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Saturday, February 4, 2023

तकनीक से समृद्ध होगी संस्कृति


एक फरवरी को केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने संसद में बजट पेश किया। बजट पर चर्चा हो रही थी। अचानक एक सज्जन का फोन आया। कहने लगे कि इस बार प्रकाशन जगत के लिए सरकार ने कुछ नहीं किया। उल्टे डिजीटल पुस्तकालयों की घोषणा करके पुस्तक व्यवसाय के लिए एक नई चुनौती खड़ी कर दी है। इतना कहने के बाद उन्होंने कहा कि हिंदी के एक शीर्ष प्रकाशक की बजट पर प्रतिक्रिया भेज रहे हैं, उसको देख लीजिएगा। उनके फोन रखते ही हमने मेल चेक की तो प्रकाशक महोदय की हिंदी और अंग्रेजी में बजट पर प्रतिक्रिया थी। बजट में प्रकाशन जगत की उपेक्षा पर वो झुब्ध नजर आ रहे थे। इसके अलावा उन्होंने डिजीटल पुस्तकालयों की घोषणा की भी आलोचना की थी और कहा था कि कोरोना के समय से संकटग्रस्त प्रकाशन व्यवसाय को सरकार की इस पहल से झटका लगेगा। यात्रा पर होने की वजह से बजट भाषण सुन नहीं पाया था। प्रकाशक महोदय की प्रतिक्रिया पढ़ने के बाद ये जानने की इच्छा हुई कि बजट में ऐसी क्या घोषणा हुई है जिसपर हिंदी के इस शीर्ष प्रकाशक ने इतनी कठोर प्रतिक्रिया दी है।

इस बजट में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बच्चों और किशोरों के लिए नेशनल डिजीटल लाइब्रेरी बनाने की घोषणा की। अपनी घोषणा में वित्त मंत्री ने स्पष्ट किया कि इस डिजीटल पुस्तकालय में सभी भाषाओं और विषयों की उत्कृष्ट पुस्तकें होंगी। सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को इस बात के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा कि वो पंचायत और वार्ड स्तर पर पुस्तकालयों की स्थापना करें। इन पुस्तकालयों में इस तरह की व्यवस्था की जाए कि बच्चे और किशोर वहां बैठकर नेशनल डिजीटल लाइब्रेरी की पुस्तकों तक पहुंच सकें। इसके साथ ही वित्त मंत्री ने कहा कि सरकार देश में पढने की संस्कृति का विकास करने के लिए गैर सरकारी संगठनों के साथ मिलकर हर आयुवर्ग के छात्रों के लिए पठनीय सामग्री उपलब्ध करने का प्रयास करेगी। इस कार्य में राष्ट्रीय पुस्तक न्यास और चिल्ड्रन बुक ट्रस्ट का सहयोग भी लिया जाएगा। राष्ट्रीय पुस्तक न्यास से अपेक्षा की गई है कि वो नेशनल डिजीटल लाइब्रेरी के लिए सभी भारतीय भाषाओं में उत्कृष्ट पुस्तकें उपलब्ध कराए। नेशनल डिजीटल लाइब्रेरी में सिर्फ पुस्तकें ही नहीं होंगी बल्कि किशोरों और बच्चों को कई अन्य चीजें सीखने को मिलेंगी। ये डिजीटल पुस्तकालय शिक्षा मंत्रालय के अधीन होगा। 

अवधारणा के स्तर पर नेशनल डिजीटल लाइब्रेरी की स्थापना एक बेहतर प्रयास दिखाई देता है। इसको आरंभ करके उत्कृष्टता प्रदान करने के लिए शीघ्रता से कार्य करना होगा। यह प्रयास राष्ट्रीय शिक्षा नीति को भी बल प्रदान कर सकता है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में स्कूलों में जिस तरह से भारतीय भाषाओं को वरीयता देने की बात की गई है उसको लागू करने में भी डिजीटल लाइब्रेरी सहायक हो सकता है। पिछले बजट में सरकार ने देश में एक डिजीटल विश्वविद्यालय की स्थापना की घोषणा की थी। तब ये कहा गया था कि इस विश्वविद्लाय की स्थापना से छात्रों को लाभ होगा और वो कहीं से बैठकर उत्कृष्ट शिक्षा प्राप्त कर सकेंगे। एक वर्ष बीतने के बाद अभी तक उस विश्वविद्यालय को शुरू नहीं किया जा सका है। कहा जा रहा है कि इस वर्ष जून जुलाई तक ये विश्वविद्लय अस्तित्व में आ जाएगा। इसी तरह से कुछ वर्षों पूर्व इंडियन इंस्टीट्यूट आफ हेरिटेज की स्थापना की बात की गई थी। उसको लेकर कई बैठकें हुईं। समितियां भी बना दी गईं, लेकिन उस घोषणा का क्या हुआ ये अभी तक सार्वजनिक नहीं हो सका है। उस समय दावा किया गया था कि संस्कृति के क्षेत्र में ये आईआईएम और आईआईटी की तरह कार्य करेगा। इसका आरंभ नहीं होना या इसपर धीमी गति के काम होना चिंताजनक है। खैर ये संस्कृति मंत्रालय से जुड़ा मामला है, इसपर फिर कभी विस्तार से चर्चा होगी। 

अभी हम बात कर रहे थे नेशनल डिजीटल लाइब्रेरी की। हमें इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि नेशनल डिजीटल लाइब्रेरी की स्थापना के साथ राज्यों में हर पंचायत और वार्ड में पुस्तकालय की स्थापना की बात भी की गई है। इस समय प्रकाशन जगह की जो स्थिति है उसमें प्रकाशकों से ये अपेक्षा करना व्यर्थ है कि वो पंचायतों तक पुस्तकों को पहुंचाने की कोई योजना बनाकर उसको साकार करें। पुस्तकों की पाठकों तक पहुंच इस वक्त प्रकाशन जगत की सबसे बड़ी समस्या है। प्रकाशकों तक की तरफ से इस समस्या को दूर करने की कोई कार्ययोजना सामने नहीं आई है। ग्राम पंचायत तो बहुत दूर की बात है महानगरों में भी पुस्तकों की दुकानें बहुत कम हैं। पुस्तकों की उपलब्धता भी। ऐसे वातावरण में नेशनल डिजीटल लाइब्रेरी की सहायता से देश के हर पंचायत में बच्चों और किशोरों तक अपने देश का साहित्य और इतिहास पहुंचाया जा सकता है। उनको अपने गौरवशाली अतीत और वर्तमान की उपलब्धियों के बारे में आसानी से बता सकते हैं।  

दूसरा एक और लाभ नेशनल डिजीटल लाइब्रेरी का है जिसको रेखांकित किया जाना बेहद आवश्यक है। बजट घोषणा में ये भी कहा गया है कि इसमें बच्चों औ किशोरों के लिए प्रचुर मात्रा में साहित्य और पठनीय सामग्री उपलब्ध होगी। अगर हम सिर्फ हिंदी की बात करें तो यहां बाल साहित्य बहुत कम मात्रा में उपलब्ध है। बाल साहित्य न तो लेखकों की प्राथमिकता में है और न ही प्रकाशकों की। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि हिंदी में बाल साहित्य लेखन पूरी तरह से उपेक्षित है। बच्चों की जो पत्रिकाए निकला करती थीं वो बंद हो चुकी हैं। एक दो पत्रिकाओं का प्रकाशन हो रहा है लेकिन उनकी पहुंच पाठकों तक नहीं बन पा रही है। हिंदी में बाल साहित्य की कमी को लकर कभी-कभार गोष्ठियों और सेममिनारों में चिंता तो व्यक्त की जाती है लेकिन इस कमी को दूर करने का कोई गंभीर प्रयास नहीं दिखाई देता है। हिंदी के लेखक एक विशेष विचारधारा के वशीभूत होकर खास प्रकार का साहित्य लिखते रह गए। उनका अधिक ध्यान समाज में फैले कथित असामनता, गरीबी और मजदूरों की समस्या पर रहा और वो इन्हीं विषयों को केंद्र में रखकर लिखते रह गए। अब अगर नेशनल डिजीटल लाइब्रेरी को समृद्ध करने के लिए राष्ट्रीय पुस्तक न्यास और चिल्ड्रन बुक ट्रस्ट की ओर से पहल की जाती है तो हिंदी की इस कमी को पूरा करने की दिशा में प्रयास आरंभ हो सकता है। राष्ट्रीय पुस्तक न्यास बच्चों को ध्यान में रखकर पुस्तकें लिखवा सकता है।        

