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Monday, October 26, 2015

लेखकीय असहिष्णुता पर सवाल

समकालीन हिंदी साहित्य के अलावा अन्य भारतीय भाषाओं के साहित्यकारों के बीच देश में फैल रही असहिष्णुता और  कट्टरता के खिलाफ बहस चल रही है । देश में बढ़ रही कट्टरता और प्रधानमंत्री की चुप्पी को आधार बनाकर कई लेखकों ने साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने का एलान किया है । हलांकि पुरस्कार वापसी अभियान पर लेखक समुदाय बंटा हुआ है  । इस लेख का विषय पुरस्कार वापसी नहीं है । हम बात करेंगे लेखक समुदाय में अपनी रचना की आलोचना को लेकर बढ़ती असहिष्णुता पर, खास कर हिंदी लेखकों के बीच बढ़ रहीइस प्रवृत्ति पर।  समकालीन हिंदी साहित्य के परिदृश्य पर अगर हम बात करते हैं तो यह बात साफ तौर पर उभर कर सामने आती है कि कवियों से लेकर कथाकारों तक में अपनी आलोचना सुनने सहने की क्षमता का उत्तरोत्तर ह्रास हो रहा है । किसी भी कृति पर आलोचनात्मक टिप्पणी करने से पहले कई बार सोचना पड़ता है । अगर आप तर्क के साथ भी किसी कृति की स्वस्थ आलोचना करते हैं तो लेखक उसको अपनी आलोचना मानकर टिप्पणीकार से खफा हो जाते हैं । उसके बाद खफा लेखक इस ताक में रहते हैं कि रचना की आलोचना करनेवाले टिप्पणीकार से कैसे बदला चुकाया जाए। आलोचनात्मक टिप्पणी करनेवाले और रचनाकार के बीच बातचीत बंद हो जाना तो आम बात है । यह हिंदी साहित्य समाज में लेखकों के बीच बढ़ रही असिष्णुता का संकेत है । इसको सोशल मीडिया खासकर फेसबुक ने और हवा दी । फेसबुक पर आलोचकों को आमतौर पर निशाना बनाया जाता है और फिर माफिया की तरह घेरकर उसपर हमले होते हैं । आलोचक के अतीत से लेकर वर्तमान तक को खंगालकर उड़ेल दिया जाता है । घर परिवार, नातेदाऱ-रिश्तेदारों की बातें शुरू हो जाती हैं । कई मसले पर तो यह भी देखा गया है कि चरित्र हनन का खेल भी शुरू हो जाता है । सोशल मीडिया पर इसके पीछे की वजह साफ तौर पर रेखांकित की जा सकती है । आज इस वजह से हिंदी में समीक्षा की हालत बहुत खराब हो गई है । समीक्षक सत्य कहने से डरने लगे हैं । काफी पहले अपने एक लेख में हिंदी की वरिष्ठ आलोचक निर्मला जैन ने भी इस बात का संकेत किया था । कालांतर में कई लेखकों ने लेखकों के बीच बढ़ती इस असहिष्णु प्रवृत्ति को पुख्ता किया ।  आज ज्यादातर लेखकों की अपेक्षा होती है कि उनकी रचनाओं को कालजयी इत्यादि घोषित कर दिया जाए । दो चार कहानी लिखकर, एकाध संग्रह छपवाकर, दंद-फंद से पुरस्कार आदि हासिल करनेवाले कहानीकारों की अपेक्षा होती है कि उसकी कहानियों को प्रेमचंद की कहानियों के बराबर मान लिया जाए । अगर ये न हो सके तो कम से कम प्रेमचंद और रेणु की परंपरा का लेखक तो घोषित कर ही दिया जाए । इसी तरह से उपन्यासकारों की आकांक्षा होती है कि उनको भी रेणु, अमृतलाल नागर के बराबर ना भी माना जाए तो कम से कम कमलेश्वर, मोहन राकेश या फिर राजेन्द्र यादव के बराबर तो खड़ा कर ही दिया जाए । ऐसा नहीं होने पर बात बिगड़ने लगती है ।
