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Saturday, August 29, 2026

पुस्तक को चर्चित करने का खेल


कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी की संस्मरणात्मक पुस्तक के भारत में प्रकाशन को लेकर विवाद जैसा हो गया है। बताया जा रहा है कि सोनिया गांधी की पुस्तक बिलांगिंग,ए जर्नी आफ लव के भारत में प्रकाशन पर लेखक और प्रकाशक में मतभेद है। इस पर चर्चा करने के पहले जरा इस पुस्तक की घोषणा की पृष्ठभूमि देखते हैं। पहले इंटरनेट मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्म्स पर इस पुस्तक का कवर आया। लोगों ने पोस्ट करना आरंभ किया, सोनिया जी की पुस्तक आ रही है। उत्सुकता का वातावरण बनाया गया। एक्स और फेसबुक पर कवर के बाद कहा जाने लगा कि सोनिया गांधी ने अपनी पुस्तक में राजीव गांधी से मिलने से लेकर गांधी परिवार की बहू बनने तक की घटनाओं का उल्लेख किया है। जो लोग भी पोस्ट कर रहे थे उनमें से किसी ने पुतक पढ़ी नहीं थी। पुस्तक 10 नवंबर को बाजार में आ रही है। अमेरिका का प्रकाशक इसको प्रकाशित कर रहा है। राजीव और सोनिया ने प्रेम विवाह किया था। किताब के नाम में जर्नी आफ लव को उनकी प्रेमकथा से जोड़कर लोगों ने पोस्ट लिखे। पुस्तक के प्रति उत्सुकता का वातावरण गाढ़ा हुआ। अब चर्चा हो रही है कि प्रकाशक पेंग्विन इंडिया ने भारत में उनकी पुस्तक को छापने से मना कर दिया है। इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म्स पर चर्चा ने जोर पकड़ा। बताया जाने लगा कि प्रकाशक ने लेखिका से कुछ प्रसंगों और अंशों को बदलने का आग्रह किया गया। लेखिका ने प्रकाशक की बात मानने से इंकार कर दिया। इसको विवाद का रूप दिया गया। इस प्रसंग को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जोड़कर देखा जाने लगा। 

प्रकाशक पेंग्विन ने अपनी तरफ से सफाई दी। घोषणा की कि सोनिया गांधी की पुस्तक पेंग्विन से प्रकासित नहीं हो रही है। आगे लिखा कि प्रकाशक होने के नाते उनका विशेषाधिकार और जिम्मेदारी है कि वो किसी भी पुस्तक के किसी भी प्रसंग का फैक्ट चेक करें। लेखक को अपनी राय से अवगत करवाएं, जो कि पुस्तक के हित में हो। ये प्रकाशन जगत की समान्य प्रक्रिया है। पेंग्विन ने आधिकारिक बयान में कहा वो अब भी इस पुस्तक को छापने के इच्छुक हैं। साथ ही बताया कि प्रकाशक और लेखक के बीच जो भी बात हुई है उसकी गोपनीता बरकरार रखना चाहते हैं। पेंग्विन ने सही कहा है। कथेतर पुस्तकों में फैक्ट चेक करने की आवश्यकता होती है। फिक्शन में तो किसी तरह प्रसंग काल्पनिक कहकर चल जाता है। जब आप किसी पुस्तक को संस्मरणात्मक कहते हैं या किसी घटना के आधार पर लिखते हैं तो उसकी प्रामाणिकता तो सिद्ध करनी ही होती है। ये तो प्रकाशन जगत की सामान्य प्रक्रिया है। जो लेखक कथेतर गद्य लिखते हैं उनको ये पता भी है। मैंने ही लोकसभा चुनाव में अमेठी में राहुल गांधी की हार और स्मृति इरानी की जीत को केंद्र में रखकर अमेठी संग्राम नाम की पुस्तक लिखी थी। उस पुस्तक के कई प्रसंगों पर प्रकाशक ने आपत्ति जताई थी। कइयों की उसकी प्रामणिकता के बारे में आशंकित थे। प्रियंका गांधी से संबंधित एक घटना मेरी पुस्तक में उल्लिखित है। प्रियंका पर टिप्पणी सुनने के बाद  स्मृति इरानी ने एक बेहद कठोर निर्णय लिया था। उस निर्णय का उनके चुनाव परिणा पर असर पड़ सकता था। इस प्रेसंग को लेकर प्रकाशक आश्वस्त नहीं थे। उन्होंने प्रामाणिकता सिद्ध करने के लिए बोला। जब उस घटना के साक्षियों के वर्जन आए तब प्रकाशक संतुष्ट हुए। दूसरी पुस्तक मार्क्सवाद का अर्धसत्य को लेकर भी प्रकाशक के कुछ प्रश्न थे। जिनको हमने साथ बैठकर हल किया था। यह तो लेखक और प्रकाशक के बीच चलनेवाली एक रुटीन प्रक्रिया है। लेकिन इन तमाम बातों के बीच सोनिया गांधी की पुस्तक को लेकर उत्सुकता का वातावरण बना हुआ है। 

इंटरनेटट मीडिया पर अब इस तरह की बातें आ रही हैं कि सोनिया जी और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की एक भेंट के प्रसंग को लेकर प्रकाशक ने आपत्ति जताई। चीन-भारत संबंध के अध्याय को लेकर प्रकाशक के कुछ प्रश्न थे। इसी तरह से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संबंधित प्रसंगों की प्रामाणिकता को लेकर प्रकाशक आश्वस्त होना चाहते थे। संस्मरणों में इस तरह की बातें होती हैं जो बहुधा लेखक की धारणा पर आधारित होती है । उससे किसी अन्य की छवि पर असर पड़ सकता है। संभव है कि उक्त प्रसंगों में इस तरह की धारणाएं हों जिसको लेकर प्रकाशक आश्वस्त होना चाहता हो। यही आश्वस्ति तो कांग्रेस के नेता 2010 में चाह रहे थे जब स्पैनिश लेखक जेवियर मोरो की पुस्तक ‘द रेड साड़ी’ भारत में प्रकाशित होनेवाली थी। जेवियर मोरो ने 2008 में स्पैनिश भाषा में सोनिया गांधी की जीवनी लिखी थी। उसका अनुवाद इटैलियन, फ्रेंच और डच भाषा में हुआ था। भारत में जब मोरो की पुस्तक के प्रकाशन की बात आई थी को कांग्रेस के नेताओं ने इसका खूब विरोध किया था। जहां तक मुझे स्मरण है कि जेवियर मोरो को कानूनी नोटिस भी भेजी गई थी। उस पुस्तक के कुछ प्रसंगों को लेकर कांग्रेस के नेताओं को आपत्ति थी। इमरजेंसी में सोनिया गांधी की भूमिका, सोनिया और मेनका गांधी के बीच के संबंध, गांधी परिवार की घटनाओं को लेकर कांग्रेस नेताओं को आपत्ति थी। कांग्रेस नेताओं ने तब जेवियर मोरो की पुस्तक को असत्य, अर्धसत्य और अपमानजनक बताया था। उस समय जेवियर मोरे ने ये दावा किया था कि सोनिया गांधी की जीवनी लिखने के लिए इटली स्थित सोनिया गांधी के पैतृक शहर लुसियाना में काफी समय बिताया था। उसने तो यहां तक दावा किया था कि पुस्तक प्रकाशन के पहले उसकी पांडुलिपि सोनिया जी की बहन नाडिया को दिखाई गई थी। सोनिया जी को भेजने का दावा भी मोरो ने किया था। बाद में जब केंद्र में सरकार बदली तब 2015 में ये पुस्तक भारत में प्रकाशित हो सकी। मोरो ने विवादों के बीच अपनी पुस्तक को फिक्शनलाइज्ड बायोग्राफी कहा था। पुस्तक पर डिस्क्लेमर भी लगाया था कि बातचीत संवाद और स्थितियां लेखक की व्याख्या पर आधारित है। यह आवश्यक नहीं कि वो प्रामाणिक भी हो। 

अब जब सोनिया गांधी की संस्मरणात्मक पुस्तक आ रही है तो वही लोग अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रश्न खड़ा कर रहे हैं जो उस समय जेवियर मोरो की पुस्तक का विरोध कर रहे थे। प्रामाणिकता की मांग करनेवाले वही लोग या तो अब खामोश हैं या प्रकाशक को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं। ना तो यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मसला है और ना ही इसमें किसी प्रकार के दबाव की बात है। यह मामला सीधे तौर पर प्रसंगों की प्रामाणिकता का है। संभव था कि सोनिया जी इसको फिक्शनलाइज्ड संस्मरण कह देती और पेंग्विन आपत्ति नहीं करता। पर ऐसा नहीं होने के संकेत हैं। दुनिया भर में ऐसे अनेक विवाद सामने आते रहे हैं जब प्रकाशक, लेखक की बातों से असहमत होते हैं और पुस्तक छापने से इंकार देते हैं। सोनिया जी की पुस्तक का विवाद को भी इसी आईने में देखे जाने की जरूरत है। हां, इन प्रसंगों से इतना अवश् हुआ कि पुस्तक को लेकर उत्सुकता का वातावरण बना हुआ है। चर्चा होगी तो बिक्री पर असर पड़ना स्वाभाविक है। 


Friday, January 10, 2025

अकबर रोड से कोटला रोड का सफर


जब ये तय हुआ कि सभी राजनीतिक दलों को उनके सांसदों की संख्या के आधार पर दिल्ली में पार्टी के मुख्यालय के लिए जमीन दी जाएगी तो कांग्रेस को पंडित दीनदयाल उपाध्याय मार्ग और कोटला रोड के कोने पर प्लांट संख्या 9 ए आवंटित किया गया। उसी समय कांग्रेस ने तय कर लिया था वो अपने कार्यालय के पते में पंडित दीनदयाल उपाध्याय रोड न लिखकर कोटला रोड लिखेगी। संभव है कि कांग्रेस नेतृत्व ने सोचा होगा कि भारतीय जनता पार्टी की विचारधारा के प्रखर और शीर्ष नेता के नाम पर रखे मार्ग को अपने पते में न लिखा जाए। इस निर्णय के लभग डेढ दशक बाद कांग्रेस के केंद्रीय कार्यालय की इमारत तैयार हो चुकी है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार दिल्ली में पार्टी का मुख्यालय पांचवीं बार स्थानांतरित हो रहा है। स्वाधीनता के बाद से कांग्रेस पार्टी का कार्यालय 7 जंतर मंतर रोड पर चल रहा था। इस इमारत से कांग्रेस पार्टी के नेताओं ने लंबे समय तक काम किया। पंडित जवाहर लाल नेहरू से लेकर उनके बाद के कई कांग्रेस अध्यक्ष वहां बैठा करते थे। 1969 में जब कांग्रेस पार्टी का विभाजन हुआ तो संगठन कांग्रेस ने इस इमारत को छोड़ने से इंकार कर दिया। इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस ने विंडसर प्लेस में अस्थायी कार्यालय बनाया। इंदिरा गांधी को 7 जंतर मंतर मंतर रोड कार्यालय के छूटने का दर्द लंबे समय तक सालता रहा था। 1971 में पार्टी ने अपना स्थायी ठिकाना डा राजेन्द्र प्रसाद रोड पर बनाया। सात वर्षों तक कांग्रेस ने इसी कार्यालय में पार्टी की राजनीतिक गतिविधियां चलती रहीं। 1977 में संगठन कांग्रेस का विलय जनता पार्टी में हो गया। इमरजेंसी के बाद हुए चुनाव के बाद मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने। इस बंगले को सरदार पटेल स्मारक संस्थान को अलाट कर दिया गया। जनता पार्टी का दफ्तर इसी इमारत में था। उस समय बताया गया था कि जनता पार्टी को सरदार पटेल स्मारक ट्रस्ट ने किराए पर जगह दी है। बाद में ये जगह विवादित होती चली गई। आज तो इस इमारत में कौन किराएदार है और कौन मालिक पता करना कठिन है।

