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Saturday, April 27, 2024

पार्टी भक्ति से संदिग्ध साहित्यधर्मिता


इस वक्त देश में आम-चुनाव चल रहे हैं। दो चरणों के लिए मतदान संपन्न हो चुके हैं। चुनाव के बीच इंटरनेट मीडिया पर साहित्यकारों का एक खेमा जमकर राजनीति की बात करता है। खुद को कथित रूप से प्रगतिशील कहने और देश में धर्मनिरपेक्षता की वकालत करनेवाले लेखक दिन-रात राजनीति पर लिखते रहते हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की आलोचना करते रहते हैं। कुछ लेखक तो राजनीतिक दलों के पूर्णकालिक कार्यकर्ता के तौर पर खुद को प्रस्तुत करते हैं। उनके लेखन में वामपंथ का एजेंडा साफ दिखता है। यह अलग बात है जबसे जनता ने वाम दलों को नकार दिया है तब से तमाम वामपंथी लेखकों को कांग्रेस में भविष्य नजर आने लगा है। ऐसे लेखक भी कांग्रेस की जयकार करते हुए भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की आलोचना में जुटे रहते हैं। स्वयं को प्रगतिशील साबित करने की होड़ में बहुधा आलोचना की मर्यादा तोड़ते नजर आते हैं। फेसबुक, एक्स (पहले ट्विटर) और इंस्टा चूंकि स्वच्छंद इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म्स हैं, इसलिए वहां मर्यादाविहीन टिप्पणियां देखने को मिलती हैं। इस स्तंभ में कई बार इसकी चर्चा की जा चुकी है कि लेखक संगठनों, प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ और जन संस्कृति मंच, से जुड़े लेखक अपनी लेखन के लिए अपने राजनीतिक आकाओं का मुंह जोहते रहते हैं। कहना न होगा कि इन संघों से जुड़े लेखक अपनी रचना में भी जबरन पार्टी के सिद्धांतों को ठूंसने का प्रयत्न करते रहे हैं, अब भी कर रहे हैं। यह अकारण नहीं है कि हिंदी का पाठक साहित्य से दूर होता जा रहा है। इन वामपंथी लेखक संघों से जुड़े लेखक जिन साहित्यिक पत्रिकाओं के संपादक आदि हैं वो पत्रिकाएं भी संबंधित कम्युनिस्ट पार्टी का मुखपत्र नजर आता है। उसी तरह की कृतियों का चयन किया जाता है और उसपर एक खास वैचारिक दृष्टि से विचार करके उनको चर्चित करने का प्रयास किया जाता है। उन्हीं विषयों पर चर्चा की जाती है जिनमें भारतीय जनता पार्टी की आलोचना की संभावना हो। 

इंटरनेट मीडिया पर इन वामपंथी और कथित प्रगतिशील लेखकों की टिप्पणियों को देखते हुए 1974 में नामवर सिंह के लिखे एक लेख, प्रगतिशील साहित्य धारा में अंध लोकवादी रुझान, की पंक्तियों की याद आती है।  