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Saturday, December 30, 2023

शिवपूजन सहाय का हिंदू मन


हाल ही में कांग्रेस पार्टी ने अपने पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी की भारत न्याय यात्रा की घोषणा की है। ये यात्रा मणिपुर से आरंभ होकर मुंबई तक जाएगी। इसके पहले भी राहुल गांधी ने कन्याकुमारी से कश्मीर तक की भारत जोड़ो यात्रा की थी। उस यात्रा का उद्देश्य भारत के विभिन्न समुदायों के बीच फैल रही वैमनस्यता को कम करना था। हिंदू मुसलमान एकता की बात की गई थी। उस यात्रा के समय कांग्रेस और वामपंथी इकोसिस्टम की तरफ से इस तरह का विमर्श स्थापित करने का प्रयास किया गया था कि देश में हिंदू और मुसलमानों के बीच मतभेद की खाई लगातार चौड़ी हो रही है। इन तथाकथित बुद्धिजीवियों ने बढ़चढ़कर दावा किया था नरेन्द्र मोदी, उनकी पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लोग हिंदू मुसलमान के बीच विभाजन को गाढ़ा करवाकर अपनी राजनीति चमका रहे हैं। ऐसा करके वो सायास मुसलमानों को मन में भय का वातावरण बनाने और हिंदुओं को बरगलाने का काम कर रहे थे। कांग्रेसी-वामपंथी इकोसिस्टम से जुड़े लोग पहली बार इस तरह का कार्य कर रहे हों ऐसा नहीं है। स्वाधीनता के बाद से ही इस इकोसिस्टम के लोग साहित्य, कला,संस्कृति और इतिहास लेखन से इस तरह का वातावरण बनाते रहे हैं। साहित्य में तो इस तरह का कार्य धड़ल्ले से हुआ। रामचंद्र शुक्ल हों या प्रेमचंद या निराला, उनके हिंदू जीवन और हिंदू प्रेम पर लिखी रचनाओं को ओझल कर उन सबको जबरदस्ती वामपंथी दिखाने का प्रयास किया गया। जबतक कांग्रेस पार्टी की सरकारें रहीं तो इस इकोसिस्टम को सरकारी संरक्षण मिलता रहा। संस्थाओं पर इनके लोग ही रखे जाते रहे और बदले में वो इस तरह के विमर्श को गाढ़ा करते रहे। तथ्यों की अनदेखी करके लेखन करवाते रहे। जिन भी साहित्यकारों और लेखकों ने हिंदू-मुसलमान संबंधों पर खुलकर लिखा या जिन्होंने राम या अन्य हिंदू देवी-देवताओं का उल्लेख किया, उन लेखों या रचनाओं को ओझल करने का खेल खेला गया। 

बिहार के एक बहुत ही महत्वपूर्ण रचनाकार हुए शिवपूजन सहाय। शिवपूजन बाबू ने विपुल लेखन किया, पत्रिकाओं का संपादन किया लेकिन उनके कृतित्व को हिंदी साहित्य में वो स्थान नहीं मिला जिसके वो अधिकारी हैं। कांग्रेस-वामपंथी इकोसिस्टम से जुड़े आलोचक अगर शिवपूजन सहाय की रचनाओं पर समग्रता में विचार करते तो सच सामने आता। शिवपूजन सहाय का साहित्य समग्र भी उनके पुत्र मंगलमूर्ति के प्रयत्नों से उनके ही संपादन में प्रकाशित हो पाया। शिवपूजन सहाय परम रामभक्त थे। वो अपनी डायरी में सैकड़ों जगह राम, रामकृपा और भगवान की इच्छा जैसी बातें लिखते हैं लेकिन उनके इस लेखन के बारे में बहुत ही कम चर्चा की गई। देश के विभाजन से लेकर चीन युद्ध तक शिवपूजन सहाय ने बेहद कठोर टिप्पणियां कीं। उन्होंने नेहरू से लेकर उनके मंत्री कृष्ण मेनन तक की आलोचना की। लेकिन नेहरू की विराट छवि बनाने में लगे कांग्रेस-वामपंथी इकोसिस्टम ने इन टिप्पणियों को दबा दिया। हमारे देश में सांप्रदायिकता को लेकर भी सहाय की टिप्पणियों को देखने की आवश्यकता है। 22 फरवरी 1946 को शिवपूजन सहाय ने अपनी डायरी में लिखा- आज संध्या समय द्विज जी आए। औरंगाबाद (गया) के मुसलमान भाइयों ने पहले से तैयारी कर रखी थी और जानबूझकर अचानक अकारण सरस्वतीपूजा के मूर्ति विसर्जन के जुलूस पर आक्रमण कर दिया तथा एक निरपराध युवक की तत्काल हत्या कर डाली। यह नृशंसता उनलोगों में प्राय: देखी जाती है। स्वाभाविक है। मांसाहारी विषय विलासी, भ्रष्टाचारी, प्राय: क्रोधी और क्रूर होते हैं। इस वाक्य के दो शब्दों, अचानक और अकारण पर विचार किया जाना चाहिए। शिवपूजन सहाय की इस टिप्पणी से 1946 में बिहार के सामाजिक जीवन में व्याप्त स्थिति का संकेत मिलता है। एक साहित्यकार का आक्रोश भी उसके शब्दों में अभिव्यक्ति पाता है। उनकी ये टिप्पणी शिवपूजन सहाय साहित्य समग्र में संकलित है। 

