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Saturday, July 13, 2024

हिटलर से बड़ा तानाशाह स्टालिन


लोकसभा चुनाव परिणाम के बाद से फेसबुक पर हिंदी साहित्य से जुड़े लोगों ने ऐसा स्तरहीन विवाद छेड़ा हुआ है जिससे साहित्य जगत शर्मसार हो रहा है। सतही, व्यक्तिगत और अश्लील टिप्पणियों की भरमार है। लोग एक दूसरे से अपनी खुंदक में किसी भी हद तक जा रहे हैं। हिंदी साहित्य से जुड़े युवा और नवोदित वृद्ध पीढ़ी के अनेक लेखक व्यक्तिगत कुंठा का सार्वजनिक प्रदर्शन करते हुए स्ततरहीन टिप्पणियां कर रहे हैं। इन टिप्पणियों से साहित्य जगत बजबजा रहा है। आभासी दुनिया के इस घटिया वातावरण में जनवादी लेखक संघ (जलेस) से जुड़े संजीव कुमार ने फेसबुक पर बहुत ही चतुराई से एक बहस को आरंभ करने का प्रयास किया। चतुराई इस कारण कि उन्होंने हिटलर और स्टालिन की तुलना करने के लिए एक पुस्तक के अनुदित अंश का हवाला दिया। हिटलर और स्टालिन को लेकर अंतराष्ट्रीय स्तर पर कई बार बहस हो चुकी है और हर बार निष्कर्ष यही निकला था कि दोनों क्रूर तानाशाह थे। परंतु यह माना जाता है कि वैचारिक मुद्दे बीस साल बाद हर पीढ़ी के सामने अपने अपने तरीके से रखे जाने चाहिए। इससे युवाओं के विचारों को प्रभावित करने और उसको गढ़ने में मदद मिलती है। कम्युनिस्ट प्रचारक बहुधा इस प्रविधि का उपयोग करते रहते हैं। अब भी कर रहे हैं। परंतु संजीव की इस बात के लिए प्रशंसा करनी चाहिए कि फेसबुक पर साहित्य को लेकर जिस तरह की गंदगी हो रही है उसमें उन्होंने एक वैचारिक मुद्दा तो उठाया। संजीव कुमार की इस टिप्पणी पर जिस प्रकार की प्रतिक्रिया आ रही है वो भी निराश ही करती है। वामपंथ से जुड़े छोटे और मंझोले लेखकों की उनकी पोस्ट पर टिप्पणियों को पढ़कर लगता है कि वो लहालोट हो रहे हैं 

अब हिटलर और स्टालिन की तुलना पर आते हैं। संजीव ने अनुवाद का अंश लगाने के पहले एक टिप्पणी लिखी- एक ही सांस में हिटलर और स्टालिन दोनों का नाम लेना इन दिनों बहुत आम है। कई उदारपंथी बुद्धिजीवियों ने तो बीच में ठीक-ठाक कोशिश की कि नरेंद्र मोदी के प्रसंग में बार-बार याद किये जाने वाले हिटलर को स्टालिन से रिप्लेस कर दिया जाए। इसे देखते हुए आइजक डाटशर की किताब ‘स्टालिन: अ पोलिटिकल बायोग्राफी’ का एक हिस्सा बहुत दिनों से अनुवाद करके साझा करना चाहता था। टलते-टलते आज संयोग बना है। जो लोग आइजक डाटशर से परिचित न हों, उनके लिए इतना जानना काफी होगा कि वे एक पोलिश मार्क्सवादी थे जो 1932 में वहां की कम्युनिस्ट पार्टी से निष्कासित हुए। 1939 में इंगलैंड चले गए और फिर आजीवन आत्मारोपित निर्वासन में ही रहे। वे ट्रोट्स्की के मुरीद थे और तीन खण्डों में उन्होंने ट्रोट्स्की की जो जीवनी लिखी है, वह आधुनिक क्लासिक मानी जाती है उससे पहले, 1949 में उन्होंने स्टालिन की जीवनी लिखी जो, जाहिर है, काफ़ी आलोचनात्मक है। यह अंश उसी के आखिरी अध्याय से है। अनुवाद का अंश लंबा है लेकिन संजीव उसके बहाने ये साबित करना चाहते हैं कि हिटलर की क्रूरता विध्वंस के लिए थी जबकि स्टालिन की निर्माण के लिए। अनुवाद में कहा गया है कि हिटलर जिस जर्मनी को छोड़कर गया वो दरिद्र और वहशी था। वहीं स्टालिन के शासनकाल में रूस का विकास हुआ। अब जरा इसकी पड़ताल करनी चाहिए। आगे बढ़ने से पहले ये देख लेते हैं कि हिटलर का कालखंड क्या था और स्टालिन का क्या था। हिटलर 1933-1939 तक सत्ता में रहा। जबकि स्टालिन ने 1924 से 1953 तक सोवियत रूस पर राज किया। यह भी ध्यान रखना चाहिए कि संजीव स्टालिन के संबंध में एक मार्क्सवादी लेखक का ही उद्धरण दे रहे हैं। 

