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Saturday, August 24, 2019

सोबती पर लिखूंगी संस्मरण- मुद्गल


चित्रा मुद्गल हिंदी की वरिष्ठ कथाकार हैं। अपने जीवन में पचहत्तर बसंत देख चुकी चित्रा मुद्गल पिछल छह दशक से सृजनरत हैं। उनको साहित्य अकादमी समेत कई प्रतिष्ठित पुरस्कार मिल चुके हैं। उन्होंने गुजराती और मराठी में भी कविताएं लिखी हैं। ुउन्होंने दिल्ली शहर के अपने अनुभव मुझसे साझा किए। 
सबसे पहले आपको एक दिलचस्प बात बताऊं क्योंकि उसका दिल्ली से गहरा संबंध है। मेरे पिताजी बड़े जमींदार थे, मां प्रतापगढ़ इलाके के बड़े तालुकेदार घराने की थी, दादी अमेठी की बडे परिवार से थीं। ऐस में जब मैंने फरवरी 1965 में अवधनारायण मुदगल से शादी की तो हमारे पूरे खानदान में हंगामा मच गया। किसी के गले ये बात उतर ही नहीं रही थी कि हमारे परिवार की लड़की अपनी मर्जी से शादी कर लेगी वो भी अपनी जाति से बाहर के लड़के से। हमारे घर में हमेशा ये कहा जाता कि जो भी लड़की ऐसी जुर्रत करेगी उसको आंगन के बाहर के ढंके हुए कुंए में डाल दिया जाएगा और कह दिया जाएगा कि पांव फिसलने से कुंए में गिर गई। जब मैंने अवध से शादी की तो मेरे पिताजी बहुत नाराज हुए। मेरे प्रेम विवाह ने उनको अंदर तक हिला दिया था और वो इसको स्वीकार नहीं कर पा रहे थे। वो इस जुगत में लगे हुए थे कि अवध को किसी तरह से जेल भिजवा दें और फिर मेरी शादी अपनी मर्जी से करवा सकें। वो सोच रहे थे कि जैसे ही अवध जेल जाएगा तो लड़की के सर से मोहब्बत का खुमार उतर जाएगा। हम पिता के सामर्थ्य से डरकर अप्रैल 1965 में मुंबई से दिल्ली आ गए। दिल्ली आकर सबसे पहले सर्वेश्वर भाई साहब के घर पर एक महीना रुके। उसके बाद राजेन्द्र यादव और मन्नू भंडारी के साथ भी महीने भर रुके। लोग कहते हैं कि मैं और अवध शादी कर भागकर दिल्ली आ गए थे। ये बात गलत है। हमें भागने  की जरूरत ही नहीं थी। दो महीने में ही हम फिर वापस मुंबई लौट गए थे। बाद में जब मेरे पिता बीमार पड़े और कोमा में जाने के पहले मेरा हाथ पकड़कर मुझसे कहा कि मैं सोचता था कि मां-बाप अपने बच्चों के लिए सुख खरीद सकते हैं पर अब मुझे लगता है कि सुख खरीदा नहीं जा सकता था। ये मेरे लिए बहुत ही भावुक क्षण था।
1979 से लेकर 1982 का दौर मेरे लिए बहुत उथल पुथल का रहा। मेरे पति अवध ‘सारिका’ पत्रिका में काम करते थे। प्रबंधन ने ‘सारिका’ को दिल्ली शिफ्ट करने का फैसला लिया। प्रबंधन कमलेश्वर से छुट्टी पाना चाहता था। उनको लगता था कि कमलेश्वर नौकरी तो ‘सारिका’ की करते हैं लेकिन जुटे फिल्म लिखने में रहते हैं। इसको खत्म करने के लिए ‘सारिका’ को मुंबई से दिल्ली शिफ्ट कर दिया गया। अवध को ‘सारिका’ का सहायक संपादक बनाकर दिल्ली भेजा गया। जब हम दिल्ली आए तो लारेंस रोड में रहने लगे। पर मेरा मुंबई आना जाना-लगा रहता था। बच्चों की पढ़ाई थी और मैं भी वहां ट्रेड यूनियन में सक्रिय थी। लारेंस रोड के बाद हमारा नया ठिकाना बना था दरियागंज, वहां भी हम रहे। जब अवध को सारिका का संपादक बनाया गया तो हमें ग्रेटर कैलाश में शिफ्ट करने का विकल्प दिया गया था, पर हमारे दोस्तों ने सलाह दी कि अपने जैसे लोगों के बीच रहना चाहिए। फिर हमलोग मयूर विहार फेज 1 में शिफ्ट कर गए। उस समय मयूर विहार में अदभुत माहौल था। काला जल जैसा कालजयी उपन्यास लिखने वाले शानी के फ्लैट पर हर दिना लेखकों का जमावड़ा लगता था। साहित्यिक अड्डेबाजी होती थी, कहानियों से लेकर दुनिया जहान की बातें होती थीं। शाऩी के घऱ होनेवाली उस बैठक में विष्णु खरे और प्रयाग शुक्ल लगभग नियमित थे, बाद में विजयमोहन सिंह भी आने लगे। शानी की पत्नी मुझे टिफिन में अच्छा खाना बनवाकर भेजती थी। वो मजाक में कहती भी थीं कि बेचारी ठकुराइन को ब्राह्मण से शादी कर घास-फूस खाना पडता है। मयूर विहार में मैंने कई घर बदले लेकिन आजतक वो इलाका छोड़ा नहीं। मैं कृष्णा सोबती जी के पड़ोस में भी लंबे समय तक रही और उनकी कई निजी बातों की साक्षी रही। मेरे नए उपन्यास में इऩ बातों पर लिखने की सोच रही हूं।   
