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Saturday, March 7, 2026

सिनेमा पर बचकानी समझ


लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी का केरल में कालेज के छात्रों के साथ संवाद की खबर समाचारपत्रों में प्रकाशित है। राहुल गांधी कह रहे हैं कि फिल्म, टीवी और मीडिया का हथियार के रूप में इस्तेमाल हो रहा है। केरल के कुट्टिक्कनम् में कालेज छात्रों से बातचीत के दौरान जब एक छात्र ने राहुल गांधी से जानना चाहा कि फिल्मों का उपयोग हथियार के रूप में कैसे हो रहा है तो उन्होंने विस्तार से अपनी बात रखी। प्रतिपक्ष के नेता ने फिल्म ‘द केरला स्टोरी 2, गोज बियान्ड’ का उदाहरण दिया और बताया कि ये अच्छी बात है कि लोगों ने दे केरला स्टोरी 2 को नहीं देखा और सिनेमा हाल खाली रहे। राहुल के अनुसार इस तरह की फिल्में लोगों को बदनाम करने, उन्हें समाप्त करने और समाज में विभाजन पैदा करने जैसे उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल किया जाता है ताकि कुछ लोगों को इससे लाभ हो और दूसरों को नुकसान। राहुल गांधी ने आगे कहा कि भारत इस तरह का बन गया। अब राहुल गांधी जब ये कहते हैं कि फिल्मों का उपयोग हथियार के तौर पर किया जा रहा है और भारत इस तरह का बन गया है तो इससे ये ध्वनित होता है कि ये नई परिघटना है। प्रश्न उठता है कि क्या फिल्मों और वेब सीरीज का उपयोग राजनीतिक हथियार के रूप में नया ट्रेंड है। क्या जब देश केंद्र में कांग्रेस पार्टी की सरकार या उसकी अगुवाई वाली सरकार थी तो फिल्मों का राजनीतिक हथियार के तौर पर उपयोग नहीं किया जाता था। क्या जब से ओटीटी प्लेटफार्म पर चलनेवाली वेब सीरीज बनने लगी हैं तब से उसमें राजनीतिक स्टेटमेंट नहीं होता है। प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से वेब सीरीज में नियमित अंतराल पर वर्तमान भारतीय जनता पार्टी की सरकार की आलोचना के स्वरों को लक्षित किया जा सकता है। कहना ना होगा कि वेब सीरीज को लेकर किसी प्रकार के प्रमाणन की व्यवस्था नहीं है इस कारण से वहां इस तरह के कंटेंट अधिक दिखाई देते हैं।

राहुल गांधी जब फिल्मों को हथियार के तौर पर उपयोग करने और समाज के विभाजन के उसके उद्देश्य पर बोलते हैं तो कई ऐसी फिल्में याद आती हैं जो कांग्रेस के शासन काल में बनीं और प्रदर्शित हुईं। तब क्या किसी ने कहा था कि वो फिल्में समाज में विभाजन पैदा करने के लिए बनाई जा रही हैं या उसका राजनीतिक उपयोग किया जा रहा है। स्वाधीनता के पहले और स्वाधीनता के बाद कई ऐसी फिल्में बनी जो सत्ता में बैठे लोगों के विचार को या सत्ता का समर्थन कर रही विचारधारा का समर्थन करती थी। नया दौर और मदर इंडिया में किस तरह से फिल्म कला की आड़ में वैचारिकी परोसी गई वो अब किसी से छुपी नहीं है। नया दौर में तो महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज और नेहरू की औद्योगिकीकरण की नीति के टकराव को चित्रित किया गया था। जिसका विश्लेषण बाद में कई फिल्म इतिहासकारों ने किया। ख्वाजा अहमद अब्बास तो घोषित रूप से वामपंथी थे। वामपंथी विचारधारा को पोषित और पल्लवित करनेवाली कहानियां लिखते और बनाते थे। नक्सवाद के कथित संघर्ष को चित्रित करती फिल्म द नक्सलाइट्स बनाई। उसका उद्देश्य क्या था? आमिर खान अभिनीत फिल्म फना आई थी जिसमें कश्मीर में जनमत संगह की बात की गई थी। भारत की जनता को अब भी याद है कि स्वाधीन भारत में किस भारतीय नेता ने सबसे पहले कश्मीर में जनमत संग्रह की बात की थी। अगर हम इतिहास में ना भी जाएं और इस शताब्दी में बनी फिल्मों पर ही नजर डालें तो एक विवादास्पद फिल्म का नाम स्मरण होता है - परजानियां। इस फिल्म को 2002 के गुजरात दंगे की सत्यकथा से प्रेरित बताकर पेश किया गया था। क्या उसमें समाज को बांटने की बातें नहीं थीं। क्या उसमें हिंदुओं और मुसलमानों के बीच की खाई को और गहरा करके नहीं दिखाया गया था। इस फिल्म के प्रदर्शन के समय तक तो राहुल गांधी राजनीति में आ चुके थे। फिल्म परजानियां को लेकर राहुल गांधी ने कभी इस तरह का बयान दिया हो, जैसा वो द केरला स्टोरी को लेकर दे रहे हैं, याद नहीं पड़ता है। परजानियां की रिलीज के समय कितना विवाद हुआ था ये अब भी फिल्मों में रुचि रखनेवाले लोगों को याद है। सिर्फ इतना ही क्यों आनंद पटवर्धन की फिल्मों को ही देख लीजिए अनुमान हो जाएगा कि वो किसके विरुद्ध ‘हथियार’ का उपयोग कर रहे थे। उनकी फिल्मों का मुख्य स्वर हिंदू विरोध होता था। ये पूरा का पूरा कांग्रेस का इकोसिस्टम का हिस्सा था।

राहुल गांधी ने टीवी और मीडिया को भी अपने बयान के लपेटे में लिया है। आज भी अगर वेबसीरीज को देखा जाए तो कई ऐसी सीरीज हैं जिनमें समाज को बांटनेवाले दृश्य या हिंदू मुसलमान के बीच नफरत के संवाद होते हैं। कई बार तो सिस्टम को भी मुसलमानों के विरुद्ध बता दिया जाता है। पाताललोक नाम के वेबसीरीज को देखिए किस तरह से पुलिस को मुस्लिम विरोधी चित्रित किया गया है। इस कारण से जब राहुल गांधी इस तरह की बातें करते हैं तो वो खोखले लगते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि वो सिनेमा और मनोरंजन की दुनिया में चलनेवाली राजनीति से अनजान हैं। आज भी कम से कम हिंदी फिल्मों में तो कांग्रेस इकोसिस्टम का ही बोलबाला है। मुक्काबाज जैसी फिल्म में बगैर किसी प्रसंग के संवाद होता है कि वो आएंगे और पीट-पीटकर तुम्हारी हत्या कर देंगे और भारत माता की जय के नारे लगाते हुए चले जाएंगे। संकेत स्पष्ट है कि फिल्मकार किस विचार को कठघरे में खड़ा कर रहा है। आज भी आईसी 814 कांधार हाईजैक जैसी वेबसीरीज बनती है जो पाकिस्तान की बदनाम खुफिया एजेंसी आईएसआई को लगभग आरोप मुक्त करती है। राहुल गांधी जब फिल्म. टीवी और मीडिया की बात करते हैं तो उनको ये देखना चाहिए कि किस विचार ने कला के लिए कला के सिद्धांत को आगे बढ़ाया और किस विचारधारा ने कला में मैसेज होने की बात आरंभ की। चाहे वो चित्र हो, चलचित्र हो या फिर साहित्य ही क्यों न हो हर जगह सृजन में मैसेज की वकालत की गई थी। जब मैसेज होगा तो किसी न किसी के पक्ष में होगा या किसी के विरोध में। मैसेज तो सामाजिक भी हो सकता है और राजनीतिक भी।

आज राहुल गांधी को द केरला स्टोरी या द कश्मीर फाइल्स जैसी फिल्मों में विभाजनकारी मैसेज दिखता है क्योंकि वो उनकी राजनीति के अनुकूल नहीं है। उनकी और उनकी पार्टी की राजनीति परजानियां और फना जैसी फिल्मों के आधार पर चलती है। राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की सूची को अगर देखा जाए तो ये बात और स्पष्ट हो जाती है। ये तो भला हो कि राहुल गांधी को धुरंधर की याद नहीं आई अन्यथा वो इसको भी नहीं छोड़ते। हिंदी फिल्मों में लंबे समय से हिंदू धर्म प्रतीकों को बदनाम करने के लिए सोची समझी रणनीति के तहत काम किया जाता रहा है, आज भी कुछ लोग कर ही रहे हैं लेकिन चूंकि वो हिंदू विरोधी हैं इस कारण से राहुल गांधी को वो ‘हथियार’ नहीं लगता है. आज फिल्मों के दर्शक बहुत समझदार हो चुके हैं और वो किसी भी भाषा में अगर उनकी धर्म और संस्कृति के खिलाफ कोई बात आती है तो उसके विरोध में खड़े हो जाते हैं। अयोध्या में भव्य रामलला के मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा के समय तमिल में अन्नपूर्णी फिल्म आई थी। उसमें हिंदू विरोधी कहानी थी। दर्शकों ने उसका विरोध किया था। नेटफ्लिक्स को उस फिल्म को अपने प्लेटफार्म से हटाना पड़ा था। जिस दिन राहुल गांधी फिल्मों, टीवी और मीडिया को समग्रता में देखना आरंभ करेंगे वो इसको राजनीति के ‘हथियार’ के तौर पर उपयोग करना बंद कर देंगे।  

Saturday, September 27, 2025

कांग्रेस को परेशान करनेवाले प्रश्न


दीवाली के पहले घरों में साफ-सफाई की जाती है। इस परंपरा का पालन हर घर में होता है। हमारे घर भी हुआ। घर के पुस्तकालय की सफाई के दौरान चालीस पेज की एक पुस्तिका मिली जिसने ध्यान खींचा। पुस्तिका का नाम है ‘घोटाले में घोटाला’। इस पुस्तिका का लेखन, संपादन और सज्जा अभय कुमार दुबे का है। अभय कुमार दुबे पत्रकार और शिक्षक रहे हैं। कुछ दिनों के लिए इन्होंने सेंटर फार द स्टडी आफ डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) में भी कार्य किया है। इन्होंने कई पुस्तकें भी लिखी हैं। समाचार चैनलों पर विशेषज्ञ के रूप में भी दिखते हैं। ‘घोटाले में घोटाला’ पुस्तिका का प्रकाशन जनहित के लिए किया गया था। ऐसा इसमें उल्लेख है। दिल्ली के इंद्रप्रस्थ एक्सटेंशन के पते पर स्थापित पब्लिक इंटरेस्ट रिसर्च ग्रुप ने इसका प्रकाशन किया है। इसमें एक और दिलचस्प वाक्य है जिसको रेखांकित किया जाना चाहिए। ये वाक्य है- इस पुस्तिका की सामग्री पर किसी का कापीराइट नहीं है, जनहित में इसका इस्तेमाल किया जा सकता है। इसका प्रकाशन वर्ष अक्तूबर 1992 है। उस समय देश में कांग्रेस पार्टी का शासन था और पी वी नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री और मनमोहन सिंह वित्त मंत्री थे। इसमें दो दर्जन लेख हैं जो उस शासनकाल के घोटालों पर लिखे गए हैं।

इस पुस्तिका में एक लेख का शीर्षक है, ओलंपिक वर्ष के विश्व रिकार्ड इसका आरंभ इस प्रकार से होता है, दौड़-कूद का ओलंपिक तो बार्सिलोना में हुआ जिसमें भारत कोई पदक नहीं जीत पाया। अगर घोटालों, जालसाजी, भ्रष्टाचार, धोखाधड़ी, जनता के पैसे का बेजा इस्तेमाल और चोरी के बावजूद सीनाजोरी का ओलंपिक होता तो कई भारतवासियों का स्वर्ण पदक मिल सकता था। व्यंग्य की शैली में लिखे गए इस लेख में एम जे फेरवानी, आर गणेश, बैंक आफ करड, वी कृष्णमूर्ति, पी चिदंबरम, हर्षद मेहता और मनमोहन सिंह के नाम हैं। मनमोहन सिंह के बारे में अभय कुमार दुबे लिखते हैं, ‘मासूमियत का अथवा जान कर अनजान बने रहने का स्वर्ण पदक। वित्तमंत्री कहते हैं कि उन्हें जनवरी तक तो कुछ पता ही नहीं था कि शेयर मार्केट में पैसा कहां से आ रहा है। और अगर हर्षद उनसे मिलना चाहता तो भारत के एक नागरिक से मिलने से वो कैसे इंकार कर देते। मनमोहन सिंह को अपनी सुविधानुसार विचार बदल लेने का स्वर्ण पदक भी मिल सकता है। पहले वो विश्व पूंजीवादी व्यवस्था के भारी आलोचक हुआ करते थे। पिछले 20 साल से वे भारत की आर्थिक नीति निर्माता मंडली के सदस्य रहे और वे नीतियां भी उन्हीं ने बनाई थीं जिनकी वे आज आलोचना कर रहे हैं।‘ आज मनमोहन सिंह को लेकर कांग्रेस और उनके ईकोसिस्टम से जुड़े लोग बहुत बड़ी बड़ी बातें करते हैं। लेकिन समग्रता में अगर पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का आकलन किया जाएगा तो इन बिंदुओं पर भी चर्चा होनी चाहिए। यह भी कहा जाता है कि मनमोहन सिंह की नीतियों के कारण 2008 के वैश्विक मंदी के समय देश पर उसका असर न्यूनतम हुआ। इसपर भी अर्थशास्त्रियों के अलग अलग मत हैं। प्रश्न ये उठता है कि मनमोहन सिंह के वित्त मंत्री रहते हुए शेयर मार्केट में जो घोटाला हुआ था क्या उसको भी उनके पोर्टफोलियो में रखा जाना चाहिए या सारी जिम्मेदारी प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव पर डाल देनी चाहिए। कांग्रेस के नेता राहुल गांधी इस समय की सरकार को अदाणी-अंबानी से जोड़ते ही रहते हैं। 1991 में जब कांग्रेस की सरकार बनी थी तब के हालात कैसे थे?  2004 से 2014 तक मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे तब कांग्रेस पर किसी उद्योगपति को लाभ पहुंचाने के आरोप लगे थे या नहीं?  इन दिनों राहुल गांधी सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के बंद होते जाने पर भी कई बार सवाल खड़े करते हैं और मोदी सरकार पर बेरोजगारी बढ़ाने का आरोप लगाते हैं। उनकी पार्टी के शासनकाल के दौरान विनिवेश को लेकर जो आरोप सरकार पर लगे थे उसपर भी उनको विचार करना चाहिए। सत्ता में रहते अलग सुर और विपक्ष में अलग सुर ये कैसे संभव हो सकता है।

इन दिनों राहुल गांधी और कांग्रेस का पूरा ईकोसिस्टम ईडी-ईडी का भी शोर मचाते घूमते हैं। घोटाले में घोटाला पुस्तिका में उल्लेख है, ‘सीबीआई को जांच में इसलिए लगाया गया था ताकि घोटाले में राजनीतिक हाथ का पता लगाकर कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति में हिसाब साफ कर लिया जाए। इसका दूसरा मकसद यह भी था कि सीबीआई कुछ गिरफ्तारियां करके और कुछ मुकदमे चलाकर जनता के सामने यह दिखा सकती थी कि सरकार घोटाले के अपराधियों को पकड़ने के लिए कितनी गंभीर है। चूंकि केवल दिखावा करना था इसलिए सीबीआई की एक जांच टीम को ही पूरी जांच नहीं दी गई वरन उसे बांट दिया गया।‘ आगे लिखा है कि सीबीआई ने अनुमान से अधिक मात्रा में राजनीतिक हाथ खोज निकाला जिससे सरकार के लिए थोड़ी समस्या हो गई क्योंकि किसी नेता का भांडाफोड़ उसे इंका (इंदिरा कांग्रेस) की अंदरूनी राजनीति में फायदेमंद लगता था और किसी का नुकसानदेह। इसलिए माधवन को चलता कर सीबीआई के पर कतर दिए गए।‘ एजेंसियों के दुरुपयोग की कांग्रेस राज में बहुत लंबी सूची बनाई जा सकती है। इस कारण जब राहुल गांधी ईडी को लेकर सरकार पर आरोप लगाते हैं तो जनता पर उसका प्रभाव दिखता नहीं है। उनके पार्टी पर इस तरह के आरोपों का इतना अधिक बोझ है जिससे वो मुक्त हो ही नहीं सकते। 