असली कहानी तो इसी कालखंड में है। स्टालिन और हिटलर में कोई दुश्मनी नहीं थी। बल्कि कहा तो ये जाता है कि हिटलर ने बर्बरता के बहुत से तरीके जोसेफ स्टालिन से सीखे। जब हिटलर जर्मनी का चासंलर बना तबतक स्टालिन ने रूस में अपनी सत्ता की जड़ें काफी मजबूत कर ली थीं। दोनों एक दूसरे से बर्बरता और अधिकनायकवाद सीख रहे थे। अगर होलोकास्ट ब्रिटानिका को देखें तो पता चलता है कि 23 अगस्त 1939 में हिटलर और स्टालिन ने एक समझौता किया। इस समझौते पर जर्मनी और सोवियत रूस के विदेश मंत्रियों ने हस्ताक्षर किए। इस समझौते को हिटलर-स्टालिन समझौता कहा जाता है। हिटलर और स्टालिन के बीच हुए इस समझौते के दो भाग थे। एक भाग जो सार्वजनिक किया गया और दूसरे को गोपनीय रखा गया। जो भाग सार्वजनिक किया गया उसमें समझौता ये था कि दोनों देश एक दूसरे पर आक्रमण नहीं करेंगे। पर खतरनाक वो हिस्सा था जिसको उस समय गोपनीय रखा गया था। गोपनीय हिस्सा था पूर्वी यूरोप में दोनों देशों का दबदबा बनाना और पोलेंड का आपस में बंटवारा करना। ये समझौता दस वर्षों के लिए किया गया था और अगर दोनों में से किसी देश से आपत्ति नहीं आती तो अगले पांच वर्षों तक ये स्वत: बढ़ जाता । समझौते के एक ही सप्ताह बाद जर्मनी ने पोलैंड पर हमला कर दिया। युद्ध चल ही रहा था कि सोवियत रूस ने पूर्वी दिशा से पोलैंड पर हमला कर दिया। फिर दोनों ने गोपनीय समझौते के अनुसार पोलैंड को आपस में बांट लिया। कई इतिहासकार हिटलर को द्वितीय विश्वयुद्ध के लिए जिम्मेदार मानते हैं लेकिन कुछ लोग हिटलर-स्टालिन समझौते को विश्वयुद्ध की जमीन तैयार करनेवाला बताते हैं क्योंकि इस समझौते के बाद ही सोवियत रूस ने फिनलैंड, लातिविया आदि पर कब्जा किया। इससे ये साबित होता है कि स्टालिन और हिटलर में सहमति थी। दोनों ने पूर्वी यूरोप को आपस में बांट लेने पर सहमति जताई थी और उसके लिए समझौता भी किया था। 