(अनंत विजय से बातचीत पर आधारित)

Friday, November 10, 2017

नब्बे पार की लेखिका का सम्मान

उम्र के नब्बे पड़ाव पार कर चुकी लेखिका कृष्णा सोबती जी को ज्ञानपीठ पुरस्कार देने का एलान किया गया । ज्ञानपीठ सम्मान देनेवाली जूरी के नामवर सिंह अध्यक्ष हैं। यह उनके कार्यकाल का अंतिम वर्ष है । उनके पुरस्कार के एलान के बाद साहित्यक हलके में इस बात को लेकर चर्चा है कि आखिर दो बार इस पुरस्कार के लिए मना करने के बाद कृष्णा जी ने इसको स्वीकार कैसे और क्यों कर लिया गया। साहित्य जगत में हो रही चर्चा के मुताबिक एक बार कृष्णा जी को किसी अन्य भारतीय भाषा के लेखक के साथ संयुक्त रूप से पुरस्कार देने का प्रस्ताव किया गया था जिसे उन्होंने मना कर दिया था। दूसरी बार जब हिंदी के वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह को ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया उसबार भी कृष्णा सोबती को ज्ञानपीठ पुरस्कार देने की चर्चा चली थी लेकिन उस बार भी उन्होंने मना कर दिया था। साहित्य जगत की इस चर्चा में कितनी सत्यता है ये तो ज्ञानपीठ की जूरी के सदस्य या फिर कृष्णा जी ही बता सकती हैं लेकिन इस बार के उनके स्वीकार के पीछे ज्ञानपीठ के निदेशक और ज्ञानपीठ पुरस्कार के संयोयक लीलाधर मंडलोई की भूमिका या निर्विवाद छवि हो सकती है।
कृष्णा सोबती जी हिंदी की बेहद समादृत लेखिका है लेकिन वो काफी विवादित भी रही हैं। हिंदी में दिए जानेवाले पुरस्कारों को लेकर उनके विवादित बयान को अब भी याद कियी जाता है । कृष्णा जी ने एक बार कहा था कि दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में पुरस्कार आदि तय किए जाते हैं। कहा तो उन्होंने बहुत कुछ था लेकिन उसकी चर्चा इस वक्त उचित नहीं है। यह इसी पृष्ठभूमि का नतीजा है कि फेसबुक और सोशल मीडिया पर कृष्णा जी को ज्ञानपीठ पुरस्कार दिए जाने को लेकर कई तरह की बातें हो रही है। कोई उनके उम्र को लेकर तंज कस रहा है तो कोई उनके स्वीकार को लेकर हैरान है। दरअसल हिंदी में बड़े पुरस्कारों के साथ यह समस्या है कि वो ज्यादातर लाइफ टाइम अचीवमेंट अवॉर्ड की तरह हो गए हैं। ज्ञानपीठ की बात को छोड़ भी दें तो ज्यादातर पुरस्कार अब लेखक की उम्र को देखकर दिए जाते हैं। यहां तक कि साहित्य अकादमी पुरस्कार में लेखन के साथ साथ उम्र को देखा जाने लगा है। कोलकाता की लेखिका अलका सरावगी को साहित्य अकादमी देने के बाद इस पुरस्कार में कोई ऐसा नाम नहीं आया जो कि सिर्फ कृति को ध्यान में रखकक दिया गया हो। ज्यादातर पुरस्कार भूल गलतियों को सुधाने के लिए दिए गए। यही हाल दिल्ली की हिंदी अकादमी के पुरस्कारों की भी है वहां भी उम्र को एक मानक माना जाने लगा है। जबकि पुरस्कार देनेवालों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि अगर कोई बेहतरीन कृति आई हो तो उसको पुरस्कृत किया जाए। भगवानदास मोरवाल का उपन्यास काला पहाड़ ऐसी ही एक कृति है लेकिन साहित्य अकादमी उस वक्त उनको पुरस्कृत करने का साहस नहीं दिखा पाई।
यह हिंदी साहित्य के लिए बेहद सौभाग्य की बात है कि नब्बे साल की उम्र के आसपास या उससे पार के कई लेखक अब भी रचनात्मक रूप से सक्रिय हैं और अभी भी अपनी रचनात्मक मौजूदगी और सक्रियता से पूरे परिदृश्य में सार्थक हस्तक्षेप कर रहे हैं । नामवर सिंह तो अब भी गोष्ठियों की शान हैं । रामदरश मिश्र लगातार अपने लेखन से समकालीन साहित्य में सार्थक हस्तक्षेप कर रहे हैं । अभी हाल ही में कृष्णा जी के संस्मरणों की पुस्तक प्रकाशित हुई जिसकी हिंदी जहत में खूब चर्चा हुई। कृष्णा जी ना केवल रचनात्मक रूप से सक्रिय हैं बल्कि राजनीतिक-साहित्यक मोर्चे पर भी बेहद सक्रिय हैं। उनकी ये सक्रियता आश्वस्तिकारक भी है । पिछले दिनों जब पूरे देश में असहिष्णुता के खिलाफ कुछ लेखकों ने आंदोलन और पुरस्कार वापसी का अभियान चलाया था तो उसके बाद दिल्ली