इस पुस्तिका में एक और विस्फोटक बात लिखी गई है, ‘कृष्णमूर्ति के घर पर छापे में सीबीआई ने सोनिया गांधी के दस्तखत वाला एक धन्यवाद पत्र बरामद किया जिसमें राजीव गांधी फाउंडेशन के लिए कोष जमा करने के लिए फाउंडेशन के चेयरमैन के रूप में उन्हें धन्यवाद दिया गया था। हर्षद मेहता और एक उद्गोयपति ने भी तो फाउंडेशन को 25-25 लाख रुपए के चेक दिए थे। दुबे यहां प्रश्न पूछते हैं कि ये धन कौन सा था? वही जो दलाल बैंकों से लेकर सट्टा बाजार में लगाते थे। इस धन से कमाई दलालों की संपत्ति तो जब्त कर ली गई पर यही पैसा तो राजीव गांधी फाउंडेशन में पड़ा है। क्या इसे जब्त करना और इसकी परतें खोलना सीबीआई का फर्ज नहीं था। राजीव गांधी फाउंडेशन की निर्लज्जता देखिए, उसने कृष्णमूर्ति के जेल जाने के बावजूद उन्हें अपनी सदस्यता से न हटाने का फैसला किया। हां, हर्षद वगैरह के जरिए मिले चंदे को मुंह दिखाई के लिए कस्टोडियन के चार्ज में जरूर दे दिया।‘ राजीव गांधी फाउंडेशन पर कोष जमा करने के कई तरह के आरोप लगते रहे हैं। आज की पीढ़ी को को ये जानने का अधिकार तो है ही कि नब्बे के दश्क में कांग्रेस के शासनकाल में किस तरह से कार्य होता था और किस तरह के आरोप लगते थे। क्या राजीव गांधी फाउंडेशन के कोष जमा करने के तरीकों के खुलासे के बाद ही तो गांधी परिवार और नरसिम्हा राव के रिश्तों में खटास आई। क्या इन सब का ही परिणाम था कि नरसिम्हा राव के निधन के बाद उनके पार्थिव शरीर को कांग्रेस के कार्यालय में अंतिम दर्शन के लिए नहीं रखा गया। ये सभी ऐसे प्रश्न हैं जो कांग्रेस और राहुल गांधी को परेशान करते रहेंगे।         


Saturday, January 18, 2025

आक्रामक दिखने का हास्यास्पद प्रयोग


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत के बयान की राहुल गांधी ने आलोचना की। आलोचकों ने संघ को घेरने के लिए इय बयान के चुनिंदा अंश को आधार बनाया। सबसे पहले हम देखते हैं कि मोहन भागवत ने कहा क्या था। उन्होंने कहा कि, ‘प्रतिष्ठा द्वादशी, पौष शुक्ल द्वादशी का नया नामकरण हुआ। पहले हम कहते थे बैकुंठ एकादशी, बैकुंठ द्वादशी अब उसे प्रतिष्ठा द्वादशी कहना क्योंकि अनेक शतकों से परतंत्रता झेलने वाले भारत के सच्चे स्वतंत्रता की प्रतिष्ठा उसी दिन हो गई। स्वतंत्रता थी, प्रतिष्ठित नहीं हुई थी। भारत स्वतंत्र हुआ 15 अगस्त को राजनीतिक स्वतंत्रता आपको मिल गई। हमारा भाग्य निर्धारण करना हमारे हाथ में है। हमने एक संविधान भी बनाया एक विशिष्ट दृष्टि जो भारत के अपने स्व से निकलती है, उसमें से वह संविधान दिग्दर्शित हुआ, लेकिन उसके जो भाव है, उसके अनुसार चला नहीं और इसलिए हो गए सब स्वप्न साकार कैसे मान लें, टल गया सर से व्यथा का भार कैसे मान लें”। ऐसी परीस्थिति समाज की, क्योंकि जो आवश्यक स्वतंत्रता में स्व का अधिष्ठान होता है, वह लिखित रूप में संविधान से पाया है, लेकिन हमने अपने मन को उसकी पक्की नींव पर आरूढ़ नहीं किया है। हमारा स्व क्या है? राम कृष्ण शिव, यह क्या केवल देवी देवता हैं, या केवल विशिष्ट उनकी पूजा करने वालों के हैं? ऐसा नहीं है। राम उत्तर से दक्षिण भारत को जोड़ते हैं।‘ अपने वक्तव्य में वो आगे भी काफई कुछ कहते हैं । 

राहुल गांधी ने शतकों से परतंत्रता झेलने वाले भारत के सच्चे स्वतंत्रता की प्रतिष्ठा को असली आजादी बताकर संघ पर हमला किया। उन्होंने कहा कि आरएसएस के प्रमुख ने कहा कि भारत ने 1947 में स्वतंत्रता हासिल नहीं की, उन्होंने कहा कि भारत को सच्ची स्वतंत्रता तब मिली जब राममंदिर का निर्माण हुआ। वो इससे भी आगे चले गए और कहा कि भागवत का ये बयान देशद्रोह है और अगर वो दूसरे देश में होते तो उनको गिरफ्तार किया जा सकता था। आगे और भी बहुत कुछ बोले जिसमें सभी संस्थाओं पर संघ के कब्जे की बात से लेकर ये तक कह गए कि हमलोग बीजेपी, आरएसएस और भारतीय राज्य (इंडियन स्टेट) के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे हैं। पहली बात तो ये कि संघ प्रमुख ने कहा ही नहीं कि देश को असली आजादी राम मंदिर बनने के बाद मिली। उन्होंने कहा कि हमारी स्वतंत्रता उस दिन प्रतिष्ठित हुई। 15 अगस्त 1947 को देश को स्वतंत्रता मिली लेकिन जिस स्व तंत्र की बात हो रही है क्या वो 1947 में मिल गई थी। इस संबंध में प्रसिद्ध राजनीति विज्ञानी रजनी कोठारी की पुस्तक पालिटिक्स इन इंडिया को देखना चाहिए। इसमें वो एक अध्याय का आरंभ ही इस बात से करते हैं कि स्वतंत्रता हासिल करने के बाद, बदलाव और पुनर्निर्माण की घोषणा होती है, लेकिन भारत में जो राजनीतिक परंपरा चली आ रही थी उसमें कोई गहन बदलाव नहीं आया। हिंदू परंपरा, पश्चिमी राजनीतिक विचार और पुनर्निमाणात्मक राष्ट्रवाद ने राष्ट्र के पुनर्निमाण का एक रास्ता तय किया। इसी क्रम में रजनी कोठारी आगे लिखते हैं कि 1947 के बाद जब कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व में सरकार बनी तो एक ऐसा अभिजात वर्ग उभरा जो भारत छोड़कर जा रहे अंग्रेज अभिजात वर्ग के विचार और अनुभवों का पोषक था। वो तो यहां तक कह जाते हैं कि इस अभिजात्य विचार ने व्यक्तिगत और सांस्थानिक विचार को प्रभावित किया। कहने का तात्पर्य ये है कि स्वतंत्रता के बाद कोठरी जिस अंग्रेजी अभिजात्य विचार की बात करते थे वो खत्म नहो हो सका। स्व स्थापित नहीं हो सका।  

इसको इस तरह से भी कहा जा सकता है कि भारतीय परंपरा और भारतीय विचार को पूर्ण रूप से नहीं अपनाया जा सका। वो जिन संस्थाओं की बात कर रहे हैं उसमें भी अंग्रेजों के अभिजात्य विचार का प्रभाव बना रहा। शिक्षा से लेकर सांस्कृतिक प्रतिष्ठान तक उससे प्रभावित रहे। इस तरह के विचार कोठारी के अलावा कई अन्य राजनीति विज्ञानी मानते और कहते रहे हैं। तो क्या ये मान लिया जाए कि वो सभी लोग देशद्रोही और संविधान विरोधी थे। वासुदेव शरण अग्रवाल से लेकर कुबेरनाथ राय तक जिस सांस्कृतिक परंपरा की व्याख्या करते रहे हैं, वो 1947 के बाद के वर्षों में स्थापित हो पाई। जिस स्व की बात हमारे मनीषी करते थे क्या वो हस्तगत हो पाया। इसपर विचार की आवश्यकता है। संघ प्रमुख ने संविधान में स्व की दृष्टि और भाव की बात की जिसको राहुल गांधी संविधान का अपमान बता रहे हैं। 

राहुल गांधी इन दिनों संविधान की बहुत बात करते हैं। संविधान को लेकर एक दिलचस्प प्रसंग। तय हुआ कि संविधान सभा के सभी सदस्य संविधान पर हस्ताक्षर करेंगे। राहुल गांधी की दादी के पिता जवाहरलाल नेहरू भी संविधान सभा के सदस्य थे। उन्होंने सबसे पहले दस्तखत कर दिया। अब संविधान सभा के अध्यक्ष डा राजेन्द्र प्रसाद के सामने संकट कि वो कहां हस्ताक्षर करें। उन्होंने नेहरू जी के दस्तखत के ऊपर हिंदी और अंग्रेजी दोनों में अपने हस्ताक्षर किए। जिसको देखकर ही लगता है कि जगह बनाकर किसी तरह अध्यक्ष ने अपने हस्ताक्षर किए। जब देश में पहला आमचुनाव होने जा रहा था तो उसके परिणाम के पहले ही नेहरू जी ने संविधान में पहला संशोधन करवा दिया। होना ये चाहिए था कि जन प्रतिनिधि निर्वाचित होते और नई संसद का गठन होता उसके बाद संविधान में संशोधन होता। पर नेहरू जी ने मनमानि की। सिर्फ नेहरू जी ने ही क्यों उनके बाद उनकी पुत्री ने तो संविधान का मजाक ही बना दिया। देश में इमरजेंसी लगाई। बाद में इंदिरा जी के पुत्र राजीव गांधी ने प्रधानमंत्री रहते हुए संसद के द्वारा प्रेस की स्वतंत्रता पर लगाम लगाने की कोशिश की। मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्रित्व काल में भी ऐसी ही एक कोशिश हुई। केबल और टेलीविजन एक्ट में संशोधन करके न्यूज चैनलों पर काबू करने का असफल प्रयास हुआ था।

इन सबसे अलग हटकर भी अगर देखा जाए तो संविधान में या जिन संस्थाओं में भारतीय धर्म प्रतीकों की बात हमारे संविधान निर्माताओं ने अंगीकार किया था क्या हमारा देश अबतक उस दिशा में चल पाया है। रजनी कोठारी भी ये मानते हैं कि राज्य को स्वतंत्रता की स्थितियां पैदा करनी चाहिए उसमें बाधा नहीं खड़ी करनी चाहिए। 1947 के बाद अगर देखा जाए तो कांग्रेस के शासनकाल में कई बार स्वतंत्रता की स्थितियों में बाधा उत्पन्न की गईं। जिसका विस्तार से जिक्र ऊपर किया जा चुका है। राहुल गांधी अंग्रेजी में बोलते हैं। उनको ये समझना होगा कि भाषा केवल शब्दों का समूह भर नहीं है उससे प्रभाव पैदा होता है, निर्मिति होती है। शब्दों का अपना संस्कार होता है इस कारण से सार्वजनिक जीवन में रहनेवालों को शब्दों के संस्कार और उसकी परंपरा से परिचित होना आवश्यक है। अन्यथा उनके वक्तव्य हास्यास्पद हो जाते हैं। देशद्रोही ऐसा ही एक शब्द है। विचार तो इस बात पर भी होना चाहिए कि क्या स्वतंत्रता के इतने वर्षों बाद भी हम संविधान निर्माताओं के सोच या भाव को राष्ट्र-जीवन में उतार सके हैं। क्या स्व की अवधारणा तक पहरुंचने में हमें सफलता प्राप्त हुई है।   

Saturday, May 18, 2024

अमेठी में भावना और विकास का संघर्ष


सोमवार को लोकसभा के पांचवें चरण के लिए मतदान होना है। उत्तर प्रदेश की कई अन्य सीटों के साथ रायबरेली और अमेठी में भी इस दिन वोट डाले जाएंगे। 2019 में अमेठी से पराजित होने के बाद कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी बगल की सीट रायबरेली से चुनाव लड़ रहे हैं। अबतक उनकी मां सोनिया गांधी रायबरेली से सांसद थीं। अमेठी से केंद्रीय मंत्री स्मृति इरानी भारतीय जनता पार्टी की प्रत्याशी के रूप में तीसरी बार चुनाव मैदान में हैं। उनके सामने लंबे समय से गांधी परिवार का कामकाज देखनेवाले किशोरी लाल शर्मा कांग्रेस के उम्मीदवार हैं। अमेठी में कांग्रेस पार्टी की तरफ से प्रचार का जिम्मा प्रियंका गांधी वाड्रा ने ले रखा है। वो गली मोहल्लों में चुनावी सभा कर रही हैं। चुनाव को भावनात्मक रूप देने का भी प्रयत्न किया जा रहा है। वो निरंतर अपने पिता राजीव गांधी और उनके कार्यों के बारे में बोल रही हैं। तुलनात्मक रूप से अगर देखा जाए तो प्रियंका गांधी वाड्रा राहुल गांधी के अमेठी के सांसद के तौर पर 15 वर्षों के काम पर बहुत ही कम बोल रही हैं। लगभग हर सभा में गांधी परिवार और अमेठी के रिश्तों को रेखांकित करती हुई नजर आईं। इस रिश्ते पर अमेठी की जनता का कितना भरोसा था ये तो 2019 के चुनाव परिणाम में सामने आ गया था, जब स्मृति इरानी ने राहुल गांधी को 55 हजार से अधिक मतों से पराजित कर दिया था। गांधी परिवार के सदस्य की अमेठी से ये तीसरी हार थी। इसके पहले संजय गांधी भी 1977 का लोकसभा चुनाव वहां से हार चुके थे। बाद में मेनका गांधी भी राजीव गांधी के खिलाफ चुनाव लड़कर हारीं। राहुल गांधी की हार इस मायने में कांग्रेस की राजनीति का एक अहम मोड़ था क्योंकि वो तब पार्टी के अध्यक्ष थे। राहुल गांधी कांग्रेस पार्टी के पहले अध्यक्ष थे जो पद पर रहते हुए लोकसभा का चुनाव हारे थे। 

रही बात प्रियंका गांधी वाड्रा की तो उत्तर प्रदेश का 2022 का विधानसभा चुनाव कांग्रेस ने प्रियंका गांधी की अगुवाई में लड़ा था और पूरे प्रदेश में कांग्रेस को सिर्फ दो सीटें मिली थीं। पूरे प्रदेश में कांग्रेस का मत प्रतिशत भी दो ढाई प्रतिशत के करीब तक गिर गया था। राजनीतिक पंडित भी इस बात को मानते हैं कि अगर किसी पार्टी को चुनाव में छह प्रतिशत से कम वोट मिलते हैं तो उसको फिर से खड़ा होने में काफी समय लगता है। कांग्रेस इस समस्या से जूझ रही है। पिछले दिनों अमेठी और रायबरेली लोकसभा क्षेत्र में जाने और वहां के मतदाताओं से मिलने और बात करने का अवसर मिला था। वहां ये पता चला कि 2003 में जब प्रियंका गांधी अमेठी आई थीं तो उनके साथ उनके पति राबर्ट वाड्रा भी आए थे। उस समय राबर्ट और प्रियंका का अमेठी के लोगों ने स्वागत किया था। कई गांव में उनको ले जाया गया था। अमेठी में पोस्टर भी लगे थे कि दीदी जीजा जी आए हैं नई रोशनी लाए हैं। उसके बाद हर चुनाव के समय पहले दीदी, फिर जीजा जी आते रहे, चुनावी वादे होते रहे। उन वादों को जमीन पर उतरने का अमेठी के लोगों को इंतजार ही रहा। जब वादे पूरे नहीं हुए तो प्रियंका वाड्रा को अमेठी की जनता की उदासीनता का सामना भी करना पड़ा था। कुछ लोग किशोरी लाल शर्मा के क्षेत्र से जुड़े होने का दावा करते नजर आए लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में किशोरी लाल शर्मा को कांग्रेस ने ही कम तवज्जो दी थी। तब राहुल गांधी के प्रतिनिधि चंद्रकांत दुबे थे। प्रियंका के सहयोगी धीरज श्रीवास्तव और राहुल के करीबी साथी कनिष्क सिंह चुनाव में अहम भूमिका निभा रहे थे। जब राहुल गांधी ने अमेठी ने न लड़ने का निर्णय लिया तो पार्टी को किशोरी लाल शर्मा की याद आई। किशोरी लाल शर्मा अच्छे चुनावी मैनेजर हो सकते हैं लेकिन एक नेता के तौर पर उनके काम का सामने आना अभी शेष है। अमेठी के जिन वोटरों से मैं मिला उनमें किशोरी लाल शर्मा को लेकर एक संशय दिखा। 

