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Thursday, July 10, 2025

व्याकुल मन और संवेदना की धुन


किसे पता था कि अपराध कथाओं पर सफल फिल्म बनाने वाला एक निर्देशक दर्द और संवेदना के तार को ऐसे छुएगा कि उसकी फिल्में क्लासिक और कल्ट फिल्म बन जाएंगी। मात्र 39 वर्ष की आयु मिली लेकिन उस लघु अवधि में हिंदी सिनेमा को अपनी कला कौशल से झंकृत कर देने वाले कलाकार का नाम है गुरुदत्त। गुरुदत्त की अपराध कथाओं पर आधारित सफल फिल्मों, बाजी, जाल, बाज और सैलाब, की चर्चा कम होती है। गुरुदत्त को हिंदी सिनेमा में इन्हीं फिल्मों से पहचान मिली थी। गुरुदत्त ने ज्ञान मुखर्जी के सहायक के तौर पर कार्य करना आरंभ किया था। माना जाता है कि हिंदी फिल्मों में ज्ञान मुखर्जी अपराध कथाओं पर आधारित फिल्मों के पहले कुछ निर्देशकों में से एक थे। अब उन कारणों की चर्चा करना आवश्यक प्रतीत होता है कि एक अपराध कथाओं पर फिल्म निर्देशित करनेवाला सिद्धहस्त निर्देशक कैसे इतनी संवेदनशील फिल्मों को कैसे साध सके। गुरुदत्त के शताब्दी वर्ष में जब हम उनकी कलात्मकता पर बात करते हैं तो उनके साथ के लोगों की बात करनी चाहिए जिनके साथ ने गुरुदत्त को महान बनाया। कलाकार गुरुदत्त की शख्सियत तीन व्यक्तियों के बिना पूरी नहीं होती है। यै हैं गीता दत्त, वहीदा रहमान और अबरार अल्वी। जब गुरुदत्त अपनी पहली फिल्म बाजी निर्देशित कर रहे थे तो वो गीता राय को दिल दे बैठे। गुरुदत्त शादी के लिए जल्दी कर रहे थे। दोनों में महीनों तक रोमांस चला और शादी हुई। गीता दत्त के बाद उनकी जिंदगी में वहीदा रहमान का प्रवेश होता है । यहीं से आरंभ होता है प्यार से असफल होकर स्वयं से दूर भागने की उनकी प्रवृत्ति। 

जब प्यासा फिल्म बन रही थी तो इस बात की चर्चा थी कि इसकी कहानी गुरुदत्त की निजी जिंदगी पर आधारित है। पर ये कहानी सिर्फ गुरुदत्त की कहानी नहीं है। इसमें लेखक अबरार अल्वी की जिंदगी की घटनाएं भी शामिल हैं। ये भी कहा जाता है कि इस फिल्म की कहानी गुरुदत्त ने लिखी थी। पर अबरार अल्वी ने बताया था कि गुरुदत्त ने सिर्फ छह पन्ने की कहानी लिखी थी और उसमें नायिका सिर्फ मीना थी। गुलाबो का चरित्र तो अबरार अल्वी ने जोड़ा। दरअसल जब अबरार मुंबई आए थे तो वो एक वेश्या के पास जाते थे। उस वेश्या के साथ के उनके अनुभव और गुरुदत्त की प्रेमिका रही मीना के किस्से को जोड़कर प्यासा की कहानी बुनी गई थी। गुरुदत्त की एक और अदा थी कि वो किसी चीज से बहुत जल्दी संतुष्ट नहीं होते थे। कई बार तो उन्होंने कई रील शूट होने के बाद फिल्म को रद करके नए सिरे से शूट किया। प्यासा फिल्म के कई रील शूट हो चुके थे। गुरुदत्त को अपना रोल पसंद नहीं आ रहा था। उन्होंने सोचा कि इस भूमिका के लिए दिलीप कुमार बेहतर अभिनेता हैं। वो दिलीप साहब के पास पहुंच गए। दिलीप कुमार ने कई शर्तें रखीं। गुरुदत्त ने सभी मान लीं। दिलीप कुमार ने डेट्स दीं लेकिन तय समय पर स्टूडियो के सेट पर नहीं पहुंचे। घंटों की प्रतीक्षा के बाद गुरुदत्त ने फिर से मेकअप किया और फिल्म पूरी की। फिल्म के प्रीमियर पर दिलीप कुमार, निर्देशक के आसिफ और बी आर चोपड़ा के साथ पहुंचे थे। फिल्म समाप्त होने के बाद दिलीप कुमार ने बी आर चोपड़ा से कहा, थैंक गाड, मैं बाल-बाल बच गया, इस फिल्म की भूमिका करता तो खूब हंसी उड़ती। ये अलग बात है कि बाद के दिनों में दिलीप कुमार को प्यासा में काम नहीं करने का अफसोस रहा। प्यासा लोगों को खूब पसंद आई थी और फिल्म जबरदस्त हिट रही। 

प्यासा के बाद गुरुदत्त ने फिल्म कागज के फूल बनाई। इसमें भी वो अशोक कुमार को लेना चाहते थे। फिल्म बाजी के समय से ही गुरुदत्त की इच्छा थी कि वो अशोक कुमार को डायरेक्ट करें लेकिन कई तरह की समस्याओं के कारण अशोक कुमार फिल्म नहीं कर पाए। गुरुदत्त ने चेतन आनंद से संपर्क किया। उन्होंने इतने पैसे मांग लिए कि गुरुदत्त को फिर से खुद ही मेकअप करवाकर फिल्म करनी पड़ी। फिल्म को दर्शकों ने नकार दिया। इस फिल्म में भी गुरुदत्त ने नायक की पीड़ा को उभारने का प्रयास किया लेकिन वो दर्शकों के गले नहीं उतरी। प्यासा का नायक बेहद गरीब था उसके दुख को दर्शकों ने स्वीकार कर लिया। कागज के फूल के नायक की अमीरी उसके दुख से दर्शकों को जोड़ नहीं पाई। एक अमीर आदमी का पारिवारिक दुख दर्शकों के गले नहीं उतर सका। फिल्म बेहद कलात्मक बनी पर भावनात्मक संघर्ष का चित्रण कमजोर माना गया। इस फिल्म की असफलता ने गुरुदत्त को अंदर से तोड़ दिया। तबतक उनकी पारिवारिक जिंदगी संघर्ष के रपटीली पथ पर आ चुकी थी। शराब की आदत बढ़ने लगी थी। वहीदा रहमान के साथ उनके संबंधों की चर्चा चरम पर थी। इस दौर में ही उन्होंने फिल्म चौदहवीं का चांद बनाने की सोची। फिल्म बन गई। इसके प्रदर्शन में बाधा खड़ी हो गई। ये फिल्म मुस्लिम समाज पर बनी है। देश का विभाजन हो चुका था। फिल्म डिस्ट्रीव्यूटर्स का मानना था कि विभाजन के बाद मुस्लिम समाज का बड़ा हिस्सा पाकिस्तान चला गया था। मुस्लिम समाज की कहानियों का बाजार सिकुड़ गया था। दरवाजा और चांदनी चौक जैसी फिल्में फ्लाप हो गई थीं। किसी तरह गुरुदत्त ने डिस्ट्रीव्यूटर्स को तैयार किया। फिल्म जबरदस्त हिट रही। 

इसके बाद गुरुदत्त ने साहब बीवी और गुलाम बनाई। मीना कुमारी से छोटी बहू का ऐसा अभिनय करवाया कि उनकी भूमिका अमर हो गई। इस फिल्म के दौरान भी अनेक बधाएं आईं। ऐसा प्रतीत होता है कि जिंदगी और कारोबार की बाधाएं और उससे उपजे दर्द से गुरुदत्त को बेहतर करने की उर्जा मिलती थी। वो व्याकुल मन से अपने दर्द को रूपहले पर्दे पर इस तरह से पेश करते थे कि दर्शक उसके मोहपाश में बंधता चला जाता था। कागज के फूल भले ही फ्लाप रही हो लेकिन आज उसकी कलात्मकता भारतीय फिल्म को गर्व का अवसर देती है। गुरुदत्त ने अपनी छोटी सी जिंदगी में हिंदी सिनेमा को वो ऊंचाई दी जहां पहुंचना किसी भी निर्देशक के लिए एक सपने जैसा है। फिल्मकार गुरुदत्त में बेहतर करने की जो ललक थी वो उनको हमेशा व्याकुल कर देती थी। व्याकुलता और दर्द ने असमय गुरुदत्त की जीवन लीला समाप्त कर दी। 