में देशभर के लेखकों का एक जमावड़ा हुआ था । कृष्णा सोबती जी उस जमावड़े में पहुंची थीं और अपनी बात उन्होंने रखी थी । उस वक्त देश में कथित तौर पर बढ़ रहे असहिष्णुता के खिलाफ पुरस्कार वापसी अभियान को कृष्णा सोबती की भागीदारी से बल मिला होगा, ऐसा मेरा मानना है । उनकी भागीदारी का जनमानस पर कितना असर हुआ इस पर मतभिन्नता हो सकती है। लेखक के तौर पर उनको अपनी बात कहने का हक है और साहित्य से इतर राजनीति पर भी अपनी राय प्रकट करने का अधिकार । कृष्णा सोबती के इस अधिकार की उनके वैचारिक विरोधियों ने भी सम्मान किया । कथित असहिष्णुता के खिलाफ उनके इस कदम को लेकर खासी चर्चा हुई थी, पक्ष में भी और विपक्ष में भी। लेकिन उसी के आसपास उन्होंने खुद पर लिखी एक किताब के विमोचन को टलवाने के लिए नई लेखिका पर उन्होंने सिर्फ इस लिए दबाव बनाया था कि उनकी विचारधारा से अलग विचार रखनेवाले लोग भी उस मंच पर थे। यह एक किस्म की अस्पृश्यता थी। इसपर भी विस्तार से चर्चा हुई थी और हिंदी के अलावा अंग्रेजी में भी इसपर लेख प्रकाशित हुए थे।   
इसके पहले भी कृष्णा जी और अमृता प्रीतम के बीच केस मुकदमा चले थे। कृष्णा सोबती ने ने अमृता प्रीतम पर उनकी कृति हरदत्त का जिंदगीनामा को लेकर केस किया था । वो केस करीब पच्चीस साल तक चला था और फैसला अमृता प्रीतम के पक्ष में आया था । दरअसल अमृता प्रीतम की किताब हरदत्त का जिंदगीनामा, जब छपा तो कृष्णा जी को लगा कि ये शीर्षक उनके चर्चित उपन्यास जिंदगीनामा से उड़ाया गया है और वो कोर्ट चली गईं । साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता कृष्णा सोबती और ज्ञानपीठ पुरस्कार से नवाजी गई अमृता प्रीतम के बीच इस साहित्यक विवाद की उस वक्त पूरे देश में खूब चर्चा हुई थी । जब केस का फैसला अमृता जी के पक्ष में आया तबतक अमृता प्रीतम की मौत हो गई थी । केस के फैसले के बाद कृष्णा सोबती ने बौद्धिक संपदा का तर्क देते हुए कहा था कि हार जीत से ज्यादा जरूरी उनके लिए अपनी बौद्धिक संपदा की रक्षा के लिए संघर्ष करना था । अब उस वक्त भी कई लेखकों ने कृष्णा सोबती को याद दिलाया था कि जिंदगीनामा का पहली बार प्रयोग उन्होंने नहीं किया था । कृष्णा सोबती के उपन्यास के पहले फारसी में लिखी दर्जनों किताबें इस शीर्षक के साथ मौजूद हैं । मशहूर लेखक खुशवंत सिंह ने तो उस वक्त भी कहा था कि श्रद्धेय गुरु गोविंद सिंह जी के एक शिष्य़ ने उनकी जीवनी भी जिंदगीनामा के नाम से लिखी थी और ये किताब कृष्णा सोबती के उपन्यास के काफी पहले प्रकाशित हो चुकी थी । जिंदगीनामा को लेकर कैसी बौद्धिक संपदा का गुमान और उसको लेकर कैसा विवाद और केस मुकदमा। लेकिन विवाद तो हुआ ही था।
इसी तरह से जब रवीन्द्र कालिया ने एक संस्मरण लिखा था तब भी कृष्णा जी ने काफी आपत्ति जताई थी और एक तरह से विवाद खड़ा किया था। बेहतर रचानाकरा और विवादप्रियता के अलावा कृष्णा जी में ह्यूमर भी था। मुझे याद पड़ता है कि दिल्ली में लेखक से मिलिए कार्यक्रम में एक बार कृष्णा जी थीं। उस कार्यक्रम में भारत भारद्वाज ने उनसे एक सवाल पूछा था कि कृष्णा जी की नायिकाएं इतनी बोल्ड और बिंदास दिखती हैं, वो आजाद ख्याल भी हैं और अपने कपड़ों आदि में आधुनिक भी। प्रश्नकर्ता ये जानना चाह रहे थे कि जब उनकी नायिकाएं इतनी बोल्ड हैं, बिंदास हैं और अपने ख्यालों औक लिबास को लेकर इतनी आधुनिक हैं तो कृष्णा जी खुद इतना लंबा चोगानुमा ड्रेस क्यों पहनती हैं। कृष्णा जी ने इस प्रश्न को मजाकिया लहजे में टालते हुए उत्तर दिया था कि भारत जी आप देखना क्या चाहते हैं और पूरा हॉल ठहाकों से गूंज गया था। ये उनके व्यक्तित्व का एक अलग पहलू है।