2019 में जब अमेठी लोकसभा चुनाव हो रहे थे तब भी मैं उस क्षेत्र में गया था। चुनाव के बाद भी कई बार गया। इस बार अमेठी में जो बदलाव देखने का मिला वो कई मायनों में गेमचेंजर हो सकता है। चार पांच वर्ष पहले अमेठी के कई गांवों में छप्पर वाले घर दिखाई देते थे। अब कम गांवों में ही छप्पर वाले घर दिखाई देते हैं। गौरीगंज से जामों जानेवाली सड़क पर दुबे जलपान गृह में हमलोग कुछ देर के लिए रुके थे। वहां माधोपुर गांव के कुछ लोग बैठे थे। उनसे जब इस बारे मे बात की तो उनकी भी राय थी कि अमेठी लोकसभा क्षेत्र में छप्पर वाले घर बहुत कम हो गए हैं। प्रधानमंत्री आवास योजना में लोगों के घर पक्के हो गए हैं। शौचालय बन गए हैं। वहां बैठे रामाधर सिंह ने बताया कि छप्पर कम होने से अमेठी में आग लगने की घटनाएं बहुत कम हो गई हैं। पहले अमेठी में आग लगने की काफी घटनाएं होती थीं। यह अनायस नहीं है कि भारतीय जनता पार्टी की प्रत्याशी स्मृति इरानी यह दावा करती हैं कि उनके क्षेत्र में प्रधानमंत्री आवास योजना के अंतर्गत एक लाख चौदह हजार घर बने और चार लाख से अधिक शौचालय बने। वो ये भी बताती हैं कि इतना काम तीन वर्षों में ही हो पाया क्योंकि दो वर्ष कोरोना महामारी की भेंट चढ़ गए। इस जलपान गृह में काफी देर तक हमलोग अमेठी की राजनीति को समझने का प्रयत्न करते रहे। यहां कुछ कांग्रेस समर्थक भी आए। पहले तो उन्होंने आते ही प्रत्याशी किशोरी लाल की प्रशंसा आरंभ की। थोड़ी देर बाद वो खुले तो उनका दर्द झलक गया और कहने लगे कि राहुल गांधी अपने आसपास के लोगों से इतना घिरे रहते हैं कि जनता उनसे मिल ही नही पाती है। उनमे में से एक बुजुर्ग व्यक्ति ने बहुत मार्के की बात कही, राजीव गांधी और संजय गांधी अमेठी से भावनात्मक संबंध इस कारण बना पाए थे कि उनके पास सतीश शर्मा, जे एन मिश्रा और किशोर उपाध्याय जैसे समर्पित व्यक्ति थे, जो निरंतर क्षेत्र की जनता के साथ संवाद और संपर्क में रहते थे। अपने नेता और जनता के बीच दीवार नहीं बनते थे। 

यहां से गौरीगंज के कांग्रेस कार्यालय होते हुए हमलोग आलोक ढाबा पहुंचे। 2014 में इसी आलोक ढाबा से स्मृति इरानी ने अपना चुनाव लड़ा था। वहां चुनावी सरगर्मी बनी रहती है। इस ढावा के मालिक आलोक जी सह्दय व्यक्ति हैं। बोलते कम, सुनते और मुस्कुराते ज्यादा हैं। वहीं पर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ता मतदाता जागरूक रैली की तैयारी कर रहे थे। वो बहुत उत्साहित थे। वहां पर विद्यार्थी परिषद के सुल्तानपुर और अमेठी के संगठन मंत्री प्रिंस कुमार मिले। उनसे राजनीति की बहुत बातें होती रहीं। उनकी बातों में राजनीतिक परिपक्वता झलक रही थी। अमेठी चुनाव और कार्यकर्ताओं को लेकर उनकी टिप्पणी उचित प्रतीत हुई। उन्होंने कहा कि विद्यार्थी परिषद से जुड़े कई कार्यकर्ताओं के घर के बड़े कांग्रेसी हैं, जिस कारण वो मुखर नहीं हो पा रहे हैं। जब हम वापस लौटने को हुए तो प्रिंस ने एक बेहद सधी हुई टिप्पणी कर दी। उन्होंने कहा कि अमेठी में कांग्रेस पार्टी नहीं, प्रथा है। किसी भी प्रथा को समाप्त करने में समय लगता है। बाल विवाह प्रथा को समाप्त करने के लिए समाज सुधारकों को काफी लंबा संघर्ष करना पड़ा था। लेकिन अब भी पूरी तरह से ये प्रथाएं समाप्त नहीं हुईं कहीं न कहीं इसके अवशेष देखने को मिल ही जाते हैं। इस राजनीतिक आब्जर्वेशन से चौंका पर ट्रेनिंग तो विद्यार्थी परिषद की है। 


Saturday, May 11, 2024

संविधान बदलने का भ्रामक नैरेटिव


लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस और आईएनडीआईए के घटक दल संविधान को बदलने का नैरेटिव गढ़ने का प्रयत्न रही है। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी अपने चुनावी भाषणों में भारतीय जनता पार्टी पर संविधान बदलने की मंशा का आरोप लगा रहे हैं। जनता को ये बताकर भयभीत करने का प्रयत्न भी कर रहे हैं कि अगर नरेन्द्र मोदी की सरकार बनती है तो वो संविधान को बदल देंगे। राहुल गांधी तो चुनावी सभाओं में संविधान हाथ में लेकर निरंतर इस बात पर बल दे रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह बहुत स्पष्ट रूप से ये कह चुके हैं कि वो संविधान उनके लिए सबसे पवित्र है और उनकी पार्टी संविधान को बदलने के बारे में सोच भी नहीं सकती है। बावजूद इसके आईएनडीआईए में शामिल क्षेत्रीय दलों के नेता भी संविधान बदलने के नैरेटिव को मजबूती देने के लिए प्रयत्नशील हैं। कोई एक हाथ में संविधान की प्रति लेकर वीडियो बना रहे है तो कोई इसको आरक्षण से जोड़ रहे हैं। कोई इस नैरेटिव को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक रहे माधव सदाशिवराव गोलवलकर से जोड़कर नई व्याख्या कर रहे हैं। कुछ लोग इस नैरेटिव को मजबूती देने के लिए गोलवलकर की पुस्तक बंच आफ थाट्स का हवाला दे रहे हैं। कुल मिलाकर संविधान बदलने के नैरेटिव के जरिए वंचित समाज के मतदाताओं के मन में ये बात डालने की कोशिश हो रही है कि अगर मोदी सरकार तीसरी बार आएगी तो  आरक्षण खत्म कर देगी। ये पिछले कई चुनावों से होता आया है। जब भी देश में कोई महत्वपूर्ण चुनाव आता है तो विपक्ष, भारतीय जनता पार्टी पर आरक्षण खत्म करने की कोशिश करने का आरोप लगाते हैं। कभी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संबद्ध किसी अधिकारी की बात को तोड़-मरोड़ कर तो कभी किसी पुरानी पुस्तक की पंक्तियों को उठाकर तो कभी डीप फेक वीडियो बनाकर ये भ्रम फैलाने की कोशिश होती है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत, सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले, प्रधानमंत्री मोदी तक इस बारे में कई बार ये बात कह चुके हैं कि आरक्षण खत्म करने जैसी कोई बात ही नहीं है। बाबा साहब के बनाए संवैधानिक व्यवस्था में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा। लेकिन चुनाव के समय विपक्ष बार-बार ये राग बजाता ही रहता है।   

कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी को संविधान बदलने के इस नैरेटिव को गढ़ते और रैलियों में संविधान की प्रति लहराते देखकर पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की जेल डायरी में 13 अप्रैल 1976 को लिखी एक टिप्पणी याद आ गई। चंद्रशेखर ने लिखा था, आज कांग्रेस कार्यसमिति ने संविधान में किए जानेवाले संशोधन के संबंध में स्वर्ण सिंह समिति की रिपोर्ट पर विचार किया। जो सुझाव दिए गए हैं, उनके अनुसार संविधान में व्यापक संशोधन होगा। उच्च न्यायालयों के अधिकारों में भारी कटौती होगी। उच्चतम न्यायालय पर भी बहुत कुछ प्रतिबंध लग जाएगा। संविधान संशोधनों को चुनौती नहीं दी जा सकेगी और अन्य विधेयकों की वैधता की जांच के बारे में भी उच्चतम न्यायालय के सात न्यायाधीशों की पीठ ही सुनवाई कर सकेगी। वह भी निर्णय दो तिहाई बहुमत से होना चाहिए। चुनाव के मुकदमे न्यायालयों की परिधि से बाहर होंगे। उनका निर्णय एक समिति द्वारा होगा जिसमें संसद के प्रतिनिधि और राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत सदस्य होंगे। इस प्रकार यह समिति पूरी तरह बहुमत प्राप्त राजनीतिक दल के पक्ष में होगी। सरकारी सेवा संबंधी मामलों का निर्णय इसके लिए नियुक्त ट्रिब्यूनल द्वारा किया जाएगा। मौलिक अधिकारों के बारे में प्रत्यक्षीकरण की याचिका सुनने का अधिकार उच्च न्यायालयों को होगा, किंतु आपातकालिन स्थिति में इसे भी समाप्त कर दिया गया है। इन सुझावों में, कुछ ऐसे हैं, जो आवश्यक हैं, किंतु जिस प्रकार न्यायालयों के अधिकारो को सीमित करने का प्रयास हो रहा है और जिस वृत्ति का परिचय थोड़े दिनों में संसद ने दिया है उससे अनेक भयंकर संभावनाओं को अस्वीकार नहीं किया जा सकता है। चुनावों में धांधली पर कोई अंकुश नहीं रह जाएगा। ऐसी स्थिति में सारी लोकशाही को ही खतरा पैदा हो सकता है। कानून-व्यवस्था, शिक्षा और कृषि में अब केंद्र को सामान्य रूप से हस्तक्षेप करने का अधिकार हो जाएगा। इस प्रकार राज्यों द्वारा अधिकार और सत्ता प्राप्त करने की मांग को ठेस लगेगी। इन सुझावों के पीछे उद्देश्य कितने भी उच्च हों, केंद्र को अधिक से अधिक अधिकार देकर सत्ता के विकेन्द्रीकरण की बात को पीछे धकेला जा सकता है। यह स्वस्थ विकास नहीं है।

चंद्रशेखर की इस टिप्पणी के बाद जब कांग्रेस पार्टी किसी अन्य दल पर संविधान बदलने की मंशा का आरोप लगाती है तो आरोप खोखले लगते हैं। कांग्रेस की उस समय की कार्यसमिति में कितनी खतरनाक बातें हुई थीं। स्वर्ण सिंह समिति की सिफारिशों में संविधान को बदलने का जो मंसूबा था वो पूरा हो पाया नहीं ये अलग बात है। महत्वपूर्ण ये है कि कांग्रेस पार्टी का सोच कैसा था। किस तरह के प्रस्तावों पर उनकी कार्यसमिति में चर्चा होती थी। उच्चतम न्यायालयों के अधिकारों की कटौती की चर्चा भी कार्यसमिति में हो चुकी है। चुनावी मुकदमों की सुनवाई का फैसला न्यायालयों की परिधि से बाहर रखने पर कांग्रेस के दिग्गज नेताओं ने मंथन किया था। इसकी तो पृष्ठभूमि भी थी, इंदिरा गांधी के चुनाव को कोर्ट ने रद कर दिया था। बाद में उच्चतम न्यायालय में क्या हुआ उसको दोहराने का अर्थ नहीं है। कांग्रेस की लोकतंत्र को लेकर मंशा को समझने के लिए इंदिरा गांधी और बीजू पटनायक के एक संवाद का हवाला दिया जा सकता है। बीजू पटनायक का दावा था कि इंदिरा गांधी ने 1970-71 के आसपास कभी उनसे कहा था कि राजनीति में नैतिकता कुछ नहीं होती। सफलता ही सबकुछ है। उसे किसी भी प्रकार प्राप्त करना चाहिए। इंदिरा जी चुनावों को इतना महंगा बना देना चाहती थीं कि कोई भी विरोधी पार्टी उस दौड़ में शामिल ही न हो पाए। बकौल बीजू पटनायक इंदिरा गांधी वैसा ही अधिकार चाहती थीं जैसा टीटो और नासिर के पास थे। 1975 में देश में इमरजेंसी लगाकर इंदिरा गांधी ने ये प्रयास भी किया। चंद्रशेखर इंदिरा गांधी की अधिनायकवादी प्रवृत्तियों को लेकर चिंतित रहा करते थे।

हमारे देश के संविधान में सौ से अधिक संशोधन हो चुके हैं लेकिन उन बदलावों को देखा जाना चाहिए जिसने व्यापक वर्ग को प्रभावित किया। यह काम किन प्रधानमंत्रियों ने किया, इसको भी देखे जाने की आवश्यकता है। पहला संविधान संशोधन जिसमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित किया गया वो नेहरू के कार्यकाल में हुआ। मूल संविधान की प्रस्तावना से छेड़छाड़ करके उसमें समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता को जोड़ा जाना इंदिरा गांधी के कार्यकाल में हुआ। राजीव गांधी ने तो शाहबानो केस में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को बदलने के लिए संविधान में ही बदलाव कर दिया। मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री रहते टीवी चैनलों की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने का प्रस्ताव आया था। अगर पिछले 10 वर्षों में देखें तो मुस्लिम महिलाओँ की जिंदगी बेहतर करने के लिए तीन तलाक की व्यवस्था को खत्म किया गया। अनुच्छेद 370 को खत्म करने के लिए संविधान में संशोधन किया गया। आज जो दल नरेन्द्र मोदी पर संविधान बदलने की मंशा का आरोप लगा रहे हैं उनको ये समझना चाहिए कि अगर संविधान में बदलाव करना होता तो पिछले 10 साल में इसकी कोशिश दिखाई देती। जब अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी करने जैसा साहसिक कदम उठा लिया गया तो अगर अन्य बदलाव करने का भी उद्देश्य होता तो उसको भी किया जा सकता था। राहुल गांधी और उनके कामरेड भले ही संविधान बदलने का नैरेटिव बनाने का प्रयास करें लेकिन कांग्रेस पर अतीत के निर्णयों और चर्चाओं का जो बोझ है वो इस नैरेटिव को प्रमाणिकता दे पाएगी, इसमें संदेह है। संदेह तो इस नैरेटिव के जनस्वीकृति में भी है।  