अब रही बात देश के निर्माण और विध्वंस की। जर्मनी के विश्वविद्यालयों और विज्ञानियों को खत्म करने की बात होती है और हिटलर को जिम्मेदार बताया जाता है। ये बताते हुए वामपंथी लेखक इस बात को सुविधानुसार तरीके से भुला देते हैं कि हिटलर यहूदियों को समाप्त कर रहा था। उस समय के जर्मनी में शिक्षा, विज्ञान, साहित्य, मनोरंजन के क्षेत्र में यहूदियों का बोलबाला था। हिटलर को यहूदियों को मारना था तो जो उसके सामने आया मारा गया। इससे भी खतरनाक और बर्बर कार्रवाई तो स्टालिन ने की। 1937 में स्टालिन ने द ग्रेट पर्ज की आड़ में अपने राजनीतिक विरोधियों, किसानों का जो नरसंहार किया उसको नहीं भूलना चाहिए। स्टालिन इतने पर ही नहीं रुका था उसने तो जातीय नरसंहार किया जिसमें एक अनुमान के मुताबिक दस लाख से अधिक लोगों का कत्ल किया गया। देश के बाहर निर्वासित जीवन जी रहे लोगों को मरवाया गया। जब भी किसी दो व्यक्ति में तुलना होती है तो उसका पैमाना तय किया जाता है। किसी भी पैमाने पर स्टालिन जर्मन तानाशाह हिटलर से अधिक बर्बर, क्रूर, शातिर और वैश्विक समाज के लिए खतरनाक दिखाई देता है। स्टालिनवादी राजनीति मार्क्सवादियों से अधिक हिंसक है। बार बार इस बात का प्रयास किया जाता है कि हिटलर की तुलना में स्टालिन रचनात्मक दिखे। 25 जून को केंद्र सरकार ने संविधान हत्या दिवस घोषित किया है। उसके बाद से ही ये प्रयास दिखाई देने लगा है कि कैसे आपातकाल को उचित ठहराया जाए। ऐसे तर्क गढ़े जाएं जिससे ये लगे कि इंदिरा गांधी ने परिस्थियों से मजबूर होकर देश पर इमरजेंसी थोपी। 