हम वापस लौटते हैं ज्ञानपीठ पुरस्कार पर । दरअसल ज्ञानपीठ की चयन प्रक्रिया बेहद जटिल है। इसकी शुरुआत होती है करीब चार हजार लेखकों और संस्थाओं स प्रस्ताव मंगवाने से लेकर। उन प्रस्तावों को फिर भाषावार छांटा जाता है । फिर तेइस भाषाओं की सलाहकार समिति के पास इन प्रस्तावों को भेजा जाता है जहां से उनसे दस नाम मांगे जाते हैं। उन नामों को फिर जूरी के सदस्यों के सामने रखा जाता है और वो अपनी सम्मति देते हैं। उन सम्मतियों के आधार पर जिस नाम पर सहमति बनती है या जिनको सबसे अधिक जूरी के सदस्य चाहते हैं उनको ये सम्मान दिया जाता है। टाई होने की स्थिति में अध्यक्ष के पास वीटो पॉवर होता है । इसके अलावा जूरी के सदस्यों को आधार सूची से अलग नाम प्रस्तावित करने का भी अधिकार होता है। ऐसे में किसी तरह की सेटिंग की गुंजाइश बहुत कम रहती है। इस बार भी कृष्णा जी के नाम के साथ अमिताभ घोष का नाम भी था। उनके नाम पर भी जूरी में व्यापक चर्चा हुई लेकिन जूरी के पाच सदस्यों ने कृष्णा जी के नाम पर सहमति दी और तीन ने अमिताभ घोष के नाम पर। जाहिर है चयन कृष्णा जी का ही होना था।


Saturday, December 24, 2016

विवादों से छीजती मर्यादा

साहित्य में विवादों की लंबी परंपरा रही है, कई बार साहित्यक सवालों को लेकर मुठभेड़ होती है तो कई बार विचारधारा की टकराहट देखने को मिलती है तो कई बार लेखकों के बीच आरोप प्रत्यारोपों से मर्यादा की रेखा मिटती नजर आती है । वर्ष दो हजार सोलह भी इन साहित्यक विवादों से अछूता नहीं रहा । पिछले साल सबसे बड़ा विवाद उठा नामवर सिंह के नब्बे साल होने के मौके पर दिल्ली के इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में दिनभर का जश्न और मंच पर गृह मंत्री राजनाथ सिंह और महेश शर्मा की उपस्थिति । प्रगतिशील लेखक संघ के महासचिव ने बयान जारी कर नामवर सिंह के कृत्यों से प्रलेस को अलग कर लिया । इसी तरह का एक विवाद कृष्णा सोबती पर केंद्रित युवा लेखिका, फोटग्राफर कायनात काजी की किताब के विमोचन के मौके पर हुआ । विमोचन कार्यक्रम के कार्ड पर सचिदानंद जोशी और विजयक्रांति का नाम देखकर कृष्णा जी ने लेखिका को विमोचन नहीं करने का दबाव बनाया और कार्यक्रम रद्द हो गया ।  कोलकाता के भारतीय भाषा परिषद में पश्चिम बंगाल के राज्यपाल केशरीनाथ त्रिपाठी का काव्यपाठ के आमंत्रण पत्र पर प्रगतिशील लेखक संघ के आयोजक के रूप में नाम छपने को लेकर भी विवाद उठा था ।
दिल्ली की हिंदी अकादमी ने हिंदी दिवस के मौके पर सोशल मीडिया पर हिंदी के प्रचार प्रसार और उत्कृष्ट कार्य के लिए सक्रिय नौ शख्सियतों को भाषादूत सम्मान देने का एलान किया । लेखकों के नाम को लेकर भ्रम की स्थिति बनी अकादमी ने पहले कुछ लेखकों को पुरस्कृत होने की सूचना दी और बाद में खेद प्रकट किया । इसको लेकर खूब हो हल्ला मचा । मैत्रेयी पुष्पा से इस्तीफे की मांग भी उठी थी । इसी तरह से उत्तर प्रदेश सरकार के थोक में बंटे यश भारती पुरस्कार को लेकर भी साहित्य जगत उद्वेलित हुआ था । पुरस्कार वापसी के अगुवा अशोक वाजपेयी को बिहार सरकार ने विश्व कविता सम्मेलन आयोजित करनेवाली कमेटी में मनोनीत किया तो इसको पुरस्कार वापसी के पुरस्कार के तौर पर देखा गया । हलांकि इस विवाद के उठने के बाद से विश्व कविता सम्मेलन का आयोजन ठंडे बस्ते में जाता दिख रहा है । अशोक वाजपेयी ने दिल्ली में अखिल भारतीय युवा लेखक सम्मेलन का आयोजन किया जिसमें प्रतिभागियों की उम्र को लेकर सोशल मीडिया पर विवाद का धुंआ उठा था ।इसी तरह से एक और बड़ा विवाद व्हाट्सएप के जरिए उठा । व्हाट्सएप पर वायरल एक आडियो क्लिप में प्रभु जोशी ये कहते सुने गए कि भालचंद्र जोशी के लिए कहानियां वो लिखा करते थे । जिसका भालचंद्र ने लेख लिखकर प्रतिवादद किया ।  साहित्यक पत्रिकाओं में भी इस विवाद पर जमकर लिखा गया ।
कुछ अप्रिय विवाद फेसबुक पर भी उठे । मास्को में रह रहे अनिल जनविजय ने फेसबुक पर पोस्ट लिखकर सनसनी फैलाने की कोशिश की कि वरिष्ठ कवयित्री गगन गिल के लिए वो कविताएं लिखा करते थे । जनविजय ने उससे भी आगे जाकर व्यक्तिगत बातें लिखी जिसके समर्थन में दो एक लेखक आए लेकिन जब महिला ब्रिगेड ने जनविजय पर हमला बोला तो वो बैकफुट पर आ गए । गगन गिल फेसबुक पर नहीं हैं पर उनके हवाले से जब ये बात फेसबुक पर आई कि वो इस मसले में कानूनू कार्रवाई कर सकती हैं तो जनविजय बैकफुट पर आ गए । इस तरह के गैर साहित्यक विवाद फेसबुक पर उठते रहते हैं जिनमें लेखकीय मर्यादा तार-तार होती रहती है । फेसबुक पर कुछ भी लिख ने की अराजक आजादी ने विचारधारा की टकराहट की आड़ में लेखकों ने एक दूसरे पर हमले किए जिनमें बहुधा लक्ष्मण रेखा लांघी गई ।