जनता पार्टी के शासन काल के दौरान कांग्रेस पार्टी को अकबर रोड पर 24 नंबर की कोठी आवंटित कर दी गई। तब से लेकर अबतक कांग्रेस पार्टी का मुख्यालय वहीं से कार्य कर रहा है। करीब 47 वर्षों के बाद इस महीने मुख्यालय कोटला रोड पर शिफ्ट होने वाला है। अकबर रोड के कार्यालय में कांग्रेस पार्टी ने काफी राजीनीतिक उतार चढ़ाव देखे। इमरजेंसी के बाद इंदिरा गांधी की सत्ता में वापसी, इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी का प्रधान मंत्री बनना, नरसिंहराव का प्रधानमंत्री बनना, सोनिया गांधी का अध्यक्ष पद संभालना, नरसिंहराव के पार्थिव शरीर के लिए कांग्रेस कार्यालय का नहीं खुलना, सोनिया की जगह मनमोहन सिंह को देश का प्रधानमंत्री बनना, राहुल गांधी का पार्टी की कमान संभलना, लंबे समय बाद किसी गैर गांधी के रूप में मल्लिकार्जुन खरगे का अध्यक्ष बनना जैसी महत्वपूर्ण राजनीतिक गठनाओं का गवाह अकबर रोड का बंगला बना। 

1978 में जब कांग्रेस पार्टी को केंद्रीय कार्यालय के लिए 24 अकबर रोड का बंगला अलाट हुआ था तब उसमें आठ कमरे थे। समय के साथ इसके परिसर में वैध-अवैध निर्माण होता रहा। इस समय तो जाने कितने स्थायी- अस्थायी कमरे हैं। रशीद किदवई ने अपनी पुस्तक में कांग्रेस मुख्यालय परिसर में एक अस्थायी मंदिर की बात की है। उनके मुताबिक कांग्रेस मुख्यालय में एक बड़ा पेड़ था। किसी समय कर्नाटक के एक व्यक्ति को जब पार्टी का टिकट मिला तो उसने पेड़ के नीचे एक छोटा सा मंदिर बनवा दिया। 1999 में आए तूफान के कारण वो विशाल पेड़ गिर गया। उसके नीचे बना मंदिर भी ध्वस्त हो गया। परिसर के उस मंदिर को लेकर भी रोचक जानकारी दी गई है कि जो भी टिकटार्थी आता था वो वहां सर नवाता था। टिकट मिलने पर फिर मंदिक पहुंच कर भगवान को धन्यवाद देता था। इस तरह के कई किस्से 24 अकबर रोड से जुड़े रहे हैं। अब जब वो परिसर खाली हो जाएगा तो ये किस्से, अगर विस्तार से लिखे नहीं गए, तो इतिहास में खो सकते हैं।   


Friday, September 22, 2017

डायनेस्टी कार्ड से खुद की खोली पोल ·

कथा सम्राट प्रेमचंद ने कहा था कि सिर्फ मूर्ख और मृतक अपने विचार नहीं बदलते हैं। भारतीय राजनीति में वंशवाद को लेकर हाल ही में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रेमचंद के इस कथन का साबित भी किया। अमेरिका के कैलिफोर्निया में एक बातचीच में राहुल गांधी ने कहा कि भारत वंशवाद से ही चल रहा है। इसके लिए उन्होंने मुलायम सिंह यादव के बेटे अखिलेश यादव से लेकर तमिलनाडु के नेता करुणानिधि के बेटे स्टालिन तक तो नाम लिया ही उन्होंने अभिषेक बच्चन को भी वंशवाद के प्रतिनिधि के तौर पर रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि पूरा देश ही ऐसे चल रहा है लिहाजा सिर्फ उनको वंशवाद के आधार पर लक्षित करने की जरूरत नहीं है। अब जरा फ्लैशबैक में चलते हैं । दो हजार आठ में उत्तराखंड के जिम कार्बेट में छात्रों से बात करते हुए राहुल गांधी ने कहा था- ‘मैं अगर अपने परिवार से नहीं आता तो यहां नहीं होता। आप अपने परिवार, मित्र या पैसे के बल पर सिस्टम में प्रवेश कर सकते हैं। मेरे पिता राजनीति में थे, मेरी दादी और दादी के पिता राजनीति में थे, इसलिए मेरे लिए राजनीति में आना और पैर जमाना आसान था। ये एक समस्या है और मैं इस समस्या का लक्षण हूं। मैं इसे बदलना चाहता हूं।‘ अपनी राजनीति के शुरुआती दिनों में राहुल गांधी वंशवाद को समस्या मानते रहे थे लेकिन उस वक्त भी जब भी मौका मिलता था अपने परिवार के बारे में अपने वंशजों के बारे में बातें करते थे।
दो हजार सात में ही यूपी में एक रोडशो के दौरान उन्होंने जोर देकर कहा था कि वो एक ऐसे परिवार से आते हैं जो अपने वचन से डिगता नहीं है, अपने वादों से पीछे नहीं हटता है। उस वक्त भी ये बात समझ में आ रही थी एक डायनेस्ट वंशवादी राजनीति के खिलाफ बातें तो कर रहा है लेकिन उसको अपने परिवार पर अपनी विरासत पर गर्व भी है। कांग्रेस में वंशवाद की जड़ें इतनी गहरी हो चुकी थीं कि उसको डायनेस्टी से मुक्त करवाने की उनकी तमाम कोशिशें, अगर कोई थीं तो, नाकाम रही थीं। जो शख्स दो हजार आठ में वंशवाद को समस्या मान रहा था वही नौ साल बाद उसको भारत की पहचान के तौर पर पेश कर रहा है, तो हुई ना प्रेमचंद की बातें सही। राहुल गांधी ने भी वही तर्क दिए जो चापलूस कांग्रेसी सालों से दे रहे हैं कि नेता की क्षमता पर बात हो उसके परिवार पर नहीं।
अगर हम भारतीय राजनीति के इतिहास पर नजर डालें तो ये साफ तौर पर नजर आता है कि नेहरू-गांधी परिवार ने कायदे से अपने बच्चों को राजनीति में बढ़ावा दिया । आजादी पूर्व 1928 में मोतीलाल नेहरू कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष थे और उन्होंने अपने बाद अपने बेटे के सर पर कांग्रेस अध्यक्ष का ताज रखने के लिए गांधी जी को 13 जुलाई 1929 को एक पत्र लिखा था जिसमें साफ तौर पर कहा था कि या तो आप या जवाहरलाल कांग्रेस की बागडोर संभालें। बाद में 1929 में जवाहरलाल नेहरू को कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया। जब लाहौर अधिवेशन में मोतीलाल नेहरू ने जवाहरलाल को कांग्रेस अध्यक्ष का चार्ज दिया तो उस वक्त इंदिरा गांधी बारह साल की थी और वहां मौजूद थीं। आजादी के बाद जब नेहरू भारत के प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने इंदिरा गांधी को भविष्य की राजनीति के लिए तैयार किया और 1959 में उनको कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष बनाया। अगर उस दौर के नेताओं पर नजर डालें तो तो इंदिरा से ज्यादा काबिल नेता कांग्रेस में थे। लाल बहादुर शास्त्री के निधन के बाद जब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनीं तो वंशवाद खुलकर सामने आ गया। संजय गांधी एक वक्त में काफी ताकतवर थे, उनके निधन के बाद इंदिरा ने राजीव गांधी को अपना उत्तराधिकारी बनाया जो बाद में देश के प्रधानमंत्री भी बने। राजीव की हत्या के बाद सोनिया और उनके बाद राहुल। जो सोनिया गांधी अपने पति की राजनीति में आने के खिलाफ थीं उनको अपने बेटे में संभावनाएं दिखने लगीं। डायेनेस्टिक पॉलिटिक्स भारत में नहीं बल्कि चंद परिवारों में चल रही है।
इसके अलावा राहुल गांधी ने कश्मीर के आतंकवाद से लेकर नोटबंदी और असहिष्णुता पर भी अपनी राय रखी। राहुल गांधी के बयानों पर लहालोट होनेवाली ब्रिगेड को उनके बयानों में अंतर्विरोध नजर नहीं आया। कश्मीर में बढ़ते आतंकवाद पर उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी पर निशाना साधा और कहा कि मनमोहन सिंह के कार्यकाल में उनलोगों ने घाटी में पसरे आतंकवाद को बेहद कम कर दिया था लेकिन कैसे  नहीं बताया। इसी तरह से नोटबंदी को लेकर भी भारत सरकार पर निशाना साधा लेकिन राहुल गांधी ये भूल गए कि नोटबंदी के बाद यूपी चुनाव में जनता ने बीजेपी को भारी जनादेश दिया था। अब रहती है बात असहिष्णुता की तो इस शब्द का रॉर्ड इतनी बार बज चुका है कि अब जब ये बजता है तो कोई प्रभाव नहीं छोड़ता है। असहिष्णुता की बात करनेवाले राहुल गांधी को कालबुर्गी और गौरी लंकेश की हत्या में कांग्रेस सरकार के कामकाज पर सवाल उठाने चाहिए। हर चीज में आरएसएस का हाथ बताकर पल्ला झाड़ने से काम नहीं चलनेवाला है। अब वो दौर चला गया कि हर चीज के पीछे विदेशी हाथ बताकर काम चल जाता था। जनता को भरमाना अब आसान नहीं है, जनता अब ठोस कार्रवाई तो चाहती ही है ठोस आरोप भी देखना सुनना चाहती है। अरविंद केजरीवाल की आरोपों की राजनीति के बाद अब जनता का हवा हवाई आरोपों में यकीन रह नहीं गया है। इस बात को राहुल गांधी को समझना होगा और राष्ट्रीय या अंतराष्ट्रीय मंच पर जाकर अपनी बात कहने के पहले होमवर्क भी करना होगा। वरना बार बार प्रेमचंद याद आते रहेंगे।    


