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Saturday, July 2, 2022

लड़खड़ाती हिंदी आलोचना


समकालीन हिंदी साहित्य में होनेवाले विमर्शों में अधिकतर लेखक आलोचना को लेकर उदासीन दिखाई पड़ते हैं। कुछ युवा और कई अधेड़ होते लेखक तो आलोचना के अंत की घोषणा करते नजर आते हैं। फेसबुकजीवी लेखक तो आलोचना की आवश्यकता को ही नकार रहे हैं। उनके मुताबिक साहित्य को न तो आलोचक की आवश्यकता है और न ही आलोचना की। हिंदी आलोचना पर कई तरह के आरोप लगते हैं। कुछ कहते हैं कि आलोचना रचना केंद्रित नहीं रही और वो लेखक केंद्रित हो गई है। आलोचकों के अलग अलग खेमे हैं और वो अपने खेमे के लेखकों की औसत रचनाओं को भी कालजयी साबित करने में जुटे रहते हैं। इसकी वजह से आलोचना की साख छीजती है। इसमें दो राय नहीं कि आलोचक की व्यक्तिगत रुचि और संबंधों के निर्वाह की वजह से आलोचना विधा को नुकसान पहुंचा है। इसके अलावा एक महत्वपूर्ण तथ्य को भी रेखांकित किया जाना चाहिए। इस वक्त जो आलोचक सक्रिय हैं उनकी तैयारी भी उतनी नहीं है कि वो किसी रचना को व्याख्यायित करके पाठकों के सामने उसके अर्थ खोल सकें। आलोचना पर लगनेवाले तमाम आरोप सही हो सकते हैं लेकिन जो लोग आलोचना की आवश्यकता पर प्रश्न उठाते हैं उनको समझना चाहिए कि आलोचना के बिना रचना और रचनाकार की प्रतिष्ठा स्थापित नहीं हो सकती है। 

स्वाधीनता के बाद से देखें तो हिंदी साहित्य की अलग अलग विधा में अलग अलग तरह की प्रवृत्तियां दिखाई पड़ती हैं। उदाहरण के लिए कहानी में नई कहानी, अकहानी, आंचलिक कहानी, सचेतन कहानी, समांतर कहानी आदि का दौर दिखाई देता है। कविता में भी नई कविता,अकविता, प्रयोगवादी कविता, प्रगतिवादी कविता की चर्चा होती है। कविता और कहानी की इन प्रवृत्तियों को स्थापित करने में आलोचकों की बड़ी भूमिका रही है। समकालीन हिंदी साहित्यिक परिदृश्य में कोई विशेष प्रवृति नजर नहीं आती है, क्यों? क्योंकि समकालीन दौर के आलोचक इस विधा को गतिशील बनाए रखने में चूक गए। आलोचना के कई दशक पुराने औजारों के आधार पर ही रचना को परखने की ऐतिहासिक भूल हुई। हिंदी आलोचना पर तमाम तरह के आरोप लगते हैं, लेकिन आलोचना की दयनीय स्थिति क्यों हुई इसके पीछे के कारणों को जानने की गंभीर कोशिश नहीं होती। ये कोशिश इसलिए नहीं होती है कि अगर इन कारणों तक पहुंचेगें तो हिंदी आलोचना के पुराने गढ़ और मठ ध्वस्त होने लगेंगे। पाश्चात्य आलोचना के सिद्धांतों की नकल करते हुए पूर्व में जो विद्वतापूर्ण व्याख्याएं की गईं है वो सारी मान्यताएं संदेह के घेरे में आ जाएंगी। संस्कृत काव्यशास्त्र में रचना को समझने की जो प्रविधि है वो बेहद वैज्ञानिक है। इसमें जिस शब्द शक्ति की बात है वो पाश्चात्य आलोचना में कहां दिखाई देती है। हमारे देश का रस सिद्धांत या ध्वनि सिद्धांत कितनी बारीकी से कविता को विन्यस्त करता है इसकी कल्पना भी आई ए रिचर्ड्स को नहीं थी। जिस विदेशी लेखक को रस सिद्धांत या धव्नि सिद्धांत के बारे में जानकारी नहीं थी उससे सीखकर भारतीय आलोचक हिंदी कविता की व्याख्या कर रहे थे। ठीक से याद नहीं आ रहा है लेकिन कहीं पढ़ा था कि संस्कृत के अलंकारशास्त्र और उपमा के बारे में पश्चिमी आलोचकों की अज्ञानता उनको हास्यास्पद बना देती है। 

पश्चिम के आलोचकों के अलावा हिंदी आलोचना में मार्क्सवादी सिद्धातों के आधार पर रचना की आलोचना की गई। इस विचारधारा के लेखकों ने मार्क्सवादी सिद्धांतों की जड़ता को अपनी ताकत बनाने की कोशिश की। परिणाम ये हुआ कि मार्क्सवादी आलोचना जड़ होती चली गई और उनका विकास अवरुद्ध होता गया। रामचंद्र शुक्ल के बाद आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी और रामविलास शर्मा ने रचना से मुठभेड़ करते हुए आलोचना के अपने प्रतिमान बनाए। कुछ हद तक नामवर सिंह ने भी। नामवर के बाद जो भी ख्यात आलोचक हुए वो रचना से टकराने में हिचकते नजर आते हैं। मार्क्सवादी विचारधारा के प्रभाव में वो रचना को लेकर समाज की ओर जाते तो हैं लेकिन समग्रता से मूल्यांकन नहीं कर पाते हैं। इसका एक और दुपरिणाम ये हुआ कि रचना को खोलने के जो औजार रामचंद्र शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी, रामविलास शर्मा के यहां दिखाई देते हैं वो बाद के आलोचकों के यहां नहीं दिखते हैं। इन औजारों की अनुपस्थिति के कारण हिंदी आलोचना की धार कुंद होती चली गई और इस विधा में एक वैचारिक सन्नाटा पसरता चला गया। अशोक वाजपेयी कभी कभार आलोचना में तलवारबाजी करते हैं लेकिन वो भी इस विधा को गतिशील नहीं बना पाते हैं। उनकी अपनी सीमाएं हैं जिसको वो पार नहीं कर पाते हैं। बाद के आलोचकों ने भी रचना के पाठ में समय के साथ हो रहे बदलाव को पकड़ने की कोशिश नहीं की और वो आलोचना के नए प्रतिमान गढ नहीं पाए।  

पिछले दिनों सुधीश पचौरी की एक पुस्तक आई है ‘नयी साहित्यिक सांस्कृतिक सिद्धान्तकियां’। इस पुस्तक में सुधीश पचौरी ने आलोचना के नए प्रतिमान स्थापित करने की कोशिश की है। उन्होंने रचना से टकराने और फिर उसके आधार पर उसको व्याख्यित करने का आग्रह किया है। सुधीश पचौरी स्पष्ट रूप से कहते हैं कि रचना सिर्फ रचना नहीं होती वह एक जटिल और पेचीदा नेटवर्क का हिस्सा होती है। इसको वो अलग तरीके से सामने रखते हैं। इस संदर्भ में वो जायसी की पद्मावत और तुलसीदास के रामचरित मानस का उदाहरण देकर नया प्रतिमान गढ़ने का प्रयास करते हैं। वो बताते हैं कि रामचंद्र शुक्ल ने करीब नब्बे वर्ष पहले जायसी के पद्मावत की भूमिका लिखी थी और उसे प्रेमगाथाओं की काव्य परंपरा में ऊंचा स्थान दिया था। इसमें उन्होंने लौकिक प्रेम की अलौकिकता के बारे में बताया था। शुक्ल जी का ये पाठ ही पद्मावत का अंतिम पाठ बन गया। उनकी स्थापना है कि जैसे ही संजय लीला भंसाली ने 2017 में फिल्म पद्मावत बनानी आरंभ की तो इसका नया पाठ सामने आने लगा। जैसे जैसे फिल्म को लेकर विवाद बढ़ा तो पद्मावत के तीन पाठ सामने आए। सुधीश पचौरी मानते हैं कि पद्मावत का पहला पाठ फिल्मी पाठ था जिसे निर्माता निर्देशक बना रहा था जो दो सौ करोड़ रुपए की आर्थिकी से जुड़ा था। दूसरा पाठ कर्णी सेना का क्षत्रियवादी (जातिवादी) पाठ था जिसमें इस्लाम विरोधी पाठ भी सक्रिय था। तीसरा पाठ राजनीतिक रहा जिसको संसद की बहसों और चुनाव के दौरान देखा गया। उनके मुताबिक इसके बाद पद्मावत का अकादमिक पाठ भी बदला। इसी तरह से जब तुलसीदास ने रामचरित मानस की रचना की थी तो उस समय का उसका पाठ अलग था और अब बिल्कुल अलग है। अब उसको पावर टेक्सट कहा जा सकता है। 

अपनी इस पुस्तक में सुधीश पचौरी ने हिंदी आलोचना की सीमाओं पर ठीक से विचार किया है। वो मानते हैं कि आरंभ में हिंदी आलोचना खुद को संस्कृत से जोड़कर देखती थी। धीरे-धीरे वो इससे दूर होती चली गई। बाद में अंग्रेजी साहित्य शास्त्र ने उसकी जगह ले ली। वो बेहद तल्ख अंदाज में कहते हैं कि संस्कृत का काव्यशास्त्र जो हिंदी को उत्तराधिकार में मिला था उसकी कुंजियां बना ली गईं लेकिन उसमें गहरे नहीं उतरा गया। इसलिए उसका नया संस्कार नहीं हो सका। सुधीश पचौरी ने अपनी इस पुस्तक में भारतीय काव्यशास्त्र की परंपरा से रस, छंद, अलंकार, रीति, वक्रोक्ति, ध्वनि आदि पर विस्तार से प्रकाश डाला है। उन्होंने ध्वनि सिद्धांत के पुनर्पाठ की बात भी की है और इसकी पश्चिम के सिद्धांत और सिद्धांतकारों की स्थापनाओं से तुलना करके इसकी श्रेष्ठता साबित की है। हिंदी आलोचना को अगर कठघरे में खड़ा करना है तो इस तरह से करना होगा जैसे सुधीश पचौरी ने किया है। अगर हमें हिंदी आलोचना की दुर्दशा की बात करनी है तो उसकी भूल गलतियों को लेकर गंभीरता से विमर्श करना होगा।न इसका महत्वपूर्ण लाभ ये होगा कि जो ऐतिहासिक भूलें हुई हैं उसका परिमार्जन हो सकेगा।

Saturday, January 16, 2021

समय के साथ चलने की बड़ी चुनौती


इक्कीसवीं सदी का दूसरा दशक समाप्त हो गया और अब हम तीसरे दशक में प्रवेश कर चुके हैं। रचनात्मक लेखन में भी इन दो दशकों में कई बदलाव देखने को मिले। कुछ लेखकों ने अपनी कहानियों में या उपन्यासों में नए प्रयोग किए, भाषा के स्तर पर भी और कथ्य के स्तर पर भी। बावजूद इसके हिंदी में साहित्य के जितने पाठक होने चाहिए वो नहीं हैं। कहानी, कविता, उपन्यास से लेकर आलोचना और निबंध आदि की पुस्तकों की बिक्री के आंकड़े उत्साहजनक नहीं हैं। कई बार ये कहा जाता है कि पुस्तकों की बिक्री के आंकड़े जानने का कोई वैज्ञानिक तरीका हमारे पास नहीं है इस वजह से ये भ्रम बनता है। हो सकता है कि इसमें सचाई हो लेकिन अगर पुस्तकों की बिक्री होती है तो इसके संकेत तो मिलने ही लगते हैं। सुरेन्द्र वर्मा के उपन्यास ‘मुझे चांद चाहिए’ का उदाहरण दिया जा सकता है। खैर ये अलग विषय है जिसपर फिर कभी चर्चा होगी। अभी हम बात कर रहे हैं कि हिंदी में कहानियों या उपन्यासों के लेखन प्रविधि में कोई बदलाव हुआ या नहीं। भाषा के स्तर पर कोई नया प्रयोग हुआ कि नहीं। अगर हम सबसे पहले कहानी की बात करें तो मुझे लगता है कि हिंदी कहानी की दुनिया बहुत नहीं बदली । हिंदी कहानी समय के साथ चल नहीं पा रही है और पिछड़ती नजर आ रही है। आज के ज्यादातर कहानीकार अब भी बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में लिखी गई कहानियों के विषय से अलग जाकर कोई नवोन्मेष करते नहीं दिख रहे। हिंदी की कहानियां गावों से मुक्त नहीं हो पाई है। हिंदी कहानी गांव की भाषा से भी कहां मुक्त हो पाई है। 

