Translate

Showing posts with label हिंदी अकादमी. Show all posts
Showing posts with label हिंदी अकादमी. Show all posts

Saturday, January 10, 2026

अकादमियों की दुर्दशा का जिम्मेदार कौन


बीते वर्ष जनवरी में दिल्ली सरकार की हिंदी अकादमी ने साहित्यकारों, कवियों और पत्रकारों के लिए पिछले तीन साल के पुरस्कारों की एक साथ घोषणा की थी। दिल्ली के तत्कालीन मंत्री सौरभ भारद्वाज ने उस समय बड़ी-बड़ी बातें की थीं, कहा था कि पुरस्कारों की घोषणा से हिंदी अकादमी ने साहित्य के क्षेत्र में मील का पत्थर दोबारा स्थापित किया है। जो पुरस्कार किन्हीं कारणों से पिछले छह साल से नहीं दिए गए थे, उन्हें अकादमी ने फिर से शुरू किया है।सौरभ भारद्वाज ने किस मील के पत्थर की बात की थी पता नहीं। हिंदी अकादमी के पुरस्कार की घोषणा अगर मील का पत्थर थी तो उस मील के पत्थर को ढंका भी तो उनकी यानि आम आदमी पार्टी की सरकार ने ही था। 2018-19 के बाद से पुरस्कारों की घोषणा और उसका वितरण भी तो सौरभ भारद्वाज की पार्टी की सरकार ने ही रोका था। सौरभ भारद्वाज को क्या पता था कि वो जिसे वो मील का पत्थर बता रहे हैं वो भी घोषणा मात्र होकर रह जाएगी। हिंदी अकादमी ने पुरस्कारों की घोषणा तो की लेकिन पुरस्कार अर्पण समारोह नहीं हो सका। दिल्ली में विधानसभा चुनाव घोषित हो गए। विधान सभा चुनाव में आम आदमी पार्टी हार गई। भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी। सत्ता बदली तो हिंदी अकादमी में भी बदलाव देखने को मिला। हिंदी अकादमी के उपाध्यक्ष और हास्य कवि सुरेन्द्र शर्मा वहां से हटे। सुरेन्द्र शर्मा ने भी पुरस्कारों की घोषणा के समय मंत्री के साथ बैठकर दावा किया था कि पिछले तीन साल के पुरस्कारों की घोषणा से देशभर में हिंदी का मान बढ़ेगा। घोषणा करके पुरस्कार नहीं दे पाने से हिंदी अकादमी का मान बढ़ा या उसकी साख प्रश्नांकित हुई ये तो सुरेन्द्र शर्मा ही बता सकते हैं। 

पिछले वर्ष फरवरी में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी तो रेखा गुप्ता मुख्यमंत्री बनीं और कपिल मिश्रा को भाषा और संस्कृति विभाग मिला। इस विभाग के अंतर्गत ही हिंदी और अन्य भाषाई अकादमियां आती हैं। नई सरकार बने लगभग 11 महीने होने को आए लेकिन आम आदमी पार्टी की सरकार द्वारा घोषित पुरस्कार अभी तक नहीं बंट सके। विधानसभा चुनाव के ठीक पहले आम आदमी पार्टी की सरकार ने जिनका चयन पुरस्कार के लिए किया था उनमें भारतीय जनता पार्टी और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विरोधियों का भी नाम था। अगर पुरस्कार सूची से नई सरकार या नए मंत्री को कोई आपत्ति है तो उसको रद कर देना चाहिए। उन वर्षों के पुरस्कार की घोषित सूची को रद करने से अनिश्चितता की स्थिति दूर होगी। पूर्व में भी कई-कई वर्ष तक पुरस्कार नहीं दिए गए इस कारण किसी विवाद की आशंका भी नहीं है। अधिक से अधिक क्या होगा, अशोक वाजपेयी कहीं लिख-बोल देंगे क्योंकि उनका नाम श्लाका सम्मान के लिए घोषित हुआ था। जब से अशोक वाजपेयी राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा में शामिल हुए हैं तब से उनके कहे या लिखे का उतना असर नहीं रहा क्योंकि उनकी निष्पक्षता संदिग्ध हो गई। ये तो हुई पुरस्कार की बात लेकिन अगर हिंदी अकादमी और अन्य भाषाई अकादमियों के काम-काज पर नजर डालें तो स्थिति बदलतर नजर आती है।

हिंदी अकादमी की वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार इसकी स्थापना का उद्देश्य हिंदी भाषा साहित्य और संस्कृति से संबंधित कार्यक्रमों को कार्यरूप में लाना है। इसके अन्तर्गत दिल्ली के प्राचीन तथा समकालीन उत्कृष्ट साहित्य का संकलन, परिरक्षण तथा उसके सृजन के लिए प्रोत्साहन का कार्य सम्मिलित है। जिससे कि दिल्ली के साहित्यकारों को उत्कृष्ट साहित्य के सृजन के लिए प्रोत्साहन मिले, पुराना और दुर्लभ साहित्य सुरक्षित किया जा सके और नये साहित्यकारों के लिए योजनाओं और नयी दिशाओं की खोज की जा सके। जब वेबसाइट पर ही इन उद्देश्यों की पूर्ति के उपक्रम खोजने लगा तो वहां दिल्ली के उपराज्यपाल और दिल्ली की मुख्यमंत्री का चित्र- परिचय दिखा। जब हमने नया क्या है सेक्शन में क्लिक किया तो बहुत ही दिलचस्प जानकारियां मिली। पहली जानकारी दो दिवसीय बाल नाट्य उत्सव कलरव -2 के लिए प्रविष्टियां आमंत्रित करने की थी। इसके लिए अंतिम तिथि 25 अक्तूबर 25 थी। यानि उसके बाद नया कुछ हुआ नहीं। उसके पहले समाचार पत्रों की रद्दी बेचने और सचिव के प्रभार देने की जानकारी है। सबसे दिलचस्प है पथ-प्रदर्शन का खंड। इसमें संचालन समिति पर क्लिक करने पर कोई जानकारी नहीं मिलती है। प्रतीत होता है कि नई सरकार गठन के बाद हिंदी अकादमी की संचालन समिति नहीं बन पाई है। संचालन समिति नहीं बन पाई तो संचालन कैसे हो। इसी खंड में दायित्वों की सूची है जिसमें सचिव, सहायक सचिव और मुख्य लेखाधिकारी की जानकारी है। सिर्फ तीन की। हिंदी अकादमी का सरकारी उपयोग शीला दीक्षित के मुख्यमंत्री रहते ही आरंभ हो गया था। अरविंद केजरीवास की सरकार के समय तो ये पूरी तरह से सरकार की प्रचार एजेंसी में तब्दील हो गई। आरंभिक दिनों में केजरीवाल की पार्टी से जुड़े मंचीय कवि इसको चलाते थे। उसी दौर में कपिल मिश्रा उसके बाद मनीष सिसोदिया और सौरभ भारद्वाज ने इसको संभाला। हो सकता है कि अन्य मंत्रियों के पास भी हिंदी अकादमी का दायित्व रहा हो। शीला दीक्षित के समय जब नानकचंद इसके सचिव थे तो उस दौरान हिंदी अकादमी ने काफी कार्य किया था। उसके बाद से निरंतर इस संस्था की साख और कार्य छीजते चले गए। अब न तो इस संस्था का उपाध्यक्ष है और ना ही संचालन समिति। भगवान भरोसे है इनका कार्य। 

सिर्फ हिंदी अकादमी ही क्यों अगर मैथिली-भोजपुरी अकादमी को देखें तो उसकी हालत और भी दयनीय है। पूर्वांचलियों को प्रसन्न करने के लिए 2008 में इस अकादमी की स्थापना की गई थी। विधानसभा चुनाव के आसपास सभी दलों को पूर्वांचलियों की याद आती है लेकिन उसके बाद भूल जाते हैं। मैथिली और भोजपुरी अकादमी का उद्देश्य मैथिली और भोजपुरी भाषाओं और साहित्य संस्कृति का उन्नयन और पल्लवन। जब इस संस्था का ही उन्नयन नहीं हो पाया तो भाषा, साहित्य और संस्कृति का उन्नयन कैसे हो पाता। ये अकादमी भी संचालन समिति और पूर्णकालिक कर्मचारियों की कमी से मरणासन्न है। दिल्ली के भाषा और संस्कृति विभाग और उसके मंत्री कपिल मिश्रा को प्राथमिकता के आधार पर इन अकादमियों पर ध्यान देना चाहिए। भारतीय जनता पार्टी तो कला और संस्कृति के काम करने की प्रतिबद्धता निरंतर दोहराती रहती है बावजूद इसके दिल्ली की इन अकादमियों की स्थिति कुछ और ही कहानी कह रही है। दिल्ली सरकार के सामने अपनी पूर्ववर्ती सरकार की इन अकादमियों के प्रति बरती गई उदासीनता को दूर करने की चुनौती है। इस उदासीनता के कारण ही इन अकादमियों की दुर्दशा हुई। अकादमियों को मूल स्वरूप में लाने का काम करना होगा। साहित्य और संस्कृति की बदलती प्रवृत्तियों के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने की चुनौती है। सरकार की प्रचार मशीनरी के तौर पर काम करनेवाली इन अकादमियों को इससे मुक्त करके भाषा और संस्कृति के लिए गंभीर कार्य करने पर ध्यान देना होगा। यह सही है कि साहित्य कला के उन्नयन आदि के कार्यों से वोट नहीं मिलते लेकिन कई बार यही सेगमेंट वोटर की मानसिकता तय कर देते हैं।  

Saturday, September 22, 2018

मृत्यु पर मौन क्यों ‘सरकार’ ?


