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Saturday, November 30, 2024

आरंभिक भारतीय फिल्मों से बदलेगा इतिहास


गोवा में आयोजित इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में जानेवालों की अपेक्षा होती है कि उनको कुछ बेहतरीन विदेशी फिल्में देखने को मिल जाएं। वहां पहुंचने वाले सिनेमाप्रेमी फेस्टिवल के शेड्यूल में से अपनी पसंद की फिल्में तलाशते और उसपर चर्चा करते नजर आते हैं। हाल ही में गोवा में समाप्त हुए फिल्म फेस्टिवल में सात भारतीय क्लासिक फिल्मों को भी नेशनल फिल्म आर्काइव आफ इंडिया ने रिस्टोर (मूल जैसा बनाया) किया। इन फिल्मों का प्रदर्शन फेस्टिवल के दौरान हुआ। इन फिल्मों को दर्शकों ने पसंद किया लेकिन सबसे अधिक रोमांच तो दादा साहब फाल्के की 1919 में बनाई गई फिल्म कालिया मर्दन को देखते समय हुआ। दादा साहब फाल्के ने 1919 में जब इस फिल्म का निर्माण किया था तो बाल कृष्ण की भूमिका उनकी बेटी मंदाकिनी फाल्के ने की थी। ये मूक फिल्म थी। करीब 50 मिनट की इस फिल्म को लाइव संगीत के साथ प्रदर्शित किया गया। उन 50 मिनट में दर्शक मूक फिल्मों के दौर में चले गए थे। जहां पर्दे पर पात्र अपने हाव भाव से दृष्य को जीवंत करते थे और पर्दे के नीचे या साथ बैठे साजिंदे अपने वाद्ययंत्रों से संगीत देकर उन दृष्यों में रोचकता पैदा करते थे। कालिया मर्दन फिल्म में जब नदी में खेल रहे बाल कृष्ण को महिलाएं गोद में लेकर ऊपर उठातीं तो हाल में बैठे आर्केस्ट्रा से निकलने वाला संगीत गजब का प्रभाव पैदा करता था। पर्दे पर जब बाल कृष्ण बांसुरी बजाते तो हाल में बैठा बांसुरी वादक वैसे ही धुन निकालता। 

एक बेहद ही मजेदार दृष्य है इस फिल्म है। कृष्ण और उनके बाल सखा को गांव की एक महिला अपमानित करती है। उन शरारती बच्चों पर पानी फेंक देती है। इससे कृष्ण जी क्षुब्ध हो जाते हैं। अपने साथियों के साथ उस महिला के घर में घुसकर माखन चोरी कर लेते हैं। माखन चोरी से क्रोधित वो महिला कृष्ण के साथियों को पीट देती है। अपमानित बालकों ने महिला से बदला देने की ठानी। एक रात कृष्ण जी उनके घर में घुस जाते हैं। महिला अपने पति के साथ सो रही होती है। नटखट कृष्ण ने सोते हुए पुरुष की दाढ़ी और महिला के बाल आपस में बांध दिए। बाद में जब वो उस कमरे से निकलने का प्रयास करते हैं तो असफल हो जाते हैं। बाल कृष्ण की बदमाशियों को दादा साहब फाल्के ने जिस खूबसूरती के साथ दिखाया है कि आज भी दर्शक आनंदित हो उठते हैं। उनको ये याद ही नहीं रहता है कि इस लंबे दृष्य में किसी तरह का कोई संवाद नहीं है। है तो सिर्फ पार्श्व संगीत। फेस्टिवल के समापन समारोह में रमेश सिप्पी ने इस बात को रेखांकित किया कि आज से 105 वर्ष पहले बनी फिल्म कितनी सुंदर थी और किस तरह से उसमें कहानी को आगे बढ़ाया गया है। उन्होंने फिल्म के कैमरा वर्क की प्रशंसा भी की। यह अनायस नहीं है कि दादा साहब फाल्के को भारतीय फिल्म जगत का पितामह कहा जाता है। इसके अलावा राज कपूर की मास्टरपीस फिल्म आवारा, देवानंद कि हम दोनों, तपन सिन्हा की हारमोनियम, ए नागेश्वर राव की तेलुगु फिल्म देवदासु और सत्यजित राय की सीमाबद्ध और ख्वाजा अहमद अब्बास की सात हिन्दुस्तानी को भी रिस्टोर करके दिखाया गया। नेशनल फिल्म हेरिटेज मिशन के अंतर्गत इन फिल्मों पर काम हुआ। यह कार्य महत्वपूर्ण है। 