हमारा देश अगस्त 1947 में स्वाधीन होता है। कई क्षेत्रों में हिंसा आरंभ हो जाती है। शिवपूजन सहाय साहित्य दर्पण में सितंबर 1947 में प्रश्न उठाते हैं, पंजाब के हिंदुओं और सिक्खों की की दुर्दशा ईश्वरेच्छानुसार है? मनुष्य क्यों कभी घोर संकट में पड़ता है? उनका मन इतना व्यथित है कि वो आगे कहते हैं कि जिन्ना कंस है या रावण? वह नादिरशाह का नाती है या चंगेज खां का चचा है? हिंदू-मुस्लिम एकता तबतक संभव नहीं है जबतक हिंदू संगठन दृढ़ नहीं होता। हिंदुओं में जातिपांति न रहे, स्वच्छता ही रहे। यहां ध्यान देने की आवश्यकता है कि उस समय शिवपूजन सहाय हिंदुओं के संगठित होने की बात कर रहे थे। इसी दिन आगे लिखते हैं कि जात-पांत और छुआछूत का भूत हिंदू को आज चबा रहा है। हिंदू धर्म उदार कहलाता है। मूर्खता से उदारता को चांप रखा है। राम की जैसी इच्छा। स्वाधीनता के तुरंत बाद भी संवेदनशील माने जानेवाले साहित्यकार भी ऐसा ही सोचते थे। यह अकारण नहीं है कि कांग्रेस-वामपंथी इकोसिस्टम के लोग शिवपूजन सहाय जैसे साहित्यकारों की वेदना पर चर्चा नहीं करते। आज एक बार फिर से हिंदुओं को जातियों के बीच बांटने का प्रयास राजनीति और समाज के एक वर्ग द्वारा की जा रही है। आज भी जब देश विभाजन की चर्चा होती है तो शिवपूजन बाबू के लिखे का स्मरण देखने को नहीं मिलता। शिवपूजन सहाय ने निरंतर लिखा। अक्तूबर 1953 में उन्होंने लिखा, मुसलमानों ने देश को बांटा और अब प्रांत-प्रांत, जिले-जिले, मुहल्ले-मुहल्ले को बांटकर असंख्य पाकिस्तान बना डालना चाहते हैं। उर्दू को वो क्षेत्रीय भाषा बनाने का घोर आंदोलन कर रहे हैं। अब भी इस तरह की प्रवृत्ति देखने को मिलती ही रहती है। 