ज्ञान के साथ साथ संस्कृति के विकास और उसको मजबूत करने में भी डिजीटल लाइब्रेरी उपयोगी हो सकती है। संस्कृति को मजबूत करने के लिए यह आवश्यक है कि नई पीढ़ी के लोग अपनी विरासत के बारे नें विस्तार से जानें। नेशनल डिजीटल लाइब्रेरी भारत की सांस्कृतिक विरासत को हर ग्राम पंचायत तक पहुंचाने का एक उपक्रम भी बन सकता है। रही बात प्रकाशकों को इस पहल से चुनौती की तो तकनीक कभी भी किसी व्यवस्या के लिए चुनौती बनकर नहीं आती है बल्कि वो उस व्यवसाय के लिए संभावनाओं के नए द्वार खोलती है। जब देश में कंप्यूटर आया था तो कई दलों के लोगों ने इसका ये कहते हुए विरोध किया था कि इससे बेरोजगारी बढ़ेगी लेकिन कालांतर में कंप्यूटर की उपयोगिता हर क्षेत्र में बढ़ी और इसने रोजगार की असमीति संभावनाओ को जन्म दिया। प्रकाशकों के सामने भी अब इस डिजीटल लाइब्रेरी के लिए बच्चों और किशोरों के लिए पुस्तकें उपलब्ध करवाने की चुनौती होगी। ऐसा नहीं है कि छपी हुई पुस्तकों की महत्ता खत्म हो जाएगी लेकिन इसका डिजीटल स्वरूप आने और उसकी लाइब्रेरी बनने से उसकी व्याप्ति बढ़ेगी। अगर पुस्तकों की व्याप्ति बढ़ती है तो प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से प्रकाशकों को ही लाभ होगा। जरूरत इस बात की है कि प्रकाशक तकनीक को अपने व्यावसायिक हितों के लिए उपयोग करें। 


Saturday, April 24, 2021

उपेक्षा के भंवर में फंसी धरोहर


कोरोना की दूसरी लहर का असर कला और कलाकारों पर फिर से पड़ने लगा है। पिछले सालभर से कोरोना संक्रमण के बढ़ने की वजह से सार्वजनिक कार्यक्रमों के रद्द होने से कलाकारों के सामने जीविका का संकट उत्पन्न हो गया था। मंच पर परफॉर्म करने वाले घर बैठे थे। बड़े कलाकारों के साथ तबले और हारमोनियम आदि पर संगत करनेवालों के लिए संकट अधिक गहरा था। इस वर्ष के आरंभ से कोरोना संक्रमण के संकट के कम होने से एक उम्मीद जगी थी, लेकिन अब संक्रमण की दूसरी लहर ने उसपर पानी फेर दिया। हाल ही में साहित्य और संस्कृति के लिए काम करनेवाली कोलकाता की संस्था प्रभा खेतान फाउंडेशन ने वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के साथ एक बातचीत का आयोजन किया था। विषय था ‘इकोनॉमी इन कल्चर’। इस बातचीत में वित्त मंत्री ने भी कलाकारों की स्थिति पर चिंता प्रकट की। उन्होंने माना कि परफॉर्मिंग आर्ट के कलाकारों के सामने चुनौती बड़ी है । उन्होंने कलाकारों से ये अपेक्षा की कि वो सरकार को बताएं कि इस क्षेत्र की चुनौतियों से कैसे निबटा जाए ताकि इस क्षेत्र की समस्याओं का निदान हो सके। इस बातचीत में आगे निर्मला सीतारमण ने माना कि संस्कृति के क्षेत्र में कई संस्थाएं सांस्थानिक उपेक्षा का शिकार हो रही हैं। वित्त मंत्री ने सांस्कृतिक संस्थाओं की बेहतरी के संदर्भ में पूछे गए प्रश्न के उत्तर में कहा कि धन के साथ-साथ इनको बेहतर करने के लिए ‘सही व्यक्तियों’ की भी जरूरत होती है। 

जब मैं ये कार्यक्रम सुन रहा था तो अचानक त्रिपुरा के उनकोटि की छवियां दिमाग में कौंधी। इस वर्ष जब कोरोना संक्रमण थोड़ा कम हुआ था तो मार्च के अंतिम सप्ताह में त्रिपुरा जाने का अवसर मिला था। उनकोटि में पत्थरों पर तराशी गई मूर्तियों की कलात्मकता की प्रशंसा सुनी थी। शिव को मानने वालों के लिए ये आस्था का बड़ा केंद्र भी है। उनकोटि का अर्थ होता है एक करोड़ से एक कम। इसके नाम के साथ भी एक बेहद दिलचस्प कहानी जुड़ी हुई है। मान्यता ये है कि भगवान शिव एक करोड़ देवी देवताओं के साथ काशी जा रहे थे। जब त्रिपुरा के इस स्थान पर पहुंचे तो रात हो गई। शिवजी ने सबके साथ वहीं रात बिताने का निर्णय लिया और सभी देवी-देवताओं को कहा कि रात्रि विश्राम के पश्चात सूर्योदय के पहले सबको काशी के लिए प्रस्थान करना है। अगले दिन पौ फटने के पहले भगवान शंकर जब उठे तो उन्होंने देखा कि सभी देवी देवताएं सो रहे हैं और कोई भी काशी जाने के लिए समय से तैयार नहीं हो पाए हैं। शिव अकेले ही वहां से नियत समय पर चल दिए लेकिन अपने साथ के सभी देवी देवताओं को श्राप दिया कि वो पत्थर के हो जाएं। मान्यता है कि इसी वजह से इस स्थान का नाम ‘उनकोटि’ पड़ा और वहां एक करोड़ से एक कम पत्थर की मूर्तियां या पत्थर पर उकेरे चित्र बने हैं। 

अगरतला से करीब पौने दो सौ किलोमीटर की दूरी तय करके जब उनकोटि पहुंचा तो वहां की सुंदरता और पत्थर के मूर्तियों की भव्यता और कलाकारी देखकर आह्लादित हो गया। इस परिसर में नीचे उतरते ही सबसे पहले करीब तीस फीट के ‘उनकोटेश्वर कालभैरव’ की पत्थर की मूर्ति मिलती है। इस मूर्ति का मुकुट ही करीब दस फीट के पत्थर पर बना है जिसपर अद्भुत कलाकारी है। उनके आसपास दो देवियों के चित्र पत्थर पर उकेरे हुए हैं और इसी के पास नंदी की पत्थर की दो मूर्ति भी मिलती है। काफी सीढ़ियां चढ़कर आपको अन्य मूर्तियों को देखने जाना पड़ता है। पत्थर की कई मूर्तियों को उसी परिसर में बने कमरे में बंद करके रखा गया है। काल भैरव की मूर्ति की दूसरी तरफ एक विशाल पत्थर पर गणेश जी की मूर्ति बनी हुई है जिसके दोनों तरफ पत्थर पर हाथी की मुखाकृति वाले चित्र उकेरे हुए हैं। इस परिसर के बारे में संक्षेप में बताने की जरूरत इसलिए है ताकि इसकी भव्यता और कलात्मकता का अंदाज हो सके। ये पूरा परिसर संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत आनेवाली संस्था भारतीय पुरातत्तव सर्वेक्षण की देखरेख में है। वित्त मंत्री ने सही कहा था कि संस्कृति से जुड़ी जगहों को सहेजने के लिए धन से ज्यादा सुरुचि संपन्न मानव संसाधन की आवश्यकता है। भले ही उन्होंने ये बातें कोलकाता की सांस्कृतिक संस्थाओं के बारे में कही हो, लेकिन ये उनकोटि पर भी लागू होता है। इतने बड़े और भव्य परिसर में नागरिक सुविधाओं के नाम पर शौचालय तो बना है लेकिन ऐसा लगा कि उसमें वर्षों से पानी नहीं आया था। बुजुर्गों और दिव्यांगों के लिए भी किसी तरह की सुविधा मुझे नहीं दिखी। इनको अगर थोड़ी देर के लिए छोड़ भी दिया जाए तो जो पत्थर पर बनी मूर्तियां हैं या कला कृतियां हैं वो भी देखरेख के आभाव में जगह जगह से खराब हो रही हैं। कालभैरव की प्रतिमा के नीचे कुछ लोग कपड़े धो रहे थे। उपर के हिस्से में जाने के लिए बनी सीढ़ियां बुरी हालत में हैं। उस परिसर में उगनेवाले जंगली घास भी लंबे समय से काटे नहीं जा सके थे। ऐसा प्रतीत होता है कि भारतीय पुरातत्तव सर्वेक्षण बस परिसर के गेट पर बोर्ड लगाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री माने बैठा है। 