Saturday, September 3, 2016

पर उपदेश कुशल बहुतेरे

ये हिंदी साहित्य का सौभाग्य है कि नब्बे साल के आसपास के और उसके पार के कई लेखक अभी भी अपनी रचनात्मक मौजूदगी और सक्रियता से पूरे परिदृश्य में सार्थक हस्तक्षेप कर रहे हैं । नामवर सिंह तो अब भी गोष्ठियों की शान हैं । रामदरश मिश्र लगातार अपने लेखन से समकालीन साहित्य में सार्थक हस्तक्षेप कर रहे हैं । इसी तरह से कृष्णा सोबती की हिंदी साहित्य में उपस्थिति आश्वस्तिकारक है । पिछले दिनों जब पूरे देश में असहिष्णुता के खिलाफ कुछ लेखकों ने आंदोलन और पुरस्कार वापसी का अभियान चलाया था तो उसके बाद दिल्ली में देशभर के लेखकों का एक जमावड़ा भी हुआ था । कृष्णा सोबती जी उस जमावड़े में पहुंची थीं और अपनी बात उन्होंने रखी थी । उस वक्त देश में कथित तौर पर बढ़ रहे असहिष्णुता के खिलाफ पुरस्कार वापसी अभियान को कृष्णा सोबती की भागीदारी से बल मिला होगा, ऐसा मेरा मानना है । उनकी भागीदारी का जनमानस पर कितना असर हुआ इस पर मतभिन्नता हो सकती है। लेखक के तौर पर उनको अपनी बात कहने का हक है और साहित्य से इतर राजनीति पर भी अपनी राय प्रकट करने का अधिकार । कृष्णा सोबती के इस अधिकार की उनके वैचारिक विरोधियों ने भी सम्मान किया । असहिष्णुता के खिलाफ अभियान का साथ देनेवाली कृष्णा सोबती से हिंदी जगत सहिष्णुता की अपेक्षा करता है । वाजिब भी है क्योंकि कहा जाता है कि जैसी आपकी अपेक्षा हो वैसा ही आपको आचरण करना चाहिए । लेकिन लगता है कि कृष्णा सोबती जी की अपेक्षाएं तो सहिष्णुता की है लेकिन वो अपने आचरण में वैसा दिखना नहीं चाहती हैं । अभी हाल के अपने एक आचरण से उन्होंने इस बात के संकेत दिए कि वो एक सीमा के बाद असहिष्णु हो जाती है । पूरा वाकया ये है कि युवा लेखिका, फोटग्राफर कायनात काजी के कृष्णा सोबती के लेखन पर किए गए शोध प्रबंध के प्रकाशन और विमोतन से जुड़ा । श्रमपूर्वक सालों तक शोध कार्य के बाद कायनात काजी की किताब – कृष्णा सोबती का साहित्य और समाज प्रकाशित हुई । युवा लेखिका के लिए यह सपने के सच होने जैसा था । हिंदी की मौजूदा दौर की सबसे बड़ी लेखिकाओं में से एक कृष्णा सोबती पर प्रकाशित किताब को लेकर वो खासी उत्साहित थीं । पुस्तक प्रकाशित होने के बाद ज्यादातर लेखकों को उसको विमोचित करवाने और उस पर चर्चा आदि की इच्छा होती है । कायनात ने भी ऐसा ही एक सपना देख लिया लेकिन उसे नहीं पता था कि उसका ये सपना दिवास्वप्न साबित होगा । विमोचन के लिए उसने इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के सदस्य सचिव सच्चिदानंद जोशी और दूरदर्शन के संपादक और तिब्बत के मसलों पर काफी दिनों से सक्रिय विजय क्रांति को बुला लिया । कार्ड आदि भी छप और बंट भी गए । उत्साह में उसने कार्ड कृष्णा सोबती जी को भेज दिया । अब यहीं से हिंदी की इस युवा लेखिका कायनात काजी के सपनों के दरकने की शुरुआत हो गई । विमोचन कार्यक्रम के कार्ड पर जोशी जी और विजयक्रांति का नाम देखकर वो आगबबूला हो गईं और कायनात को फौरन इस कार्यक्रम को रद्द करने का फरमान जारी कर दिया । वजह बेहद दिलचस्प । कृष्णा जी का मानना था कि चूंकि कार्यक्रम में सभी संघियों को बुला लिया गया है लिहाजा वो वहां अपने नाम का इस्तेमाल होने की इजाजत नहीं दे सकती । एक तरफ कृष्णा सोबती जैसी हिंदी साहित्य की कद्दावर लेखिका तो दूसरी तरफ एक नवोदित लेखिका कायनात काजी । बताया जा रहा है कि कृष्णा सोबती जी ने तो कायनात को धमकी दी कि अगर विमोचन का कार्यक्रम हुआ और उसमें उनके नाम का इस्तेमाल किया गया तो वो केस कर देंगी । कृष्णा जी के साहित्यक कद और प्रतिष्ठा के आगे कायनात काजी ने अपने सपनों को कुर्बान कर दिया । विमोचन का कार्यक्रम नहीं हुआ ।