लेखकों के बीच बढ़ती इस प्रशंसा-पिपासा के उदाहरण इस वक्त हिंदी में यत्र-तत्र-सर्वत्र मिल जाएंगे । इन दिनों हिंदी में व्हाट्सएप पर कई साहित्यक ग्रुप सक्रिय हैं । वहां भी आलोचना की कोई गुंजाइश नहीं है । अगर आप व्हाट्सएप पर चलनेवाले समूहों के सदस्य हैं तो आपतो इस बात का अंदाज होगा कि वहां किस तरह से तू पंत मैं निराला का दौर चलता है । खुदा ना खास्ता अगर किसी ने किसी रचना पर सवाल खड़े कर दिए तो उनकी खैर नहीं । आपको नकारात्मक सोच से लेकर हर वक्त मीन मेख निकालनेवाला करार दे दिया जाएगा । फेसबुक आदि की तरह इन समूहों में भी लेखक संगठित होकर आलोचना करनेवालों पर वार करते हैं और उसको इतना अपमानित करते हैं कि वो समूह छोड़ने पर मजबूर होता है । अगर फिर भी हिम्मत करके आलोचनात्मक टिप्पणी करनेवाला शख्स इन समूहों में बना रहता है तो गाहे बगाहे उसके विकेक पर सवाल खड़ा किया जाता रहता है । अपनी आलोचना ना सहने की प्रवृत्ति का विकास हाल के दिनों में युवा लेखकों के बीच वायरल की तरह फैला है । अब अगर हम इसके पीछे के वजह की पड़ताल करें तो पाते हैं कि सोशल मीडिया के फैलाव और फेसबुक के लाइक बटन ने रचनाकारों की अपनी आलोचना सुनने की क्षमता ही विकसित नहीं होने दी । कोई भी रचनाकार फेसबुक पर अपनी रचना डालता है तो उसको सौ दो सौ लोग लाइक कर देते हैं । सौ पचास टिप्पणियां वाह वाह के मिल जाते हैं । लेखकों को यह लगने लगता है कि वो हिंदी का महान लेखक हो गया । इस मानसिकता से गुजर रहे लेखक का समाना जब आलोचनात्मक टिप्पणी से होता है तो वो इसको बर्दाश्त नहीं कर पाता है और टिप्पणीकार को अपनी सफलता की राह में बाधा की तरह देखने लगता है । फिर वो वही सारे काम करता है जो कोई भी अपनी राह के रोड़े को हटाने के लिए करता है । इसके अलावा हिंदी में थोक के भाव बंट रहे पुरस्कारों ने भी कई युवा लेखकों का दिमाग खराब कर दिया है । जुगाड़ से हासिल पुरस्कार को वो अपने लेखन से जोड़कर छद्म की जमीन पर खड़ो होना चाहता है । छद्म की जमीन को सबसे बड़ा खतरा आलोचना या समीक्षा से ही रहता है ।

आज अगर हिंदी में समीक्षा पर सवाल उठ रहे हैं तो उसके पीछे की वजहों को जानने की जरूरत है । एक वजह तो यही है जिसपर उपर विस्तार से लिखा गया । समीक्षक खुलकर अपनी बात कहने से घबराने लगे हैं । कोई भी अपने व्यक्तिगत रिश्ते खराब नहीं करना चाहता है । नतीजा यह होता है कि किताब के बारे में परिचयात्मक लेख लिखे जाते हैं । पहले लेखक के बारे में एक पैरा फिर किताब का सारांश और अंत में बगैर कुछ कहे या फिर बीच का रास्ता निकालते हुए समीक्षक अपनी बात खत्म कर देता है । यह स्थिति हिंदी साहित्य के लिए अच्छी नहीं है । लेखकों के बीच बढ़ रही असहिष्णुता से एक विधा पर उसके खत्म होने का खतरा मंडराने लगा है । इसको बचाने की आवश्यकता है । लेखकों को उदार और सकारात्मक तरीके से स्वस्थ आलोचना का स्वागत करना चाहिए । अगर किसी समीक्षक ने तर्कों के साथ अपनी बात रखी है तो उसकी बातों का सम्मान होना चाहिए । विमर्श हो तो और भी बेहतर है ।  