यह स्थिति तब है जबकि इस वर्ष के बजट में भारतीय पुरातत्तव सर्वेक्षण के हिस्से में संस्कृति मंत्रालय के बजट से हजार करोड़ रुपए से अधिक का आवंटन है। इसके अलावा संस्कृति मंत्रालय की अन्य योजनाओं के अंतर्गत पूर्वोत्तर के लिए एक सौ दो करोड़ की राशि भी आवंटित की गई है। संस्कृति के साथ-साथ पर्यटन मंत्रालय के बजट का कुछ हिस्सा भी जोड़ दें तो एक अलग ही तस्वीर बनती है। ‘देखो अपना देश’ (डीएडी) योजना के तहत ही उनकोटि जैसे स्थानों के बारे में लोगों को बताया जाए और जब इन स्थानों के बारे में बताया जाए तब वहां उपलब्ध सुविधाओं के बारे में भी जानकारी दी जा सकती है। उनकोटि को तो दो तरह से विकसित किया जा सकता है। एक तो इसको धार्मिक पर्यटन के तौर पर प्रचारित किया जा सकता है। एक ही स्थान पर एक करोड़ से बस एक कम देवताओं का दर्शन लाभ लिया जा सकता है। दूसरे इसको भारतीय मूर्तिकला के अप्रतिम उदाहरण के तौर पर पूरी दुनिया में पेश किया जा सकता है। पूर्वोत्तर भारत में इतनी तरह की कलाओं के उदाहरण मिलते हैं जिनसे न केवल भारतीय कला की समृद्ध परंपरा सामने आती है बल्कि हमारे इतिहास का वो पन्ना भी दुनिया के सामने आ सकता है जो कि हमारी प्राचीन सभ्यता की सुरुचि संपन्नता  को भी सामने ला सकती है।   

दरअसल हम अपनी विरासत को लेकर उत्साहित ही नहीं होते हैं। उनको सहेजने और उसको पूरी दुनिया के सामने लाने के उपक्रम में भी पिछड़ जाते हैं। उनकोटि जैसी विरासत या कला का नायाब नमूना अगर पश्चिम के किसी देश के पास होता तो वो इसकी इतनी मार्केटिंग करता कि पूरी दुनिया उस स्थान की दीवानी हो जाती। प्रश्न सिर्फ मार्केंटिंग का नहीं है, सवाल तो ये भी कि हम अपने इतिहास को भी इन कलाओं के माध्यम से और इनसे जुड़ी कहानियों से जान सकते हैं। अगर पूरे देश में फैले विरासत के इन अनमोल हीरों को एक माला में पिरो सकें तो यह एक बड़ा काम होगा। इन हीरों को एक माला में पिरोने के लिए एक देश को एक संस्कृति नीति की आवश्यकता है। जितनी जल्दी संस्कृति नीति बनेगी उतनी जल्दी हम ने केवल अपनी गौरवशाली विरासत को सहेज पाएंगे बल्कि नई पीढ़ी के अंदर भी आत्मगौरव का संचार कर पाएंगे। 

Saturday, November 21, 2020

ज्ञान से लव जिहाद का प्रतिकार संभव


वर्तमान में एक बार फिर से लव जेहाद को लेकर बहस छिड़ी हुई है। उत्तर प्रदेश के कानपुर और अन्य इलाकों में लव जिहाद की कई घटनाओं ने लोगों का इस ओर ध्यान खींचा। इन घटनाओं के बाद उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश समेत कुछ अन्य राज्य लव जिहाद के खिलाफ कानून बनाने की तैयारी में हैं। इस बीच राजस्थान के मुख्यमंत्री ने इसके खिलाफ अपनी राय सामने रख दी। लव जिहाद पर जारी इस बहस के बीच खुद के प्रगतिशील होने का दावा करनेवाले विश्लेषकों ने भारतीय जनता पार्टी के नेता शाहनवाज हुसैन और मुख्तार अब्बास नकवी की शादी को लेकर भी लव जिहाद के खिलाफ कानून की बात करनेवालों का उपहास करना शुरू कर दिया। यहां वो ये भूल गए कि जिस लव जिहाद के खिलाफ कानून की बात हो रही है उसके मूल में धोखा देकर या नाम बदलकर विवाद करने का मामला है। न तो नकवी ने नाम बदलकर प्रेम किया और न ही शाहनवाज ने नाम बदलकर शादी की। ये अवांतर प्रसंग है लेकिन यहां ये उल्लेख करना आवश्यक है कि प्रगतिशीलता और निष्पक्षता का बाना धारण करनेवाले तथाकथित बुद्धिजीवी हर मसले में घालमेल करने में सिद्धहस्त हैं।लव जिहाद पर बनने वाले कानून को अगर वो प्रेम और प्यार की राह में बाधा से जोड़ दें तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। खैर..इस पर चर्चा फिर कभी। फिलहाल बात लव जिहाद पर ।

इन दिनों लव जिहाद एक बेहद गंभीर सामाजिक समस्या के तौर पर उपस्थित हुआ है जिसका फायदा आपराधिक मनोवृत्ति के लोग उठा रहे हैं। धोखा देकर लड़कियों को अपने प्रेम के जाल में फंसाना और फिर शादी कर लड़की का धर्मांतरण करवाना आ उसके लिए दबाव बनाना ही लव जिहाद के मूल में है। कहीं पढ़ा था कि किसी भी सामाजिक परिवर्तन की रफ्तार अगर धीमी रहती है तो उसको सुधार कहकर परिभाषित किया जाता है और अगर वो सामाजिक परिवर्तन काफी तेजी से होता है तो उसको क्रांति कहा जाता है। इसी तरह से अगर कोई सामाजिक बुराई धीमी गति से फैलती है तो उसपर अंकुश लगाने के लिए दीर्घकालिक योजना की जरूरत होती है लेकिन अगर सामाजिक बुराई तीव्र गति से फैलने लगती है तो उसको कानून के डंडे और सामाजिक जागृति से काबू में लाया जाता है।

पिछले दिनों जिस तरह से लव जिहाद के मामले बढ़े हैं उसको रोकने के लिए कानून बनाने की सोच उचित प्रतीत होती है। लव जिहाद जैसी सामाजिक बुराई को सिर्फ कानून बनाकर दूर नहीं किया जा सकता है। इसके लिए संस्कृति और शिक्षा के क्षेत्र में भी काम करना आवश्यक होगा। दरअसल हमारे देश में गंगा-जमुनी तहजीब का जो सिद्धांत प्रतिपादित किया गया उसका निषेध करना होगा। ऐसी कोई संस्कृति हमारे देश में नहीं है। गंगा जमुनी तहजीब के साथ साथ इस अवधारणा को भी दूर करने का उपक्रम करना होगा कि भारत विविध संस्कृतियों का देश है। हमारे देश की संस्कृति एक ही है, एक ऐसी संस्कृति जहां हम तमाम तरह की विविधताओं का उत्सव मनाते हैं। भारतीय संस्कृति की यही विशेषता रही है कि वो सबको अपने अंदर समाहित करता चलता है। भारतीय संस्कृति के सामाजिक रूप पर अगर विचार करें तो यह पाते हैं कि आर्यों और आर्येतर जातियों ने साथ मिलकर एक संस्कृति को मजबूत किया जिसे हिंदी संस्कृति के तौर पर जाना गया। मुसलमानों के भारत में आगमन के पहले जब तुर्क और मंगोल आदि भारत आए तो उन्होंने यहां की संस्कृति को अपनाया। नतीजा यह हुआ कि विविधता और बढ़ गई। इस अवधारणा को पुष्ट करने के लिए विद्यालय स्तर पर काम करने की जरूरत है। अभी हाल ही में पेश की गई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में इस बात के संकेत तो हैं लेकिन बहुत स्पष्ट रूप से इसको सामने रखने की जरूरत है। स्पष्टता के साथ नीति सामने आएगी तो फिर उसके क्रियान्वयन के लिए प्रयास करना होगा। 