इस तिथि को ही वो आगे लिखते हैं शकों और हूणों को हिंदू पचा गए, पर मुसलमान ही उनकी अंतड़ी के मक्खी बन गए। हिंदुओं में अघोर पंथ भी है पर हिंदू अपनी धार्मिक शक्ति नहीं पहचानते। मुसलमान अब पच नहीं सकते। मुसलमानों भाइयों को अब अपने में मिला लेने की शक्ति अब हममें नहीं रही। यहां पर शिवपूजन सहाय की विवशता साफ तौर पर दृष्टिगोटर होती है। वो हिंदुओं के अपनी धार्मिक शक्ति नहीं पहचानने को लेकर भी चिंतित थे। उस वक्त मुसलमानों के व्यवहार से वो बेहद खिन्न थे और निरंतर लिख रहे थे। शिवपूजन सहाय ने शेख अब्दुल्ला को देशद्रोही तक कहा था। जब शेख अब्दुल्ला के समर्थन में बिहार के मुसलमान चंदा जमा कर रहे थे तो सहाय ने चिंता जताई थी। शिवपूजन सहाय साहित्य समग्र खंड 7 में अगस्त 1958 में उन्होंने हिंदुओं को अपने धर्म से प्रेम नहीं करने के लिए धिक्कारा भी था, हिंदुओं में धर्म या अपनी भाषा तथा संस्कृति के लिए वैसी ममता नहीं है जैसी मुसलमानों और ईसाइयों में । हिंदुओं में आपसी फूट बहुत है। हिंदू युवकों में भी वह स्पिरिट या भावना नहीं है जो ईसाई और मुसलमान युवकों में है। उन लोगों के पादरी और फकीर भी सचेत हैं। शिवपूजन सहाय की टिप्पणियों से ऐसा प्रतीत होता है कि वो चाहते थे कि हिंदू समाज संगठित हो। जात-पांत से ऊपर उठकर सभी हिंदू अपने देश की उन्नति और राष्ट्र को शक्ति देने के बारे में प्रयत्न करे। आज अगर कोई दल या व्यक्ति इस तरह की बात करें तो कांग्रेसी-वामपंथी इकोसिस्टम के लोग उनको संघी, सांप्रदायिक और न जाने किस किस तरह के विशेषणों से जोड़ देते हैं। आज इस तरह की बातें तो छोड़िए अगर कोई अयोध्या के राम मंदिर के बारे में अधिक बातें करने लगे, काशी विश्वनाथ मंदिर पर शोध करने लगे या मथुरा के श्रीकृष्ण जन्म स्थान पर विमर्श आरंभ करे तो उसको भी इकोसिस्टम वाले सांप्रदायिक और देश को तोड़नेवाले विचार-वाहक के तौर पर चिन्हित करने में जुट जाएंगे। आज आवश्यकता है भारत खोजो यात्रा की। उस भारत को जहां हमारी ज्ञान-परंपरा है और जिसे कांग्रेसी-वामपंथी इकोसिस्टम ने ओझल कर रखा है। 

Saturday, May 20, 2023

मेरा दर्शक-तेरा दर्शक का खतरनाक खेल


जिस दिन फिल्म ‘द केरल स्टोरी’ प्रदर्शित हुई उसी दिन एक और फिल्म का प्रदर्शन हुआ, जिसका नाम है ‘अफवाह’ । एक तरफ द केरल स्टोरी में कोई चमकता सितारा नहीं है वहीं दूसरी तरफ अफवाह फिल्म में नवाजुद्दीन सिद्दिकि और भूमि पेडणेकर जैसे सितारों ने काम किया है। फिल्म अफवाह को सुधीर मिश्रा ने निर्देशित किया है। ‘द केरल स्टोरी’ न केवल चर्चित हुई, हो रही है, बल्कि सुदीप्तो सेन निर्देशित इस फिल्म ने बंपर कारोबार भी किया। फिल्म ‘अफवाह’ को पालिटिकल थ्रिलर बताया गया लेकिन इस फिल्म की न तो चर्चा हो पाई और न ही इसने औसत कारोबार किया। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार इस फिल्म ने पहले सप्ताह में करीब तीस लाख का कारोबार किया। कुछ ट्विटरवीरों ने इस फिल्म के पक्ष में माहौल बनाने का प्रयास किया लेकिन हवा बन नहीं पाई। फिल्म फ्लाप हो गई। इस पृष्ठभूमि को बताने का आशय ये नहीं है कि किस फिल्म ने कितना बिजनेस किया। इसको बताने का उद्देश्य ये है कि फिल्म अफवाह के निर्देशक सुधीर मिश्रा ने एक ट्वीट किया जिसके निहितार्थ बेहद गंभीर हैं। इस ट्वीट में सुधीर ने लिखा, द कश्मीर फाइल्स के बारे में लिबरल्स को शिकायत रहती है। क्यों? विवेक अग्निहोत्री ने एक फिल्म बनाई और उसके दर्शक इस फिल्म को देखने के लिए थिएटर में आए। लेकिन जब हम फिल्म बनाते हैं तो हमारे दर्शक, जो विवेक की आलोचना करते हैं, चुपचाप बैठे रहते हैं। वो फिल्म देखने के लिए सिनेमा हाल नहीं पहुंचते हैं। क्षमा करें, मुझे ये कहना पड़ा। फिर उन्होंने हैशटैग लगाकर अपनी फिल्म का नाम अफवाह लिखा।