Sunday, March 22, 2015

आलोचना पर सवाल

शुक्रिया तुम्हारा । निर्मला जी ( निर्मला जैन) या मर्दतंत्र के कुछ समर्थक अपने विद्वतापूर्ण भाषण से मेरे उपन्यास ‘चाक’ की बिक्री और पाठकों में ऐसे ही इजाफा कर देते हैं जैसे किरन बेदी का एक इंटरव्यू ‘आप’ की कई सीटों पर जीत मुकर्रर कर देता था । संदर्भ साहित्य गोष्ठियां । ये लिखा है हिंदी की वरिष्ठ लेखिका और उपन्यासकार मैत्रेयी पुष्पा ने अपने फेसबुक वॉल पर । अब इस फेसबुक पोस्ट में जिस तरह से तुलना की गई है वह बेहद दिलचस्प है । एक उपन्यासकार यानी मैत्रेयी पुष्पा ने एक आलोचक को एक राजनीतिक शख्सियत के बरक्श खड़ा कर दिया । अपने उपन्यास को दिल्ली की आम आदमी पार्टी की सफलता से जोड़ते हुए उन्होंने आलोचक निर्मला जैन को किरन बेदी से जोड़ दिया । आलोचक निर्मला जैन पर तंज कसते हुए मैत्रेयी ने साफ कर दिया कि उनकी आलोचनाओं से उनके उपन्यास की बिक्री और पाठक दोनों में इजाफा होता है । उपर से देखने पर यह बात छोटी और सामान्य लगती है लेकिन अगर हम गहराई से समकालीन साहित्यक परिदृश्य पर नजर डालें तो मैत्रेयी ने अपने तंज के माध्यम से बड़े सवाल खड़े किए हैं । अब अगर उनके शब्दों पर गौर करें निर्मला जी या मर्दतंत्र के कुछ समर्थक । मैत्रेयी ने अपने शब्दों से हिंदी आलोचना को कठघरे में खड़ा किया है । उन्होंने अपने उपन्यास के आलोचना के बहाने से वरिष्ठ आलोचकों की वाचिक परंपरा पर भी सवाल खड़ा किया है । दो तीन साल पहले ही निर्मला जैन ने आलोचना के वर्तमान परिदृश्य पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि किसी कृति पर सच कहने में डर लगता है क्योंकि लेखक बुरा मान जाते हैं । ये बात स्मृति के आधार पर लिखी जा रही है लिहाजा शब्दों का हेरफेर हो सकता है लेकिन भाव बिल्कुल वही हैं । अब देखिए निर्मला जी ने जाने अनजाने वर्तमान आलोचना की स्थिति को अपने इस वक्तव्य से सामने रख दिया । सवाल तब भी उठे थे और सवाल अब भी उठे हैं कि हिंदी आलोचना क्या इतनी डरपोक हो गई है कि वो लेखकों के नाराज हो जाने के डर से कृतियों पर टिप्पणी करना छोड़ देगी । क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात नहीं कही जाएगी । दरअसल अगर हम समकालीन साहित्य के पिछले बीस तीस साल के परिदृश्य पर नजर डालते हैं तो कथा आलोचना के नाम पर लगभग सन्नाटा दिखाई देता है । आलोचना के नाम पर समीक्षात्मक लेख लिखे जा रहे हैं जिनमें कृतियों पर परिचयात्मक लेख होते हैं । तिस पर से आलोचकों का तुर्रा ये कि वही हिंदी