Saturday, July 20, 2024

हिंदू-मुसलमान के चक्रव्यूह में शासनादेश


उत्तर प्रदेश सरकार के एक आदेश की इन दिनों बहुत चर्चा है। कई विपक्षी दल और बयान बहादुर किस्म के नेता इस आदेश को समाज को बांटनेवाला बता रहे हैं। आदेश ये है कि कांवड़ यात्रियों के मार्ग में पड़नेवाले सभी दुकानों, ढाबों और ठेलों पर दुकान मालिक का नाम, रेट लिस्ट और दुकान मालिक का मोबाइल नंबर लिखना अनिवार्य कर दिया गया है। यह आदेश समान रूप से सभी दुकानों के लिए है। किसी जाति और मजहब के दुकानदारों के लिए नहीं। इस आदेश के बाद तथाकथित सेक्युलर ब्रिगेड को लगने लगा कि ये मुसलमानों को चिन्हित करने के लिए किया जा रहा है। जमीयत उलमा-ए-हिंद ने भी एक बयान जारी कर सरकार से इस फैसले को वापस लेने की मांग की है। जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद असद मदनी ने इस निर्णय को अनुचित, पूर्वाग्रह पर आधारित और भेदभावपूर्ण बताया है। उन्होंने अपने बयान में आगे ये भी कहा कि ये फैसला मुसलमानों को दोयम दर्जे का नागरिक बनाने की घिनौनी साजिश है। अपने बयान में मदनी ने सभी धर्म के लोगों से अपील की है कि वो एकजुट होकर इसके विरुद्ध आवाज उठाएं। अब जरा निर्णय की बात कर ली जाए। खानपान व्यवसाय के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने 2006 में एक नियम बनाया था। उसको खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम कहा गया। इस अधिनियम के अनुसार प्रत्येक रेस्तरां या ढाबा संचालक को अपनी फर्म का नाम, अपना नाम और लाइसेंस संख्या लिखना अनिवार्य है। ग्राहक जागो अभियान के अंतर्गत भी इस बात की अनिवार्यता की गई थी कि हर प्रतिष्ठान पर उसके मालिक का नाम, पंजीयन संख्या और वहां की सेवाओं या वस्तुओं का रेट कार्ड लगाया जाएगा। तब किसी भी कोने अंतरे से इसके विरोध की आवाज नहीं आई थी। कारण कि तब तथाकथित सेक्यूलरों की सरकार थी। अब योगी आदित्यनाथ की सरकार है तो उनको घेरने के लिए इसका एक राजनीतिक औजार की तरह उपयोग हो रहा है। पुराने कानून को लागू करने से कैसे समाज में हिंदू-मुसलमान विभेद उत्पन्न हो जाएगा, ये समझ से परे है। 

स्वाधीनता के 75 वर्षों बाद भी अगर समाज में हिंदू और मुसलमान के बीच सिर्फ नाम जानने के बाद विभेद पैदा हो रहा है तो इस बात पर विचार किया जाना चाहिए कि हमने कैसा समाज बनाया। गंगा-जमुनी संस्कृति को नारे की तरह उपयोग करनेवालों को ये सोचना चाहिए कि इस कथित गंगा-जमुनी संस्कृति की नींव कितनी कमजोर थी जो सिर्फ नाम जान लेने से दरक जा रही है। नाम उजागर करने से मुसलमान चिन्हित कैसे हो जाएंगे। जमीयत के नेता इसको घिनौनी साजिश बता रहे हैं, लेकिन कैसे, ये नहीं बता पा रहे हैं। जहां तक नाम के सार्वजनिक करने का प्रश्न है तो नाम तो हर जगह सार्वजनिक होता है। किसी जिलाधिकारी के कमरे में जाइए तो उसकी मेज पर उसकी नाम पट्टिका रखी होती है। यहां तक कि प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति की भी नेमप्लेट, जहां आवश्यक होता है, वहां लगाई जाती है। हर पुलिस आफिसर और सैनिक की वर्दी पर उसका नाम लगा होता है। नाम जान लेने से समाज के बंटने का तर्क बेहद सतही है। समाज को इस बात पर चिंता करनी चाहिए कि कुछ लोग हर बात को हिंदू-मुसलमान के चश्मे से देखने लगते हैं। 

शास्त्रीय संगीत की बात करें। क्या कभी भी उस्ताद बिस्मिल्ला खां की शहनाई को इस कारण से सुनना बंद किया कि वो मुसलमान हैं। किसी ने उस्ताद अल्लारखा खान से लेकर उस्ताद अलाउद्दीन खान, बड़े गुलाम अली खां, विलायत खां, बेगम अख्तर, रसूलन बाई जैसे दिग्गज कलाकारों के सम्मान में कोई कमी की। सबके नाम सार्वजनिक थे हैं और सभी कलाकार समान रूप से हिंदुओं को भी पसंद हैं। नाम को लेकर जो फिजूल की बातें हो रही हैं वो विरोध करनेवालों की मानसिकता को ही दर्शाते हैं। सवाल मुसलमान नाम का नहीं है मानसिकता का है, राजनीति का है। जिन मुस्लिम कलाकारों ने अपना नाम बदलकर हिंदू नाम रख लिए उनको भी हमारे देश की जनता ने इतना सम्मान और प्यार दिया जिसका हिसाब नहीं लगाया जा सकता है। आज भी जब सिनेमा के दमदार कलाकारों की बात होती है तो दिलीप कुमार का नाम लिया जाता है। युसूफ खान जब फिल्मों में आए तो दिलीप कुमार बन गए। लोगों को इस बात का पता भी चला लेकिन उनकी लोकप्रियता में किसी प्रकार की कमी नहीं आई। इसी तरह जब हमारे देश के दर्शकों को पता चला कि अभिनेत्री मीना कुमारी का नाम महजबीन बानो है तब भी कोई अंतर नहीं आया। मधुबाला भी मुमताज जहां बेगम देहलवी थीं लेकिन आज भी हिंदी फिल्मों की सबसे सुंदर अभिनेत्री के तौर पर समादृत है। इन सबके प्रशंसक हैं, न हिंदू न मुसलमान। दर्जनभर से अधिक मुसलमान अभिनेता और अभिनेत्रियों ने अपना नाम बदलकर हिंदू नाम रख लिया था। देश की जनता को पता भी चला लेकिन किसी को कुछ फर्क नहीं पड़ा। इसी तरह से शाहरुख खान या सलमान खान अपने मुस्लिम नाम और पहचान के साथ ही फिल्मों में आए लेकिन उनके नाम से न तो फिल्म हिट हुई न ही उनके नाम और मजहब को देखकर दर्शक फिल्म देखने गए। यहां तक कि 2002 के गुजरात के सांप्रदायिक दंगों के बाद आमिर खान एक पार्टी विशेष के एजेंडा को बढ़ाने के लिए एक्टिविस्ट बन गए थे लेकिन जनता ने न तो उनकी राजनीति देखी और न ही उनका नाम। देखा तो सिर्फ उनका काम। आज भी फैज से लेकर मीर तक की शायरी भारत में लोगों की जुबान पर है। तो फिर कैसी बात करते हैं कि दुकान पर मुस्लिम नाम लिखे होने के कारण हिंदू वहां नहीं जाएंगे। या दुकानों पर नाम लिखने का नियम लागू होने से मुसलमान इस देश में दोयम दर्ज के नागरिक हो जाएंगे।

