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Sunday, April 17, 2016

सितारों के बायोपिक का दौर

जब फिल्म पान सिंह तोमर आई तो उसकी सफलता ने लोगों को चौंकाया था । कम लागत में बनी इस फिल्म को तारीफ तो मिली ही थी इसने जमकर मुनाफा भी कमाया था । पान सिंह तोमर भारतीय फौज में थे और उन्होंने उन्नीस सौ अट्ठावन के तोक्यो एशियन गेम्स में भारत का प्रतिनिधित्व किया था । इस बायोपिक को लोगों ने पसंद किया था क्योंकि इसमें एक फौजी के बागी बनने की कहानी थी । चंबल के रहनेवाले पान सिंह ने किस तरह से बंदूक उठाई उसको फिल्मकार ने दर्शकों के सामने परोसा था । इसके बाद तो हिंदी फिल्मों में बॉयोपिक का दौर चल पड़ा । दो हजार तेरह में ओलंपियन मिल्खा सिंह पर बनी फिल्म भाग मिल्खा भाग ने तो सफलता के तमाम रेकॉर्ड धवस्त करते हुए एक सौ नौ करोड़ का बिजनेस कर डाला । मिल्खा सिंह की जिंदगी भी पान सिंह तोमर की तरह ही नाटकीय है । उसमें सफल बॉलीवुड फिल्म के सारे तत्व मौजूद हैं । भारत विभाजन के बाद हुए दंगों में मिल्खा सिंह के माता-पिता की जान चली गई थी । उसके बाद वो दिल्ली आते हैं फिर सेना में शामिल होकर ओलंपिक गेम्स तक पहुंचते हैं । आज भी लोग मिल्खा सिंह को उड़न सिख कहते हैं तो उनके जेहन में उन्नीस सौ साठ का ओलंपिक आता है जब पलभर से मिल्खा सिंह पदक से चूक गए थे । चार सौ मीटर की उस रेस में मिल्खा सिंह आधी दूर तक सबसे आगे थे लेकिन उसके बाद वो पिछड़ गए थे । करीब पौने छियालीस सेकेंड का उनका रिकॉर्ड भारत में चार दशकों तक कायम रहा था और कोई भी धावक उसको पार नहीं कर पाया था । एक तो भारत विभाजन का वक्त, दूसरे एक परिवार के तहस नहस होने के बाद उसके सदस्य का उठ खड़ा होना लोगों को भा गया ।  इसी तरह से पिछले दिनों बॉक्सर मैरी कॉम पर प्रियंका चोपड़ा अभिनीत बॉयोपिक मैरी कॉम आई थी । प्रियंका चोपड़ा के शानदार अभिनय और उत्तर पूर्व के राज्य मणिपुर के एक छोटे से कस्बे से निकलकर मैरी कॉम पांच बार एमैच्योर बॉक्सिंग की विश्व चैंपियन रहीं । मैरी कॉम ने ना केवल इचियोन एशिएयन गेम्स में स्वर्ण पदक जीता था बल्कि ओलंपिक में भी अपने मुक्के का कमाल दिखाया था । उस वक्त मैरी कॉम पूरे देश में नायिका की तरह उभरी थीं । मैरी कॉम पर बनी फिल्म भी हिट रही थी और इंडस्ट्री के अनुमान के मुताबिक उसने बासठ करोड़ का बिजनेस किया था । दरअसल होता यह है कि स्पोर्ट्स के सितारों के जीवन पर फिल्म बनाने के लिए  बॉलीवुड के फिल्मकार और निर्देशक ज्यादा उत्साहित रहते हैं । उस उत्साह की कई वजहें हैं लेकिन सबसे बड़ी वजह है तैयार बाजार मिलता है । इस तैयार बाजार का फायदा यह होता है कि यहां मुनाफे की गुंजाइश ज्यादा रहती है । तैयार बाजार को भुनाने के लिए फिल्मकार उन खिलाड़ियों की जिंदगी की ओर आकर्षित होते हैं जिनके साथ किंवदंतियां, किस्से कहानियां जुड़े हों और लोग उसके बारे में जानने के लिए उत्सुक हों । इसके अलावा भारतीय दर्शक कुछ अलग देखने की चाहत