नामवर सिंह ने आज से पांच दशक पहले ये माना था कि वामपंथ से जुड़े लेखक पार्टी लाइन पर लेखन करते हैं। पचास वर्षों बाद भी बहुत कुछ नहीं बदला है। नामवर सिंह ने तब लिखा था, भारत में इस समय तीन या चार कम्युनिस्ट पार्टियां हैं और इनके अलावा भी अपने आपको मार्क्सवादी कहनेवाले कुछ समुदाय तथा व्यक्ति हैं, जिनमें से हर एक के पास कुछ न कुछ लेखक या तो संबद्ध हैं या सहानुभूति रखते हैं। इसलिए अपनी अपनी पार्टियों या समुदायों की राजनीतिक ‘लाइन’ के अनुसार लेखकों की राजनीतिक दृष्टि में भिन्नता स्वाभाविक है। उन्होंने तो यहां तक कह दिया कि इन लेखकों से दलगत निष्ठा, प्रतिबद्धता या राजनीति से ऊपर उठने की बात कहना ज्यादती है। ऐसा कहने के पीछे नामवर सिंह का उद्देश्य चाहे जो रहा हो लेकिन एक बात तो स्पष्ट है कि वो ये स्वीकार कर रहे हैं कि कम्युनिस्ट पार्टियों या मार्क्सवादी समुदायों से जुड़े लेखक राजनीतिक ‘लाइन’ पर लेखन कर रहे थे। नामवर सिंह ने अपने इस लेख में मार्क्सवाद को वैश्विक दृष्टि जरूर करार दिया लेकिन ऐसी कई बातें कह गए जो वामपंथी लेखकों की पोल खोल कर रख देते हैं। वो आगे कहते हैं कि एक निष्ठावान लेखक से उसकी राजनीति की साहित्यिक अंतर्वस्तु की मांग तो की ही जा सकती है क्योंकि एक लेखक के नाते उसका अपना कर्मक्षेत्र तो साहित्य ही है। विचित्र विडंबना है कि अधिकांश लेखक अपनी रराजनीति के अभीष्ट साहित्यिक रूपांतर में या तो असमर्थ हैं या फिर अनजान हैं। दरअसल इस समस्या के समाधान की उम्मीद अनेक निष्ठावान लेखकों को अपनी पार्टी के राजनीतिक नेताओं से है।...किसी समानधर्मा राजनीतिकर्मी तथा बुद्धिजीवी के अनुभव-ज्ञान का लाभ उठाना एक बात है, किंतु साहित्य के जिस क्षेत्र से उनका परिचय नही हैं उसके बारे में उससे समाधान की उम्मीद करना उसके साथ सरासर ज्यादती है। 

पता नहीं क्यों नामवर सिंह अपने वामपंथी कामरेडों पर इतने कुपित थे। उन्होंने यहां तक कह दिया कि राजनितिज्ञों से समाधान की उम्मीद करने से किसी लेखक की पार्टी-भक्ति भले ही प्रमाणित हो,उसकी अपनी सृजनशीलता और साहित्यधर्मिता संदिग्ध हो जाती है। राजनीति के पराश्रयी और राजनीतिक नेताओँ के पिछलग्गू लेखक ही इस दिशा में प्रवृत्त होते हैं। कोई स्वाभिमानी और सुबुद्ध साहित्यकार इस पराश्रयी वृत्ति को स्वीकार नहीं कर सकता है। नामवर की इन टिप्पणियों से स्पष्ट हो रहा है कि वामपंथी लेखक पार्टी-भक्ति करते रहे हैं, राजनीतिक नेताओं के पिछलग्गू रहे हैं और उनकी साहित्यधर्मिता संदिग्ध है। पार्टी भक्ति करनेवाले वामपंथी लेखकों पर नामवर सिंह ने 1974 जो बातें कही थीं उसका कोई असर नहीं दिखता है। अब भी जो पुराने, नववामपंथी या वामपंथ में इंटर्नशिप कर रहे लेखक सभी इसी लीक पर चल रहे हैं। वामपंथ कमजोर हुआ। वामपंथ कांग्रेस का पिछलग्गू बना। तो इस श्रेणी के लेखक भी कांग्रेस के पिछलग्गू बनकर इंटरनेट मीडिया पर क्रांति (?) करने में जुट गए। इस तरह के लेखक देशी विदेशी लेखकों का नाम लेकर अपनी विद्ता से जनता को