कुछ दिनों पहले कृष्णा सोबती जी का एक इंटरव्यू छपा था जिसमें उन्होंने युवा लेखकों को लेकर उत्साह दिखाया था समकालीन युवा लेखन को लेकर आश्वस्त भी दिखाई दे रही थीं । उन्होंने किसी लेखक का नाम तो नहीं लिया था लेकिन युवा लेखकों को चेताते हुए उनको अपने लिखे की तारीफ की अपेक्षा से बचने की सलाह दी थी। उन्होंने युवा रचनाकारों को देश विदेश के लेखकों को पढ़ने की नसीहत भी दी थी और कहा था कि इससे उनकी सोच का दायरा बढ़ेगा । जब उनकी नसीहतों के मुताबिक एक युवा लेखिका ने कृष्णा जी की रचनाओं को पढ़कर, समझकर अपने सोच का दायरा बढ़ाने की कोशिश की तो उसका क्या हश्र हुआ ये पूरे हिंदी साहित्य के सामने है । ऐसी परिस्थितां साहित्य जगत में हर काल में मौजूद रही होंगी तभी तो कहा गया है – पर उपदेश कुशल बहुतेरे ।
अब जरा हम कृष्णा सोबती की उस मानसिकता का विश्लेषण करते हैं जिसके तहत उन्होंने पुस्तक विमोचन के कार्ड को देखने के बाद कहा कि सभी संघियों को बुला लिया । चलिए अगर हम कृष्णा जी की बात मान भी लें कि सच्चिदानंद जोशी और विजयक्रांति संघी हैं तो क्या संघी होने से कोई भी शख्स अस्पृश्य हो जाता है । क्या वामपंथी या अन्य किसी विचारधारा को माननेवालों के लिए अपने से अलग विचारधारा के साथ विचार विनिमिय नहीं करना चाहिए । अगर कृष्णा जी को संघियों से और उनकी विचारधारा से इतना ही परहेज या घृणा है तो उनको अपनी किताबों के कवर पर लिखवा देना चाहिए कि राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ से जुड़े या उनकी विचारधारा को मानने वाले इस किताब को नहीं खरीदें । क्या कृष्णा जी ये साहस दिखा पाएंगी । अगर पूर्व प्रकाशित किताबों पर नहीं लिखा तो क्या शीघ्र प्रकाश्य अपनी आत्मकथात्मक कृति गुजरात पाकिस्तान से गुजरात हिन्दुस्तान तक के कवर पर यह लिखने का साहस दिखा पाएंगी । अगर हां तो उनके साहस को सलाम किया जाना चाहिए और कायनात काजी के विमोचन को टलवा देने के उनके फैसले को भी इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए । अगर वो ऐसा करने का साहस नहीं दिखा पाती हैं तो फिर उनके इस दोहरे रवैये पर साहित्य जगत में व्यापक बहस होनी चाहिए । क्या ये एक प्रकार की साहित्यक असहिष्णुता और अस्पृस्यता नहीं है । कृष्णा जी हिंदी साहित्य की गौरव हैं और उनका लेखन हिंदी समाज कि थाती । उसपर चर्चा करने का हक व्यापक हिंदी समाज को है । मेरा तो मानना है कि किसी भी लेखक की कृति जब छपकर पाठकों के बीच पहुंच जाती है तो वो लेखक से ज्यादा पाठकों की हो जाती है, चाहे वो किसी भी विचारधारा, जाति या धर्म का क्यों ना हो । क्या पाठक की भी कोई अलग पहचान हो सकती है । क्या साहित्य में वर्ग विभाजन का कृष्णा जी का ये कदम उचित है । एक नवोदित लेखिका के साथ इस तरह का व्यवहार अगर साहित्य के शिखर पर बैठी लेखिका करेंगी तो साहित्यकारों की कैसी छवि बनेगी इसका सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है ।
अब रही बात कायानात को केस करने की धमकी की तो कृष्णा जी ने तो अमृता प्रीतम पर उनकी कृति हरदत्त का जिंदगीनामा को लेकर केस कर ही दिया था । वो केस करीब पच्चीस साल तक चला था और फैसला अमृता प्रीतम के पक्ष में आया था । दरअसल अमृता प्रीतम की किताब हरदत्त का जिंदगीनामा, जब छपा तो कृष्णा जी को लगा कि ये शीर्षक उनके चर्चित उपन्यास जिंदगीनामा से उड़ाया गया है और वो कोर्ट चली गईं । साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता कृष्णा सोबती और ज्ञानपीठ पुरस्कार से नवाजी गई अमृता प्रीतम के बीच इस साहित्यक विवाद की उस वक्त पूरे देश में खूब चर्चा हुई थी । जब केस का फैसला आया तो अमृता प्रीतम की मौत हो गई थी । केस के फैसले के बाद कृष्णा सोबती ने बौद्धिक संपदा का तर्क देते हुए कहा था कि हार जीत से ज्यादा जरूरी