हम वापस लौटते हैं फिल्म कालिया मर्दन की ओर। आज से 105 वर्ष पहले बनी इस फिल्म के केंद्र में श्रीकृष्ण का बाल स्वरूप है। उस दौर में जितनी भी फिल्में बन रही थीं सभी भारतीय पौराणिक कथाओं और पात्रों पर आधारित थीं। दादा साहब फाल्के की पत्नी ने उनको कृष्ण के व्यक्तित्व के अलग अलग शेड्स पर फिल्में बनाने के लिए प्रेरित किया। इसके लिए उनकी पत्नी ने अपने गहने गिरवी रखे। उससे मिले पैसे को लेकर फाल्के लंदन गए और वहां से सिनेमैटोग्राफी सीखकर वापस लौटे। अब उनके सामने अपने सपने को साकार करने की चुनौती थी। उन्होंने पहले कृष्ण और फिर राम पर फिल्म बनाने की कोशिश की लेकिन संसाधन के अभाव में उसको छोड़ना पड़ा। फिर राजा हरिश्चंद्र की कहानी पर काम आरंभ किया। विज्ञापन के बावजूद कोई महिला इस फिल्म में अभिनय के लिए तैयार नहीं हो रही थी। निराशा बढ़ती जा रही थी। पास की दुकान में चाय पीने गए। वहां चायवाले लड़के, सालुंके, पर उनकी नजर पड़ी और उस लड़के को तारामती के रोल के लिए तैयार किया गया। इस तरह भारतीय फिल्म में एक पुरुष ने पहली अभिनेत्री का रोल किया। ‘राजा हरिश्चंद्र’ फिल्म बन गई। 3 मई 1913 को बांबे के कोरोनेशन हॉल में उसका प्रदर्शन हुआ। फिल्म लगातार 12 दिन चली। 1914 में लंदन में प्रदर्शित हुई। इनकी दूसरी फिल्म ‘भस्मासुर मोहिनी’ में नाटकों में काम करनेवाली कमलाबाई गोखले ने अभिनय किया। कमला बाई को फिल्म में अभिनय के लिए उस वक्त फाल्के साहब ने आठ तोला सोना, दो हजार रुपए और चार साड़ियां दी थीं। इसके बाद इन्होंने ‘कृष्ण जन्म’ बनाई। कहते हैं कि इस फिल्म ने इतनी कमाई की कि टिकटों की बिक्री से जमा होनेवाले सिक्कों को बोरियों में भरकर ले जाना पड़ता था। सफलता के बाद इनको फाइनेंसर मिल गया। उन्होंने हिंदुस्तान फिल्म कंपनी बनाई। इसी फिल्म कंपनी से दादा साहब फाल्के ने कालिया मर्दन फिल्म का निर्माण किया। फाल्के साहब ने अपने जीवन काल में करीब 900 लघु फिल्में और 20 फीचर फिल्में बनाईं। भारतीय सिनेमा के शोधार्थियों को इस बात की पड़ताल करनी चाहिए कि दादा साहब फाल्के भारतीय पौऱाणिक पात्रो को लेकर ही फिल्में क्यों बनाते रहे। 

जिस तरह से नेशनल फिल्म हेरिटेज मिशन के अंतर्गत पुरानी भारतीय फिल्मों को रिस्टोर करने का कार्य हो रहा है, उसको और बढ़ाने और भारतीय दर्शकों तक पहुंचाने की आवश्यकता है। स्वाधीनता के बाद फिल्मी दुनिया में कई ऐसे निर्माता निर्देशक आए जिन्होंने जो वामपंथी विचार के प्रभाव वाले थे। स्वाधीनता के बाद तत्कालीन भारत सरकार फिल्मी जगत के लोगों को सोवियत रूस भेजकर उनके प्रभाव में आने का रास्ता खोल रही थी। अनके पुस्तकों और दस्तावेजों में इस बात का उल्लेख मिलता है कि किस तरह से सोवियत रूस ने अपने विचारों को भारत में फैलाने के लिए फिल्म और साहित्य जगत का उपयोग किया और सफलता भी प्राप्त की। रूस को सफलता इस कारण मिली क्योंकि उस समय भारत सरकार का सहयोग उनको प्राप्त था। गीतों से लेकर संवाद में पूंजी और पूंजीपतियों पर परोक्ष रूप से हमले शुरु हो गए थे। जमींदारों से लेकर पैसेवालों को बुरा आदमी दिखाने की प्रवृत्ति जोर पकड़ने लगी थी। पूंजीवादी व्यवस्था के कथित दुर्गुणों को फिल्मों में प्रमुखता से दिखाकर भारतीय जनमानस पर साम्यवादी विचारधारा को थोपने का प्रयास हुआ। कहा जाता है कि उस समय से प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का भी परोक्ष समर्थन इस कार्य के लिए था। अगर नेशनल फिल्म हेरिटेज मिशन अपने काम में तेजी लाती है, इसको सरकार की तरफ से उचित संसाधन उपलब्ध होता है तो संभव है कि आनेवाले दिनों में भारतीय फिल्मों के इतिहास को फिर से लिखने की आवश्यकता पड़े। इसके साथ ही विश्वविद्यालयों में भारतीय फिल्मों की प्रवृत्तियों पर जो कार्य हो रहे हैं उनकी भी दिशा बदल सकती है।    


Saturday, December 2, 2017

विवाद उछालने की नीयत !