जब भी हमारे देश में इस तरह की बातें होती है तो लगता है कि जो लोग धर्मनिरपेक्षता के झंडाबरदार होने का दावा करते हैं उनका सोच कितना संकुचित है। जो लोग इस तरह के नियमों से सामाजिक समरसता खत्म होने की बात करते हैं उनको न तो हिंदुओं पर भरोसा है न मुसलमानों पर विश्वास। दरअसल जबसे संविधान की प्रस्तावना में पंथनिरपेक्ष शब्द को अवैध तरीके से जोड़ा गया तब से ही सायास इस तरह का वातावरण बनाया गया जिससे हिंदुओं और मुसलमानों के बीच वैमनस्यता बढ़े। पिछले दस वर्षों से ये प्रवृत्ति और बढ़ी है। कांग्रेस और उसके इकोसिस्टम को ये लगता है कि मुसलमानों को इस तरह से डराकर ही अपने पाले में ला सकती है। उनका वोट एकमुश्त उनकी पार्टी को मिल सकता है। 2024 के चुनाव में हलांकि कांग्रेस पार्टी को सफलता नहीं मिली लेकिन मुसलमानों को एक वोटबैंक के तौर पर अपने गठबंधन में लाने में सफल रहे। अब उनके सामने इस वोटबैंक को अपने साथ बनाए रखने की चुनौती है। इस चुनौती से निबटने के लिए वो दुकानों पर नाम लिखने के सरकारी आदेश को राजनीति के टूल की तरह उपयोग कर रहे हैं। हिंदू मुसलमान में देश को उलझानेवाली इन कोशिशों से तात्कालिक रूप से वोट मिल सकता है, कहीं कहीं सत्ता भी लेकिन देश कहीं पीछे छूट जाएगा। इसके बारे में समाज को सोचना होगा।  

Tuesday, June 11, 2024

उत्कृष्टता के आग्रही निर्देशक


करीम आसिफ। उत्तर प्रदेश के इटावा में पैदा हुए। अपने मामू नसीर अहमद खान के साथ सत्रह बरस की उम्र में बांबे (अब मुंबई) पहुंचे। नसीर खान अपने समय के जाने माने फिल्म निर्माता निर्देशक थे। कुछ फिल्मों में अभिनय भी किया था। करीम आसिफ अपने मामू के साथ बांबे पहुंचते हैं तो वहां कुछ समय के लिए एक फिल्म कंपनी में सिलाई का काम करते हैं। इसी दौर में वो करीम आसिफ से के आसिफ हो जाते हैं। इन्होंने अपने जीवन में दो ही फिल्में निर्देशित कीं, फूल और मुगल ए आजम। फिल्म फूल सफल रही। दूसरी ने तो इतिहास ही रच दिया। बहुधा इस बात की चर्चा होती है कि के आसिफ ने मुगल ए आजम के निर्माण में दस वर्ष लगा दिए। फिल्म पर होनेवाले खर्च को लेकर निर्माता और निर्देशक के बीच मतभेद के कारण काम रुक जाता था। फिल्म की भव्यता को लेकर के आसिफ छोटे से छोटा समझौता भी नहीं करना चाहते थे। ये कम ज्ञात है कि के आसिफ ने पहले भी मुगल ए आजम के नाम से फिल्म बनाने का असफल प्रयास किया था। पहली बार के आसिफ ने सिराज अली हकीम को अपनी फिल्म में पैसा लगाने के लिए राजी किया था। हकीम बांबे के बेहद धनवान व्यक्ति थे। 1946 में ही के आसिफ की फिल्म मुगल ए आजम फ्लोर पर चली गई थी। यह जानना दिलचस्प है कि मुगल ए आजम में अनारकली की भूमिका के लिए मधुबाला निर्देशक के आसिफ की पहली पसंद नहीं थीं। ना ही बादशाह अकबर के लिए पृथ्वीराज कपूर और शहजादा सलीम के लिए दिलीप कुमार। अगर के आसिफ की मूल परिकल्पना साकार होती तो अकबर की भूमिका चंदरमोहन निभाते और सलीम की सप्रू। अनाकरली के रूप में आज हम नर्गिस को देख रहे होते। नियति को कुछ और ही मंजूर था। फिल्म एक चौथाई शूट हो चुकी थी। अचानक चंदरमोहन का निधन हो गया। सबकुछ रुक गया। देश का विभाजन हो चुका था। विभाजन का असर भी फिल्म निर्माण पर पड़ा। फिल्म के फाइनेंसर सिराज अली हाकिम पाकिस्तान जाने की तैयारी करने लगे। एक दिन के आसिफ को सूचना मिली कि हाकिम साहब हिन्दुस्तान छोड़कर जा रहे हैं और वो फिल्म में निवेश नहीं कर पाएंगे। फिल्म रुक गई। कोई भी निवेशक फिल्म में के आसिफ के खर्चे उठाने को तैयार नहीं हो रहा था। उन्होंने काफी कोशिश की। सफलता नहीं मिल पाई। 

दो वर्ष बाद उनको बांबे के बड़े बिल्डर पिता-पुत्र शोपोरजी-पालनजी मिस्त्री का साथ मिला। फिल्म नए सिरे बनाने की योजना बनी। दुर्गा खोटे को छोड़कर पूरी स्टार कास्ट बदल दी गई। उसके बाद की कहानी इतिहास में दर्ज है। के आसिफ ने जिस उत्कृष्टता से फिल्म का निर्माण किया वो अप्रतिम है। फिल्म मुगल ए आजम का गीत याद करिए मोहे पनघट पर नंदलाल...। ये गाना जब आरंभ होता है तो बाल- कृष्ण का स्वरूप में झूले दिखता है। इस दृष्य को शूट करने की बारी आई तो के आसिफ ने कहा कि कृष्ण जी की सोने की मूर्ति बनवाई जाए। शोपोर जी तैयार नहीं थे। वो इस बात पर अड़े हुए थे कि मूर्ति किसी भी धातु की बनवाकर सुनहला रंग चढ़ा दिया जाए। के आसिफ का तर्क था कि बादशाह के दरबार में तो सोने की ही मूर्ति होनी चाहिए। उनका कहना था कि ब्लैक एंड व्हाइट फिल्म में सोने की बनी मूर्ति का रंग और सुनहले रंग चढ़ा कर बनाई गई मूर्ति का रंग अलग दिखेगा। आखिरकार के आसिफ की ही चली। निर्देशक और निवेशक की तनातनी में फिल्म की शूटिंग कई दिन रुक गई। गाने में भगवान कृष्ण का सीन चंद फ्रेम का है लेकिन आसिफ माने नहीं। एक और दृष्य याद करिए। जब 14 वर्षों के बाद युद्ध कला में निपुण होकर शहजादा सलीम वापस महल में आनेवाले होते हैं तो जोधाबाई कहती है कि उनके बेटे का स्वागत मोतियों बरसा कर की जाए। मामला फिर फंस गया। आसिफ चाहते थे कि शहजादा जब दरबार में आएं तो उनका स्वागत असली मोतियों से हो। शोपोर जी कहने लगे कि दो चार सेकेंड के दृश्य के लिए इतने सारे असली मोती पर खर्च करना मूर्खता है। आसिफ डटे रहे। उनका तर्क था कि असली मोती की चमक नकली मोती में नहीं दिखेगी। नकली मोती पकड़ में आ जाएगी। असली मोती जब फर्श पर गिरेंगी तो उसकी आवाज नकली मोतियों के गिरने की आवाज से अलग होगी। बात इतवनी बढ़ गई कि के आसिफ ने फिल्म की शूटिंग रोक दी। महीने भर बाद शोपोर जी किसी तरह से तैयार हुए। असली मोती मंगवाए गए और शूट आरंभ हो सका। उत्कृष्टता के आग्रही के आसिफ और मुगल ए आजम से जुड़े इतने प्रामाणिक किस्से मौजूद हैं कि उनपर ही एक रोचक फिल्म बन सकती है। पर ये साहस कोई के आसिफ जैसा निर्देशक और शोपोर जी जैसा निवेशक ही कर सकता है। 


