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Thursday, February 20, 2020

पुरस्कार से उठते विवादों के बोल


हिंदी फिल्मों के लंबे इतिहास में पुरस्कारों को लेकर विवाद उठते रहे हैं। ताजा विवाद उठा है गीतकार मनोज मुंतशिर के एक फैसले से। इस वर्ष के फिल्मफेयर अवॉर्ड की घोषणा के बाद मनोज मुंतशिर ने ट्वीटर पर ये एलान किया कि वो अब किसी अवॉर्ड फंक्शन का हिस्सा नहीं होंगे। ऐसा प्रतीत होता है कि वो इस बात से खफा हो गए कि फिल्म ‘केसरी’ के लिए लिखे उनके गीत की बजाए ‘गली बॉय’ के गीत ‘अपना टाइम आएगा’ को फिल्मफेयर अवॉर्ड से पुरस्कृत कर दिया गया। मनोज इतने क्षुब्ध हो गए कि उन्होंने यहां तक कह दिया कि अगर वो अब भी अवॉर्ड का ध्यान रखते हैं तो ये उनकी कला का अपमान होगा। मनोज मुंतशिर अपने लिखे गीत को पुरस्कृत गीत से बेहतर मानते हैं इस वजह से दुखी हैं। उन्होंने अपने दुख को सार्वजनिक भी किया, बाद में उनका एक बयान भी प्रकाशित हुआ कि पूरा देश उनके साथ खड़ा है और गीत ‘तेरी मिट्टी’ किसी भी पुरस्कार से परे है। मनोज मुंतशिर ने जिस तरह से पूरे मसले को सामने रखा उसको देखते हुए मुझे यतीन्द्र मिश्र की पुस्तक लता सुरगाथा का एक प्रसंग याद आ गया जिसमें लता जी कहती हैं ‘आपसे एक दिल की बात शेयर कर रही हूं, वह यह कि मुझे पूरी उम्मीद थी कि ‘वो कौन थी’ के लिए मदन मोहन को फिल्मफेयर पुरस्कार मिलेगा। उनको वह नहीं मिला, इसके लिए मुझे व्यक्तिगत तौर पर बहुत दुख हुआ था। मैंने मदन भैया से उनके घर जाकर यह व्यक्त भी किया था कि ‘मुझे उम्मीद थी कि ये पुरस्कार इस साल आपको मिलेगा, मगर नहीं मिला। इसपर मदन भैया ने मुझसे कहा था, लता! तुमको अगर यह लगता है कि मुझको ये पुरस्कार मिलना चाहिए था और तुम्हें इस बात से तकलीफ है कि मुझे यह नहीं मिला, तो समझ लो कि मुझे यह पुरस्कार आज मिल गया। इससे बड़ा पुरस्कार मेरे लिए क्या होगा कि तुम्हें लगता है और न मिलने का दुख है।‘  मनोज का लिखा गीत भी देश के लाखों लोगों को पसंद है यही उनका पुरस्कार है।
फिल्मफेयर अवॉर्ड को लेकर हमेशा से विवाद होते रहे हैं और हिंदी फिल्मों से जुड़े ज्यादातर लोगों को इसकी हकीकत पता भी है। इस हकीकत को ऋषि कपूर ने अपनी आत्मकथा खुल्लमखुल्ला में बयां भी किया है। अपने और अमिताभ बच्चन के संबंधों पर ऋषि कपूर ने लिखा है कि फिल्म कभी-कभी की शूटिंग के दौरान उनके और अमिताभ के बीच शीतयुद्ध जैसी स्थिति थी और दोनों में बातचीत भी नहीं होती थी। ऋषि को लगता था कि अमिताभ इस बात से खफा थे कि ऋषि को ‘बॉबी’ फिल्म के लिए फिल्मफेयर अवॉर्ड मिला था क्योंकि उनको लगता था कि उसी साल रिलीज हुई फिल्म ‘जंजीर’ के लिए ये पुरस्कार उनको मिलना चाहिए था। ऋषि कपूर ने असली कहानी इसके बाद बताई, ‘दरअसल वो पुरस्कार मैंने खरीदा था, मैं अनुभवहीन था और मेरा एक पीआरओ था तारकनाथ गांधी, उसने मुझसे कहा कि सर तीस हजार दे दो तो आपको मैं अवॉर्ड दिला दूंगा। मैंने बगैर कुछ सोचे समझे उसको तीस हजार दे दिए। तब मेरे सेक्रेटरी घनश्याम ने भी मुझे कहा था कि सर देते हैं, मिल जाएगा अवॉर्ड इसमें क्या है।