दिल्ली की हिंदी अकादमी के उपाध्यक्ष और हिंदी के वामपंथी कवि-आलोचक विष्णु खरे का निधन हो गया। विष्णु खरे को चंद महीने पहले ही केजरीवाल सरकार ने, मैत्रेयी पुष्पा के कार्यकाल खत्म होने के बाद, हिंदी अकादमी का उपाध्यक्ष नियुक्त किया था। उनके निधन के बाद दिल्ली  के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने शोक जताते हुए कोई ट्वीट नहीं किया जबकि मुख्यमंत्री हिंदी अकादमी का अध्यक्ष भी होता हैं। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की जगह उनके उप ने ट्वीट कर विष्णु खरे के निधन पर शोक जताया। मनीष सिसोदिया ने ट्वीट किया ‘हिंदी अकादमी के उपाध्यक्ष, साहित्य पत्रकारिता जगत की बड़ी हस्ती और हम सबके प्रेरणास्त्रोत श्री विष्णु खरे जी का देहावसान हो गया है। उनके निधन से साहित्य जगत को अपूरणीय क्षति हुई है। परमपिता परमात्मा उनकी आत्मा को शांति प्रदान करें। इस दुखद क्षण में हम सब उनके परिवार के साथ हैं।‘ अरविंद केजरीवाल के ट्वीट नहीं करने पर सोशल मीडिया पर सवाल खडे होने लगे हैं। किसी को ये संवेदनहीनता नजर आ रही है तो कोई ये कह रहा है कि अरविंद केजरीवाल ने मनीष सिसोदिया के दबाव में विष्णु खरे को अकादमी का उपाध्यक्ष बनाया था लिहाजा वो शुरू से खरे साहब को लेकर उदासीन थे। वजह चाहे जो हो पर एक संस्थान के उपाध्यक्ष के निधन पर उसी संस्थान के अध्यक्ष का सार्वजनिक रूप से शोक प्रकट नहीं करना खेदजनक और असंवेदनशील है। हिंदी अकादमी को नजदीक से जानने वाले लोग इसकी एक अलग ही वजह बताते हैं। दिल्ली के साहित्यिक हलके में इस बात की चर्चा है कि अरविंद केजरीवाल चाहते थे कि मैत्रेयी पुष्पा को एक और कार्यकाल मिले, आम आदमी पार्टी के नेता दिलीप पांडे भी इसी मत के थे लेकिन मनीष सिसोदिया, मैत्रेयी जी की जगह पर किसी और को लाना चाहते थे। मनीष सिसोदिया ने इसके लिए अपने एक पत्रकार मित्र की सलाह पर विष्णु खरे का नाम आगे बढाया और फिर उसको अनुमोदन भी करवा लिया। जब विष्णु खरे जी को दिल्ली की हिंदी अकादमी का उपाध्यक्ष बनाया गया था तब भी ये सवाल उठा था कि दिल्ली-एनसीआर के लेखक को छोड़कर विष्णु खरे जी को मुंबई से क्यों लाया गया। लेकिन सरकार के अपने फैसले होते हैं जिनकी आलोचना समय के साथ दबती चली जाती है।  अब खरे साहब के निधन के बाद तो ये बातें बिल्कुल ही अर्थहीन हो गई हैं।  अब केजरीवाल के पक्ष के लोग इस बात को लेकर शोरगुल कर रहे हैं कि साहित्य और राजनीति को अलग रखा जाना चाहिए। मुझे इस संदर्भ में साहित्य और राजनीति के संबंधों पर लिखा विजयदेव नारायण साही का एक लेख याद आ रहा है। अपने उस लेख में विजयदेव नारायण साही ने उस वक्त कहा था ‘ जिस तरह से आज राजनीति से साहित्य को अलग रखने का नारा लगानेवाले मध्यवर्गीय कलाकार प्रतिक्रियावादी हैं, उसी तरह से राजनीति की तानाशाही में कैद करके समस्त साहित्य को पार्टी का अस्त्र मात्र घोषित करनेवाले कला के दुश्मन हैं।‘ साहित्य और राजनीति का इस तरह से घालमेल किया गया कि वो अलग हो ही नहीं सकती, कम से कम जबतक साहित्य पर मार्क्सवाद का प्रभाव है। यह मैं इस वजह से कह रहा हूं क्योंकि लेनिन के प्रसिद्ध लेख ‘पार्टी साहित्य और पार्टी संगठन’ का असर भारत के लेखकों, खासतौर पर हिंदी के लेखकों पर बड़ा गहरा पड़ा था। लेनिन के उस लेख में कहा गया था कि ‘साहित्य को सर्वहारा के साझा उद्देश्य का अंग होना चाहिए और उसे पार्टी यंत्र का दांता और पेंच बन जाना चाहिए।‘ लेनिन के उस लेख की व्याख्या इस तरह के की गई जिसमें प्रतिबद्धता को पार्टी की सदस्यता से जोड़ दिया गया। सालों तक इस प्रतिबद्धता को कायम रखा गया, कमोबेश अब भी है। तो जब हम साहित्य को राजनीति से अलग रखने की बात करते हैं तो वो सुविधा के हिसाब से इस्तेमाल करनेवाली बात लगती है। साहित्य और राजनीति का हमारे समाज में गहरा संबंध रहा है। लेकिन राजनीतिज्ञों में साहित्य या साहित्यकारों को लेकर जिस तरह की उदासीनता इस वक्त है वैसा पहले कभी देखने को नहीं मिला है। राजनीति को साहित्य के प्रति संवेदनशील होने की जरूरत है। किसी वरिष्ठ लेखक की मृत्यु पर ‘सरकार’ का मौन सवालों के घेरे में है।  
सिर्फ राजनीति और राजनेता ही संवेदनहीन हुए हों ऐसा नहीं है। विष्णु खरे जी जब जिंदगी की जंग लड़ रहे थे, तो हिंदी अकादमी में उनकी पूर्ववर्ती उपाध्यक्ष मैत्रेयी पुष्पा की एक टिप्पणी भी विवादास्पद हो गई है। मैत्रेयी पुष्पा ने पहले अपनी वॉल पर युवा कवि शायक आलोक का एक पत्र लगाया जो कि उऩको ही संबोधित था। पत्र में लिखा था ‘आभारी हूं कि हम दिल्ली में बसे कुछ युवा जो संघर्षरत हैं, और साहित्यिक वैचारिक रचनात्मकता से जुड़े हैं, उन्हें आपने समय समय पर हिन्दी अकादमी मंच पर आमंत्रित किया और कुछ आर्थिक लाभ भी दिया ताकि हमारा हौसला न टूटे. युवा कवि प्रकाश ने अपने संघर्ष से तंग आकर आत्महत्या कर ली. उसके बाद श्री वाजपेयी ने वार्षिक युवा संगम का आयोजन शुरू किया और माह दूमाह पर युवा कवियों से कविताएं पढ़ा उन्हें कुछ आर्थिक लाभ देते हैं. उन्होंने प्रकाश-वृत्ति योजना का शिलान्यास भी किया है जहां युवा कवियों के प्रथम संग्रह छाप वे अपनी ग्लानि धो रहे. क्या हम भी आत्महत्या कर लें ताकि आचार्य विष्णु खरे की हिन्दी अकादमी जो मृतकों व मृत्यु-उत्सुक कवियों के ही आयोजन में लगी है वह शायक-वृत्ति या अविनाश-वृत्ति योजना का शिलान्यास कर शेष रह जाते युवा कवियों का कुछ कल्याण कर सके?’ इसके उत्तर में मैत्रेयी ने जो लिखा उसको लेकर उनपर हमले शुरू हो गए हैं। मैत्रेयी पुष्पा ने शायक के पत्र का उत्तर भी फेसबुक पर ही दिया और लिखा- तुम्हारी चिट्ठी का क्या जवाब दूं? मैंने युवा कलमकारों और कलाकारों के लिए जो संकल्प लिये थे और कार्यान्वित किये, मेरे वो इरादे पुरानी पीढ़ी को घातक लगे, जैसे उनकी सत्ता छिन रही हो। परिणाम तुम युवकों युवतियों के सामने है। हिंदी अकादमी....। मैत्रेयी पुष्पा के इस उत्तर को विष्णु खरे की परोक्ष आलोचना माना गया। पुरानी पीढ़ी और बूढ़े जैसे शब्दों का इस्तेमाल भी उनके लिए लिए ही किया गया जान पड़ा। चर्चा तो ये भी चली कि मैत्रेयी ने ही शायक को कहकर वो खत लिखवाया फिर उसका उत्तर दिया। क्योंकि शायक का खत मैत्रेयी जी ने अपनी फेसबुक वॉल पर लगाया और दस मिनट बाद ही उसका उत्तर भी पोस्ट कर दिया। इस पूरे प्रकरण के पीछे हिंदी अकादमी की पत्रिका ‘इंद्रप्रस्थ भारती’ का नया अंक और हिंदी अकादमी के आयोजनों में एक खास विचारधारा के लोगों को बुलाना है। मैत्रेयी पुष्पा ने अपने कार्यकाल के अंतिम दिनों में ‘इंद्रप्रस्थ भारती’ का कहानी विशेषांक तैयार किया था और पूर्व की घोषणा के अनुसार कहानीकारों की कहानियां तय कर दी गई थीं। इस बीच उनका कार्यकाल समाप्त हो गया और विष्णु खरे ने कार्यकाल संभालते ही उसमें काफी बदलाव कर दिए। साहित्य जगत को इसकी जानकारी भी मैत्रेयी पुष्पा के फेसबुक वॉल पर उनकी पोस्ट से ही हुई थी। अब शायक आलोक के पत्र के माध्यम से मैत्रेयी ने जिस प्रकार से विष्णु खरे और आयोजनों में बुलाए जानेवाले बुजुर्ग लेखकों पर निशाना साधा उसकी टाइमिंग गलत हो गई। मैत्रेयी के पोस्ट के सात-आठ घंटे के बाद ही विष्णु खरे जी का निधन हो गया। उसके बाद विवाद और बढ़ गया।
ऐसा प्रतीत होता है कि अब मैत्रेयी जी फेसबुक पर विवाद खड़ा कर उसका आनंद उठाने लगी हैं। जैसे राजेन्द्र जी किया करते थे, वो भी पहले विवाद उठाते थे और फिर किनारे बैठकर उसका मजा लिया करते थे। पिछले एक साल में मैत्रेयी ने कई विवादास्पद पोस्ट लिखी, छठ के दौरान नाक तक सिंदूर लगाने को लेकर की गई विवादास्पद टिप्पणी भी उसमें शामिल है। फेसबुक पर जिस रफ्तार से विवाद वायरल होते हैं, उसका दायरा फैलता है, पक्ष और विपक्ष में दलीलें आती हैं वो विवाद उठानेवाले को आनंद से भर देने के लिए काफी होते हैं। हिंदी अकादमी और विष्णु खरे को लेकर भले ही विवाद खडा करने की कोशिश की जा रही हो लेकिन हमारे भारतीय संस्कार में किसी की मृत्यु के बाद उनके बारे में आलोचनात्मक नहीं लिखने की परंपरा रही है। अपशब्द का इस्तेमाल तो वर्जित ही होता है। विष्णु खरे जी के निधन के बाद भले ही केजरीवाल मौन रहे हों, उनकी मृत्य के पहले मैत्रेयी पुष्पा की टिप्पणी आपत्तिजनक हो लेकिन उनकी मृत्यु के फौरन बाद तो हम सबको मृतात्मा की शांति के लिए प्रार्थना करना चाहिए, विवाद को हवा देकर भारतीय परंपरा की मर्यादा को ना तोड़ें। अगर बात करनी ही है, तो विष्णु खरे की कविताओं पर बात हो, उनकी रचनात्मकता को कसौटी पर कसा जाए।