Tuesday, August 22, 2023

लकीरों में मिलना था


कोयंबटूर में आजाद फिल्म की शूटिंग चल रही थी। संभवत: 1954 की बात है। दिलीप कुमार शूटिंग के सिलसिले में वहां थे। उनसे मिलने जेमिनी स्टूडियो के एस एस वासन साहब पहुंचे। उस दौर में दिलीप कुमार की आशिकी के चर्चे फिल्मी पत्रिकाओँ में खूब छपा करते थे। उनकी उम्र 32 साल हो चुकी थी लेकिन शादी नहीं हुई थी। वासन ने उनसे कहा कि चलो एक ज्योतिष के पास चलते हैं और उनसे पूछते हैं। दोनों ज्योतिष के पास पहुंचे। ज्योतिष ने दिलीप कुमार की एक कुंडली बनाई और फिर उनके करियर और परिवार के बारे में बताने लग गए। दिलीप कुमार ज्योतिष की बातें सुनकर चकित थे। अचानक वासन साहब ने ज्योतिष से कहा कि ये बताइए की इनकी शादी कब होगी। ज्योतिष थोड़ी देर चुप रहे, दिलीप कुमार के चेहरे को देखा, फिर हथेली की लकीरों को और कहा कि इनकी शादी चालीस वर्ष की उम्र पार करने के बाद होगी और लड़की इनसे आधी उम्र की होगी। ज्योतिष ने ये भी भविष्यवाणी की थी कि वो फिल्म इंडस्ट्री से होगी। ये सुनकर दिलीप कुमार ने जोरदार ठहाका लगाया और कहा कि इंडस्ट्री की लड़की से तो वो कभी शादी नहीं करेंगे। बात आई गई हो गई लंबा अरसा बीत गया। एक दिन नसीम बानो ने दिलीप कुमार को फोन करके सायरा बानो की जन्मदिन पार्टी में आने का न्योता दिया। दिलीप साहब जन्मदिन की पार्टी में पहुंचे और सायरा को देखते ही दिल दे बैठे। इसके पहले वो सायरा को बच्ची समझते थे और लगातार उनके साथ फिल्म में काम करने से मना कर रहे थे।  उधर सायरा के दिल में उनके लिए प्रेम अंकुरित होकर बढ़ने लगा था। सायरा बानो बेहद साफ बोलनेवाली महिला हैं। जब दिलीप कुमार ने समंदर किनारे उनको प्रपोज किया था और शादी की बात की थी तब भी सायरा ने उनसे पूछ लिया था कि शादी की बात वो कितनी लड़कियों से कर चुके हैं। जल्द ही दोनों का विवाह गो गया। जब विवाह हो रहा था तो दिलीप कुमार को अचानक कोयंबटूर के ज्योतिष की बात याद आ गई थी। 

विदेश में पढ़ी लिखी और संपन्न परिवार की लड़की सायरा जब शादी करके ससुराल आई थी तो उसको अपनी ननदों के तानों का सामना करना पड़ा था लेकिन वो घर को जोड़े रही थीं। उस समय तक वो बेहद सफल और लोकप्रिय अभिनेत्री हो चुकी थी। देव आनंद, राजकपूर, राजेन्द्र कुमार आदि के साथ उनकी फिल्में सिनेमाघरों में धूम मचा चुकी थीं लेकिन ये दिलीप कुमार की बहनों की समज में नहीं आ रही थी और वो सायरा को लगातार तंग करते थे। दिलीप कुमार चाहते थे कि अलग घर लेकर रहें लेकिन सायरा चाहती थीं कि परिवार एक साथ रहे। और ऐसा ही हुआ भी। दिलीप कुमार की एक बहन थी अख्तर। उसने के आसिफ से विवाह कर लिया था जिससे नाराज दिलीप कुमार ने उनसे संबंध तोड़ लिए थे। एक दिन दोपहर को अस्पताल से फोन आया कि अख्तर बहुत बीमार है और अपने भाई से मिलना चाहती है। फोन सायरा ने उठाया था। उसने दिलीप कुमार को सारी बातें बताईं और बहन से मिलने का अनुरोध किया। तबतक के आसिफ का भी निधन हो चुका था। दिलीप कुमार ने बहुत बेरुखी से मना कर दिया और कहा मेरे लिए अख्तर मर चुकी है। दो घंटे तक सायरा बानो दिलीप कुमार को मनाती रही और आखिरकार अपने साथ उनको लेकर अस्पताल पहुंची। भाई बहन को मिलवाया। बाद में अख्तर और सायरा अच्छी दोस्त बन गईं। सायरा बानो के व्यक्तित्व के इस पक्ष पर चर्चा कम होती है। वो जितनी ग्लैमरस और लोकप्रिय अभिनेत्री थीं उतनी ही सहज और पारिवारिक संबंधों को निभाने वाली महिला हैं। सायरा बानो ने दिलीप कुमार से न केवल टूटकर प्रेम किया बल्कि उनकी पत्नी होने की सभी जिम्मेदारियों को भी बखूबी निभाया। आज वो एक सफल अभिनेत्री और बेहतर इंसान के तौर पर हिंदी फिल्म जगत में समादृत हैं। 

Tuesday, February 8, 2022

प्रतिभा को मिलती रही अंतराष्ट्रीय मान्यता


कोरोना महामारी के दौर में ओवर द टाप (ओटाटी) प्लेटफार्म और तकनीक के अन्य माध्यमों के जरिए देश विदेश में फिल्मों का प्रदर्शन होता है। फिल्म निर्माता या कंपनी फिल्म के मुनाफे को प्रचारित करती हैं तो बहुधा फिल्म के विदेश में प्रदर्शन से होनेवाली आय को भी जोड़ा जाता है। आमिर खान की फिल्म दंगल या इरफान खान अभिनित फिल्म हिंदी मीडियम की विदेश में प्रदर्शन से होनेवाली आय पर भी खूब बातें हुईं। करण जौहर की फिल्मों की विदेश में सफलता को भी प्रचारित किया जाता रहा है। जब इन फिल्मों के विदेश में सफलता की बात होती है तो हम ये भूल जाते हैं कि भारतीय निर्माताओं की फिल्में स्वाधीनता के पहले से विदेशी दर्शकों को आकर्षित करती रही हैं। किश्वर देसाई ने अपनी पुस्तक द लाइफ एंड टाइम्स आफ देविका रानी में हिमांशु राय की फिल्म कर्मा के लंदन और बर्मिंघम के सिनेमा में प्रदर्शन और उसको लेकर उत्सुकता के बारे में विस्तार से लिखा है।  ये फिल्म 1933 में लंदन में रिलीज हुई थी और इसका निर्माण भारत, ब्रिटेन और जर्मनी के निर्माताओं ने संयुक्त रूप से किया था। इसके लीड रोल में हिमांशु राय और देविका रानी थी। 68 मिनट की इस फिल्म को देखने के लिए उस वक्त लंदन का पूरा अभिजात्य वर्ग उमड़ पड़ा था। आक्सफोर्ड स्ट्रीट पर इस फिल्म का एक बड़ा पोस्टर लगा था जिसमें सिर्फ देविका रानी की तस्वीर लगी थी। इस फिल्म के बारे में लंदन के समाचारपत्रों में कई प्रशंसात्मक लेख छपे थे। उसके बाद भी कई हिंदी फिल्मों को विदेश में सराहना मिली थी। इससे परतंत्र भारत के फिल्मकारों और कलाकारों का स्वयं पर भरोसा भी गाढ़ा हुआ था। 

जब देश आजाद हुआ तो भारतीय फिल्मों खासतौर पर हिंदी फिल्मों को लेकर पूरी दुनिया में एक उत्सुकता का माहौल बना। फिल्म इतिहासकारों के मुताबिक इसकी वजह ये थी कि दुनिया के अलग अलग देशों के लोग भारत के बारे में जानना चाहते थे। 1952 में दिलीप कुमार और निम्मी की एक फिल्म आई थी ‘आन’। इस फिल्म को योजनाबद्ध तरीके से दुनिया के 28 देशों में रिलीज किया गया था। दुनिया की 17 भाषाओं में इस फिल्म का सबटाइटल तैयार किया गया था। लंदन में इस फिल्म के प्रीमियर पर ब्रिटेन के उस समय के प्रधानमंत्री लार्ड एटली के उपस्थित रहने का उल्लेख कई जगहों पर मिलता है। अंग्रेजी में इसको सैवेज प्रिंसेस तो फ्रेंच में मंगला, फी दिज आंद ( मंगला, भारत की लड़की) के नाम से रिलीज किया गया था। इस फिल्म में निम्मी ने जिस चरित्र को निभाया था उसका नाम मंगला था। इस फिल्म को कुछ समय बाद जापान में भी रिलीज किया गया था और वहां के दर्शकों ने भी इसको खूब पसंद किया था। राज कपूर की फिल्म ‘आवारा’ हिंदी में 1951 में रिलीज हो गई थी। 1954 में मास्को और लेनिनग्राद में भारतीय फिल्म फेस्टिवल में राज कपूर की इस फिल्म का प्रदर्शन हुआ। इस फिल्म को दर्शकों ने खूब पसंद किया और वहां के अखबारों में राज कपूर के अभिनय की जमकर प्रशंसा हुई। राज कपूर का जादू ऐसा चला कि इस फिल्म को रूस के अन्य सिनेमाघरों में भी प्रदर्शित किया गया। इस फिल्म के बाद ‘श्री 420’ आई उसको भी रूस के दर्शकों ने बेहद पसंद किया था। इस फिल्म के प्रीमियर पर जब राज कपूर वहां पहुंचे थे तो दर्शकों को काबू में करना मुश्किल हो गया था। फिर तो राज कपूर की हर फिल्म रूस में रिलीज होने लगी और व्यावसायिक रूप से भी सफल हुई । राज कपूर की फिल्मों को तो इजरायल के दर्शकों ने भी खूब पसंद किया था। वहां तो राज कपूर की फिल्म ‘श्री 420’ का गाना ‘ईचक दाना बीचक दाना’ तो इतना अधिक लोकपर्य हुआ कि इजरायल के गायक नईम ने उसको अपनी भाषा में गाया। कई फिल्म इतिहासकारों का मानना है कि रूस और चीन में राज कपूर की फिल्में इस वजह से दर्शकों को पसंद आ रही थीं कि वो समाजवादी विचारधारा के नजदीक थीं। पर राज कपूर खुद कह चुके हैं कि उनकी फिल्में विचार या विचारधारा को ध्यान में रखकर नहीं बनाई जाती हैं। उनकी फिल्मों में दर्शकों की संवेदना का ध्यान रखा जाता है। 