सुधीर मिश्रा के इस ट्वीट पर ‘द कश्मीर फाइल्स’ के निर्देशक विवेक अग्निहोत्री ने उत्तर दिया। लिबरल का अर्थ जानना चाहा। सुधीर मिश्रा को चर्चा के लिए आमंत्रित किया। दोनों के बीच चर्चा भी हुई। सुधीर ने अपना पक्ष रखा और विवेक का अपना पक्ष था। हम यहां उस चर्चा के बिंदुओं पर नहीं जाएंगे। सुधीर ने अपने ट्वीट में जो लिखा उसके पीछे की मानसिकता को डिकोड करने का प्रयास करेंगे। सुधीर ने लिखा कि विवेक के दर्शक और हमारे दर्शक। सुधीर की छवि एक संजीदा फिल्मकार की है । जाने किस मानसिकता में उन्होंने हिंदी फिल्मों के दर्शकों का बंटवारा कर दिया। दर्शकों को बांटने की बात सार्वजनिक रूप से कहकर सुधीर ने एक विभाजक रेखा खींच दी। इस विभाजन की बात बहुत दूर तक जाएगी और इसके खतरनाक परिणाम भी हो सकते हैं। अगर निर्देशकों का अपना दर्शक वर्ग होने लगा तो फिल्म उद्योग संकट में फंस सकता है। हिंदी फिल्म जगत जिसको बालीवुड के नाम से भी जाना जाता है, पहले से ही कई खेमों में बंटा हुआ है। बावजूद इसके दर्शकों को लेकर कभी भी बंटवारे की बात नहीं होती थी। यह विभाजन हिंदी फिल्म जगत के लिए ठीक नहीं है। अभी तक ऐसा कोई संदर्भ या प्रसंग नहीं आया जिसमें किसी गंभीर फिल्मकार ने अपने और दूसरे के दर्शक की बात की हो। सुधीर ने ऐसा क्यों किया। क्या उनकी फिल्मों के लगातार फ्लाप होने की कुंठा से ये शब्द उपजे या कारण कुछ और है। अगर हम देखें तो सुधीर की पिछली कई फिल्में अच्छा बिजनेस नहीं कर पाई हैं। वो लाख कहें कि वो सौ करोड़, दो सौ करोड़ कमाने की होड़ में नहीं हैं लेकिन फिल्म अपनि लागत वसूल सके, इतना तो चाहते ही होंगे। संभव है कि उनको लगता हो कि वो जिस विचारधारा के अनुयायी हैं उस विचारधारा को माननेवाले लोग उनकी फिल्में देखने क्यों नहीं आते हैं। ये बात इस वजह से कह रहा हूं कि उन्होंने विवेक से बातचीत के क्रम में ये स्वीकार किया कि वो लेफ्टिस्ट हैं। उनकी फिल्मों में सर्वहारा की जीत होती है। उनकी फिल्मों का अंत सुखांत नहीं होता है। उनकी फिल्में कई असुविधाजनक सवाल खड़े करती हैं। आदि आदि। यदि ऐसा है तो सुधीर को अभी वामपंथियों को समझना शेष है।

सुधीर के तथाकथित दर्शक अगर उनकी फिल्म देखने के लिए नहीं आते हैं। सुधीर को इस बात की तकलीफ है। क्या ये माना जाए कि सुधीर मिश्रा सिर्फ अपने वैचारिक मित्रों के लिए ही फिल्में बनाते रहे हैं। समाज और फिल्मों से प्रश्न खड़े करने और दर्शकों से संवाद के दावे खोखले हैं। क्या उनकी फिल्मों में वामपंथ का एजेंडा या उस विचारधारा का प्रोपेगैंडा होता रहा है। सुधीर को ये बातें स्पष्ट करनी चाहिए। फिल्म जगत में वामपंथियों का एजेंडा किस तरह से चलता रहा है,किस प्रकार से हिंदी फिल्मों की दुनिया में में रूसियों के सहयोग से वामपंथियों ने अपना ईकोसिस्टम तैयार किया। उसके बारे में पिछले सप्ताह इस स्तंभ में चर्चा की गई थी। सुधीर की टिप्पणी से उस चर्चा को बल मिलता है। सुधीर ने विवेक अग्निहोत्री से बातचीत में ये भी कहा कि अब फिल्म उद्योग के लोग चुप हो गए हैं। शायद वो भूल गए कि उनके इर्दगिर्द जिन फिल्म निर्देशकों को देखा जाता है या जिनके साथ उनकी तस्वीरें इंटरनेट मीडिया पर आती हैं वो मुखरता से न सिर्फ अपनी बातें कहते हैं बल्कि कई बार तो सार्वजनिक मंचों पर गाली गलौच की भाषा का भी उपयोग करते हैं। दिल्ली के शाहीन बाग में नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में धरने में शामिल होकर बिरयानी खाते हुए नारे लगाते भी देखे जाते हैं। सुधीर अपने मित्रों की भाषा तो नहीं बोलते हैं लेकिन उनके मन में क्या चलता है ये उनकी टिप्पणी से पता चलता है। विवेक से बातचीत में वो कहते हैं कि इन दिनों लोग चुप हो गए हैं। दबी जुबान में भय के माहौल की चर्चा भी करते हैं। फिल्म इंडस्ट्री में कई सितारों ने पहले भी भय की चर्चा की थी। उनमें से एक शाह रुख खान की फिल्म पठान ने बंपर बिजनेस किया। तब तो किसी ने तुम्हारा दर्शक और मेरा दर्शक का प्रश्न नहीं उठाया। दरअसल जो लेफ्ट की विचारधारा में आस्था रखते हैं वो लगातार अर्धसत्य के साथ चलते रहते हैं। सुधीर भी इस दोष के शिकार हो गए प्रतीत होते हैं। 