Saturday, August 11, 2018

भाषा अकादमियों के जरिए राजनीति


हाल ही में दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने कैबिनेट की बैठक में 15 भाषा अकादमियों के गठन को मंजूरी दी। उन भाषाओं की अकादमियां भी दिल्ली में होंगी जिनके बोलने लिखनेवाले लोग राजधानी दिल्ली में रहते हैं। भारतीय भाषाओं की पैरोकारी करनेवाले सभी लोगों को ये पहल अच्छी लग सकती है, लेकिन दिल्ली में पहले से चल रही भाषाई अकादमियों के हाल देखकर आगामी दिनों में बनने वाली इन 15 अकादमियों को लेकर बहुत उम्मीद नहीं जग रही है। बल्कि ये आशंका और बलवती हो रही है कि करदाताओं के पैसे का अपव्यय ना हो। दरअसल हमारे देश में भाषा बहुत ही संवेदनशील मुद्दा है और आजादी के बाद से सभी राजनीतिक दल इसको भुनाने की जुगत में रहते हैं। केजरीवाल सरकार को भी इसमें राजनीति की संभावनाएं नजर आईं होंगी तभी एक साथ 15 भाषा अकादमियों के गठन को कैबिनेट की मंजूरी दी गई है। दिल्ली की दो भाषा अकादमी ऐसी रही हैं जिनके प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल अपनी राजनीति चमकाने के लिए किया जाता रहा है। पहली तो हिंदी अकादमी और दूसरी मैथिली-भोजपुरी अकादमी। उर्दू अकादमी भी अपने आयोजनों को लेकर विवादित रही हैं।  
दिल्ली की हिंदी अकादमी की बेवसाइट पर उपलब्ध जानकारी के मुताबिक दिल्ली में हिन्दी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति के संवर्द्धन, प्रचार-प्रसार और विकास के उद्‌देश्य से 1981 में तत्कालीन दिल्ली प्रशासन ने स्वायत्तशासी संस्था के रूप में हिन्दी अकादमी की स्थापना की। इस अकादमी के अध्यक्ष दिल्ली के मुख्यमंत्री होते हैं। अकादमी के कार्यक्रमों तथा गतिविधियों के क्रियान्वयन और नियोजन में निर्णय एवं परामर्श के लिए दिल्ली के मुख्यमंत्री दो वर्ष की अवधि के लिए संचालन-समिति गठित करते हैं। घोषित तौर पर इसमें 25 जाने-माने साहित्यकार, लेखक, विशेषज्ञ, पत्रकार आदि नामित किए जाते हैं। इसके अलावा अकादमी में समय-समय पर विभिन्न कार्यों के निष्पादन/निर्णय के लिए अलग-अलग समितियां बनायी जाती है जो उपयुक्त दिशा-निर्देशन के साथ-साथ यह सुनिश्चित करती हैं कि योजनाओं के अंतर्गत लाभ उठाने वालों के चयन में निष्पक्षता बरती जाए। इसके अलावा इसके इसके करीब दर्जन भर घोषित उद्देश्य भी हैं जिसमें हिंदी को लेकर बड़े बड़े दावे किए गए हैं।
अरविंद केजरीवाल के मुख्यमंत्री बनने क बाद से हिंदी अकादमी भी किसी ना किसी विवाद में पड़ती रही, पहले अपने संचालन समिति के गठन को लेकर तो फिर भाषा सम्मान में अंतिम समय में जोड़े गए नामों को लेकर। मैत्रेयी पुष्पा जब हिंदी अकादमी की उपाध्यक्ष रहीं तब भी इसके मंच पर नेता आए, उनको लाखों का भुगतान भी किया गया। सवाल भी उठे लेकिन ये पता नहीं चल सका कि ऑडिट में उस खर्चे को किस तरह से समायोजित किया गया। कलांतार में मैत्रेयी पुष्पा ने अकादमी को लगभग विवाद मुक्त कर दिया था और अकादमी में ठोस काम-काज भी होने लगे थे, पत्रिका भी मासिक होकर अच्छी निकल रही थी। यह अलहदा मुद्दा है कि मैत्रेयी पुष्पा के इर्द-गिर्द भी कुछ लोग जमा होकर लाभ उठा रहे थे। ये तो सत्ता और समाज का चरित्र भी है। मैत्रेयी पुष्पा के कार्यकाल के खत्म होने के बाद अब जो उपाध्यक्ष बने हैं वो तो सीधे तौर पर राजनीति पर उतर आए हैं। मैत्रेयी के बाद दिल्ली सरकार ने हिंदी अकादमी की कमान मुंबई में रहनेवाले मशहूर और बुजुर्ग मार्क्सवादी कवि लेखक विष्णु खरे को सौंपी। विष्णु खरे की नियुक्ति पर यह भी सवाल उठता है कि दिल्ली की हिंदी अकादमी का उपाध्यक्ष मुंबई में रहनेवाले व्यक्ति को क्यों बनाया गया? क्या दिल्ली की धरती साहित्यकार विहीन हो गई थी। या दिल्ली में विष्णु खरे से योग्य को व्यक्ति था नहीं? अकादमी में अबतक ये परिपाटी रही है कि इसका उपाध्यक्ष दिल्ली का रहनेवाले होता है या वो व्यक्ति होता है जो काम करने के लिए दिल्ली आता हो। यह इस वजह से भी कह रहा हूं कि मुंबई के व्यक्ति को हिंदी अकादमी का उपाध्यक्ष बनाने से वित्तीय बोझ बढ़ता है। अगर उपाध्यक्ष हर सप्ताह अपने घर मुंबई जाना चाहे तो उसको अकादमी की तरफ से मुंबई आने जाने का हवाई किराया देना पड़ेगा। वो दिल्ली में रहेगा तो उसके रहने खाने का इंतजाम करना होगा। इसका प्रावधान दिल्ली की हिंदी अकादमी में नहीं है। अगर उपाध्यक्ष दिल्ली सरकार से अपने आवास की व्यवस्था का अनुरोध कर दें तो एक और समस्या खड़ी हो सकती है। दिल्ली की हिंदी अकादमी के उपाध्यक्ष के लिए कोई वेतन तय नहीं है बल्कि उनको हर महीने पांच हजार रुपए यात्रा व्यय के लिए दिए जाने का प्रावधान है। तो उपाध्यक्ष पर अगर इसके अलावा किसी प्रकार का खर्च होता है तो उसको कैसे जायज ठहराया जाएगा, ये देखना दिलचस्प होगा। हिंदी अकादमी के उपाध्यक्ष को अकादमी के कार्यक्रमों में शामिल होने के एवज में कोई धन देने का प्रावधान भी नहीं है इस वजह से अबतक निमंत्रण पत्रों पर उपाध्यक्ष का सानिध्य छपता रहा है। अगर अकादमी का उपाध्यक्ष किसी कार्यक्रम की अध्यक्षता करता है या उसमें वक्ता के तौर पर शामिल होता है तो वो धन ले सकता है लेकिन वो धन लेना कितना नैतिक होता है यह तो उपाध्यक्ष ही बता सकता है, या फिर हिंदी अकादमी के अध्यक्ष होने के नाते दिल्ली की जनता को अरविंद केजरीवाल से ये जानने का हक है।
दिल्ली की हिंदी अकादमी के नए नवेले उपाध्यक्ष खरे ने अभी वार्षिक पुरस्कार समारोह में मंच से वहां मौजूद लोगों से राजनीतिक अपील की। उन्होंने मंच से कहा कि नरेन्द्र मोदी को वोट मत देना। यह बात समझ से परे है कि एक साहित्यिक समारोह में सरकारी अकादमी का उपाध्यक्ष उपमुख्यमंत्री की मौजूदगी में मोदी को वोट नहीं देने की अपील क्यों करता है और उस अपील पर उपमुख्यमंत्री खामोश क्यों रहता है। समारोह में उपस्थित एक व्यक्ति ने कहा कि हो सकता है कि नए उपाध्यक्ष सूबे की सरकार को खुश करने के लिए अपनी सीमा से बाहर चले गए हों। अपने छोटे से वक्तव्य में उन्होंने साहित्यकारों से कम्युनिस्ट होने की अपेक्षा भी जता दी थी। दरअसल विष्णु खरे साहित्य की जिस पाठशाला से आते हैं वहां साहित्यिक संगठन अपने राजनीतिक आकाओं के इशारे पर काम करते हैं, उन्हीं के इशारे पर लेखन करते हैं। अंग्रेजी का एक कहावत है ना कि ल्ड हैबिट डाई हार्ड मतलब कि पुरानी आदतें जल्दी जाती नहीं है। यह तो हिंदी अकादमी की बात हुई लेकिन इसके पहले दिल्ली की मैथिली भोजपुरी अकादमी के मंच पर नीतीश कुमार को बुलाकर केजरीवाल की राजनीति चमकाने की कोशिश की गई थी। तब भी उसको लेकर सवाल खड़े हुए थे, लेकिन ना तो सरकार से ना ही अकादमी की तरफ से कोई ठोस उत्तर आया था।
अब अगर हम दिल्ली की भाषा अकादमियों के प्रशासनिक ढांचे पर नजर डालें तो वहां सालों से तदर्श व्यवस्था चल रही है। हिंदी अकादमी की ही बात करें तो वहां कई वर्षों से पूर्णकालिक सचिव नहीं है। अभी संस्कृत अकादमी के सचिव को हिंदी अकादमी का अतिरिक्त प्रभार है। मौथिली भोजपुरी अकादमी में भी तदर्श व्यवस्था लागू है। उर्दू में भी पूर्णकालिक सचिव नहीं है। इन अकादमियों से लंबे समय से जुड़े एक अधिकारी ने बताया कि किसी भी भाषा अकादमी के पास स्थायी सचिव नहीं है ।भाषा अकादमियों को लेकर केजरीवाल सरकार कितनी गंभीर है यह इससे ही पता चलता है कि इन अकादमियों को सुचारू रूप से चलाने की जिम्मेदारी जिस सचिव पर है वही तदर्थ है। हिंदी अकादमी में आखिरी पूर्णकालिक सचिव ज्योतिष जोशी थे उसके बाद से तदर्थ व्यवस्था चल रही है। हिंदी के लेखक भगवानदास मोरवाल का चयन हिंदी अकादमी के सचिव के रूप में हो गया था लेकिन उसाक नोटिफिकेशन नहीं हो पाया। साहित्यिक हलके में चर्चा यह है कि मैत्रेयी पुष्पा नहीं चाहती थीं कि मोरवाल जी उनके कार्यकाल मे सचिव बनें। सचिव के नहीं होने से इन अकादमियों का कामकाज प्रभावित होता है।
भाषा, साहित्य और संस्कृति का मामला ऐसा है जहां कि गंभीरता से काम करने की जरूरत होती है, तदर्थ व्यवस्था से राजनीति तो चमक सकती है, लोगों को लुभाया जा सकता है लेकिन कुछ ठोस हो नहीं पाता है। जैसे अभी हिंदी अकादमी ने जो पुरस्कार दिए हैं उसमें मुंबई के रहनेवाले जावेद अख्तर को श्लाका सम्मान दिया गया। इसपर भी सवाल है। इसी तरह से दिल्ली के बाहर वालों को भी अन्य पुरस्कार दिए गए। दिल्ली के लोगों के बीच काम करने की जिम्मेदारी इन अकादमियों पर थी लेकिन उसको राष्ट्रीय पहचान दिलाने के चक्कर में ना तो दिल्ली में ठीक से काम हो पा रहा है और ना ही राष्ट्रीय पहचान बन पा रही है, इन अकादमियों के कर्ताधर्ताओं को ये समझना होगा कि पुरस्कार दे देना सबसे आसान काम है लेकिन भाषा के लिए जमीन पर काम करना बहुत कठिन है लेकिन जब मंशा ही राजनीति की हो तो फिर उम्मीद क्यों करें ठोस जमीनी काम की।   