Friday, February 27, 2015

पुस्तक नहीं लेखक मेला

10 मई 1933 का बदनाम बर्लिन बुक बर्निंग जब हुआ था तब वो हिटलर के उत्थान और ताकतवर होने का दौर था । नाजीवादी यह मानते थे कि साहित्य मनुष्य की भावनाओं को जगाता है और भावना लोगों को दुर्बल बना देती है । उनका मानना था कि अगर जर्मनी को दुनिया फतह पर करना है तो कमजोर लोगों से काम नहीं चल सकता । लिहाजा विश्व साहित्य की महत्वपूर्ण कृतियों को बर्लिन विश्वविद्यालय के विशाल प्रांगण में जला दिया गया था । इसे बुक बर्लिन ब्लास्ट या बर्लिन बुक ब्लास्ट के नाम से जाना जाता है । जिस दिन किताबें जलाई गई उसी दिन अब हर साल बर्लिन विश्वविद्यालय के उसी जगह को विश्व भर की किताबों से पाट दिया जाता है । उन लेखकों के नाम लिखे जाते हैं जिनकी किताबें 1933 में जला दी गई थी । बर्लिन में उस दिन को किताब उत्सव की तरह मनाया जाता है । हर जगह पर लोग किताब पढ़कर एक दूसरे को सुनाते हैं, रेस्तरां से लेकर फुटपाथ तक, चौराहों से लेकर पार्कों तक में । यह विरोध का अपना एक तरीका है । इस घटना को बताने के पीछे उद्देश्य यह है कि जर्मनी में एक पुस्तक संस्कृति विकसित होती चली गई और अब ई बुक्स के दौर में भी किताबों की महत्ता कम नहीं हुई । लेकिन उसके उलट भारत में किताबों की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत होने के बावजूद हम उत्तरोत्तर किताबों से दूर होते चले गए । हमारे यहां इतने महाकाव्य है जो कि विश्व की अन्य भाषाओं में दुर्लभ हैं । फिर क्या वजह रही कि हमारा हिंदी समाज पुस्तकों से दूर होता चला गया ।
आज खत्म हो रहे दिल्ली विश्व पुस्तक मेले में जाकर पुस्तकों के प्रति पाठकों के घटते प्रेम का अंदाज लग सकता है । दिल्ली का ये विश्व पुस्तक मेला ना होकर भारतीय लेखक मेला सरीखा लगता है । यहां किताबों के खरीदार गंभीर पाठक कम किताबों के गंभीर अगंभीर लेखकों का मेला लगा रहता है । इतनी बड़ी संख्या में किताबों का प्रकाशन हुआ है जिसके अनुपात में इन किताबों की बिक्री हुई हो इस बारे में संदेह होता है । नई नई प्रवृत्तियों के मुताबिक किताबें प्रकाशित हो रही हैं । घटिया काव्य संग्रहों की बाढ़ आई हुई है । फेसबुक पर की जा रही हल्की फुल्की रचनाओं को किताब की शक्ल दी जा रही है । रचना प्रक्रिया साधना है लेकिन यहां तो वह मशहूर होने और सोशल नेटवर्किग साइट पर चेहरा चमकाने का जरिया मात्र है । कई विमोचनों के दौरान लेखकों को यह कहते सुना गया कि फोटो इस तरह से खींची जानी चाहिए कि उसको फेसबुक की कवर पिक्चर के तौर पर इस्तेमाल किया जा सके । फेसबुक का इस्तेमाल गलत नहीं है और मैं हमेशा से इस बात की पैरोकारी करता रहा हूं कि फेसबुक और अन्य सोशल साइट्स का इस्तेामाल लेखक करें । लेकिन फेसबुक ने जिस तरह से हिंदी के नए लेखकों के बीच छपास रोग को जन्म दिया है वह चिंता का विषय है । फेसबुक ने औसत तुकबंदी करनेवालों को कवि बनने का मौका दे दिया । फेसबुक ने जुमले बाजी करनेवालों को कहानीकार बनने का मौका दे दिया । प्रकाशकों ने लेखकों की मशहूर होने की इस महात्वाकांक्षा को हवा देते हुए अपने कारोबार को चमकाने का एक रास्ता तलाश लिया । यहां भी एक बात रेखांकित की जानी चाहिए कि जो बड़े या स्थापित प्रकाशक हैं उन्होंने इस रास्ते को ठुकराया लेकिन प्रकाशन जगत में भी तो कई घुसपैठिए जो साहित्य का नुकसान कर रहे हैं । इस साल के पुस्तक मेले के अनुभव पर ये कहा जा सकता है कि हिंदी प्रकाशन संस्थानों की भी ग्रेडिंग की जानी चाहिए । उनकी साख और टर्नओवर आदि के आधार पर कोई सिस्टम बनना चाहिए । इससे ये साफ होगा कि अमुक प्रकाशक ने छापा है तो रचना स्तरीय होगी । इससे पाठकों का साहित्य में भरोसा वापस लाने में मदद मिलेगी ।  