वामपंथी लगातार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात करते हैं। अवसर मिलने पर आक्रामक होकर अपनी बात ऱखना और नारे लगाना उनका शौक है। उनके नारे, उनकी आक्रामकता सब खोखले हैं। अपनी विचारधारा को प्रभावी बनाने के लिए वो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उपयोग करते हैं। कई बार जब उनकी विचारधारा से जुड़े लोग कुछ ऐसा कर जाते हैं जो उनके विचारों के विपरीत होता है तो वहां उनको अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की चिंता नहीं सताती है। अभी कुछ दिनों पहले एक फिल्म आई थी। गांधी और गोडसे, एक युद्ध। ये फिल्म हिंदी के वरिष्ठ लेखक और जनवादी लेखक संघ के अध्यक्ष असगर वजाहत के नाटक गोडसे@गांधी.काम पर आधारित था। असगर वजाहत पर आरोप लगे कि उन्होंने इस फिल्म में गोडसे को गांधी के समकक्ष खड़ा कर दिया। गांधी के परिवार के तुषार गांधी भी इस विवाद में कूदे थे। हिंदी साहित्य जगत में इस बात की खूब चर्चा रही कि जनवादी लेखक संघ का एक धड़ा असगर वजाहत को संगठन के अध्यक्ष पद से हटाना चाहता है। हिंदी साहित्य की इस चर्चा को मानें तो प्रश्न उठता है कि वामपंथी लेखकों के इस संगठन, जनवादी लेखक संघ, को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार की कितनी चिंता थी। उनके संगठन के अध्यक्ष ने एक नाटक लिखा, उस नाटक में उन्होंने गांधी के विचारों के आधार पर एक काल्पनिक परिदृष्य गढ़ा, जिसपर फिल्म बनी। ये उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता थी। चूंकि असगर वजाहत के विचार उनके संगठन के विचारों से अलग थे लिहाज उनके विरुद्ध एक माहौल बनाया गया। आवश्यकता इस बात की है फिल्म के दर्शक सुधीर की टिप्पणी के निहितार्थों को समझें और अपने विवेक से निर्णय लें।       