1960 के दशक और उसके बाद बनी फिल्में भी विदेश में लोकप्रिय हुईं जिनमें मुगले आजम प्रमुख हैं। 1965 आई देवानंद की फिल्म गाइड को भी विदेश में पसंद किया गया। उसके बाद शोले फिल्म को भी अंतराष्ट्रीय स्तर पर सराहना मिली। कालांतर में करण जौहर की रोमांटिक फिल्मों ने भी अंतराष्ट्रीय दर्शकों को अपनी ओर खींचा लेकिन तबतक हिंदी फिल्मों में पैसा आ चुका था और तकनीक भी बेहतर हो चुकी थीं। तकनीक के मामले में भी अगर हिंदी फिल्मों के सफर को देखें तो हिंदी फिल्मकारों ने कम संसाधन होने के बावजूद बेहतरीन दृश्यों की संरचना की। व्ही शांताराम जैसे निर्देशक तो बैलगाड़ी के अगले हिस्से में कैमरा लगाकर जिमी जिब तैयार कर मूविंग शाट्स लेते थे। उस जमाने में एल्यूमिनियम शीट्स पर पानी डालकर समंदर की लहर का अहसास करवाने वाले शाट्स बनाए जाते थे। तकनीक के मामले में भी हिंदी फिल्मों ने बहुत लंबा सफर तय कर लिया है। वीएफएक्स के इस दौर में तो गानों से लेकर नायकों की त्वचा तक को बेहतर बनाया जा सकता है। इस तरह से हम देखें तो भारतीय फिल्मकारों ने स्वाधीनता के पहले जो एक विश्वास अर्जित किया था उसकी बुनियाद पर बाद के फिल्मकारों ने सफलता की बुलंद इमारत खड़ी की। 

Wednesday, July 7, 2021

दिलीप कुमार का अमेठी कनेक्शन


दिलीप कुमार फिल्मों के बेहतरीन अभिनेता थे। फिल्मों के अलावा नेता का उनका रूप अल्पज्ञात है। दिलीप कुमार का उत्तर प्रदेश के अमेठी की राजनीति से नाता रहा है। इमरजेंसी के बाद 1977 में आम चुनाव की घोषणा हुई थी। संजय गांधी अमेठी से लोकसभा का चुनाव लड़ रहे थे। दिलीप कुमार ने अमेठी में चुनाव प्रचार की इच्छा जताई थी। कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने पूरे क्षेत्र में इस बात का जमकर प्रचार किया कि फिल्म अभिनेता दिलीप कुमार चुनाव प्रचार के लिए सात मार्च को अमेठी पहुंच रहे हैं। उन जगहों पर सुबह से लोगों की भीड़ जमा हो गई थी । लोग दिलीप कुमार को देखना चाहते थे। लेकिन अमेठी की जनता इंतजार करती रह गई क्योंकि दिलीप कुमार नहीं आए। कांग्रेस के किसी ने तारीख को लेकर घपला कर दिया था। 

दिलीप कुमार का दौरा आठ मार्च का था। वो आठ मार्च को फुर्सतगंज हवाई अड्डे पहुंचे लेकिन वहां उनको रिसीव करने के लिए कोई नहीं था। उन दिनों अमेठी में यातायात की सुगम व्यवस्था नहीं थी। एक पीपल के पेड़ के नीचे दिलीप कुमार दो घंटे अकेले खड़े इंतजार करते रहे। दो घंटे बाद एक बस आई और उससे दिलीप कुमार अमेठी पहुंचे। जहां वो एक चाय दुकान पर उतरे और किसी से कांग्रेस के दफ्तर में खबर भिजवाई गई। थोड़ी देर बाद एक जीप दिलीप कुमार को लेने आई और फिर आनन फानन में उनकी सभा तय की गई। चूंकि उनके नाम का प्रचार नहीं किया जा सका था इसलिए बमुश्किल कुछ ही लोग दिलीप कुमार की सभा में आ पाए। चुनावी सभा असफल हो गई। दिलीप कुमार मायूस होकर लौट गए। अपनी पुस्तक द संजय स्टोरी में विनोद मेहता ने इस प्रसंग का उल्लेख चुनाव के दौरान कांग्रेस की बदइंतजामी और खराब प्लानिंग के सिलसिले में की है। इस घटना के 23 साल बाद कांग्रेस ने उनको राज्यसभा में भेजा ।      

दो सितारों की दोस्ती की मिसाल


दिलीप कुमार के पेशावर से मुंबई (तब बांबे) आने की भी बेहद दिलचस्प कहानी है। प्रथम विश्व युद्ध के बाद दुनिया में कई बदलाव आने लगे थे। कारोबार के अवसर कम हो गए थे और कारोबारी नए नए व्यवस्या की तलाश में इधर उधर जाने लगे थे। दिलीप कुमार के पिता भी कारोबार के सिलसिले में मुंबई आ गए थे। एक दिन बेहद दिलचस्प घटना घटी। शाम को दिलीप साहब के पिताजी मुंबई के अपोलो बंदर इलाके में टहल रहे थे। एक दिन उन्होंने देखा कि एक दंपति अपने बेहद खूबसूरत बच्चे को प्रैम में लिटाकर टहल रहे थे। उस बच्चे के चेहरे को देखकर उनको अपने छोटे से बच्चे युसूफ की याद आ गई। वो प्रैम तक पहुंचे और बच्चे को उठाकर गले से लगा लिया। हट्टे-कट्ठे पठान को प्रैम से अपने बच्चे को उठाते देखकर दंपति शोर मचाने लगे। ये देखकर युसूफ के पिताजी ने बच्चे को प्रैम में लिटा दिया और दंपति से ये कहकर क्षमा मांगी कि बच्चे को देखर उनको अपने बेटे की याद आ गई थी इसलिए गोद में उठा लिया था। लेकिन इस घटना ने एक पिता को बेचैन कर दिया। वो पेशावर लौट गए और फिर अपनी पत्नी और सात बच्चों को लेकर मुंबई आ गए। दिलीप कुमार ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि वो अपने परिवार के साथ फ्रंटियर मेल से मुंबई के लिए रवाना हो गए। ठीक से याद नहीं पर ये 1935 के आसपास की बात होगी। ये उनकी पहली ट्रेन यात्रा थी, इस वजह से सभी बच्चे बेहद उत्साहित थे। रास्ते में उनके रिश्तेदार और पहचान वाले उनसे मिलने आते थे और कहीं सामिष तो कहीं निरामिष भोजन मिलता था। दिलीप कुमार ने एक बेहद अजीब सी बात लिखी है अपनी आत्मकथा में। उन्होंने लिखा है कि जब ट्रेन स्टेशन पर रुकती थी तो चायवाले जोर जोर से चिल्लाते थे- हिंदू चाय, हिंदू पानी, मुस्लिम चाय, मुस्लिम पानी। दिलीप कुमार के मुताबिक उनके परिवार के लोग इस ओर ज्यादा ध्यान नहीं देकर कोई भी पानी और कोई भी चाय पी ले रहे थे। उनके डब्बे में बैठे कई लोग भी ऐसा ही कर रहे थे लेकिन कई लोग अपने धर्म के हिसाब से चाय और पानी पी रहे थे। सुबह सुबह इनकी ट्रेन कोलाबा पहुंची और वहां से तांगा करके ये लोग किराए के घर में क्रॉफर्ड मार्केट के निकट नागदेवी रोड पर अब्दुल्ला बिल्डिंग में रहने आ गए। वहां तीन कमरों के फ्लैट में दिलीप कुमार का परिवार रहने लगा। दिलीप कुमार की पढ़ाई भी शुरु हुई और 1937 में उनके पिता ने उऩका नामांकन अंजुमन इस्लाम हाई स्कूल में पांचवीं क्लास में करवा दिया। फिर वहां से वो खालसा कॉलेज पहुंचे जहां रा कपूर से उनकी मुलाकात हुई। दोनों का पेशावर कनेक्शन था और दोनों दोस्त बन गए। दिलीप कुमार के पिता सरवर खान और राज कपूर के दादा बसेश्वरनाथ मित्र थे। सरवर खान बहुधा बसेश्वरनाथ को कहा करते थे कि यार! तुम कैसे अपने बेटे पृथ्वीराज को नाचनेवालियों के साथ काम करने की इजाजत दे देते हो। उस दौर में फिल्मों में कई लोग पेशेवर नृत्यांगनाओं के बारे में इस शब्द का प्रयोग करते थे। जब युसूफ खान को देविका रानी ने फिल्मों में काम करने का प्रस्ताव दिया था तब दिलीप कुमार अपने पिता के रुख से परिचित थे, उनको इस बात की आशंका भी थी कि पिता उनको अनुमति नहीं देंगे। उन्होंने अपनी मां को बताया कि उनको एक नौकरी मिल गई है। मां ने जब पूछा कि क्या नौकरी मिली है तो उन्होंने ये कहकर मां को बरगला दिया कि उनकी अच्छी उर्दू की वजह से नौकरी मिली है।