‘ तीस हजार रुपए देने के बाद उस साल का फिल्मफेयर अवॉर्ड ऋषि कपूर को मिल गया। बाद में किसी ने अमिताभ बच्चन को सारी बातें बता दीं। ऋषि कपूर के फिल्मफेयर पुरस्कार खरीदने की बात जानकर अमिताभ नाराज हो गए थे। इस तरह से देखा जाए तो फिल्मफेयर अवॉर्ड की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर पहले भी सवाल उठते रहे हैं। मनोज मुंतशिर जो बात कहते हैं कि उनके गीत पुरस्कारों से परे हैं तो उसको ही सार्वजनिक जीवन में जीना भी चाहिए।   



Saturday, August 24, 2019

बहिष्कार से नहीं संवाद से बनेगी बात


लगभग एक पखवाड़े पहले पटना में रहनेवाले हिंदी के उपन्यासकार रत्नेश्वर ने फेसबुक पर एक टिप्पणी लिखी, ‘इस समय हिन्दी के कई सुपर हिट गीत लिखने वाले मनोज मुंतशिर के साथ एक शाम। मनोज मुंतशिर ने ‘तेरी गालियां’ से लेकर ‘तेरे संग यारा’, ‘मेरे रश्के-कमर’ आदि अनेक लोकप्रिय गीत लिखे हैं। इनके गीत अभी क्या हिन्दी और क्या अहिन्दी सबकी जुबान पर चढ़े हुए हैं। ‘कलम’ श्रृंखला के अंतर्गत चाणक्य होटल में मनोज मुंतशिर मुखातिब थे। कार्यक्रम खत्म होने के बाद कार्यक्रम संयोजक एवं संचालिका अन्विता प्रधान मेरे पास आईं और मुझे धन्यवाद देते हुए कहा- 'आपका धन्यवाद कि आप आए। अन्यथा हिन्दी के एक भी प्रतिष्ठित लेखक का नहीं आना खटकता।‘ अब सवाल यह है कि हिन्दी का ढिंढोरा पीटने वाले, हिन्दी से यश पाने वाले, हिन्दी का पुरस्कार लेनेवाले स्वनामधन्य लेखक इसमें शामिल क्यों नहीं हुए! हिन्दी के गंभीर लेखक हिन्दी सिनेमा को स्तरहीन मानते हैं और उसे अपने साहित्य के बराबर का दर्जा नहीं देते। यह आज से नहीं हमेशा से है। जिस सिनेमा ने हिन्दी को हिन्दी भाषी क्षेत्रों में ही नहीं अहिन्दी आमजन तक पहुंचाने में जबरदस्त भूमिका निभाई। वह हमारे लिए अछूत जैसा क्यों है? हिन्दी के गंभीर लेखकों का अपना महत्त्व है पर भाषा को जन-जन तक पहुंचाने का काम हिन्दी सिनेमा ने उनसे कहीं ज्यादा किया है। अन्यथा संस्कृत के तो एक-से-एक प्रकांड विद्वान हमारे बीच रहे हैं पर वह क्यों आमजन के बीच सिर्फ मंत्रों में सिमट कर रह गई। हिन्दी की सर्वमान्य समृद्धि चाहिए तो सबको समान दर्जा देना ही होगा। अहिन्दी भाषियों की टूटी फूटी हिन्दी के उपहास से भी बचना होगा। अन्यथा ढोल पीटते रह जाएंगे और हिन्दी संस्कृत की राह चल पड़ेगी। रत्नेश्वर की टिप्पणी के उत्तरार्ध से असहमि होते हुए मुझे लगा कि फिल्म को लेकर तथाकथित गंभीर साहित्याकारों के मन में जो उपेक्षा भाव की बात उन्होंने की है उसको रेखांकित किया जाना आवश्यक है। पटना के कथित गंभीर साहित्यकारों की ‘कलम’ कार्यक्रम में अनुपस्थिति की रत्नेश्वर की टिप्पणी का वरिष्ठ लेखिका उषाकिरण खान ने प्रतिवाद किया। ठीक किया, लेकिन ‘कलम’ के हर कार्यक्रम में जिनकी आवश्यक उपस्थिति होती है उन सभी का ना होना रत्नेश्वर की आशंका को पुष्ट ही करता