Saturday, May 4, 2024

अमेठी से जीत का नहीं था भरोसा


लोकसभा चुनाव के दौरान अमेठी और रायबरेली से कांग्रेस प्रत्याशी की घोषणा को लेकर अनिश्चितता नामांकन के अंतिम दिन दूर हुई। कांग्रेस पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी रायबरेली से कांग्रेस के उम्मीदवार बने। प्रियंका गांधी वाड्रा के चुनाव लड़ने पर भी कयास लगाए जा रहे थे लेकिन चुनावी रण से दूर रहेंगी। भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने राहुल गांधी पर अमेठी का रण छोड़ने का आरोप लगाया। प्रियंका गांधी वाड्रा के बारे में ये कहा गया कि वो कांग्रेस की स्टार प्रचारक हैं, पूरे देश में पार्टी का प्रचार करना है, इस कारण वो चुनाव नहीं लड़ रही हैं। इस पूरे प्रकरण के दौरान कई ऐसी बातें आईं जिनके बारे में विचार करना आवश्यक है। तथ्यों को देखना भी। निरंतर ये कहा जाता रहा है कि रायबरेली और अमेठी गांधी परिवार का गढ़ है। आंकड़े इस बात की गवाही देते हैं कि रायबरेली कांग्रेस पार्टी का गढ़ तो हो सकता है लेकिन गांधी परिवार का नहीं। इमरजेंसी के बाद हुए चुनाव में इंदिरा गांधी रायबरेली से चुनाव हारी थीं। उसके बाद के चुनाव में उन्होंने दक्षिण भारत की मेडक और रायबरेली सीट से चुनाव लड़कर जीत हासिल की। फइर रायबरेली सीट से इस्तीफा दे दिया। अब फिर से प्रश्न उठ रहा है कि अगर राहुल गांधी भी रायबरेली और वायनाड, दोनों क्षेत्र से चुनाव जीत जाते हैं, तो वायनाड को प्राथमिकता देंगे या रायबरेली को। केरल में दो वर्ष बाद विधानसभा का चुनाव होना है और अगर राहुल गांधी केरल के वायनाड की सीट से जीतने के बाद इस्तीफा दे देते हैं तो उसका असर उस चुनाव पर पड़ सकता है। कांग्रेस को लगातार दो बार केरल के विधानसभा चुनाव में पराजय का सामना करना पड़ा है। आगामी चुनाव को लेकर कांग्रेस को बड़ी उम्मीदें हैं। अगर वो वायनाड को प्राथमिकता देते हैं तो उसका असर उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के भविष्य पर पड़ेगा। राहुल गांधी के सामने ये संकट है। देश का राजनीतिक इतिहास इस बात की पुष्टि करता है कि दिल्ली की सत्ता पर काबिज होने के लिए उत्तर प्रदेश में बेहतरीन प्रदर्शन करना आवश्यक होता है। इसका कांग्रेस क्या उत्तर ढूंढती है ये देखना दिलचस्प होगा। 

अब बात अमेठी की। अमेठी से राहुल गांधी तीन बार सांसद निर्वाचित हुए। 2019 में स्मृति इरानी से पराजित हो गए। कई राजनीतिक पंडितों और कांग्रेस समर्थक विश्लेषकों का मानना है कि राहुल गांधी ने अमेठी को छोड़कर स्मृति इरानी की महत्ता को कम कर दिया। अब यहीं से निष्कर्ष दोषपूर्ण हो जाता है। स्मृति इरानी दो दशक से अधिक समय से राजनीति में सक्रिय हैं। पिछले दस वर्षों से वो कैबिनेट मंत्री हैं। उसके पहले भाजपा की महिला मोर्चा की अध्यक्ष रह चुकी हैं। दो बार पार्टी की राष्ट्रीय सचिव रही हैं। उनका एक सफल करियर रहा है। राहुल गांधी को एक बार पराजित कर इतिहास बना चुकी हैं। 2019 में जब राहुल गांधी पराजित हुए थे तब वो कांग्रेस पार्टी के अखिल भारतीय अध्यक्ष थे। स्मृति इरानी को कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष को हराने का गौरव भी हासिल है। राहुल गांधी के अमेठी से चुनाव नहीं लड़ने से उनकी अबतक बनी महत्ता कम नहीं होने वाली है। दोषपूर्ण निष्कर्षों से आगे जाकर हमें तथ्यों और आंकड़ों पर बात करनी चाहिए कि राहुल गांधी ने अमेठी का रण क्यों छोड़ा। राहुल गांधी पहली बार अमेठी से 2004 में सांसद बने। इस चुनाव में उनको दो लाख 90 हजार से अधिक वोटों से जीत मिली। 2009 में जीत का अंतर तीन लाख सत्तर हजार वोटों तक पहुंच गया। पर 2014 में जब स्मृति इरानी पहली बार अमेठी पहुंचीं तो उनके जीत का अंतर घटकर एक लाख सात हजार रह गया। जबकि स्मृति को करीब तीन सप्ताह का समय मिला था। 2019 में राहुल 55 हजार वोटों से हार गए। पिछले दो चुनावों में उनको मिलनेवाले मतों की संख्या कम हुई। इतना ही नहीं 2017 में हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अमेठी संसदीय क्षेत्र के पांच विधानसभा क्षेत्रों में से कांग्रेस एक पर भी जीत हासिल नहीं कर पाई। चार सीटें भारतीय जनता पार्टी को और एक समाजवादी पार्टी को मिली। 2022 के विधानसभा चुनाव में अमेठी लोकसभा के पांच विधानसभा क्षेत्रों में तीन पर भारतीय जनता पार्टी और दो पर समाजवादी पार्टी को जीत मिली। समाजवादी पार्टी के एक विधायक अब भारतीय जनता पार्टी के साथ हैं। इस विधानसभा चुनाव में पूरे प्रदेश में कांग्रेस को मिले वोटों का प्रतिशत बहुत ही कम रहा, जबकि प्रियंका गांधी की देखरेख में वहां चुनाव हुए थे। 

एक और तथ्य की बात करना आवश्यक है जिसने अमेठी से राहुल की उम्मीदवारी टाली गई। जब 2019 के संसदीय चुनाव में राहुल गांधी अमेठी से पराजित हुए तो उसके बाद वो इस क्षेत्र के दौरे पर बहुत ही कम गए। चुनाव के समय वहां उनकी उपस्थिति पर मतदाताओँ के मन में स्वाभाविक तौर पर ये प्रश्न उठता कि इतने दिनों तक कहां थे। जबकि 2014 में पराजित होने के बाद स्मृति इरानी निरंतर अमेठी आती जाती रहीं। चुनाव हारने के 15 दिन के अंदर ही स्मृति इरानी अमेठी पहुंच गई थीं। राहुल गांधी अपने मतदाताओं के आसन्न प्रश्नों का उत्तर नहीं खोज पाने के कारण भी रायबरेली चले गए प्रतीत होता है। राजनीतिक विश्लेषकों का ये भी कहना है कि कांग्रेस पार्टी ने जो आंतरिक सर्वे करवाया उसमें अमेठी से बहुत सकारात्मक रुझान कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवार के पक्ष में नहीं मिले। जबकि रायबरेली के मतदाता राहुल को लेकर उत्साहित होने का संकेत दे रहे थे। चर्चा तो ये भी रही थी कि प्रियंका गांधी वाड्रा को अमेठी से और राहुल को रायबरेली से प्रत्याशी बना दिया जाए। विश्लेषकों का आकलन है कि सोनिया गांधी की सीट से जो भी प्रत्याशी होता उसको सोनिया की राजनीति का स्वाभाविक उत्तराधिकारी माना जाता। अगर रायबरेली से प्रियंका गांधी चुनाव लड़तीं तो संभव है कि ये संदेश जाता। सोनिया जी निरंतर राहुल गांधी के पक्ष में दिखती रही हैं। वो उनको ही आगे लाना चाहती हैं। अगर प्रियंका चुनावी राजनीति में आतीं तो पार्टी में एक और पावर सेंटर उभरने का खतरा था। दूसरे भारतीय जनता पार्टी का परिवारवाद का आरोप और गाढ़ा होता। रायबरेली से प्रियंका और वायनाड से राहुल गांधी जीत जाते तो परिवार के तीन लोग संसद के सदस्य होते। इन आरोपों से बचने के लिए भी प्रियंका को चुनाव नहीं लड़वाया गया। कुल मिलाकार अगर देखें तो राहुल के अमेठी से नहीं लड़ने के बहुत सारे कोण हैं। एक कोण जो बेहद महत्वपूर्ण है वो ये है कि स्मृति इरानी ने क्षेत्र में अपनी उपस्थिति से और वहां के मतदाताओं के साथ संवाद कायम करके अमेठी की जनता को गांधी परिवार के मोह से लगभग मुक्त कर दिया। अमेठी में ऐसे लोग अब कम ही हैं जो गांधी परिवार के साथ अपने रिश्तों को याद करते हुए आंख मूंदकर परिवार को वोट देते रहे हैं। राजीव गांधी के सांसद रहते तक तो क्षेत्र के लोगों से उनका मिलना जुलना था। राहुल गांधी के वहां आने के बाद से राजनीति को एक अलग ही तरह से चलाने का प्रयास हुआ। राजनीतिक संबंध रागात्मक न होकर प्रोफेशनल जैसे होने लगे। राजनीति कार्यकर्ताओं का स्थान प्रोफेशनल्स ने ले लिया। ऐसा प्रतीत होता है कि संजय गांधी ने 1976 में जिस राजनीतिक संबंध की नींव अमेठी में रखी थी उसका अंत हो गया। किशोरी लाल शर्मा को कांग्रेस का प्रत्याशी बनाने से स्मृति इरानी की राह आसान हो गई है। कांग्रेस के प्रत्याशी की छवि नेता की नहीं रही है। वो गांधी परिवार के सहयोगी के तौर पर जाने जाते हैं। व्यवस्थापक और राजनेता का अंतर तो मतदाता समझता ही है। 


Saturday, December 23, 2023

लाल झंडा थामने को आतुर 'हाथ'


हाल ही में जब नई दिल्ली में विपक्षी दलों के गठबंधन आईएनडीआईए की बैठक हुई तो राहुल गांधी और सीताराम येचुरी की साथ बैठी तस्वीरें सामने आईं। इसी तरह जब विपक्षी दलों के नेता नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर सांसदों के निलंबन पर विरोध जताने के लिए जुटे तो उसमें भी राहुल गांधी और सीताराम येचुरी एक दूसरे का हाथ थामे नजर आए। इन दोनों जगहों पर कांग्रेस और कम्युनिस्टों की निकटता ही नहीं दिखी बल्कि उनके साथ में एक विशेष प्रकार का उत्साह भी दिखा। इस प्रसंग की चर्चा इस कारण से कर रहा हूं कि कुछ दिनों पहले दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में अजीत कुमार पुरी की पुस्तक स्वतंत्रता संग्राम, समाजवाद और श्रीरामवृक्ष बेनीपुरी के लोकार्पण समारोह में उपस्थित रहने का अवसर मिला। कार्यक्रम में मुझे भी पुरी जी की पुस्तक और श्रीरामवृक्षबेनीपुरी जी पर बोलना था। इस वजह से समारोह में जाने के पहले बेनीपुरी की डायरी के पन्ने को पलट रहा था। अचानक नजर एक जगकह जाकर रुकी, तारीख थी, 11 दिसंबर 1957। उस दिन बेनीपुरी जी ने अपनी डायरी में लिखा, आज बेनीपुर से पटना लौट रहा हूं। इधर 15 नवंबर से ही भाई अशोक मेहता के चुनाव के चक्कर में रहा। वह मुजफ्फरपुर-सदर निर्वाचन क्षेत्र से पार्लियामेंट के उम्मीदवार थे। आज से मतगणना शुरू हुई है, तीन थानों में आधे निर्वाचन क्षेत्र में 2700 वोट से जीत गए हैं। आधे में भी विजयी होंगे, ऐसा विश्वास है। दरअसल बेनीपुरी जी प्रख्यात समाजवादी नेता अशोक मेहता के चुनाव की बात कर रहे थे। 1957 में अशोक मेहता ने बिहार के मुजफ्फरपुर से लोकसभा का चुनाव लड़ा था। उस समय समाजवादी नेता अशोक मेहता का कम्युनिस्टों ने विरोध किया था और कांग्रेस के उम्मीदवार नहीं खड़ा करने की घोषणा के बाद भी अपना उम्मीदवार खड़ा कर अपनी पार्टी के असली चरित्र के दर्शन करवाए थे। तब मतपत्रों से चुनाव होता था और उसकी गिनती में कई दिन लग जाते थे।

उसी दिन डायरी में बेनीपुरी जी ने आगे लिखा, अजीब चुनाव रहा यह। भाई अशोक की विद्वता का ख्याल करके कांग्रेस ने यह सीट छोड़ दी। साथियों ने सोचा, अब क्या है, आसानी से विजय मिल जाएगी। किंतु बीच में कम्युनिस्ट आ टपके। हमारे किशोरी भाई उनके उम्मीदवार! फिर क्या था, सिद्धांत गया ताखे पर- जाति के नाम पर, जिले के नाम पर वह बावला मचाया गया, कि हम चकित रहे और प्रांत भर के कम्युनिस्ट कार्यकर्ता गांव-गांव में डेरे डालकर पड़ गए। कोई भी उपाय नहीं छोड़ा गया। हमें कदम कदम पर लड़ना पड़ा। आज की गणना से थोड़ा इत्मीनान हुआ। ...कांग्रेस कार्यकर्ताओं का कम्युनिस्टों के साथ गठबंधन देखकर हैरान रह जाना पड़ा। अशोक हमारी पार्टी के संस्थापक सदस्यों में से हैं। कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के यशस्वी संपादक। विचारक अर्थशास्त्री। श्रीरामवृक्ष बेनीपुरी की इस टिप्पणी से स्पष्ट है कि उस चुनाव में कम्युनिस्टों ने सिद्धांत को ताखे पर रख दिया था। जातिवाद और प्रांतवाद का खेल जमकर खेल गया था। दरअसल अशोक मेहता बांबे (अब मुंबई) के थे और बिहार से आकर चुनाव लड़ रहे थे। वो दौर ऐसा था कि कई अन्य प्रांतों के नेता बिहार से आकर चुनाव लड़ते थे। मधु लिमय ने मुंगेर से और जार्ज फर्नांडिस ने मुजफ्फरपुर और बांका से चुनाव लड़ा था। जीते भी थे। बेनीपुरी की डायरी में दर्ज इस टिप्पणी पर गौर करना चाहिए कि कांग्रेस और कम्युनिस्टों के गठबंधन को देखकर उनको हैरानी हुई थी। हैरानी दरअसल कम्युनिस्टों की उस राजनीति को देखकर हुई थी जिसमें उन्होंने जाति और प्रांत का कार्ड खेला था। असामनता और विभेद की राजनीति का दंभ भरनेवाली विचारधारा का असली चेहरा खुला था। 

12 दिसंबर 157 को श्रीरामवृक्ष बेनीपुरी ने अपनी डायरी में बहुत छोटी सी टिप्पणी दर्ज की। लिखा, और वही होकर रहा, अशोक जीत गए। चौदह हजार वोटों से। कम्युनिस्ट हारे, जातिवाद की हार हुई, प्रांतवाद की हार हुई। अशोक की जीत, जनतंत्र की जीत, समाजवाद की जीत, राष्ट्रीयता की जीत, विद्वता की जीत, देशभक्ति की जीत! हिप-हिप हुर्रे!! इस पूरी टिप्पणी से बेनीपुरी की प्रसन्नता दिख रही है। कम्युनिस्टों की हार को उन्होंने जातिवाद और प्रांतवाद की हार से जोड़ा और अशोक की जीत को उन्होंने राष्ट्रीयता और देश भक्ति के साथ समाजवाद और विद्वता से जोड़ा। भारत में जो समाजवाद पनपा वो साम्यवाद से अलग था। उसमें देशभक्ति और राष्ट्रीयता के गुण और भारतीयता कूट कूट कर भरी थी। बहुधा ये बेनीपुरी के लेखन में दिखती भी है। एक बार बेनीपुरी कलकत्ता (अब कोलकाता) गए। वहां बंगीय परिषद की सभा में उन्होंने सीता की मां नाम की रचना सुनाई। फिर पत्रकारों की एक सभा हुई उसमें कम्युनिस्टों ने कुछ उल्टा पुल्टा बोल दिया तो बेनीपुरी भड़क गए। उन्होंने लिखा है, पत्रकारों की ओर से जो सभा हुई, उसमें कम्युनिस्टों ने कुछ ऊटपटांग बातें कहीं। बस, मेरा देवता जाग गया और लोगों ने कहा कि मैंने बड़ा ही ओजपूर्ण भाषण दिया। कितनी खूबसूरती से उन्होंने बताया कि कम्युनिस्टों की क्या गत की। 