Saturday, May 15, 2021

कमल हासन की हार से निकलते संदेश


इस महीने के आरंभ में कई राज्यों के विधानसभाओं के चुनाव नतीजे आए और इसके साथ ही उन राज्यों के चुनाव संपन्न हो गए। पश्चिम बंगाल चुनाव के परिणामों के शोरगुल में तमिलनाडु विधासभा चुनाव  की एक महत्वपूर्ण खबर की अपेक्षित चर्चा नहीं हो पाई। तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में मशहूर अभिनेता कमल हासन और उनकी पार्टी दोनों हार गई। कमल हासन ने दो हजार अठारह में मक्कल निधि मायय्म नाम से एक पार्टी बनाई थी और उसके बैनर तले दो हजार उन्नीस का लोकसभा चुनाव भी लड़ा था। उस चुनाव में भी उनकी पार्टी का खाता नहीं खुल पाया था। कुछ चुनावी विशेषज्ञों और वामपंथी उदारवादी राजनीतिज्ञों को इसकी उम्मीद थी कि कमल हासन और उनकी पार्टी विधानसभा चुनाव में बेहतर करेगी। कम से कम इस बात का अंदाज तो था ही कि कमल हासन की पार्टी तमिलनाडु विधानसभा चुनाव को त्रिकोणीय कर देगी। पर ऐसा हो नहीं सका। जब तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के परिणाम आए तो कमल हासन कोयंबटूर दक्षिण सीट से भारतीय जनता पार्टी महिला मोर्चा की अध्यक्षा वनाथी श्रीनिवासन से पराजित हो गए। चुनाव प्रचार के दौरान कमल हासन ने वनाथी को छोटा राजनेता कहकर उनका मजाक भी उड़ाया था। तब वनाथी ने पलटवार करते हुए उनको ‘लिप सर्विस’ करनेवाला राजनेता बताया था। इस चुनाव के दौरान एक और दिलचस्प घटना घटी थी। प्रचार के दौरान कमल हासन के पैर में चोट लग गई थी, जब वनाथी को पता चला तो उन्होंने कमल हासन को फलों की एक टोकी भेजी और साथ में जल्द स्वस्थ होने की कामना का एक कार्ड भी। जब पत्रकारों ने उनसे इस बारे में सवाल किया था तब वनाथी ने कहा था कि कोयंबटूर वाले अपने मेहमानों का खास ख्याल रखते हैं और उन्होंने इस परंपरा को निभाया है। कहना न होगा कि कमल हासन को ‘मेहमान’ बताकर वनाथी ने मतदाताओं को ये संदेश दे दिया था कि हासन कोयंबटूर में बाहरी हैं। परिणाम सबके सामने है। 

कमल हासन की हार को इस वजह से भी रेखांकित किया जाना आवश्यक है कि वो भारतीय जनता पार्टी की प्रत्याशी से हारे, उनको कांग्रेस के प्रत्याशी से हार नहीं मिली। कांग्रेस का तमिलनाडु में द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) से चुनावी गठबंधन था और इस बार पूरे राज्य में डीएमके की लोकप्रियता अन्य दलों से अधिक थी। चुनाव परिणामों में ये दिखा भी। कमल हासन का पराजित होना एक विधानसभा चुनाव का परिणाम नहीं है बल्कि इसके गहरे निहितार्थ हैं, खासकर तमिलनाडु की राजनीति में। कमल हासन तमिलनाडु के बेहद लोकप्रिय अभिनेता रहे हैं और पिछले करीब पांच दशक से वो फिल्मों में काम रहे हैं। उनको कई राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुके हैं। वो अपनी फिल्मों में जिस तरह से प्रयोग करते रहे हैं उससे भी एक कलाकार के तौर पर उनकी काफी प्रतिष्ठा है। दक्षिण के राज्यों में फिल्मों के जो भी सुपरस्टार राजनीति में आए उन्होंने यहां भी सफलता प्राप्त की। ये सूची काफी लंबी है लेकिन अगर सिर्फ तमिलनाडु का ही संदर्भ लें तो एम जी रामचंद्रन, करुणानिधि और जयललिता के उदाहरण अभिनेताओं की चुनावी सफलता की कहानी कहते हैं। इन अभिनेताओं की चुनावी सफलता और राज्य में राजनीति के शिखर पर पहुंचने की परंपरा से प्रभावित होकर कमल हासन भी राजनीति में उतरे थे। कमल हासन अपने पूर्वज अभिनेताओं से प्रभावित होकर राजनीति में उतर तो गए लेकिन वर्तमान हालात का आकलन करने में चूक गए। इन नतीजों को देखने के बाद लगता है कि तमिल फिल्मों के सुपरस्टार रजनीकांत इस वजह से ही राजनीति के मैदान में उतरने से हिचकते रहे । ऐसा लगता है कि उन्हें इस बात का अंदाज हो गया था कि अब वो समय नहीं रहा कि फिल्मों का लोकप्रिय अभिनेता, राजनीतिक दल बनाकर उतरे और जनता के भारी समर्थन से सत्ता पर काबिज हो सके। इस बात की कई बार चर्चा होती थी कि रजनीकांत राजनीति में आने वाले हैं लेकिन अबतक तो वो राजनीति में आए नहीं हैं। कमल हासन और उनकी पार्टी की हार से ऐसा प्रतीत होता है कि रजनीकांत का फैसला सही रहा।  