उनके लिए अपनी बौद्धिक संपदा की रक्षा के लिए संघर्ष करना था । अब उस वक्त भी कई लेखकों ने कृष्णा सोबती को याद दिलाया था कि जिंदगीनामा का पहली बार प्रयोग उन्होंने नहीं किया था । कृष्णा सोबती के उपन्यास के पहले फारसी में लिखी दर्जनों किताबें इस शीर्षक के साथ मौजूद हैं । मशहूर लेखक खुशवंत सिंह ने तो उस वक्त भी कहा था कि श्रद्धेय गुरु गोविंद सिंह जी के एक शिष्य़ ने उनकी जीवनी भी जिंदगीनामा के नाम से लिखी थी और ये किताब कृष्णा सोबती के उपन्यास के काफी पहले प्रकाशित हो चुकी थी । जिंदगीनामा को लेकर कैसी बौद्धिक संपदा का गुमान और उसको लेकर कैसा विवाद और केस मुकदमा । बावजूद इसके कृष्णा जी ने वो सब किया। ऐसा प्रतीत होता है कि कृष्णा जी के इस कदम की जानकारी कायनात काजी को थी लिहाजा इस नवोदित लेखिका ने केस मुकदमों के पचड़े में पड़ने की बजाए कृष्णा जी के फरमान को मानने में ही अपनी भलाई समझी और पुस्तक विमोचन और उसपर चर्चा के कार्यक्रम को रद्द कर दिया । पुस्तक विमोचन का रद्द होना संभव है मामूली घटना लगे लेकिन इसकी अनुगूंज लंबे समय तक सुनाई देगी ।      


Sunday, July 25, 2010

बेवफाई का सुपर धमाका

हिंदी साहित्य में रवीन्द्र कालिया की ख्याति उपन्यासकार, कहानीकार और संस्मरण लेखक के अलावा एक ऐसे बेहतरीन संपादक के रूप में भी है जो लगभग मृतप्राय पत्रिकाओं में भी जान फूंक देते हैं । रवीन्द्र कालिया हिंदी के उन गिने चुने संपादकों नें से एक हैं जिनको पाठकों की नब्ज और बाजार का खेल दोनों पता है । धर्मयुग में जब रवीन्द्र कालिया थे तो पत्रिका के तेवर और कलेवर में उनका भी योगदान था लेकिन जैसा कि आमतौर पर होता है कि हर बड़ी-छोटी जीत का सेहरा टीम के कप्तान के सर बंधता है । बाद के दिनों में जब कालिया जी की धर्मवीर भारती से खटपट हुई तो वो लौटकर इलाहाबाद चले आए । यह वही दौर था जब कालिया जी ने काला रजिस्टर लिखा था । इलाहाबाद लौटकर रवीन्द्र कालिया ने जब गंगा-जमुना निकाला तो उसने भी साहित्य जगत में धूम मचा दी थी । हिंदी के पाठकों को उन्नीस सौ इक्यानबे में निकले वर्तमान साहित्य के दो कहानी महाविशेषांक अब भी याद होंगे । वर्तमान साहित्य के दो भारी भरकम अंक अप्रैल और मई उन्नीस सौ इक्यानवे में प्रकाशित हुए थे । उस दौर में मैं कॉलेज का छात्र था और मुझे याद है कि जमालपुर के व्हीलर के स्टॉल चलानेवाले पांडे जी ने हमें वर्तमान साहित्य के वो अंक चुपके से इस तरह सौंपे थे जैसे कोई बेहद कीमती चीज छुपाकर देता हो । उस वक्त मुझे अजीब लगा था । कई दिनों बाद जब मैंने पांडे जी से पूछा तो उन्होंने बताया था कि उक्त अंक की दस ही प्रतियां आई थी और साहित्यानुरागी पांडे जी के मुताबिक उसके ज्यादा खरीदार हो सकते थे । सो उन्होंने अपने चुनिंदा ग्राहकों को छुपाकर वर्तमान साहित्य का कहानी महाविशेषांक दिया था । यह हिंदी में पहली बार हुआ था जब किसी भी विशेषांक को महाविशेषांक बताया गया हो । जैसा कि मैं उपर कह चुका हूं कि कालिया जी को पाठकों की रुचि के साथ-साथ बाजार की भी समझ है । वर्तमान साहित्य से पहले इस तरह का आयोजन उन्नीस सौ अट्ठावन –साठ में कहानी पत्रिका ने किया था, जिसके संपादक श्रीपत राय थे । कहानी के उन अंकों में अमरकांत की डिप्टी कलेक्टरी , कमलेश्वर की राजा निरवंसिया, मार्केंडेय की हंसा जाई अकेला जैसी बेहद प्रसिद्ध रचनाएं छपी थी ।
यही बात वर्तमान साहित्य के कहानी विशेषांक के साथ भी हुई । कालिया जी ने उन दो अंकों में लगभग संपूर्ण हिंदी साहित्य का समेट कर रख दिया था । कृष्णा सोबती की लंबी कहानी ए लड़की वर्तमान साहित्य के उस महाविशेषांक में ही छपी थी । बाद में स्पीड पोस्ट में उसपर तीन गंभीर टिप्पणियां छपने से कहानी को खासी चर्चा मिली । बाद में यह उपन्यास के रूप में स्वतंत्र रूप से प्रकाशित हुई । साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त मशहूर लेखिका अलका सरावगी की पहली कहानी – आपकी हंसी भी वर्तमान साहित्य के महाविशेषांक में ही प्रकाशित हुई थी । उस अंक में उपेन्द्र नाथ अश्क का एक बेहद धमाकेदार लेख- महिला कथा लेखन की अर्धशती भी प्रकाशित हुई थी । किसी भी संपादक की दृष्टि पत्रिका को एक उंचाई देती है । और कालिया ने इसे एक बार नहीं कई बार साबित किया ।