बेनीपुरी जी कम्युनिस्टों की मौकपरस्त राजनीति से खिन्न रहते थे। उनको लगता था कि कम्युनिस्ट कहते कुछ हैं और करते कुछ हैं। इस तरह के संकेत उनकी डायरी के पन्ने में यत्र-तत्र बिखरे हैं। समाजवादी लोग राष्ट्र और भारतीय संस्कृति के साथ चलनेवाले थे जबकि साम्यवादियों की राष्ट्र में आस्था न थी, न है। बेनीपुरी शाश्वत भारत या सांस्कृतिक भारत की बात करनेवाले लेखक और राजनेता थे। वो इस सांस्कृतिक भारत के खान पान, रहन सहन, गीत-नृत्य, पर्व-उत्सव, आनंद-विनोद आदि में एकात्मता देखते थे । उनका मानना था कि राजनीतिक उलटफेरों के बावजूद संपूर्ण भारत में आदिकाल से एक अविच्छिन्न सांस्कृतिक धारा प्रवाहित होती रही है। समय समय पर उसका चित्रण किया जाना चाहिए। बेनीपुरी जब भी इस सांस्कृतिक धारा में किसी प्रकार की बाधा देखते या बाधा की आशंका को भांपते तो उसका सार्वजनिक रूप से लिखकर और बोलकर प्रतिकार करते। मुजफ्परपुर लोकसभा चुनाव के समय कम्युनिस्टों और कांग्रेस के साथ आने पर उन्होंने तब भी कहा था और बाद में भी कहते रहे।

हलांकि कांग्रेस ने कम्युनिस्टों का स्वाधीनता के बाद से ही साथ लेना आरंभ कर दिया था। नेहरू का झुकाव साम्यवाद की ओर था और उसके ऐतिहासिक कारण थे। इंदिरा गांधी ने भी कम्युनिस्टों का साथ लिया, समर्थन के एवज में उनको कला संस्कृति और शिक्षा से जुड़ी सरकारी संस्थाएं आउटसोर्स कर दीं। लेकिन इन दोनों ने कभी भी कम्युनिस्टों को हावी नहीं होने दिया। जब आवश्यकता पड़ी कम्युनिस्टों का अपनी और अपनी राजनीति के हक में उपयोग किया, उनको उसका ईनाम दिया और फिर आगे चल पड़े। हाल के दिनों में जिस प्रकार से कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की कम्युनिस्टों से निकटता बढ़ी है, जिस प्रकार से कम्युनिस्ट विचारधारा वाले लोग कांग्रेस पार्टी को चलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने लगे हैं वैसे में ऐसा प्रतीत होता है कि कांग्रेस की राजनीतिक चालें भी वहीं लोग तय कर रहे हैं। दरअसल ऐसा तब होता है जब पार्टी में विचारवान नेताओं की कमी हो जाती है। उनको अपनी राजनीतिक राय बनाने के लिए किसी के सहारे की जरूरत होती है। कम्युनिस्टों की एक विशेषता है कि वो बातें बड़ी अच्छी करते हैं, गरीबों और मजदूरों की बातें करते हैं जो किसी को भी लुभाने का सामर्थ्य रखती हैं। सैद्धांतिक धरातल पर इन बातों का असर होता भी है लेकिन जब उनको यथार्थ की धरातल पर उतारने की बात आती है तो सारे सिद्धांत धरे रह जाते हैं। वो भी जात-पात और अन्य प्रकार की बातें करने लग जाते हैं। बेनीपुरी जी जैसे और उनके बाद की पीढ़ी के लेखकों का ना केवल साम्यवाद से मोहभंग होता है बल्कि साफ तौर पर बगैर हिचके सिद्धांतों को ताखे पर रखने की बात भी कह जाते हैं। 

Saturday, December 9, 2023

मोदी विजय रथ को रोक पाएंगे राहुल?


राज्यों के विधानसभा चुनाव के परिणाम के बाद आगामी लोकसभा चुनाव को लेकर चर्चा आरंभ हो गई है। भारतीय जनता पार्टी के नेताओं के हौसले बुलंद हैं। उन्होंने लोकसभा चुनाव में हैट्रिक का विमर्श शुरु कर दिया है। उधर कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी दलों में मायूसी का वातावरण है। तेलांगना के विधानसभा चुनाव में जीत के बावजूद कांग्रेस पार्टी अपने कार्यकर्ताओं में उत्साह का संचार नहीं कर पा रही है। कुछ दिनों पूर्व बने विपक्षी दलों के गठबंधन आईएनडीआईए को लेकर कुछ ठोस सामने नहीं आ रहा है। विशेषज्ञ ऐसा होगा तो ऐसा होगा के तर्कों के सहारे भारतीय जनता पार्टी की कठिनाइयों को गिनाने में लगे हैं। चुनावी विश्लेषक विधानसभा चुनाव में विपक्षी दलों को मिले वोटों की संख्या के आधार पर लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के सामने चुनौती पेश करने का प्रयास कर रहे हैं। यही विश्लेषक ये कहते हुए नहीं थकते थे कि विधानसभा चुनाव और लोकसभा चुनाव में मतदान का पैटर्न अलग होता है। स्मरणीय है कि 2018 के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ विधानसभा का चुनाव हार गई थी लेकिन अगले ही वर्ष 2019 में जब लोकसभा का चुनाव हुआ तो भारतीय जनता पार्टी को 2014 में मिली सीटों से अधिक सीटें प्राप्त हुईं। इसी तरह से दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को बंपर जीत मिली थी लेकिन लोकसभा चुनाव में सातों सीट पर भारतीय जनता पार्टी ने जीत का परचम लहराया। आंकड़ों से संकेत तो मिल सकते हैं लेकिन उसे परिणाम का सटीक आकलन नहीं लग सकता है। 

लोकसभा के चुनाव में जनता यह तय करती है कि कौन सा नेता ऐसा है जो राष्ट्रीय नेतृत्व प्रदान कर सकता है। वैश्विक मंच पर राष्ट्रीयय हित को मजबूती से पेश कर सकता है। पूरे देश को साथ लेकर चल सकता है और जिसकी नीतियों से देश का विकास होगा। किस नेतृत्व में स्थायित्व और स्थिरता प्रदान करने की क्षमता है। वर्तमान राजनीति परिदृष्य में नरेन्द्र मोदी भारतीय जनता पार्टी के सर्वमान्य नेता हैं और पार्टी 2024 का लोकसभा चुनाव मोदी के नेतृत्व में लड़ेगी। विपक्ष में कांग्रेस पार्टी सबसे बड़ी पार्टी है और उसकी उपस्थिति हर राज्य मैं है। कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष भले ही मल्लिकार्जुन खड़गे हैं लेकिन अगर प्रधानमंत्री बनने की नौबत आई तो राहुल गांधी ही आगे आएंगे। आईएनडीआईए में भी सबसे बड़ी पार्टी होने के कारण कांग्रेस का नामित नेता ही उसका नेतृत्व कर सकता है। यहां भी राहुल गांधी का ही नाम आ सकता है। इस बात की संभवाना कम है कि राहुल गांधी किसी अन्य के नेतृत्व में 2024 के लोकसभा चुनाव मैदान में जाएं। राहुल गांधी के कुछ स्वयंभू सलाहकार और गठबंधन के कुछ दल राहुल गांधी के नाम पर असहमति जता सकते हैं लेकिन जिस प्रकार अन्य दलों के नेताओं के नाम पर मतभिन्नता है उसमें राहुल के नाम पर ही मतैक्य हो सकता है। विपक्षी गठबंधन नेतृत्व के प्रश्न को लोकसभा चुनाव के बाद के लिए टालने की घोषणा कर सकते हैं लेकिन उसका कोई लाभ होगा, इसमें संदेह है। स्वाभाविक है कि विपक्षी गठबंधन मजबूरी में ही सही लेकिन राहुल गांधी को नेता चुन सकते हैं। अगर राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्षी दलों का गठबंधन आईएनडीआए चुनाव मैदान में जाता है तो फिर मुकाबला नरेन्द्र मोदी और राहुल गांधी के बीच होगा। 

राहुल गांधी के बारे में देश में एक राय है। कांग्रेस पार्टी में भी। सोमवार को पूर्व राष्ट्रपति और लंबे समय तक कांग्रेस पार्टा के महत्वपूर्ण नेता रहे प्रणब मुखर्जी की बेटी शर्मिष्ठा मुखर्जी की पुस्तक बाजार में आ रही है। पुस्तक का नाम है प्रणब, माई फादर। इस पुस्तक में सोलह स्थानों पर राहुल गांधी का उल्लेख है और कई स्थानों पर तो प्रणब मुखर्जी के डायरी के अंश भी उद्धृत किए गए हैं। प्रणब मुखर्जी की डायरी के अंश संभवत: पहली बार सार्वजनिक होने जा रहे हैं। प्रसंग 29 जनवरी 2009 के कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक का है।  प्रणब मुखर्जी अपनी डायरी में लिखते हैं, राहुल गांधी ने गठबंधन के विरोध में अपनी बात जोशीले अंदाज में रखी। मैंने (प्रणब) उनसे कहा कि जोश तो ठीक है लेकिन अपने आयडिया को विस्तार से कारण समेत व्याख्यायित करें। प्रणब मुखर्जी के इतना कहने पर राहुल गांधी ने उनकी तरफ देखा और कहा कि वो उनसे अलग से बात कर लेंगे। उसके बाद प्रणब मुखर्जी ने राहुल के बारे में अपनी डायरी में लिखा कि वो बेहद शिष्ट हैं और उनके मन में काफी प्रश्न कुलबुलाते रहते हैं जो ये दर्शाते हैं कि वो सीखना चाहते हैं लेकिन अभी राहुल गांधी को राजनीतिक रूप से परिपक्व होना बाकी है। परिपक्वता के प्रश्न पर ही प्रणब मुखर्जी 27 सितंबर 2013 की एक घटना का उदाहरण देते हैं। उस दिन राहुल गांधी दिल्ली में अजय माकन के एक प्रेस कांफ्रेंस में पहुंच गए थे और उन्होंने एक अध्यादेश की काफी सार्वजनिक रूप से फाड़ दी थी। भन्नाए प्रणब मुखर्जी लिखते हैं कि राहुल गांधी खुद को क्या समझते हैं? वो कैबिनेट के सदस्य नहीं हैं। वो होते कौन हैं जो कैबिनेट के निर्णय को सार्वजनिक रूप से फाड़ डालें। प्रदानमंत्री विदेश में हैं। उनको(राहुल) को इस बात का अनुमान भी है कि उनके इस कदम का परिणाम और प्रधानमंत्री पर क्या असर होगा? राहुल को प्रधानमंत्री को इस तरह अपमानित करने का अधिकार किसने दिया? राहुल में गांधी-नेहरू खानदान से होने अहंकार तो है लेकिन राजनीतिक कौशल नहीं। कांग्रेस पार्टी के तत्कालीन उपाध्यक्ष की इस हरकत को लेकर प्रणब मुखर्जी बेहज नाराज दिखते हैं और कहते हैं कि राहुल का यह कार्य कांग्रेस पार्टी के लिए ताबूत की आखिरी कील साबित हुई। वो प्रश्न उठाते हैं कि लोग कांग्रेस को इसके बाद वोट क्यों देंगे। वो इस बात को लेकर स्पष्ट नहीं हैं कि राहुल गांधी कांग्रेस पार्टी को फिर से सक्रिय कर पाएंगे। वो लिखते हैं कि सोनिया जी राहुल को अपना उत्तराधिकारी बनाना चाहती हैं लेकिन उनमें (राहुल) करिश्मा और राजनीतिक समझ की कमी के कारण कठिनाई हो रही है। 

राहुल गांधी को लेकर सिर्फ प्रणब मुखर्जी की ही ये राय नहीं है। अपनी पुस्तक अमेठी संग्राम लिखने के दौरान मैंने युवक कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष से बात की थी तो उन्होंने भी कमोबेश इसी तरह की बात कही थी। उन्होंने जो सबसे महत्वपूर्ण बात कही थी वो ये राहुल गांधी अगर किसी नेता से नाराज होते हैं तो वो उसको दंडित नहीं करते हैं और जब खुश होते हैं तो पारितोषिक भी नहीं देते। खफा होने से उससे बातचीत बंद कर देते हैं जिसका नुकसान संगठन को होता है। दूसरी तरफ नरेन्द्र मोदी हैं जो दोनों स्थितियों में निर्णय लेते हैं। 2024 का लोकसभा चुनाव अगर नरेन्द्र मोदी बनाम राहुल गांधी होता है तो आज की स्थिति में मोदी का हैट्रिक तो तय ही है। राहुल गांधी या आईएनडीआईए को अगर नरेन्द्र मोदी को चुनौती देनी है तो उनको एक परिपक्व राजनीतिक चेहरा ढूंढकर उसपर सभी दलों के बीच सहमति बनानी होगी। उस नेता को अपनी  नीतियों और विजन को जनता के सामने रखना होगा। आईएडीआईए ने अबतक दो ढाई दिन ही काम किया है। विपक्षी गठबंधन की तरफ से हाल ही में एक बैठक आहूत करने का समाचार आया था लेकिन अज्ञात कारणों से वो बैठक टाल दी गई। आमचुनाव में छह महीने से भी कम समय बचा है। भारतीय जनता पार्टी अपनी चुनावी तैयारियां कर चुकी है लेकिन विपक्षी गठबंधन को बहुत कुछ करना शेष है। अगर विपक्ष ने समय का सदुपयोग नहीं किया तो परिणाम हैट्रिक की ओर ही जाता दिख रहा है। 