जब हम हिंदी कहानी के कम होते पाठक की बात करते हैं तो तमाम साहित्यिक गुणों और अवगुणों की चर्चा करते हैं लेकिन एक बेहद महत्वपूर्ण बात की ओर हमारा ध्यान नहीं जाता है। हिंदी के कहानीकार ऐसे दोष का शिकार हो रहे हैं जिसको रेखांकित किया जाना आवश्यक है। हिंदी के कहानीकार अब भी गांव भी भाषा लिख रहे हैं जबकि कहानी की पहुंच शहरी पाठक तक अधिक है। ज्यादातर कहानियां गांव की पृष्ठभूमि पर लिखी जा रही हैं जबकि उनकी पहुंच शहरी पाठकों तक अपेक्षाकृत अधिक है। हिंदी के ज्यादातर कहानीकार अपनी कहानियों में अपने पात्रों को उन घटनाओं और परिस्थियों से मुठभेड़ करवाते हैं जो गांव की होती हैं। शहरी घटनाओं और शहरी परिस्थितियों को चित्रित करने का हुनर अभी हिंदी के कम कहानीकारों के पास है। परिणाम ये होता है कि शहरी पाठक गांव की भाषा और परिस्थितियों या घटनाओं से अपना तादात्म्य नहीं बना पाता है और वो हिंदी कहानी से विमुख होने लगते हैं। शहरी पाठक को इस वजह से रेखांकित कर रहा हूं क्योंकि साहित्यिक कृतियों की पहुंच गांवों की अपेक्षा शहरों में अधिक है। गांवों और कस्बों में पुस्तकों की दुकानें कम हो रही हैं, कम तो शहरों में भी हैं लेकिन शहरी इलाकों में ऑनलाइन या ई कॉमर्स प्लेटफॉर्म इस कमी को बहुत हद तक पूरा कर देते हैं। हिंदी के कहानीकारों को इस ओर ध्यान देने की आवश्यकता है। हिंदी के कुछ कहानीकारों ने शुरुआती कहानियों में शहरी परिवेश को उठाया  लेकिन फिर वो गांव चले गए। हिंदी कहानी की इस स्थिति को देखते हुए मुझे फ्रांसीसी कथाकार सार्त्र का एक कथन याद पड़ता है। सार्त्र ने कभी कहा था कि वो एक ऐसे लेखक हैं जिनको इस बात की चिंता है कि उनके पाठक तो हैं पर पब्लिक नहीं है (वी हैव रीडर्स बट वी हैव नो पब्लिक)। सार्त्र अपने पाठकों से आगे जाकर अपने लिए जनता की तलाश करते हैं उसके लिए प्रयत्न करते हैं। लेखन के स्तर पर भी और पाठकों से आत्मीयता बढ़ाने के अन्य काम करते हुए भी। लेकिन हिंदी के कहानीकार अपने पाठकों की ही बहुत अधिक चिंता नहीं करते हैं तो उनसे ये अपेक्षा करना, कि वो अपनी रचनाओं के लिए ‘पब्लिक’ की तलाश करेंगे, व्यर्थ है। 

यही हाल हिंदी के उपन्यासों का भी है। जहां तक उपन्यासों की पहुंच है वहां की भाषा में उपन्यास कम लिखे जा रहे हैं। हिंदी के पाठक हैं, वो पढ़ना भी चाहते हैं लेकिन उनको उनकी पसंद की सामग्री नहीं मिल पाती है। आज भी हिंदी में लिखे जा रहे अधिकांश उपन्यासों की कथावस्तु या उसकी भाषा काफी पुरानी हो गई है। हिंदी उपन्यास भी हिंदी कहानियों की तरह गांव से बाहर नहीं निकल पा रही है। उपन्यासों में गांव में आ रहे बदलावों को रेखांकित नहीं किया जा रहा है। समकालीनता की हिंदी में बहुत बातें होती है लेकिन लेखन को समकालीन बनाने के लिए वैसे विषय नहीं उठाए जाते हैं। कोरोना काल में जिस तरह से शहरों में काम करनेवाले लोग अपने गांव की ओर लौटे, उसने गांव का पूरा समीकरण बदल दिया। पारिवारिक से लेकर सामाजिक संरचना पर असर पड़ा लेकिन हिंदी कहानी या हिंदी उपन्यास इस बदलाव को अबतक नहीं पकड़ पाई है। इसके पहले की सामाजिक घटनाओं को भी समकालीन हिंदी रचनाशीलता में स्थान नहीं बना पाई है। दो चार लेखक लिखते तो हैं लेकिन वो पर्याप्त नहीं माना जा सकता है। यह अनायास नहीं है कि हिंदी में विभाजन पर बहुत ज्यादा नहीं लिखा गया, न ही उसकी त्रासदी पर और ना ही उसके सामाजिक असर पर। यशपाल और भीष्म साहनी ने लिखा जरूर पर इतनी बड़ी त्रासदी के लिए वो बहुत कम है। भारत का विभाजन मानवता के इतिहास में सबसे बड़ी घटनाओं में से एक है। इस बात पर हिंदी के साहित्यकारों को गंभीरता से विचार करना चाहिए कि समय को पकड़ पाने और उसको अपनी रचनाओं में उतार पाने में वो क्यों पिछड़ जा रहे हैं। इक्सीवीं शताब्दी के दूसरे दशक में हिंदी में कुछ नए लेखक आए जिन्होंने अपनी रचनाओं में शहरी युवाओं की कहानियां उनकी भाषा में लिखीं। पाठकों ने ऐसे लेखकों को पसंद भी किया। उनके उपन्यासों को लेकर साहित्य जगत में चर्चा भी हुई लेकिन वो अपनी ही बनाए खांचे को तोड़कर बाहर नहीं निकल पाए और खुद को दोहराने लगे। विश्वविद्यालय कैंपस से बाहर निकलते ही उनके लेखन की सीमाएं सामने आ गईं। 

इससे इतर अगर हम देखें तो सिनेमा ने बदलते हुए समय को पकड़ा। जब व्यवस्था से विद्रोह की बात थी तो एंग्री यंग मैन आया। जब देश में उदारीकरण की आहट सुनाई देने लगी तो तो हिंदी सिनेमा में एंग्री यंग मैन की जगह ऐसे नायक ने ले ली जो कॉलेज का छात्र है। उसके अपने सपने हैं, वो अपने फैसले खुद लेना चाहता है। फिर जब हिंदी सिनेमा इक्कीसवीं सदी में प्रवेश करता है तो उसकी कहानियां फिर बदलती हैं और वो शहरों की यथार्थवादी कहानियों तक आता है। समाज में प्रचलित उन मुद्दों पर फिल्में बनने लगती हैं जिसपर कम बात होती थी। फिल्मों में संवाद की भाषा बदलती है, गानों के बोल बदलते हैं। विकी डोनर, पीकू, दम लगाके हईसा, बैंड बाजा बारात, लेडीज वर्सेज रिकी बहल से लेकर गली बॉय तक पहुंचती है। इस बदलाव को लोगों ने पसंद भी किया और फिल्में हिंट भी हुईं। सार्त्र के शब्द उधार लेकर अगर कहें तो इन फिल्मों को ‘पब्लिक’ भी मिली। हिंदी कहानीकारों के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वो समय के साथ चलें और उन पाठकों का ध्यान रखें जहां तक उनकी रचनाएं पहुंच सकती हैं। अगर ऐसा हो पाता है तो वो हिंदी कथा जगत के लिए एक आदर्श स्थिति होगी। अन्यथा हिंदी कहानी भी उसी गति को प्राप्त हो जाएगी जिस गति को हिंदी की आर्ट फिल्में प्राप्त हुईं। 