जब रवीन्द्र कालिया वागर्थ के संपादक होकर कोलकाता गए तो भारतीय भाषा परिषद की उस दम तोड़ती पत्रिका को भी ना केवल खड़ा कर दिया बल्कि हिंदी साहित्य की मुख्यधारा में लाकर उसे एक अहम पत्रिका बना दिया । वागर्थ का संपादन छोड़कर जब वो नया ज्ञानोदय आए तो इस पत्रिका का हाल भी बेहाल था और साहित्य के नाम पर बेहद ठंढी और विचारोत्तेजक सामग्री के आभाव में ज्ञानोदय एक सेठाश्रयी पत्रिका बनकर रह गई थी जो इस लिए निकल पा रही थी क्योंकि उसका प्रकाशन टाइम्स जैसे बड़े ग्रुप से हो रहा था । लेकिन कालिया ने संपादक का दायित्व संभालते ही ज्ञानोदय को हिंदी साहित्य की अनिवार्य पत्रिका बना दिया । रवीन्द्र कालिया के ज्ञानोदय के संपादक बनने के पहले हंस और उसके संपादक राजेन्द्र यादव समकालीन हिंदी साहित्य का एजेंडा सेट किया करते थे । लेकिन जब मई दो हजार सात में कालिया के संपादन में युवा पीढी विशेषांक निकला तो पहली बार ऐसा लगा कि हंस के अलावा कोई और पत्रिका है जो साहित्य का एजेंडा सेट कर सकती है । संपादक ने दावा किया कि दो हजार सात में छपे युवा पीढी विशेषांक की मांग इतनी ज्यादा हुई थी कि उसे पुनर्मुद्रित करना पडा़ था । नया ज्ञानोदय के उक्त अंक को लेकर उस वक्त अच्छा खासा बवाल भी मचा था लेकिन आखिरकार रचना ही बची रहती है सो उस अंक का एक स्थायी महत्व बना रहा । धीरे धीरे पहले नवलेखन अंकों से कहानीकारों की एक नई फौज खड़ी कर दी । उसके बाद चार लगातार अंकों में प्रेम विशेषांक निकालकर बिक्री के भी सारे रिकॉर्ड तोड़ डाले । संपादक के दावे के मुताबिक प्रेम विशेषांकों की कड़ी के पहले अंक को पाठकों की मांग पर कई बार प्रकाशित करना पड़ रहा है । आज जब हिंदी के साहित्यिक पत्रिकाओं के संपादक पाठकों की कमी और बिक्री ना होने का रोना रो रहे हैं ऐसे में कालिया का ये दावा एक सुखद आश्चर्य की तरह है ।
अब कालिया जी ने नया ज्ञानोदय का बेवफाई सुपर विशेषांक-1 निकाला है । कहानी महाविशेषांक वो पहले ही निकाल चुके हैं । पाठकों को हर बार कोई नई चीज देनी होती है लिहाजा अब सुपर विशेषांक । संपादकीय की पहली ही लाइन है- अगर वफा का अस्तित्व ना होता तो बेवफाई नहीं होती । कई शायरों के मार्फत भी कालिया जी ने बेवफाई को परिभाषित किया है । तकरीबन सवा दौ सौ पन्नों के इस महाविशेषांक में वह हर रचना मौजूद है जो पाठकों को ना केवल बांधे रखेगी बल्कि उसकी साहित्यिक वफा को और मजबूत करेगी । इस विशेषांक में प्रेमचंद, मंटो, इस्मत चुगताई से लेकर ओ हेनरी, मोपासां, हेमिंग्वे तक मौजूद हैं । बेवफाई पर गुलजार ने जब ज्ञानोदय संपादक को अपनी नज्में भेजी तो लिखा- जनाब रविन्द्र कालिया साहब । बे-वफायी पर कुछ नज्में । मेरे यहां कुछ इल्जाम-देही और गिले शिकवे नहीं हैं । मेरा ख्याल है वो बे-वफायी भी नहीं । बस अलग हो गए । बे-वफायी कैसी । नज्में ज्यादा है ताकि आप कुछ रद्द कर सकें । बे-वफायी को बस अलग हो गए मानने वाले गुलजार की नज्म देखिए – और तुम ऐसे गई जैसे /शहर की बिजली चली जाए अचानक जैसे/और मुझको/बंद कमरे में बहुत देर तलक कुछ भी दिखायी नहीं दिया/आंखें तारीकी से मानूस हुई तो.../फिर से दरवाजे का खाका सा नजर आया/ । सिर्फ गुलजार ही नहीं बेवफायी पर बशीर बद्र की नज्में भी बेहतरीन हैं । इसके अलावा विदेशी उपन्यासों में, मीडिया में, फिल्मों में और इंटरनेट की बेवफाइयों पर भी अहम लेख हैं । कुल मिलाकर यह अंक पठीनय तो है ही संग्रहणीय भी है । बेवफाई सुपर विशेषांक -2 का भी ऐलान है जिसमें नोवोकोब का प्रसिद्ध उपन्यास लोलिता भी प्रकाश्य है । आखिरकार लोलिता भी तो अंत में बेवफाई पर ही खत्म होती है । कालिया जी का यह प्रयोग काबिल-ए-तारीफ है ।