भी रखते हैं । अपने नायक को रूपहले पर्दे पर देखने की उनकी ख्वाहिश भी उनको सिनेमा हॉल तक खींच सलाती हैं । इसके अलावा अपने नायक के जीत को वभारत का दर्शक बार-बार देखना चाहता है । अगर फिलमकार दर्शकों के इस मनोविज्ञान को पकड़कर ठीक से उसको फिल्मा देता है तो फिल्म के सफलता की गारंटी रहती है । इसके अलावा एक और वजह होती है खिलाड़ियों की लोकप्रियता को भुनाने की, लेकिन यहां एक पेंच भी होता है । वो पेंच है लोकप्रियता के साथ या तो संघर्ष हो या फिर कोई लंबे समय तक चला विवाद । इसका फायदा यह होता है कि फिल्मकारों को और निर्देशकों को अपनी रचनात्मकता और कल्पनाशीलता को दिखाने के लिए खुले आकाश जैसा विस्तार  मिलता है जहां वो खुल कर खेल सकते हैं ।
अब अगर देखें तो इस वक्त तीन क्रिकटरों के अलावा एक गणितज्ञ और एक पहलवान पर बायोपिक आने वाली है । पहली फिल्म आ रही है टीम इंडिया के पूर्व कप्तान मोहम्मद अजहरुद्दीन पर । फिल्म का नाम है अजहर । इस फिल्म में अजहरुद्दीन की भूमिका निभा रहे हैं इमरान हाशमी और ये तेरह मई को रिलीज होगी । अब अगर हम अजहरुद्दीन की जिंदगी पर नजर डालते हैं तो ये एक फिल्म की परफेक्ट स्क्रिप्ट की तरह नजर आती है । अजहर की जिंदगी जहां एक सितारे की बनने की दास्तां है, उसके बाद उसके बॉलीवुड की एक नायिका के साथ प्रेम है, विवाह है और फिर है अलगाव । कहानी इतने पर ही नहीं रुकती है । भारतीय क्रिकेट का ये सितारा मैच फिक्सिंग के जाल में भी फंसता है । मैच फिक्सिंग की फांस में घिरे इस क्रिकेट कप्तान पर आजीवन प्रतिबंध लगाया जाता है फिर लंबी कानूनी लड़ाई के बाद उसको हाईकोर्ट से मामूली राहत मिलती है । इस बीच वो शख्स राजनीति में आता है और सांसद बन जाता है । पारिवारिक जिंदगी में भी दर्द का सामना करना पड़ता है । इस बीच एक अन्य बैडमिंटन खिलाड़ी से उसके रोमांस की खबरें आम होती है हलांकि वो प्यार परवान नहीं चढ़ सकता है । तो जहां जिंदगी में इतना मसाला हो वहां बॉलीवुड की नजर ना जाए, संभव ही नहीं है । अजहर के बाद दूसरी फिल्म आ रही है टीम इंडिया के कैप्टन कूल महेन्द्र सिंह धौनी पर । इस फिल्म का नाम है – एम एस धोनी, द अनटोल्ड स्टोरी और ये सितंबर के पहले सप्ताह में रिलीज होने को तैयार है । इस फिल्म में धोनी के किरदार को निभाया है अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत ने । अब धौनी की जिंदगी में सफलता के शिखर पर पहुंचने के बाद के साथ साथ उनकी कहानी लगातार किंवदंती बनती जा रही है । कई बार ये किस्सा सामने आया है कि किस तरह से धौनी अपना एक क्रिकेट मैच खेलने के लिए रांची से पूर्वोत्तर के किसी राज्य में पहुंचे थे । इसके अलावा रेलवे के टिकट चैकर की नौकरी से अरबपति होने की दास्तां अपने आप में दिलचस्प है । इसी तरह से आमिर खान की फिल्म दंगल भी हरियाणा के मशहूर पहलवान महावीर सिंह फोगट की जिंदगी पर आधारिक हैं । यहां भी इस चरित्र के साथ किंवदंतियां जुड़ी हुई हैं ।