Saturday, March 11, 2017

विकल्पहीनता और मैत्री का पुरस्कार


दिल्ली की हिंदी अकादमी ने अभी अपने सालाना पुरस्कारों का एलान किया है । पुरस्कृत लेखकों की सूची को देखकर लगा कि हिंदी में पुरस्कारों को लेकर जोखिम उठाने का साहस कोई कर नहीं सकता है ।पिछले वर्ष जब हिंदी अकादमी ने अपने सालाना पुरस्कारों का एलान किया था तब कमोबेश चयन को लेकर एक आश्वस्ति हुई थी । कुछ नाम तब भी विवादास्पद थे लेकिन सरकारी संस्था होने के कारण उसके कर्ताधर्ताओं पर बाहरी-भीतरी कई तरह के दबाव होते हैं । बावजूद इसके पिछले वर्ष के नामों को देखकर लगा था कि हिंदी अकादमी की उपाध्यक्ष मैत्रेयी पुष्पा में जोखिम लेने का साहस है । मैत्रेयी पुष्पा ने दिल्ली की हिंदी अकादमी को गतिशील कर वहां की साहित्यक जड़ता को तोड़ा है लेकिन इस वर्ष के चुनाव में नामों को देखकर लगता है कि मैत्रेयी जी दो साल में व्यवस्था से लड़ते लड़ते थक गई हैं और हथियार डाल दिए हैं । इस वर्ष का सबसे बड़ा पुरस्कार यानि श्लाका सम्मान मैनेजर पांडे को दिया गया है । इन पुरस्कारों पर टिप्पणी करने से पहले यह जान लेना आवश्यक है कि पुरस्कारों की चयन समिति में कौन कौन से विद्वान थे । मैत्रेयी पुष्पा के अलावा भारतीय ज्ञानपीठ के निदेशक और हिंदी के वरिष्ठ कवि लीलाधर मंडलोई, लेखक वीरेन्द्र यादव और प्राध्यापक सुधा सिंह । अब इस सूची से ही बहुत कुछ साफ हो जाता है कि हिंदी अकादमी अपने पुरस्कारों के चयन को लेकर कितनी संजीदा थी । लीलाधर मंडलोई के अलावा जो दो विद्वान इस जूरी में थे उनके बारे में हिंदी जगत को ज्ञात है । वीरेन्द्र यादव हिंदी के आलोचक माने जाते हैं, हिंदी अकादमी में हाल में इनकी सक्रियता बढ़ी है, संभव है अकादमी की उपाध्यक्ष से उनकी नजदीकी फिर से कायम हो गई हो । अन्यथा दिल्ली में रहनेवाले तमाम आलोचकों को दरकिनार कर यादव जी को जूरी में रखने का औचित्य समझ से परे है । दरअसल संस्थाओं पर से मार्क्सवादियों के खत्म होते वर्चस्व के मद्देनजर वीरेन्द्र यादव जैसे सम्मानित वामपंथी लेखक अलग अलग ठीहा तलाशने में लगे हैं । ठीहे की तलाश के क्रम में दिल्ली की अरविंद केजरीवाल की सरकार वामपंथ के अनुयायियों के लिए सबसे मुफीद जगह है । मैत्रेयी पुष्पा अपने लेखन से लेकर अपने विचार में कभी भी किसी पंथ या वाद में नहीं बंधी लेकिन जब सरकारी पद पर पहुंची तो उनके सामने भी अपने सरकार के एजेंडे के हिसाब से काम करने का परोक्ष या प्रत्यक्ष दबाव तो होगा ही । वीरेन्द्र यादव जी को रायपुर में रमन सिंह सरकार द्वारा आयोजित लेखक सम्मेलन पर घोर आपत्ति थी क्योंकि वहां उनके मुताबिक फासीवादी सरकार है, उस पार्टी की सरकार है जिसपर गुजरात दंगों के दाग हैं । वीरेन्द्र यादव जी को गुजरात दंगे याद रहते हैं लेकिन वो मुजफ्फरनगर दंगों को भुलाते हुए अखिलेश यादव सरकार से खुद सम्मानित हो जाते हैं । यादव जी स्वयं बता सकते हैं कि उनके इस विचलन के पीछे उनकी क्या सोच रही होगी, लखटकिया पुरस्कार या कुछ और । खैर यह अवांतर प्रसंग है । अब बचती हैं सुधा सिंह जी, दिल्ली विश्वविद्यालय में शिक्षक हैं और कोलकाता विश्वविद्यालय में शिक्षक रहे जगदीश्वर चतुर्वेदी जी के साथ कई पुस्तकों का लेखन किया है । उनका साहित्यक कद इतना बड़ा नहीं है कि वो जूरी के अन्य सदस्यों के मत का विरोध आदि कर सकें । इसमें से सिर्फ लीलाधर मंडलोई से निरपेक्ष होकर निर्णय की अपेक्षा की जा सकती है ।
अब श्लाका पुरस्कार से पुरस्कृत मैनेजर पांडे के साहित्यक अवदान पर बात कर लेते हैं । पांडे जी बड़े आलोचक हैं । जन संस्कृति मंच से लंबे समय तक जुड़े रहे हैं ।  मैं समझता हूं कि श्लाका सम्मान एक तरह से लाइफ टाइम अचीवमेंट अवॉर्ड है, लिहाजा उनको मिल ही जाना चाहिए था । पर पांडे जी को श्लाका सम्मान मिलने पर मुझे पिछले साल नामवर सिंह के जन्मदिन पर प्रोफेसर कृष्ण कुमार सिंह के संपादन में प्रकाशित बहुवचन पत्रिका में नामवर जी के अपनी बेटी को लिखे एक पत्र की याद आ गई । नामवर जी ने वो पत्र अपनी पुत्री को दार्जिलिंग से बारह जून दो हजार पांच को लिखा था । पत्र की पृष्ठभूमि यह है कि दार्जिलिंग के होटल में कोई पांडे नाम के सज्जन पहुंचे और पांच सौ पृष्ठों के महाकाव्य पर नामवर जी से कुछ लिखने का आग्रह किया । नामवर जी लिखते हैं – बेटू, मेरी वह पुरानी जन्मकुंडली कहीं पड़ी हो तो इस बार लौटने पर मुझे दे देना । मैं उसे किसी ज्योतिषी को दिखाना चाहता हूं । मुझे शक है, उसमें कहीं ना कहीं ‘पांडे-पीड़ा’ का उल्लेख अवश्य होगा । काशी तो ‘पांडे-पीड़ित’ हैं ही, कहीं ना कहीं मुझे भी वह छूत लग गई है । भदैनी पर रहने के लिए किराए का जो मकान लिया था वह रामनाथ पांडे का ही दिया हुआ था और बाद में बगल का जो मकान खरीदा वह भी उन्हीं पांडे जी ने दिलवाया था । इस क्रम में मैनेजर पांडे भी याद आ रहे हैं जो जोधपुर में मिले तो मिले ही, मेरी शामत आई कि उनको जेएनयू ले आया और अंत में अवकाश ग्रहण करने के बाद तीन साल के लिए सेंटर पर थोप दिया, जिसके लिए सभी लोग आज भी कोस रहे हैं । जो हो, दार्जीलिंग भीइस ‘पांडे-पीड़ा’ से सुरक्षित नहीं है । जाने यह पीड़ा कहां-कहां तक और कब तक मेरा पीछा करती रहेगी ।‘ नामवर जी के इस उद्गार में कुछ और जोड़ने की आववश्यकता नहीं है ।
इसके अलावा भी जिन अन्य लोगों को पुरस्कार दिए गए हैं उनके चयन को लेकर यह तर्क दिया जा रहा है कि विकल्पहीनता की वजह से इन लोगों का चयन हुआ । कहा तो यहां तक जा रहा है कि हिंदी अकादमी के सामने विकल्प ही नहीं बचे हैं लिहाजा जो हैं उन्हीं में से चुनाव किया जा रहा है । पर मुझे लगता है कि कुछ को विकल्पहीनता, कुछ को आम आदमी पार्टी के प्रति निष्ठा, कुछ को मैत्रीवश तो कुछ को उनकी उम्र का ख्याल रखकर दिया गया है । इन कोष्ठकों में नाम रख देने से उनका अनादर होगा लेकिन दिल्ली के हिन्दी जगत के लोग इसको बखूबी समझ सकते हैं । वफादारी का इनाम हर जगह मिलता है लेकिन वफादारी को नैतिकता के आवरण में लपेटकर दिया गया इनाम हमेशा संदेहास्पद भी हो जाता है ।  मैत्रेयी पुष्पा ने जब हिंदी अकादमी के उपाध्यक्ष का पद संभाला था तब यह उम्मीद जगी थी कि वो हिंदी की घिसी पिटी लीक से अलग हटकर अपना रास्ता बनाएंगी । एक दो बार इस तरह के जोखिम उठाने के बाद वो भी लीक से हटकर चलने का कौशल नहीं दिखा पाईं । घिसे-पिटे तरीके को अपनाकर मैत्रेयी जी ने भी यह बता दिया कि व्यवस्था को बदलना आसान नहीं है, इसके लिए अदम्य साहस के साथ साथ अपने साथियों की नाराजगी का खतरा मोल लेने की हिम्मत दिखानी पड़ती है । क्या यह संभव नहीं है कि उन कम उम्र लेखकों को पुरस्कृत किया जाए जिन्होंने अपनी लेखनी और सृजनात्मरता से समकालीन हिंदी साहित्य में सार्थक हस्तक्षेप किया है । मैत्रेयी जी को तो यह बात समझनी चाहिए थी क्योंकि उन्होंने तो इसको देखा और महसूसा है कि कैसे बेहतर लेखन के बावजूद उनको सम्मानित नहीं किया गया था । अब वक्त आ गया है कि बेहतर लेखन को रेखांकित कर उसको पुरस्कृत किया जाए चाहे वो किसी आयुवर्ग के लेखक ने किया हो या फिर डंके की चोट पर यह बता देना चाहिए कि लेखक को उसके समग्र योगदान के लिए पुरस्कृत किया जा रहा है । इससे किसी तरह के सवाल उठने की गुंजाइश नहीं रहेगी ।  
एक और बात जिसका दिल्ली की हिंदी अकादमी को खुलासा करना चाहिए था, वह ये कि उन्होंने आम जनता से या लेखकों आदि से जो संस्तुतियां मंगवाई थी उससे इस पुरस्कार को तय करने में कोई मदद मिली या नहीं । अगर मदद मिली तो उसको सार्वजनिक करना चाहिए क्योंकि केजरीवाल जी स्वयं पारदर्शिता की पैरोकारी करते रहे हैं । अगर आमंत्रित संस्तुतियों से पुरस्कार के निर्णायकों को किसी तरह की मदद नहीं मिली तो इस प्रक्रिया को बंद कर देना चाहिए । हिंदी अकादमी अगर यह भी बताती कि किन लेखकों के नामों की संस्तुति सबसे ज्यादा आई है तो निर्णय की विश्वसनीयता बढ़ती ।  बताना तो हिंदी अकादमी को यह भी चाहिए कि पुरस्कार के निर्णायकों का चयन किस आधार पर किया गया है । दिल्ली की अकादमी होने के बावजूद एनसीआर से बाहर के लेखक को निर्णायक मंडल का सदस्य, हिंदी अकादमी की किस नियम के तहत, बनाए गए । अगर इस मसले पर हिंदी अकादमी के नियम खामोश हैं तो इसको परिभाषित किए जाने की भी जरूरत है क्योंकि दिल्ली-एनसीआर में योग्य निर्णायकों के होने के बावजूद बाहर के निर्णायक बुलाने से बेवजह खर्च बढ़ता है । इस खर्च का वहन दिल्ली के करदाताओं के पैसे से होता है और बेहतर होता कि यहीं के लेखकों को जोड़कर अकादमी बेहतर साहित्यक माहौल बनाने की कोशिश करती । राज्यों की अकादमी इसलिए तो केंद्रीय साहित्य अकादमी की प्रकृति से अलग होती है । 

Saturday, June 4, 2016

संस्कृति के नाम पर फिजूलखर्ची ?

दिल्ली में एक अकादमी है, नाम है हिंदी अकादमी । दिल्ली के मुख्यमंत्री इसके अध्यक्ष हैं और हिंदी की मशहूर और वरिष्ठ कथाकार मैत्रेयी पुष्पा इसकी उपाध्यक्ष हैं । दिल्ली में हिंदी भाषा, साहित्य और संस्कृति के संवर्धन, प्रचार प्रसार और विकास के उद्देश्य से उन्नीस सौ इक्यासी में एक स्वायत्तशासी संस्था के तौर पर इसका गठन किया गया था । हिंदी अकादमी का दावा है कि ये अपने गठन के समय से ही भाषाई, सांस्कृति और साहित्यक गतिविधियों के प्रचार प्रसार में अहम भूमिका निभाती रही है । हिंदी अकादमी की बेवसाइट पर मौजूद उसके लक्ष्यों और उद्देश्यों के मुताबिक इसको भाषा साहित्य और संस्कृति के कार्यक्रमों को कार्यरूप में लाना है । इसके अंतर्गत दिल्ली के प्राचीन तथा समकालीन साहित्य का संकलन, परिरक्षण और उसके सृजन के लिए प्रोत्साहन का कार्य सम्मिलित है । इसके अलावा भी इसकी बेवसाइट कई तरह के कार्यों को करने का दावा करती है जिसमें वयोवृद्ध उच्च कोटि के साहित्यकारों को पुरस्कृत करने से लेकर, साहित्यक कार्यक्रमों और गोष्ठियों का आयोजन, साहित्यक पत्रिका का प्रकाशन और युवा लेखकों को प्रकाशन योजना के अंतर्गत सहायता देना शामिल है । हिंदी अकादमी ने पूर्व में क्या काम किया इसपर जाने का ना तो वक्त है और ना ही अवसर लेकिन इस मौके पर टी एस इलियट की एक उक्ति अवश्य याद आ रही है – केवल अतीत ही वर्तमान को प्रभावित नहीं करता है, वर्तमान भी अतीत को प्रभावित करता है । हिंदी अकादमी के संदर्भ में ये दोनों बातें सही हैं । अतीत की आड़ में हिंदी अकादमी में बहुत कुछ ऐसा हो रहा है जो कि अपेक्षित नहीं है और जो वर्तमान है वो अतीत के क्रियाकलापों पर फिर से कसौटी पर कसने की चुनौती दे रहा है । जब से मैत्रेयी पुष्पा ने हिंदी अकादमी के उपाध्यक्ष का पदभार संभाला है तब से कार्यक्रमों के आयोजन से उसकी सक्रियता नजर आ रही है । बाताया जा रहा है कि हिंदी के विकास के लिए स्कूलों कॉलेजों में भी कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं । अच्छी बात है । लेकिन अभी एक ऐसा मामला सामने आया है जो हिंदी अकादमी के कार्यक्रमों, उसके घोषिथ उद्देश्यों और लक्ष्य से अलग हट कर है । होली के मौके पर हिंदी अकादमी ने कई विधायकों और मंत्रियों के क्षेत्रों में होली मिलन कार्यक्रम आयोजित किया था जिसको सांस्कृतिक कार्यक्रम के तहत शामिल कर खर्चे दिखाए गए थे । इलियट की उक्ति के आलोक में देखें तो हिंदी अकादमी सालों से इस तरह के कार्यक्रमों का खर्चा उठाती रही है । सालों से किसी ने इसपर सवाल नहीं उठाया कि होली मिलन से कैसे संस्कृति का संवर्धन और विकास होता है । ये सब अब भी चल रहा था लेकिन होली मिलन के नाम पर बीजेपी के सांसद और कलाकार मनोज तिवारी को आठ लाख रुपए के भुगतान के बाद इस तरह के कार्यक्रमों पर सवाल उठने लगे हैं । खबरों के मुताबिक मनोज तिवारी के लोकसभा क्षेत्र में यह कार्यक्रम आयोजित किया गया था और संभवत यह दिल्ली के भाषा और संस्कृति मंत्री कपिल मिश्रा का विधानसभा क्षेत्र भी है । इस कार्यक्रम के निमंत्रण पत्र के मुताबिक मुख्य अतिथि मशहूर कवि और आम आदमी पार्टी के नेता कुमार विश्वास थे और मुख्य प्रस्तुति मनोज तिवारी की थी । निमंत्रण पत्र के मुताबिक निवेदक कपिल मिश्रा थे जो कि दिल्ली के भाषा और संस्कृति मंत्री हैं और हिंदी अकादमी उनके मंत्रालय के अधीन है । अब सवाल यही से खड़े होते हैं कि हिंदी अकादमी के कार्यक्रमों के निमंत्रण पत्र में , परंपरा के मुताबिक, निवेदक के तौर पर उसके सचिव का नाम छपता रहा है । इस बार खुद मंत्री का नाम कैसे छप गया । खैर ये बात छोटी लग सकती है लेकिन यहां से परंपरा टूटने और कुछ अलग हटके होने का संकेत मिलता है । इस कार्यक्रम के कार्ड पर उपाध्यक्ष का नाम भी नहीं छपा है जो कि हिंदी अकादमी के निमंत्रण पत्रों पर शोभा की तरह होता ही है । सानिध्य के तौर पर ।
दूसरी बात यह कि मनोज तिवारी को हिंदी अकादमी आठ लाख रुपए का भुगतान करती है तो क्या इतनी बड़ी रकम के भुगतान के लिए कार्यकारिणी की मंजूरी ली गई थी । अगर मंजूरी लगी गई थी तो क्या ये माना जाए कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की भी इसमें सहमति थी क्योंकि वो ही अकादमी के अध्यक्ष हैं । सरकार को इन बातों को साफ करना चाहिए कि किसकी अध्यक्षता में उस कार्यकारिणी की बैठक हुई जिसने इतनी बड़ी रकम खर्च करने की मंजूरी दी गई । सवाल तो यह भी उठता है कि क्या कार्यकरिणी की बैठक में मनोज तिवारी के नाम पर इतने बड़े भगुतान की मंजूरी ली गई थी । क्या कार्यकारिणी के सदस्यों को इस बात की जानकारी दी गई थी कि करावल नगर में आयोजित होनेवाले कार्यक्रम में मनोज तिवारी को बुलाया जा रहा है और अमुक भुगतान पर।  क्या हिंदी अकादमी की उपाध्यक्ष मैत्रेयी पुष्पा की इसमें कोई भूमिका थी या वो सिर्फ मूकदर्शक बनी रहीं थी । जौसा कि उपर बताया गया है कि दिल्ली की हिंदी अकादमी पूर्व में होली मिलन जैसे कार्यक्रम करती रही है लेकिन बिदेसिया नाटक आयोजित करने में भी दो लाख खर्च किया गया था और उस नाटक के मंचन को देखने के लिए उस वक्त बीस हजार की भीड़ जुटी थी । एक सांस्कृतिक विरासत से लोगों का परिचय भी हुआ था ।
दरअसल अगर हम आम आदमी पार्टी की सरकार के बाद दिल्ली की हिंदी अकादमी के क्रियाकलापों पर नजर डालें तो उसके संचालन समिति के गठन से देखना होगा । इसी स्तंभ में पहले भी इस बात की चर्चा की जा चुकी है कि हिंदी अकादमी के संचालन समिति के गठन में पार्टी से गहरे जुड़े एक कवि की चली थी । मैत्रेयी पुष्पा को जब उपाध्यक्ष बनाया गया था तब सदस्यों की एक सूचूी उनको थमाई गई कि इनके साथ ही आपको काम करना है ।  अरविंद केजरीवाल के साथ हुई सदस्यों की पहली बैठक में उस कवि की मौजूदगी पर उस वक्त भी सवाल खड़े हुए थे लेकिन तब किसी ने उसपर ध्यान नहीं दिया था । बाद में वो बात आगे बढ़ती रही जिसकी परिणिति होली मिलन समारोह के आयोजन आदि में आकर दिखी । इसके पहले  हिंदी अकादमी के सदस्यों का कार्यकाल एक साल का होता है और पहले साल में ऐसे लोगों की नियुक्तियां हुई थी जो वृहत्तर एनसीआर के रहनेवाले थे । स्पष्ट था किसकी रुचि का ध्यान रखा गया था । इस साल वृहत्तर एनसीआर से आनेवाले सदस्यों को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया और नए सदस्यों को शामिल किया गया । हिंदी अकादमी के सदस्यों का कार्यकाल भी एक साल से बढ़ाकर दो साल कर दिया गया । इस बार के चयन में उपाध्यक्ष मैत्रेयी पुष्पा की चली है, ऐसा प्रतीत होता है । लेकिन दो ऐसे चयन है जो सवालों के घेरे में हैं । अकादमी में दो ऐसे सदस्य मनोनीत किए गए हैं जिनके मनोनयन के कुछ ही दिन पहले हिंदी अकादमी ने लखटकिया पुरस्कार से पुरस्कृत किया था । खैर इन सवालों का थोड़ी देर के लिए दरकिनार किया भी जा सकता है क्योंकि हमारा मानना है कि टीम लीडर को उसकी टीम में कौन हो इसका अधिकार मिलना चाहिए । अगर मैत्रेयी पुष्पा ने उनका चयन किया है तो यह देखना होगा कि आगे आनेवाले दिनों में उनका क्या उपयोग करती हैं । संचालन समिति से ज्यादा अहम भूमिका कार्यकारिणी की होती है और इस बार की सूची में ये माना जा रहा है कि उपाध्यक्ष के समर्थकों का दबदबा है ।
रही बात मनोज तिवारी को आठ लाख रुपए के भुगतान की तो हिंदी अकादमी को यह साफ करना होगा कि किस प्रक्रिया के तहत मनोज को भुगतान किया गया । मनोज तिवारी एक बेहतरीन कलाकार हैं और वो इस बात को स्वीकार भी करते हैं कि वो अपने हुनर के प्रदर्शन के लिए पैसे लेते हैं । इस पूरे प्रकरण में मनोज पर सवाल खड़ा उचित नहीं होगा । सवालों के घेरे में हिंदी अकादमी और उसकी प्रक्रिया है । क्या हिंदी अकादमी की स्वायत्ता में भाषा और संस्कृति मंत्रालय का दखल होता है । क्या मंत्री के कहने पर इस तरह के आयोजनों में कलाकारों को भारी भरकम भुगतान किया जाता है या फिर एक निश्चित प्रक्रिया के तहत भुगतान हुआ है । अगर भुगतान में प्रक्रिया का पालन किया गया है तो अकादमी के उस वक्त के सदस्यों के विवेक पर सवाल खड़े होते हैं कि मनोज के कार्यक्रम से कैसे भाषा, साहित्य और संस्कृति का विकास होता है क्यों अकादमी का पैसा आम आदमी की गाढ़ी कमाई का पैसा है ।     