Monday, September 30, 2019

'लेडी नामवर' की उदार अपेक्षा


हिंदी के चर्चित लेखक और अनुवादक प्रभात रंजन ने फेसबुक पर लिखा, ‘मनोहर श्याम जोशी अक्सर एक बात कहते थे तुम हिंदी वाले हिंदी को ढंग का एक लेखक भी नहीं दे पाए (उनकी मुराद मेरे जैसे हिंदी के विद्यार्थियों से होती थी)। हिंदी के अधिकांश बड़े लेखक वे हैं जो मूलत: हिंदी भाषा-साहित्य के विद्यार्थी नहीं हैं। उसके बाद वो नाम गिनाना शुरू करते- प्रेमचंद, जैनेन्द्र, बच्चन, अज्ञेय, निर्मल वर्मा, रामविलास शर्मा, भीष्म साहनी, कमलेश्वर, कृष्ण बलदेव वैद, अशोक वाजपेयी आदि आदि के बाद कुछ देर रुककर कहते और मैं ( वे स्वयं विज्ञान स्नातक थे)। एक बार मैंने जवाब दिया कि भले अधिकांश लेखक हिंदी के बाहर के रहे हों लेकिन आचार्य तो एक हिंदी वाला ही है, नामवर सिंह। जोशी जी अपना चश्मा उतारकर कुछ देर अपनी आंखों को मलते रहे, फिर चश्मा पहनकर बोले, तुम हिंदी वाले दूसरा नामवर भी पैदा नहीं कर पाओगे।‘ जैसा कि आमतौर पर होता है कि प्रभात रंजन की पोस्ट पर तरह तरह के कमेंट आते हैं, मनोरंजक भी गंभीर भी, चुटीले भी, कुंठा से भरे हुए भी, प्रशंसात्मक भी, उस दिन भी आए। सबसे दिलचस्प टिप्पणी लिखी वरिष्ठ लेखिका ममता कालिया ने। उन्होंने लिखा, ‘अब एक महिला नामवर की जरूरत है। कुर्सी खाली पड़ी हुई है। रोहिणी अग्रवाल से हम सबको उम्मीद है।‘  ममता जी बेहद सजग लेखिका हैं और शब्दों का चयन सावधानी से करती हैं लेकिन ऐसा लगता है कि अतिरिक्त स्नेह में शब्दों के चयन में वो उदार हो गईं। रोहिणी अग्रवाल में उनको महिला नामवर बनने की उम्मीद नजर आ गई। अब फेसबुक पर चलनेवाली बहसों में या फेसबुक की टिप्पणियों में राय तो फैसले की शक्ल में ही आती है जिसका आधार भी आवश्यक नहीं होता। ममता कालिया की टिप्पणी भी इसी शक्ल में आई लेकिन चूंकि उन्होंने अपेक्षा की थी लिहाजा उसको फैसले की तरह नहीं देखकर अपेक्षा की तरह देखते हैं। लेकिन ममता कालिया की इस टिप्पणी में अपेक्षा के साथ-साथ उम्मीद भी थी, इस वजह से जब मैंने इस टिप्पणी को देखा तो चौंका । ममता कालिया जैसी वरिष्ठ और संजीदा रचनाकार को किसी भी लेखक में नामवर सिंह बनने की उम्मीद नजर आती है तो उसको गंभीरता से लेना चाहिए। उसके लेखन का गंभीरता से विश्लेषण करना चाहिए। रोहिणी अग्रवाल विश्वविद्यालय में हिंदी पढ़ाती हैं। निरंतर समीक्षानुमा टिप्पणियां करती हैं लेकिन आलोचना जिस अनुशासन और तैयारी की मांग करती है वो उनकी टिप्पणियों में अनुपस्थित दिखता है। एक तो उनकी ज्यादातर टिप्पणियां प्रशंसात्मक होती हैं। दूसरे ज्यादातर रचनाएं उनको आह्लाद और आनंद से भर देती हैं। वो ज्यादातर उन्हीं कृतियों पर टिप्पणी करती हैं जो ‘अद्भुत’ होती हैं और ‘लंबी लकीर’ खींचती हैं। अभी कुछ दिनों पहले उन्होंने लक्ष्मी शर्मा की कहानी पर एक टिप्पणी लिखी उसका एक अंश देख सकते हैं, ‘जानती हूं कहानी के प्रभाव से चौतरफा घिर कर मैं बहुत कुछ अतिशयोक्तिपूर्ण कह रही हूं। खुद अपने को बरजना और दुरुस्त करना भी चाहती हूं कि स्त्री की दुरावस्था में स्वयं स्त्री का भी हाथ है। चौबीस घंटे पुरुष को कोसते रहना अपनी निष्क्रियता और कमतरी का स्वीकार है। लेकिन क्या यह भी आज के प्रगतिशील उदार समय का सच नहीं कि डांट-फटकार उपहास-उपेक्षा खाने की प्लेट में परोसी जानेवाली कुछ डिशेज हैं जिन्हें बुद्धिजीवी कमाऊ स्त्री भी पारिवारिक शांति के नाम पर निगल लेती है ?... लक्ष्मी शर्मा की कहानी ‘रानियां रोती नहीं’ पढ कर मन में उगी रॉ प्रतिक्रिया, आलोचना तो लिख नहीं पाई लक्ष्मी जी, चित्त का उबाल आलोचना के आधार को तहस नहस कर देता है न!’ ये टिप्पणी उनकी है जिनसे ममता कालिया नामवर सिंह बनने की उम्मीद कर रही हैं। इनके बिंब देखिए, जब वो लिखती हैं डांट-फटकार और उपहास-उपेक्षा को खाने वाली प्लेट में परोसी जानेवाली डिशेज बताती हैं। ये बिंब उत्तर आधुनिकता के नाम पर छात्रों को तो पढ़ाई जा सकती हैं लेकिन क्या इस तरह के बिंबों को अपनी टिप्पणियों में रचकर कोई नामवर हो सकता है या नामवर के आसपास भी पहुंच सकता है। या इस तरह की भाषा और बिंब को हिंदी आलोचना स्वीकार करेगी। दूसरे उनके एक और शब्द ने चकित किया वो है ‘रॉ’ प्रतिक्रिया। काफी देर तक को ‘रॉ’ का मतलब समझ नहीं पाया। फिर लगा कि वो अनगढ़ प्रतिक्रिया की बात कर रही हैं। यह तो कतई हिंदी आलोचना की भाषा नहीं हो सकती। यह कहा जा सकता है कि उपरोक्त टिप्पणी फेसबुक पर लिखी गई है इसलिए इसमें गंभीरता से नहीं लेना चाहिए । पर प्रतितर्क ये भी हो सकता है कि एक सार्वजनिक मंच पर की गई टिप्पणी से उसके लेखक की भाषा और भाव के संकेत तो मिल ही सकते हैं। हिंदी में कहा जाता है कि अच्छी आलोचना रचना की ही तरह भाषा का शास्त्रीय नहीं बल्कि सृजनात्मक उपयोग करती है। 
ममता कालिया ने जब रोहिणी अग्रवाल में संभावना देखी और उनका नाम सार्वजनिक तौर पर लिखा तो एक किस्से का स्मरण हो आया जो हिंदी के एक वरिष्ठ उपन्यासकार ने बताया था। हुआ यूं कि वो एक दिन अपने एक मित्र की पुस्तक प्रकाशन की सिफारिश लेकर हिंदी के शीर्ष प्रकाशकों में से एक के यहां पहुंचे। बातचीत शुरू हुई और उपन्यासकार महोदय ने अपने आने का उद्देश्य प्रकाशक महोदय को बताया। पूरी बात सुनने के बाद प्रकाशक महोदय ने जो उत्तर दिया वो आलोचना और समीक्षा पर की गई सटीक टिप्पणी थी। प्रकाशक ने उपन्यासकार से कहा कि आप जिनकी सिफारिश लेकर आए हैं वो समीक्षा लिखते हैं और हम समीक्षा की पुस्तक प्रकाशित करते नहीं हैं। जब उपन्यासकार ने जोर दिया तो प्रकाशक और खुले और बोले कि आलोचना के लिए एक विशेष तैयारी और अध्ययन की जरूरत होती है। आलोचना योजनाबद्ध तरीके से की जाती है जबकि समीक्षा करने के अन्यान्य कारण होते हैं। अब उपन्यासकार महोदय सन्न। उनसे कुछ कहते नहीं बना और वो प्रकाशक के यहां से उठकर चले आए।
दरअसल आलोचना बहुत कठिन विधा है। इस विधा का साधने के लिए आवश्यक है कि आप अपने देश की लेखन परंपरा से पूरी तरह परिचित हों। ना सिर्फ परंपरा बल्कि समकालीन लेखक क्या लिख रहे हैं और वो अपने लेखन में किस तरह का प्रयोग कर रहे हैं, अपने लेखन से अपनी परंपरा को किस चरह से चुनौती दे रहे हैं आदि। इसके अलावा वैश्विक स्तर पर इस वक्त साहित्य में किस तरह का लेखन हो रहा है, किस तरह की नई लेखकीय प्रवृत्ति आकार ले रही है इसका भी भान हो। नामवर सिंह ने ना सिर्फ विदेशी साहित्य को पढ़ा था बल्सि संस्कृत समेत अन्य भारतीय भाषाओं के लेखन से भी परिचित थे। नामवर सिंह की एक खूबी और थी कि वो अपने समकालीनों को तो पढ़ते ही थे, नए से नए लेखकों की रचनाएं भी उनकी नजर से गुजरती थी और जब भी उनको उचित लगता था तो उसपर टिप्पणी भी करते थे। कभी भी ऐसा नहीं देखा गया कि उनके ‘चित्त के उबाल ने उनकी आलोचना के आधार को तहस नहस कर दिया हो’। आलोचक को रचना पढते समय और उसकी आलोचना करते समय अपनी संवेदनाओं पर काबू रखना पड़ता है। राग-द्वेष और मित्रता आदि से तो दूर रहना ही पड़ता है। यहां निराला और पंत का उदाहरण देना उचित होगा। ये छायावाद के दौर की बात है। पंत और निराला में बेहद घनिष्ठ संबंध थे लेकिन जब पंत की कृति पल्लव पर लिखने की बात आई तो निराला ने अपनी घनिष्ठता को अलग रखते हुए उसपर बेहद कठोर टिप्पणी की थी। इसके ठीक उलट राग-द्वेष का भी उदाहरण है। जब विजयमोहन सिंह कहते हैं कि ‘राग दरबारी तो घटिया उपन्यास है और मैं उसको हिंदी के पचास उपन्यासों की सूची में भी नहीं रखूंगा और ये तीन कौड़ी का उपन्यास है।‘ इस तरहब की प्रवृत्ति ने तब जोर पकड़ा जब हिंदी आलोचना ने साहित्य की आसान पंगडंडियों पर चलना शुरू कर दिया और आलोचक रचनाकार की परवाह करने लगे। आलोचना लिखते समय ये सोचने लगे कि अमुक रचनाकार पर की गई टिप्पणी से कहीं बो बुरा ना मान जाएं। आलोचना राजनीति नहीं है जिसमें समझौते की कोशिश की जाए और सभी पक्षों की सहूलियतों का ध्यान रखा जाए। आलोचना दायित्व और विवेक का वो रास्ता है जिसमें किसी रचना को बेहतर ढंग से समझकर सिर्फ और सिर्फ रचना के आधार पर टिप्पणी की जाए और आलोचना लिखते समय रचनाकार कहीं से सोच में भी न आए। अगर कोई आलोचक ऐसा कर पाए तो उससे नामवर सिंह बनने की उम्मीद की जा सकती है।