Wednesday, April 30, 2014

फासीवाद का डर और सियासत की फसल

नरेन्द्र मोदी के सत्ता में आते ही देश में फासीवाद आ जाएगा । नरेन्द्र मोदी हिटलर की तरह है । नरेन्द्र मोदी के आने से देश में सांप्रदायिक ताकतें मजबूत होंगी । नरेन्द्र मोदी उस विचारधारा के पोषक हैं जो देश को बांटती है । यह चुनाव मुद्दों की लड़ाई नहीं है विचारधारा की लड़ाई है । लोकसभा चुनाव के दौरान इस तरह के आरोप नरेन्द्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी पर लगातार लग रहे हैं । नरेन्द्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में हवा के रुख को भांपते हुए आलोचकों और विरोधियों के हमले और तीखे हो रहे हैं । सबसे संगीन इल्जाम जो लग रहा है वह है कि मोदी के आते ही देश में फासीवाद आ जाएगा और तानाशाही प्रवृत्ति का बोलबाला हो जाएगा । मोदी के विरोधी उत्साह में भले ही मोदी की तुलना हिटलर से कर दें लेकिन वो तथ्यात्मक और सैद्धांतिक दोनों रूप में वह गलत है । आज के भारत की तुलना हिटलर के उत्थान के समय के जर्मनी से नहीं की जा सकती है । उस वक्त जर्मन साम्राज्य के पतन के सिर्फ पंद्रह साल हुए थे और जर्मनी एक नवजात राष्ट्र के तौर पर खड़ा होने की कोशिश कर रहा था । उस वक्त जर्मनी के लोग देश की खराब आर्थिक हालात की वजह से बुरी तरह से परेशान थे और वहां की लड़खड़ाती सरकार उसे संभालने में नाकाम हो रही थी । आज जब पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था पर संकट है ऐसे में भी भारत लगभग पांच फीसदी के ग्रोथ रेट के साथ मजबूती से अपनी अर्थव्यवस्था को संभाले हुए है । जनता की वर्तमान सरकार से नाराजगी है लेकिन यह साफ है कि कोई भी अगर उसके नागरिक अधिकारों के हनन की कोशिश करेगा तो उसे वह बर्दाश्त नहीं करेगी । इसके अलावा एक राष्ट्र के तौर पर भारत की जो संरचना है वो भी जर्मनी से अलहदा है । अलग अलग राज्यों में अलग अलग दलों की चुनी हुई सरकारें हैं । कुछ मसले ऐसे हैं जिनमें केंद्र का दखल नहीं हो सकता है । भारत में लोकतंत्र की जड़ें इतनी गहरी हो चुकी हैं कि वहां अगर हिटलर भी आ जाए तो उसे उखाड़ कर नहीं फेंक सकता है । इस देश ने इंदिरा गांधी को भी देखा था जिन्होंने उन्नीस सौ पचहत्तर में भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में इमरजेंसी का काला अध्याय जोड़ा । तमाम ताकत और जोर लगा देने के बावजूद जनविरोध के आगे इंदिरा को झुकना पड़ा और दो साल में ही इमरजेंसी खत्म करनी पड़ी थी । उन्नीस सौ पचहत्तर और अब की स्थितियां और भी बदल चुकी हैं । अब मीडिया पहले से ज्यादा ताकतवर है और जनता अपने अधिकारों को लेकर पहले से ज्यादा जागरूक । दरअसल हमारे देश में फासीवाद एक ऐसा जुमला है जिसका डर सदियों से दिखाकर राजनीति की रोटियां सेंकी जा रही है । फासीवाद का जुमला सबसे ज्यादा इस देश में कार्ल मार्क्स के अनुयायी उछालते रहे हैं । यहां यह याद दिलाने की जरूरत है कि कार्ल मार्क्स हमेशा से चुनाव, चुनाव करने की स्वतंत्रता और चुनी हुई संस्थाओं का विरोध करते थे । उनका मानना था कि जबतक आर्थिक समानता नहीं हो तो चुनाव बेमानी हैं ।
अब अगर दूसरे आरोप हिंदू सांप्रदायिकता की बात करें जिसके प्रचंड होने की आशंका जताई जा रही है तो इस शब्द की अवधारणा ही गलत है । हिंदू धर्म का आधार ही सर्वधर्मसम्भाव और सहिष्णुता है । अस्सी के दशक के अंत में और नब्बे के दशक की शुरुआत में इसी तरह से हिंदू राष्ट्रवाद की बात फैलाई गई थी । उस वक्त यह प्रचारित किया गया था कि हिंदू राष्ट्रवाद का मतलब है देश की एकता और अखंडता को कायम रखना और हिंदू राष्ट्र का निर्माण करना । अब जरा इसपर गहराई से विचार करिए । हिंदी राष्ट्रवाद के ये दोनों उद्देश्य एक दूसरे के खिलाफ हैं । हिंदू राष्ट्र की कल्पना करते हुए देश की एकता और अखंडता कायम नहीं रखी जा सकती है । अगर हिंदू राष्ट्र थोपने की बात होती तो देश में हिंसा का ऐसा दौर चलता कि देश की एकता और अखंडता खतरे में पड़ जाती । दरअसल हिंदू राष्ट्रवाद के सिद्धांत का प्रतिपादन और प्रचार करके समाज में भ्रम फैलाने की गहरी साजिश की गई थी जिसमें तर्कों के लिए कोई जगह नहीं बची थी । दोनों तरफ से उन्माद फैलाने का काम किया गया था । पहले हिंदू राष्ट्रवादियों का भय पैदा किया गया था और बाद में उसके खिलाफ धर्मनिरपेक्षता की दुहाई देकर राजनीतिक फायदा उठाया गया था । धर्मनिरपेक्ष सांप्रदायिकता के खिलाफ प्रचार का एक ऐसा वितान खड़ा किया गया था जिससे जनता भयाक्रांत होकर किसी पार्टी विशेष के पक्ष में मतदान कर सके । हुआ भी यही था । हिंदू राष्ट्रवाद और धर्मनिरपेक्ष सांप्रदायिकता के खिलाफ बोलने वालों को हिंदू सांप्रदायिक करार दे दिया जा रहा था । अब एक बार फिर से उसी तरह का भय का माहौल पैदा कर सियासी फसल काटने की तैयारी की जा रही है । यहां एक और उदाहरण प्रासंगिक होगा । इन दिनों धर्मनिरपेक्षता की वकालत करनेवालों को लालकृष्ण आडवाणी बहुत अच्छे लगने लगे हैं । तथाकथित धर्मनिरपेक्ष विचारकों को लगता है कि लालकृष्ण आडवाणी अपेक्षाकृत कम कट्टर हैं । हमें अपने इन विचारकों की बदलती राय पर तरस आता है । यह वही जमात है जो बाबरी विध्वंस के बाद आडवाणी को देश का सामाजिक ताना-बाना धव्स्त करने का जिम्मेदार मान रही थी । ये वही लोग है जो उस वक्त आडवाणी को कट्टर और अचल बिहारी वाजपेयी को उदार छवि के मानते थे । उनके तर्कों का आधार तब भी गलत थे और अब भी गलत हैं ।