        

Wednesday, March 30, 2016

मोहल्ला पुस्तकालय से निकलेगा रास्ता

दिल्ली की अरविंद केजरीवाल सरकार गैर पारंपरिक राजनीति के लिए तो जानी ही जाती है वो अलग तरह की योजनाएं बनाकर चौंकाती भी रही है । हाल ही में जिस तरह से दिल्ली में मोहल्ला क्लीनिक शुरू होकर सफल हुआ उसकी देश विदेश में तारीफ हो रही है । मोहल्ला क्लीनिक की तर्ज पर अब दिल्ली सरकार मोहल्ला पुस्तकालय खोलने की योजना पर गंभीरता से विचार कर रही है । दिल्ली सरकार की हिंदी अकादमी ने तय किया है एक अप्रैल से शुरू होनेवाले वित्त वर्ष में वो दिल्ली की सत्तर विधानसभाओं में मोहल्ला पुतकालय खोलेगी । हिंदी अकादमी की उपाध्यक्ष और मशहूर कथाकार मैत्रेयी पुष्पा के मुताबिक पहले चरण में सत्तर विधानसभा में पुस्तकालय खोले जाएंगे । हिंदी अकादमी की इस पहल से देश में खत्म हो रही पुस्तक और पुस्तकालय संस्कृति को एक नया जीवन मिलने की शुरुआत हो सकती है । हिंदी अकादमी के ही दिल्ली में तेरह केंद्रों पर लाइब्रेरी चल रही है जो मरणासन्न है, उसको भी देखने की जरूरत है । इसके अलावा दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी और ऐतिहासिक लाला हरदयाल लाइब्रेरी है जहां मूलभूत सुविधाओं का आभाव है । धनाभाव के चलते किताबों के रखरखाव से लेकर उसके डिजीटाइजेशन का काम नहीं हो पा रहा है । लिहाजा ऐतिहासिक महत्व की किताबें नष्ट हो रही हैं या उनके नष्ट होने का खतरा उत्पन्न हो गया है । दिल्ली सरकार को मोहल्ला पुस्तकालयों के साथ साथ इस ओर भी ध्यान देना होगा । दूसरी चुनौती उन पुस्तकालयों में किताबों के चयन और खरीद में होनेवाले घपले से बचाने की होगी । ये घपले इतने प्रछन्न रूप से प्रकट होते हैं कि वो आम जन को दिखाई नहीं देते । सर्व शिक्षा अभियान से लेकर सभी सरकारी खरीद इसके गवाह हैं । ऑपरेशन ब्लैकबोर्ड के दौर में हुए तमाम कांड अभी तक अनसुलझे हैं ।
एक जमाना था जब हिंदी पट्टी में पुस्तकालय खासे लोकप्रिय हुआ करते थे । बदलते वक्त के साथ पुस्तकालयों के प्रति उदासीनता दिखाई देने लगी जिसकी वजह से वो बदहाल होते चले गए । बिहार के पहले मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह की किताबें मुंगेर में श्रीकृष्ण सेवासदन में रखी हैं लेकिन अब वहां लगभग सन्नाटा रहता है । मुंगेर के उस पुस्तकालय में हजारों किताबें है जिनमें से कई तो अब दुर्लभ हैं । पटना की लॉर्ड सिन्हा लाइब्रेरी भी अच्छी हालत में नहीं है और कई जगह के ब्रिटिश लाइब्रेरी भी अब नाम मात्र के ही रह गए हैं ।

पुस्तकालयों की बदहाली वजहें हमारे आसपास हवा में तैरती नजर आती है । कई विद्वानों का मानना है कि पुस्तकालयों की दुर्गति के लिए इंटरनेट जिम्मेदार है । अब लोगों की मुट्ठी में मौजूद इंटरनेट युक्त मोबाइल फोन और टैबलेट पर गूगल बाबा हर वक्त हर तरह की मदद को तैयार रहते हैं । आपने कुछ सोचा और पलक झपकते वो आपके सामने लाखों परिणाम के साथ हाजिर है लेकिन चुनौती सूचनाओं के इस जंगल में से सही का चुनाव । डार्विन ने कहा था कि जंगल का मतलब होता है जहां शक्ति का बोलबाला हो और नीति का कोई स्थान नहीं हो । अगर इंटरनेट पुस्तकालय का विकल्प हो सकता है तो ये शिक्षा का भी विकल्प हो सकता है । पुस्तकालयों के प्रति उपेक्षा बड़ी वजह हमारी शिक्षा पद्धति भी है । छात्रों की इस तरह से कंडीशनिंग हो रही है कि उनके लिए पाठ्य पुस्तकों के अलावा अन्य किसी पुस्तक का महत्व ही नहीं रह गया है । आज हालात यह है कि नई पीढ़ी के छात्र-छात्राओं को लाइब्रेरी कार्ड का तो पता है लेकिन उनको लाइब्रेरी का कैटलॉग देखना आता हो इसमें संदेह है । हमें अपने देश में पुस्तकालय या पढ़ने की संस्कृति का विकास करना है तो सर्वप्रथम हमारी शिक्षा प्रणाली की खामियों को दूर करना होगा । 1952-53 में स्थापित मुदालियार आयोग से लेकर कोठारी और राममूर्ति आयोग तक सभी ने पुस्तकालयों पर जोर दिया । चंद सालों पहले सांसदों के स्थानीय विकास निधि में से भी एक निश्चित राशि पुस्तकों की खरीद के लिए आपक्षित कर दिया गया था लेकिन पुस्तक और पुस्तकालयों को लेकर स्थिति उत्साहजनक नहीं दिखाई देती है । पाठ्य पुस्तकों के अलावा अन्य पुस्तकों के बारे में एक ऐसा मैकेन्जिम बनाना होगा कि नई पीढ़ी के छात्र उन्हें भी पढ़ें । इसके अलावा समाज में जागृति पैदा करने के लिए सरकारी और गैरसरकारी संगठनों को काम करना होगा ताकि मां-बाप अपने बच्चों को किताबों के करीब ले जाएं । 