नैतिक शिक्षा की बात बार-बार की जाती है और तथाकथित प्रगतिशील तबका उसका उपहास करती रही है, लेकिन आज की सामाजिक समस्या को ध्यान में रखते हुए नैतिक शिक्षा की आवश्कता एक बार फिर से महसूस होने लगी है। सामाजिक और पारिवारिक संस्कार शिक्षा के मूलाधारों में से एक होना चाहिए। कथित प्रगतिशील तबका भारतीय संस्कृति या यों कहें कि हिंदू संस्कृति का ये कहकर मजाक उड़ाती रही है कि यहां लोक से अधिक परलोक को प्रधानता दी गई है। ऐसा कहने के पीछे उनका उद्देश्य यह होता है कि वो ये साबित करें कि हिंदू संस्कृति जिंदगी को जीने या संघर्ष करने की प्रेरणा नहीं देता है बल्कि पलायन की राह दिखाता है। ऐसे कथित प्रगतिशील विद्वानों को ये नहीं पता कि उनके इन तर्कों का आधार उनका अज्ञान है। हम वैदिक धर्म का सूक्षमता से अध्ययन करें तो पाते हैं कि वहां संन्यास की नहीं बल्कि गृहस्थधर्म की प्रधानता है। ऋगवेद में तो इस बात का उल्लेख मिलता है कि ऋषि वैराग्य की कामना वहीं करते बल्कि वो इंद्र से ये कहते हैं कि ‘हमारे घोड़ों को पुष्ट करो, हमारी संततियों को बलवान बनाओ, हमारे शत्रुओं को कमजोर करो आदि आदि।‘ ऋगवेद में समाज और संस्कृति की जो रेखा दिखाई देती है उसका ही विस्तार रामायण और महाभारत में भी दिखता है। गीता में भी कर्मयोग पर जोर दिया गया है। ये सारी बातें विस्तार से नई पीढ़ी को बतानी होगी। उनको पौराणिक ग्रंथों में वर्णित ज्ञान से संस्कारित करना होगा। इसके लिए जरूरी है कि शिक्षा और संस्कृति मंत्रालय मिलकर एक समेकित योजना पर काम करें। इसके लिए किसी नए संस्थान बनाने की जरूरत भी नहीं बल्कि जो संस्थाएं पहले से काम कर रही हैं उनकी कार्यप्रणाली को ठीक करके उनसे ये काम करवाया जा सकता है। बस संस्कृति और उसको मजबूत करने में रुचि की होनी चाहिए।

शिक्षा और संस्कृति को मजबूत करके हम समाज में अपने युवाओं को इस तरह से संस्कारित कर सकते हैं जिससे वो सभ्यता के दुर्गुणों के पीछे नहीं भागें। दिनकर ने सभ्यता और संस्कृति को बहुत कायदे से परिभाषित किया है। उनके अनुसार ‘सभ्यता वह वस्तु है जो हमारे पास है, संस्कृति वह है जो हम स्वयं हैं। प्रत्येक सुसभ्य व्यक्ति सुसंस्कृत नहीं होता क्योंकि संस्कृति का निवास मोटर, महल और पोशाक में नहीं, मनुष्य के ह्रदय में होता है।‘ नई शिक्षा नीति में संस्कृति को लेकर जो चीजें छूट गई हैं उसको राष्ट्रीय संस्कृति नीति बनाकर शामिल किया जा सकता है। आजाद भारत के इतिहास में अबतक हमारे देश की कोई संस्कृति नीति नहीं बनी। संस्कृति के क्षेत्र में जो लोग सक्रिय रहे उनकी सोच के हिसाब से काम होता रहा। पहले पुपुल जयकर और बाद के दिनों में कपिला वात्स्यायन की सोच सरकारी की संस्कृति को लेकर बनने वाली नीतियों को प्रभावित करती रही। इमरजेंसी के बाद के दौर में वामपंथियों की सोच ने भी भारत सरकार की नीतियों को प्रभावित किया। विदेश से आयातित विचारों के आधार पर भारतीय संस्कृति को सिर्फ व्याख्यायित ही नहीं किया गया बल्कि उसको प्रभानित करने की नापाक कोशिश भी हुई।समग्रता में संस्कृति नीति के बारे में कभी सोचा गया हो ऐसा ज्ञात वहीं है। अब जब सरकार ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति को लागू करने की दिशा में ठोस कदम उठाया है तब देश के लिए एक समग्र सांस्कृतिक नीति को लेकर भी विचार करना चाहिए। अगर मौजूदा सरकार इस देश में राष्ट्रीय शिक्षा नीति के साथ साथ एक समग्र संस्कृति नीति बनाने और उसको लागू करने पर विचार करती है तो लव जिहाद जैसी सामाजिक समस्याएं न्यून हो सकती हैं।