बांबे टॉकीज में एक दिन अचानक उनको राज कपूर मिल गए, दोनों ने आश्चर्य से एक दूसरे को आश्चर्य से देखा और राज कपूर ने देविका रानी के सामने ही पूछ लिया कि तुम्हारे पिता जानते हैं कि तुम फिल्मों में काम करते हो। दिलीप कुमार ने फौरन बात बदल दी और खालसा कॉलेज के दौर की अपनी और राज कपूर  बातें देविका रानी को बताने लगे। बाद में राज और दिलीप कुमार की दोस्ती और परवान चढ़ी। बहुत कम लोगों को मालूम है कि ‘संगम’ फिल्म के लिए राज कपूर ने दिलीप कुमार को ऑफर दिया था जिसे दिलीप साहब ने ठुकरा दिया था। तब दिलीप कुमार और राज कपूर के बीच एक खास तरह का खिंचालव रहता था, प्रतिद्वंदिता थी। जब राज कपूर दिल्ली के एम्स के आईसीयू में भर्ती थे और जिंदगी की जंग लड़ रहे थे तो दिलीप कुमार उनसे मिलने अस्पताल पहुंचे थे। राज कपूर अचेत थे। दिलीप कुमार ने उनका हाथ अपने हाथ में लिया और कहने लगे ‘उठ जा राज! अब उठ जा, मसखरापन बंद कर। तू तो बेहतरीन कलाकार है जो हमेशा हेडलाइंस बनाता है। मैं अभी पेशावर से आया हूं और चपाली कबाब लेकर आया हूं। याद है राज हम बचपन में पेशावर की गलियों में साथ मिलकर ये स्वादिष्ट कबाब खाया करते थे।‘ बीस मिनट तक दिलीप कुमार आईसीयू में राज कपूर का हाथ अपने हाथ में लेकर बोलते रहे थे। आज दिलीप कुमार के निधन से एक युग का अंत हो गया। 

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बदल गई दिलीप कुमार की जिंदगी


अब से कुछ देर पहले हिंदी सिनेमा के सबसे बड़े नायकों में से एक दिलीप कुमार का निधन हो गया। उनके निधन की खबर सुनते ही 1940 के बाद के दौर के कुछ दिलचस्प प्रसंग की याद ताजा हो गई। दिलीप कुमार के फिल्मों में आने का प्रसंग। दरअसल हुआ ये था कि अपने पति हिमांशु राय के निधन के बाद देविका रानी बांबे टॉकीज को अपने साथियों अमिय चक्रवर्ती और एस मुखर्जी के साथ मिलकर चला रही थीं। थोड़े दिनों तक सब ठीक चला फिर चक्रवर्ती और मुखर्जी में टकराव शुरू हो गया। देविका रानी ने अमिय चक्रवर्ती का साथ दिया और मुखर्जी बांबे टॉकीज छोड़कर चले गए। उसी समय फिल्म ‘किस्मत’ को लेकर अशोक कुमार और अमिय चक्रवर्ती में झगड़ा हो गया और अशोक कुमार ने भी बांबे टॉकीज छोड़ दिया था। उस वक्त अशोक कुमार बेहद लोकप्रिय अभिनेता थे और उनका बांबे टॉकीज छोड़ना देविका रानी के लिए बड़ा झटका था। वो दौर था जब ज्यादातर अभिनेता किसी स्टूडियो में मासिक वेतन पर काम किया करते थे। अशोक कुमार को भी उस समय हजार रुपए प्रतिमाह मिला करते थे। खैर... ये अवांतर प्रसंग है। जब अशोक कुमार बांबे टॉकीज छोड़कर चले गए तब से देविका रानी किसी नए हीरो की तलाश में थीं। जहां भी जाती थीं वहां वो इस संभवना को तलाशती रहती थीं। 

अपनी नई फिल्म की लोकेशन देखने के लिए वो नैनीताल गई हुई थीं। इस बात की बहुत चर्चा होती है कि वहीं उन्होंने एक युवा फल कारोबरी को देखा जो अपने पिता के फलों के बिजनेस के सिलसिले में आया हुआ था। तब देविका रानी ने उनको कहा था कि मुंबई आओ तो मिलना। लेकिन दिलीप कुमार ने अपनी आत्मकथा, ‘द सब्सटेंस एंड द शैडो’ में इस घटना को अलग तरीके से लिखा है और भ्रम को साफ किया। दिलीप कुमार एक दिन चर्च गेट पर खड़े थे तो उनको मनोविज्ञानी डॉ मसानी दिखे। दिलीप कुमार ने उनको अपने कॉलेज में सुना था। वो स्टेशन पर उनके पास पहुंचे और अपना परिचय दिया। डॉ मसानी युसूफ खान से गर्मजोशी से मिले क्योंकि वो उनके पिता से परिचित थे। उन दिनों दिलीप कुमार काम की तलाश में थे। डॉ मसानी ने उनसे कहा कि वो बांबे टॉकीज की मालकिन से मिलने जा रहे हैं और युसूफ खान को भी साथ लेकर चले गए। युसूफ खान जब डॉ मसानी के साथ बांबे टॉकीज के स्टूडियो में पहुंचे तबतक उन्होंने कोई फिल्म भी नहीं देखी थी सिवाय एक डॉक्यूमेंट्री के। डॉ मसानी के साथ जब युसूफ खान देविका रानी के कमरे में दाखिल हुए तो देविका ने उनसे कहा, कुर्सी खींचिए और बैठ जाइए। खान साहब ने लिखा है कि देविका रानी उनको इस तरह से देख रही थीं जैसे स्कैन कर रही हों। इस बीच डॉ मसानी ने युसूफ खान का परिचय करवाया और उनको साथ लाने का उद्देश्य बताया। 