प्रभावित करना चाहते हैं लेकिन जिस तरह से हर जगह ये सेलेक्टिव होकर बात करते हैं, वैसे ही विदेशी लेखकों को उद्धृत करने में भी इसी सलेक्टिव प्रविधि का उपयोग करते हैं। ग्राम्शी के लिखे को उद्धृत करते हैं। ये कभी नहीं बताते कि उन्होंने कहा था कि ‘राजनीतिज्ञ साहित्य-कला की दुनिया में अपने समय की एक निश्चित सांस्कृतिक दुनिया के निर्माण के लिए दबाव डालते हैं।‘ स्वाधीनता के बाद से ही कम्युनिस्ट नेता हमारे देश में भी साहित्य और कला के क्षेत्र में अपने तरह की सांस्कृतिक दुनिया बनाना चाहते थे। इसके लिए उन्हें पहले सोवियत रूस से और बाद में चीन से दिशा निर्देश मिलते थे। उन दिशा निर्देशों के अनुसार उन्होंने कला जगत को अपने कब्जे में लिया। 

वामपंथी लेखकों के साथ दिक्कत ये रही है कि वो बहुधा अपनी रचनाओं में राजनीतिक परिवर्तन का नारा लगाते रहे हैं। उनके लिए विरोधी विचारधारा की सरकार और सत्ता हमेशा से दमन का माध्यम है। वो वैचारिक रूप से विरोधी सरकार पर तमाम तरह के आरोप लगाते रहे हैं। अभिव्यक्ति की स्वाधीनता से लेकर संविधान के खतरे में होने तक का। राजनीतिक आरोपों में वो ऐसे फंसते हैं कि सामाजिक और सांस्कृतिक बदलाव के पक्ष में बातें नहीं कर पाते हैं। कम्युनिस्टों ने हमारे देश के लेखकों को प्रगतिशील संज्ञा दी। साथ ही प्रगतिशीलता और क्रांति की ऐसी घुट्टी पिलाई कि अधिकतर लेखक राजनीतिक बदलाव के पक्ष में रचनाएं लिखने लगे। होना यह चाहिए था कि वो समाज और संस्कृति को प्रभावित करनेवाली रचनाएं लिखते। ऐसी रचनाएं पाठकों के समक्ष रखते जिनसे पाठकों में भारत की संस्कृति के प्रति एक समझ बनती। भारत की सांस्कृतिक पहचान को गाढ़ा करनेवाली कहानियां, उपन्यास, कविताएं लिखी जाती। लेकिन हुआ इसके उलट। वामपंथी प्रगतिशील लेखकों ने खुद तो इस तरह की रचनाएं लिखी नहीं, जो लेखक इस तरह की रचनाएं लिख रहे थे उनको भी षडयंत्रपूर्वक हाशिए पर डाल दिया गया। कई बार अपमानित किया गया। योग्य लेखकों को सम्मान पुरस्कार से दूर रखा। लेखक संघों ने लेखकों के हितों में कोई कार्य किया हो ये ज्ञात नहीं है। वैचारिक संघर्ष की आड़ में ये दूसरे संघों से जुड़े लेखकों को नुकसान पहुंचाने में जुटे रहे। बेहतर होता कि ये लेखकों के हितों की रक्षा के लिए एकजुट होते। लेखकों के भविष्य को सुरक्षित बनाने के लिए सरकार पर दबाव बनाते। पर ऐसा हो न सका। परिणाम लेखक संगठन भी अप्रसांगिक हो गए।  


Saturday, March 31, 2018

लेखक संगठनों पर वाजपेयी का हमला