बॉलीवुड की नजर अजहर और धोनी पर तो जाती है लेकिन उनकी नजर सचिन तेंदुलकर या फिर सुनील गावस्कर पर नहीं जाती है । ये दोनों क्रिकेटर महानतम खिलाड़ियों में से एक हैं लेकिन इनके संघर्ष में मसाला नहीं लिहाजा इनपर बॉलीवुड की नजर नहीं गई । सचिन तेंदुलकर पर फिल्म आ रही है जो बना रहे हैं हॉलीवुड के जेम्स इर्सकिन सचिन पर फिल्म बना रहे है जिसका नाम है सचिन-अ बिलियन ड्रीम्स । इस फिल्म का एक पोस्टर भी हाल ही में रिलीज किया गया है । फिल्म के पोस्टर के रिलीज के मौके पर सचिन तेंदुलकर ने कहा कि कैमरे को फेस करना किसी भी फास्ट बॉलर को फास्ट पिच पर खेलने के कठिन है । खैर ये अवांतर प्रसंग है । हम बात कर रहे हैं बॉलीवुड की बायोपिक फिल्मों की । दरअसल यही बुनियादी फर्क है बॉलीवुड या हॉलीवुड में । बॉलीवुड में नजर होती है मसाला और मुनाफा पर जबकि हॉलीवुड कला पर भी अपना ध्यान केंद्रित करता है । हमारे देश के फिल्मकार बाबा साहब भीमराव अंबेडकर या फिर सरदार पटेल पर फिल्म बनाने के लिए सरकार का मुंह जोहते हैं और सरकारी मदद के बाद हीइन शख्सियतों पर फिल्में बनाते हैं । यह विंडबना ही कही जाएगी कि गांधी पर अबतक की सबसे बेहतरीन फिल्म भारत से बाहर बनी है । रिचर्ड अटनबरो को ही गांधी में संभावना नजर आई और उन्होंने विश्व प्रसिद्ध फिल्म का निर्माण किया । गांधी पर बनी ये फिल्म उन्नीस सौ बयासी में रिलीज हुई थी । बेन किंग्सले अभिनीत इस फिल्म की याद करीब तीन दशक से ज्यादा बीच जाने के बाद भी भारतीय मानस में ताजा है । इसी तरह से हॉलीवुड से महान गणितज्ञ रामानुजन पर बनी फिल्म 29 अप्रैल को रिलीज हो रही है । द मैन हू न्यू इनफिनिटी के बनने की बेहद दिलचस्प दास्तां हैं । रॉबर्ट केनिगेल की किताब- द मैन हू न्यू इनफिनिटी, ए लाइफ ऑफ द जीनियस रामानुजन को अमेपिकर स्क्रिप्ट राइटर मट ब्राउन ने ढूंढ निकाला और उसपर फिल्म बनी । पिछले साल इसका प्रीमियर टोरंटो फिल्म फेस्टिवल में हो चुका है । पिछले साल गोवा इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में इस फिल्म को दिखाया गया था । अब ये फर्क साफ तौर पर देखा जा सकता है । दरअसल बॉलीवुड में फिल्म मेकिंग शुद्ध कारोबार है और फिल्म या कहानी का चयन मुनाफे को ध्यान में रखकर किया जाता है । बॉयोपिक अगर ज्यादा बन रहे हैं तो इसके पीछे भी भाग मिल्खा भाग और मैरी कॉम की सफलता है । इस बात को फिल्म से जुड़े लोग स्वीकार भी करते हैं । इंतजार तो इस बात का है कि कब हमारे यहां भी असल मायने में बायोपिक बनाने वाले फिल्मकार सामने आएं ।  

Saturday, January 14, 2012

धौनी नहीं बुढ़ाते खिलाड़ी जिम्मेदार