Saturday, August 12, 2017

कांग्रेस में संघर्ष होगा तेज

अभी हाल ही में कांग्रेस पार्टी में दो अहम घटनाएं हुईं। बहुचर्चित राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस अध्यक्ष के राजनीतिक सचिव अहमद पटेल गुजरात से निर्वाचित हुए। निर्वाचन के पहले हाई वोल्टेज ड्रामा हुआ और मेरे जानते हाल के दशकों में किसी राज्यसभा चुनाव को मीडिया में इतनी कवरेज नहीं मिली थी। अहमद पटेल के राज्यसभा चुनाव को कांग्रेस और बीजेपी दोनों ने प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया था लेकिन पटेल के लिए तो यह चुनाव करो या मरो की स्थिति के जैसा था। पिछले करीब एक दशक से अहमद पटेल कांग्रेस में सोनिया गांधी के बाद सबसे ताकतवर नेता के तौर पर स्थापित थे। कहा जाता था कि पटेल की मर्जी के बगैर पार्टी में पत्ता भी नहीं हिलता है। ऐसे में जब बीजेपी ने कांग्रेस के इस कद्दावर नेता को राज्यसभा चुनाव के चक्रव्यूह में घेरा तो अहमद पटेल के सामने अपने अस्तित्व का संकट पैदा हो गया। पटेल ने अपने रणनीतिक कौशल से इस चुनाव के नतीजे को अपने पक्ष में कर लिया और पार्टी में अपनी अहमियत भी साबित कर दी। राज्यसभा चुनाव के नतीजे के पहले पार्टी में एक और बेहद अहम घटना हुई। कांग्रेस के महासचिव और राहुल गांधी कैंप के माने जानेवाले दिग्विजय सिंह ने कांग्रेस आलाकमान को खत लिखकर पार्टी की सभी जिम्मेदारियों से मुक्त करने की मांग की ताकि तीर्थयात्रानुमा जर्नी पर जा सकें। इसके पहले दिग्विजय सिंह को गोवा और कर्नाटक के बाद तेलांगना के प्रभार से पार्टी ने मुक्त कर दिया था। पार्टी के अंदर गोवा में सरकार नहीं बनने के लिए दिग्विजय सिंह को ही जिम्मेदार माना गया था। तेलगांना का प्रभार लिए जाने के बाद दिग्विजय ने खत लिखा था।
पहली घटना ने तो मीडिया में जमकर सुर्खियां बटोरी लेकिन दिग्विजय सिंह के कदम को उस तरह से सुर्खियां हासिल नहीं हुईं। अब इन दोनों घटनाओं को मिलाकर देखने पर कांग्रेस में एक नए तरह के समीकरण का आभास होता है। पटेल की जीत से एक बात तो तय मानी जा रही है कि पार्टी में अब राहुल गांधी के कैंप के नेताओं पर सोनिया की पीढ़ी के नेता और उनके सहयोगी हावी होने की कोशिश करेंगे। अहमद पटेल की मजबूती को इस रूप में देखा जा रहा है । यह भी संभव है कि अब इस तरह की मांग उठे कि दो हजार उन्नीस के लोकसभा चुनाव तक सोनिया गांधी के हाथों में ही पार्टी की कमान रहे। राहुल गांधी पार्टी के उपाध्यक्ष के तौर पर अपनी भूमिका का निर्वाह करते रहे। अगर इस तरह की मांग मान ली जाती है तो 2019 तक अहमद पटेल की पार्टी में अहमियत और केंद्रीय भूमिका बनी रह सकती है।
कांग्रेस में संगठनात्मक चुनाव होने वाले हैं और जिस तरह से एक नियमित अंतराल पर राहुल गांधी के अध्यक्ष बनने की खबरें आम होती हैं उसी तरह से एक बार फिर से कयास लगाए जा रहे हैं कि अक्तूबर में राहुल गांधी कांग्रेस के अध्यक्ष बन सकते हैं। अहमद पटेल की जीत के बाद यह तो तय हो गया है कि अगर राहुल गांधी पार्टी के अध्यक्ष बनते भी हैं तो उनके लिए अहमद पटेल को दरकिनार कर अपनी मर्जी चलाना आसान नहीं होगा। दिग्विजय सिंह की खुद को पार्टी की जिम्मेदारियों से मुक्त करने के अनुरोध को कुछ लोग कांग्रेस के पुराने कामराज फॉर्मूले की तरह देख रहे है। यह कहां तक व्यावहारिक है ये तो आने वाले वक्त में ही पता चल पाएगा।
दरअसल मौजूदा कांग्रेस पार्टी में सोनिया के कैंप के नेताओं और राहुल गांधी के करीबी नेताओं के बीच एक तरह की रस्साकशी लंबे समय से चल रही है। राहुल गांधी चाहते हैं कि वो तब अध्यक्ष बनें जब पार्टी के सभी पदाधिकारी उनकी मर्जी के हों। वो अपनी टीम खुद बना सकें। लेकिन ऐसा संभव नहीं हो पाता है। राहुल कैंप के कई नेताओं का मानना है कि इसमें अहमद पटेल सबसे बड़ी बाधा हैं और वो चाहते हैं कि पार्टी नए और पुराने नेताओं के बीच समन्वय बनाकर चले ताकि पार्टी को अनुभव और ऊर्जा दोनों का साथ मिल सके। अहमद पटेल ने राज्यसभा चुनाव में जीत हासिल कर अपने अनुभव और ऊर्जा के समन्वय के सिद्धांत को साबित भी कर दिया, लिहाजा ये माना जा रहा है कि सोनिया गांधी का इस सिद्धांत में भरोसा बढ़ेगा। सोनिया गांधी जितना ही अनुभव और ऊर्जा के समन्वय की बात करेंगी उतनी ही राहुल गांधी को दिक्कत होगी। राहुल कैंप के नेता चाहते हैं कि जब वो राहुल गांधी पार्टी अध्यक्ष बनें तो उनकी राह में किसी तरह की बाधा ना हो। उनकी टीम में सभी नेता ऐसे हों जिनकी आस्था सिर्फ उनमें हो। अहमद पटेल की राज्यसभा की जीत ने पार्टी के अंदर के इस द्वंद को बढ़ा दिया है।

राहुल गांधी कैंप के नेताओं और अहमद पटेल के बीच संबंध कैसे हैं इसकी बानगी ट्वीटर पर भी देखने को मिल सकती है। अहमद पटेल की जीत के बाद जब पार्टी के सभी नेता अहमद पटेल को बधाई दे रहे थे तो वो सभी उनको टैग कर रहे थे और पटेल भी लगभग सबको नाम लेकर धन्यवाद दे रहे थे। दिग्विजय सिंह ने जो ट्वीट किया उसमें लिखा- बधाई हो अहमद भाई। जवाब में पटेल ने लिखा- बहुत धन्यवाद जी। औपचारिक बधाई का बेहद औपचारिक धन्यवाद। इस ट्वीटर संवाद से ही संकेत मिल रहे हैं। पटेल की जीत के बाद अब पार्टी में एक बार फिर से पीढ़ियों का संघर्ष बढ़ सकता है, इसके संकेत तो मिलने शुरू हो ही गए हैं। अब यह सोनिया के राजनीतिक कौशल पर निर्भऱ करता है कि वो इस संघर्ष से पार्टी को कैसे उबारती हैं।    

Monday, June 19, 2017

राहुल से हो पाएगा क्या?

पिछले तीन चार सालों से नियमित अंतराल पर इस बात के कयास लगते रहे हैं कि कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी को पार्टी की कमान सौंपी जाने वाली है। सोनिया गांधी की बीमारी के बाद कयास का अंतराल कम होता चला गया है। जब भी कांग्रेस के सामने किसी तरह की क्राइसिस या राजनीति का अहम पड़ाव आता है तो इस तरह की खबरें आने लगती हैं कि राहुल गांधी के पार्टी के अध्यक्ष के तौर पर ताजपोशी अमुक वक्त तक हो जाएगी। पर अबतक ऐसा हो नहीं पाया है। अभी हाल ही में राष्ट्रपति चुनाव को लेकर रणनीति बनाने के लिए कांग्रेस के तमाम आला नेता जब सोनिया गांधी की अध्यक्षता में बैठे तो एक बार फिर से इस बात के कयास लगने लगे कि राहुल गांधी को पार्टी की रहनुमाई सौंप दी जाएगी। पिछले साल सात नवंबर को कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में इस बात पर जमकर चर्चा हुई थी कि राहुल गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष की कुर्सी संभालनी चाहिए। कार्यसमिति के ज्यादातर सदस्य इस पक्ष में थे भी लेकिन तब दिग्विजय सिंह ने कहा था कि सोनिया गांधी की अनुपस्थिति में इस तरह का कोई फैसला लेना उचित नहीं था। गौरतलब है कि उस वक्त सोनिया गांधी तबीयत खराब होने की वजह से उक्त बैठक में शामिल नहीं हो पाई थी।
इस साल के अंत तक कांग्रेस पार्टी में संगठनात्मक चुनाव होने हैं। राहुल गांधी को पार्टी अध्यक्ष पद सौंपने की एक बार फिर से तैयारी शुरू हो गई है। कयासबाजी भी। अब सवाल यही है कि राहुल गांधी कांग्रेस पद की जिम्मेदारी से भाग रहे हैं या फिर पार्टी में उनकी ताजपोशी को लेकर दो मत हैं। पार्टी से जुड़े कुछ नेताओं का दावा है कि राहुल गांधी लोकतांत्रिक तरीके से चुनकर पार्टी अध्यक्ष बनना चाहते हैं जबकि ज्यादातर नेता चाहते हैं कि कांग्रेस कार्यसमिति राहुल गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष नामित कर दे और फिर उसके बाद राष्ट्रीय अधिवेशन में उनके नाम पर मुहर लग जाए। यह तो वो बातें हैं जो सिद्धांत रूप से सामने आने पर अच्छी लगती हैं लेकिन इसके अलावा भी उनके अध्यक्ष बनने में एक पेंच है। वो पेंच है पार्टी के वो नेता जो सोनिया गांधी की पीढ़ी के हैं। वो चाहते हैं कि मौजूदा व्यवस्था ही चलते रहे जिसते तहत पार्टी के बारे में अंतिम फैसला लेने का हक सोनिया गांधी के हाथ में ही रहे और राहुल गांधी उपाध्यक्ष के तौर पर काम करते रहे। उनके तर्क हैं कि सोनिया गांधी के नेतृत्व में विपक्ष एकजुट हो सकता है लेकिन नीतीश और ममता बनर्जी जैसे दिग्गजों को राहुल गांधी का नेतृत्व मंजूर ना हो। इस तरह के तर्क देकर राहुल गांधी की ताजपोशी में फच्चर फंसाया जाता रहा है ।

देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस इस वक्त उस दौर से गुजर रही है जहां नेतृत्व को लेकर नेताओं से लेकर कार्यकर्ताओं तक में एक भ्रम और उलझन लक्षित किया जा सकता है । सोनिया के नेपथ्य में रहने की वजह से पुरानी पीढ़ी के नेता स्वत: परिधि पर चले गए थे और राहुल गांधी के आसपास के नेता पार्टी के केंद्र में दिखाई देने लगे थे । यह संसद और उसके बाहर दोनों जगह पर साफ तौर पर देखा जा सकता था । सोनिया के नेपथ्य में जाने के बावजूद उनके इर्दगिर्द के नेता भले ही पृष्ठभूमि में चले गए हों लेकिन उनकी ताकत कम नहीं हुई थी । ये जरूर हुआ कि राहुल गांधी के नजदीकी नेताओं का भाव बढ़ गया । इस परिस्थिति में पार्टी के फैसलों और नेताओं के बयान में एकरूपता नहीं दिखाई देती है । कुछ नेताओं का मानना है कि राहुल गांधी जब नोटबंदी का विरोध कर रहे थे और धीरे-धीरे अन्य विपक्षी दलों के नेता उनके साथ आते दिख रहे थे वैसे में राहुल गांधी बगैर सबको विश्वास में लिए प्रधानमंत्री मिलकर विपक्षी एकता के प्रयासों को झटका दे गया । दरअसल अगर हम देखें तो दो हजार नौ के लोकसभा चुनाव के बाद ही राहुल गांधी को कमान सौपने की मांग के बाद से यह भ्रम की स्थिति बनी हुई है । इस भ्रम ने दो हजार चौदह के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की लुटिया डुबोई थी । सात आठ साल से यह स्थित बनी हुई है और एक के बाद एक चुनाव हारने के बाद यह और बढ़ता चला जा रहा है । नेतृत्व में भ्रम की वजह से पार्टी का कोई सीधा रास्ता नहीं बन पा रहा है जिसपर चला जा सके।
दो हजार उन्नीस का आमचुनाव अब आ ही चला है । एक तरह से देखें तो उसमें डेढ साल का वक्त बचा है क्योंकि छह महीने पहले से तो आचार संहिता आदि लगा दी जाती है। अब वक्त कांग्रेस के हाथ से लगभग निकल चुका है। य़ूपी चुनाव के बाद तो जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री ओमर अबदुल्ला ने कह ही दिया था कि अब दो हजार चौबीस की तैयारी करनी चाहिए। दरअसल अगर कांग्रेस अब भी राहुल गांधी के हाथ में कमान सौंपती है तो उनके अबतक के अप्रोच को देखकर लगता नहीं है कि वो बहुत गंभीरता से इस जिम्मेदारी को निभा ले जाएंगे। पहले ही कई बार कहा जा चुका है कि राजनीति चौबीस घंटे का काम है इसको कैजुअल तरीके से नहीं किया जा सकता है। अब जब देश में किसान अपनी समस्या को लेकर उग्र हो रहे हैं तो राहुल गांधी इटली चले गए हैं और पार्टी में फिर से सभी नेता हो गए हैं। अगर कांग्रेस को 2019 की लड़ाई में बने भी रहना है तो राहुल गांधी को कमान फौरन सौंपनी होगी और राहुल बाबा को भी खालिस राजनेता की भूमिका में उतरना होगा क्योंकि उनका मुकाबला अमित शाह जैसे मेहनती अध्यक्ष से है।