हिंदी साहित्य जगत में एक बार फिर से लेखक संगठनों पर सवाल उठ रहे हैं। इस बार सवाल उठाया है हिंदी के वरिष्ठतम लेखकों में से एक अशोक वाजपेयी ने । हाल ही में उन्होंने वामपंथ को लेकर जो टिप्पणी की है उसके लपेटे में लेखक संगठन भी आ गए हैं। अशोक वाजपेयी के मुताबिक ‘वाम रुझान रखनेवाले लेखकों के तीन संगठन हैं, वे त्रिपुरा-हार के पहले से ही, बल्कि भाजपा की दिग्विजय से भी पहले से, अप्रासंगिक और निष्क्रिय होते गए हैं, हालांकि वे ऐसा मानने को कतई तैयार नहीं हैं। उन्होंने स्वयं कई लेखकों और वृत्तियों के साथ जो अन्याय और अनाचार किए हैं उन्हें स्वीकार करने को भी तैयार नहीं हैं। लोकतंत्र का नाट्य करते हैं पर इन संगठनों का ढांचा मूलतः और मुख्यतः लोकतांत्रिक नहीं रहा। उसके पदाधिकारियों की राजनैतिक-साहित्यिक चूकें काफी रही हैं।पर इस वस्तुस्थिति ने उन्हें बहिष्कार, निन्दा, अफवाह की गर्हित राजनीति से बचने के लिए उकसाया नहीं है। वे अब भी विचार और विश्लेषण ऐसी पदावली में करते हैं जो अब संसार भर की वाम विचारशीलता में कब की बाहर फेंकी जा चुकी है।‘ अशोक वाजपेयी ने बहुत सधे तरीके से लेखक संगठऩों की निष्क्रियता और उन संगठनों में अलोकतांत्रिक व्यवस्था को उजागर कर एक बार फिर से वाम विचारधारा को कठघरे में खड़ा कर दिया। अशोक वाजपेयी का वाम विरोध जगजाहिर रहा है और वामपंथी लेखक बहुधा उनको कलावादी कहकर मजाक उड़ाते रहे हैं। निर्मल वर्मा, विद्यानिवास मिश्र जैसे लेखकों के साथ अशोक जी की निकटता जगजाहिर थी। इस वजह से भी वो वामपंथियों के निशाने पर रहते थे और अशोक वाजपेयी भी लगातार वामपंथियों पर हमले करते रहते थे। लेकिन केंद्र में मरेन्द्र मोदी सरकार आने के बाद जिस तरह से अशोक वाजपेयी ने सरकार के खिलाफ पहले परोक्ष रूप से और फिर प्रत्यक्ष रूप से मुहिम चलाई थी, जिसमें पुरस्कार वापसी अभियान प्रमुख था, उसके बाद वामपंथी लेखकों को अशोक वाजपेयी में एक अवसर नजर आया और वो अचूक अवसरवादी की तरह अशोक वाजपेयी के झंडे के नीचे खड़े होते चले गए। चाहे वो खुद को सबसे ज्यादा क्रांतिकारी मानने वाला संगठन जन संस्कृति मंच के उपाध्यक्ष मंगलेश डबराल हों या फिर जनवादी लेखक संघ के असद जैदी हों। इस तरह अलग अलग वामपंथी लेखक संगठनों में मौजूद लोग अशोक वाजपेयी के साथ जुड़ते चले गए। ये अशोक जी के साहित्यिक हितों की प्रत्यक्ष तौर पर रक्षा करते हैं या नहीं ये ज्ञात नहीं है लेकिन कई बार इनके कदमों से अशोक जी को समर्थन मिलता है। इससे यह संदेश भी गया कि अशोक वाजपेयी वामपंथी हो गए। नतीजा यह हुआ कि अशोक वाजपेयी के साथ जुड़े लेखकों उन लेखकों को परेशानी होने लगी जो वामपंथ विरोध की वजह से अशोक जी के साथ थे। मैंने एक बार अशोक जी से इस बारे में जिक्र किया और उनको कहा कि आप तो सरकार और मोदी विरोध के चलते वामपंथियों के साथ चले गए तो अशोक जी ने थोडी नाराजगी भरे स्वर में मुझे कहा कि मैं किसी से साथ नहीं गया बल्कि वो मेरे साथ आ गए। खैर...