Sunday, March 20, 2016

असगर वजाहत को श्लाका सम्मान

दिल्ली की हिंदी अकादमी में जब से मैत्रेयी पुष्पा ने उपाध्यक्ष का पद संभाला है तब से अकादमी की सक्रियता काफी बढ़ गई है । हर महीने ताबड़तोड़ आयोजन हो रहे हैं- कविता, कहानी, नाटक से लेकर पत्रकारिता तक के विषयों पर विमर्श आयोजित किए जा रहे हैं । अब हिंदी अकादमी ने पिछले दो साल से रुके पुरस्कारों को भी फिर से देना शुरू किया है । दरअसल दिल्ली में सरकारों के बनने बिगड़ने के खेल में पिछले दो साल से साहित्यक पुरस्कार नहीं दिए जा रहे थे । अब अकादमी ने पुरस्कार की राशि बढ़ाते हुए एक बार फिर से इन पुरस्कारों का एलान किया है । इस बार हिंदी अकादमी का सबसे बड़ा पांच लाख रुपए का श्लाका सम्मान हिंदी के वरिष्ठ लेखक असगर वजाहत को दिया गया है । इसके अलावा राजी सेठ को भी हिंदी अकादमी ने सम्मानित करने का एलान किया है । हिंदी अकादमी के पुरस्कृत लेखक-पत्रकारों की सूची लगभग अविवादित है । कहना न होगा कि मैत्रेयी पुष्पा की अगुवाई में बेहतर लेखकों का चयन हुआ है । पुरस्कार की चयन समिति में जो लोग थे उनमें से एक को छोड़कर दो से बहुत उम्मीद नहीं की जा सकती थी क्योंकि उनको हिंदी साहित्य से बहुत लेना देना है नहीं । जिन एक का लेना देना है वो बेहद सौम्य हैं । दरअसल मैत्रेयी पुष्पा का चयन समिति में इस तरह के लोगों को रखने का प्रयोग भी सही रहा और उनके चुनाव को चयन समिति ने सहूलियतें दी बाधा पैदा नहीं की होंगी । साहित्य से इतर जिन लोगों को पुरस्कार दिया गया वो आम आदमी पार्टी की नीतियों और नेताओं के प्रशंसक रहे हैं । सरकारी अकादमियों को ऐसे फैसले लेने होते हैं । संतोष कोली के नाम पर शुरू किया गया पुरस्कार छत्तीसगढ़ की सोनी सोरी को दिया गया है । सोनी सोरी के साथ क्या हुआ है ये ज्ञात है और उसको दोहराने का ये अवसर नहीं है।  
असगर वजाहत इस वक्त हिंदी के उन गिने चुने लेखकों मे जो विवादों से परे हैं । उनकी प्रतिबद्धता को लेकर कभी कभार कोने अंतरे से हल्की फुल्की आवाज उठती रहती है लेकिन कमोबेश वो पाठकों के प्यारे हैं । उनके उपन्यासों की पठनीयता और पाठकों से सीधे संवाद करने की उनकी कला उनकी रचानओं को अलग करती हैं । असगर वजाहत के उपन्यासों के अलावा उनका एक नाटक- जिस लाहौर नइ देख्या ओ जम्याइ नइ- बेहद लोकप्रिय रहा है और उसके हजारों मंचन हो चुके हैं । आज के करीब दस साल पहले हिंदी की एक समाचार पत्रिका के एक सर्वेक्षण में असगर वजाहत को हिंदी के दस श्रेष्ठ लेखकों में चुना गया था । उपन्यासों और नाटक के अलावा असगर वजाहत के यात्रा संस्मरण भी बेहतरीन माने जाते हैं । ईरान और आजरबाइजान की यात्रा को केंद्र में रखकर असगर वजाहत ने चलते तो अच्छा था के नाम से एक किताब लिखी जो इस विधा में अपना अलग मुकाम रखती है । असगर वजाहत की लेखन के अलावा चित्रकला में भी गहरी रुचि है । मुजे याद है कि आजमगढ़ के जोकहरा में रामानंद सरस्वती पुस्तकालय में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान असगर वजाहत ने बातों बातों में एक रेखाचित्र बनाया और मुझे भेंट कर दिया । लगभग बारह तेरह साल बाद भी मैंने उस खूबसूरत चित्र को संभाल कर रखा है । असगर वजाहत उन लेखकों में हैं जिनकीओर साहित्य अकादमी का ध्यान नहीं गया, ऐसे में हिंदी अकादमी का उनको श्लाका सम्मान से सम्नानित करना संतोष की बात है । वैसे तो साहित्य अकादमी का ध्यान अबतक किसी भी मुस्लिम लेखक की ओर नहीं गया जो हिंदी में लिखते हैं चाहे वो राही मासूम रजा हो, मंजूर एहतेशाम हो या फिर नासिरा शर्मा । यह साहित्य अकादमी की अपनी बौद्धिक सांप्रदायिकता है जो अब जाकर रेखांकित होनी शुरू हुई है ।   


Saturday, August 29, 2015

विवादों के बवंडर में ‘युवा’ लेखक

इन दिनों हिंदी साहित्य जगत में ‘युवा लेखन और लेखक‘ को लेकर घमासान मचा हुआ है । दरअसल पूरा प्रसंग ये है कि दिल्ली की हिंदी अकादमी ने युवा कहानी और युवा कविता पर दो दिनों का आयोजन किया । हिंदी की वरिष्ठ और चर्चित लेखिका मैत्रेयी पुष्पा के हिंदी अकादमी का उपाध्यक्ष बनने के बाद अकादमी का ये पहला बड़ा आयोजन था । कविता पर जो आयोजन हुआ था उसका नाम -कविता के नए रूपाकार, युवा कवियों के साथ एक शाम । कहानी पर हुए आयोजन को नाम दिया गया था – हमारे समय की हिंदी कहानियां, स्वरूप और संभावनाएं । सरकारी कार्यक्रम के लिहाज से देखें तो आयोजन बेहतर था । पूरे आयोजन पर मैत्रेयी पुष्पा की छाप दिख रही थी, उनकी पसंद और नापसंद दोनों की । कविता पर हुए आयोजन पर जिन कवियों को बुलाया गया था उसको लेकर सोशल मीडिया पर खूब हो हल्ला मचा । कवियों की उम्र को लेकर भी छींटाकशी की गई । विरोधस्वरूप दिल्ली के दर्जनभर से ज्यादा युवा कवियों ने एक अलग आयोजन किया और अपनी कविताएं पढ़ीं । यह सब तो साहित्य में हमेशा से चलता रहा है । सरकारी आयोजनों में जो उसके कर्ताधर्ता होते हैं उनकी ही चलती है लेकिन इस बार हिंदी अकादमी का चयन अपेक्षाकृत कम विवादित रहा । हिंदी अकादमी की उपाध्यक्ष मैत्रेयी पुष्पा ने सोशल मीडिया पर अपने अनेकानेक पोस्ट में इस बात को रखा कि अकादमी का यह पहला आयोजन है और उसको उसी कसौटी पर कसा जाना चाहिए । लेकिन युवा को लेकर सोशल मीडिया पर विरोध जारी रहा ।युवा शब्द पर हुए इस विवाद की भी वजह है जिसका जिक्र इस लेख में आगे आएगा । फेसबुक आदि पर मचे हो-हल्ला के बीच आयोजन के दौरान हिंदी अकादमी की उपाध्यक्ष मैत्रेयी पुष्पा ने मंच से एलान किया कि अगले आयोजन से युवा शब्द हटा दिया जाएगा । इसको हिंदी के युवा लेखक और कवि अपनी जीत के तौर पेश कर रहे हैं । उन युवा लेखकों को ये सोचना होगा कि साहित्य में जीत या हार नहीं होती है। बहुत दिनों बाद हिंदी अकादमी को एक सक्रिय उपाध्यक्ष मिला है । हमें उम्मीद करनी चाहिए कि वो वस्तुनिष्ठ होकर साहित्य के लिए काम करेंगी । उनको थोड़ा मौका भी दिया जाना चाहिए । हलांकि उनको जो टीम मिली है उससे बहुत ज्यादा उम्मीद बेमानी है, चंद लोगों को छोड़कर उनमें से ज्यादातर के साहित्यक अवदान को हिंदी साहित्य के सामने आना शेष है । हैरानी की बात है कि कहानी पर हुए आयोजन की अध्यक्षता वरिष्ठ आलोचक मैनेजर पांडे को सौंपने को लेकर हुई । कहानी पर हुए आयोजन का अध्यक्ष पांडे जी को किस आधार पर बनाया गया । कम से कम मेरे जैसा पाठक अब तक मैनेजर पांडे के कहानी पर किए गए काम से अनभिज्ञ है । कार्यक्रम में मैनेजर पांडेय ने मेकी आशंका को सही साबित किया । उन्होंने इस आयोजन में ना तो कहानी के स्वरूप और ना ही संभावना पर गंभीरता से कोई अवधारणा प्रस्तुत की । एक अनाम सी पक्षिका के विशेषांक लेकर पहुंचे और उसके ही आधार पर कहानी के वर्तमान पर भाषण दे दिया । मैनेजर पांडे को बुलाने की वजह समझ से परे है । मैत्रेयी पुष्पा को मैं करीब डेढ़ दशक से ज्यादा वक्त से जानता हूं, वो जो ठान लेती हैं उसपर चलती हैं । तमाम विरोध और झंझावातों के बावजूद । इस वजह से ही शायद उन्होंने मैनेजर पांडे को नहीं बदला होगा । अगर चयन में थोड़ी बहुत खामी रह जाए या फिर अपने अपने लोगों को बुलाया जाए तो किसी नतीजे पर पहुंचने के पहले सोशल मीडिया पर सक्रिय लेखकों को धैर्य रखना चाहिए । सावधान तो उपाध्यक्ष को भी रहना चाहिए, उन्हें अब काफी लोग तारीफ करनेवाले मिलेंगे । आनेवाले दिनों में उनपर संचयन, पत्रिकाओं के विशेषांक आदि भी निकलेगे । अगर इस तरह के लोगों को बढ़ावा मिलता है तो जाहिर तौर पर वो घिरेंगी लेकिन हमें ये मानकर नहीं चलना चाहिए कि ऐसा ही होगा । खैर ये एक अवांतर प्रंसग है, जिसपर भविष्य में चर्चा होगी ।
बात हो रही थी हिंदी में युवा लेखकों पर । साहित्य में युवा कहने की कोई सीमा नहीं है । पचास पार या पचास को छूते लेखक को हिंदी साहित्य समाज में युवा माना जाता है । साहित्य अकादमी जो युवा सम्मान देती है उसके मुताबिक लेखक की उम्र पैंतीस साल से अधिक नहीं होनी चाहिए । लेकिन इस वक्त हिंदी में एक साथ इतनी पीढ़ी सक्रिय है कि सब गड्डमड् हो गया है । जिसके जो मन हो रहा है वो लिख रहा है । इस तरह के अराजक माहौल में चालीस पचास साल पार के लेखक लेखिका भी युवा हुए जा रहे हैं । इस संदर्भ में एक बेहद दिलचस्प प्रसंग याद आता है । सन दो हजार की बात होगी । हंस पत्रिका के दफ्तर में उसके संपादक राजेन्द्र यादव से मिलने गया था । हंस का ताजा अंक आया था जो यादव जी ने मेरी तरफ बढ़ाया । मैंने पन्ने पलटने के बाद उनसे पूछा कि बुढा़ती लेखिकाओं की आप जवानी के दिनों की तस्वीर क्यों छापते हैं । उन्होंने हल्के फुल्के अंदाज में गंभीर बात कह दी । उन्होंने कहा कि हिंदी के कई पाठक लेखिकाओं की तस्वीर देखकर हंस खरीद लेते हैं । अब जब युवा लेखक की उम्र को लेकर जब एक बार फिर से विवाद हो रहा है तो राजेन्द्र यादव की बात जेहन में कौंधी । कहीं ऐसा तो नहीं कि युवा कहकर युवाओं से जुड़ने की जुगत में उदारता के साथ लेखक खुद को या आयोजक लेखक को या आलोचक लेखक को युवा घोषित कर देता है । हलांकि यह बहुत दूर की कौड़ी है लेकिन कौड़ी है अच्छी ।
कुछ दिनों पहले मैत्रेयी पुष्पा जी ने भी स्त्री विमर्श को लेकर एक लंबा लेख लिखा था । उस लेख में मैत्रेयी जी ने लिखा था – ‘इक्कीसवीं सदी में जबसे ‘युवा लेखन’ का फतवा चला है, लेखन की दुनिया में खासी तेजी आई है। लेखिकाओं की भरी-पूरी जमात हमें आश्वस्त करती है। किताबें और किताबें। लोकार्पण और लोकार्पण। इनाम, खिताब, पुरस्कार जैसा बहुत कुछ। प्रकाशक, संपादक भी अपने-अपने स्टाल लेकर हाजिर। अपने-अपने जलसों की आवृत्तियां। कैसा उत्सवमय समां है। कौन कहता है कि यह दरिंदगी और दहशत भरा समय और समाज है? साहित्य जगत तो यहां आनंदलोक के साथ है। नाच-गाने और डीजे। शानदार पार्टियां और आपसी रिश्तों के जश्न। ऐसा लगता है जैसे कितनी ही कालजयी रचनाएं आई हैं। मगर इस समय की कलमकार के अपने रूप क्या हैं? युवा के सिवा कुछ भी नहीं, यह युवा लेखिका का फतवा किस दोस्त या दुश्मन ने चलाया कि इस समय की रचनाकार अपनी उम्र का असली सन तक अपने बायोडाटा में दर्ज नहीं करतीं, क्योंकि उम्र जगजाहिर करना युवा लेखन के दायरे से खारिज होना है। वे लेखन के हल्केपन की परवाह नहीं करतीं, जवानी को संजोए रखने की चिंता में हैं। इसी तर्ज पर कि रचना में कमी-बेसी से डर नहीं लगता साब, वयस्क कहे जाने से डर लगता है। परवाह नहीं उम्र पैंतालीस से पचास पर पहुंच जाए, युवा कहलाने का अनिर्वचनीय सुख मिलता रहे । लगता है मैत्रेयी जी जब हिंदी अकादमी के आयोजनों के लिए लेखकों का चयन कर रही थीं तो उन्होंने अपनी ही कही इस बात को भुला दिया । युवा के नाम पर चालीस पार की लेखिकाओं और लेखकों को युवा घोषित करते हुए कार्यक्रम में जगह दे दी । क्या वो अपना कहा ही भूल गईं कि जो लेखिका अपने बायोडाटा में अपनी उम्र दर्ज नहीं करती क्योंकि उम्र जाहिर करना युवा लेखन के दायरे से खारिज होना है । क्या वो भी आमंत्रित लेखक लेखिकाओं को वयस्क कहने से डर गईं । दरअसल सरकारी आयोजनों में एक कमेटी प्रतिभागियों का चुनाव करती हैं । संभव है उपाध्यक्ष ने चुनाव करते समय कमेटी के सदस्यों को छूट दी होगी । उस छूट का ही नतीजा है कि कुछ ऐसे लेखकों का चयन हो गया जिनपर और जिनके लेखन पर विवाद उठ खड़ा हो गया । यह भी संभव है कि युवाओं को जोड़ने का अनिर्वचनीय सुख हिंदी अकादमी भी लेना चाहती हो । हिंदी में युवा कहलाने का जो फैशन है उसपर गाहे बगाहे विवाद होता रहा है । मेरा मानना है कि साहित्यक विवाद होने चाहिए । इससे साहित्य की सेहत अच्छी बनी रहती है लेकिन जब विवाद के बीच व्यक्तिगत हमले होने लगते हैं, किसी के चरित्र से लेकर व्यक्तित्व पर सवाल खड़े होने लगते हैं तब साहित्य बीमार पड़ने लगता है । साहित्य में विवादों की एक लंबी परंपरा रही है लेकिन जिस तरह से उसको सोशल मीडिया ने मंच और हवा दोनों दी वो चिंता की बात है । लेखन पर सवाल खड़े होने चाहिए तर्कों और तथ्यों के साथ, फिर चाहे वो कितना भी बड़ा लेखक क्यों ना हो । युवाओं के लेखन को खास तौर पर कसौटी पर कसना चाहिए । 