Friday, May 26, 2017

बीजेपी मस्त, विपक्ष पस्त

केंद्र में नरेन्द्र मोदी की अगुवाई वाली एनडीए सरकार के तीन साल पूरे हो रहे है। सरकार के उठाए गए कदमों के बारे में सब जगह चर्चा हो रही है लेकिन स्वस्थ लोकतंत्र में बगैर विपक्ष के बारे में बात किए कोई चर्चा पूरी नहीं होती है। आज जब सरकार ने तीन साल पूरे कर लिए हैं और प्रधानमंत्री की लोकप्रियता में लगातार इजाफा हो रहा है तब विपक्ष के बारे में, उसकी नीतियों और कार्यक्रमों के बारे में विचार करना और जरूरी हो गया है। पारंपरिक आंकलन के मुताबिक किसी भी सरकार के लिए तीन साल के बाद जनता के मोहभंग का काल होता है और विपक्ष उसका ही फायदा उठाते हुए अपनी राजनीति करता है। सत्ता में अपनी वापसी की जुगत लगाता है। पर इस वक्त पारपंरिक राजनीति को नरेन्द्र मोदी का मजबूत नेतृत्व और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह की अकाट्य रणनीति ने नकार दिया है। एक के बाद एक विधानसभा चुनाव में बीजेपी की जीत से पार्टी के हौसले बुलंद हैं और विपक्ष के हौसले पस्त हैं। प्रमुख विपक्षी दल अपने नेतृत्व की क्षमताओं से जूझ रहा है और अन्य क्षेत्रीय दलों के नेताओं की अपनी अपनी महात्वाकांक्षाएं हैं। इस वक्त अगर देखें तो कांग्रेस में भ्रम की स्थिति बनी हुई है, पार्टी ये तय नहीं कर पा रही है कि पश्चिम बंगाल में वो सीपीएम का साथ छोड़कर तृणमूल कांग्रेस का हाथ पकड़े या फिर सीपीएम के साथ बनी रहे। तृणमूल कांग्रेस के साथ जाने को लेकर कांग्रेस की राज्य ईकाई में विरोध के स्वर उठ रहे हैं। बंगाल में पार्टी के सबसे मजबूत नेताओं में से एक अधीर रंजन चौधरी ने एक तरह से बगावत के संकेत दे ही दिए हैं। ममता बनर्जी भी कांग्रेस अध्यक्ष से मिल रही हैं लेकिन कांग्रेस के नेता मानस भुइंया को अपनी पार्टी से राज्यसभा का उम्मीदवार बनाने का एलान कर पार्टी को झटका भी दे रही हैं ।
कांग्रेस पार्टी में कई स्वयंभू नेता अलग अलग तरीके का बयान देकर पार्टी की मिट्टी पलीद करने में लगे हैं। तीन तलाक के मुद्दे पर कपिल सिब्बल ने जिस तरह से राम का नाम उछाला उसने कांग्रेस की छवि को खासा नुकसान पहुंचाया । कांग्रेस को अब ये समझने की जरूरत है कि अल्पसंख्यक तुष्टीकरण का दौर अब लगभग खत्म हो चला है। भारतीय संविधान सबको समान अवसर की बात करता है। ऐसा लगता है कि कांग्रेस के नेता संविधान की प्रस्तावना को भी भुला बैठे हैं। दूसरे राहुल गांधी के अध्यक्ष बनने को लेकर जिस तरह से सालों से भ्रम बना हुआ है उसने भी पार्टी के नेताओं के बीच कंफ्यूजन की स्थिति पैदा कर दी है । और जब नेता ही कंफ्यूज रहेगें तो पार्टी का तो भगवान ही मालिक है।
दूसरी तरफ अगर हम क्षेत्रीय दलों की बात करें तो बिहार में सत्ता में सहयोगी लालू यादव और नीतीश कुमार के बीच सबकुछ ठीक चल रहा है, ऐसा विश्वास के साथ कहना मुमकिन नहीं है। जब लालू यादव के ठिकानों पर छापा पड़ा तो जिस तरह से बीजेपी को नए सहयोगी के लिए लालू ने मुबारकबाद दिया उससे साफ है कि गठबंधन मजबूरी में चल रहा है। नीतीश और लालू यादव स्वाभाविक सहयोगी नहीं है बल्कि सत्ता के लिए साथ हैं। जैसे ही नीतीश कुमार को यह लगेगा कि लालू के बगैर भी उनका काम चल सकता है वो फैसला लेने में एक मिनट की देरी नहीं लगाएंगे। अखिलेश यादव और मायावती अपनी अपनी पार्टी की समस्याओं से जूझ रही हैं। मायावती के सामने पार्टी को बचाने का संकट तो है ही उनके भाई पर अकूत संपत्ति जमा करने का भी आरोप लगा है। अखिलेश के सामने शिवपाल की चुनौती तो है ही, योगी आदित्यनाथ की सरकार तमाम तरह के जांच के आदेश भी दे रही है। बचते हैं नवीन पटनायक। नवीव बाबू को भी बीजेपी से कड़ी टक्कर मिलने की उम्मीद है और उनको तय करना है कि वो विपक्षी दलों की एकता में शामिल हों या नहीं। राष्ट्रवाद के इस दौर में फारुख अब्दुल्ला जिस तरह की बयानबाजी कर रहे हैं उसमें उनकी पार्टी नेशनल कांफ्रेंस जिस दल या गठबंधन के साथ जाएगी उसको नुकसान हो सकता है। हरियाणा में चौटाला की पार्टी भी बिखरी हुई है क्योंकि पिता पुत्र दोनों जेल में हैं।
दरअसल विपक्षी एकता की कोशिश कर रहे दलों के बीच भी विश्वास की भारी कमी है। अगर हम दक्षिण के राज्यों की बात करें तो एआईएडीएमके और वाईएसआर कांग्रेस तो बीजेपी के साथ होने को बेताब है। ले देकर बचती है सीपीआई और सीपीएम। सीपीआई का कोई जनाधार बचा नहीं है और सीपीएम भी आंतरिक कलह से जूझ रही है। पार्टी में सीताराम येचुरी को राज्यसभा में तीसरी बार भेजने को लेकर करात गुट और सीता गुट खुलकर आमने सामने आ गए हैं। बंगाल सीपीएम ने खुलकर येचुरी को राज्यसभा का तीसरा टर्म देने का प्रस्ताव पोलित ब्यूरो को भेज दिया है। करात गुट ने ने येचुरी को राज्यसभा में जाने से रोकने के लिए तीन चार तर्क दिए जिसे बंगाल यूनिट ने खारिज कर दिया । अब छह और सात जून की पोलित ब्यूरो की बैठक में इसपर फैसला होना है। सीपीएम को बंगाल से राज्यसभा की इस सीट को जीतने के लिए कांग्रेस की मदद चाहिए होगी। राजनीति मे हमेशा दो और दो चार नहीं होता है। उसी तरह से अगर देखें तो इन दिनों येचुरी विपक्षी एकता को लेकर सोनिया गांधी से कई बार मिल चुके हैं। कुछ लोग इस सक्रियता को राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस के समर्थन से जोड़कर भी देख रहे हैं। अगर समग्रता में विपक्ष के हालत पर विचार करें तो यह स्वस्थ लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत नहीं है लेकिन लोकतंत्र में सबकुछ जनता पर निर्भर करता है और जनता इस वक्त मोदी सरकार के कामकाज से खुश है क्योंकि विपक्ष कोई विकल्प पेश करने में नाकाम रहा है।   

    

Friday, May 19, 2017

राष्ट्रपति चुनाव बहाना, 2019 निशाना

करीब दो महीने बाद होने वाले राष्ट्रपति चुनाव के लिए सियासी बिसात बिछने लगी है। पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों में से चार में जीत हासिल करने और दिल्ली म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन के चुनाव में हैट्रिक लगाने के बाद बीजेपी के हौसले बुलंद हैं। वहीं चुनाव दर चुनाव हार के बाद से विपक्ष दलों के हौसले पस्त हैं। इन पस्त हौसलों की वजह से ही अलग अलग सियासी जमीन पर राजनीति करनेवाले दल एकजुट होने की कोशिश कर रहे हैं। आंकड़े बता रहे हैं कि एनडीए को अपने राष्ट्रपति उम्मीदवार को जिताने में कोई दिक्कत नहीं होगी। विपक्ष के उम्मीदावर की हार भी लगभग तय है । बावजूद इसके बीजेपी के विरोधी दल राष्ट्रपति चुनाव में विपक्षी एकता के लिए एड़ी चोटी का जोड़ लगाए हुए हैं । कहा तो यहां तक जा रहा है कि राष्ट्रपति चुनाव के लिए कम्युनिस्टों को बंगाल में अपने चिर प्रतिद्वंदी तृणमूल कांग्रेस के साथ आने में भी अब कोई परहेज नहीं रहा । सोनिया गांधी बीमार होने के बावजूद दिल्ली में विपक्षी दलों के नेताओं के साथ लगातार बैठकें कर रही हैं । ममता बनर्जी ने की लंबी मुलाकात सोनिया गांधी से हुई लेरिन राष्ट्रपतु चुनाव के लिए विपक्ष के साझा उम्मीदवार को लेकर सहमति नहीं बनी है। उधर सीताराम येचुरी ने भी नेशनल कांफ्रेंस के नेता फारूख अब्दुल्ला और बीजेडी के नेता और ओडिशा के मुख्मंत्री नवीन पटनायक से मुलाकात कर राष्ट्रपति चुनाव में बीजेपी के खिलाफ लामबंदी को गति दी है। अबतक नवीन पटनायक कांग्रेस और बीजेपी से समान दूरी बनाए हुए थे लेकिन जब से ओडिशा के स्थानीय निकाय चुनावों में बीजेपी को जबरदस्त सफलता मिली है तो नवीन पटनायक बीजेपी के विरोधवाले पाले में जाते दिखाई दे रहे हैं। अब  भानुमति का कुनबा कैसा बनता है और राष्ट्रपति चुनाव तक क्या शक्ल अख्तियार करता है यह तो वक्त ही बताएगा। प्रणब मुखर्जी के चुनाव के वक्त भी कांग्रेस के विरोध का स्वर उठानेवाले ममता बनर्जी और मुलायम सिंह यादव ने आखिर तक राजनीतिक उहापोह बरकरार रखा था वो अभी भी देश की जनता की स्मृति में ताजा है। विपक्षी दलों को एकजुट करने की कोशिश करना वैसा ही है जैसे अलग अलग दिशाओं में जाने वाले घोड़ेवाले रथ की सवारी करना।
इसके अलावा जो एक बड़ी चुनौती विपक्षी दलों के सामने है वो अपने साझा उम्मीदवार के चयन को लेकर है। पश्चिम बंगाल के राज्यपाल रहे गोपालकृष्ण गांधी,पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार के अलावा शरद पवार और शरद यादव के नाम भी फिजां में, विपक्ष के साझा उम्मीदवार के तौर पर, तैर रहे हैं। गोपालकृष्ण गांधी ने तो माना भी है कि उनसे संपर्क भी किया गया है। गोपालकृष्ण गांधी महात्मा गांधी के पौत्र हैं और पश्चिम बंगाल के राज्यपाल के तौर पर उनका ममता बनर्जी से भी संपर्क बेहतर रहा है। इसके अलावा शरद पवार को लेकर विपक्षी दल इसलिए उत्साहित हैं कि वो मानकर बैठे हैं कि मराठा प्राइड के नाम पर शिवसेना उनका समर्थन कर सकती है। दो हजार सात के राष्ट्रपति के चुनाव में शिवसेना ने कांग्रेस के उम्मीदवार प्रतिभा पाटिल का समर्थन किया था क्योंकि वो महाराष्ट्र से थीं। उस वक्त शिवसेना ने एनडीए के उम्मीदवार को वोट नहीं दिया था। जेडीयू के नेता शरद यादव का नाम आगे बढ़ा रहे हैं । उनके तर्क का आधार शरद यादव की वरिष्ठता है। राष्ट्रपति चुनाव के नोटिफिकेशन होने के पहले ही विपक्षी दलों के बीच किसी साझे उम्मीदवार के नाम पर सहमति को लेकर जिस तरह की राजनीति चल रही है उससे आनेवाले दिनों के संकेत मिल रहे हैं। संभव है कि चुनाव तक मतभेद खुलकर सामने आ जाएं।