Saturday, June 23, 2018

साहित्य में उठाने गिराने का खेल


पिछले दिनों एक छोटे से साहित्यिक जमावड़े में बात ‘नई वाली हिंदी’ से शुरू हुई, जिसमें उन कृतियों पर लंबी बात हुई, फिर अन्य प्रकाशनों से प्रकाशित होनेवाले छोटे-छोटे उपन्यासों पर चर्चा चल निकली। वहां से होते होते साहित्य के तथाकथित मुख्यधारा के लेखन पर बात होने लगी। सबके अपने अपने विचार थे, ज्यादातर के कृतियों पर कम लेखकों पर ज्यादा। बातों से ऐसा लग रहा था कि अब साहित्य से जुड़े ज्यादातर लोग किसी भी लेखक पर अपनी राय एकाध कहानी या एक उपन्यास पढ़कर बना रहे हैं। राय भी ऐसी कि या तो एकदम से खारिज या एकदम से प्रेमचंद से तुलना। उस दिन वहां हो रही बातचीत से एक बात समझ में आई कि हिंदी में आलोचना पर इन दिनों क्यों इतने सवाल उठ रहे हैं। क्यों फेसबुक पर होनेवाली साहित्यिक चर्चाओं में हर कोई आलोचना पर प्रश्नवाण चलाता नजर आता है। आलोचना को कठघरे में खड़ा करनेवाले ज्यादातर लोग अपने मन की नहीं होते देख उत्तेजित हो जाते हैं और उसी उत्तेजना में पहले आलोचक और फिर आलोचना विधा को ही खारिज करने के उपक्रम में जुट जाते हैं। राजकमल प्रकाशन के संपादकीय निदेशक सत्यानंद निरुपम ने उस दिन बहुत महत्वपूर्ण बात कही जिसको रेखांकित किया जाना चाहिए। निरुपम ने कहा कि ‘आज लोग पढ़ते ही नहीं हैं, अपनी साहित्यिक विरासत के बारे में जानने की कोशिश ही नहीं करते हैं। खुद या उनके मित्र जो कर देते हैं उसको वो सबसे महत्वपूर्ण मान लेते हैं। इस वजह से इस तरह के बयान आते हैं कि साहित्य में पहली बार, साहित्य में ऐतिहासिक काम आदि आदि।‘ सत्यानंद निरुपम की बात में एक वाक्य मैं भी जोड़ना चाहता हूं कि आज के ज्यादातर लेखक खासतौर पर नए और युवा लेखक अज्ञानता के अपने ढिंढोरे को सार्वजनिक रूप से पीटते भी हैं। यह चिंता की बात है। साहित्य से जुडे लोगों में पढ़ने की प्रवृत्ति का घोर ह्रास हुआ है। गूगल बाबा का भी इसमें योगदान है। अब हर हाथ में मोबाइल और उसमें इंटरनेट कनेक्शन की वजह से गूगल पर साहित्य के बारे में उपलब्ध जानकारी तक पहुंचना आसान हो गया है। लेकिन आलोचना के मैदान में उतरने के लिए या किसी कृति पर टिप्पणी करने के लिए गूगल पर्याप्त आधार नहीं दे पाता है। गूगलीय ज्ञान के आधार पर फेसबुक पर जिस तरह का साहित्यिक विमर्श होता है वह हास्यास्पद होता है। फेसबुक पर चलनेवाले इस गूगलीय साहित्यिक विमर्श को हास्यास्पद कहकर छोड़ा नहीं जाना चाहिए। खासकर तब जब साहित्य की अपेक्षाकृत नई पीढ़ी इसका शिकार हो रही है। यह बेहद चिंता की बात है। चिंता इस वजह से कि यह प्रवृत्ति लगातार बढ़ती जा रही है। कई लेखक तो अज्ञानता में हिंदी में नई विधा की शुरुआत आदि की बात तक करने लग जाते हैं जो उनकी नासमझी की ओर इशारा करता है।
अब अगर हम चिंतनीय प्रवृत्ति के बढ़ने के कारणों की पड़ताल करते हैं तो दो तीन बातें समझ में आती हैं। पहली तो ये कि फेसबुक पर लेखकों ने अपनी अपनी बस्ती बसा और बना ली है। इस बस्ती में रहनेवाले लेखक या साहित्यिक रुचि के मित्रगण एक दूसरे की तारीफ में प्राणपन से लग जाते हैं। यहां तक तो ठीक था कि मित्र की तारीफ करें लेकिन तारीफ के लिए बेहद उदार शब्दावली का उपयोग टिप्पणी करनेवाले से ज्यादा कृतिकार को नुकसान पहुंचा देता है। अब अगर किसी की कृति की तुलना प्रेमचंद से या मंटो से होने लगे और उसका कोई आधार या तर्क प्रस्तुत ना किया जाए तो उसको गंभीरता से नहीं लिया जाता है बल्कु उसका मजाक ही बनता है। फेसबुक पर तारीफ करनेवाले बस्तीबद्ध लेखक आलोचना की शब्दावली का भी इस्तेमाल करने लगते हैं और तर्क नहीं दे पाते तो फिर वो तारीफ नहीं ढ़िढोरा की तरह बजता हुआ प्रतीत होता है।
अगर हम देखें तो नहीं पढ़ना या कम पढ़ना एक बड़ी समस्या के तौर पर साहित्य में उपस्थित हो गया है। समस्या तब और बड़ी हो जाती है जब कम पढ़ा और बड़ा बयान दिया जाता है। फेसबुक पर इन दिनों मंटो और राजकमल चौधरी को लेकर इसी तरह की एक बहस चलाने की कोशिश की जा रही है। किसी भी लेखक के बारे में यह कह देना बहुत आसान होता है कि फलां का मूल्यांकन होना अभी शेष है। राजकमल चौधरी हिंदी के बड़े लेखक हैं लेकिन क्या ये जरूरी है कि उनके बड़प्पन को उछालने के लिए मंटो को छोटा साबित करें। सवाल तो यह भी उठता है कि फेसबुक पर बीस पंक्तियों की कैजुअल टिप्पणी से राजकमल चौधरी की रचनात्मकता स्थापित हो जाएगी? क्या नामवर सिंह को कठघरे में खड़ा करके राजकमल चौधरी का मूल्यांकन हो जाएगा? राजकमल चौधरी की रचनात्मकता को अगर नई पीढ़ी के सामने लाना है तो पूर्व की गलतियों को रेखांकित करते हुए छाती कूटने से बेहतर है कि आप उनके लेखन पर गंभीरता से लिखें और नए पाठकों को उसके बारे में बताएं। फेसबुकिया टिप्पणी और पूर्व की गलतियों को रेखांकित करते हुए सिर्फ चंद लाइक्स और कुछ तारीफ भरी टिप्पणी मिलेगी जिससे राजकमल का महत्व किसी भी तरह से रेखांकित नहीं होगा।
पहले यह काम कुछ आलोचक करते थे जो आलोचना के नाम पर लेखकों को
उठाने गिराने का खेल खेलते थे। किसी को साहित्य से दाखिल खारिज करने की सुपारी लेते थे। एक खास विचारधारा के आलोचक सिंडिकेट की तरह काम करते थे जो अपने विरोधियों को साहित्य की दुनिया से बाहर कर देने के लिए तमाम तरह के दंद फंद करते थे। हर दौर में ऐसे कुछ आलोचक हुए लेकिन हर दौर में वैसे भी आलोचक हुए जिन्होंने बहुत गंभीरता के साथ आलोचना कर्म और आलोचक धर्म का निर्वाह किया। कुछ वर्षों पूर्व विजय मोहन सिंह का एक इंटरव्यू याद आ रहा है जिसमें उन्होंने उपन्यास ‘राग दरबारी’ को लेकर कहा था कि - ‘राग दरबारी’ तो घटिया उपन्यास है । मैं उसे हिंदी के पचास उपन्यासों की सूची में भी नहीं रखूंगा । पता नहीं ‘राग दरबारी’कहां से आ जाता है ? वह तीन कौड़ी का उपन्यास है । हरिशंकर परसाईं की तमाम चीजें ‘राग दरबारी’ से ज्यादा अच्छी हैं । वह व्यंग्य बोध भी श्रीलाल शुक्ल में नहीं है जो परसाईं में है । उनके पासंग के बराबर नहीं है श्रीलाल शुक्ल और उनकी सारी रचनाएं।‘ लेकिन अपने इस इंटरव्यू में विजय मोहन सिंह ये नहीं बता पाए थे कि ‘राग दरबारी’ क्यों और कैसे घटिया और तीन कौड़ी का उपन्यास है। विजय मोहन सिंह ने अपने उसी इंटरव्यू में बाबा नागार्जुन की तुलना भी काका हाथरसी से कर दी थी। दंभ के साथ ये भी कहा था कि चूंकि केदार जी को ये बात बुरी लगी थी इसलिए उन्होंने वो टिप्पणी वापस ले ली थी।   
‘राग दरबारी’ को खारिज तो गोपाल राय जी ने भी किया था जब उन्होंने लिखा था- व्यंग्य के लिए कथा का उपयोग लाभदायक होता है पर उसके लिए उपन्यास का ढांचा भारी पड़ता है। उपन्यास में व्यंग्य का उपयोग उसके प्रभाव को धारदार बनाता है पर पूरे उपन्यास को व्यंग्य के ढांचे में फिट करना रचनाशीलता के लिए घातक होता है । व्यंग्यकार की सीमा यह होती है कि वह चित्रणीय विषय के साथ अपने को एकाकार नहीं कर पाता है । वह सृष्टा से अधिक आलोचक बन जाता है । सृष्टा अपने विषय से अनुभूति के स्तर पर जुड़ा होता है जबकि व्यंग्यकार जिस वस्तु पर व्यंग्य करता है उसके प्रति निर्मम होता है ।‘ गोपाल राय ने अपनी स्थापना के समर्थन में एक आधार प्रस्तुत किया था, तर्क दिए थे। सहमति-असहमति अलग चीज है। दोनों तरह के आलोचक हर दौर मे रहे हैं। लेकिन जिस तरह से विजय मोहन सिंह ने राग दरबारी को घटिया बताया या जिस तरह से राजकमल चौधरी को लेकर दूसरे साहित्यकारों पर कीचड़ उछाले जा रहे हैं या जिस तरह से नई वाली हिंदी के लेखकों को खारिज किया जा रहा है वो गंभीर चिंतन की मांग करता है । किसी के भी लेखन को खारिज करना बहुत आसान है लेकिन तर्कों के साथ खारिज करना बेहद मुश्किल है क्योंकि उसके लिए आपको अपने अध्ययन का दायारा बढ़ाना पड़ता है, अपने पूर्वग्रह को अलग रखकर वस्तुनिष्ठता के साथ बात करनी होती है। क्या इसके लिए हिंदी साहित्य के फेसबुक वीर तैयार है ? अगर ऐसा हो सकता है तो साहित्य का भी भला होगा और लेखकों का भी। भला इस तरह से कि टिप्पणीकारों की साख बढ़ेगी और सकारात्मक विमर्श की राह खुलेगी जिससे हिंदी साहित्य समृद्ध होगा।  