विदेशी धरती पर पिछले छह टेस्ट में लगातार हार से भारतीय क्रिकेट में भूचाल आया हुआ है । एक दो लोगों को छोड़कर तमाम पूर्व क्रिकेटर और दिग्गज भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान महेन्द्र सिंह धौनी को इस शर्मनाक हार का जिम्मेदार मानते हैं । धौनी के सर हार का ठीकरा फोड़ने के बाद अब उनके आलोचकों ने धौनी को हटाने का एक अभियान सा छेड़ दिया है । जिस महेन्द्र सिंह धौनी ने अब से नौ महीने पहले ही देश को क्रिकेट विश्व कप का तोहफा दिया था वही धौनी अब क्रिकेट के सबसे बड़े खलनायक करार दिए जा रहे हैं । हमें धौनी की आलोचना के पीछे के मनोविज्ञान और मानसिकता को समझने की जरूरत है । जब से भारत ने क्रिकेट खेलना शुरू किया तब से लेकर अबतक भारत में भी यह खेल अभिजात वर्ग के हाथ में ही रहा । क्रिकेट और क्रिकेट से जुड़े अहम संस्थाओं पर भी उसी इलीट वर्ग का वर्चस्व रहा । बड़े शहरों के बड़े लोगों का खेल क्रिकेट । दिल्ली और मुंबई का इस खेल पर लंब समय तक आधिपत्य रहा । लेकिन धौनी ने भारतीय क्रिकेट के उस मिथ को तोड़ा । झारखंड के एक छोटे से शहर रांची से आकर धौनी विश्व क्रिकेट के आकाश पर धूमकेतु की तरह चमके और छा गए । भारतीय क्रिकेट में धौनी युग की शुरूआत के बाद क्रिकेट दिल्ली मुंबई से निकलकर अमेठी-मेरठ हापुड-मेवात तक पहुंचा और वहां के खिलाड़ी सामने आने लगे और उन्होंने अपनी प्रतिभा का लोहा भी मनवाया। जब धौनी भारत के लिए तमाम सफलता हासिल कर रहे थे तब भी कई पूर्व क्रिकेटर उसको धौनी की मेहनत नहीं बल्कि किस्मत से जोड़कर देख रहे थे । उनको धौनी की सफलता रास नहीं आ रही थी । दिल्ली और मुंबई महानगरों की मानसिकता में जी रहे इन क्रिकेटरों को धौनी की सफलता से रश्क होने लगा था और वो उसको पचा नहीं पा रहे थे । इसलिए जैसे ही धौनी की कप्तानी में टीम इंडिया की हार होने लगी है तो महानगरीय मानसिकता वाले पूर्व क्रिकेटरों को भारतीय कप्तान पर हमला करने का मौका मिल गया ।धौनी की कप्तानी कौशल पर भी सवाल खड़े होने लगे और कुछ लोग तो उनको हटाने की मांग भी करने लगे हैं । लेकिन धौनी को हटाने की मांग करनेवाले या टीम इंडिया की हार के लिए अकेले धौनी को जिम्मेदार ठहरानेवाले इन विशेषज्ञों की टीम के दिग्गज और बुढा़ते बल्लेबाजों पर चुप्पी आश्चर्यजनक है। आज भारतीय टीम में जितने खिलाड़ी खेल रहे हैं अगर उनके शतकों को जोड़ दिया जाए तो वह पर्थ टेस्ट की पहली पारी में टीम इंडिया के स्कोर के करीब करीब बराबर होगी । लेकिन इतने दिग्गज बल्लेबाजों के रहते भी टीम इंडिया लगातार हार रही है तो सिर्फ कप्तान पर सवाल खड़े करने की वजह से क्रिकेट से अलहदा नजर आती है । टीम इंडिया के चार बड़े और दिग्गज बल्लेबाज- सचिन तेंदुलकर, विरेन्द्र सहवाग, राहुल द्रविड़ और वी वी एस लक्ष्मण का बल्ला विदेशी पिचों पर चल ही नहीं पा रहा है । क्रिकेट के भगवान सचिन तेंदुलकर पिछले कई मैचों से एक शतक नहीं लगा पाने की वजह से भारी दबाव में हैं और अपने प्राकृतिक खेल से दूर होते जा रहे हैं । सचिन पर अपने सौंवे शतक का दबाव इतना ज्यादा है कि उसका खामियाजा टीम को उठाना पड़ रहा है । सवाल यह उठता है कि सचिन तेंदुलकर को और कितना मौका दिया जाएगा । क्या अब वक्त नहीं आ गया है कि सचिन को खुद से संन्यास लेकर नए लोगों को खेलने का मौका देना चाहिए । अगर सौंवा शतक नहीं बन पा रहा है तो कब तक भारत उसका इंतजार करते रहेगा । धौनी पर आलोचना का तीर चलानेवाले विशेषज्ञों को यह कहने का साहस क्यों नहीं है कि सचिन को संन्यास ले लेना चाहिए ।