रायसीना हिल्स की इस लड़ाई में बीजेपी का अपर हैंड है क्योंकि राष्ट्रपति चुनाव की जो प्रक्रिया है,उसमें वोटरों की संख्या के लिहाज से एनडीए को बढ़त हासिल है। राष्ट्रपति चुनाव में लोकसभा और राज्यसभा के चुने हुए सांसद और विधायक वोट डालते हैं। राज्यसभा और लोकसभा के चुने हुए सांसदों की संख्या सात सौ छिहत्तर है और विधायकों की चार हजार एक सौ चौदह। एक सांसद का वोट सात सौ छिहत्तर के बराबर होता है और राज्यों के विधायकों के वोट की गणना जनसंख्या और विधानसभा सदस्यों के अनुपात के हिसाब से तय की जाती है । इस वक्त विधायकों के वोटों की आनुपातिक संख्या पांच लाख उनचास चार सौ आठ है, जबकि सांसदों के वोटों की आनुपातिक संख्या पांच लाख उनचास हजार चार सौ आठ है। इस आधार पर गणना करने से एनडीए के पास कुल वोट पांच लाख बत्तीस हजार सैंतीस हैं और उसको अपने कैंडिडेट को जिताने के सत्रह हजार चार सौ चार वोटों की जरूरत है। राष्ट्रपति चुनाव के नियमों के मुताबिक इलेक्टोरल कॉलेज के वोटों का पचास फीसदी यानि पांच लाख उनचास हजार चार सौ इकतालीस वोट मिलना जीत के लिए आवश्यक है। इसी तरह से अगर आंकड़ों को देखें तो विपक्षी खेमे के पास इलेक्टोरल कॉलेज के तीन लाख इक्यानवे हजार सात सौ उनतालीस वोट हैं। अब तक जिन पार्टियों का रुख साफ नहीं हुआ है उनके वोटों की संख्या एक लाख चौवालीस हजार तीन सौ दो है। दोनों को जोड़ देने के बाद भी यह कुल मत के पचास फीसदी वोट तक नहीं पहुंचता है। अभी कुछ दिन पहले आंध्र प्रदेश की पार्टी वाईएसआर कांग्रेस के नेता जगन रेड्डी ने प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात के बाद एनडीए के उम्मीदवार को समर्थन देने का एलान कर दिया है । इस एलान के बाद एनडीए उम्मीदवार की जीत का रास्ता लगभग साफ हो जाएगा। इन आंकड़ों के बावजूद अगर विपक्षी दल राष्ट्रपति चुनाव के नाम पर एकजुट होने की कोशिश कर रहे हैं। दरअसल वो दो हजार उन्नीस के महागठबंधन की संभावनाओं को तलाश रहे हैं, और इस बहाने से गठबंधन की जमीन तैयार कर रहे हैं। 

Thursday, February 9, 2017

आंतरिक लोकतंत्र से कांग्रेस को परहेज ·

पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के बीच एक बेहद अहम खबर दब सी गई । चुनाव आयोग ने देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस को अपने आतंरिक चुनाव तीस जून तक करवाने का आदेश दिए हैं । चुनाव आयोग ने साफ तौर पर कहा है कि अब इसको और टालने की अनुमति नहीं दी जा सकती है । दरअसल जो हजार पंद्रह के सितंबर से लेकर अब तक कांग्रेस पार्टी अपने आंतरिक चुनावों को टालने का अनुरोध दो बार चुनाव आयोग से कर चुकी है जिसको आयोग ने मान लिया था । लेकिन अब आयोग ने कड़ा रुख अख्तियार करते हुए कांग्रेस को तीस जून तक संगठन के अध्यक्ष समेत सभी स्तरों के चुनाव संपन्न करवाने का हुक्म दिया है और साथ ही यह भी कहा है कि अब संगठन के चुनाव को टालने की और छूट नहीं दी जा सकती है । दरअसल कांग्रेस में सभी स्तरों पर सांगठनिक चुनाव दो हजार दस में ही हुए थे और दो हजार तेरह में राहुल गांधी को उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया था । सोनिया गांधी उन्नीस सौ अट्ठानवे से कांग्रेस की अध्यक्ष बनी हुई हैं और नियमित अंतराल पर इस बात की चर्चा होती रहती है कि अब कांग्रेस की कमान राहुल गांधी को सौंपी जानेवाली है ।
अब कांग्रेस चुनाव आयोग के इस निर्देश का विरोध कर रही है और कह रही है कि दिसंबर के पहले चुनाव करवाना संभव नहीं है । कांग्रेस के प्रवक्ता अब यह दलील दे रहे हैं कि चुनाव आयोग को किसी भी राजनीतित दल के आंतरिक चुनावों की तारीख तय करने का हक नहीं है । कांग्रेस की दलील है कि उनकी पार्टी की सर्वोच्च नीति निर्धारक कार्यसमिति ने चुनावों की तारीखें तय की है और उसके हिसाब से ही चुनाव करवाए जाएंगे । कांग्रेस के इस रुख के बाद पार्टी और चुनाव आयोग में टकराव की आशंका पैदा हो गई है । दरअसल देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस में आजादी के बाद से आंतरिक लोकतंत्र धीरे धीरे खत्म होता चला गया । पहले नेहरू फिर इंदिरा जी और उसके बाद राजीव गांधी और सोनिया गांधी के दौर में पार्टी पर एक परिवार का वर्चस्व बढ़ता चला गया । राजीव गांधी की हत्या के बाद जब सोनिया गांधी ने राजनीति में आने से मना तक दिया था उस दौर में उन्नीस सौ सत्तानवे में कांग्रेस में अध्यक्ष पद के लिए चुनाव हुए थे । उस वक्त पार्टी के लंबे समय तक कोषाध्यक्ष रहे सीताराम केसरी ने शरद पवार और राजेश पायलट को मात दी थी लेकिन उनका भी कार्यकाल ज्यादा लंबा नहीं चल पाया था ।
लगभग सात साल से राजनीति से दूर रहनेवाली सोनिया गांधी ने एलान कर दिया कि वो उन्नीस सौ अट्ठानवे के आम चुनाव में कांग्रेस का प्रचार करेंगी । सोनिया के चुनाव प्रचार से कांग्रेस को कोई खास फायदा नहीं हुआ लेकिन बगैर किसी सदन के सदस्य बने सोनिया गांधी को कांग्रेस पार्लियामेंट्री पार्टी की चेयरपर्सन चुन लिया गया । ऐसा नहीं है कि कांग्रेस में यह पहली बार हुआ था । उन्नीस सौ सत्तर में इंदिरा गांधी भी इसी तरह से कांग्रेस पार्लियामेंट्री पार्टी की चेयरपर्सन चुनी गई थीं । सोनिया के राजनीति में आने के बाद पार्टी में सत्ता के दो केंद्र बनने लगे थे जिसकी परिणति सीताराम केसरी को हटाकर सोनिया को पार्टी का अध्यक्ष बनाया जाना । दो साल बाद यानि दो हजार दस में कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव हुआ जिसमें सोनिया गांधी ने जितेन्द्र प्रसाद को भारी बहुमत से हरा दिया था । सतहत्तर सौ इकहत्तर वोट में से जितिन पसाद को सिर्फ चौरानवे वोट मिले थे । यह पार्टी के अध्यक्ष पद के लिए आखिरी चुनाव था । इसके बाद से सोनिया गांधी के नेतृत्व को कभी चुनौती नहीं मिली और वो सर्वसम्मति से पार्टी की अध्यक्ष बनती रहीं । सोनिया गांधी कांग्रेस की सबसे लंबे समय तक रहनेवाली अध्यक्ष हैं । कभी कभार निचले स्तर पर चुनाव हुए भी तो राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए किसी ने सोनिया गांधी के खिलाफ चुनाव लड़ने की हिम्मत नहीं दिखाई । जितेन्द्र प्रसाद का हश्र सबसे सामने था । राहुल गांधी जब पार्टी के मामलों को देखने लगे तो उन्होंने ब्लाक, जिला और राज्य स्तर के चुनावों को करवाने का बीड़ा उठाया । कई राज्यों में चुनाव हुए भी और अध्यक्ष भी चुने गए ।

दरअसल कांग्रेस में जो प्रवृति इंदिरा गांधी के वक्त मजबूत हुई उसने इस पार्टी के आंतरिक लोकतंत्र को कमोजर किया या कह सकते हैं कि बाधित किया । जब से काग्रेस पार्टी में एक व्यक्ति को राज्य का अध्यक्ष नियुक्त करने का अधिकार दिया जाने लगा तब से आंतरिक लोकतंत्र कमजोर होने लगा । हर तरह के फैसले लेने का अधिकार आलाकमान को चाहे वो प्रदेश अध्यक्ष हो, प्रदेश कार्यकारिणी का गठन हो, मुख्यमंत्री का चुनाव हो या फिर बाद में प्रधानमंत्री का भी । कांग्रेस के नेता आलाकमान को खुश करने के लिए हर तरह के अहम फैसलों को लिए के उनको अधिकृत करने लगे । इससे चमचागिरी की राजनीति को बढ़ावा मिलने लगा और मजबूत स्थानीय नेतृत्व पनप नहीं सका । इसके दूरगामी परिणाम को कांग्रेस का नेतृत्व भांप नहीं सका । आज अगर कांग्रेस की हालात पतली है और एक के बाद एक राज्य से वो सत्ता से दूर हो रही है या जनता उनको नकार रही है तो उसके पीछे पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र का नहीं होना है । आंतरिक लोकतंत्र के नाम पर पार्टी में जिस तरह का छलावा होता है वो जगजाहिर है । लोकतंत्र में विपक्ष की अहम भूमिका होती है और अगर विपक्ष कमजोर होता है तो प्रकरांतर से लोकतंत्र भी कमजोर होता है । आज अगर कांग्रेस को खुद को मजबूत करना है तो उसको पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र को बहाल करना होगा और आलाकमान को अधिकृत करने की राजनीति से दूर जाना होगा । लेकिन इसके आसार नजर नहीं आ रहे हैं । राहुल गांधी की ताजपोशी भी बगैर चुनाव के ही होती नजर आती है क्योंकि वो निर्विरोध अध्यक्ष बनेंगे । 

Wednesday, August 3, 2016

यूपी के सियासी भंवर में सोनिया

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस सत्ताइस साल से सत्ता से बाहर है । कांग्रेस की महात्वाकांक्षी योजना और उनेक उपाध्यक्ष राहुल गांधी की मानें तो पार्टी इस बार सूबे के विधानसभा चुनाव में नंबर वन की लड़ाई लड़ रही है । राहुल गांधी के इस दावे में कितना दम है ये तो अगले साल विधानसभा चुनाव के नतीजे ही साबित करेंगे लेकिन इतना तय है कि कांग्रेस इस बार उत्तर प्रदेश में गंभीरता से विधानसभा चुनाव लड़ती दिखना चाहती है । अगले साल होनेवाले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में पार्टी का बेड़ा पार कराने की जिम्मेदारी चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर को सौंपी है । प्रशांत किशोर ने यूपी के हर जिले में सर्वा करवाकर अपनी रणनीति तैयार कर ली है और उसके हिसाब से कांग्रेस काम करती दिख रही है । कांग्रेस ने कुछ दिनों पहले जो यूपी की टीम घोषित की है उसमें सामाजिक और जातीय समीकरणों का खास ध्यान रखा गया है । सत्तर पार शीला दीक्षित को मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित कर कांग्रेस ने दो चाल चली है । एक तो सूबे की दस बारह फीसदी ब्राह्मण मतदाता पर डोरे डालने का काम और दूसरे शीला दीक्षित ने दिल्ली में जो विकास किया है उसको शोकेस करके पार्टी मोदी के विकास की राजनीति का मुकाबला करना चाहती है । इसी तरह से दलित, मुसलमान और पिछड़े को पार्टी उपाध्यक्ष की कमान सौंप कर भी कांग्रेस ने अपने मंसूबों को साफ कर दिया था । जिस तरह से कांग्रेस कार्यक्रमों का आयोजन कर रही है उससे कार्यकर्ताओं में भी एक भरोसा कायम होने लगा है ।
दरअसल अगर हम उत्तर प्रदेश की सामाजिक संरचना पर विचार करें तो इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि वहां का समाज कमोबेश सामंती मानसिकता वाला समाज है । वहां के लोगों को वैभव, ऐश्वर्य और किसी भी आयोजन की विराटता आकर्षित करती है । यूपी की स्थानीय भाषा में कहें तो भौकाल होना चाहिए, चाहे वो पारिवारिक आयोजन हो, सामाजिक सम्मेलन हो या राजनैतिक रैलियां या कार्यक्रम हो । यह बात दो हजार चौदह के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की समझ में आ गई थी । लिहाजा अगर आप उस दौर में नरेन्द्र मोदी की रैलियों को याद करें तो उसमें एक खास किस्म की विराटता दिखती थी । उसके बरक्श कांग्रेस की रैलियों में इस तरह का कोई आकर्षण होता नहीं था । सूबे के कांग्रेस प्रभारी मधूसूदन मिस्त्री एनजीओ पृष्ठभूमि से आते थे लिहाजा उनके स्कीम ऑफ थिंग्स में ग्रैंडनेस का आभाव दिखता था । अब कांग्रेस की समझ में ये बात आ गई है । अगर आप देखें तो जब राज बब्बर की टीम कार्यभार संभालने के लिए लखनऊ पहुंची थी तो कांग्रेस ने उस इवेंट को बड़ा करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी थी । कांग्रेस दफ्तर के आसपास दुकान चलेनवालों का मानना था कि दशकों बाद इस दफ्तर ने इतनी भीड़ देखी । हाल ही में राहुल गांधी का लखनऊ में एक कार्यक्रम हुआ जिसमें यूपी में बदहाली के सत्ताइस साल पर कांग्रेस उपाध्यक्ष ने कार्यकर्ताओं के सवालों के जवाब दिए । इस कार्यक्रम की विराटता को देखा जाना चाहिए । इसमें विदेशों में होनेवाली राजनैतिक रैली की तरह रैंप बनाए गए थे और उस रैंप पर चलते हुए राहुल कार्यकर्ताओं के सवालों का जवाब दे रहे थे । उस कार्यक्रम में भी लोगों की अच्छी खासी भीड़ जुटी थी ।