दरअसल हमारे देश में नेहरू के बाद सही मायने में धर्मनिरपेक्षता को जोरदार तरीके से बढ़ावा देने वाला कोई नेता हुआ ही नहीं । नेहरू का मानना था कि राष्ट्रवाद की भावना को धर्म नहीं बल्कि संस्कृति मजबूत कर सकती है । उनकी किताब डिस्कवरी ऑफ इंडिया में अशोक, अकबर,  कबीर और गुरू नानक को नायक के तौर पर याद किया गया है । गांधी को भी । क्योंकि गांधी ने भी धर्म को राष्ट्र से अलग किया था । उन्होंने कहा था कि अगर हिंदू सोचते हैं कि यह सिर्फ उनका देश है तो वो सपनों की दुनिया में हैं । भारत को जिन हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई ने अपना देश चुना है वो सभी भाई हैं । नेहरू के बाद इंदिरा गांधी की धर्मनिरपेक्षता अलग किस्म की थी और उसके बाद राजीव गांधी की धर्मनिरपेक्षता को तो सारे देश ने देखा था जब उन्होंने अयोध्या में शिला पूजन किया था । राजीव गांधी के बाद देश की बागडोर संभालने वाले नरसिम्हाराव पढ़े लिखे समझदार प्रधानमंत्री माने जाते हैं लेकिन बाद के दिनों में जिस तरह से धर्म को लेकर उनकी पसंद और नापसंद का खुलासा हुआ उससे तो यही लगता है कि उनकी आत्मा एक धर्मविशेष की तरफ झुकी हुई थी । सामाजिक न्याय के मसीहाओं की धर्मनिरपेक्षता को देश ने नब्बे के दशक में देखा । किस तरह से धर्मनिरपेक्षता के नाम पर समाज को बांटने का खतरनाक खेल खेला गया । बाद के दिनों में समुदाय के नाम पर राजनीति का रंग और गाढ़ा हुआ और अब हालात यह है कि देश की दो प्रमुख दलों के अध्यक्ष धर्मगुरुओं के आशीर्वाद के आंकांक्षी हो रहे हैं । अंत में सिर्फ इतना कहा जा सकता है कि इस महान देश में कोई भी तानाशाह पैदा नहीं हो सकता है । तानाशाही को देश की जनता क्षण भर भी बर्दाश्त नहीं करेगी और एक क्या हजार मोदी भी इस देश में फासीवाद नहीं थोप सकते हैं । आग्रह सिर्फ इतना है कि देश में भय की राजनीति बंद होनी चाहिए और भयाक्रांत कर वोट लेने की कोशिशों को जनता भी नाकाम करे ।