Saturday, May 25, 2019

स्मृति की जीत से निकलते संदेश


ठीक से याद नहीं, पर घटना 21 या 22 मार्च 1977 की रात की है। उस रात हम अपने ननिहाल, बिहार के एक कस्बाई शहर जमालपुर के पास के गांव वलिपुर, में थे। देश से इमरजेंसी हटाई जा चुकी थी और चुनाव हो चुके थे। सबको चुनाव के नतीजों की प्रतीक्षा थी। चुनाव और उसके बाद के नतीजों को लेकर हमारे ननिहाल में भी खूब गहमागहमी थी। उस वक्त हमारी उम्र ककहरा सीखने की थी, राजनीति और उसकी भाषा बिल्कुल समझ नहीं आती थी, पर उत्सव का माहौल समझ आता था। चुनावी के उत्सवी माहौल में इतनी दिलचस्प बातें होती थीं कि मजा खूब आता था। रातभर रेडियो पर चुनावी नतीजे आते रहते थे। वो बैलेट का जमाना था और मतपत्रों की गिनती में तीन से चार दिन का समय लगता था। हमारे ननिहाल में एक बड़ा सा मरफी का रेडियो हुआ करता था। उसका एंटीना खपड़ैल के छज्जे में लगाया हुआ था। एंटीना काफी बड़ा था जिससे एक तार रेडियो तक आता था। कहने का मतलब ये है कि रेडियो को रखने का स्थान नियत था और उसको उधर उधर हटाया नहीं जा सकता था। रेडियो सुनने के लिए उसके पास जाना होता था। 21 या 22 मार्च की रात में रेडियो पर चुनाव के नतीजे आ रहे थे, गांव के काफी लोग वहां बैठे थे, किसी बड़े नतीजे की प्रतीक्षा में। रात ज्यादा होने से लोग ऊंघ भी रहे थे, अचानक रेडियो पर खबर आई कि इंदिरा गांधी रायबरेली से चुनाव हार गईं। इस खबर के बाद ऊंघ रहे लोगों की आंखें चमक उठीं, वो सभी खुशी में झूमते हुए शोर मचाने लगे, नारेबाजी होने लगी। पूरे गांव के लोग अपने अपने घरों से निकलकर सड़क पर आ गए। इस बीच किसी ने हमारे रेडियो की आवाज तेज कर दी थी। उसपर इंदिरा गांधी की हार की खबर के बाद एक गाना बजने लगा था- बरेली के बाजार में झुमका गिरा रे...। लोग उसपर झूमने लगे थे। इंदिरा गांधी को जनता पार्टी के उम्मीदवार और समाजवादी नेता राजनारायण ने करीब 55000 मतों से मात दी थी। उसी चुनाव में रायबरेली के बगल के संसदीय सीट अमेठी से इंदिरा गांधी के कनिष्ठ पुत्र संजय गांधी की हार भी हुई थी। गांधी परिवार के इन दो सदस्यों की हार आखिरी हार थी। उसके बाद के हुए सभी संसदीय चुनावों में गांधी परिवार के इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, सोनिया गांधी और राहुल गांधी की कोई हार नहीं हुई थी।
बयालीस साल बाद 23 मई को चुनाव के नतीजे आ रहे थे, शाम तक रुझानों से साफ हो गया था कि देश के मतदाताओं ने नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को प्रचंड बहुमत दे दिया है। सबकी निगाहें अमेठी पर जाकर टिक गई थीं। अमेठी से गांधी परिवार के राजनीतिक वारिस और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी चुनाव मैदान में थे। वो यहां के अलावा केरल के वायनाड से भी चुनाव लड़े थे। अमेठी में कांग्रेस अध्यक्ष के सामने थीं बीजेपी की फायरब्रांड युवा नेता और केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी। वही स्मृति ईरानी जिसको राहुल गांधी 2014 के चुनाव में एक लाख से अधिक वोटों से मात दे चुके थे। इस बार के चुनाव नतीजों में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी लगातार पिछड़ रहे थे। अब जमाना रेडियो का रहा नहीं था यहां तो चुनाव आयोग की साइट पर गिनती के हर चक्र के बाद अपडेट आ रहा था। वोटों का फासला बढञता जा रहा था। हर किसी के हाथ में मोबाइल और मोबाइल पर सोशल साइट्स से लेकर न्यूज वेबसाइट्स पर पल-पल की जानकारी आ रही थी। देशभर के रुझान और नतीजे आने शुरू हो गए थे लेकिन अमेठी के नतीजे में देर हो रही थी। नतीजा आने के पहले ही शाम करीब साढे पांच बजे राहुल गांधी ने अमेठी लोकसभा क्षेत्र से अपनी हार सार्वजनिक रूप से स्वीकार कर ली थी और स्मृति ईरानी को शुभकामनाएं दे दी थीं। स्मृति ने भी अपने ट्वीट से ये संकेत दे दिया था वो जीत गई हैं। उन्होंने मशहूर शायर दुष्यंत कुमार की एक पंक्ति उद्धृत की थी- ‘कौन कहता है आसमां में सुराख नहीं हो सकता’। रात करीब साढे ग्यारह बजे ये खबर आई कि राहुल गांधी को स्मृति ईरानी ने हरा दिया। तकनीक के उन्नत होने और लगातार जानकारी मिलने के बावजूद उत्सकुता में तो कमी नहीं हुई थी, लेकिन राहुल गांधी की हार के बाद कोई गाना नहीं बजा। मुझे 1977 की घटना याद थी इसलिए मैं ऑल इंडिया रेडियो भी सुन रहा था। मैं देखना चाहता था कि रेडियो पर क्या होता है। रेडियो ने सिर्फ खबर दी। इस नतीजे के बाद अमेठी में लोग झूमे, भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं ने जश्न भी मनाया।  
स्मृति ईरानी ने राहुल गांधी को करीब 55000 वोटों से शिकस्त दी। यहां याद दिला दें कि करीब इतने ही मतों से इंदिरा जी भी रायबरेली हारी थीं। इसके अलावा भी कई समानताएं इन दोनों चुनावों में देखी जा सकती हैं। 1971 में राजनारायण जब इंदिरा गांधी से हारे थे तब उन्होंने कहा था कि रायबरेली की जनता का प्यार उनको मिला है और इसी धरती से वो इंदिरा गांधी को हराएंगे। कुछ ऐसा ही बयान स्मृति ईरानी ने भी 2014 में अमेठी में अपनी हार के बाद दिया था। 1977 के चुनाव में रायबरेली में जो हुआ लगभग वही 2019 के चुनाव में अमेठी में दोहराया गया। एक ताकतवर और नामदार उम्मीदवार को हार का सामना करना पड़ा। पर अगर 2019 में अमेठी में राहुल गांधी की हार और 1977 में रायबरेली में इंदिरा गांधी की हार की तुलना करें तो ऐसा लगता है कि राहुल को हराना ज्यादा मुश्किल था। 1977 में इंदिरा गांधी के खिलाफ देशभर में गुस्सा था। लोग इमरजेंसी लगाए जाने को लेकर उनसे बेहद खफा थे। उनके खिलाफ पूरा विपक्ष लामबंद था, सीपीआई को छोड़कर। सीपीआई चूंकि इमरजेंसी में कांग्रेस के साथ थी इस वजह से वो चुनाव में भी इंदिरा जी के समर्थन में खड़ी थी। फासीवाद और तानाशाही की बात करनेवाली इस पार्टी का चाल, चरित्र और चेहरा देश की जनता ने इमरजेंसी के दौरान देख लिया था। इस बार पूरा विपक्ष राहुल गांधी के साथ था। राहुल गांधी को अखिलेश और मायावती के महागठबंधन का समर्थन हासिल था। अमेठी में मतदान के चंद दिनों पहले मायावती ने अपने कॉडर को राहुल गांधी को वोट करने के निर्देश दिए थे। स्मृति का राहुल से सीधा मुकाबला था। इसबार तो वहां से आम आदमी पार्टी का भी कोई उम्मीदवार नहीं था। 2014 के चुनाव में तो कुमार विश्वास भी अमेठी से चुनाव लड़े थे। सीधे मुकाबले में पारिवारिक गढ़ को ध्वस्त करना टेढी खीर था। स्मृति ने वो कर दिखाया।
अमेठी के चुनाव नतीजे ने इस धाऱणा को और पुष्ट किया है कि इस बार के चुनाव में देश के मतदाता ने बहुत समझदारी के साथ वोट किया। वो जात-पात की जकड़न से तो मुक्त हुआ ही, वोटरों ने अब अपने और अपने क्षेत्र के हितों की रक्षा करनेवाले उम्मीदवारों पर भरोसा जताकर भारतीय लोकतंत्र के मजबूत और मैच्योर होने के संकेत भी दे दिए। तमाम तरह के समीकरणों के आधार पर चुनाव लड़ने और जीतनेवालों को हार का मुंह देखना पड़ा। अमेठी की जनता ने ये भी बता दिया कि अगर आपको राजनीति करनी है तो आपको मेहनत करनी होगी। आपको जनता के साथ खड़े रहना होगा। यही मानदंड काम आएगा। कुछ विश्लेषकों ने मोदी पर ये आरोप लगाया कि वो चुनाव में सेना के पराक्रम का फायदा उठा रहे हैं। सेना ने पाकिस्तान में घुसकर आतंकवादी ठिकानों पर हमले किए थे, उसका श्रेय ले रहे हैं। जिसका मकसद लोकसभा चुनाव में फायदा उठाना है। कांग्रेस ने भी बालाकोट हमले को चुनावी मुद्दा बनाने को लेकर मोदी को घेरने की कोशिश की थी। पर कांग्रेस के लोग ये भूल गए कि 1972 के विधानसभा चुनाव के पहले इंदिरा गांधी का देश की जनता के नाम लिखा एक पत्र देशभर के समाचार पत्रों में विज्ञापन के रूप में छपा था। 10 मार्च 1972 को छपे इस विज्ञापन में इंदिरा गांधी ने देश की जनता को बांग्लादेश में पाकिस्तान पर विजय की याद दिलाई थी। बांग्लादेशी रिफ्यूजियों के उनके देश लौटाने की बात बताई गई थी। इसके साथ ही इंदिरा गांधी ने उस खतनुमा विज्ञापन में वोटरों से उनकी पार्टी को भारी बहुमत से विधानसभा चुनाव में विजयी बनाने की अपील भी की थी। जनता ने उस चुनाव में उनकी पार्टी को भारी बहुमत दिया। चुनाव में राष्ट्रवाद को मुद्दा बनाकर इंदिरा गांधी ने फायदा उठाया था। पर अमेठी में तो जब छठे चरण में वोट डाले जा रहे थे तबतक बालाकोट का मुद्दा भी नेपथ्य में जा चुका था। अब चुनाव खत्म हो चुके हैं, नतीजा आ गया है। प्रतीत ये होता है कि अमेठी के चुनाव नतीजे का असर कांग्रेस पार्टी पर दिखाई देगा। कैसे? ये समय के गर्भ में है।

Saturday, April 6, 2019

वादे नहीं ठोस नीति की दरकार


चुनाव के पहले लगभग सभी दल अपना-अपना घोषणा पत्र जारी करते हैं। घोषणा-पत्र में जनता से वादा किया जाता है कि अगर वो सत्ता में आए तो अमुक-अमुक काम करेंगे। देश में इस वक्त लोकसभा चुनाव का माहौल है और अलग अलग दलों ने अपना-अपना घोषणा-पत्र जारी करना शुरू कर दिया है। कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष राहुल गांधी ने दिग्गज पार्टी नेताओं की मौजूदगी में चुनावी घोषणा-पत्र जारी किया। कांग्रेस के घोषणा-पत्र में कला-संस्कृति और साहित्य के बारे में भी पार्टी ने अपनी राय और भविष्य की योजनाओं को रखा है। पार्टी के घोषणा-पत्र का बीसवां वादा इसी विषय पर है। इसमें लिखा गया है कि ‘कला-संस्कृति और विरासत लोगों को पहचान दिलाती है। भारत जैसा बहु-सांस्कृतिक देश, जिसके पास गर्व करने लायक कला-संस्कृति-साहित्य और वृहद विरासत है, जिसे संरक्षित और सुरक्षित किए जाने की जरूरत है।‘ अब अगर हम इन पंक्तियों पर गौर करें तो ये लगता है कि कांग्रेस को कला-संस्कृति और साहित्य के अलावा विरासत को संजोने का ख्याल इतने लंबे अरसे बाद क्यों आया? अगर पहले भी इनको संरक्षित करने का ख्याल कांग्रेस पार्टी को आया था तो अब इसको दोहराने का मकसद क्या है? कांग्रेस ये सही कह रही है कि भारत के पास कला-संस्कृति-साहित्य की समृद्ध परंपरा है लेकिन आजादी के सत्तर साल बाद इसको संरक्षित और सुरक्षित करने की बात करने से ऐसा प्रतीत होता है कि अबतक इस काम को गंभीरता से नहीं लिया गया था। आजादी के बाद कांग्रेस पार्टी के पास लंबे समय तक सत्ता रही लेकिन जिस गंभीरता के साथ सांस्कृतिक विरासत को संजोने और उसको सहेजने का काम होना चाहिए था वो हो नहीं पाया। देश के अलग अलग हिस्सों में पुस्तकालयों में प्राचीन ग्रंथों की पांडुलिपियां उचित रखरखाव के अभाव में नष्ट होती रहीं लेकिन उसकी ओर समुचित ध्यान नहीं गया। अभी पिछले दिनों वाराणसी के गोयनका पुस्तकालय जाने का अवसर मिला, वहां इतने महत्वपूर्ण ग्रंथों की पांडुलिपियां रखी हैं, लेकिन उसको उचित तरीके से सहेजा नहीं जा सका है। धूल धूसरित कपड़ों में लपेटकर रखी गई ये पांडुलिपियां कभी भी नष्ट हो सकती हैं। राजस्थान के पूर्व राजघरानों के पुस्तकालयों में रखे हजारों ग्रंथ लगभग नष्ट हो गए। हुआ यह कि राजघरानों में उनके वारिसों के बीच संपत्ति के बंटवारे को लेकर विवाद हुए, मुकदमेबाजी हुई और कई जगह अदालत के आदेश के पर संपत्ति को सील कर दिया गया। जब सालों बाद मुकदमे का फैसला आया तो सीलबंद पुस्तकालयों की हालत बदतर हो चुकी थी, ग्रंथ लगभग नष्ट हो चुके थे। जरूरत इस बात की थी इन बहुमूल्य ग्रंथों को बचाने को लेकर सरकार कोई नीति बनाती । जो बन नहीं सकी। जो संस्थाएं बनाई गईं वो ठीक तरीके से अपना काम नहीं कर सकीं।
कांग्रेस पार्टी के घोषणा-पत्र में आगे कहा गया है कि ‘कांग्रेस भारत की कला और समृद्ध विविधतापूर्ण संस्कृति की रक्षा करने और इसे स्वतंत्र और रचनात्मक माहौल में फलने-फूलने का मौका मुहैया कराने के लिए प्रतिबद्ध है। हम पूरी तरह से सेंसरशिप का विरोध करने के साथ ही किसी भी समूह की कला और संस्कृति को बदनाम करने या नष्ट करने का विरोध करेंगे।‘  अब जरा इस वादे के आलोक में कुछ तथ्यों को देख लेते हैं। कांग्रेस पार्टी स्वतंत्र और रचनात्मक माहौल में फलने-फूलने का मौका मुहैया कराने के साथ साथ सेंसरशिप के विरोध की बात  करती है तो ये वादा खोखला लगता है। खोखला इसलिए कि कांग्रेस पार्टी हमेशा से सेंसरशिप के साथ रही है। साहित्य जगत अभी तक ये भूला नहीं है कि सलमान रश्दी की पुस्तक ‘द सैटेनिक वर्सेस’ पर जब भारत में बैन लगाया गया था तो उस वक्त कांग्रेस पार्टी के राजीव गांधी देश के प्रधानमंत्री थे। तस्लीमा नसरीन के साथ जो हुआ उसको भी साहित्य जगत के लोग भुला नहीं पा रहे हैं। इसके अलावा जब स्पेऩिश लेखक जेवियर मोरो लिखित सोनिया गांधी की फिक्शनलाइज्ड जीवनी ‘द रेड साड़ी’ जब भारत में प्रकाशित होनेवाली थी तो कांग्रेस ने उसको रुकवा दिया था। उस वक्त कांग्रेस के नेताओं ने खूब हो हल्ला मचाया था, जेवियर मोरो को कानूनी कार्रवाई की धमकियां दी गई थीं। कांग्रेस उस वक्त सत्ता में थी लिहाजा इस पुस्तक का प्रकाशन नहीं हो सका। ये कैसा रचनात्मक माहौल था इसकी कल्पना ही की जा सकती है।
अब अगले बिंदु पर नजर डालते हैं जिसमें ये वादा किया गया है कि ‘हम पारंपरिक कला और शिल्प के क्षेत्र में कार्यरत कलाकारों और शिल्पकारों को आर्थिक सहायता(फैलोशिप) प्रदान करेंगे।‘ कांग्रेस पार्टी ये कर सकती है और इसने पूर्व में ऐसा किया भी है। तमाम तरह के फैलोशिप दिए गए, अलग अलग संस्थानों में फैलोशिप के नाम पर अपने लोगों को उपकृत किया गया। कांग्रेस ने एक बहुचर्चित फेलौशिप आरंभ किया था जिसका नाम है ‘टैगोर नेशनल फेलोशिप’। संस्कृति मंत्रालय के अधीन चलनेवाले इस फैलोशिप में शोधकर्ता को अस्सी हजार रुपए प्रतिमाह और अन्य खर्चे के लिए ढाई लाख सालाना दिए जाने का प्रावधान है। अगर इस फैलोशिप के लिए चयनित उम्मीदवार विश्वविद्यालय या अन्य सरकारी संस्थाओं में कार्यरत है तो उनके वेतन के बराबर राशि उनको दी जाएगी। संस्कृति मंत्रालय इस फेलोशिप को अपने अधीन और अपने से संबद्ध स्वायत्त संस्थाओं के माध्यम से प्रदान करती है। यह जानना दिलचस्प होगा कि अबतक ये किन किन लोगों को दिया गया है और उनमें से कितने लोगों ने तय समय में काम पूरा करके संस्थाओं को सौंपा। एक अनुमान के मुताबिक शुरुआती सालों में जिनको ये फेलोशिप दी गई उनमें से सत्तर फीसदी से अधिक लोगों ने अपना प्रोजेक्ट जमा ही नहीं किया। इसी तरह से भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद में इतहास के एक विद्वान चालीस सालों तक एक फेलोशिप के तहत प्रोजेक्ट पर काम करते रहे लेकिन वो पूरा नहीं हो पाया। उनको परिषद के दफ्तर में एक कमरा भी दिया गया था जिसे बहुत मुश्किल से 2014 में केंद्र में सरकार बदलने के बाद खाली करवाया जा सका। अब घोषणा-पत्र में फिर से फेलोशिप की बात की गई है लेकिन उसमें इस बात का कहीं जिक्र नहीं है कि इसमें जवाबदेही कैसे तय होगी। सरकार जब कोई फेलोशिप देती है तो उसमें करदाताओं का पैसा लगा होता है, लिहाजा उनको ये जानने का हक है कि खर्च हुए पैसे के एवज में देश को मिलेगा क्या? आवश्यकता तो इस बात की है कि आजादी के बाद फेलोशिप के नाम पर जितना पैसा बांटा गया उसका ऑडिट हो और जनता के सामने एक श्वेत पत्र प्रस्तुत किया जाए।
एक और वादा किया गया है कि ‘कांग्रेस कलात्मक स्वतंत्रता की गारंटी देगी, कलाकार और शिल्पकार सेंसरशिप या विरोध के डर के बिना अपने विचार व्यक्त करने के लिए स्वतंत्र होंगे। स्वयंभू सतर्कता समूहों द्वारा किसी प्रकार का सेंसर करने तथा कलाकारों को धमकाने को पूरी गंभीरता के साथ लेते हुए कानूनी कार्यवाही की जाएगी।‘ इस वादे को पढ़ने के बाद मन में यह सवाल उठता है कि क्या अबतक ऐसा नहीं हो रहा है। अगर कुछ लोग फिल्म पद्मावत को लेकर विरोध जताते हैं तो कुछ लोग फिल्म इंदु सरकार की रिलीज के खिलाफ भी बवाल मचाते हैं। रही बात कानूनी कार्यवाही की तो ये गारंटी तो हमारा संविधान ही हमें देता है। कलात्मक स्वतंत्रता की भी एक सीमा है जिसको हमारे देश की अदालतों ने समय समय पर व्याख्यायित किया हुआ है। चाहे वो एम एफ हुसैन का मामला हो या तमिल लेखक मुरुगन का। उससे अलग हटकर क्या किया जा सकता है इसको थोड़ा विस्तार से समझाने और समझने की जरूरत है। एक और दिलचस्प वादा है ‘कांग्रेस सांस्कृतिक संस्थाओं को स्वायत्ता, जिसमें वित्तीय स्वायत्ता भी निहित है, प्रदान करने का वचन देती है।‘ सांस्कृतिक संस्थाओं में स्वायत्ता के नाम पर किस तरह की अराजकता हुई है उसको हमारे देश ने देखा है, चाहे वो साहित्य अकादमी हो, संगीत नाटक अकादमी हो या फिर ललित कला अकादमी। ललित कला अकादमी से करोडों के पेंटिग्स बेच दिए गए। भ्रष्टाचार में ये संस्था आकंठ डूबी रही। इन सबका आरोप जिन लोगों पर लगा उनका बाल भी बांका नहीं हो सका, क्योंकि उनके तार कहीं ना कहीं कांग्रेस पार्टी से जुड़े थे। यूपीए टू के दौरान इन संस्थाओं में स्वायत्ता की आड़ में होनेवाले खेल पर सीताराम येचुरी की अगुवाई वाली संसद की एक कमेटी ने अपनी रिपोर्ट पेश की थी, बावजूद इसके कोई कार्रवाई नहीं हो सकी। ना ही उसके सुझावों पर अमल हो सका। कला साहित्य और संस्कृति को लेकर जितने भी वादे किए गए हैं वो रस्मी हैं और उससे कोई नई उम्मीद नहीं जगती है। जरूरत इस बात की है कि सभी दल एक राष्ट्रीय सांस्कृतिक नीति की बात करें ताकि संस्कृति,साहित्य और कला को मजबूती प्रदान करने के लिए कुछ ठोस किया जा सके।