कमल हासन ने जब दो हजार अठारह में अपना राजनीतिक दल बनाया था तब उन्होंने मोदी विरोध का भी बिगुल भी फूंका था। राजनीतिक दल बनाने के बाद वो केरल के वामपंथी मुख्यमंत्री विजयन से लेकर दिल्ली में आम आदमी पार्टी के नेता और मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से भी मिले थे। खबरों के मुताबिक मुलाकात तो उन्होंने ममता बनर्जी से भी की थी। उनके इन मुलाकातों से उनके मंसूबे साफ थे कि वो भारतीय जनता पार्टी के विरोध या विपक्ष की राजनीति करना चाहते थे। यही संदेश तमिलनाडु में भी गया। कमल हासन के विचारों से ऐसा प्रतीत होता है कि वो वामपंथ के करीब हैं। वो अपने वामपंथी विचारों को अपने साक्षात्कारों में प्रकट भी करते रहे हैं। उनके इन विचारों का प्रभाव स्पष्ट रूप से उनके राजनीतिक दल पर भी दिखा। तो क्या कमल हासन की चुनाव में हार और उनकी पार्टी का तमिलनाडु में संपन्न हुए विधानसभा चुनाव में सूपड़ा साफ होने से इस निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है कि वाम दलों के विचारों में लोगों का भरोसा न्यूनतम रह गया है। ‘न्यूनतम भरोसे’ के तर्क को यह कहकर खारिज किया जा सकता है कि तमिलनाडु के पड़ोसी राज्य केरल के चुनाव में वामपंथी गठबंधन की सरकार बनी। ये ठीक है, लेकिन केरल की स्थितियां अलग थीं। वहां वामपंथी दलों के मोर्चे का मुख्य मुकाबला कांग्रेस की अगुवाई वाली संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा से था। मतदाताओं को वहां वाम और कांग्रेस में से एक को चुनना था क्योंकि भारतीय जनता पार्टी अभी वहां संघर्ष ही कर रही है। मतदाताओं ने वाम मोर्चे को चुना। यह भी कहा जा सकता है कि कमजोर विकल्प की वजह से मतदाताओं ने वामपंथी गठबंधन को चुना। पश्चिम बंगाल में तो कांग्रेस और वामपंथी मिलकर चुनाव लड़ रहे थे और इस गठबंधन का वहां खाता भी नहीं खुला। यहां मतदाताओं के पास विकल्प थे। आज से चंद साल पहले कोई इस बात की कल्पना भी नहीं कर सकता था कि बंगाल की जनता लेफ्ट को इस तरह से नकार देगी कि पूरे राज्य में उसको एक भी सीट नहीं मिलेगी। कल्पना तो ये भी नहीं की जा सकती थी कि बंगाल की नक्सलबाड़ी विधानसभा सीट पर भारतीय जनता पार्टी का उम्मीदवार विधानसभा चुनाव में जीत हासिल कर लेगा। कमल हासन को तमिलनाडु में भारतीय जनता पार्टी का प्रत्याशी पराजित कर देगी। 

दरअसल अगर अब हम इन घटनाओं को देखें और अतीत की इसी तरह की घटनाओं के आधार पर विश्लेषण करें तो सही निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पाएंगे। अब भारत का लोकतंत्र अपेक्षाकृत परिपक्व हुआ है। अब चेहरे या फिल्मी पर्दे की छवि के आधार पर वोट मिलना संभव नहीं है। अब जनता काम चाहती है, जनता उस पार्टी को पसंद करती है जिसका नेता उसको भरोसा दिला सके, भरोसा उनकी बेहतरी का, भरोसा देश की बेहतरी का और भरोसा समयबद्ध डिलीवरी का। आजादी के सात दशकों के बाद जनता इतनी परिपक्व हो गई है कि उसको अब नारों या नेताओं की राजनीति से इतर छवि से बहलाया नहीं जा सकता है। अब शायद ही संभव हो कि कोई अभिनेता एन टी रामाराव का तरह अपनी पार्टी बनाकर आएं, सालभर तक राज्य में घूमें फिर चुनाव लड़ें और जनता उनको भारी बहुमत से जिताकर गद्दी सौंप दें। कई चुनावों में तो हिंदी फिल्मों के सुपरस्टार के प्रचार भी उम्मीदवारों का बेड़ा पार नहीं कर पाए। इस लिहाज से कमल हासन की हार भारतीय राजनीति को समझने का एक प्रस्थान बिंदु हो सकता है।   