अब, जब अशोक वाजपेयी ने वामपंथी लेखक संगठनों को कठघरे में खड़ा किया है तो ये देखना दिलचस्प होगा कि मंगलेश डबराल या असद जैदी जैसे कवि/लेखक कोई प्रतिक्रिया देते हैं या नहीं। हलांकि इसकी उम्मीद कम से कम जनवादी लेखक संघ को नहीं है क्योंकि जनवादी लेखक संघ के उपमहासचिव संजीव कुमार ने अशोक वाजपेयी को फेसबुक पर लंबी टिप्पणी लिखकर जो जवाब दिया हैं उसमें इस बात के पर्याप्त संकेत हैं। ‘अशोक वाजपेयी की मुश्किल’ शीर्षक से की गई लंबी टिप्पणी में संजीव कुमार ने लिखा- ‘अशोक जी इतने सुजान तो हैं ही कि उनकी हर बात बेबुनियाद न हो। मसलन, उनका यह कहना कि लेखक संगठनों के लोग ‘अब भी विचार और विश्लेषण ऐसी पदावली में करते हैं जो अब संसार भर की वाम विचारशीलता में कब की बाहर फेंकी जा चुकी है’ (‘अब’ ‘कब’ के प्रयोग में जो अटपटापन है, उसका श्रेय मुझे न दें), वामपंथी लेखकों के एक हिस्से के लिए बहुत गलत नहीं है। लेकिन इससे यह भी पता चलता है कि अपनी चरम निराशा में उन्होंने वामपंथी पहचान वाले लेखकों को पढ़ना ही छोड़ दिया है, इसलिए उन्हें मुहावरे के बदलाव और विश्लेषण में उभरे नए नुक्तों का कोई इल्म नहीं है। उनसे यह उम्मीद करनी भी नहीं चाहिए कि उन्होंने सब कुछ पढ़ रखा हो, लेकिन यह उम्मीद तो की ही जा सकती है कि ‘संसार भर की वाम विचारशीलता’ आदि के बारे में सब कुछ पढ़े हुए जैसा दावा करने से बचें—अगर बौद्धिक ईमानदारी के ख़याल से नहीं, तो अपने को हास्यास्पद होने से बचाने के लिए ही सही! उनकी इस बात से भी सहमत होने के अलावा कोई चारा नहीं कि ये लेखक संगठन निष्क्रिय होते गए हैं. अगर निष्क्रिय न होते तो ऐसा क्यों होता कि अशोक जी के या किसी भी और के लगाए आरोपों का जवाब देने के लिए कोई आगे न आता! ऐसा तभी होता है जब संगठन के साथ अपनी पहचान को जोड़ने से उसके सदस्य भी कतराते हैं, या दूसरी तरह से देखें तो वह उनकी आत्म-छवि का हिस्सा नहीं होता. शामिल लोग संगठन से अपनी पहचान को न जोड़ें, यह निष्क्रियता की सबसे बड़ी निशानी है; इससे पता चलता है कि कार्यक्रम आदि करा लेने के बावजूद, जो कि मुट्ठी भर सक्रिय लोगों के प्रयास से भी हो सकते हैं, संगठन कुल मिलाकर एक जीवंत इकाई की तरह काम नहीं कर रहा।‘ अशोक वाजपेयी को उत्तर देने के क्रम में संजीव कुमार ने लेखकों के संगठन से अपनी पहचान जोड़ने से कतरानेवाले लेखकों की ओर इशारा किया है। बेहतर होता कि संजीव कुमार अपने लेख में ऐसे लेखकों के नाम उजागर करते। साहित्य जगत को यह तो पता चलता कि कौन से ऐसे लेखक हैं जो संगठन में रहते हुए उसका लाभ तो उठाते हैं लेकिन जब संगठन पर किसी तरह का संकट आता है या उसपर कोई साहित्यिक हमला होता है तो वो उससे अपना नाम जोड़ने में कतराते हैं।
इस पूरे प्रसंग से एक बात तो साफ है कि हिंदी साहित्य में जो लेखक वाम विचारधारा के ध्वजवाहक हैं, उनमें से ज्यादतर अवसरवाद की ध्वजा लिए घूम रहे हैं और जिस जगह पर उनको अवसर दिखाई देता है अपना झंडा वहीं गाड़कर कीर्तन करने लग जाते हैं। अशोक वाजपेयी के अखाडे में इन दिनों इस तरह के लेखकों का अखंड कीर्तन होता दिख रहा है। अशोक वाजपेयी लंबे समय तक भारत सरकार में नौकरशाह रहे हैं, मंत्रालयों में उच्च पदों पर काम किया है, इसलिए यह माना जा सकता है कि उनको इस तरह के लेखकों की पहचान करने में कोई दिक्कत नहीं होती है और वो गाहे बगाहे इनका इस्तेमाल करते रहते हैं, तरह तरह के लॉलीपॉप देकर।