इन सबसे उत्साहित कांग्रेस पार्टी ने अपने अध्यक्ष सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के गढ़ में उतार दिया । लंबे समय बाद उत्तर प्रदेश की जनता ने कांग्रेस के किसी कार्यक्रम में इतना जोश और उत्साह दिखा । यहां भी सोनिया गांधी के रोड शो और उसके बाद के कार्यक्रमों में विराटता का खास ध्यान रखा गया था ताकि जनता को लगे कि कुछ बड़ा हो रहा है । ये तो वो बातें है जो सतह पर दिखाई दे रही थी । अगर हम सोनिया गांधी के कार्यक्रमों को देखें तो वो भी खास समुदाय के वोटरों को ध्यान में रखकर बनाया गया था । सोनिया गांधी का कमलापति त्रिपाठी की प्रतिमा पर माल्यार्पण या फिर बाबा विश्वनाथ के मंदिर में दर्शन का कार्यक्रम । कमलापति त्रिपाठी लंबे समय तक उत्तर प्रदेश के ब्राह्मणों के नेता थे और सूबे के मुख्यमंत्री और केंद्र में रेल मंत्री रह चुके थे । तो एक बार फिर से ब्राह्मणों को अपने पाले में लाने का दांव । इसी तरह से बाबा विश्ननाथ के दर्शन का कार्यक्रम और उसको सावन में बाबा के आशीर्वाद के तौर पर प्रचारित करना । यह अलहदा बात है कि रोड शो के दौरान सोनिया गांधी बीमार पड़ गईं और उनको कार्यक्रम को बीच में छोड़कर दिल्ली वापस आना पड़ा । कांग्रेस पर यह आरोप लगता रहा है वो मुसलमानों को लेकर अत्यधिक उदार और संवेदनशील रहती है । इस छवि को तोड़ने की कोशिश कांग्रेस बार बार कोशिश करती है । लेकिन सोनिया के बनारस के रोड शो से एक बात तो साफ हो गई कि अगर कांग्रेस के नेता जमीन पर बेहतर रणनीति के साथ उतरें तो वो यूपी विधानसभा चुनाव में चुनौती बनकर खड़े हो सकते हैं । पहले नंबर की लड़ाई तो बहुत दूर की कौड़ी लगती है लेकिन अगर कांग्रेस ने गंभीरता से चुनाव लड़ा और प्रियंका गांधी ने धुंआधार प्रचार आदि किया तो संभव है कि उसको चालीस पचास सीटें आ जाएं । अगर कांग्रेस को इतनी सीटें आ जाती हैं तो फिर उसके बगैर सूबे में सरकार बनना संभव नहीं होगा । नतीजा चाहे जो हो लेकिन इतना तय है कि यूपी का चुनावी समर इस बार बेहद दिलचस्प होगा ।   

Friday, June 17, 2016

लाभ के पद को लेकर भ्रम

दिल्ली विधानसभा चुनाव में जब आम आदमी पार्टी ने सत्तर में से सड़सठ सीटें जीती थीं तब ना तो पार्टी सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल को और ना ही उनके इक्कीस विधायकों को ये अंदाज रहा होगा कि उनको पांच साल के पहले एक बार फिर से चुनाव मैदान में जाना पड़ेगा । अब इस बात के आसार बन रहे हैं कि सड़सठ में से इक्कीस विधायकों को पांच साल के पहले ही जनता की अदालत में जाना पड़े । दरअसल ये पूरा मामला लाभ के पद से जुड़ा है । केजरीवाल को दिल्ली की जनता ने 70 में से 67 सीटें जिताकर विराट बहुमत दिया था । इस विराट बहुमत और जनता की अन्य राजनीतिक दलों से नाराजगी की वजह से केजरीवाल सरकार ने केंद्र से दो दो हाथ करने की ठान ली थी । लंबे समय तक उपराज्यपाल से उनकी ठनी हुई है ।  दिल्ली की स्थिति देश के अन्य राज्यों से अलग है और यहां के नियम कायदे भी अलग हैं । केजरीवाल ने कई नियमों को चुनौती देने का जोखिम उठाना शुरू कर दिया । संविधान और कानून की व्याख्या अलग अलग तरीके से होने लगी । केजरीवाल सरकार ने कई नियमों को अदालत में तो कई को मीडिया के मंचों के पर चुनौती दी । इसी कोलाहल के बीच केजरीवाल सरकार ने अपने इक्कीस विधायकों को संसदीय सचिव नियुक्त कर दिया और अलग अलग मंत्रालयों से उनको अटैच कर दिया गया । उस वक्त तक दिल्ली में एक संसदीय सचिव नियुक्त करने का प्रावधान था । इस बारे में भी भ्रम की स्थिति है कि एक संसदीय सचिव भी लाभ के पद के दायरे में आता है या नहीं । बीजेपी के शासनकाल के दौरान नंदकिशोर गर्ग मुख्यमंत्री के संसदीय सचिव बनाए गए थे लेकिन जब बाद में उसपर विवाद हुआ को उन्होंने पद छोड़ दिया था । इसी तरह से इस वक्त के दिल्ली कांग्रेस के अध्यक्ष अजय माकन भी शीला दीक्षित के संसदीय सचिव रह चुके हैं । तब लाभ के पद का मामला नहीं उछला था । लेकिन जब केजरीवाल ने अपने इक्कीस विधायकों को संसदीय सचिव बनाया तो इसको लाभ का पद मानते हुए एक शख्स ने चुनाव आयोग के समक्ष याचिका दायर कर दी । विवाद बढ़ता देख दिल्ली सरकार ने विधानसभा में एक बिल पास करवाया जिसमें संसदीय सचिवों को लाभ के पद के दायरे से बाहर करते हुए इसको भूतलक्षी ( रेट्रोस्पेक्टिव) प्रभाव से लागू कर दिया ताकि उनके विधायकों पर कोई आंच नहीं आए । लेकिन इस बिल को राष्ट्रपति ने मंजूरी देने से इंकार कर दिया ।

राष्ट्रपति के इंकार करने के बाद दिल्ली की आम आदमी पार्टी और उसके सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल आगबबूला हैं और प्रधानमंत्री मोदी पर अपनी सरकार को अस्थिर करने का आरोप लगा रहे हैं । बीजेपी और आम आदमी पार्टी दोनों एक दूसरे पर बयानों की तीरंदाजी कर रहे हैं । आम आदमी पार्टी को लग रहा है कि उनके इक्कीस विधायक गंभीर संकट में फंस गए हैं तो वो इसका भी राजनीतिक लाभ उठाना चाहते हैं । हर बार की तरह इस बार भी उनके निशाने पर सीधे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हैं ।  दरअसल इस मसले पर. ऐसा लगता है कि, आम आदमी पार्टी से गलती हो गई है लेकिन अपनी गलती को छुपाने के लिए अब इस तरह की दलीलें भी दी जा रही हैं कि उनके विधायकों ने किसी प्रकार का कोई धनालाभ या अन्य आर्थिक लाभ सरकार से नहीं लिया । कहा तो यहां तक जा रहा है कि उनके विधायकों ने संसदीय सचिव के लिए बने दफ्तरों का इस्तेमाल भी नहीं किया । लेकिन इस मामले में शिकायतकर्ता का दावा है कि उनके पास एक आरटीआई का जवाब है जिसमें बताया गया है कि विधानसभा परिसर में इन सभी इक्कीस संसदीय सचिवों को दफ्तर के लिए कमरे अलॉट किए गए थे । ये सारा मामला अब चुनाव आयोग के समक्ष है और वो सभी विधायकों का पक्ष सुनने के बाद अपना फैसला सुनाएगा । विशेषज्ञों का मानना है कि चुनाव आयोग को फैसला लेने में करीब छह माह का समय लग सकता है । तबतक राजनीति की बिसात पर शह और मात का खेल चलता रहेगा । लेकिन यहां यह याद दिलाना आवश्यक है कि दो हजार छह में सोनिया गांधी ने जब राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के अध्यक्ष का पद संभाला था तब उनको लेकर भी सवाल खड़े हुए थे और उन्होंने रायबरेली के सांसद के तौर पर इस्तीफा देकर फिर से चुनाव लड़ा था । इसी तरह से समाजवादी पार्टी की राज्यसभा सांसद जया बच्चन भी जब यूपी फिल्म विकास निगम की अध्यक्ष नियुक्त की गई थी तब उनकी सदस्यता भी गई थी । बाद में वो फिर से चुनकर आई थी । इसलिए यह माना जाना चाहिए कि दिल्ली में इक्कीस सीटों पर फिर से चुनाव होना लगभग तय है, वक्त चाहे जितना लगे । दरअसल संसदीय सचिवों को लेकर हर राज्य में अलग अलग कायदे कानून हैं । पूर्वोत्तर के कई राज्यों में जहां साठ विधायकों वाली विधानसभा है वहां भी अठारह संसदीय सचिव हैं लेकिन जब पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ने दो हजार तेरह में तेरह संसदीय सचिवों की नियुक्ति की तो कलकत्ता हाईकोर्ट ने उसको जून दो हजार पंद्रह में रद्द कर दिया जबकि ये नियुक्तियां दो हजार बारह के एक कानून के तहत की गई थी । कई राज्यों के हाईकोर्ट ने संसदीय सचिवों की नियुक्तियों को रद्द कर दिया है जिसके खिलाफ राज्यों की कई अपील सुप्रीम कोर्ट में लंबित है । हिमाचल प्रदेश का मामला तो 2005 से सुप्रीम कोर्ट में पेंडिंग है । इस मामले में अलग अलग राज्यों में भ्रम की स्थिति होने से अब वक्त आ गया है कि सुप्रीम कोर्ट संविधान की उचित व्याख्या कर स्थिति को साफ करे ।     