अपने एक लेख में मशहूर सांस्कृतिक इतिहासकार लोटमान ने लिखा है कि – चिन्हों और प्रतीकों के जरिए संप्रेषण मानवता की सबसे बड़ी उपलब्धि है लेकिन इसती भी नियति तकनीकी सुधार की तरह ही है। जैसे प्राय: सभी तकनीकी सुधार एक प्रकार से दुधारी तलवार होती है जहां उन्हें सामाजिक प्रगति और जनकल्याण के क्षेत्र में अपनी भूमिका का निर्वाह करना पड़ता है वहां नकारात्मक उद्देश्यों के लिए भी उनका उपयोग चालाकी से किया जाता है। चिन्हों और प्रतीकों के उपयोग का उद्देश्य सही रचना देना होता है लेकिन इसका उपयोग बहुधा गलत रचना देने के लिए किया गया गया है। उनका मानना है कि इस प्रकार के चलन से एक बहुत ही विचित्र किस्म की हठवादी विपरीत अवधारणा का विकास हुआ। इस अवधारणा के तहत यह माना जाने लगा कि एक विषय जो कि असत्य हो सकता है बनाम एक विषय जो कि असत्य नहीं हो सकता है। हाल ही में गोवा में संपन्न हुए अंतराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल के दौरान जिस तरह से ‘एस दुर्गा’ फिल्म को लेकर विवाद उठाने की कोशिश की गई, उसको अगर लोटमान की इन अवधारणाओं के आलोक में देखें तो उसमें भी एक हठवादी अवधारणा की अंतर्धारा दिखाई देती है। फिल्मकार ने पहले ‘सेक्सी दुर्गा’ के नाम से फिल्म बनाई, बाद में उसको ‘एस दुर्गा’ कर दिया। फिल्म फेस्टिवल में उसकी स्क्रीनिंग नहीं हो पाई, वो अदालत चले गए वहां से स्क्रीनिंग का आदेश लेकर आए। फिर सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने अदालत में अपील की जहां से जूरी को फैसला लेने को कह दिया गया। फिल्म फेस्टिवल के आखिरी दो दिनों तक इस फिल्म को दिखाए जाने पर सस्पेंस बना रहा। इन दो दिनों के दौरान फिल्म सनल शशिधरन ने गोवा में धरना प्रदर्शन आदि की भी कोशिश की लेकिन ज्यादा तवज्जो नहीं मिली। इस पूरे विवाद का पटाक्षेप सेंसर बोर्ड के एक फैसले से हो गया जिसमें उसने इस फिल्म के सर्टिफिकेशन को रद्द कर दिया। हलांकि अगर इस फिल्म को प्रदर्शित किया जाता तो एक गलत परंपरा की शुरुआत होती कि कोई भी अदालत जाकर जूरी के फैसले को चुनौती देता और फिर अदालत के आदेश के बाद फिल्म की स्क्रीनिंग हो जाती। ऐसा होने से जूरी की आजादी पर भी फर्क पड़ता जो कि स्वस्थ सिनेमा के लिए उचित नहीं होता। हलांकि इस तरह के आयोजनों में फिल्मों के प्रदर्शन की अनुमति का अंतिम अधिकार स्थानीय राज्य सरकार के पास होता है।  
इस पूरे विवाद को हवा देने की कोशिश की गई लेकिन इन तथ्यों को छुपा लिया गया कि फिल्मकार ने ‘एस’ के बाद तीन आयताकार सफेद बॉक्स लगा कर फिल्म को गोवा अंतराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल में दिखाने की अर्जी दी थी। सेंसर बोर्ड से जुड़े जानकारों का कहना है कि ‘एस’ के बाद तीन आयताकार बॉक्स लगाकर उसके बाद दुर्गा लिखने के कई अर्थ हैं। इन आयताकार बॉक्स लगाकर फिल्मकार ये संदेश देने की कोशिश कर रहे हो सकते हैं कि उन्होंने विरोध स्वरूप ‘सेक्सी’ की तीन अक्षरों दो ढंक दिया। शबाना आजमी जैसी अदाकारा ने गोवा फिल्म फेस्टिवल के बहिष्कार का आह्वान किया था लेकिन उसको फिल्मी दुनिया में ही किसी ने तवज्जो नहीं दी। गोवा फिल्म फेस्टिवल के समापन समारोह में अमिताभ बच्चन, सलमान खान, अक्षय कुमार, कटरीना कैफ से लेकर करण जौहर, पूजा हेगड़े, भूमि पेडनेकर और सुशांत सिंह राजपूत के अलावा कई अन्य सितारे मौजूद थे। दरअसल एक खास विचारधारा के पोषकों को बहिष्कार आदि का रास्ता सबसे आसान लगता है। उससे भी आसान है कि कहीं कुछ हो तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को खतरे में होने की बात उछाल दो। यह एक ऐसा जुमला बन गया है जो हर जगह फिट हो जाता है चाहे वो फिल्म हो, साहित्य हो, पत्रकारिता हो, पेंटिंग हो, कहीं भी।