Saturday, June 2, 2018

संस्कृति को लेकर उदासीन सरकार


देश में जब जब भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में केंद्र में सरकार बनी है तब-तब उसपर शिक्षा और संस्कृति के भगवाकरण के आरोप लगाए जाते रहे हैं। आरोप के साथ ये जरूर जोड़ा जाता है कि ये भगवाकरण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कहने पर होता है। पाठ्यक्रम और स्कूली शिक्षा में बदलाव के आरोप भी आम रहे हैं। जब 2014 में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार बनी तो इन आरोपों की फेहरिश्त में एक इल्जाम और जुड़ गया। वो आरोप था शैक्षणिक और सांस्कृतिक संस्थाओं में दक्षिणपंथी विचारधारा के लोगों को बिठाने का यानि संस्थाओं को संघ से डुड़े लोगों के हवाले करने का। 2014 में जब स्मृति ईरानी को मानव संसाधन विकास मंत्री बनाया गया था तो उनपर भी इस तरह के आरोप लगे थे। अपने उपर लगे आरोपों पर स्मृति ईरानी ने संसद में उदाहरण समेत जोरदार तरीके से खंडन किया था और देश के सामने तथ्यों को सामने रख दिया था। दरअसल शिक्षा और संस्कृति को लेकर किसी भी तरह के सकारात्मक बदलाव को भी आरएसएस की चाल तक करार दिया जाता रहा है। मोदी सरकार के दौरान जब शैक्षणिक और सांस्कृति संस्थानों पर नियुक्तियां शुरू हुईं तो वामपंथी विचारधारा के लोगों को लगा कि इस क्षेत्र में उनका एकाधिकार खत्म होने लगा है तो वो और ज्यादा हमलावर होते चले गए। इमरजेंसी के समर्थन के एवज में इंदिरा गांधी ने शैक्षणिक और सांस्कृतिक संस्थाओं को वामपंथी विचारधारा के लेखकों और कार्यकर्ताओं को अनौपचारिक रूप से सौंप दिया था। शिक्षा और संस्कृति को वामपंथियों को सौंपने का नतीजा यह रहा कि आज भारत में चिंतन परंपरा लगभग खत्म हो गई। इतिहासकारों ने नेहरू का महिमामंडन शुरू किया और उसके एवज में भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद ने अपने अनुवाद परियोजना में सीपीएण के महासचिव नम्बूदरीपाद की कृतियों का अनुवाद प्रकाशित किया। इसपर कभी हो हल्ला मचा हो, या पार्टी की विचारधारा को बढ़ाने के आरोप लगे हों, याद नहीं आता। इतने लंबे समय से जारी इस एकाधिकार को 2014 में जब चुनौती मिलने लगी तो विरोध स्वाभाविक था।
अगर हम वस्तुनिष्ठ होकर विचार करें तो 2014 के बाद मोदी सरकार ने इन संस्थाओं में जिन लोगों की नियुक्ति की उनकी मेधा और प्रतिभा पर किसी तरह का प्रश्नचिन्ह नहीं लगाया जा सकता है, चाहे वो भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद में बी बी कुमार जी की नियुक्ति हो या इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में राम बहादुर राय और डॉ सच्चिदानंद जोशी की नियुक्ति हो, संगीत नाटक अकादमी में बेहतरीन कलाकार शेखर सेन को जिम्मेदारी दी गई हो या राष्ट्रीय पुस्तक न्यास के चेयरमैन के तौर पर बल्देव भाई शर्मा की नियुक्ति। इन सब लोंगों ने अपने अपने क्षेत्र में लंबी लकीर खींची। राष्ट्रीय पुस्तक न्यास में तो बल्देव भाई की अगुवाई में पूरे देश में पुस्तक संस्कृति के प्रोन्नयन के लिए इतना काम हुआ जो पहले शायद ही हुआ हो। गांवों तक पुस्तक मेले का आयोजन से लेकर संस्कृत के पुस्तकों का प्रकाशन तक हुआ। जहां इतनी सारी नियुक्तियां होती हैं वहां एकाध अपवाद भी होते हैं। यहां भी हुए।
यह आरोप भी पूरी तरह से गलत है कि आंख मूंदकूर सिर्फ उनकी ही नियुक्तियां की गईं जो भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा के लोग थे। कई नियुक्तियां तो ऐसे विद्वानों की भी हुईं जो पूर्व में संघ और भारतीय जनता पार्टी के आलोचक रहे हैं। सरकार पर जिस तरह के हमले विरोधी विचारधारा के लोगों ने किए उसका एक नुकसान यह हुआ कि नियुक्तियों में सरकार धीमे चलने की नीति पर चलने लगी। अगर हम एक नजर डालें तो देख सकते हैं कि संस्कृति मंत्रालय के अधीन कई ऐसी स्वायत्त संस्थाएं हैं जिनमें काफी समय बीत जाने के बाद भी उनके प्रमुखों की और प्रशासकों की नियुक्ति नहीं हुई। ललित कला अकादमी इसका उदाहरण है जहां लंबे समय तक प्रशासक से काम चलाया गया। मंत्रालय के संयुक्त सचिव इसके कर्ताधर्ता रहे। इसकी गवर्निंग बॉडी को भारत सरकार ने भंग कर दिया और इस संस्था की बेवसाइट के मुताबिक अब तक इसका गठन नहीं हो सका है। अभी हाल में वरिष्ठ कलाकार उत्तम पचारने को इसका चेयरमैन नियुक्त किया गया है लेकिन अभी भी यहां स्थायी सचिव की नियुक्ति नहीं की जा सकी है। इसी तरह से अगर हम देखें तो सांस्कृतिक स्त्रोत और प्रशिक्षण केंद्र, जिसे सीसीआरटी के नाम से जाना जाता है, में चेयरमैन की नियुक्ति नहीं की जा सकी है। सीसीआरटी का काम शिक्षा को संस्कृति से जोड़ने का है। यह संस्कृति मंत्रालय संबद्ध एक स्वायत्त संस्था है। इस संस्था के बारे में उपलब्ध जानकारी है कि ‘केन्द्र का मुख्य सैद्धांतिक उद्देश्य बच्चों को सात्विक शिक्षा प्रदान कर उनका भावात्मक व आध्यात्मिक विकास करना है। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए सीसीआरटी संस्कृति पर आधारित शैक्षिक कार्यक्रमों का आयोजन करता है और उनमें विचारों की स्पष्टता, स्वतन्त्रता, सहिष्णुता तथा संवेदनाओं का समावेश किया जाता है।‘ यह उद्देश्य तो संघ को अच्छा लग सकता है लेकिन एक वर्ष से ज्यादा समय से यहां कोई अध्यक्ष नहीं हैं। इतने महत्वपूर्ण संस्था का अध्यक्ष ना होना संस्कृति मंत्रालय के काम करने के तरीके पर प्रश्न खड़ा करता है और इस बात के संकेत भी देता है कि संघ इन नियुक्तियों में दखल नहीं देता है। इसी तरह से संस्कृति मंत्रालय से संबद्ध एक और संस्था है राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, इसके चेयरमैन रतन थियम का कार्यकाल 2017 में खत्म हो गया लेकिन अबतक किसी की नियुक्ति नहीं हुई और संस्था बगैर अध्यक्ष के चल रही है। इस सूची में कई अन्य नाम और भी हैं। देश में पुस्तकों और पुस्तक संस्कृति के उन्नयन के लिए बनाई गई संस्था राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन के अध्यक्ष ब्रज किशोर शर्मा का कार्यकाल भी समाप्त हो चुका है लेकिन उनकी जगह भी संस्कृति मंत्रालय ने किसी की नियुक्ति नहीं की है। नतीजा यह हो रहा है कि वहां लगभग अराजकता है। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के दो ट्रस्टी फिल्मकार चंद्रप्रकाश द्विवेदी और पूर्व आईपीएस के अरविंद राव ने महीनों पहले इस्तीफा दे दिया लेकिन उनकी जगह संस्कृति मंत्रालय ने किसी को नियुक्त नहीं किया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जब पद संभाला था तो उन्होंने यह कहा था कि यथास्थितिवाद उनको किसी भी कीमत पर मंजूर नहीं है लेकिन कई मंत्रालयों को देखकर लगता है कि प्रधानमंत्री ने स्वयं वहां यथास्थितिवाद के देवताओं को स्थापित कर रखा है।
अब अगर एक नजर भाषा के विकास के लिए बनाई गई संस्थाओं पर डालते हैं तो वहां भी कई ऐसे संस्थान हैं जो बगैर अध्यक्ष या निदेशक के चल रहे हैं। हिंदी को लेकर ये सरकार बहुत संवेदनशील रही है। इसको संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा बनाने को लेकर भी सरकार ने इच्छाशक्ति दिखाई थी लेकिन केंद्रीय हिंदी निदेशालय में सालों से नियमित निदेशक नहीं हैं। पहले राष्ट्रीय सिंधी भाषा संवर्धन परिषद के निदेशक डॉ रवि टेकचंदानी इसका अतिरिक्त प्रभार संभाल रहे थे और अब वैज्ञानिक और तकनीकी शब्दावली आयोग के चेयरमैन अवनीश कुमार इसको संभाल रहे हैं। इसमें एक और दिलचस्प तथ्य है कि वो गणितज्ञ हैं लेकिन सरकार ने उनको वैज्ञानिक और तकनीकी शब्दावली के अलावा हिंदी का जिम्मा भी सौंप रखा है। केंद्रीय हिंदी निदेशालय में स्थायी निदेशक की नियुक्ति नहीं होने से कई नुकसान हैं क्योंकि इस संस्था का उद्देश्य हिंदी को अखिल भारतीय स्वरूप प्रदान करना, हिंदी भाषा के माध्यम से जन-जन को जोड़ना और हिंदी को वैश्विक धरातल पर प्रतिष्ठित करना है। इसमें कई सालों से निदेशक का नहीं होना सरकार की हिंदी को लेकर उदासीनता को दर्शाता है। इसी तरह से मानव संसाधन विकास मंत्रालय की एक और स्वायत्त संस्था है राष्ट्रीय सिंधी भाषा संवर्धन परिषद, उनके निदेशक का कार्यकाल भी खत्म हो गया है और उनको तीन महीने का विस्तार दिया गया है। यह कुछ ऐसे उदाहरण हैं जो इंगित करते हैं कि सरकार भाषा और संस्कृति को लेकर कितनी गंभीर है। इसी वर्ष मार्च में राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक से में भाषा को लेकर महत्वपूर्ण प्रस्ताव पास किया गया था जिसमें भारतीय भाषाओं के संरक्षण और संवर्धन की आवश्यकता पर जोर दिया गया। भाषा के संरक्षण और संवर्धन के लिए सरकारों, नीति निर्धारकों और स्वयंसेवी संगठनों से प्रयास करने की अपील की गई थी। संघ की अपील के बाद करीब तीन महीने तक ऐसा होना भी ये दर्शाता है कि संघ का सरकार में कितना दखल है। संस्कृति मंत्री और शिक्षा मंत्री को इस दिशा में व्यक्तिगत रुचि लेकर काम करना होगा ताकि इन संस्थाओं को बदहाली से बचाया जा सके। और सबसे महत्वपूर्ण बात ये कि इन मंत्रियों को यथास्थितिवाद के मकड़जाले को भी तोड़ना होगा।