Thursday, June 2, 2016

दामाद के बचाव में गुम आरोप ·

सोनिया गांधी अपने लोकसभा क्षेत्र रायबरेली से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर अबतक का सबसे बड़ा हमला किया । उन्होंने प्रधानमंत्री पर आरोप लगाया कि वो देश के शहंशाह की तरह काम कर रहे हैं । उन्हॆंने आरोप लगाया कि देश के कई हिस्सों में सूखा पड़ा है, किसान बेहाल हैं और प्रधानमंत्री जश्न मना रहे हैं । दरअसल सोनिया गांधी जब कोई भी बात करती हैं तो वो मीडिया में बड़ी खबर बनती है । लिहाजा जब उन्होंने सीधे पीएंम मोदी को निशाने पर लिया सुर्खियां बनीं । सोनिया गांधी और कांग्रेस हमेशा से बीजेपी पर किसान और गरीब विरोधी होने का आरोप लगाती रही है । कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने जब बीजेपी पर सूट बूट की सरकार का आरोप लगाया था तो वो लंबे समय तक बीजेपी से चस्पां रही थी क्योंकि उस वक्त प्रधानमंत्री ने लाखों रुपए का सूट पहना था । लंबे समय बाद वक्त के साथ कांग्रेस का ये विशेषण कमजोर पड़ा । राजनीति ने भी करवट बदली और बिहार और दिल्ली की हार के बाद असम में बीजेपी की जीत ने कांग्रेस को बैकफुट पर ला दिया । सूट बूट की सरकार पर कांग्रेस मुक्त भारत का नारा भारी पड़ने लगा ।
लिहाजा जब सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री पर हमला बोला तो बीजेपी ने पलटवार करते हुए कहा कि सोनिया गांधी हालिया विधानसभा चुनाव में हार की बौखलाहट की वजह से ऐसे बयान दे रही हैं । बीजेपी के नेताओं का दावा है कि भारत को कांग्रेस मुक्त होता देख कर सोनिया हताशा में उल्टे सीधे आरोप लगा रही हैं । सोनिया गांधी के आरोपो की पड़ताल होती उसपर बहस होती, उसको कसौटी पर कसा जाता लेकिन खुद सोनिया ने ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर लगाए अपने आरोपों को ही भटका दिया । सोनिया ने अपने दामाद राबर्ट वाड्रा पर लगाए जा रहे आरोपों को कांग्रेस पार्टी से जोड़ दिया । दरअसल राबर्ट वाड्रा पर रक्षा सौदों में बिचौलिये का काम करनेवाले एक शख्स से संबंध रखने और उसके मार्फत लंदन में एक उन्नीस करोड़ का बेनामी बंगला खरीदने का आरोप लगा है । राबर्ट वाड्रा और उनके सहायक ने कथित तौर पर रक्षा सौदे के उक्त बिचौलिए के साथ कुछ ईमेल का आदान प्रदान किया था जिसके आधार पर उनपर ये संगीन इल्जाम लग रहे हैं । उन ईमेल में लंदन की इमारत की मरम्मत के बारे में बातचीत है । इन ईमेल के सामने आने के बाद बीजेपी के सांसद किरीट सोमैया ने प्रवर्तन निदेशालय के निदेशक को खत लिखकर पूरे मामले की जांच की मांग कर डाली । ये मामला तूल पकड़ ही रहा था कि सोनिया ने प्रधानमंत्री को शहंशाह बता दिया और चर्चा उधर मुड़ने लगी थी लेकिन इस बीच सोनिया ने अपने दामाद वाड्रा का बचाव कर अपने ही आरोपों की हवा निकाल दी । विपक्ष के हाथ बेवजह का एक मुद्दा दे दिया ।
सोनिया ने पहली बार खुलकर राबर्ट वाड्रा का बचाव करते हुए कह डाला कि उनपर हमेशा से बेबुनियाद आरोप लगाए जाते रहे हैं । उन्होंने केंद्र सरकार को चुनौती भी दी कि अगर राबर्ट के खिलाफ कोई आरोप है तो उसको साबित करे और जनता के सामने दूध का दूध और पानी का पानी कर दे । सोनिया यहीं पर रुक जाती तो भी ठीक था लेकिन उन्होंने राबर्ट वाड्रा को कांग्रेस मुक्त की साजिश से जोड़कर विपक्ष को हमला कराने का असलाह मुहैया करवा दिया । अब बीजेपी और कांग्रेस के विरोधी कांग्रेस मतलब राबर्ट वाड्रा कहकर चुटकी लेने लगे हैं । कुछ दिनों पहले भी जब कांग्रेस ने जंतर मंतर पर प्रदर्शन किया था तब भी कुछ तख्तियों पर राहुल सोनिया के साथ राबर्ट वाड्रा की तस्वीर वाले बोर्ड भी लगे थे । तब कांग्रेस ने उसको चंद उत्साही पार्टी कार्यकर्ताओं की करतूत बताकर पल्ला झाड़ लिया था । प्रियंका गांधी से शादी के बाद जब भी राबर्ट पर आरोप लगे तब तब कांग्रेस पार्टी राबर्ट वाड्रा पर लग रह आटक गया । यह बात भी ठीक है कि बीजेपी लगातार राबर्ट वाड्रा पर इल्जाम लगाती रही है जमीन सौदों से लेकर इमारतों की खरीदारी का लेकिन सरकार के दो साल बीत जाने के बाद भी अबतक किसी भी आरोप में से कोई साबित नहीं हो पाया है । अपने चुनावी रैलियों में नरेन्द्र मोदी ने भी राबर्ट वाड्रा के जमीन सौदे को लेकर कांग्रेस पर जमकर प्रहार किए थे लेकिन सत्ता में आने के बाद जांच बेहद धीमी गति से चल रही है । दरअसल अगर हम देखें तो बीजेपी और कांग्रेस दोनों इस वक्त परसेप्शन की लड़ाई लड़ रही है । अगस्ता वेस्टलैंड हेलीकॉप्टर सौदे में घोटाले पर भी कोई ठोस जांच होगी इसमें संदेह है। बीजेपी भी चाहती है कि ये लंबा चलता रहे और उसको लगातार कांग्रेस पर आरोपों की बौछार करने का अवसर मिलता रहे । उधर इसी तरह के सौदे में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री और उनके बेटे पर कांग्रेस आप लगाती रही । इसी तरह से राबर्ट का मुद्दा भी बीजेपी के लिए मुफीद है । दरअसल पिछले दस साल के यूपीए के शासन काल में भ्रष्टाचार के इतने मामले सामने आए कि जनता कांग्रेस से जुडे किसी नेता या उसके रिश्तेदारों पर लगने वाले आरोपों को प्रथम दृष्टया सहीमान लेती है । निष्कर्षत; यह कहा जा सकता है कि आरोपों का ये खेल दरअसल कोई जुर्म साबित करने के लिए नहीं बल्कि अपने विरोधियों को जनता की नजरों से गिराने का खेल है । सोनिया गांधी भी इस खेल में कूदी थीं लेकिन उन्होंने सेल्फ गोल कर डाला


Saturday, December 12, 2015

सियासी संग्राम में GST की बलि !

नेशनल हेराल्ड केस और जीएसटी में यूं तो प्रत्यक्ष रूप से कोई तार जुड़ता नहीं है क्योंकि एक तो कोर्ट में चल रहा केस है तो दूसरा देश में आर्थिक सुधार के लिए सरकार का एक ऐसा कदम है जिसको संसद की मंजूरी चाहिए । लोकतंत्र में कानूनी मुकदमों और विधायी कार्य के बीच कोई रिश्ता होता नहीं है बल्कि संविधान इस बात को मजबूती से कहता है कि विधायिका और न्यायपालिका स्वतंत्र रूप से काम करते हैं । लेकिन नेशनल हेराल्ड में सोनिया गांधी और राहुल गांधी की व्यक्तिगत पेशी से छूट के बाद जिस तरह से कांग्रेस सांसद दोनों सदनों में आक्रामक हुए हैं उससे जीएसटी बिल पर संकट के बादल छा गए हैं । संसद में जारी हंगामे के बीच जीएसटी बिल पर पक्ष और विपक्ष के बीच दूसरे राउंड की बातचीत नहीं हो सकी है । कांग्रेस का आरोप है कि बीजेपी सुब्रह्ण्यम स्वामी के कंधे पर बंदूक रखकर सोनिया-राहुल पर निशाना साध रही है । नेशनल हेराल्ड केस में पैसों की हेराफेरी का आरोप लगाकर स्वामी ने सोनिया और राहुल को केंद्र में बीजेपी की सरकार के आने के पहले ही अदालत में खींचा था । काफी लंबे वक्त तक इस मामले की सुनवाई चली । इस बीच सोनिया, राहुल और अन्य कांग्रेसी नेताओं ने दिल्ली हाईकोर्ट में इस केस में व्यक्तिगत पेशी से छूट के लिए याचिका दायर की । इस याचिका को खारिज करते हुए अदालत ने सोनिया और राहुल को दिल्ली की पटियाला हाउस अदालत में पेश होने का आदेश दिया । इस आदेश के बाद शुरुआत में कांग्रेस नेताओं के बीच भ्रम की स्थिति दिखाई दी । पहले ये बात सामने आई कि हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की जाएगी लेकिन अदालत में सोनिया और राहुल ने साफ तौर पर कहा कि वो कोर्ट के सामने पेश होने के लिए तैयार हैं । अब उन्नीस दिसबंर को दोपहर तीन बजे सोनिया-राहुल दोपहर तीन बजे अदालत के सामने हाजिर होंगे । इस पूरे मामले को विस्तार से बताने का मकसद सिर्फ इतना है कि यह एक कानूनी प्रक्रिया है जिसके तहत सोनिया और राहुल को समन किया गया है । लेकिन कांग्रेस को इसमें राजनीति नजर आती है और वो सरकार पर राजनीतिक बदले की भावना का आरोप लगाते हुए संसद को ठप कर देती है । पार्टी के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद तो यहां तक कह देते हैं कि बीजेपी सरकार गांधी परिवार, बिमाचल के मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह, पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम शंकर सिंह वाघेला आदि को जानबूझकर फंसाने की कोशिश कर रही है । कोर्ट के फैसले पर संसद ठप करने की यह पहली घटना है इसके पहले भी ऐसा हुआ है लेकिन कोर्ट के फैसले पर कई अहम बिल के ठप हो जाने की यह संभवत: पहली घटना हो सकती है । जीएसटी ही नहीं बल्कि कई और अहम बिल हैं जिनको संसद की मंजूरी चाहिए जिनमें रियलिटी सेक्टर में सुधार का बिल इस सेक्टर में आई मंदी को दूर करने के लिए बेहद अहम है ।  
जीएसटी पर सरकार और कांग्रेस के बीच बेहतर तालमेल की संभवना बन रही थी और उम्मीद की जा रही थी कि इस सत्र में ये बि पास हो जाएगा । सरकार की तरफ से बनाई गई विशेषज्ञों के पैनल ने सत्रह अठारह फीसदी की स्टैंडर्ड जीएसटी रेट की सिफारिश कर दी थी । इसके अलावा इस पैनल ने सर्विसेज की सप्लाई पर एक फीसदी के अतिरिक्त टैक्स को भी खत्म करने का सुझाव दिया था । ये दोनों कांग्रेस की मांग थी लेकिन कोर्ट के फैसले के बाद चेन्नई से राहुल गांधी ने साफ संदेश दे दिया कि वो सरकार पर दबाव बनाने की रणनीति पर काम करेंगे । राहुल ने कहा कि सरकार सोचती है कि वो बदले की राजनीति से उनका मुंह बंदकर देगी लेकिन ऐसा होगा नहीं । उन्होंने जोर देकर कहा कि वो सरकार पर दबाव बनाते रहेंगे और अपना काम करते रहेंगे । राहुल के इस बयान से साफ है कि वो किस तरह का दबाव सरकार पर बनाते रहेंगे । लेकिन ये बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि कांग्रेस ने देश की न्यायिक प्रक्रिया को संसद की कार्यवाही से जोड़ दिया है । जिसका असर आर्थिक सुधारों पर पड़ना तय है । जीएसटी बिल पर आए संकट के मद्दनदर मंगलवार को सेंसेक्स में करीब सवा दो सौ प्लाइंट की गिरावट दर्ज की गई जो पिछले तीन महीनों का निम्नतम स्तर रहा । शेयर बाजार में ये गिरावट लास्ट ट्रेडिंग सेशन में दर्ज की गई । आर्थिक मामलों के जानकारों का कहना है कि संसद में नेशनल हेराल्ड मसले पर जारी हो हल्ले के बीच बाजार में निगेटिव सेंटिमेंट चला गया । इसका असर रुपए की कीमत पर भी देखने को मिला और वो भी करीब ग्यारह पैसे टूटकर दो साल के निम्नतम स्तर पर जा पहुंचा । यह बात समझ से परे हैं कि कांग्रेस संसद को ठप अर्थव्यवस्था को क्या संकेत देना चाहती है । सोनिया गांधी ने संसद भवन के परिसर में संवाददातओं से कहा कि उनको किसी से डर नहीं लगता है क्योंकि वो इंदिरा गांधी की बहू हैं । सोनिया गांधी के इस बयान से साफ है कि कांग्रेस इस पूरे मसले को राजनीतिक तौर पर भुनाना चाहती है । इमरजेंसी के बाद जब इंदिरा गांधी को गिरफ्तार किया गया था तो कांग्रेसियों को उसको एक पॉलिटिकल इवेंट बना दिया था । जब जब इंदिरा गांधी शाह कमीशन के सामने पेश होती थी तब तब कांग्रेस के नेता देश को यह संदेश देते थे कि जनता पार्टी की सरकार बदले की भावना से काम कर रही है । इसी तरह से सोनिया ने जब एलान कि उनको डर नहीं लगता तो एक एक करके कांग्रेस के तमाम दिग्गजों ने मंगलवार को प्रेस कांफ्रेंस की और सरकार पर बदले की राजनीति का आरोप जड़ा । यह बहुत मशहूर कहावत है कि हिस्ट्री रिपीट इटसेल्फ और कांग्रेस को लगता है कि इतिहास खुद को दोहराने वाला है । पर कांग्रेस एक और कहावत भूल गई है कि राजनीति में काठ की हांडी बार बार नहीं चढ़ती ।