अशोक वाजपेयी ने लेखक संगठनों पर दो बेहद संगीन इल्जाम लगाए हैं, एक तो ये कि इन संगठनों ने लेखकों और वृत्तियों के साथ अन्याय और अनाचार किया। यह सही है। जिस तरह से पूर्व में कई लेखकों को सायास उपेक्षित किया गया वो अब सबके सामने है। हिंदी में प्रचुर और महत्वपूर्ण लेखन करनेवाली शिवानी और मालती जोशी को लगातार उपेक्षित किया गया। उनके लेखन पर जानबूझकर विचार नहीं किया गया। नरेद्र कोहली की कथावाचक कहकर खिल्ली उड़ाई जाती रही। जबकि इन लेखकों के पास तथाकथित मुख्यधारा के लेखकों से कई गुणा ज्यादा पाठक थे और अब भी हैं। यह अन्याय ही तो है। अशोक वाजपेयी और कड़े शब्दों में कहते हैं कि ये लेखक संगठन ‘लोकतंत्र का नाट्य करते हैं पर इन संगठनों का ढांचा मूलतः और मुख्यतः लोकतांत्रिक नहीं रहा।‘ यह सबसे संगीन इल्जाम है। इस बात पर हिंदी साहित्य जगत में विचार किया जाना चाहिए कि क्या इन लेखक संगठनों में लोकतंत्र नहीं है क्या वो लोकतंत्र का नाटक करते हैं। इन लेखक संगठनों के अध्यक्ष उपाध्यक्ष और महासचिव के कार्यकाल को देखकर तो अशोक जी के आरोपों में दम लगता है। पर यह भी लगता है कि इन लेखक संगठनों की सार्थकता तो लगभग समाप्त हो गई है, प्रासंगिकता तो ये पहले ही खो चुके हैं, इनकी विश्वसनीयता भी लगभग समाप्त ही हो चुकी है तो ऐसे में अशोक जी क्यों चिंता कर रहे हैं? संजीव कुमार की तो मजबूरी समझ में आती है क्योंकि वो जनवादी लेखक संघ के पदाधिकारी हैं लिहाजा उनका बोलना आवश्यक है। लेकिन अकेले संजीव कुमार का बोलना भी तो कुछ संकेत करता ही है। इन संकेतों को समझने की जरूरत भी है।


Friday, April 17, 2009

लेखकों के मरने का इंतजार करते लेखक संगठन !

पिछले कुछ वर्षों से लेखकों की सामाजिक भूमिका लगभग खत्म हो गई है । कहीं से भी ये लगता ही नहीं है कि लेखकों का समाज से कोई जुड़ाव भी है । किसी भी बड़े सामाजिक प्रश्न पर इनकी एकजुटता नजर नहीं आती है । वे छोटे-छोटे गुटों में बनाई अपनी ही दुनिया में संतुष्ट नजर आते हैं, जबकि साहित्य और संस्कृति के सामने संकट गहराता जा रहा है । लेखकों की सामाजिक सक्रियता को लेकर लेखक संगठों की स्थापना की गई थी । कहने को तो आज हिंदी में तीन लेखक संगठन हैं और ये तीनों अलग-अलग कम्युनिस्ट पार्टियों से संबद्ध हैं । प्रगति लेखक संघ, सीपीआई से , जनवादी लेखक संघ, सीपीएम से और जन संस्कृति मंच, सीपीआई-एमएल से । लेकिन ये संगठन इन पार्टियों के पिछलग्गू ही साबित हो रहे हैं । जब सन 1936 में प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना हुई थी तो दो दशकों तक इसने सभी भारतीय भाषाओं में समान रूप से लेखकों को जोड़कर गंभीरता से काम किया लेकिन समय बीतने के साथ ये संगठन कमजोर होता गया और आज तो हालत ये है कि कुछ शहरों को छोड़ दें तो ये लगभग मृतप्राय है । यही हाल जलेस और जसम का भी है । अब तो ये तक पता नहीं चलता है कि इनके अध्यक्ष और सचिव कौन हैं । इन संगठनों का पता तब चलता है जब किसी लेखक की मृत्यु होती है । इसके बाद लेखक संगठन एक शोकसभा का आयोजन करते हैं और उसमें मर्सिया पढकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं । यह सही और दुखद है कि लेखक लोग या तो किसी शोकसभा में मिलते हैं या पुस्तक विमोचन के अवसर पर । मुद्दों को लेकर लेखकों ने आपस में मिलना बंद कर दिया है ।