Saturday, May 13, 2017

सांस्कृतिक नीति की आवश्यकता

इन दिनों साहित्य कला जगत में सरकार के एक कदम को लेकर खासी चर्चा है। सरकार ने इन संस्थाओं को कहा है कि वो अपने बजट का तीस फीसदी अपने आंतरिक स्त्रोत से इकट्ठा करें। इस संबंध में साहित्य अकादमी और संस्कृति मंत्रालय के बीच सत्ताइस अप्रैल को एक करार हुआ है। इस करार के मुताबिक साहित्य अकादमी को इस बाबत कोशिश करनी होगी। इसी तरह का करार अन्य सांस्कृतिक संस्थाओं के लिए प्रस्तावित है । माना जा रहा है कि निकट भविष्य में ललित कला अकादमी, संगीत नाटक अकादमी और इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र जैसी संस्थाओं को भी अपनी बजट का तीस फीसदी हिस्सा अपने आंतरिक स्त्रोत से इकट्ठा करना होगा। यह एक ऐसा मुद्दा है जिसपर गहन विचार-विमर्श के बाद फैसला किया जाना चाहिए था। इस फैसले के दो पक्ष हैं और दोनों पर विचार करते हुए अगर किसी नतीजे पर पहुंचते तो बेहतर होता। साहित्य अकादमी, संगीत नाटक अकादमी और ललित कला अकादमी में पूर्व में कई तरह की गड़बड़ियां हुई हैं। कई साल पहले साहित्य अकादमी के और अब ललित कला अकादमी के सचिव को उनके पद से हटाया भी जा चुका है। संसदीय समितियों ने इनके कामकाज में भी कई गड़बड़ियां पाई थीं। उसके बाद बनी हाई पॉवर कमेटी ने भी कई तरह की सिफारिशें की थीं। बावजूद इसके इन संस्थानों के बजट में कटौती और उनको संसाधन जुटाने के लिए कहना उचित नहीं है।साहित्य,कला और संस्कृति हमेशा से राज्याश्रयी रही है। बगैर राज्याश्रय के कला-संगीत कभी फला-फूला नहीं है। साहित्य अकादमी ने जो करार संस्कृति मंत्रालय के साथ किया है वो उनकी बेवसाइट पर मौजूद है। उसको ध्यान से पढ़ने के बाद संस्कृति मंत्रालय के इस प्रस्ताव की विसंगतियां समझ में आती हैं। साहित्य अकादमी को सरकार से अलग अलग मदों के लिए अनुदान मिलता है। जैसे वेतन के लिए अलग, कार्यक्रमों के लिए अलग, लेखकों की यात्रा के लिए अलग और सलाना अकादमी पुरस्कारोंम के लिए अलग । अगर सूक्ष्मता से तीस फीसदी संसाधन जुटाने के प्रस्ताव को देखें तो यह प्रस्ताव हास्यास्पद लगता है। अकादमी अपने कर्मचारियों के वेतन का तीस फीसदी किस तरह से और कहां से जुटाएगी? सवाल उठता है कि करार बनानेवालों ने इस बात पर विचार किया या करार पर दस्तखत करनेवालों ने इस बाबत अपनी आपत्ति दर्ज की।
अकादमी लेखकों को हर साल दिए जानेवाले पुरस्कार की राशि का तीस प्रतिशत कहां से लाएगी इस बारे में सोचा जाना चाहिए था। इसका तो एक ही उपाय सूझता है कि ये अकादमियां अपने पुरस्कारों के लिए स्पांसरशिप ढूंढें। कुछ सालों पहले साहित्य अकादमी के पुरस्कार को एक बहुराष्ट्रीय कंपनी ने स्पांसर करने का प्रस्ताव किया था, लेकिन लेखकों के विरोध आदि को देखते हुए वो जना परवान नहीं चढ़ सकी थी। साहित्य, कला और संस्कृति की इन संस्थाओं को बाजार की बुरी नजर से बचाकर रखने की कोशिश होनी चाहिए। अगर सरकार इन अकादमियों के खर्चे से अपने को अलग करना चाहती है तो उनको सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के कॉरपोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी फंड को इन अकादमियो को दिलवाने के लिए आदेश जारी करना चाहिए। निजी क्षेत्र का पैसा जैसे ही इन अकादमियों में लगेगा तो फिर उन कंपनियों की शर्तें भी लागू करनी पड़ेंगी।
दिल्ली स्थित इंदिरा गांधी कला केंद्र की स्थिति इन अकादमियों से थोड़ी अलग है। दिल्ली के मध्य में इसके पास करीब बीस पचीस एकड़ का परिसर है। इस परिसर का व्यावसिक उपयोग होता रहा है। यहां साहित्यक मेलों से लेकर फूड फेस्टिवल तक आयोजित किए जाते हैं। इन आयोजनों के लिए कला केंद्र अपने लॉन से लेकर हॉल तक किराए पर देती है। उनको इससे आमदनी होती है। बस इस तरह की बुकिंग को बढ़ाना होगा। इसी परिसर में राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन का दफ्तर भी है, जो इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र को हर महीने लाखों रुपए किराया देती है। तो इंदिरा गांधी कला केंद्र के लिए सरकार से मिलनेवाले अनुदान का तीस प्रतिशत अपने स्त्रोतों से जुटाना मुश्किल काम नहीं है। इसके अलावा इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के पास सौ करोड़ की संचित निधि भी है जिसका ब्याज भी सालों से उनको मिलता रहा है, जो सरकार से मिलने वाले अनुदान के अतिरिक्त होता है। लेकिन साहित्य अकादमी, ललित कला अकादमी और संगीत नाटक अकादमी के परिसर ना तो बड़े हैं और ना ही उनको किराए आदि से भारी भरकम रकम मिलती है। कला प्रदर्शनी पर अगर टिकट लगाते हैं तो जो थोड़े दर्शक आते हैं वो भी इनसे मुंह मोड़ लेंगे। इसी तरह से संगीत नाटक अकादमी अगर टिकट लगाना शुरू कर देगी तो वहां भी दर्शकों, श्रोताओं को जमा करना बहुत मुश्किल होगा। साहित्य अकादमी अवश्य किताबों का प्रकाशन करती है, लेकिन वो किताबों का मूल्य बाजार के हिसाब से तय नहीं करती है बल्कि पाठकों की सहूलियत के हिसाब से तय की जाती है । इन अकादमियों का उद्देश्य देश में कला, साहित्य और संस्कृति के माहौल का निर्माण करना है और अगर ये व्यावसायिक गतिविधियों में लगकर धन इकट्ठा करने लगेंगी तो फिर मूल उद्देश्य से भटकने का खतरा उत्पन्न हो जाएगा।
सरकार में बैठे संस्कृति के कर्ताधर्ताओं को इस पहलू पर विचार करना चाहिए। दरअसल होता यह है कि सरकार में बैठे आला अफसर साहित्य कला और संस्कृति को भी अन्य विभागों की तरह चलाना चाहते हैं। गड़बड़ी यहीं से शुरू होती है। नीति बनाते समय इन संस्थाओं के उद्देश्यों को समझते हुए उसके असर का भी आंकलन करना आवश्यक होता है। यह सुनने देखने में बहुत अच्छा लगता है कि स्वायत्तशासी संस्थाओं को वित्तीय रूप से भी स्वायत्त होना चाहिए। जब इस सिद्धांत को साहित्य कला और सांस्कृतिक संगठनों पर लागू करने के बारे में फैसला लेने की घड़ी आती है तो भारत सरकार के लोक-कल्णकारी स्वरूप को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।
अगर हम देश के अन्य राज्यों की अकादमियों पर गौर करें तो राज्य सरकारों ने उनको लगभग पंगु बना दिया है । इन अकादमियों को राज्य सरकारों ने अपना प्रचार विभाग बना दिया है चाहे वो दिल्ली की हिंदी अकादमी हो या बिहार की संगीत नाटक अकादमी। बिहार की इस अकादमी को तो राज्य सरकार ने इवेंट मैनेजमेंट कंपनी बना दिया है। सरकार को जब कोई कार्यक्रम आदि करना होता है तो वो अकादमी को एक निश्चित राशि अनुदान के तौर पर दे ती है। इस अनुदान के साथ यह आदेश भी आता है कि अमुक कार्यक्रम, अमुक संस्था या अमुक व्यक्ति को दिया जाए। उदाहरण के लिए प्रकाश पर्व के वक्त अकादमी को करीब दो करोड़ रुपए का अनुदान मिला था, साथ ही ये आदेश भी आया था कि ये राशि दिल्ली के भाई बलदीप सिंह से जुड़े अनाद फाउंडेशन को दिया जाए जो कि उस दौरान सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन करेगी। । ऐसा ही हुआ भी । इसी तरह से आगामी सितंबर अक्तूबर में बिहार में विश्व कविता सम्मेलन का आयोजन किया जाना है। इस आयोजन का बजट तीन करोड़ का है और इसका आयोजन बहुत संभव है कि बिहार संगीत नाटक अकादमी के माध्यम से हो। इस आयोजन को करने का जिम्मा अशोक वाजपेयी या उनकी संस्था को दिया जाना भी लगभग तय है। ऐसी स्थिति में अकादमी के करने के लिए क्या बचता है। दरअसल बिहार सरकार ने ऐसी व्यवस्था बना दी है कि अगर किसी कार्यक्रम में किसी तरह की गड़बड़ी हो तो उसकी जिम्मेदारी अकादमी पर डाल कर निकल लिया जाए। अब अगर विश्व कविता सम्मेलन सफल होता है तो सेहरा अशोक वाजपेयी और बिहार सरकार के सर बंधेगा और अगर किसी तरह की गड़बड़ी होती है तो अकादमी को जिम्मेदार ठहरा दिया जाएगा।
बिहार में संगीत नाटक अकादमी की दुर्दशा और स्वयत्ता को खत्म करने के खिलाफ किसी भी कोने अंतरे से आवाज नहीं उठती है। कोई जनवादी लेखक संघ, कोई प्रगतिशील लेखक संघ या कोई जन संस्कृति मंच इसके खिलाफ आवाज नहीं उठाता है। इसके राजनीतिक कारण हैं जो बिल्कुल साफ हैं। यहां इनको संस्कृति पर कोई खतरा भी नजर नहीं आता है। बिहार के भी जो क्रांतिकारी लेखक आदि हैं वो भी खामोश हैं।