Tuesday, August 29, 2017

बीजेपी के ‘शाह’ का मिशन 350

एक पुरानी कहावत है कि कामयाबी के बाद लोग थोड़े ढीले पर जाते हैं, सेना भी जीत के बाद अपने बैरक में जाकर आराम कर रही होती है। आजादी के बाद लगभग सात दशकों में देश की राजनीति ने वो दौर देखा जब ये कहा जाता था कि नेता चुनाव में जीत के बाद पांच साल बाद ही नजर आते हैं। भारतीय राजनीति में नरेन्द्र मोदी युग के उदय के बाद स्थितियां बदलती नजर आ रही हैं। अमित शाह ने तीन साल पहले जब भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष का पद संभाला तो उन्होंने अपनी कार्यशैली से भारतीय राजनीति में एक अलग तरह की शुरुआत की। जीत दर जीत के बाद भी उनके काम करने के अंदाज में किसी तरह की ढिलाई नजर नहीं आई। उनके सियासी सिपाही भी चुनावी जीत के बाद बैरक में नहीं पहुंचे बल्कि अपने सेनापति की रणनीति पर अमल करने के लिए अगले सियासी मैदान की ओर कूच करने लगे। इस वक्त जबकि दो हजार उन्नीस में होनेवाले लोकसभा चुनाव में करीब पौने दो साल बाकी हैं, तो अमित शाह ने उसकी रणऩीति बनाकर अपने मोहरे फिट करने शुरू कर दिए हैं। खुद अध्यक्ष हर राज्य में जाकर वहां संगठन की चूलें तो कस ही रहा है सरकार में बैठे लोगों को यह संदेश भी दे रहा है कि बगैर जनता के बीच में गए सफलता संदिग्ध है।
एक तरफ जहां पूरा विपक्ष बिखरा हुआ है और विपक्षी एकता की सफल-असफल कोशिशें जारी हैं वहीं अमित शाह ने 2019 के लोकसभा चुनाव का लक्ष्य निर्धारित कर दिया है। मिशन 360 यानि लोकसभा की तीन सौ साठ पर जीत का लक्ष्य। अमित शाह ने अपने इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए ब्लूप्रिंट बनाकर पार्टी के वरिष्ठ नेताओं और केंद्रीय मंत्रियों के साथ सीटों पर जीत की संभावनाएं तलाशनी शुरू कर दी है। पहले तो उन लोकसभा सीटों की पहचान की गई है जहां बीजेपी के जीतने की संभावना काफी है, उन सीटों के बारे में भी मंत्रियों और नेताओं के साथ मंथन कर जीत पक्की करने की रणनीति बनाकर उसपर काम शुरू हो गया है। इसके बाद उन सीटों पर काम शुरू किया जा चुका है जहां 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी दूसरे नंबर पर आई थी। इन सीटों पर जीत की संभावनाओं के लिए अमित शाह ने पिछले दिनों दिल्ली में बीजेपी मुख्यालय में पार्टी के नेताओं के साथ बैठक की थी। उस बैठक में बीजेपी के सभी राष्ट्रीय महासचिवों के अलावा केंद्रीय मंत्री, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र के दो तीन मंत्री के अलावा पार्टी के चुनिंदा सांसदों ने भी हिस्सा लिया था। कुल बाइस नेताओं की इस बैठक में हरेक को पांच से छह लोकसभा सीटों की जिम्मेदारी दी गई है। माना जा रहा है कि उस बैठक में तमिलनाडू, केरल और पूर्वोत्तर के राज्यों में बीजेपी की सीटें बढ़ाने की रणनीति को अंतिम रूप दिया गया। केरल में बीजेपी अपना आधार बढ़ाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाए हुए है। केरल में आरएसएस के कार्यकर्ताओं की हत्या को मुद्दा बनाकर बीजेपी के वरिष्ठ मंत्री से लेकर संगठन के नेताओं के लगातार दौरे हो रहे हैं। हाल ही में वित्त मंत्री अरुण जेटली भी केरल गए थे । आरएसएस के बड़े नेता भी उस मोर्चे पर सक्रिय हैं। दिल्ली से लेकर केरल तक में सेमिनार और धरना प्रदर्शन कर माहौल बनाया जा रहा है ।
बीजेपी की एक रणनीति जो देखने को मिली वो ये कि चुनाव के पहले सूबे में विपक्ष के महत्वपूर्ण नेता को अपने पाले में लाने की कवायद। चाहे असम में हेमंता सरमा हो, दिल्ली में अरविंदर सिंह लवली हों, उत्तर प्रदेश में स्वामी प्रसाद मौर्य हों या अब गुजरात में शंकर सिंह वाघेला हों। विपक्षी नेताओं को अपने पाले में लाने की अमित शाह की इस रणनीति का बड़ा मनोवैज्ञानिक फायदा मिलता है। यह पाला बदल कई बार चुनाव के ऐन पहले भी करवाया जाता है ताकि वोटरों के बीच परोक्ष रूप से यह संदेश जाए कि फलां पार्टी जीत रही है क्योंकि विपक्ष के अहम नेता पार्टी छोड़कर उधर चले गए हैं।

बीजेपी ने 2014 के लोकसभा चुनाव में 289 सीटों पर विजय प्राप्त की थी और पारंपरिक आंकलन यह है कि कुछ सीटों पर बीजेपी को एंटी इनकंबेसी झेलनी पड़ सकती है। एंटी इंनकंबेंसी की धार को कुंद करने के लिए या फिर इससे होने वाले नुकसान की भारपाई के लिए रणनीति तो बनाई ही गई है, साथ ही मिशन 360 का लक्ष्य भी रखा गया है। अमित शाह की चुनावी रणनीति में जोरशोर से लगने से ये कयास भी लगाए जा रहे हैं कि 2019 में होनेवाले लोकसभा चुनाव को प्रीपोन कर 2018 में भी करवाया जा सकता है। दो हजार अठारह में कई राज्यों में विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं । इऩ चुनावों के लिए भी अरुण जेटली समेत केंद्रीय मंत्रियों को प्रभारी नियुक्त किया गया है। संभव है कि प्रधानमंत्री मोदी के राज्य और केंद्र में साथ चुनाव कराने के प्रस्ताव पर अमल हो जाए। हलांकि पार्टी के कई नेता इसमें दो हजार चार के चुनाव में शाइनिंग इंडिया के बावजूद पार्टी की हार का हवाला देकर ऐसा नहीं करने की सलाह दे रहे हैं। लेकिन अमित शाह की कार्यशैली को देखकर इतना तो कहा ही जा सकता है कि वो सारे संभावनाओं और आशंकाओं पर विचार करने के बाद व्यूह रचना रचते हैं और वो व्यूह रचना ऐसी होती है जिसमें एक दो बार को छोड़कर हमेशा उनको सफलता ही मिली है। मिशन 360 को पूरा करने के लिए जुटे शाह को विपक्ष के बिखराव का लाभ भी मिल सकता है। लाभ तो राहुल गांधी के पार्टी अध्यक्ष पद को संभालने को लेकर जारी भ्रम का भी होना लगभग तय है।  

Saturday, August 12, 2017

कांग्रेस में संघर्ष होगा तेज

अभी हाल ही में कांग्रेस पार्टी में दो अहम घटनाएं हुईं। बहुचर्चित राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस अध्यक्ष के राजनीतिक सचिव अहमद पटेल गुजरात से निर्वाचित हुए। निर्वाचन के पहले हाई वोल्टेज ड्रामा हुआ और मेरे जानते हाल के दशकों में किसी राज्यसभा चुनाव को मीडिया में इतनी कवरेज नहीं मिली थी। अहमद पटेल के राज्यसभा चुनाव को कांग्रेस और बीजेपी दोनों ने प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया था लेकिन पटेल के लिए तो यह चुनाव करो या मरो की स्थिति के जैसा था। पिछले करीब एक दशक से अहमद पटेल कांग्रेस में सोनिया गांधी के बाद सबसे ताकतवर नेता के तौर पर स्थापित थे। कहा जाता था कि पटेल की मर्जी के बगैर पार्टी में पत्ता भी नहीं हिलता है। ऐसे में जब बीजेपी ने कांग्रेस के इस कद्दावर नेता को राज्यसभा चुनाव के चक्रव्यूह में घेरा तो अहमद पटेल के सामने अपने अस्तित्व का संकट पैदा हो गया। पटेल ने अपने रणनीतिक कौशल से इस चुनाव के नतीजे को अपने पक्ष में कर लिया और पार्टी में अपनी अहमियत भी साबित कर दी। राज्यसभा चुनाव के नतीजे के पहले पार्टी में एक और बेहद अहम घटना हुई। कांग्रेस के महासचिव और राहुल गांधी कैंप के माने जानेवाले दिग्विजय सिंह ने कांग्रेस आलाकमान को खत लिखकर पार्टी की सभी जिम्मेदारियों से मुक्त करने की मांग की ताकि तीर्थयात्रानुमा जर्नी पर जा सकें। इसके पहले दिग्विजय सिंह को गोवा और कर्नाटक के बाद तेलांगना के प्रभार से पार्टी ने मुक्त कर दिया था। पार्टी के अंदर गोवा में सरकार नहीं बनने के लिए दिग्विजय सिंह को ही जिम्मेदार माना गया था। तेलगांना का प्रभार लिए जाने के बाद दिग्विजय ने खत लिखा था।
पहली घटना ने तो मीडिया में जमकर सुर्खियां बटोरी लेकिन दिग्विजय सिंह के कदम को उस तरह से सुर्खियां हासिल नहीं हुईं। अब इन दोनों घटनाओं को मिलाकर देखने पर कांग्रेस में एक नए तरह के समीकरण का आभास होता है। पटेल की जीत से एक बात तो तय मानी जा रही है कि पार्टी में अब राहुल गांधी के कैंप के नेताओं पर सोनिया की पीढ़ी के नेता और उनके सहयोगी हावी होने की कोशिश करेंगे। अहमद पटेल की मजबूती को इस रूप में देखा जा रहा है । यह भी संभव है कि अब इस तरह की मांग उठे कि दो हजार उन्नीस के लोकसभा चुनाव तक सोनिया गांधी के हाथों में ही पार्टी की कमान रहे। राहुल गांधी पार्टी के उपाध्यक्ष के तौर पर अपनी भूमिका का निर्वाह करते रहे। अगर इस तरह की मांग मान ली जाती है तो 2019 तक अहमद पटेल की पार्टी में अहमियत और केंद्रीय भूमिका बनी रह सकती है।
कांग्रेस में संगठनात्मक चुनाव होने वाले हैं और जिस तरह से एक नियमित अंतराल पर राहुल गांधी के अध्यक्ष बनने की खबरें आम होती हैं उसी तरह से एक बार फिर से कयास लगाए जा रहे हैं कि अक्तूबर में राहुल गांधी कांग्रेस के अध्यक्ष बन सकते हैं। अहमद पटेल की जीत के बाद यह तो तय हो गया है कि अगर राहुल गांधी पार्टी के अध्यक्ष बनते भी हैं तो उनके लिए अहमद पटेल को दरकिनार कर अपनी मर्जी चलाना आसान नहीं होगा। दिग्विजय सिंह की खुद को पार्टी की जिम्मेदारियों से मुक्त करने के अनुरोध को कुछ लोग कांग्रेस के पुराने कामराज फॉर्मूले की तरह देख रहे है। यह कहां तक व्यावहारिक है ये तो आने वाले वक्त में ही पता चल पाएगा।
दरअसल मौजूदा कांग्रेस पार्टी में सोनिया के कैंप के नेताओं और राहुल गांधी के करीबी नेताओं के बीच एक तरह की रस्साकशी लंबे समय से चल रही है। राहुल गांधी चाहते हैं कि वो तब अध्यक्ष बनें जब पार्टी के सभी पदाधिकारी उनकी मर्जी के हों। वो अपनी टीम खुद बना सकें। लेकिन ऐसा संभव नहीं हो पाता है। राहुल कैंप के कई नेताओं का मानना है कि इसमें अहमद पटेल सबसे बड़ी बाधा हैं और वो चाहते हैं कि पार्टी नए और पुराने नेताओं के बीच समन्वय बनाकर चले ताकि पार्टी को अनुभव और ऊर्जा दोनों का साथ मिल सके। अहमद पटेल ने राज्यसभा चुनाव में जीत हासिल कर अपने अनुभव और ऊर्जा के समन्वय के सिद्धांत को साबित भी कर दिया, लिहाजा ये माना जा रहा है कि सोनिया गांधी का इस सिद्धांत में भरोसा बढ़ेगा। सोनिया गांधी जितना ही अनुभव और ऊर्जा के समन्वय की बात करेंगी उतनी ही राहुल गांधी को दिक्कत होगी। राहुल कैंप के नेता चाहते हैं कि जब वो राहुल गांधी पार्टी अध्यक्ष बनें तो उनकी राह में किसी तरह की बाधा ना हो। उनकी टीम में सभी नेता ऐसे हों जिनकी आस्था सिर्फ उनमें हो। अहमद पटेल की राज्यसभा की जीत ने पार्टी के अंदर के इस द्वंद को बढ़ा दिया है।