है। मनोज मुंतशिर हमारे दौर के महत्वपूर्ण कवि-गीतकार हैं। उनकी कविताओं का संग्रह जागरण बेस्टसेलर की सूची में शामिल हो चुका है। उनके गीत तो लोकप्रिय होते ही हैं। उनके कार्यक्रम में पटना के कथित गंभीर साहित्यकारों का ना आना साहित्यकारों के अहंकार को भी दर्शाता है। ये ऐसा अहंकार है जो आपको अघोषित बहिष्कार करने के लिए बाध्य करता है। जब आप किसी का बहिष्कार करते हैं तो आप संवाद बाधित करते हैं। संवाद बाधित होने से लोकतंत्र कमजोर होता है। लेकिन विचारधारा विशेष के लेखकों को लोकतंत्र से क्या देना वो तो विदेशों में बैठे अपने आकाओं के इशारे पर साहित्यिक कदमों को भी तय करते हैं। यह अलग बात है कि अब उनके विदेशी आका थोड़े कमजोर हो गए हैं और दिशा निर्देश के साथ धन नहीं भेज पाते हैं तो उनके समर्थक थोड़े उदासीन हो गए हैं। लेकिन अंग्रेजी की एक कहावत है न कि पुरानी आदतें देर से जाती हैं, तो ये भी अबतर पुरानी आदतों से उबर नहीं पाए हैं। मनोज मुंतशिर के कार्यक्रम को लेकर पटना के साहित्यकारों की उदासीनता खेदजनक है। खास तौर पर उन लेखकों की उदासीनता जो बिना नागा कलम के कार्यक्रम में उपस्थित रहते थे। इस तरह की कई टिप्पणी रत्नेश्वर के पोस्ट पर भी है।
आजकल वामपंथियों के प्रिय लेखक अशोक वाजपेयी भी फिल्मों पर या फिल्मी शख्सियतों पर लेखन को दोयम दर्जे का ही मानते रहे हैं, कुमार शाहनी जैसे फिल्मकारों को छोड़कर ।एक सम्मान समारोह में उन्होंने लता पर लिखी किताब के बारे में बेहद हल्की टिप्पणी की थी। यह एक प्रकार का आभिजात्य भी है। एक बार अशोक वाजपेयी ने ज्ञानपीठ पुरस्कार समारोह में अमिताभ बच्चन को बुलाने को लेकर भी तंज किया था। तब भी खासा विवाद हुआ था। लेकिन अशोक वाजपेयी यह भूल जाते हैं कि अमिताभ बच्चन का अभिनय कला में तो अप्रतिम योगदान है ही हिंदी के प्रचार प्रसार में भी वो किसी भी साहित्यकार से अधिक योगदान कर रहे हैं। अमिताभ बच्चन इस बात पर जोर देते हैं कि उनको स्क्रिप्ट देवनागरी में दी जाए जबकि बॉलीवुड में ज्यादातर स्क्रिप्ट रोमन में लिखी जाती हैं। इसी तरह से भोपाल में आयोजित विश्व हिंदी सम्मेलन में अमिताभ को बुलाए जाने पर हिंदी के लेखकों ने बहुत अनाप शनाप लिखा था। सोशल मीडिया पर बेहद सक्रिय एक अध्यापक-लेखक ने उस समय लिखा था कि- हिंदी साहित्य में अभिनेता अमिताभ बच्चन के योगदान के बारे में गूगल से लेकर राष्ट्रीय पुस्तकालय तक पर कहीं कोई रचना नहीं मिलेगी । इसके बावजूद उनको मोदी सरकार ने दसवें विश्व हिंदी सम्मेलन के समापन सत्र में आमंत्रित किया ।यह संकेत है कि मोदी जी की निष्ठा साहित्य में नहीं मुंबईया सिनेमा में है।