दरअसल अब वक्त आ गया है कि केंद्र सरकार को एक ठोस सांस्कृतिक नीति बनानी चाहिए । जब इन अकादमियों का गठन हुआ था तब देश की स्थिति अलग थी, अब परिस्थियां काफी बदल गई हैं। बदलते वक्त के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने के लिए यह आवश्यक है कि एक नई सांस्कृतिक नीति बनाई जाए जिसमें इन अकादमियों के काम काज को बारीकी से तय किया जाए, उनके संसाधनों को भी। इस प्रस्तावित नीति पर राष्ट्रव्यापी बहस हो, विचार हो, मंथन हो और फिर किसी नतीजे पर पहुंचा जाए। सांस्कृतिक नीति बनाते वक्त अफसरशाही से ज्यादा इस क्षेत्र में काम कर रहे लोगों की राय को तवज्जो दिया जाना चाहिए ताकि व्यावहारिकता का ध्यान रखा जाना चाहिए।               

Saturday, November 12, 2016

कौशल विकास से जुड़ती विधा

भारत संभवत: विश्व का इकलौता देश होगा जहां अपनी कला संस्कृति को बचाने, संजोने और सहेजने को लेकर एक तरह की उपेक्षा का भाव दिखाई देता है । यहां अपनी विरासत को आगे बढ़ाने को, अपनी पारंपरिक भाषा और वेशभूषा में बात करने को पिछड़ेपन की निशानी करार दिया जाता रहा है । हमारे देश की संस्कृति बेहद आधुनिक रही है लेकिन धीरे-धीरे उसको पुरातन करार देकर पश्चिमी संस्कृति को अपनाने की राह बनाई गई और युवाओं को उस राह पर चलने के लिए येन केन प्रकारेण प्रेरित और बहुत हद तक मजबूर किया गया । मजबूर इस वजह से कि भारत की पौराणिक संस्कृति को अपनाने पर दकियानूसी और पिछड़ा कहकर प्रचारित किया जाने लगा । पश्चिमी सभ्यता और संस्कृति को मॉडर्न बताया जाने लगा । यह कहना अनुचित होगा कि पश्चमी संस्कृति में कोई बुराई है लेकिन वो उनकी अपनी संस्कृति है, हमारी अपनी संस्कृति है । आपत्ति तो उनकी संस्कृति में आवाजाही को लेकर भी नहीं होनी चाहिए । आपत्ति तब होती है जब उनकी विदेशों से आई संस्कृति को बेहतर और भारतीय संस्कृति को बदतर कहकर प्रचारित किया जाता है । किसी भी लकीर को बड़ी दिखाने के लिए दूसरी लकीर को छोटी करने के उद्यम से बेहतर होता है अपनी लकीर को बड़ी करना । अफसोस तो तब होता है जब देश में कला और संस्कृति के वाहक भी भारतीय संस्कृति को अपेक्षित महत्व नहीं देते हैं और विदेशी संस्कृति को तरजीह देते हैं।
कमोबेश यही स्थिति साहित्य में भी है । हम अपने साहित्य की समृद्ध विरासत को संजोने में नाकाम रहे और फिर एक लंबे अंतराल के बाद विदेशों से आनेवाले साहित्य को ही सर्वोत्तम मानने लगे जबकि वही काम हमारे देश में वर्षों पूर्व किया जा चुका है चाहे वो व्याकरण का क्षेत्र हो या फिर विज्ञान का । विचार करना होगा कि आज भारत में लोग व्याकरण के लिए पाणिनी को कितना याद करते हैं और रेन और मार्टिन को कितना महत्व देते हैं । आज से करीब पच्चीस सौ साल पहले पाणिनी ने चालीस पन्नों में जो अष्टाध्ययी लिखा वो अप्रतिम है लेकिन उसको लेकर अब हमारे अकादमिक जगत में कोई हलचल होती हो ये ज्ञात नहीं है । पाणिनी ने उस वक्त पवित्र मानी जानेवाली भाषा संस्कृत के स्वर और व्यंजन को एक वैज्ञानिक आधार प्रदान किया । विशेषज्ञों का तो यहां तक मानना है कि इस भाषिक वैज्ञनिकी की वजह से भारत साफ्टवेयर के क्षेत्र में अग्रणी बना हुआ है जबकि चीन अब भी हार्डवेयर में ही फंसा हुआ है । तो अगर हम देखें तो यहां भी साफ नजर आता है कि हम अपनी परंपराओं के प्रचार प्रसार को लेकर कितने उदासीन हैं । संस्कृत को जिस पवित्रता से पाणिनी ने आजाद करवाकर वैज्ञानिकता से जोड़ा था बाद में उसको फिर से पवित्र बनाकर विश्वविद्यालयों के विभागों में कैद कर दिया गया है । ये क्यों और कैसे हुआ इस पर राष्ट्रव्यापी बहस होनी चाहिए ।