दूसरी सबसे शर्मनाक बात ये है कि इन लेखक संगठनों को किसी लेखक के मरने के बाद ही ही उसकी महत्ता समझ में आती है । लेखक के जीवित रहते ये संगठन लेखकों की रचनाओं पर कुछ भी करने से कतराते रहते हैं लेकिन उनके मरते ही उसे महान तथा उसकी रचनाओं को बेहद अहम बताने लग जाते हैं । इससे लगता तो ये है कि ये लेखक संगठन लेखकों की मरने की प्रतीक्षा कर रहा होता है । पिछले दिनों हिंदी के कवि सुदीप बनर्जी का निधन हुआ और तामम संगठनों के बीच उन्हें महान साबित करने की होड़ लग गई लेकिन मुझे नहीं याद कि उनके जीवित रहते किसी भी संगठन ने कोई मग्तवपूर्ण कार्यक्रम सुदीप बनर्जी पर आयोजित किया ।
कई साल पहले हिंदी के एक वरिष्ठ कवि मंगलेश डबराल ने एक बातचीत में कहा था कि लेखक संगठन लेखकों के यूनियन नहीं है जो कॉपीराइट आदि के मुद्दे पर संघर्ष करें । उनका मानना था कि ये वैचारिक संगठन हैं जिनका काम साहित्य की दुनिया में वैचारिक संवेदना का प्रचार करना है । अगर मंगलेश की बातों को मान भी लिया जाए तो सवाल ये उठता है कि वैचारिक संवेदना के प्रचार के लिए भी लेखक संगठन क्या कर रहे हैं ?
आज जरूरत इन लेखक संगठों की भूमिका पर पुन्रविचार की है । इन संगठनों की निष्क्रियता के पीछे वामपंथी राजनीति की हिम्मतपरस्ती और अवसरवादिता की राजनीति है । लेखको के बीच भी पद और पुरस्तार पाने की लोलुपता बढ़ती जा रही है । वैचारिकता पर अवसरवादिता हावी हो गई है । तमाम लेखक इस दंद-फंद में जुटे रहते हैं कि किस संगठन से जुड़कर उन्हें लाभ हो सकता है और ये तय करते ही वो उन संगठनों से जुड़कर साहित्यिक मठाधीशों का आशीर्वाद प्राप्त कर लेता है । सच तो ये है कि इन दिनों लेखक संगठनों से न तो कोई उर्जा प्राप्त कर पा रहे हैं और न ही कोई वैचारिक दिशा ।
लेखक संगठनों का इतना बुरा हाल है कि वो अपने ही साथी लेखकों के हित के लिए कुछ बी नहीं कर पा रहा है । कॉपीराइट हिंदी में लेखकों के लिए आज एक बड़ा मु्दा है और तमाम लेखक इसके शिकायत हो रहे हैं । लगातार प्रकाशकों द्वारा लेखकों के शोषण की बात सामने आती रहती है लेकिन आजतक लेखक संगठनों ने इस शोषण के खिलाफ कोई ठोस आवाज नहीं उठाई है, आंदोनल की बात तो दूर । इसके अलावा भी की मुद्दे हैं जिनपर लेखक संगठनों की खोमोशी चिंतनीय है ।
दरअसल अब प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ, और जन संसकृति मंच को आपसी भेदभाव भुलाकर साथ आकर एक नया सांस्कृतिक और साझा मंच बनाना चाहिए और लेखकों की मर्सिया पढ़ना बंद कर उनके जीवित रहते उनको उनका देय दिलाने के लिए प्रयास करना चाहिए तभी साहित्या का भी भला होगा और साहित्यकारों का भी । अन्यथा लेखक संघ अपने ही साथियों के मरने का इंतजार करनेवाला संगठन बनकर रह जाएगा ।