साहित्य की दशा और दिशा तय करते हैं । आलोचकों की इस प्रवृत्ति को कई लेखकों ने भी बढ़ावा दिया जब वो फैरी सफलता और चर्चा के लिए आलोचकों के आगे हाथ बांधे खड़े होने लगे । आलोचकों में जैसे जैसे यह प्रवृत्ति बढ़ी तो होने यह लगा कि हिंदी में उखाड़-पछाड़ का खेल शुरू हो गया । सबने अपने अपने गढ और मठ बना लिए और आलोचक मठाधीश की भूमिका में आ गए । सेंसेक्स की तरह कृतियों को उठाने और गिराने का खेल शुरू हो गया । साहित्य बाजार में तब्दील हो गया । नामवर जी ने हिंदी में आलोचना की जिस वाचिक परंपरा को आगे बढ़ाया उसको कई लोगों ने लपक लिया । बजाए गंभीर अध्ययन, मनन और चिंतन के इस परंपरा को आगे बढ़ाने से हिंदी आलोचना की छवि को ठेस लगी है । नामवर जी का तो अध्ययन इतना गहरा है कि वो जब कुछ कहते हैं तो उसमें एक संदर्भ भी होता है और मूल्यांकन की दृष्टि भी होती है । नामवर सिंह जिस तरह से लगातार नई पीढ़ी के लेखन से खुद को अपडेट करते हैं वह उनकी ताकत है । लिहाजा जब वो बोलते हैं तो पूरा हिंदी साहित्य सुनता है । नामवर जी ने कहीं कहा भी है- ‘मुझ पर अक्सर यह आरोप लगाया जाता है कि आलोचना में मैं रणनीति अपनाता हूं । यह भी कहा जाता है कि यदि मैं किसी लेखक का नाम ले लूं या उसके बारे में कुछ कह हूं तो वह मुख्यधारा में स्थापित हो जाता है । जिसे छोड़ देता हूं वह यूं ही पड़ा रहता है । दरअसल राजनीति में तो हाशिए पर चले जाने से नुकसान होता है पर साहित्य में हाशिया बहुत महत्वपूर्ण होता है । हमने देखा है कि हिंदी ही नहीं, उर्दू और प्राय: सभी भाषाओं में जो लेखक हाशिए पर रहे थे, आज महत्वपूर्ण लेखक हैं । त्रिलोचन, नागार्जुन, शमशेर बहादुर सिंह की बात छोड़ भी दें तो निराला और गालिब के साथ यही हुआ । प्रसिद्ध अंग्रेजी कवि मिल्टन ने तो लिखा भी है – दे ऑल्सो सर्व हू स्टैंड एंड वेट ।‘  नामवर सिंह के उनके बाद की पीढ़ी के आलोचक इस हैसियत को हासिल नहीं कर पाए,खासकर कथा आलोचना में तो बिल्कुल ही नहीं ।  हाशिए को महत्वपूर्म बताना कोई हंसी ठट्ठा नहीं है यह तो अनुभव और अध्ययन से ही संभव है  ।

अब अगर हम मैत्रेयी पुष्पा के कथन पर गौर करें तो वो आलोचना में उन लोगों पर भी निशाना साधती हैं जो मर्दतंत्र के समर्थक हैं । फेसबुक पोस्ट पर मैत्रेयी पुष्पा से कई लोगों ने यह जानने की भी कोशिश की ये मर्दतंत्र समर्थक कौन हैं । जवाब नहीं मिला। अपनी रचनाओं की नायिकाओं के माध्यम से स्त्री विमर्श के नए आयाम गढ़नेवाली मैत्रेयी पुष्पा जब आलोचना में मर्दतंत्र की बात करती हैं तो वो बड़े सवाल खड़ी करती हैं । हिंदी आलोचना में मर्दतंत्र के उन समर्थकों की पहचान होनी चाहिए । इस पहचान की तलाश में अगर आगे बढ़ते हैं तो मर्दतंत्र की जड़ें देशभर के हिंदी विश्वविद्लायों के हिंदी विभागों के आचार्यों के कमरों में मिलती हैं । इन कमरों में बैठे आचार्य विद्वान