Saturday, March 17, 2018

आलोचना की साख पर सवाल


हिंदी साहित्य में आलोचना एक ऐसी विधा है जिस पर नियमित अंतराल पर सवाल उठते रहते हैं, कई बार उचित, तो बहुधा व्यक्तिगत राग-द्वेष की वजह से। इन दिनों फिर से आलोचना की स्थिति को लेकर सोशल मीडिया से लेकर पत्र-पत्रिकाओं में लिखे जा रहे हैं। कुछ कहानीकार, कुछ कवि अपने अधकचरे ज्ञान के आधार पर आलोचना को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश गाहे बगाहे करते रहते हैं। आलोचना विधा को समझे बगैर, उसकी गंभीरता और उसके औजारों को जाने बगैर उसपर सवाल उठाना हास्यास्पद लगता है। हद तो तब हो जाती है जब कुछ वरिष्ठ होते रचनाकार भी आलोचना के खिलाफ कोरस में शामिल हो जाते हैं और आलोचना को परजीवी विधा तक करार दे देते हैं। उनका बहुत साधारण सा तर्क होता है कि रचना के बगैर आलोचना का अस्तित्व ही नहीं है। सतही तौर पर ये आकलन ठीक लग सकता है, फेसबुक आदि पर इस तरह की टिप्पणी लिखनेवालों को लाइक्स के साथ-साथ वाहवाही आदि भी मिल जाती है, लेकिन आलोचना पर गंभीरता से काम करनेवालों की राय जुदा होती है। दरअसल जब आलोचना के परजीवी होने की बात की जाती है तो अज्ञानता में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष संबंध के सिद्धांत पर विचार नहीं किया जाता है। रचना के बगैर आलोचना के अस्तित्व को नकारनेवाले यह भूल जाते हैं कि बगैर आलोचना के रचना के अर्थ खुलते ही नहीं हैं। यह आलोचक ही होता है जो किसी भी कृति या रचना के अंदर की संवेदना की परतों को रेशा दर रेशा अलग कर देख पाता है और उसको पाठकों के सामने पेश करता है। रचना और आलोचना के बीच बहुत गहरा संबंध होता है जिसको समझने के लिए भी गहरी अंतर्दृष्टि की आवश्यकता होती है, इसका सामान्यीकरण कर इस संबंध को समझना लगभग असंभव है। मुझे ठीक से याद नहीं कि किस आलोचक ने ये कहा था- ‘आलोचना रचना है, इसका एक अर्थ यह भी है कि अच्छी आलोचना रचना की ही तरह भाषा का शास्त्रीय नहीं बल्कि सृजनात्मक उपयोग करती है, जिससे उसे पढ़ते समय तक एक स्तर पर रचना को पढ़ने का आनंद मिलता है। जैसे रचना की एक रचना प्रक्रिया होती है, वैसे ही निश्चित रूप से आलोचना की भी। उदाहरण के तौर पर जब नामवर सिंह के साठ के दशक में नई कहानियां पत्रिका में स्तंभ लिखते थे तो उसको पढ़ते हुए पाठकों को किसी रचना से कम आस्वाद नहीं मिलता था। इसी तरह से विजयदेव नारायण साही के लेख शमसेर की काव्यानुभूति की बनावट को पढ़ें तो किसी बेहतरीन रचना को पढ़ने का आनंद मिलता है।‘ यह ठीक कहा गया है। अस्सी के दशक में ये हिंदी साहित्य में ये शोर उठा था कि हिंदी आलोचना समसामयिक हो गई है। कहने का मतलब यह कि हिंदी आलोचना समकालीन रचनाकारों और कृतियों तक ही सीमित हो गई है। उस वक्त यह भी कहा गया था कि हिंदी आलोचना इतिहास और परंपरा की तरफ मुड़कर नहीं देखती। उस वक्त की स्थितियों का आकलन करने पर इसमें तथ्यों की कमी नजर आती है। उस दौर में सूर से लेकर मीरा तक और तुलसी से लेकर कबीर तक पर काम हो रहे थे। बार बार आलोचक मीरा बाई की कविताओं की ओर लौटते थे।
ऐसा नहीं है कि इस वक्त ही आलोचना को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं, आलोचना की प्रविधि और उसके तौर तरीकों पर समय समय पर सवाल भी उठते रहे हैं और आलोचक अपने तरीके से उसका उत्तर भी देते रहे हैं। शुक्ल जी के जमाने से लेकर अबतक आलोचना पर सवाल उठते रहे हैं। अशोक वाजपेयी ने भी आलोचना को लेकर कई तरह की स्थापनाएं दीं और कइयों पर पर प्रश्नचिन्ह लगाया। विवाद भी हुआ लेकिन बावजूद इसके रचना और आलोचना दोनों अपनी गति से चलती रही बल्कि कहें कि चल ही रही है। चंद दिनों पहले की बात है, हिंदी के वरिष्ठ उपन्यासकार भगवानदास मोरवाल ने आलोचना को लेकर एक टिप्पणी की थी। उन्होंने कहा था कि हिंदी आलोचना अब भी रामचंद्र शुक्ल और हजारी प्रसाद द्विवेदी के बीच ही झूल रही है। उसके पहले संभवत: स्तंभकार कुलदीप कुमार ने लिखा था कि हिंदी का प्राध्यापक नौकरी लगते ही आलोचक हो जाता है जबकि अंग्रेजी में ऐसा नहीं है। भगवानदास मोरवाल के इस कथन के बाद मुझे दिल्ली विश्वविद्यालय में प्राध्यापक गोपेश्वर सिंह का रामचंद्र शुक्ल और द्विवेदी जी की आलोचना पर एक लेख पढ़ने को मिला था। कुलदीप कुमार ने जिस प्रवृत्ति की ओर इशारा किया वो तो हिंदी आलोचना की सबसे बड़ी बाधा है ही। यह अकारण नहीं था कि राजेन्द्र यादव विश्वविद्यालयों के हिंदी विभागों को प्रतिभा की कब्रगाह कहा करते थे।
बावजूद इन सारी चीजों के हिंदी आलोचना में एकरसता से इंकार नहीं किया जा सकता है। इंकार तो इस बात से भी नहीं किया जा सकता है कि हिंदी के जो नए आलोचक उभर कर आ रहे हैं वो हीं आलोचना की लीक से हटकर कुछ नया नहीं कर पा रहे हैं। मार्क्सवादी आलोचना के फॉर्मूले पर रचनाओं को कसते हैं। जब कसौटी ही पुरानी हो जाए तो उसके नतीजे तो दोषपूर्ण होंगे ही। इसके अलावा एक और बात जो आलोचना को सवालों के कठघरे में खड़ा करती है वो है आलोचनाकर्म पर व्यक्तिगत रागद्वेष का हावी हो जाना। इस बात के अनेक उदाहरण हिंदी साहित्य में मौजूद हैं जब आलोचकों ने मित्रताभाव का निर्वाह किया। एक ऐसी आलोचक हैं जिनको सभी कृतियां अद्भुत ही लगती हैं। सोशल मीडिया पर वो नियमित अंतराल पर अद्भुत कृतियों के नाम पोस्ट करती रहती हैं। उनके मुताबिक हर कृति एक लंबी लकीर खीचती है। आलोचना में इस तरह की उदारता भी अनपेक्षित होती है। इन दोनों के अलावा आलोचकों में अपनी बात कहने का साहस भी कम होता जा रहा है। वरिष्ठ आलोचक निर्मला जैन ने सालों पहले कहा था कि वो अब इस वजह से किसी कृति के बारे में सही बात नहीं करती हैं क्योंकि उनको लगता है कि अगर वो ऐसा करेंगी तो लेखक नाराज हो जाएंगे। तब भी मेरे मन में सवाल उठा कि आलोचक कब से लेखक के नाराज या खुश ङोने की परवाह करने लगा? निराला ने छायावादी दौर में पंत जी की रचना ‘पल्लव’ पर बेहद कठोर टिप्पणी की थी । उस वक्त पंत जी और निराला में कितने गहरे संबंध थे यह बात पूरा साहित्य जगत जानता था। दरअसल आलोचना में कभी भी मुंह देखी नहीं होती है और बेहद निर्विकार भाव से कृति पर विचार करती है। खुद मार्क्स की एक किताब है- अ क्रिटिक ऑफ क्रिटिकल रिजन। लेकिन बाद के दिनों में मार्क्स के अनुयायियों ने इसको नेपथ्य में डाल दिया और रागद्वेष के आधार पर आलोचना करनी शुरू कर दी। आलोचना को सभ्य बना दिया जो कि बेहद शिष्ट होकर कृतियों पर विचार करने लगा। इस छद्म शिष्टाचार ने आलोचकों को सच कहने से दूर कर दिया। और आलोचना जब जब सच से दूर हुई है तो उसकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हुए हैं।   
आलोचना पर बात करें और समीक्षा पर बात ना हो यह उचित नहीं होगा। दरअसल हिंदी में समीक्षा की स्थिति बहुत चिंताजनक होती जा रही है। बगैर किसी तैयारी के समीक्षकों की एक पूरी फौज हिंदी में आ गई है। जो समीक्षा के नाम पर किसी कृति का सारांश प्रस्तुत कर दे रहे हैं। बहुत फूहड़ता के साथ कृतियों का और लेखक का परिचय देते हैं। इस तरह के समीक्षकों को चिन्हित करना बहुत आसान है। समीक्षा भी आलोचना की तरह ही एक गंभीर कर्म है जिसमें बगैर तैयारी के उतरना बेहद जोखिम भरा होता है। सारांशात्मक समीक्षा से कृति के उसपक्ष पर बात नहीं हो पाती है जिसकी अपेक्षा समीक्षा और समीक्षकों से की जाती है। इस प्रकार की समीक्षा से लेखक भले ही खुश हो सकता है लेकिन साहित्य का या फिर पाठकों का कोई भला नहीं होता है। बहुधा समीक्षा की इस कमजोर स्थिति की वजह से ही हिंदी आलोचना को भी कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है। आज जरूरत इस बात की है कि समीक्षा कर्म पर बहुत गंभीरता से ध्यान दिया जाए और नादान समीक्षकों को चिन्हित कर उनको बताया जाना चाहिए कि आपने समीक्षा के नाम पर जो सारांश प्रस्तुत किया है वो साहित्य की एक समृद्ध विधा को कमजोर करनेवाली है। इस बात की पहल लेखकों के साथ साथ साथी समीक्षकों को भी करनी चाहिए क्योंकि फेसबुक ने इस प्रकार की सारांशात्मक समीक्षा को मंच दे दिया है। फेसबुक के बहुत श्वेत पक्ष हो सकते हैं लेकिन उसकी अराजक आजादी ने लेखकों के साथ साथ नादान समीक्षकों की महात्वाकांक्षाओं को भी पंख लगा दिए हैं। आलोचना और समीक्षा की साथ को कायम रखने के लिए जरूरी है कि इस तरह के छद्म समीक्षकों को रोका जाए।      


Saturday, April 1, 2017

संवाद से बढ़ेगा दायरा

आज हिंदी में इस बात को लेकर बहुधा सवाल खड़े होते हैं कि कोई कालजयी कृति क्यों सामने नहीं रही । कालजयी ना भी तो अपने समय को झकझोर देनेवाली कहानी या उपन्यास क्यों नहीं लिखे जा रहे हैं । क्या वजह है कि असगर वजाहत की ‘कैसी आई लगाई’ चित्रा मुद्गल की ‘आवां’, भगवानदास मोरवाल का ‘काला पहाड़’ जैसे उपन्यास नहीं लिखे जा रहे हैं । पिछले दो तीन सालों में कुछ उपन्यास आए लेकिन वो सामान्य उपन्यासों की तरह छपे, बिके, कुछ चर्चा हुई, कुछ मित्रों ने लिख दिया लेकिन पाठकों के बीच ललक जैसी बात नहीं दिखाई दी । अल्पना मिश्र का ‘अंधियारे तलछट में चमका’ हो, जयश्री राय का ‘दर्दजा’ हो, प्रियदर्शन का ‘जिंदगी लाइव’ हो, पंकज सुबीर का ‘अकाल में उत्सव’ हो, भगवानदास मोरवाल का ‘नरक मसीहा’ हो या फिर अखिलेश का उपन्यास ‘निर्वासन’ हो, इन सबकी चर्चा हुई, पाठकों ने पसंद भी किया लेकिन उस ऊंचाई तक नहीं पहुंच पाई जिसतक ‘आवां’, ‘चाक’ या ‘काला पहाड़’ पहुंचे थे । इसकी वजह क्या रही होगी । यह सवाल बार-बार कई मंचों पर उठाते रहे हैं, विरोध और प्रतिरोध के बावजूद । आज की आत्ममुग्ध पीढ़ी के लेखक इस बात को मानने को तैयार नहीं है लेकिन इस प्रश्न का उत्तर ही उनको बेहतर लिखने की राह पर ले जा सकते है ।
क्या लेखकों का अनुभव संसार सिकुड़ता जा रहा है या फिर लेखक पाठकों की बदलती रुचि को नहीं पकड़ पा रहे हैं । इस बारे में कुछ भी प्रामाणिकता से कहना मुश्किल है लेकिन एक चीज जो साफ तौर पर लक्षित की जा सकती है वह है लेखकों के बारे में, उनकी रचना प्रक्रिया के बारे में पाठकों को जानकारी नहीं होना । पहले पत्र-पत्रिकाओं में लेखकों की रचना प्रक्रिया नियमित रूप से छपा करती थी । इसका फायदा यह होता था कि पाठकों को यह पता चलता था कि किसी भी रचना को लेकर लेखक के मन में क्या चल रहा है । उसका मानसिक संघर्ष कैसा था या उसको किसी उपन्यास या कहानी को लिखने में किस प्रक्रिया से गुजरना पड़ा था । इसका फायदा यह होता था कि पाठकों के मन में एक उत्सकुता का भाव तो उत्पन्न होता ही था, लेखक के संघर्ष में उसको खुद का संघर्ष भी दिखता था । कहना ना होगा कि इस प्रक्रिया के सामने आने से लेखकों और पाठकों के बीच एक तादात्मय स्थापित होता था । इस संबंध से रचना को वृहत्तर पाठक वर्ग में स्वीकृति मिलती थी । अब क्या हो रहा है कि लेखकों की रचनाएं तो आ रही हैं पर पाठकों को उनकी रचना प्रक्रिया को जानने का अवसर नहीं मिल रहा है । पत्र-पत्रिकाओं में लेखकों की रचना प्रक्रिया पर बात नहीं होती । ना ही कोई ऐसा कार्यक्रम होता है जिसमें लेखकों से उनकी रचना प्रक्रिया पर बात हो सके । इस वक्त दर्जनों लिटरेचर फेस्टिवल हो रहे हैं जिसमें हिंदी के लेखकों को बुलाया जाता है, उनसे बातचीत की जाती है लेकिन बहुधा उनकी कृतियों पर बात की जाती है या फिर साहित्य की उन प्रवृत्तियों पर बात की जाती है जिनमें विवाद की गुंजाइश नजर आती है ।  मुझे याद आता है  जब चंद सालों पहले भगवानदास मोरवाल का उपन्यास रेत या मैत्रेयी पुष्पा का उपन्यास अल्मा कबूतरी छपा था तो लेखकों ने बताया था कि कैसे वो उन समुदायों के लोगों के बीच गए उनसे बात की उनकी जिंदगी को करीब से जिया । इसका फायदा यह हुआ कि पाठकों को उपन्यासों में एक प्रामाणिकता का बोध हुआ जिसने कालांतर में इन कृतियों को बेहतक बनाने में या उनको स्थापित करने में मदद की । अब तो ये हो रहा है कि कल्पना के आधार पर देश विदेश की कहानियां लिखी जा रही हैं । इसमें बुराई नहीं है लेकिन काल्पनिकता कभी भी प्रामाणिकता का स्थान नहीं ले सकती है ।  
तकनीक के विस्तार ने, इंटरनेट के फैलते घनत्व ने लेखकों को पाठकों तक आसानी से पहुंचने का एक मंच दिया है । जरूरत इस बात की है कि हिंदी के लेखक इस सुविधा का लाभ उठाएं । फेसबुक पर हाल के दिनों में जिस तरह से वीडियो पोस्ट करने की या लाइव करने की सहूलियत मिली है उसका लाभ हिंदी के लेखकों को उठाना चाहिए । इसमें ज्यादा कुछ तामझाम की जरूरत भी नहीं पड़ती है । आप कैमरे वाले फोन और बेहतर इंटरनेट कनेक्शन के साथ बैठ जाएं और फेसबुक लाइव के जरिए अपने पाठकों से रूबरू हों, उनके सवालों का जवाब दें, अपनी रचना प्रक्रिया पर बात करें और अपनी कृति को लेकर उत्सुकता का वातवरण बनाए । विदेशों में लेखक इस तरह संवाद कर रहे हैं । कई बार खुद तो कई बार किसी सेलिब्रिटी के साथ बैठकर अपनी कृतियों पर बात करते हैं । यह भी देखा गया है कि विदेशों के लेखक पाठकों के साथ अपनी कृति को लेकर सवाल जवाब भी करते हैं । फेसबुक लाइव के दौरान सवाल जवाब का विकल्प भी है । फेसबुक लाइक्स से आगे जहां और भी है, इस बात को हिंदी के लेखकों को समझना होगा और उसको अपने और साहित्य के हक में इस्तेमाल करना होगा । पाठकों से संवाद का यह इकलौता मंच नहीं है, ट्विटर, व्हाट्स एप जैसे मंच का इस्तेमाल भी लेखकों को पाठकों तक अपनी बात पहुंचाने के लिए करना चाहिए । हैरी पॉटर सिरीज की मशहूर लेखिका जे के रॉलिंग तो अपनी नई कृति के प्रकाशन के पहले अपने पाठकों और प्रशंसकों के साथ संवाद ही नहीं करती है बल्कि कोई सवाल उछालकर अपने प्रशंसकों को उकसाती भी है । कई बार उसका जवाब देकर तो कई बार उसको रीट्वीट करके ।
अब ये सवाल पूछा जा सकता है कि इन सबको अपनाकर पाठकों को झकझोर देनेवाली कहानियां या उपन्यास कैसे लिखे जा सकते हैं । सवाल बाजिब है लेकिन जब पाठकों को किसी कहानी के पीछे की कहानी पता चलेगी या फिर लेखक के उन अनुभवों का अंदाजा लगेगा जिससे प्रभावित होकर उसने कोई रचना लिखी है तो पाठक उसको दूसरे तरीके से देखगें । रचना की प्रक्रिया को जाने बगैर कोई कृति बहुत सपाट लग सकती है लेकिन अगर उसको जान लेंगे और समग्रता में उसको देखेंगे तो, संभव है उसके कई अर्थ उद्घाटित हों । सपाट रचना के अर्थ उद्घाटित होते ही उसके बेहतर रचना के कोष्टक में शामिल होने की संभावना बढ़ जाती है । 