राहुल गांधी कैंप के नेताओं और अहमद पटेल के बीच संबंध कैसे हैं इसकी बानगी ट्वीटर पर भी देखने को मिल सकती है। अहमद पटेल की जीत के बाद जब पार्टी के सभी नेता अहमद पटेल को बधाई दे रहे थे तो वो सभी उनको टैग कर रहे थे और पटेल भी लगभग सबको नाम लेकर धन्यवाद दे रहे थे। दिग्विजय सिंह ने जो ट्वीट किया उसमें लिखा- बधाई हो अहमद भाई। जवाब में पटेल ने लिखा- बहुत धन्यवाद जी। औपचारिक बधाई का बेहद औपचारिक धन्यवाद। इस ट्वीटर संवाद से ही संकेत मिल रहे हैं। पटेल की जीत के बाद अब पार्टी में एक बार फिर से पीढ़ियों का संघर्ष बढ़ सकता है, इसके संकेत तो मिलने शुरू हो ही गए हैं। अब यह सोनिया के राजनीतिक कौशल पर निर्भऱ करता है कि वो इस संघर्ष से पार्टी को कैसे उबारती हैं।    

Tuesday, March 28, 2017

क्षेत्रीय क्षत्रपों की अहमियत

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव नतीजों के दिन एक न्यूज चैनल पर चर्चा के दौरान बीजेपी के एक उत्साही नेता ने लगभग नारेबाजी की शक्ल में कहा कि ये बीजेपी से ज्यादा नरेद्र मोदी की जीत है । बहुत विनम्रता से उनको नरेन्द्र मोदी का प्रधानमंत्री बनने के पहले बीस मई दो हजार चौदह को संसद भवन के सेंट्रल हॉल में दिया भाषण याद दिलाया । उस भाषण में उन्होंने भावुक होकर कहा था कि पार्टी उसके कार्यकर्ता के लिए मां समान होती है और मां पर कोई कृपा नहीं करता है बल्कि सेवा करता है । कहना ना होगा कि नरेन्द्र मोदी अपने इस वाक्य से पार्टी और संगठन की अहमियत बता रहे थे । प्रधानमंत्री बनने के बाद भी नरेन्द्र मोदी ने पार्टी और संगठन की अहमियत को दरकिनार नहीं किया। उन्होंने लगभग तीन वर्षों के अपने कार्यकाल में बीजेपी को सांगठनिक रूप से मजबूत करने काम किया । जिन राज्यों में बीजेपी को विधानसभा चुनावों में जीत मिली वहां उन्होंने स्थानीय नेतृत्व को उभारने और मजबूत करने की योजना पर गंभीरता से काम हुआ । उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ को सूबे की कमान सौंपकर एक बार नरेन्द्र मोदी ने फिर से अपनी इस कार्ययोजना को परवान चढाया । मोदी ने योगी को मुख्यमंत्री बनाकर आडवाणी-वाजयेपी युग से आगे जाकर पार्टी को युवा नेतृत्व देने का साहस भी दिखाया । ना सिर्फ योगी को बल्कि अपने विश्वासी रक्षा मंत्री मनोहर पार्रिकर को भी गोवा भेजकर वहां पार्टी की स्थिति मजबूत करने का दांव चल दिया । पार्रिकर के दिल्ली आने के बाद से पार्टी गोवा में बिखर गई थी । इसके पहले भी उन्होंने महाराष्ट्र में ब्राह्णम देवेन्द्र फड़णवीस को, झारखंड में गैर आदिवासी रघुवर दास को, हरियाणा में गैर जाट मनोहर लाल खट्टर को, असम में सर्वानंद सोनोवाल को सूबे की कमान सौंपी थी । गुजरात में तमाम अटकलों के बावजूद विजय रूपानी को कमान मिली थी । विधानसभा चुनावों में जीत के बाद तो अटकलें ये भी लग रही हैं कि शिवराज सिंह चौहान, रमन सिंह और वसुंधरा को दिल्ली लाकर वहां नए नेतृत्व के हाथ में सत्ता दी जाएगी । अगर ऐसा होता है एंटी इनकंबेंसी को कम करने की कोशिश के तौर पर देखा जाएगा । दरअसल अगर देखा जाए तो मोदी उन लोगों को ज्यादा तरजीह दे रहे हैं जिनकी छवि बेदाग है और जो दबाव में नहीं आते हैं । देवेन्द्र फड़णवीस को ही लें तो वो शिवसेना के जरा भी दबाव में नहीं आते हैं और पार्टी को लगातार मजबूत भी करते चल रहे हैं । ऐसी ही छवि योगी आदित्यनाथ की भी है । इसके साथ ही मोदी जिनको चुनते हैं उनके आसपास एक कवच भी तैयार कर देते हैं जैसे योगी के मुख्यमंत्री बनने के बाद फौरन सूबे के सभी सांसदों को बुलाकर संदेश दे दिया कि वो ट्रांसफर पोस्टिंग के लिए मुख्यमंत्री के पास सिफारिश ना करें । इस तरह से वो स्थानीय या क्षेत्रीय नेतृत्व को मजबूत करते हैं । राजनीतिक तौर पर इसके कई फायदे हैं । एक तो संगठन मजबूत हो रहा है दूसरे अपनी पसंद का मुख्यमंत्री बनाकर नरेन्द्र मोदी अपनी स्थिति को भी मजबूत कर रहे हैं । हलांकि इस वक्त पार्टी में उनको कोई चुनौती नहीं है लेकिन वो भविष्य के मद्देनजर अपनी रणनीति तय करते चल रहे हैं ।

अब बीजेपी की तुलना में अन्य दलों में देखें तो इसका साफ अभाव दिखता है । कांग्रेस ने सायास वर्षों तक स्थानीय नेतृत्व को कमजोर करने का ही काम किया। इंदिरा गांधी से लेकर राजीव गांधी तक ने किसी भी राज्य के मुख्यमंत्री को मजबूत नहीं होने दिया । कांग्रेस के इन दो नेताओं के दौर में शायद ही कोई ऐसा मुख्यमंत्री होगा जिसने पद पर अपना कार्यकाल पूरा किया हो । कांग्रेस में इंदिरा गांधी के दौर में किचन कैबिनेट और राजीव गांधी के दौर में कोटरी हुआ करती थी, इनमें तमाम वो नेता होते थे जो गणेश परिक्रमा में यकीन रखते थे । लंबे समय तक चली इस कोटरी की पॉलिटिक्स ने कांग्रेस को पंगु कर दिया । सांगठनिक क्षमताओं की बजाए उन नेताओं को तरजीह दी जाने लगी जो नेता व्यक्ति पूजा में प्रवीण थे । यही वह दौर था जब भारत को राजवंशीय लोकतंत्र कहा जाने लगा था क्योंकि एक परिवार के इर्दगिर्द पार्टी सिमट गई थी । इंदिरा गांधी ने जिस दरबारी संस्कृति को बढावा दिया था उसको संजय-राजीव-सोनिया ने आगे बढ़ाया । राहुल गांधी ने जरूर शुरुआत में संगठन के चुनाव आदि की पहल की थी लेकिन उसको वो आगे नहीं बढ़ा पाए और दरबारियों ने उनको अपने चंगुल में ले लिया । कांग्रेस की इस राजवंशीय संस्कृति का असर अन्य पार्टियों पर भी पड़ा चाहे वो डीएमके हो, एआईएडीएमके हो,नेशनल कांफ्रेंस हो, जेडीएस हो, समाजवादी पार्टी हो । समाजवादी पार्टी, नेशनल कांफ्रेंस और डीएमके जैसी कुछ पार्टियों के नेताओं ने अपने बेटों को पार्टी सौंप दी लेकिन मायावती, ममता और जयललिता ने दूसरी पंक्ति के नेता तैयार नहीं किए । नीतीश कुमार तक ने इस मसले पर कुछ खास नहीं किया । बहुधा यह इस वजह से भी होता है कि इनको लगता है कि अगर मजबूत नेता उभर गया तो उनकी कुर्सी को खतरा हो सकता है । इस मनोविज्ञान के तहत ही कमजोर नेताओं को आगे बढाया जाता है। कांग्रेस को अगर दो हजार चौबीस के लोकसभा चुनाव में मुकाबले में रहना है तो उसको अपने क्षेत्रीय क्षत्रपों को अहमियत देनी होगी, क्योंकि पार्टी की जो हालत है उसमें दो हजार उन्नीस के लोकसभा चुनाव तक उसको सांगठनिक रूप से मजबूत कर नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व को चुनौती देना संभव नहीं लग रहा है । कांग्रेस के नेता भले ही पार्टी में बदलाव की बात करें लेकिन ये बदलाव जमीनी होंगे तभी लाभ हो पाएगा । 

Monday, March 20, 2017

पस्त संगठन, मस्त नेता

दो हजार चौदह के बाद से जब भी कोई चुनाव होता है और उसमें कांग्रेस को हार मिलती है तो राहुल गांधी के नेतृत्व को लेकर सवाल खड़े होने लगते हैं । राजनीतिक विश्लेषकों के अलावा कांग्रेस के नेता भी उनके नेतृत्व को लेकर प्रत्यक्ष तौर पर तो नहीं लेकिन संगठन की चूलें आदि कसने के नाम पर सवाल उठाने लगते हैं । इसमें कोई दो राय नहीं है कि राहुल गांधी में एक सौ तीस साल पुरानी पार्टी की अगुवाई को लेकर कोई स्पार्क नहीं दिखा है । ना ही किसी तरह की कोई ठोस रणनीति के दर्शन हुए हैं । हालिया विधानसभा चुनावों खासकर यूपी में कांग्रेस की हार के बाद एकबार फिर से कांग्रेस के नेता तरह तरह के सवाल खड़े करने लगे हैं । कोई शल्य चिकित्सा की बात कर रहा है तो कोई संगठन मजबूत करने की बात कर रहा है । यह सही है कि पार्टी को सही तरीके से चलाने और उसको संसदीय प्रणाली में जीत दिलवाने की जिम्मेदारी नेतृत्व पर होती है परंतु यह भी उतना ही सच है कि कोई भी राजनीतिक दल अपने मजबूत नेतृत्व के साथ साथ समर्पित अन्य नेताओं के कंधों पर ही चल सकता है । अब कांग्रेस को देखें तो इस वक्त पार्टी को लेकर जो ज्यादा चिंतित नजर आ रहे हैं उनमें से ज्यादातर राज्यसभा के सदस्य हैं । इसके अलावा कांग्रेस ने यूपी में जिनको जिम्मेदारी भीदी वो सारे के सारे राज्यसभा वाले नेता थे चाहे वो गुलाम नबी आजाद हों, प्रमोद तिवारी हों, राज बब्बर हों या फिर संजय सिंह, पीएल पूनिया हों या फिर राजीव शुक्ला ।  जनता के बीच जाकर संघर्ष का उनका कोई हालिया इतिहास नहीं रहा है । हम अगर उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव को ही देखें तो भारतीय जनता पार्टी ने वहां अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी । प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दर्जनों रैलियां की, बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने करीब दो सौ रैलियां की । इसके अलावा करीब बीस केंद्रीय मंत्री उत्तर प्रदेश में पार्टी के पक्ष में रात-दिन एक किए हुए थे । एक केंद्रीय महासचिव को पार्टी ने महीने भर से ज्यादा के लिए लखनऊ में तैनात कर दिया था । अब इसकी तुलना में कांग्रेस के नेताओं को देखें । बड़ी बड़ी बातें करनेवाले, टीवी कैमरों के आगे चिंता जताने वाले किस कांग्रेस नेता ने उत्तर प्रदेश में प्रचार किया । सत्यव्रत चतुर्वेदी, मणिशंकर अय्यर, दिग्विजय सिंह और गठबंधन होने के बाद तो गुलामनबी आजाद और राज बब्बर भी अपेक्षाकृत कम दिखाई देने लगे थे । कपिल सिब्बल, मनीष तिवारी जैसे नेता यूपी चुनाव के दौरान कहीं दिखाई नहीं दे रहे थे । हिंदी में एक पुरानी कहावत है कि अकेला चना भांड़ नहीं फोड़ता है । कांग्रेस के साथ इन दिनों वही हो रहा है ।
आज के अखबारों में कमलनाथ का साक्षात्कार छपा है जिसमें उन्होने कहा है कि राहुल गांधी को नेतृत्व संभाल लेना चाहिए । दरअसल कमलनाथ हर हार के बाद बाहर आते हैं और राहुल गांधी के बारे में अपनी अपेक्षा जाहिर कर नेपथ्य में चले जाते हैं । पिछले दिनों मुंबई लिटो फेस्ट में एक सत्र में कांग्रेस की पूर्व सांसद प्रिया दत्त से संवाद का अवसर मिला था । मैंने उनसे जब पूछा कि क्या कांग्रेस को नेतृत्व में बदलाव की जरूरत है तो उन्होंने साफ जवाब तो नहीं दिया लेकिन इतना जरूर कहा कि कांग्रेस को गंभीर आत्ममंथन की आवश्यकता के साथ कड़े कदम उठाने की आवश्यकता है । प्रिया दत्त ने बगैर कहे भी सबकुछ कह दिया था । दरअसल कांग्रेस के नेता अपनी कमजोरियों को ढांपने के लिए राहुल की कमजोरी को अपनी ढाल बना लेते हैं । दिग्विजय सिंह बहुधा ज्ञान देते रहते हैं लेकिन गोवा कांग्रेस के नेता उनपर जो इल्जाम लगा रहे हैं उसपर ध्यान देने की जरूरत है । गोवा में सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरने वाली कांग्रेस समर्थन का पत्र टाइप नहीं करवा पाई। जबकि भारतीय जनता पार्टी ने उतने वक्त में ही समर्थन भी जुटा लिया और अपने रक्षा मंत्री का इस्तीफा दिलवाकर दावा भी पेश कर दिया। बावजूद इस भ्रम के दिग्विजय सिंह से किसी तरह की कोई पूछताछ की गई हो, लगता नहीं है ।

दरअसल कांग्रेस के नेताओं को यह लगता है कि उनकी पार्टी अपने बूते पर कम विपक्षी दलों की गलतियों की वजह से सत्ता में आती रही है । चाहे वो इमरजेंसी के बाद बनी मोरारजी देसाई सरकार की नाकामियां हो जिसकी वजह से उन्नीस सौ अस्सी में इंदिरा गांधी की वापसी हुई या फिर चौरासी में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उपजी सहानुभूति लहर हो । या फिर 1991 में राजीव गांधी की हत्या के बाद मिला जनादेश हो । इसी तरह से दो हजार चार में शाइनिंग इंडिया को लेकर भारतीय जनता पार्टी के आंकलन में हुई गलती से कांग्रेस को सत्ता मिली । अभी पंजाब भी इसका सर्वेत्तम उदाहरण है जहां अकालियों की वजह से कांग्रेस को सत्ता मिली । इस लंबे कालखंड में सत्ता मिलते रहने से कांग्रेस के नेता आराम तलब हो गए हैं । उनके ज्यादातर नेता जमीन से भी कटने लगे और उनको लगता है राज्यसभा का रूट सबसे अच्छा है, चुनाव लड़ना नहीं है लेकिन सत्ता सुख हासिल होता रहता है । संघर्ष से दूर होते जाने से पार्टी आम जनता से भी दूर होती चली गई । लोगों से उसका कनेक्ट लगभग खत्म हो गया । संसदीय प्रणाली में चुनावी जीत बहुत अहम होती है । दो हजार नौ से लेकर दो हजार बारह तक भारतीय जनता पार्टी के माहौल को भी याद करना चाहिए । कितनी निराशा थी, लेकिन उसी वक्त गुजरात से पार्टी को आशा की किरण दिखाई दी । नरेन्द्र मोदी ने अपने कुशल नेतृत्व से पार्टी को लगातार जीत दिलाई । अमित शाह जैसे कुशल संगठनकर्ता ने उस जीत को आगे बढ़ाया । अब अगर कांग्रेस को अपनी खोई जमीन हासिल करनी है तो उसको जमीन पर आना होगा । सोनिया और राहुल गांधी के बीच के पार्टी का असली बॉस कौन के भ्रम को भी दूर करना होगा ।