देविका रानी और युसूफ खान की इस मुलाकात के कई वर्जन उपलब्ध हैं। अपनी आत्मकथा के अलावा दिलीप कुमार ने अपने जीवनकाल में प्रकाशित अपनी जीवनी के लिए उसके लेखक बनी रूबेन को भी इस मुलाकात का विवरण दिया था। जब देविका रानी को पता चला कि युसूफ खान काम की तलाश में हैं तो उन्होंने उनसे पूछा कि क्या आप उर्दू जानते हैं। उनके इतना पूछते ही डॉ मसानी ने युसूफ खान के पेशावर कनेक्शन के बारे में विस्तार से देविका रानी को बताया। उर्दू के बाद सीधे वो सिगरेट पर पहुंच गईं और पूछा कि क्या आप सिगरेट पीते हैं तो संकोच के साथ युसूफ खान ने कहा नहीं। अगला प्रश्न था कि क्या कभी अभिनय किया है इसका उत्तर भी आया नहीं। फिर वो प्रश्न आया जिसने युसूफ खान की जिंदगी की राह बदल दी। देविका रानी ने पूछा कि क्या आप अभिनय करना चाहते हैं। जवाब आया हां। इतना सुनते ही देविका रानी ने अपने कमरे में बैठे अपने सहयोगी अमिय की ओर देखते हुए युसूफ खान के सामने 1250 प्रतिमाह के वेतन पर काम करने का प्रस्ताव दे दिया। उस वक्त ये बड़ी रकम थी। युसूफ खान को समझ में नहीं आ रहा था कि कैसे रिएक्ट करें। वहां से हां करके निकल आए। रास्ते में उनके और डॉ मसानी के बीच ज्यादा बातचीत नहीं हुई। वो घर पहुंच गए पर कशमकश जारी रही। वो इस बात पर यकीन ही नहीं कर पा रहे थे कि उनको 1250 प्रतिमाह वेतन मिलेगा। उस वक्त राज कपूर को सिर्फ 170 रु महीने मिला करते थे। इसी उधेड़बुन में वो फिर से डॉ मसानी के घर पहुंचे और उनसे कहा कि 1250 रु सालाना बहुत कम है और इतने कम पैसों में काम करना मुश्किल होगा। डॉ मसानी ने कहा कि 1250 रु तो प्रतिमाह था। खैर युसूफ खान के कहने पर उन्होंने देविका रानी को फिर से फोन किया और ये बात तय हो गई कि 1250 रु प्रतिमाह का प्रस्ताव है। 

अगले दिन जब युसूफ खान बांबे स्टूडियो पहुंचे तो देविका रानी से मिले। देविका रानी ने उनसे कहा कि युसूफ खान नाम नहीं चलेगा इसको बदलना चाहिए। इस बात की जानकारी नहीं मिलती है कि देविका रानी ने नाम बदलने की क्यों सोची लेकिन अनुमान है कि उस वक्त हिंदू मुसलमान के बीच बढते तनाव को देखते हुए देविका रानी ने ऐसा सोचा होगा। उन्होंने युसूफ खान के सामने तीन नाम रखे- जहांगीर, वासुदेव और दिलीप कुमार। बनी रुबेन ने लिखा है कि युसूफ खान ने उनको बताया कि जब ये तीन विकल्प उनके सामने आए तो उन्होंने दिलीप कुमार को चुना जबकि उऩको दूसरा नाम पसंद था। दूसरे जीवनीकारों का मानना है कि युसूफ खान को जहांगीर नाम पसंद आया था लेकिन देविका रानी के किसी सलाहकार ने दिलीप कुमार के नाम पर जोर डाला और युसूफ खान दिलीप कुमार बन गए। देविका रानी को भी दिलीप कुमार नाम पसंद आया क्योंकि ये अशोक कुमार से मिलता जुलता था। उसके बाद की कहानी तो इतिहास है। जब बांबे टॉकीज की फिल्म ‘ज्वार भाटा’ दिलीप कुमार  को मिली तो उनकी उम्र उन्नीस साल पांच महीने थे। आज 98 साल की उम्र में उनके निधन के बाद उनसे जुड़े कई प्रसंग याद आते हैं, कई फिल्मों में उनका शानदार अभिनय भी। 

https://www.jagran.com/entertainment/bollywood-vishesh-when-dilip-kumar-met-with-devika-rani-she-offered-him-to-come-in-bollywood-and-she-change-actor-name-yusuf-khan-to-dilip-kumar-verified-21806711.html

Sunday, February 14, 2021

इश्क बागी न हुए, ख्वाब मुकम्मल न हुए

हिंदी फिल्मों में रोमांटिक जोड़ियों की एक लंबी फेहरिश्त है लेकिन उतनी ही लंबी फेहरिश्त रीयल लाइफ रोमांटिक जोड़ियों की भी रही है। उन्नीस सौ पचास के बाद के वर्षों में अगर देखें तो कई ऐसी रोमांटिक जोड़ियां रहीं है जिनके इश्क के किस्से अबतक बॉलीवुड में सुनाई देते हैं। मोतीलाल और शोभना समर्थ के बीच इश्क इतना गाढ़ा था कि एक बार मोतीलाल बीमार पड़े और उनको ऑक्सीजन लगाना पड़ा। शोभना समर्थ उनको देखने अस्पताल पहुंची तो उन्होंने नर्स को इशारा किया कि मास्क हटा दिया जाए। मास्क हटाते ही उन्होंने कहा कि जब शोभना समर्थ उनके आसपास होती हैं तो उनकी सांसें सामान्य रहती हैं। इसी तरह अशोक कुमार और नलिनी जयवंत के बीच प्यार इतना गाढा था कि अशोक कुमार उनको देखेने के लिए बेचैन रहा करते थे। हिंदी फिल्म जगत में ये किस्सा बहुत प्रसिद्ध है कि अशोक कुमार ने अपने घर की छत पर दूरबीन लगा रखी थी जिसके कि वो पड़ोस में रहनेवाली नलिनी को ठीक तरीके से देख सकें। राज कपूर और नर्गिस, देव आनंद और सुरैया के प्रेम के किस्से भी आम हैं। दिलीप कुमार और मधुबाला के बीच अफेयर की भी अलग ही दास्तां है। दिलीप कुमार पहले तो कामिनी कौशल के इश्क में डूबे लेकिन जब उनका प्यार परवान नहीं चढ़ सका तो दिलीप कुमार का दिल मधुबाला पर आ गया। प्यार का रंग गाढा होता चला गया। इनका प्यार अपने अंजाम तक पहुंच पाता इसके पहले मधुबाला के पिता इन दोनों के मोहब्बत के बीच आ गए। 

उस जमाने में नायिकाओं के मुंबई (तब बांबे) से बाहर जाने को लेकर उनके माता-पिता बहुत झंझट किया करते थे। खासतौर पर जब उनको अपनी बेटियों के इश्क के बारे में पता होता था। टी जे एस जॉर्ज ने अपनी किताब द ‘लाइफ एंड टाइम्स ऑफ नर्गिस’ में लिखा है कि राज कपूर फिल्म बरसात की शूटिंग कश्मीर में करना चाहते थे लेकिन नर्गिस की मां जद्दनबाई इस बात पर अड़ गईं थीं कि उनकी बेटी राज कपूर के साथ कश्मीर नहीं जाएंगी। आखिरकार फिल्म के उन दृष्यों को महाबालेश्वर में शूट करना पड़ा था। इसी तरह जब बी आर चोपड़ा अपनी फिल्म ‘नया दौर’ की शूटिंग भोपाल में करना चाहते थे लेकिन मधुबाला के पिता अताउल्लाह खान किसी भी कीमत पर अपनी बेटी को दिलीप कुमार के साथ भोपाल नहीं जाने देने पर अड़े हुए थे। दिलीप कुमार ने मधुबाला से फैसला लेने को कहा लेकिन मधुबाला अपने पिता से बगावत नहीं कर सकी। यहीं से दिलीप कुमार और मधुबाला का इश्क दरक गया। इसके पहले भी कामिनी कौशल ने अपने परिवार की मर्जी बताकर दिलीप कुमार के साथ प्यार को अंजाम तक पहुंचाने से मना कर दिया था। एक बार फिर अपने और अपनी मोहब्बत के बीच परिवार के आने से दिलीप कुमार बेहद खफा थे। अताउल्लाह खान के मधुबाला के भोपाल जाने से मना करने पर बी आर चोपड़ा ने मधुबाला पर केस कर दिया। मधुबाला की बहन मधुर भूषण ने एक इंटरव्यू में कहा था कि ‘नया दौर’ फिल्म से संबंधित कोर्ट केस के दौरान दिलीप कुमार ने बी आर चोपड़ा का साथ दिया था। अदालत में मधुबाला के खिलाफ गवाही दी थी। दिलीप कुमार ने तो कोर्ट में यहां तक कह दिया कि वो मधुबाला से बेहद प्यार करते हैं और अपनी महबूबा के मरने तक उससे प्यार करते रहेंगे। मधुबाला के पिता ने भी अपनी बेटी को इस बात के लिए ताना मारा था कि उसका प्रेमी उसके मरने की कामना कर रहा था। इस केस को बाद में बी आर चोपड़ा ने वापस ले लिया था लेकिन मधुबाला कोर्ट में हुए अपमान को भूल नहीं पाई। वो अंदर से टूट गई थीं। ये अनायास नहीं था कि मधुबाला ने अपनी एक सहेली से कहा था कि उससे शादी मत करना जिससे तुम प्यार करती हो बल्कि उस व्यक्ति से शादी करना जो तुम्हें प्यार करता है। आठ साल की उम्र में फिल्मी दुनिया में कदम, बीस साल में तमाम शोहरत और सत्ताइस साल में फिल्मी दुनिया को अलविदा कहनेवाली मधुबाला को छोटी उम्र मिली लेकिन जीवन भर तो प्यार के लिए तरसती ही रहीं। 