‘  अब इतने विद्वान लेखक को क्या बताया जाए कि ये विश्व हिंदी साहित्य सम्मेलन नहीं था । मैं यह मानकर चलता हूं कि उनको इतना तो ज्ञान होगा ही कि साहित्य और भाषा में थोड़ा फर्क तो है । रही बात अमिताभ बच्चन के हिंदी साहित्य में योगदान की तो ना तो अमिताभ बच्चन ने और ना ही उस वक्त की सरकार ने कभी ये दावा किया था कि बच्चन साहब बड़े साहित्यकार हैं । पर हिंदी के प्रचार प्रसार को लेकर अमिताभ के प्रयास सराहनीय है । वयोवृद्ध फिल्मी गीतकार गुलजार की भी यही पीड़ा है कि हिंदी साहित्य जगत के कथित गंभीर आलोचक और कवि उनको कवि नहीं मानते। गुलजार की ये पीड़ा तो कई बार सार्वजनिक रूप से झलक भी जाती है। दरअसल ये हिंदी के इस तरह के लेखक ये समझ नहीं पा रहे हैं कि हिंदी फिल्मों और टेलीविजन सीरियलों ने उनकी भाषा को कितना विस्तार दिया। मुझे याद है कि 2012 में जोहिनसबर्ग में विश्व हिंदी सम्मेलन हुआ था। जोहिनसबर्ग में जिस टैक्सी से हमलोग एयरपोर्ट से होटल जा रहे थे उसका ड्राइवर वहां के लोकल एफएम चैनल लोटस पर हिंदी के गाने सुन रहा था। जब मैंने उन, पूछा कि क्या वो हिंदी गाने सनझते हैं तो उसने अंग्रेजी में उत्तर दिया था कि ‘वी डोंट अंडरस्टैंड हिंदी बट वी एंजॉय हिंदी सांग्स।‘ कोई भी भाषा जब किसी दूसरी भाषा के लोगों को आनंद देने लगे तो समझिए कि उस भा। की संप्रेषणीयता अपने उरूज पर है। विष्व हिंदी सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में मॉरिशस के उस वक्त के कला और संस्कृति मंत्री चुन्नी रामप्रकाश ने भी ये माना था कि हिंदी के प्रचार प्रसार में बॉलीवुड फिल्में और टीवी पर चलनेवाले हिंदी सीरियल्स का बड़ा योगदान है। उन्होंने सभा को हिंदी में संबोधित कर मजमा तो लूटा ही था, वहां मौजूद सभी लोगों का दिल भी जीत लिया था। चुन्नी रामप्रकाश ने सार्वजनिक तौर पर स्वीकार किया था कि उनकी जितनी भी दक्षता हिंदी में है वो हिंदी फिल्मों और टीवी की बदौलत। लेकिन हिंदी के कथित गंभीर साहित्यकार इस बात को कभी नहीं मानते। उनका तो तर्क ये होता है कि हिंदी सीरियल्स और सिनेमा में उपयोग में लाई जानेवाली भाषा हिंदी का नाश कर रही है। इस तरह की धारणा हिंदी की सबसे बड़ी शत्रु है।
हिंदी सिनेमा एक गंभीर विधा है और सिनेमा पर लेखन रचनात्मक साहित्य की श्रेणी में आता है। सिनेमा के लिए लिखनेवाले भी उतना ही महत्वपूर्ण काम कर रहे हैं जितना कथित तौर पर गंभीरता से उपन्यास या कविता लिखने वाले हिंदी के लेखक या कवि। हिंदी के प्रचार प्रसार में फिल्मों का बहुत योगदान है । दरअसल फिल्मी कलाकारों को लेकर हिंदी के वामपंथी लेखक कभी संजीदा नहीं रहे । फिल्म वालों को बुर्जुआ संस्कृति का पोषक मानकर उनकी लगातार उपेक्षा की जाती रही । हिंदी फिल्मों के बड़े से बड़े गीतकार को हिंदी का कवि नहीं माना गया जबकि विचारधारा का झंडा उठाकर घूमनेवाले औसत कवियों को महान घोषित कर दिया गया । मनोज मुंतशिर के कार्यक्रम में कथित गंभीर साहित्यकारों का नहीं आना इसी मानसिकता का प्रकटीकरण था। आज जरूरत इस बात की है कि वामपंथी विचारधारा के लेखकों को किसी को भी अस्पृश्य मानने की अपनी मानसिकता से बाहर निकलें, हर तरह की विधा को महत्व दें और हर तरह की विचारधारा के साथ संवाद करें। अस्पृश्यता के सिद्धांत को अपनाकर वामपंथियों ने अबतक अपना बहुत नुकसान कर लिया है और अगर वक्त रहते नहीं चेते तो नुकसान भी नदी के कटान की तरह तेजी से उनकी बची-खुची जमीन को लील जाएगा।