Saturday, March 4, 2017

आलोचना, अज्ञान और अवसर

हिंदी साहित्य में हर दौर में आलोचना को लेकर लंबी बहसस होती रहती है । बहुधा आलोचकों पर आरोप लगते हैं कि अपना काम ठीक से नहीं कर रहे हैं । पर हाल के दिनों में रचनाकारों का आलोचकों को सर्टिफिकेट देने की प्रवृत्ति काफी बढ़ी है हलांकि हिंदी आलोचना के अभी इतने बुरे दिन नहीं आए हैं कि उनको रचनाकारों के प्रमाण-पत्र की आवश्यकता पड़े । अगर हम गंभीरता से विचार करें तो रचनाकार और आलोचक के बीच के झगड़े का कोई अर्थ नहीं है । कुछ उत्साही लेखक तो आलोचना को रचना का परजीवी तक करार दे देते हैं । उनके तर्क होते हैं कि रचना ना हो तो आलोचना कैसे होगी । सतह पर या प्रत्यक्ष रूप से यह तर्क ठीक प्रतीत हो सकता है लेकिन रना और आलोचना कं संबंधों को जाननेवालों की राय अलग होती है । रचना के बगैर आलोचना के अस्तित्व को नकारने वाले यह भूल जाते हैं कि बगैर आलोचना के रचना भी नहीं हो सकती है । प्रत्य़क्ष और अप्रत्यक्ष के इस संबंध को पहचान नहीं पाने की भूल अक्सर साहित्य से जुड़े लोगों को हो जाती है । रचना और आलोचना को आमने सामने ऱड़ा करना भी लगभग अज्ञानता की ही बात है । अगर हम विचार करें तो आलोचना जहां रचना के अंदर की संवेदना के रेशे रेशे को अलग कर देखने का प्रयत्न है वहीं रचना में संवेदना अपने अखंड रूप में सृजित होती है । एक जगह पर आकर रचना और आलोचना दोनों मिलती है वह है भाषा । कई बार जो आनंद रचना की भाषा को पढ़कर होता है वैसा हीआनंद आलोचना की भाषा में भी प्राप्त होता है और कई बार तो आलोचना को पढ़ते हुए रचना का आस्वाद मिलता है । एक आलोचक ने लिखा भी है - आलोचना रचना है इसका एक अर्थ यह भी है कि अच्छी आलोचना रचना की तरह ही भाषा का शास्त्रीय नहीं बल्कि सृजनात्मक उपयोग करती है, जिससे उसे पढ़ते समय तक एक स्तर पर रचना को पढ़ने का आनंद मिलता है । जैसे रचना की एक कचना प्रक्रिया होती है, वैसे ही निश्चित रूप से आलोचना की भी । उदाहरण के तौर पर नामवर सिंह जब साठ के दशक में नई कहानियां में स्तंभ लिखते थे तो उस वक्त उसको पढ़ते हुए पाठकों को रचना का आस्वाद मिलता था । इसी तरह से अगर हम विजयदेव नारायण साही का लेख- शमशेर की काव्यानुभूति की बनावट को पढ़े तो ऐसा लगता है कि कोई बेहतरीन रचना पढ़ रहे हों । यह लेख सृजनात्मक आलोचना का बेहतरीन नमूना माना जा सकता है । हलांकि कुछ आलोचर इसके कथ्य को लेकर सवाल खड़े करते रहे हैं । इसी तरह से नामवर सिंह की किताब दूसी परंपरा की खोज भी सृजनात्मक आलोचना का शिखर है ।  रचनात्मक भाषा को छोड़कर आलोचना ने रूढ भाषा को आलिंगनबद्ध कर लिया । इसके अलावा एक और दोष का शिकार हिंदी आलोचना हुई । हिंदी के आलोचकों ने अपने लेखों में अपने पांडित्य का प्रदर्शन करना शुरू कर दिया और एक विदेशी विद्वानों के हवाले से एक ऐसी शब्दावली विकसित कर दी जो हिंदी के आम पाठकों के समझ से बाहर की चीज होने लगी । विश्वविद्यालयों के शिक्षकों का इस तरह की आलोचना में मुख्य योगदान है । पूरी तैयारी के साथ आलोचना लेखन का स्थान सरसरी तौर पर रचना का परिचय देने और सार संक्षेप बताने तक सीमित होने लगा । यह वैसा ही हुआ कि हाईवे पर जाने की बजाए हिंदी आलोचना ने आसान पगडंडियां ढूंढनी शुरू कर दी ताकि कठिन रास्ते से जाने का श्रम नहीं करना पड़े । आलोचकों और समीक्षकों ने भी हाल के दिनों में साहस के साथ लिखना छोड़ दिया है । कुछ साल पहले हिंदी की वरिष्ठ आलोचक निर्मला जैन से कहा था कि अब रचानाकरों में अपनी आलोचना सुनने पढ़ने का धैर्य नहीं रहा और अपनी रचना के खिलाफ लिखा उनको पसंद नहीं आता है । इस नापसंदगी की मार आलोचक को झेलनी पड़ती है क्योंकि रचनाकार उनसे दुश्मनी पाल बैठते हैं । तब भी मैंने लिखा था कि आलोचक का बिगाड़ के डर से ईमान की बात कहना छोड़ देना साहित्य के लिए अच्छी स्थिति नहीं है ।
दरअसल आलोचना को जब से नारेबाजी की शक्ल दी गई या जब से आलोचना ने अपनी दृष्टि संकुचित कर ली तब से उसके पाठक कम होने लगे । हमारे आलोचक यह भी भूलने लगे कि आलोचना राजनीति नहीं है जिसमें समझौते की कोशिश की जाए या दोनों पक्षों की सहूलियतों का ध्यान रखा जाए । आलोचना का रास्ता दायित्व और विवेक का रास्ता है जिसको बेहतर ढंग से समझकर उसको अपने लेखन में अपनाया जाए । लेकिन मार्क्सवाद के सोवियत संस्करण के प्रभाव में लिखी जानेवाली आलोचना इस बात को समझ नहीं पाई । विचारधारा के जकड़न और गुलामी में लिखी गई आलोचना पथभ्रष्ट होती चली गई । कलांतर में सोवियत मार्क्सवाद के प्रभाव में ज्यादातर आलोचना उद्धरणों की विधा बनकर रह गई । अगर आप हिंदी के कई आलोचकों का लेखन देखें तो विदेशी विद्वानों के, विदेशी आलोचकों के एक एक पन्ने का उद्धरण फिर उसको आगे बढ़ाने के लिए एक वाक्य और फिर एक पन्ने का उद्धरण । इस तरह की आलोचना का एक नुकसान यह हुआ कि पाठकों उसको पढ़ने के बाद खुद को ठगा हुआ महसूस करने लगा । उसको लगने लगा कि उसने तो अमुक का नाम देखकर किताब खरीदी थी लेकिन इसमें ज्यादातर तो राय दूसरे या विदेशी विद्वानों की है । इसके अलावा इस पद्धति का एक और दोष जो सामने आया वो ये कि इसने अपनी परंपरा और समृद्ध साहित्यक विरासत को हाशिए पर डालकर आलोचना की एक ऐसी पद्धति अपनाई जो विदेशी विद्वानों की अवधारणाओं पर आधिरत हो गई । विचारधारा विशेष के प्रभाव में लिखी जा रही आलोचना ने जानबूझकर भारतीय क्लासिक्स को दरकिनार करना शुरू कर दिया । उससे उद्धरण लेने की जरूरत ही महसूस हीं हुई । कोई भी आलोतर यह कहने का साहस नहीं जुटा पाया कि महाभारत पूरी दुनिया में किसी भी भाषा में लिखा गया सबसे बड़ा क्राइम थ्रिलर है । महाभारत का इस आधार पर मूल्यांकन नहीं होने का नतीजा यह रहा कि हमारी विरासत की इस अहम कृति को वैश्विक स्तर पर वो मान्यता नहीं मिल पाई जिसकी वो हकदार है । अब अंग्रेजी के लेखकों ने छोटे-छोटे महाभारत लिखकर शोहरत कमाना प्रारंभ कर दिया है तब जाकर भी हमारे आलोचकों की तंद्रा भंग नहीं हो पाई है । एक और विवाद उठाने की कोशिश की गई कि हिंदी में रचनाकार आलोचकों की कमी है । रचनाकार आलोचना की ओक नहीं जाते हैं । इसकी वजह को समझने की जरूरत है । रचनाकार जब आलोचना लिखता है तो उसके अवचेतन मन में अपनी खुद की रचनना होती है । जो उसको अपने बाड़े से आगे जाने से बार-बार रोकती है जिसका नतीजा उसके लेखन के स्वकेंद्रित हो जाना होता है । अगर आलोचना को एक विधा के तौर पर मजबूत करना है तो उसको विचारधारा की जकड़न, गुलामी से तो मुक्त होना ही होगा साथ ही उद्धरणों से आगे जाकर अपनी बात कहने का हुनर भी विकसित करना होगा ।