इसी तरह से अगर हम देखें तो साहित्य की भी कई विधाओं के साथ यही सलूक हो रहा है । इन विधाओं में नाटक प्रमुख है जिसको लेकर कम से कम हिंदी में तो चंद लोग ही गंभीरता से काम करते नजर आ रहे हैं । साहित्य को अपने कंधे पर उठाकर आधुनिक बनाने का दावा करनेवाली नई पीढ़ी के लेखक नाट्य लेखन की ओर प्रवृत्त नहीं हो रहे हैं । संभव है मेरे इस कथन पर नाटक से जुड़े लोगों को आपत्ति हो लेकिन क्या हम युवा पीढ़ी के लेखकों के लिखे नाटकों के बारे में जानते हैं । अगर लिखे भी जा रहे हों तो जिस तरह से उसको प्रचारित किया जाना चाहिए वो नहीं हो रहा है । यह सही है कि देश के हर शहर में नाटक से जुड़े लोग मिल जाएंगे और उसमें से कई गंभीरता से काम भी कर रहे हैं लेकिन नाटक अब एक खास दायरे में बंधता नजर आ रहा है । नई पीढ़ी में इंदिरा दांगी ने ने नाटक लिखे हैं और उनसे वरिष्ठ पीढ़ी की विभा रानी भी लगातार नाटक के क्षेत्र में सक्रिय हैं और उस क्षेत्र में कुछ नया कर रही हैं । और भी लोग होंगे । परंतु नाटक जैसी असीमित संभावनाओं वाली विधा के लिए इतना प्रयास काफी नहीं है । हाल ही में मुझे दिल्ली विश्वविद्यालय ते आत्माराम सनातन धर्म कॉलेज के ड्रामेटिक सोसाइटी के एक कार्यक्रम में जाने का मौका मिला । छात्रों ने खुद ही कई नाटक लिखे और उनका मंचन भी किया । छोटे नाटक लेकिन बड़ा संदेश । छात्रों के लिखे नाटकों में मोहब्बत की एक अंतर्धारा साफ तौर पर दिखाई दे रही थी । सात नाटकों को देखने के बाद ये लगा कि कोई संस्थान तो ऐसा है जो छात्रों को गंभीरता से इस विधा की ओर प्रवृत्त कर रहा है । कॉलेज के प्रिंसिपल ज्ञानतोष झा तो साफ कहते हैं कि उनका मकसद छात्रों में एक तरह के कौशल का विकास करना है और इस कौशल विकास के लिए रंगमंच भी एक माध्यम हो सकता है । छात्रों को रंगमंच की बुनियादी सुविधाएं तो मिल ही रही हैं वहां लगातार नाटक से जुड़े लोगों से छात्रों का संवाद भी करवाया जाता है । इस कॉलेज के छात्रों को प्रिंसिपल के मार्गदर्शन के अलावा जयदेव तनेजा की कॉलेज शिक्षक के रूप में उपस्थिति ने भी माहौल बनाया । वहां भी छात्रों से बात करने पर ये पता चला कि वो बेहतर नाटकों की तलाश में रहते हैं । बड़े और कठिन नाटकों को करने से पहले वो छोटे-छोटे और आसान नाटक करना चाहते हैं ताकि अपनी कला को मांज सकें । हिंदी में कम नाटक लिखे जाने की वजह से उनको दिक्कतें होती हैं । दरअसल नाट्य लेखन करते वक्त लेखकों को अभिनय, संगीत, नृत्य के अलावा अन्य दृश्यकलाओं के बारे में भी ज्ञान होना आवश्यक है । इस ज्ञान के लिए बेहद श्रम की जरूरत है क्योंकि जिस तरह से हमारे समाज की स्थितियां जटिल से जटिलतर होती जा रही हैं उसको नाटक के रूप में प्रस्तुत कर दर्शकों को अपनी बात संप्रेषित करना एक बड़ी चुनौती है । चुनौती तो नाटकों में संदेश देने से लेकर व्यवस्था को चैलेंज करने कि भी है । बगैर इसके नाटकों में वो दम नहीं आ पाता है जो अंधा युग से लेकर जिन लाहौर नईं बेख्या.. तक में महसूस किया जा सकता है । लेकिन संतोष ये कि इस विधा को लेकर छात्रों को आगे बढ़ाने का काम हो रहा है । 

Sunday, November 15, 2015

संस्कृति पर हो बहस

आज हमारे बौद्धिक जगत में संस्कृति को लेकर काफी बातें हो रही हैं । भारतीय संस्कृति बनाम आयातित संस्कृति को लेकर देश में लंबे समय से बहस चल रही है लेकिन केंद्र में बीजेपी की सरकार आने के बाद और पूरे देश में वामपंथी पार्टियों के लगभग हाशिए पर जाने के बाद यह बहस और तेज हो गई है । वामपंथियों ने हमेशा लोकप्रिय संस्कृति को दूर रखने की कोशिश की । उसका प्रतिबिंब साहित्य में भी देखने को मिला । पॉपुलर कल्चर को इस तरह से पेश और स्थापित किया गया कि वो घटिया ही हो सकते हैं । हमें पॉपुलर शब्द पर विचार करना चाहिए । जब भी संस्कृति के संदर्भ में पॉपुलर का इस्तेमाल होता है तो उसमें नकारात्मकता दिखाई देती है । जैसे जब हम कहते हैं कि ये तो पॉपुलर कल्चर का हिस्सा है या फलां फिल्म तो पॉपुलर सिनेमा है तो यह धव्नित होता है कि वो स्तरहीन है । इसकी वजहों की पड़ताल करनी होनी चाहिए कि किस तरह से शब्दों को नकारात्मकता से जोड़ दिया गया । अब जरा इस शब्द को इस तरह से देखिए । जब पॉपुलर शब्द लीडर के साथ जुड़ता है तो वो अर्थ बदल देता है । यहां उससे हल्कापन या नकारात्मकता का बोध नहीं होता है । अब इसको ही अगर दूसरे तरह से देखें और पॉपुलर के हिंदी अनुवाद को लेकर चलें तो यह बेहतर नजर आता है । हिंदी में लोक संस्कृति, लोक पर्व, लोकगीत आदि को श्रेष्ठ नजर से देखा जाता है । हमारे यहां तो लोक संस्कृति पश्चिम की लोक संस्कृतियों से बिल्कुल ही अलग है । लोक और लोक से जुड़ी हर चीज हमारे यहां समाज में जीवंतता के साथ हर शख्स की जिंदगी में मौजूद हैं । हमारी लोक संस्कृति बहुधा हमारे लोक साहित्य को भी प्रभावित करती है । पियूष दइया की किताब लोक में इस बात का विस्तार से उल्लेख मिलता है । जहां तक मुझे याद आता है कि उक्त किताब के एक लेख में इस बात का विस्तार से वर्णन है कि आंध्र प्रदेश में जो तेलुगू रामायण है उसमें वर्णित लक्ष्मण की पत्नी उर्मिला के चरित्र को लोकगीतों में बहुत प्रतिषठा हासिल हुई । कई बार तो यह माना जाता है कि आंध्र प्रदेश के लोकगीतों में जितना सम्मान उर्मिला को मिला है उतना रामचरित मानस की सीता को हिंदी पट्टी में नहीं मिला ।
अब हम अगर लोक संस्कृति की बात करें तो इसका निर्माण भाषा से भी होता है । अगर आप अवधी या वृजभाषा की लोक संस्कृति को देखें तो यह साफ तौर पर दिखाई देता है । आज असहिष्णुता को लेकर बहुत बातें हो रही हैं लेकिन अगर आप देखें तो हमारी लोक संस्कृतियों में हर समुदाय आपको उदार नजर आएगा । हिंदू और मुसलमानों के बीच का प्रेम और सद्भाव जो लोक संस्कृतियों में नजर आता है वो कालांतर के साहित्य में गायब होता चला गया ।  दरअसल अगर हम गंभीरता से विचार करें तो जब से लोक संस्कृति के ठेकेदार सामने आए हैं तब से हमारी संस्कृति को लेकर कई लकीरें दिखाई देने लगी हैं । लोक संस्कृति का दावेदार कोई पार्टी नहीं हो सकती है और ना ही इसको हिंदू धर्म या इस्लाम से जोड़ा जा सकता है । कई लोगों का तो मानना है कि जबतक भारत के संविधान में धर्मनिरपेक्ष शब्द नहीं था तब तक हमारा समाज ज्यादा धर्मनिरपेक्ष और उदार था । उन्नीस सौ छिहत्तर में जब भारत के संविधान में सॉवरिन डेमोक्रेटिक रिपब्लिक को संशोधित कर सॉवरिन सोशलिस्ट सेक्युलर डेमोक्रेटिक रिपब्लिक किया गया तब से लोक और संस्कृति दोनों पर असर पड़ा । इस बात पर अब भी बहस होनी चाहिए कि क्या संविधान में धर्मनिरपेक्ष लिखकर हमने अपने समाज को धर्मनिरपेक्ष बना दिया ।