भारत के दूसरे दिग्गज बल्लेबाज विरेन्द्र सहवाग की बात करें तो वहां तस्वीर और भी दयनीय है । सहवाग कभी अच्छी बल्लेबाजी करते होंगे, अभी कुछ दिनों पहले देश में ही उन्होंने तिहरा शतक भी लगाया लेकिन विदेशी दौरों पर उनका प्रदर्शन दयनीय से भी बदतर है । दक्षिण अफ्रीका से लेकर ऑस्ट्रेलिया तक में सहवाग जब भी ओपनिंग करने आए तो बुरी तरह से फ्लॉप रहे । विदेशी धरती पर ओपनर के तौर पर उनका औसत 16 का है और भारतीय उपमहाद्वीप के बाहर शतक लगाए हुए उनको चार साल हो गए । धौनी की आलोचना करनेवालों को सहवाग का इतना घटिया प्रदर्शन नजर नहीं आ रहा है । क्या अब वक्त नहीं आ गया है कि सहवाग को टीम से बाहर का रास्ता दिखाया जाए । कब तक अतीत में अच्छे प्रदर्शन के आधार पर टीम इन वरिष्ठ खिलाड़ियों को ढोती और उसकी वजह से हारती रहेगी । सहवाग के अलावा एक जमाने में टीम इंडिया की दीवार कहे जानेवाले राहुल द्रविड़ के खेल को देखें तो वहां तो हालात और भी खराब है । मेलवर्न से लेकर पर्थ तक की पांच पारियों में द्रविड़ ने 24 रनों की औसत से 121 रन बनाए हैं और चार बार बोल्ड आउट हुए हैं । टीम इंडिया की दीवार अब ढहती नजर आने लगी है । तकनीक के मास्टर माने जानेवाले द्रविड़ जब पांच में चार पारियों में बोल्ड आउट होते हैं तो चयनकर्ताओं के लिए सोचने का वक्त आ गया है । उसी तरह अगर लक्ष्मण की बल्लेबाजी का आकलन करें तो वहां भी निराशा ही हाथ लगती है । ऐसे में सिर्फ धौनी को जिम्मेदार मानना उस शख्स के साथ अन्याय है जिसने देश को वनडे और टी-20 विश्वकप का तोहफा दिया । धौनी की कप्तानी पर सवाल खड़े करनेवालों को विश्व कप का फाइनल याद करना चाहिए जहां सहवाग के शून्य और सचिन के अठारह रन पर आउट होने के बाद धौनी ने जबरदस्त फॉर्म में चल रहे युवराज सिंह की बजाए खुद को बल्लेबाजी क्रम में उपर किया और फाइनल में नाबाद 97 रन बनाकर भारत को शानदार जीत दिलाई । हाई वोल्टेज मैच में शानदार छक्का लगाकर मैच जिताने का जिगरा बहुत ही कम बल्लेबाजों को होता है । उसी तरह टी-20 विश्व कप के फाइनल में जोगिंदर शर्मा को आखिरी ओवर देकर धौनी ने जीत हासिल की थी । तब सभी लोग धौनी की कप्तानी और उनकी रणनीति के गुणगान करने में जुटे थे । सौरभ गांगुली और सचिन ने भी अगल अलग वक्त पर धौनी को महानतमन कप्तान कहा है । टीम इंडिया के कोच गैरी कर्स्टन ने भी रिटायरमेंट के बाद कहा था कि अगर उन्हें युद्ध के मैदान में जाना होगा तो धौनी को अपना सेनापति रखना पसंद करेंगे । दरअसल क्रिकेट एक टीम गेम है और वो महान अनिश्चतिताओं का भी खेल है । इसमें किसी एक वयक्ति के प्रदर्शन पर हार या जीत का फैसला कम ही होता है ।