Sunday, May 15, 2016

आलोचना से बचती युवा पीढ़ी

अभी पिछले दिनों एक अनौपचारिक साहित्यक गोष्ठी में एक लेखक मित्र ने कहा कि इन दिनों हिंदी के युवा लेखक बहुत जल्दबाजी में हैं और वो इंस्टैंट कॉफी और टू मिनट नूडल्स की तरह साहित्य की रचना कर रहे हैं । उनकी यह बात सोलह आने सच ना भी हो तो चौदह पंद्रह आने तो सही है ही । ज्यादातर युवा लेखक थोक के भाव से कहानियां और कविताएं लिख रहे हैं और उनकी चाहत मशहूर होने की भी होती है । साहित्य को अगर साधना कहा गया है तो उसके पीछे कोई ना कोई सोच रही होगी । अगर हम ये मान भी लें कि ये साधना जैसा कठिन कर्म नहीं भी है तो कम से कम श्रमसाध्य तो है ही । साहित्य को हल्के तरीके से नहीं लिया जा सकता है, यह एक बेहद गंभीरकर्म है और इसमें लेखकों को उनका दाय कभी उनके जीवन काल में मिल पाता है तो कभी मरणोपरांत ही उनके लेखन पर चर्चा हो पाती है । इन दिनों हमारे युवा लेखक लिखना शुरू करते ही चाहते हैं कि उनको साहित्य जगत में गंभीरता से लिया जाए औप वो स्थान मिले जो उनके वरिष्ठों को हासिल है । यह अपेक्षा और महात्वाकांक्षा सही है लेकिन इसके लिए जितने प्रयास किए जाने चाहिए उतने दिखाई नहीं देते हैं । युवा लेखकों की इस महात्वाकांक्षा तो परवान चढाया है कुछ वैसी पत्रिकाओं ने जो लेख की तरह कहानीकारों से कहानियां लिखवाते हैं । आठ सौ शब्दों में दे दीजिए, हजार शब्दों में दे दीजिए या ज्यादा से ज्यादा पंद्रह सौ शब्दों की कहानी होनी चाहिए । पत्रिकाओं की मजबूरी हो सकती है लेकिन लेखकों की क्या मजबूरी है, ये समझ से परे हैं ।  जब लेखकों की रचनाओं और उसकी कल्पना को शब्द संख्या में बांधा जाने लगे और लेखक उसको स्वीकार भी करने लगे तो माना जाना चाहिए कि साहित्य के सामने संकट काल है । कई युवा लेखकों ने मुझे बताया कि अमुक पत्रिका ने उनके उतने शब्दों में कहानी मांगी और हमने फौरन उनको लिखकर दे दिया । गोया कहानी ना हो किसी समसमायिक विषय पर लेख हो । जरूरत इस बात की है कि साहित्य को इंस्टैंट प्रसिद्धि की चाहत के इस रोग से मुक्त किया जाए ।

दूसरी बात जो समकालीन साहित्य में रेखांकित की जानी चाहिए वो है युवा लेखकों का अपने साथी लेखकों की रचनाओं पर टिप्पणी करने से बचना । मौखिक या फेसबुकिया टिप्पणियां यदा कदा देखने को मिल जाती है लेकिन ज्यादातर युवा लेखक अपने समकालीनों पर लेख आदि लिखने से बचते हैं । इसका एक नुकसान यह होता है कि नई सोच सामने आने से रह जाती है । नए विमर्श को स्थान नहीं मिलता है । मोहन राकेश, कमलेश्वर और राजेन्द्र यादव का जब कहानी की दुनिया में डंका बज रहा था तो सभी एक दूसरे की रचनाओं पर लिख रहे थे । उसका लाभ तीनों को मिला था और वो लगातार चर्चा में बने रहे थे । युवा लेखक क्यों नहीं अपने साथियों पर गंभीरता से लिखते हैं इसका विश्लेषण किया जाना चाहिए । ऐसा प्रतीत होता है कि युवा पीढ़ी अपने साथियों पर आलोचनात्मक टिप्पणियों से बचना चाहती है । तू पंत, मैं निराला जैसी टिप्पणियां तो यदा कदा देखने को मिल जाती हैं पर किसी रचना को आलोचना की कसौटी पर उसके औजारों से कसता हुए लेख दुर्लभ है । यह सही है कि हिंदी में आलोचनात्मक टिप्पणियों का असर व्यक्ति संबंधों पर पड़ता है लेकिन क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात नहीं कही जानी चाहिए । 

Monday, October 26, 2015

लेखकीय असहिष्णुता पर सवाल

समकालीन हिंदी साहित्य के अलावा अन्य भारतीय भाषाओं के साहित्यकारों के बीच देश में फैल रही असहिष्णुता और  कट्टरता के खिलाफ बहस चल रही है । देश में बढ़ रही कट्टरता और प्रधानमंत्री की चुप्पी को आधार बनाकर कई लेखकों ने साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने का एलान किया है । हलांकि पुरस्कार वापसी अभियान पर लेखक समुदाय बंटा हुआ है  । इस लेख का विषय पुरस्कार वापसी नहीं है । हम बात करेंगे लेखक समुदाय में अपनी रचना की आलोचना को लेकर बढ़ती असहिष्णुता पर, खास कर हिंदी लेखकों के बीच बढ़ रहीइस प्रवृत्ति पर।  समकालीन हिंदी साहित्य के परिदृश्य पर अगर हम बात करते हैं तो यह बात साफ तौर पर उभर कर सामने आती है कि कवियों से लेकर कथाकारों तक में अपनी आलोचना सुनने सहने की क्षमता का उत्तरोत्तर ह्रास हो रहा है । किसी भी कृति पर आलोचनात्मक टिप्पणी करने से पहले कई बार सोचना पड़ता है । अगर आप तर्क के साथ भी किसी कृति की स्वस्थ आलोचना करते हैं तो लेखक उसको अपनी आलोचना मानकर टिप्पणीकार से खफा हो जाते हैं । उसके बाद खफा लेखक इस ताक में रहते हैं कि रचना की आलोचना करनेवाले टिप्पणीकार से कैसे बदला चुकाया जाए। आलोचनात्मक टिप्पणी करनेवाले और रचनाकार के बीच बातचीत बंद हो जाना तो आम बात है । यह हिंदी साहित्य समाज में लेखकों के बीच बढ़ रही असिष्णुता का संकेत है । इसको सोशल मीडिया खासकर फेसबुक ने और हवा दी । फेसबुक पर आलोचकों को आमतौर पर निशाना बनाया जाता है और फिर माफिया की तरह घेरकर उसपर हमले होते हैं । आलोचक के अतीत से लेकर वर्तमान तक को खंगालकर उड़ेल दिया जाता है । घर परिवार, नातेदाऱ-रिश्तेदारों की बातें शुरू हो जाती हैं । कई मसले पर तो यह भी देखा गया है कि चरित्र हनन का खेल भी शुरू हो जाता है । सोशल मीडिया पर इसके पीछे की वजह साफ तौर पर रेखांकित की जा सकती है । आज इस वजह से हिंदी में समीक्षा की हालत बहुत खराब हो गई है । समीक्षक सत्य कहने से डरने लगे हैं । काफी पहले अपने एक लेख में हिंदी की वरिष्ठ आलोचक निर्मला जैन ने भी इस बात का संकेत किया था । कालांतर में कई लेखकों ने लेखकों के बीच बढ़ती इस असहिष्णु प्रवृत्ति को पुख्ता किया ।  आज ज्यादातर लेखकों की अपेक्षा होती है कि उनकी रचनाओं को कालजयी इत्यादि घोषित कर दिया जाए । दो चार कहानी लिखकर, एकाध संग्रह छपवाकर, दंद-फंद से पुरस्कार आदि हासिल करनेवाले कहानीकारों की अपेक्षा होती है कि उसकी कहानियों को प्रेमचंद की कहानियों के बराबर मान लिया जाए । अगर ये न हो सके तो कम से कम प्रेमचंद और रेणु की परंपरा का लेखक तो घोषित कर ही दिया जाए । इसी तरह से उपन्यासकारों की आकांक्षा होती है कि उनको भी रेणु, अमृतलाल नागर के बराबर ना भी माना जाए तो कम से कम कमलेश्वर, मोहन राकेश या फिर राजेन्द्र यादव के बराबर तो खड़ा कर ही दिया जाए । ऐसा नहीं होने पर बात बिगड़ने लगती है ।
लेखकों के बीच बढ़ती इस प्रशंसा-पिपासा के उदाहरण इस वक्त हिंदी में यत्र-तत्र-सर्वत्र मिल जाएंगे । इन दिनों हिंदी में व्हाट्सएप पर कई साहित्यक ग्रुप सक्रिय हैं । वहां भी आलोचना की कोई गुंजाइश नहीं है । अगर आप व्हाट्सएप पर चलनेवाले समूहों के सदस्य हैं तो आपतो इस बात का अंदाज होगा कि वहां किस तरह से तू पंत मैं निराला का दौर चलता है । खुदा ना खास्ता अगर किसी ने किसी रचना पर सवाल खड़े कर दिए तो उनकी खैर नहीं । आपको नकारात्मक सोच से लेकर हर वक्त मीन मेख निकालनेवाला करार दे दिया जाएगा । फेसबुक आदि की तरह इन समूहों में भी लेखक संगठित होकर आलोचना करनेवालों पर वार करते हैं और उसको इतना अपमानित करते हैं कि वो समूह छोड़ने पर मजबूर होता है । अगर फिर भी हिम्मत करके आलोचनात्मक टिप्पणी करनेवाला शख्स इन समूहों में बना रहता है तो गाहे बगाहे उसके विकेक पर सवाल खड़ा किया जाता रहता है । अपनी आलोचना ना सहने की प्रवृत्ति का विकास हाल के दिनों में युवा लेखकों के बीच वायरल की तरह फैला है । अब अगर हम इसके पीछे के वजह की पड़ताल करें तो पाते हैं कि सोशल मीडिया के फैलाव और फेसबुक के लाइक बटन ने रचनाकारों की अपनी आलोचना सुनने की क्षमता ही विकसित नहीं होने दी । कोई भी रचनाकार फेसबुक पर अपनी रचना डालता है तो उसको सौ दो सौ लोग लाइक कर देते हैं । सौ पचास टिप्पणियां वाह वाह के मिल जाते हैं । लेखकों को यह लगने लगता है कि वो हिंदी का महान लेखक हो गया । इस मानसिकता से गुजर रहे लेखक का समाना जब आलोचनात्मक टिप्पणी से होता है तो वो इसको बर्दाश्त नहीं कर पाता है और टिप्पणीकार को अपनी सफलता की राह में बाधा की तरह देखने लगता है । फिर वो वही सारे काम करता है जो कोई भी अपनी राह के रोड़े को हटाने के लिए करता है । इसके अलावा हिंदी में थोक के भाव बंट रहे पुरस्कारों ने भी कई युवा लेखकों का दिमाग खराब कर दिया है । जुगाड़ से हासिल पुरस्कार को वो अपने लेखन से जोड़कर छद्म की जमीन पर खड़ो होना चाहता है । छद्म की जमीन को सबसे बड़ा खतरा आलोचना या समीक्षा से ही रहता है ।

आज अगर हिंदी में समीक्षा पर सवाल उठ रहे हैं तो उसके पीछे की वजहों को जानने की जरूरत है । एक वजह तो यही है जिसपर उपर विस्तार से लिखा गया । समीक्षक खुलकर अपनी बात कहने से घबराने लगे हैं । कोई भी अपने व्यक्तिगत रिश्ते खराब नहीं करना चाहता है । नतीजा यह होता है कि किताब के बारे में परिचयात्मक लेख लिखे जाते हैं । पहले लेखक के बारे में एक पैरा फिर किताब का सारांश और अंत में बगैर कुछ कहे या फिर बीच का रास्ता निकालते हुए समीक्षक अपनी बात खत्म कर देता है । यह स्थिति हिंदी साहित्य के लिए अच्छी नहीं है । लेखकों के बीच बढ़ रही असहिष्णुता से एक विधा पर उसके खत्म होने का खतरा मंडराने लगा है । इसको बचाने की आवश्यकता है । लेखकों को उदार और सकारात्मक तरीके से स्वस्थ आलोचना का स्वागत करना चाहिए । अगर किसी समीक्षक ने तर्कों के साथ अपनी बात रखी है तो उसकी बातों का सम्मान होना चाहिए । विमर्श हो तो और भी बेहतर है ।  

Saturday, June 15, 2013

आलोचना से अपेक्षा क्यो ?