आलोचक है । विद्वान आलोचक( स्कॉलर क्रिटिक) शब्द पहली बार ऑक्सफोर्ड युनिवर्सिटी से निकलनेवाले जर्नल- एसेज ऑन क्रिटिसिज्म, में सामने आया था और एफ डब्ल्यू वीटसन ने इसका प्रयोग किया था । हमारे देश के विश्वविद्यालयों के हिंदी विभागों में बैठे आलोचक सच में स्कॉलर क्रिटिक यानी विद्वान आलोचक हैं, उनसे पाठालोचन की अपेक्षा ठीक है, वो किताबों का संपादन कर सकते हैं लेकिन उनसे सर्जनात्मक आलोचना की अपेक्षा नहीं की जा सकती है । हिंदी विभागों के ये स्कॉलर क्रिटिक अपनी महत्ता साबित करने और अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए बहुधा बयानों का सहारा लेते रहते हैं । हिंदी विभागों के इन आलोचकों का समकालीन साहित्य के भी वास्ता रह गया हो, ऐसा प्रतीत नहीं होता । उनके लिए डॉ रामविलास शर्मा आदर्श हैं जो कहा करते थे कि वो दूसरों का लिखा नहीं पढ़ते हैं । पढ़े बगैर अपने पूर्व के अध्ययन के आधार पर ज्ञान देकर आज के आलोचक अपने आपको ही एक्सपोज करते हैं । अब वक्त आ गया है कि हिंदी आलोचना खासकर कथा आलोचना के बारे में उसके औजारों और सिद्धांतों के बारे में गंभीरता से विचार हो । मार्क्सवादी आलोचना के औजार भोथरे हो चुके हैं । दुनिया की अलग अलग भाषाओं में आलोचना की सैद्धांतिकी पर गंभीर बातें होती रही हैं, नए नए औजार विकसित किए जा रहे हैं जिसके अच्छे परिणाम भी आ रहे हैं । पश्चिम में फेमिनिस्ट क्रिटिसिज्म ने शेक्सपीयर को नए सिरे से एक नई दृष्टि के साथ उद्घाटित किया । वहां से होते हुए जब ये स्त्री विमर्श के रूप में हिंदी साहित्य में पहुंचा तो राजेन्द्र यादव ने उसको एक अलग ही दिशा में मोड़ दिया । स्त्री विमर्श के आदार पर किसी रचना का समग्रता से मूल्यांकन नहीं सका क्योंकि हमने स्त्री विमर्श के नाम पर कुछ और ही शुरू किया । ये कुछ ऐसा था जिसमें विमर्श नाम का रह गया । आज की आलोचना के सामने सबसे बड़ा संकट अपने साख को बचाए रखने की है । आलोचकों को एक ऐसी दृष्ठि विकसित करनी होगी जिससे वो रचनाकारों की तरह से कृतियों के पार जाकर उसको देख सकें । आलोचकों के सामने ये संकट होता है कि वो रचनाकारों की तरह रचना के पार जाकर देख नहीं पाते हैं वो तो पाठके आधार पर अपनी दृष्टि गढ़ते हैं और फिर उसी गढ़ी हुई दृष्टि के आधार पर रचनाओं का मूल्यांकन करते हैं । इसका नतीजा यह होता है कि बहुधा आलोचक कृतियों को खोलने से चूक जाते हैं और जबतक इस चूक को सुधारा जाता है या उसकी कोशिश होती है तबतक बहुत देर हो चुकी होती है । अब भी वक्त है कि आलोचना अपनीएक नई शैली नई दृष्टि विकसित करे और व्यक्तिगत आग्रहों और दुराग्रहों से उपर उठकर रचना को रचना के स्तर पर देखें और उसका मूल्यांकन करें ।इससे कम से कम आलोचना की साख तो बची रहेगी ।और अगर साख बची रहेगी तो फिर एरक विधा के रूप में और मजबूत और समकालीन होने में देर नहीं लगेगी ।