Wednesday, May 15, 2019

लड़खड़ाते बिंब से लूट ली महफिल


साहित्य और फिल्म का बहुत पुराना नाता रहा है। फिल्म भुवन शोम और सारा आकाश से सार्थक या समांतर सिनेमा की शुरुआत मानी जाती है। राजेन्द्र यादव भले ही आगरा में पैदा हुए लेकिन शोहरत के शिखर पर वो दिल्ली में रहते हुए ही पहुंचे। उनके उपन्यास सारा आकाश पर इसी नाम से फिल्म बनी। प्रेमचंद से लेकर अमृतलाल नागर और गोपाल सिंह नेपाली से लेकर पंडित नरेन्द्र शर्मा ने तक फिल्मों में अपने हाथ आजमाए। पहले ये होता था कि कवि के तौर पर स्थापित होने के बाद फिल्मों में हाथ आजमाते थे अब फिल्मों में गीत लिखकर शोहरत और सुर्खियां बटोरने के बाद हिंदी कविता में अपना स्थान तलाशते हैं। इस तलाश को गुलजार से लेकर जावेद अख्तर और प्रसून जोशी से लेकर मनोज मुंतशिर तक के लेखन में रेखांकित किया जा सकता है। हाल ही में दिल्ली में गीतकार मनोज मुंतशिर एक कार्यक्रम में आए थे। इस कार्यक्रम में हिंदी कविता की दुनिया से लगभग अपरिचित और अंग्रेजी की दुनिया में विचरण करनेवाले श्रोता उपस्थित थे। अंग्रेजी के लोग जब हिंदी में या फिर अंग्रेजी-हिंदी मिलाकर बात करते हैं तो हिंदी के लिए एक सुखद दृश्य उपस्थित होता है। इस कार्यक्रम में जो माहौल था वो हिंदी के लिए आश्वस्त करनेवाला था। कार्यक्रम की शुरुआत में मनोज मुंतशिर के परिचय के ऑडियो-वीडियो में उनको हिंदी फिल्मों में कविता की वापसी करनेवाला बताया गया। फिल्मी अंदाज में उनकी एंट्री हुई। जोरदार तालियों से स्वागत हुआ। उसके बाद कविता और शायरी पर बातें शुरू हुईं। बातचीत में ऐसा लगा कि मनोज महफिल लूटने की कला में माहिर हैं।
लेकिन जब बात कविता की होगी, हिंदी फिल्मों में कविता की वापसी की होगी तो कई प्रश्न भी उठेंगे। कविता के व्याकरण और उसके बिंबों पर बात होनी चाहिए लेकिन मनजो ने जब अपने पहले प्यार की बात उठाई तो कहा कि वो बारहवीं में थे। दो साल के बाद जब उनकी प्रमिका ने अपने पापा के नाराज होने की वजह बताकार उनसे अपने प्रेमपत्र और फोटो वापस मांगे तो मनोज ने शायरी लिखी जिसमें प्रमिका से अपनी जवानी लौटाने की बात करने लगे। यहीं बिंब का घालमेल हो गया। किशोरवस्था के प्रेम के टूट जाने के बाद अपनी प्रेमिका से जवानी वापस मांगकर कवि ने ज्यादती कर दी। मनोज की कविताई में बार बार बिंबों का खिलवाड़ देखने को मिला। इसी तरह उन्होंने जोश में साहिर लुधियानवी के गीतों के पहले हिंदी फिल्मों मजाक उड़ाया। उन्होंने कहा कि साहिर के पहले हिंदी फिल्मों के गीतों में फूल-पत्ती, मौसम आदि होते थे जिसे साहिर ने अपने गीतों से बदला । यहां वो हिंदी फिल्मों के केदार शर्मा, पंडिच नरेन्द्र शर्मा जैसे गीतकारों की परंपरा भूल गए लेकिन साहिर की शायरी सुनाकर मजमा तो लूट ही लिया। वहां मौजूद एक साहित्यकार ने कहा भी कि महफिल लूटना एक बात होती है और बौद्धिक उपस्थिति अलग।