आज हिंदी के वर्तमान परिदृश्य में हिंदी आलोचना की जमकल लान मलामत की जा रही है । आलोचना पर सतही और अपनी राह से भटकने के आरोप भी जड़े जा रहे हैं । आलोचना पर एक संगीन इल्जाम यह लगता है कि वो पुस्तक समीक्षा से आगे नहीं बढ पा रही है । विद्वान लेखक उसके घटते गांभीर्य को लेकर रुद-क्रन्दन कर रहे हैं । लेकिन आलोचना पर यह आरोप नए नहीं हैं ये दशकों से लग रहे हैं । एक फैशन की तरह से कविता पर संकट, कहानी पर संकट या फिर रचनाशीलता पर संकट को लेकर साहित्य जगत में कोलाहल होता रहा है उसी तरह आलोचना को लेकर भी छाती कूटी जाती है । कुछ लेखक अति उत्साह में उसकी शवयात्रा निकाल चुके हैं । हो सकता है कि आलोचना में थोड़ा ठहराव आ गया हो लेकिन अंधकार जैसे हालात नहीं है । रचनाकारों को तो इस बात की छूट मिलती है कि वो अपनी संवेदना और बोध का निरंतर परिष्कार करते चलें लेकिन आमतौर पर आलोचकों से यह अपेक्षा की जाती है कि उन्होंने एक बार जो निष्कर्ष प्रस्तुत कर दिया है उससे हटना उनके लिए मुमकिन नहीं है और अगर वो हटते हैं तो उसे आलोचक का भटकाव या उसका विचलन मान लिया जाता है । रामविलास शर्मा जैसे आलोचक इसके लिए अवसरवाद शब्द का प्रयोग करते हैं । जबकि होना यह चाहिए कि रचनाकारों की तरह आलोचकों को भी अपने निष्कर्षों में संशोधन का हक मिलना चाहिए ।
हिंदी आलोचना में वामपंथी विचारधारा के व्यापक प्रभाव और वर्चस्व की वजह से उसके औजार पुराने पड़ गए हैं । एक खास विचारधारा के आधार पर खेमेबंदी ने आलोचना का सबसे ज्यादा नुकसान किया है । दरअसल मार्क्सवादियों के साथ दिक्कत यह है कि वो कोई नया औजार विकसित नहीं करना चाहते हैं । मशहूर इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने अपनी किताब पैट्रियाट और पार्टीशन में एक लेख लिखा है – द पास्ट एंड फ्यूचर ऑफ इंडियन लेफ्ट । इस लेख में एक जगह पर गुहा लिखते हैं कि मार्कसवादी छपे हुए को अंतिम सत्य मानते हैं । उन्होंने इस मसले पर मार्कसवादियों की तुलना कट्टरपंथी इस्लाम और क्रिश्चियनिटी को मानने वालों से की है । गुहा लिखते हैं कि मार्क्सवादियों का भरोसा छपे हुए शब्दों में इतना ज्यादा है कि वो अपने हर कृत्य को, तर्कों को मार्क्स, लेनिन और एंगेल्स के इस या उस पैराग्राफ को कोट करते हुए जस्टिफाई करते हैं । दरअसल यह उनकी कमजोरी है । किसी भी चीच में आस्था रखना अच्छी बात है लेकिन अंधभक्ति तर्क और विज्ञान दोनों के लिए सबसे बड़ी बाधा बनकर खड़े हो जाते हैं । वैज्ञानिक विश्लेषण का मतलब ही है कि हर चीच को सवालों के घेरे में खड़ा किया जाए और फिर उसको तर्कों की कसौटी पर कसा जाए लेकिन मार्क्सवाद इसकी इजाजत नहीं देता उसके लिए तो मार्क्स के कहे गए वचन अंतिम सत्य हैं । एक यमय तो मार्क्सवादी आलोचना राजनीतिक पार्टियों के सिद्धांत को आगे बढ़ाने में लगी थी । उस समय मार्कसवाद का रोमांटिसिज्म अपने चरम पर था लेकिन बाद में जब साम्यवादी व्यवस्था ध्वस्त हुई तो यह रोमांटिसिज्म भी हवा हो गया । उसका एक और बेहतर नतीजा यह निकला कि आलोचना ने आयातित विचारधारा की भाषा से खुद को मुक्त किया और सिद्धांत के बोझ से मुक्त होकर रचनात्मकता की भाषा को अपनाया । जिसकी वजह से आलोचना पठनीय हुई । एक जमाना था जब निराला जी कहा करते थे कि यदि उनकी कविताएं शुक्ल जी सुन रहे हैं तो जैसे समूचा हिंदी जगत सुन रहा है । लेकिन क्या अब ऐसी स्थिति है । क्या कोई लेखक यह कह सकता है । कदापि नहीं । लेकिन यहां यह भी याद रखना आवश्यक है कि जब हिंदी के सबसे बड़े आलोचक रामचंद्र शुक्ल सक्रिय थे तो वह वक्त था- प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, निराला, सुमित्रानंदन पंत जैसे मूर्धन्य लेखकों का । सवाल यह उठता है कि कि क्या वर्तमान परिदृश्य में लेखकों का वह स्तर रह गया है । फिर आलोचना से स्तरीयता की अपेक्षा करना कुछ ज्यादा डिमांडिग होना नहीं है ।
युवतम पीढ़ी के आलोचकों के साथ सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि वह अब भी मार्क्सवाद के प्रभाव से मुक्त नहीं हो पाई है । आज भी आलोचना में कहानी नई जमीन तोड़ती है, खुरदरे यथार्थ को उभारती है आदि आदि । नतीजा यह हो रहा है कि हिंदी कहानी ने इतनी नई जमीन तोड़ दी है कि अबतक कोई जमीन बचनी नहीं चाहिए थी । दूसरी बड़ी दिक्कत समकालीन विश्व साहित्य से अपरिचय है। विश्व की अलग अलग भाषाओं में क्या लिखा जा रहा है उससे अनभिज्ञता भी आज की आलोचना के विकास को रोक रही है । वर्तमान हिंदी आलोचना के परिदृश्य में बहुत कम ऐसे आलोचक हैं जो अंग्रेजी और अन्य भाषाओं में चलनेवाली बहसों से परिचित हैं । हिंदी के नए आलोचकों ने अपने आपको एक चौहद्दी में घेर लिया है और उनको लगता है कि उस चौहद्दी में रहते हुए वो सुरक्षित हैं । कहना ना होगा कि यह मार्क्सवाद की चौहद्दी है ।
कुछ महीनों पहले हिंदी की वरिष्ठ आलोचक डॉक्टर निर्मला जैन ने एक दैनिक में लेख लिखा था जिसका लब्बोलुआब यह था कि हिंदी लेखकों में धैर्य की कमी हो गई है और वो अपनी रचनाओं का विरोध सहन नहीं कर पाते हैं । रचना की आलोचना का असर व्यक्तिगत संबंधों पर पड़ता है । निर्मला जी ने एक कड़वी सचाई की तरफ इशारा किया था । जिस दिन से कोई लेखक आलोचना विधा का चुनाव करता है उसको यह सोच लेना चाहिए है कि सच कहने पर हमले होंगे । इन खतरों को झेलने का माद्दा रखनेवालों को ही आलोचना में हाथ आजमाना चाहिए क्यों बिगाड़ के डर से ईमान की बात नहीं कहना लेखकीय बेईमानी है ।
आज की आलोचना ने विश्वविद्लायों की चाहरदीवारी से खुद को मुक्त किया है । रचना के साथ आलोचना का एक बेहतर संबंध बनता दिख रहा है लेकिन इसको सामने आने में लंबा वक्त लगेगा । कुछ लोग आलोचना पर पुस्तक समीक्षा होने का आरोप जड़ रहे हैं । लेकिन समीक्षा आलोचना से अलग नहीं है । समीक्षा एक फूल है तो आलोचना पूरा गुलदस्ता । हिंदी में समीक्षा के स्तर को लेकर भी खूब हल्ला गुल्ला मच रहा है । कई आलोचकों को लगता है कि अखबारी समीक्षा से इस विधा की इज्जत कम हो रही है । उनका मानना है कि अखबारों और पत्र पत्रिकाओं में छपनेवाली समीक्षा बेहद हल्के तरीके से लिखी जाती है । लेकिन इस तर्क पर समीक्षा को खारिज करनेवाले यह भूल जाते हैं कि समीक्षा से आलोचना का एक पाठक वर्ग संस्कारित होता है । वो यह भी भूल जाते हैं कि आधुनिक हिंदी आलोचना का जन्म पुस्तक समीक्षा से ही हुआ है । दूसरे समीक्षा का काम है कि नई छपी पुस्तकों के बारे में पाठकों के मन में जिज्ञासा पैदा करना । समीक्षा पर यह आरोप भी लगता है कि वो कई बार मित्रों और अपनी विचारधारा के लेखकों को आगे बढ़ाने के लिए लिखे जाते हैं । हो सकता है कि इस आरोप में सचाई हो लेकिन अगर समग्रता में यह आरोप लगाया जाता है तो वो आरोप का सामान्यीकरण है । पुस्तक समीक्षा एक गंभीर रचनाकर्म है और आज छपनेवाली कई साहित्यक पत्रिकाओं- हंस, तद्भव, कथादेश, पहल आदि में बेहतरीन समीक्षाएं देखने को मिल जाया करती हैं । दरअसल अगर हम समग्रता में पूरे साहित्यक परिदृश्य पर विचार करें तो कविता, कहानी, उपन्यास सभी में स्तरहीनता का अनुपात वही है तो समीक्षा और आलोचना में है । इसलिए सिर्फ समीक्षा या फिर आलोचना को कठघरे में खड़ा करना बेमानी है । हम सिर्फ समीक्षा या आलोचना से यह अपेक्षा नहीं कर सकते कि हर अक्षर सर्वश्रेष्ठ हो । हां इतना अवश्य है कि समकालीन परिदृश्य में रचनाकारों की रुचि आलोचना कर्म में नहीं रही । मुक्तिबोध ने अंधेरे में नाम की लंबी कविता लिखी तो कामायनी एक पुनर्विचार भी लिखा । इसके अलावा कुंवर नारायण, निर्मल वर्मा, राजेन्द्र यादव, विष्णु खरे, अरुण कमल आदि ने भी आलोचना के क्षेत्र में गंभीर काम किया । आज इस बात की कमी जरूर खलती है कि रचनाकार आलोचना से विमुख हो गए हैं । हो सकता है कि इससे आलोचना का कुछ नुकसान हो रहा हो । लेकिन आलोचना और समीक्षा को लेकर जितना स्यापा किया जा रहा है वो चर्चा पाने का एक तरीका बनता जा रहा है ।