Wednesday, June 24, 2020

फिल्मी दुनिया पर इमरजेंसी की गाज


अभिव्यक्ति की आजादी की बात करनेवाले बहुधा ये भूल जाते हैं कि इमरजेंसी के दौरान सिर्फ समाचारपत्रों पर ही दबाव नहीं बनाया गया था बल्कि कलात्मक और रचनात्मक अभिव्यक्ति को भी बाधित किया गया था। दबाव था सरकार को समर्थन देने का, इमरजेंसी को सही ठहराने का। देवानंद अपनी आत्मकथा में विस्तार से इमरजेंसी के दौर के बारे में लिखते हैं। देवानंद के मुताबिक इमरजेंसी के दौर में यूथ कांग्रेस से जुड़ी एक आकर्षक युवा नेत्री मुंबई ( उस वक्त बांबे) आई थीं और बड़े फिल्मी सितारों से मिलकर संजय गांधी की दिल्ली में होनेवाली रैली में बुलाने आईं। वो जब उस नेत्री के आमंत्रण पर दिल्ली पहुंचे तो उनको वहां दिलीप कुमार भी मिले थे। जब वो लोग रैली में पहुंचे तो वहां कांग्रेस के सभी बड़े नेता कांग्रेस संजय गांधी की चमचागिरी कर रहे थे। रैली खत्म होने के बाद जब देवानंद और दिलीप कुमार वहां से बाहर निकल रहे थे तो दोनों को कांग्रेस के एक नेता ने टीवी स्टेशन जाकर यूथ कांग्रेस के समर्थन में बयान रिकॉर्ड करवाने का आदेश दिया। देवानंद को तब लगा था कि कोई फासीवादी प्रोपगंडा मशीनरी संजय गांधी के लिए काम कर रही है। जब देवानंद ने यूथ कांग्रेस के लिए बयान रिकॉर्ड करवाने से मना कर दिया तो सरकार ने दूरदर्शन पर उनकी फिल्मों के प्रदर्शन पर पाबंदी लगा दी। उसके बाद देवानंद ने तत्कालीन सूचना प्रसारण मंत्री से बात भी लेकिन कुछ हुआ नहीं। मुंबई वापस लौटने पर देवानंद की मुलाकात नर्गिस से हुई तो उन्होंने देवानंद को यूथ कांग्रेस के पक्ष में टीवी के लिए बयान रिकॉर्ड करवाने की वकालत की। देवानंद लिखते हैं कि वो जानते थे कि नर्गिस, गांधी परिवार की करीबी है लेकिन उनका दिल इस बात के लिए तैयार नहीं था कि वो यूथ कांग्रेस और इमरजेंसी के लिए तत्कालीन सरकार के पक्ष में बयान दें। लिहाजा इमरजेंसी के दौर में उनकी फिल्में टीवी पर नहीं आईं।
इसी तरह का वाकया किशोर कुमार के साथ भी हुआ था। इमरजेंसी के बाद बीस सूत्री कार्यक्रम को प्रचारित करने के लिए हिंदी फिल्मों से जुड़े कलाकारों और सितारों को बुलाकर उनसे प्रचार करवाए जाने की योजना बनी। इसी कड़ी में किशोर कुमार को भी संदेश भेजा गया । सूचना प्रसारण मंत्रालय के उस वक्त के संयुक्त सचिव ने जब किशोर कुमार को फोन किया तो उन्होंने अपनी खराब तबीयत का हवाला देते हुए दिल्ली आने और सरकार के पक्ष में बयान देने से मना कर दिया। इससे खफा होकर मंत्रालय ने किशोर कुमार के गानों को दूरदर्शन और आकाशवाणी पर पाबंदी लगा दी। इतना ही नहीं उनकी फिल्मों पर भी नजर रखने का आदेश हुआ और उनके गाए गानों के ग्रामोफोन की बिक्री की राह में भी रोड़े अटकाए गए। किशोर कुमार को जब इतना तंग किया और दबाव डाला गया तो वो सहयोग को तैयार हो गए लेकिन तब भी सरकार ने कहा कि पाबंदी हटाने के पहले ये देखा जाए कि वो कितनी देर और दूर तक सहयोग करते हैं।

Sunday, June 2, 2019

कोई यूं ही नहीं बनता राज कपूर


हजारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पर रोती है/ बड़ी मुश्किल से होता है चमन मे दीदा-वर पैदा। अलम्मा इकबाल का ये शेर बॉलीवुड के सबसे बड़े शोमैन पर अक्षरश: लागू होता है। आज राज कपूर साहब के निधन के 31 साल पूरे हो रहे हैं लेकिन उनके जैसा स्वप्नदर्शी फिल्मकार दिखाई नहीं देता है। फिल्मों के हर शॉट मे परफेक्शन के लिए राज कपूर किसी भी हद तक जा सकते थे। उस वक्त की बात है जब राज कपूर श्री 420 की शूटिंग कर रहे थे। ‘मेरा जूता है जापानी’ गाने के लिए कुछ शॉट्स की जरूरत थी। राज कपूर ने अपनी पत्नी कृष्णा को कहा कि वो दो रात के लिए ठाणे और लोनावला जा रहे हैं एक गाने की शूटिंग करनी है। उन्होंने पत्नी से ये भी बताया कि चूंकि फिल्म के नायक भी वही हैं और निर्देशक भी तो ज्यादा लोगों की जरूरत है नहीं तो कैमरापर्सन राधू करमाकर के साथ जा रहे हैं। जब तय जगह पर पहुंचे तो उनको ब्लैक एंड व्हाइट फ्रेम में बादल नहीं मिले। वो बादल की तलाश में कोल्हापुर जा पहुंचे, वहां से बेलगाम लेकिन बादल मिले ऊटी पहुंचकर। सोचिए जरा एक शॉट की तलाश में कितने घंटे की यात्रा।
परफेक्ट शॉट और परफेक्ट प्रोफेशनल। बहुत कम लोगों को मालूम है कि ‘संगम’ फिल्म के लिए राज कपूर ने दिलीप कुमार को ऑफर दिया था जिसे करने से दिलीप साहब ने मना कर दिया था। ये वो दौर था जब दिलीप कुमार और राज कपूर के बीच प्रतिद्वंदिता थी। बावजूद इसके दोनों दोस्त थे। अपनी जिंदगी की आखिरी जंग लड़ रहे राज कपूर जब दिल्ली के एम्स के आईसीयू में थे तो दिलीप कुमार उनसे मिलने पहुंचे। राज कपूर अचेत थे। दिलीप कुमार ने उनका हाथ अपने हाथ में लिया और कहने लगे ‘उठ जा राज! अब उठ जा, मसखरापन बंद कर। तू तो हमेशा से बढ़िया कलाकार रहा है जो हमेशा हेडलाइंस बनाता है। मैं अभी पेशावर से आया हूं और चापली कबाब लेकर आया हूं। याद है राज हम बचपन में पेशावर की गलियों में साथ मिलकर ये स्वादिष्ट कबाब खाया करते थे।‘ बीस मिनट तक दिलीप कुमार बोलते रहे लेकिन शोमैन ने तो मानो ठान रखी हो कि अब वो नहीं बोलेगा।