 

Sunday, June 7, 2015

सियासत के चक्रव्यूह में हिंदी अकादमी

दिल्ली में अरविंद केजरीवाल की सरकार हर दिन नए नए विवाद में फंसती नजर आती है । उपराज्यपाल के साथ अफसरों की तैनाती को लेकर विवाद चल ही रहा है । इस विवाद के शोरगुल में दिल्ली की भाषाई अकादमियों में हुई नियुक्तियों का मामला कहीं खो सा गया है । हाल ही में केजरीवाल सरकार ने दिल्ली की हिंदी अकादमी, संस्कृत अकादमी और मैथिली भोजपुरी अकादमी के उपाध्यक्षों की नियुक्ति की। इन नियुक्तियों पर कोई सवाल खड़े नहीं हुए । हिंदी अकादमी में वरिष्ठ लेखिका मैत्रेयी पुष्पा को उपाध्यक्ष के तौर पर नियुक्ति का स्वागत ही हुआ । लेकिन साहित्यक हलके में यह चर्चा तेज है कि मैत्रेयी के स्वागत में जो एक बात दब कर रह गई । चर्चा ये है कि मैत्रेयी पुष्पा जी की नियुक्ति के साथ साथ हिंदी अकादमी के संचालन समिति के पच्चीस में से इक्कीस सदस्यों का मनोनयन भी कर दिया गया । ऐसा करने के पीछे सरकार की मंशा क्या रही है यह बात साफ होनी चाहिए । साहित्य से जुड़े कुछ लोगों का दावा है कि अबतक की परंपरा के मुताबिक उपाध्यक्ष की नियुक्ति के बाद वो सचिव के साथ मिलकर संचालन समिति के लिए मनोनीत किए जानेवाले सदस्यों का नाम अकादमी के पदने अध्यक्ष मुख्यमंत्री के पास भेजते रहे हैं । उन नामों में से दिल्ली का मुख्यमंत्री संचालन समिति के सदस्यों का चुनाव करते हैं । इन आरोपों के मुताबिक आम आदमी पार्टी ने हिंदी अकादमी के गठन के वक्त से चली आ रही परंपरा को तोड़ा। अब उपाध्यक्ष के जिम्मे संचालन समिति के सिर्फ चार सदस्यों के मनोनयन का अधिकार है जो किया जा रहा है । इस परंपरा के समर्थन के पीछे की दलील यह रही है कि उपाध्यक्ष और सचिव अपनी मर्जी की टीम का गठन करते हैं । लेकिन तथ्य यह भी है कि इस बारे में कोई लिखित नियम नहीं है । कई बार सरकार की तरफ से नाम आते हैं और कई बार अकादमी अपना नाम भेजती है । लेकिन संचालन समिति के सदस्यों में एक बात का ध्यान रखा जाता रहा है कि जो भी सदस्य हो उसका दिल्ली से सरोकार हो । कहने का मतलब यह है कि या तो मनोनीत सदस्य दिल्ली का रहने वाला हो या फिर रोजगार के लिए दिल्ली आता हो । बाद में एनसीआर को भी इसमें शामिल कर लिया गया । इस बार संचालन समिति में ऐसे लोग भी रखे गए हैं जिनका दिल्ली से कोई संबंध नहीं है ।  
दरअसल आम आदमी पार्टी की सरकार बनने के बाद साहित्य संस्कृति का जिम्मा उस पार्टी से जुड़े एक कवि के जिम्मे है । दिल्ली के साहित्यक गलियारों में इस बात की चर्चा भी है कि संचालन समिति में सदस्यों के मनोनयन में उन्हीं की चली है । सदस्यों के नाम तो देखकर प्रतीत भी ऐसा ही होता है । कई सदस्यों की उनसे करीबी सार्वजनिक मंचों पर भी देखी गई है । इस चर्चा की पुष्टि इस बात से भी होती है कि अभी हाल ही में अकादमियों के नवनियुक्त उपाध्यक्षों और संचालन समिति के सदस्यों की मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और मंत्री जितेन्द्र तोमर के साथ एक बैठक हुई । उक्त बैठक में कवि जी भी मौजूद थे । सवाल यह उठता है कि बगैर किसी अकादमी के संचालन समिति के सदस्य होने के, बगैर सरकार में किसी पद पर होने के कवि महोदय उस सरकारी बैठक में किस हैसियत से उपस्थित थे । क्या कोई भी व्यक्ति अगर सत्ताधारी दल का सदस्य है तो वो सरकारी बैठकों में भाग लेने के लिए योग्य हो जाता है । हैरत की बात यह है कि कवि महोदय की इस सरकारी बैठक में मौजूदगी पर किसी ने सवाल नहीं उठाए, ना तो किसी उपाध्यक्ष ने और ना ही किसी संचालन समिति के सदस्य ने । ये तो भला हो सोशल मीडिया का उस बैठक के बारे में और उसकी तस्वीरें सार्वजनिक हो गई । सरकारी बैठक में गैर सरकारी बैठक की उपस्थिति से क्या संदेश निकलता है । क्या यह मान लिया जाए कि आम आदमी पार्टी की दिल्ली सरकार ने साहित्य और संस्कृति ये महकमा बगैर कोई पद दिए उनके हवाले कर दिया है । अब तक के संकेत को यही मानने को कह रहे हैं । दरअसल सरकारी भाषाई अकादमियों का हर जगह बुरा हाल है । साहित्य और संस्कृति किसी भी सरकार की प्राथमिकताओं में रही नहीं है । दिल्ली सरकार ने जब मैत्रेयी पुष्पा को हिंदी अकादमी के उपाध्यक्ष पद पर नियुक्त किया तो साहित्य जगत में एक उम्मीद जगी थी लेकिन जब संचालन समिति की बात सामने आई तो उस उम्मीद पर आशंका के काले बादल मंडराते नजर आ रहे हैं । अब मैत्रेयी पुष्पा के सामने सबसे बड़ी चुनौती किसी और की बनाई टीम के साथ काम करना है ।

दिल्ली की हिंदी अकादमी का एक और दुर्भाग्य है कि 2009 से वहां कोई नियमित सचिव नहीं है । ज्योतिष जोशी के हिंदी अकादमी के सचिव का पद छोड़ने के बाद से नियमित सचिव की नियुक्ति नहीं हो पाई है । एक बार जब अशोक चक्रधर हिंदी अकादमी के उपाध्यक्ष थे उस वक्त सचिव के पद के लिए आवेदन मंगाए गए थे लेकिन नियुक्ति नहीं हो पाई । उसके बाद भी दिल्ली सरकार ने इस पद को विज्ञापित किया और लोगों को साक्षात्कार के लिए बुलाया । इस विज्ञापन के आधार पर लोगों को दो बार इंटरव्यू के लिए बुलाया गया और आखिरी इंटरव्यू 14 अक्तूबर दो हजार चौदह को हुआ । उसके बाद विशेषज्ञों के पैनल ने तीन नामों की सूची तैयार कर संबंधित विभाग को भेज दी । उस वक्त दिल्ली में चुनी हुई सरकार नहीं थी और प्रशासन उपराज्यपाल के हाथ में था लेकिन तब भी किसी ने विशेषज्ञों की बनाई हुई सूची को राज्यपाल की मंजूरी के लिए नहीं भेजी या अगर भेजी गई तो उपराज्यपाल सचिवालय से उसको मंजूर कर नोटिफाई नहीं किया गया । अब खबर आ रही है कि विशेषज्ञों द्वारा तैयार की गई सूची को केजरीवाल सरकार ने रद्द कर दिया है और फिर नए सिरे से सचिव की नियुक्ति की पूरी प्रक्रिया चलेगी । यहां यह जानना दिलचस्प होगा कि सचिव के पैनल को रद्द करने का आधार क्या रहा है । क्या केजरीवाल सरकार सचिव पद पर भी अपने किसी मनचाहे अफसर को बैठाना चाहती है ।   दरअसल हिंदी अकादमी के सचिव का पद प्रतिनुयुक्ति का पद है और इस पर खास योग्यता वाले की ही नियुक्ति हो सकती है । जिलस पैनल को सरकार ने रद्द किया उसमें हिंदी के एक दलित लेखक का भी नाम था । इस पैनल को रद्द करने के बाद केजरीवाल सरकार ने एक दलित को हिंदी अकादमी का सचिव बनाने के अवसर को भी गंवा दिया । हिंदी अकादमी के गठन के बाद से अबतक इसके सचिव पद  पर किसी दलित की नियुक्ति नहीं हुई है । रही बात उपाध्यक्ष की तो जनार्दन द्विवेदी के बाद के दिल्ली हिंदी अकादमी के उपाध्यक्ष बस शोभा के तौर पर काम करते रहे हैं । हिंदी अकादमी में उनके बैठने के लिए एक कमरा जरूर है लेकिन उनके लिए और कोई सुख सुविधा नहीं है । हर महीने पांच हजार रुपए के मानदेय का प्रावधान है । इन को देखते हुए हिंदी के वरिष्ठ लेखक उपेन्द्र नाथ अश्क से जुड़ा एक वाकया याद आ रहा है । अश्क जी को एक पत्रिका से समीक्षा के लिए कुछ पुस्तकें प्राप्त हुई । अश्क जी ने संपादक को लिखा कि समीक्षा के लिए पुस्तकें प्राप्त हो गई हैं और वो यथासमय उसकी समीक्षा लिखकर भेज देंगे । इसके साथ ही अश्क जी ने यह भी लिखा कि अगर समीक्षा लिखने का मानदेय़ अग्रिम मिल जाता तो समीक्षा हुलसकर लिखता । तो अगर दिल्ली सरकार सचमुच भाषाई अकादमियों को लेकर गंभीर है तो उसको अपने उपाध्यक्ष के लिए बेहतर सुविधाओं का इंतजाम करना होगा ताकि वो हुलसकर काम कर सकें । दूसरे दिल्ली सरकार को इन भाषाई अकादमियों को एक छत के नीचे लाना चाहिए । इस वक्त हिंदी अकादमी दिल्ली के किशनगंज इलाके के एक सामुदायिक केंद्र से चल रहा है जहां कि आधारभूत सुविधाएं भी नहीं हैं । हिंदी से जुड़े लोगों का वहां तक पहुंचना ही मुश्किल है । दिल्ली सरकार को चाहिए कि वो इन अकादमियों को ऐसी जगह पर लेकर जाएं जहां वो आम आदमी की पहुंच में हो । एक ऐसे परिसर का निर्माण हो जहां कि भाषा, संस्कृति, कला पर बात हो सके, किताबों पर चर्चा हो सके । दिल्ली की जनता को आम आदमी पार्टी की सरकार से बहुत उम्मीदें हैं, ऐसी ही उम्मीद साहित्य, संस्कृति और कला जगत के लोगों को भी है । दिल्ली की हालत तो यह है कि यहां किसी भी एक किताब या पत्रिका को खरीदने के लिए आपको कई किलोमीटर के चक्कर लगाने पड़ सकते हैं । वर्ल्ड सिटी का सपना देख रहे दिल्ली वासियों के लिए यह भी आवश्यक है ।   