अगर हम हाल के दिनों में भारतीय क्रिकेट के खराब प्रदर्शन पर नजर डालें तो उसके लिए भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड जिम्मेदार है । इतना अधिक क्रिकेट खेला जा रहा है कि खिलाड़ी बुरी तरह थक जा रहे हैं उन्हें आराम का मौका बिल्कुल नहीं मिल पा रहा है । चैंपियंस लीग जैसे बैकार के टूर्नामैंट हो रहे हैं जो खिलाड़ियों को तोड़ दे रहे हैं । जरूरत इस बात की है कि बीसीसीआई क्रिकेटिंग कैलेंडर को थोड़ा रिलैक्स्ड रखे । इसके अलावा टीम के हालिया खराब प्रदर्शन के लिए चयनकर्ता भी कम जिम्मेदार नहीं है । चयनकर्ताओं ने टीम इंडिया के बुढ़ाते खिलाड़ियों के विकल्प के लिए कोई नीति नहीं बनाई, युवा खिलाड़ियों को तैयार नहीं किया । आज सचिन, सहवाग,द्रविड़ और लक्ष्मण का विकल्प दूर दूर तक दिखाई नहीं देता । चयनकर्ताओं में

Thursday, December 4, 2008

बुड्डों ने किया बेड़ागर्क- अनुपम श्रीवास्तव

सचिन जब भी फ्लॉप होते हैं तो यही आवाज़ एडिटोरियल मीटिंगों में गूंजती है कि 'बाहर करो बूढ़ों को' मगर सचिन कभी न कभी मौका देखकर अपने खेल से सभी को चुप कर देते हैं। मैं उन पत्रकारों की बात नहीं कर रहा हूं जो सिर्फ़ इसको भगवान जाग उठा या भगवान सो गया से ज्यादा नहीं समझते। चूंकि सारे संपादकों की रुचि क्रिकेट में है तो क्रिकेट का गुरु बनने की हर कोई कोशिश करता है या फिर दिखने की।
जब मैंने पत्रकारिता का ये प्रोफेशन ज्वाइन ही किया था तब किसी ने कहा था कि सीख जाओगे वक्त के साथ और ये भी जोड़ दिया की तुम अभी बच्चे हो। 'अच्छे-अच्छे गधे घोड़े बन गए इस प्रोफेशन में।' चाहे वो नेता, क्षेत्र या अपने बाप के दम पर आए हों।
कुम्बले और गांगुली रिटायर हो गए और बाकी सभी बूढ़ों का यही हाल होना है मगर जाने क्यों सचिन की बात अलग है। ये खिलाड़ी सारी दुनिया से टक्कर लेता है। शायद भारत का राइस ग्राफ भी ऐसा है जैसा सचिन का रहा। पिछले 19 सालों में जैसा कि लोग अमिताभ बच्चन को एंग्री यंग मैन की भूमिका में देखते थे। तब शायद भारत का भी लुकआउट वैसा ही था जैसा अमिताभ बच्चन की भूमिका रहती थी एंग्री यंग मैन में, जो शायद समाज से दुखी रहता था और उसका फ्रस्ट्रेशन परदे पर दिखता था।
मैंने सचिन के साथ जिया है क्योंकि जब से मैंने होश संभाला सचिन ही देखा। मुझे हमेशा से लगता है कि सचिन हम लोगों के मोटिवेटर हैं और 'सिंबल ऑफ़ होप' हमेशा रहे हैं। कहीं न कहीं मुझे मेरे पूरे स्ट्रगल पीरियड में जाने क्यों सचिन हमेशा याद रहते हैं।
चलो ये तो रहा हाल खेल का। देश-विदेश में जो घटनाएं हो रही हैं उससे हम पत्रकारों पर भारी संकट है। चुनाव का वक्त करीब है... तो आप किस आइडियोलॉजी से जुड़े पत्रकार हैं ये प्रश्न हमेशा आपसे जाने अंजाने पूछा जाता है मगर क्या जवाब है आपके पास। क्या आप संघी हैं या फिर वामपंथी या फिर बताएं कि leftist, rightist, centrist, capitalist हैं। हैं क्या आप। पत्रकार क्या कहे, साहब मैं तो पेट भरने आया हूं प्रोफेशनल हूं। मेरा इंटरेस्ट था इसलिए आया। 'आई एम हेयर बाई चॉइस नोट बाइ डीफॉल्ट ओर बाई चांस'... चल डॉयलाग मत मार। मुझे तो वही याद आता है जो मेरे रिश्तेदारों ने कहा था - जो कुछ नहीं कर पाता जिन्दगी में वही पत्रकार बनता है।