Sunday, May 18, 2014

बादशाहत बचाने की बेचैनी

लोकसभा चुनाव के बाद देश में नए जनादेश के मुताबिक भारतीय जनता पार्टी के नेता नरेन्द्र मोदी देश के अगले प्रधानमंत्री होंगे । इस जनादेश ने सिर्फ देश की सियासी तस्वीर बदलेगी बल्कि इसका असर साहित्य और संस्कृति पर भी पड़ना तय है । भारतीय जनता पार्टी की इस जीत तक हमारे देश में कमोबेश सभी साहित्यक और सांस्कृतिक संस्थाओं पर वामपंथी सोच और विचार वाले लेखकों, साहित्यकारों और विश्वविद्यालय शिक्षकों का कब्जा है । सरकारी पैसे से चलनेवाली इन संस्थाओं में स्वायत्ता के नाम पर उन्हीं का एजेंडा चलता रहा है । देश में बदले सियासी हालात में इन संस्थाओं के सत्ता समीकरण पर भी असर पड़ेगा ही। वामपंथी दलों और कांग्रेस से उनकी वफादारी का सुख भोगनेवाले लोग जो इन संस्थाओं में लंबे समय से कायम हैं उनके माथे पर लोकसभा चुनाव नतीजों के बाद से शिकन है । अगर हम देश की इन साहित्यक संस्थाओं के इतिहास पर नजर डालते हैं तो सबसे पहले साहित्य अकादमी पर नजर जाती है । उन्नीस सौ चौवन में जब साहित्य अकादमी का गठन किया गया था तो जवाहर लाल नेहरू उसके पहले अध्यक्ष बनाए गए थे । नेहरू को एक लेखक के तौर पर अकादमी का अध्यक्ष बनाया गया था प्रधानमंत्री के तौर पर नहीं । यह वह दौर था जब हमारे देश के राजनेता पढते लिखते थे । कालांतर में साहित्य अकादमी एरक खास विचारधारा के लोगों के हाथों में चली गई । जब इमरजेंसी में प्रगतिशील लेखक संघ ने इंदिरा गांधी का समर्थन कर दिया तो उसके बाद तो कांग्रेस ने इस तरह के संस्थाओं को वामपंथी बुद्धिजीवियों के हवाले कर दिया । सत्तर और अस्सी के दशक में इन वामपंथियों ने योजनाबद्ध तरीके से इन संस्थाओं पर कब्जा किया और अपने समर्थकों को आगे बढ़ना शुरू कर दिया । विरोधियों को चुनचुन कर इस तरह के संस्थाओं से निकालना शुरू किया । अभी अभी साहित्य अकादमी ने अपने साठसाल पूरे होने के मौके पर डी एस राव के संपादन में एक कॉफी टेबल बुक का प्रकाशन किया है । प्रोडक्शन के लिहास से इस शानदार किताब में साहित्य अकादमी के उद्देश्यों और बाद के दिनों में उसके क्रियाकलापों के बारे में कई दिलचस्प टिप्पणियां हैं । इस किताब को शुरू से लेकर अंत तक पलटने और पढ़ने के बाद यह बात साफ हो जाती है कि साहित्य अकादमी का स्तर कैसे उत्तरोत्तर गिरता गया ।

वामपंथी साहित्यकारों और कथित विचारकों में एक और दुर्गुण यह भी है कि वो दूसरी विचारधारा की आवाज को दबाने के लिए किसी भी हदतक जा सकते हैं । विश्वविद्यालयों में पीएचडी देने से लेकर नौकरी तक में ये खेल खुलकर खेला जाता है । मैं बहुधा इसे वामपंथी फासीवाद कहता हूं । इस तरह की फासीवादी विचारधारा के पोषकों को दिल्ली दरबार में सत्ता परिवर्तन से फर्क पड़ सकता है । वाराणसी के चुनाव में धुर मोदी विरोधी तीस्ता शीतलवाड़ के नेतृत्व में या कह सकते हैं उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर इन धुर वामपंथियों ने अपने इरादे तो साफ कर ही दिए थे । करीब दो दर्जन साहित्यकारों ने मोदी के खिलाफ चुनाव प्रचार किया और इस तरह का माहौल बनाने की कोशिश की कि मोदी के आने से लेखकों और बुद्धिजीवियों पर खतरा बढ़ जाएगा । यह हताशा और निराशा अभिव्यक्ति की आजादी को बचाने के लिए नहीं बर्ना अपनी मलाईदार कुर्सियां और साहित्य अकादमी जैसी संस्थाओं से लाभ लेने के खत्म होने के डर से उपजा था । वाल्टेयर ने एक बार कहा था कि वो हजारों चूहों के कुतरे जाने से खत्म होने की बजाए एक शेर के निगल जाने से खत्म होने को पसंद करेंगे ।