Saturday, October 2, 2010

पुरस्कारों का ‘खेल’

अभी कुछ अरसा पहले डाक से एक बेहद दिलचस्प पत्र प्राप्त हुआ । मध्य प्रदेश से लिखा गया यह खत एक परिपत्र की शक्ल में था, जो एक साथ तकरीबन कई लेखकों-पत्रकारों को भेजा गया प्रतीत होता है । दिलचस्प इसलिए था कि उसमें इस बात का प्रस्ताव दिया गया था कि अगर आप अमुक पुरस्कार पाना चाहते हैं तो सौ रुपये के डिमांड ड्राफ्ट और अपनी किताब की दो प्रतियों के साथ प्रविष्टि भेजें । इस मनोरंजक पत्र को पढ़ने के बाद मुझे लगा कि किसी ने मजाक किया है लेकिन चंद दिनों पहले जब मैंने अमुक पुरस्कार के ऐलान की खबर की पढ़ी तो मुझे लगा कि वह खत तो गंभीरता पूर्वक लिखा गया था । जिन लेखक महोदय को उक्त पुरस्कार देने का ऐलान किया गया है उन्होंने अवश्य ही सौ रुपये के डिमांड ड्राफ्ट के साथ पुरस्कार के लिए आवेदन किया होगा । तो हिंदी के लेखकों में पुरस्कार लोलुपता इतनी बढ़ गई है कि वो पुरस्कार पाने के लिए आवेदन करने लगे हैं । अब तक तो पुरस्कार के लिए घेरेबंदी की खबरें ही सामने आती रही थी लेकिन आवेदन कर पुरस्कार मेरे लिए चैंकानेवाली खबर थी ।
दरअसल हाल के दिनों में हिंदी में दिए जाने वाले पुरस्कारों की विश्वसनीयता और साख बेहद कम हुई है । कुछ अरसा पहले साहित्य अकादमी और ज्ञानपीठ पुरस्कार हिंदी में सबसे ज्यादा प्रतिष्ठित पुरस्कार थे । ज्ञानपीठ की प्रतिष्ठा और साख तो अब भी कायम है लेकिन साहित्य अकादमी पुरस्कारों की साख पर पिछले कई वर्षों में अनेकों बार बट्टा लगा है । इसके लिए हिंदी के वो प्रगतिशील शिखर लेखक-आलोचक कम जिम्मेदार नहीं हैं जो कई वर्षों तक साहित्य अकादमी के कर्ता-धर्ता रहे । बाद में जब साहित्य अकादमी में सत्ता परिवर्तन हुआ तो हिंदी के संयोजक ने समर्थन देने के एवज में सौदेबाजी कर अपने चहेते लेखक को पुरस्कार दिलवाया । उनके बाद जो आलोचक महोदय हिंदी के संयोजक बने उन्होंने भी उस परंपरा को कायम रखा । साहित्य अकादमी के इस सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार का खेल उसके ऐलान होने के काफी पहले ही शुरु हो जाता है । प्रक्रिया के मुताबिक अकादमी, जिस वर्ष पुरस्कार दिए जाने हैं उसके पहले के एक वर्ष को छोड़कर, तीन वर्षों की अवधि में प्रकाशित कृतियों की एक आधार सूची बनाती है । यानि इस वर्ष दिए जानेवाले पुरस्कार के लिए दो हजार नौ से दो हजार सात के बीच प्रकाशित कृतियों पर विचार किया जाएगा । इस अवधि में प्रकाशित कृतियों की एक आधार सूची को हिंदी के एडवायजरी बोर्ड के सदस्यों को भेजी जाती है और उनसे सूची में से तीन किताबों का चयन कर सुझाव देने का अनुरोध किया जाता है । लेकिन यहां सिर्फ तीन कृतियों की सिफारिश की कोई पाबंदी नहीं है, बोर्ड सदस्य अगर चाहें तो तीन से ज्यादा कृतियों की भी सिफारिश कर सकते हैं । जब सदस्यों की सिफारिश अकादमी को प्राप्त हो जाती है तो उसके बाद हर विधा के लिए अलग अलग सूची बनाई जाती है । मोटे तौर पर एडवायजरी बोर्ड के सदस्यों की राय के आधार पर हर विधा की तीन तीन किताबों का चयन किया जाता है । इन्हीं तीन किताबों में से जूरी एक कृति को चुनती है जिसको पुरस्कृत किया जाता है ।
लेकिन यह प्रक्रिया उपर से देखने में जितनी दोष-रहित लगती है व्यवहार में उतनी ही दोषपूर्ण है । किताबों की आधार सूची से लेकर जूरी के चयन तक में तिकड़मों का बड़ा खेल खेला जाता है ।अपनी किताब को आधार सूची में डलवाने से लेकर ही यह खेल शुरु हो जाता है जिसके लिए तमाम तरह के दंद-फंद किए जाते हैं । जब एक बार आधार सूची में नाम आ जाता है तो उसके बाद अपनी लेखनी से क्रांति का दावा करनेवाले ये तथाकथित प्रतिशील लेखक एडवायजरी बोर्ड के सदस्यों के पास से अपना नाम भिजवाने की जुगत में लग जाते हैं । येन केन प्रकारेण बोर्ड के सदस्य से अपना नाम प्रस्तावित करवाने के लिए सम्मानित लेककगण एड़ी चोटी का जोड़ लगा देते हैं । फिर घेरेबंदी शुरु होती है जूरी के सदस्यों के चयन की । जूरी में तीन सदस्य होते हैं जिनका चुनाव साहित्य अकादमी का अध्यक्ष करता है । इसलिए पुरस्कार के लिए लालायित तमाम तिकड़मी लेखक अध्यक्ष के पास अपनी गोटी फिट करने में लग जाते हैं, उनकी गणेय़ परिक्रमा शुरू हो जाती है । पुरस्कार के लिए किताबों के अंतिम चयन के लिए जूरी की जो बैठक होती है उसमें भाषा के संयोजक की कोई भूमिका नहीं होती वो सिर्फ बैठक का संयोजन और शुरुआत भर करते हैं । हलांकि उर्दू के एक आलोचक के अकादमी अध्यक्ष बनने के पहले जब हिंदी आलोचना के शिखर पुरुष हिंदी के संयोजक हुआ करते थे तब ये स्थिति नहीं थी । तब उनकी मर्जी चला करती थी । नियमों को दरकिनार करते हुए वो जिसे चाहते उसे पुरस्कार दिला देते थे । लेकिन अकादमी के चुनाव में जब उस गुट का सफाया हो गया उसके बाद से स्थिति पूरी तरह बदल गई । पहले भाषा के संयोजक की मर्जी चला करती थी अब अध्यक्ष की चलने लगी । भाषा संयोजक अकादमी के संविधान के तहत बैठक की सिर्फ प्रोसिंडिंग शुरु करते हैं । लेकिन एक बार फिर से अध्यक्ष बदले तो स्थितियां बदल गई । अब हिंदी के लिए पूर्व अध्यक्ष और भाषा संयोजक की राय हावी होने लगी ।
पुरस्कार के निर्णय के लिए जब अंतिम बैठक होती है तो जूरी के सदस्य अलग अलग कृतियों पर विचार करते हैं और फिर या तो सर्वसम्मति से या बहुमत के आधार पर फैसला लेते हैं । ऐसा कम ही देखने में आया है कि सर्वसम्मति से किसी कृति को पुरस्कृत किया गया हो । ज्यादातर फैसले बहुमत यानि दो –एक से होते है । इससे एक तो ये लगता है कि जूरी में कृति की गुणवत्ता को लेकर जोरदार बहस हुई और लोकतांत्रिक तरीके से फैसला हुआ । लेकिन होता ये सिर्फ दिखावा है । जब जूरी के तीन सदस्यों का चुनाव किया जाता है तभी ये तय कर लिया जाता है कि दो सदस्य अध्यक्ष की मनमाफिक काम करनेवाले हों और तीसरा घोर विरोधी । इससे होता ये है कि कमिटी के गठन पर कोई विवाद नहीं हो पाता है और सारा काम पूर्व निर्धारित रणनीति के हिसाब से हो जाता है । जूरी के फैसले के बाद उसे एक्जीक्यूटिव कमिटी की स्वीकृति के लिए भेजा जाता है और वहां से स्वीकृति मिलने के बाद अंतिम मुहर अध्यक्ष लगाते हैं ।
राज्यों की हिंदी अकादमियों में तो पुरस्कारों की स्थिति और भी खराब है। सारा कुछ सेटिंग-गेटिंग के सिद्धांत पर चलता है । अभी कुछ दिनों पहले दिल्ली की हिंदी अकादमी के पुरस्कारों को लेकर अच्छा खासा विवाद भी हुआ था । दिल्ली की हिंदी अकादमी हिंदी के लेखकों को हर साल पुरस्कृत करती है । इसके लिए वो अखबारों में विज्ञापन देकर शहर के नामचीन लोगों और लेखकों की राय आमंत्रित करती है । उसके बाद कार्यकारिणी की बैठक में पुरस्कार का फैसला होता है । इन पुरस्कारों में कार्यकारिणी के सदस्य जिसे चाहते हैं उसको पुरस्कृत कर देते हैं । कई बार तो कार्यकारिणी के सदस्यों ने खुद को पुरस्कृत कर लिया, भले ही उसके पहले उनको कार्यकारिणी से इस्तीफा देना पड़ा । हलांकि अकादमी के सबसे बड़े पुरस्कार श्लाका सम्मान को लेकर बड़ा विवाद कभी नहीं हुआ लेकिन साहित्यकार सम्मान और अन्य पुरस्कारों के चयन पर कई बार उंगलियां उठी । दिल्ली की हिंदी अकादमी के अलावा बिहार राष्ट्रभाषा परिषद और बिहार का राजभाषा विभाग भी थोक में हिंदी के लेखकों को पुरस्कृत करती है । बिहार सरकार के राजभाषा विभाग के पुरस्कारों को नियमविरुद्ध प्रसातावित करने के लिए पिछले वर्ष रद्द करना पड़ा । चयन समिति के सदस्य हिंदी के वरिष्ठ आलोचक ने अपने कहानीकार अनुज का नाम प्रस्तावित कर दिया लेकिन वहां नियम है कि चयनकर्ता को यह लिखकर देना होता है कि पुरस्कृत लेखकों में कोई उनका संबंधी नहीं है । इसी नियम ने भाइयों का खेल बिगाड़ दिया और छोटे भाई पुरस्कार से वंचित रह गए ।
ये चंद उदाहरण हैं हिंदी साहित्य के, जो ये दर्शाते हैं कि हिंदी में पुरस्कारों के लेकर लेखक कितने बेचैन हैं और उन्हें हथियाने के लिए तमाम तरह के हथकंडों का इस्तेमाल करने से भी उन्हें गुरेज नहीं । पहले मीडिया का इतना फैलाव नहीं था और उस तरह के षडयंत्र सामने नहीं आ पाते थे लेकिन मीडिया के विस्तार के बाद इस तरह की तमाम खबरें सामने आने लगी । इन खबरों के प्रकाशन के बाद हिंदी के पाठकों के मन में अपने आदर्शवादी लेखकों को लेकर एक खास तरह की दुविधा पैदा होने लगी । लिखते कुछ और आचरण कुछ की दुविधा ने पाठकों के मानस पर हिंदी लेखकों की छवि पर प्रहार कर उसे खंडित किया । जब साख पर बट्टा लगता है और विश्वसनीयता संदिग्ध होती है तो स्थिति बेहद चिंतनीय हो जाती है । हिंदी के वरिष्ठ लेखकों को यह समझना होगा कि कुछ लेखकों की वजह से हिंदी लेखक समाज की साख पर बट्टा लग रहा है । अगर इसे समय रहते ठीक नहीं किया गया तो एक समय ऐसा भी आ सकता है जब हिंदी के पाठक अपने ही लेखकों को रिजेक्ट करना शुरू कर दें । वह स्थिति पूरे हिंदी लेखक समाज के लिए बेहद खराब होगी । पुरस्कारों के पीछे भागने की लेखकों की जो ललक है वो सिर्फ इस वजह से है कि उन्हें जल्दी प्रसिद्धि मिले और वो मशहूर हो जाएं वो यह भूल जाते हैं कि यह प्रसिद्धि तात्कालिक होती है । तभी तो अज्ञेय जी ने कहा था कि अगर किसी लेखक को माराना हो तो उसे पुरस्कृत कर दो । अज्ञेय जी की यह बात बाद में साबित भी हुई ।
----------