अब जमाना चाहे जो हो गया हो लाखों रुपये में मॉस कम्युनिकेशन की डिग्री मिलती हो या लाखों रुपये की नौकरी है और फिर वही मानसिक डाउनमार्केट सॉरी खांटी पत्रकारों के बीच की जिंदगी। मेरे पास नौकरी मांगने आए एक इन्टर्न ने कहा- सर मेरे पापा ने लाखों रुपये खर्चे कर ये कोर्स कराया है बस मुझे नौकरी दे दीजिए बाकी मैं कर लूंगा, नौकरी बची रहने का भी जुगाड़ देख लूंगा। बाकी मैं सीख लूंगा। मुझे बॉस, नौकरी दे दीजिये।
मैं जब मुंबई में था तो कई नए पत्रकार कहते थे कि जर्नलिस्ट "Is always ahead of times "। "master of all traits"- शायद वो अंग्रेजी के पत्रकार थे इसलिए कहते थे। मीडिया समाज का आईना होता है या फिर में पूछता हूं ' मीडिया में बीते लोग समाज का'... सही कहा बीड़ू
मैं भी कहां फंस गया, ज्ञान की बातों में, ज्ञान कि बातों से ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है। खैर, आजकल दफ्तरों में भी खेल होने लगा है। कंट्रोल में रहेगा। आजकल जैसा सारे न्यूज चैनलों में माहौल है थोड़ा चिल्लाइये, डोज दीजिये फिर जानिये आपकी मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिलेगा। सब डर कर काम करेंगे। खौफ का माहौल होगा, आपकी सब जी हुजूरी करेंगे बस खलीफा बन जाएंगे फिर क्या आप ही आप हैं।
शायद हम हिन्दुस्तानियों को डंडे के बिना काम करने की आदत ही नहीं है। तभी दिमागी शोरगुल में भी हमारी जिंदगी कटती है। नेचुरल इंस्टिंक्ट, टेलेंट क्या होता है। फ्लेयर इसलिये नहीं है क्योंकि सभी नौकरी या खानापूर्ति करने आए हैं। किसको दोष दें आप। अगर सब कुछ ठीक होता तो जो हाल हिन्दी न्यूज़ चैनलों का दिवालियापन है क्या दिवालियापान..अरे... भाई अगर ख़बर नहीं होगी तो हम क्या दिखायेंगे।
राखी सावंत का हैप्पी बर्थडे ही तो दिखायेंगे भले ही वो ऐश्वर्या, माधुरी या तब्बू, कैटरीना, दीपिका नहीं। अगर वो मीडिया को यूज, सॉरी..समय देना चाहें तो क्या बुराई है। ड्रामा हर रोज मिलता नहीं है। देश में हार्ड न्यूज़ देखता कौन है। हांलाकि चुनाव चल रहे हैं मगर फिर भी रेटिंग का सवाल है।
वो तो भला हो मुंबई ब्लास्ट का कि कुछ जर्नलिज्म करने को मिला। हम सब ने वो ही किया जो कभी भी किसी ने नहीं किया था। जाहिर तौर पर खबर ही ऐसी थी। मगर कहीं न कहीं हर पैमाने पर होड़ लगी हुई थी। आखिर बुराई क्या है इसमें। .......थैंक्स मुंबई ब्लास्ट....180 फीसदी का इजाफा हुआ व्यूअरशिप में। मगर अब तो ये खबर भी ख़त्म हो रही है। पब्लिक मेमोरी इज शॉर्ट ..अब फिर से नया कुछ खोजना पड़ेगा।
चुनाव है न मगर क्या जो जनता का गुस्सा है नेताओं के प्रति इससे चैनल संख्या या पोलिंग करने वालो की संख्या में इजाफा होगा। इस रिसेसन के दौर में भी हमारी निकल पड़ी..सही है बिड़ू। बाकवास बंद कर और नौकरी कर।
छोड़िए, नौकरी कीजिए..नौकरी...नहीं सर नहीं आपको सचिन बनना ही होगा... सचिन बनिए...सचिन बनिए...सचिन।