Sunday, January 18, 2015

ड्रामेटिक जीवन, ड्रामेटिक विरोध

स्पेनिश लेखक जेवियर मोरो की सोनिया गांधी की फिक्शनलाइज्ड जीवनी कई सालों के अघोषित प्रतिबंध के बाद अब प्रकाशित हुई है । द रेड साड़ी के नाम की इस किताब के प्रकाशन को लेकर कांग्रेस ने खूब हो हल्ला मचाया था । लेखक जेवियर मोरो को कानूनी धमकियां दी गई थी । कांग्रेस उस वक्त सत्ता में थी लिहाजा सोनिया गांधी की इस किताब को हमारे यहां प्रकाशित नहीं होने दिया गया । लगभग चार साल बाद अब स्थितियां बदल गई हैं । कांग्रेस सत्ता से बाहर है और जेवियर मोरो की किताब द रेड साड़ी को लेकर बवाल मचानेवाले कांग्रेस के नेता भी कमजोर हुए हैं । सवाल यह नहीं है कि कांग्रेस के नेता क्यों विरोध कर रहे थे । सवाल यह है कि अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर हो हल्ला मचानेवाली ब्रिगेड उस वक्त कहां थी । तमिल लेखक मुरुगन की किताब पर विरोध करनेवाले, वेंडी डोनिगर की किताब के प्रकाशक का उसको वापस लेने का फैसला करने पर छाती कूटनेवाले लोग उस वक्त कहां थे जब जेवियर मोरी की किताब को डरा धमका कर प्रकाशित होने से रोका गया था । सत्ता की हनक में तब भी अभिव्यक्ति की आजादी पर पाबंदी लगी थी । लेकिन विरोध का स्वर उतना तीव्र नहीं था जितने की अपेक्षा की जाती है । अभिव्यक्ति की आजादी की पक्षपातपूर्ण विरोध की यह घटना मिसाल है । अभी हाल में लेखक जेवियर मोरे ने माना है कि कांग्रेस पार्टी ने उसके किताब के खिलाफ एक अभियान चलाकर उसका प्रकाशन रोका गया था । उनके मुताबिक उस वक्त तो वो छह महीने तक अपने ईमेल अकाऊंट को खोलने से भी घबराते थे कि कहीं कोई कानूनी नोटिस तो नहीं आ रहा है । दो हजार दस में जेवियर मोरो इसको अंग्रेजी में प्रकाशित कर भारतीय बाजार के अलावा अन्य यूरोपीय देशों और अमेरिका के बाजार में सोनिया गांधी के नाम को भुनाना चाहते थे । जेवियर मोरो की यह किताब अक्तूबर दो हजार आठ में स्पेनिश में छपी और बाद में इसका अनुवाद इटैलियन, फ्रैंच और डच में किया गया । भारत में उठे विवाद के पहले के अनुमान के मुताबिक इसकी तीन लाख प्रतिया बिक चुकी थी । 
 दरअसल स्पेनिश लेखक जेवियर मोरो की ये किताब कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष सोनिया गांधी के जीवन पर आधारित है । लेखक मोरो का दावा है कि यह पूरी किताब सोनिया के बचपन से लेकर उनकी राजीव गांधी से मुलाकात और शादी से लेकर सास इंदिरा गांधी के साथ बिताए दिनों के अलावा राजीव गांधी की हत्या का बाद सोनिया की मानसिकता का चित्रण करती है । दरअसल मोरो की इस किताब से इस बात के संकेत मिलते हैं कि सोनिया गांधी अपने पति की हत्या के बाद भारत छोड़कर इटली जाना चाहती थी । मोरो की किताब में इस तरह के संकेत हैं कि सोनिया गांधी के दिमाग में यह बात आई थी कि उस देश में क्यों रहना जो अपने ही बच्चों को खा जाता है । इस किताब में इस बात की ओर भी पर्याप्त इशारा किया गया है कि गांधी परिवार में राजीव की मौत के बाद इटली वापस लौट जाने पर चर्चा होती थी । हलांकि कई प्रसंगों में साफ है कि लेखक ने सोनिया गांधी की जिंदगी के यथार्थवादी पहलुओं में अपनी कल्पना का तड़का लगाया है । जैसे एक जगह इस बात का जिक्र है कि रात के तीन बजे सोनिया ने राजीव को कहा कि देश में इमरजेंसी लगाने के ड्राफ्ट में उन्होंने इंदिरा गांधी की मदद की थी ।  मोरो लिखते हैं- सोनिया के पैदा होने पर लुजियाना के घरों में परंपरा के अनुसार गुलाबी रिबन बांधे गए । चर्च ने सोनिया को नाम दिया एडविजे एनटोनियो अलबिना मैनो । लेकिन उनके पिता स्टीफैनो ने उन्हें सोनिया नाम दिया । रूसी नाम रखकर वो उन रूसी परिवारों का शुक्रिया अदा करना चाहते थे जिन्होंने द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान उनकी जान बचाई थी । सोनिया के पिता स्टीफैनो, मुसोलिनी की सेना में थे जो रूसी सेना से पराजित हो गई थी । सोनिया जियोवेनो के कॉन्वेंट स्कूल में गई लेकिन उतनी ही पढाई की  जितनी की जरूरत थी । यानि वो अच्छी विद्यार्थी नहीं थी लेकिन पढ़ाई में कमजोर होने के बावजूद वो हंसमुख और दूसरों की मदद को तत्पर रहती थी । कफ और अस्थमा की शिकायत की वजह से वो बोर्डिंग स्कूल में अकेले सोती थी । आगे जाकर तूरीन में पढ़ाई के दौरान सोनिया के मन में एयर होस्टेस बनने का अरमान भी जगा था ले किन वो सपना जल्द ही बदल गया । उसके बाद सोनिया विदेशी भाषा की शिक्षक या फिर संयुक्त राष्ट्र में अनुवादक बनने की ख्वाहिश पालने लगी ।
लेखक मोरो का दावा है कि उसकी किताब लंबे समय तक किए गए शोध पर आधारित है । जेवियर मोरो का दावा है कि तथ्यों और घटनाओं की सत्यता को परखने के लिए उन्होंने सोनिया के होम टाउन लुजियाना में काफी वक्त बिताया । उसका तो यह भी दावा है कि उसवे किताब छपने के पहले उसकी पांडुलिपि सोनिया गांधी की बहन नाडिया को भी दिखाई थी क्योंकि वो स्पैनिश जानती थी । कांग्रेस नेताओं की आपत्तियों और लेखक को कानूनी नोटिस के हो हल्ले के बीच जेवियर मोरो की किताब सोनिया और उसके इर्द गिर्द के विवादों और घटनाओं में सिमटकर रह गई। जबकि इस किताब में इस वक्त केंद्र सरकार में मंत्री और सोनिया की देवरानी मेनका गांधी के बारे में ज्यादा विस्फोटक प्रसंग छपे हैं, जो घटनाओं के चश्मदीदों के बयानों पर आधारित होने की वजह से ज्यादा प्रामाणिक प्रतीत होते हैं । बेटे संजय गांधी की जिद की वजह से तेइस सितंबर उन्नीस सौ चौहत्तर को गांधी के पारिवारिक मित्र मोहम्मद युनुस के घर पर संजय और मेनका परिणय सूत्र में बंध गए । यहां पर जेवियर मोरो ने इस बात के संकेत दिए हैं कि मेनका को गांधी परिवनार में एडजस्ट करने में सोनिया से ज्यादा दिक्कत हुई ।
एक और बेहद ही दिलचस्प वाकया इस किताब में है । एक बार मशहूर लेखक खुशवंत सिंह जब गांधी परिवार से मिलने उनके घर गए तो वहां कुत्तों के बीच जबरदस्त झगड़ा चल रहा था । किताब के मुताबिक मेनका के आइरिश वुल्फहाउंड और सोनिया के शांत से अफगानी कुत्ते के बीच लड़ाई चल रही थी । सोनिया दोनों को अलग करना चाह रही थी लेकिन मेनका इस झगड़े से मजा ले रही थी क्योंकि उसे मालूम था कि उसका कुत्ता सोनिया के कुत्ते से मजबूत था । लेखक ने इंदिरा गांधी की सचिव उषा के हवाले से लिखा है कि मेनका बेहद ही बुद्धिमती लेकिन महात्वाकांक्षी थी । उसे हर वक्त यह लगता था कि जल्द ही संजय गांधी भारत के प्रधानमंत्री बनेंगे, और वो गाहे बगाहे इस बात तो सार्वजनिक रूप से कहती भी थी । लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था । सतहत्तर में कांग्रेस की कारी हार के बाद जब संजय गांधी की एक विमान दुर्घटना में मौत हो गई तो इंदिरा गांधी मेनका को लेकर बेहद चिंतित रहने लगी । उन्होंने अपनी दोस्त पुपुल जयकर से अपनी चिंता जताते हुए कहा भी था कि मेनका की मां की महात्वाकांक्षा उसको संजय की जगह लेने के लिए प्रेरित करेगी । इस सोच को बल मिला खुशवंत सिंह के एक लेख से जिसमें उन्होंने खुलेआम इस बात की वकालत की थी कि संजय की मौत के उनकी राजनीतिक वारिस मेनका हैं । खुशवंत सिंह ने यह भी लिखा कि मेनका संजय गांधी की तरह बहादुर हैं और दुर्गा की अवतार हैं । जाहिर है खुशवंत सिंह के इस लेख से इंदिरा गांधी आहत हुई क्योंकि बांग्लादेश युद्द में विजय के बाद इंदिरा गांधी की तुलना दुर्गा से होने लगी थी । खुशवंत की इस तुलना से इंदिरा गांधी के मन में इस बात का संदेह पैदा हो गया कि मेनका की रजामंदी के बाद ही खुशवंत ने वो लेख लिखा । मेनका गांधी को घर वापस निकालने  के इंदिका गांधी के फैसले पर भी यह किताब प्रकाश डालती हैं । घर से बाहर निकालने के वक्त हुए हाई वोल्टेज ड्रामा पर भी मोरो ने विस्तार से लिखा है ।
ये सारी बातें लिखते हुए मोरो ने किताब में एक डिस्क्लेमर भी लगाया है - बातचीत, संवाद और स्थितियां लेखक के व्याख्या पर आधारित है और यह जरूरी नहीं है कि वो प्रामाणिक भी हो । इस पूरे विवाद पर जैसे अभिव्यक्ति की आजादी के झंडाबरदारों पर सवाल खड़े होते हैं उसी तरह लेखक की मंशा पर भी सवालिया निशान लगता है । सवाल वही कि क्या लेखकीय आजादी के नाम पर कुछ भी काल्पनिक लिखने की इजाजत किसी लेखक को दी जा सकती है । इन्हीं सवालों के बीच अब सोनिया की यह जीवनी भारतीय पाठकों के लिए उपलब्ध है । राजनीति और राजनेताओं की किताबों की खासी बिक्री के बीच इस बात पर सबकी नजर रहेगी कि सोनिया गांधी की इस काल्पनिक जीवनी को हमारे देश का पाठक कैसे लेता है ।