अगर कहीं कुछ गलत होता लग रहा हो तो उसके लिए संवाद करने की जरूरत है, सरकार या आयोजक से बात की जा सकती है। शबाना आजमी जैसी शख्सियतों को मसलों को सुलझाने की कोशिश करनी चाहिए ना कि किसी भी विवाद में अपनी राजनीति को चमकाने का अवसर तलाशना चाहिए। एक अभिनेत्री के तौर पर उनका जितना सम्मान है उसका उपयोग उनको बॉलीवुड के सकारात्मक पैरोकारी में करना चाहिए क्योंकि नकारात्मकता का अंत तो नकार से ही होता है। यह ठीक है कि लोकतंत्र में सबको अपनी बात रखने का हक है, विरोध जताने का हक भी है लेकिन जब आप एक मुकाम हासिल कर लेते हैं तो लोगों की आकांक्षा अलग हो जाती है। इस फिल्म फेस्टिवल के समापन समारोह में अमिताभ बच्चन ने एक बेहतरीन बात की। उन्होंने कहा कि ‘फिल्म ही एक ऐसा माध्यम है जहां तीन घंटे तक हमें अपने बगल में बैठे इंसान के जाति, धर्म, विचारधारा आदि के बारे में पता नहीं होता और ना ही उससे कुछ लेना लेना देना होता है।‘ लेकिन अफसोस कि अमिताभ बच्चन की सोच वाले लोग कम हैं यहां तो लोग फिल्म को लेकर भी राजनीति करने से नहीं चूकते।
विवादों से बेअसर गोवा फिल्म फेस्टिवल में इस वर्ष कुछ बेहद सार्थक काम भी हुए। फिल्म फेस्टिवलों में भी अबतक ज्यादातर एकालाप होता था। या तो फिल्मकार की बातें सुनकर फिल्म देखो, या सितारों की स्पीच सुनो, लेकिन अड़तालीस साल बाद अंतराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल ने अपना दायरा बढाया और एकालाप को संलाप में बदलने की कोशिश की गई।
साहित्य और सिनेमा को लेकर पूर्व में बहुत बातें होती रही हैं। खासतौर पर हिंदी में तो साहित्यकारों के सिनेमा को लेकर अनुभव बहुत अच्छे नहीं रहे हैं। प्रेमचंद के सिनेमा से मोहभंग के बारे में रामवृक्ष बेनीपुरी ने अपने संस्मरण में लिखा है- ‘1934 की बात है । बंबई में कांग्रेस का अधिवेशन हो रहा था । इन पंक्तियों का लेखक कांग्रेस के अधिवेशन में शामिल होने आया। बंबई में हर जगह पोस्टर चिपके हुए थे कि प्रेमचंद जी का ‘मजदूर’ अमुक तारीख से रजतपट पर आ रहा है । ललक हुई, अवश्य देखूं कि अचानक प्रेमचंद जी से भेंट हुई । मैंने ‘मजदूर’ की चर्चा कर दी । बोले ‘यदि तुम मेरी इज्जत करते हो तो ये फिल्म कभी नहीं देखना ।’ यह कहते हुए उनकी आंखें नम हो गईं । और, तब से इस कूचे में आने वाले जिन हिंदी लेखकों से भेंट हुई सबने प्रेमचंद जी के अनुभवों को ही दोहराया है ।‘ प्रेमचंद के अलावा अमृत लाल नागर, उपेन्द्र नाथ अश्क, पांडेय बेचन शर्मा उग्र, गोपाल सिंह नेपाली, सुमित्रानंदन पंत जैसे साहित्यकारों का भी सिनेमा से साथ ज्यादा दिनों तक नहीं चल पाया।
अंतराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल में इस वर्ष साहित्य और सिनेमा से लेकर कहानी की ताकत, उसके कहने का अंदाज और बच्चों के सिनेमा जैसे विषयों पर गंभीर मंथन हुआ। वाणी त्रिपाठी टिक्कू द्वारा क्यूरेट किए गए इन विषयों को लेकर श्रोताओं में खासा उत्साह रहा। साहित्यक प्रेरणा, सिनेमा और लिखित शब्द पर पौऱाणिक कथाओं को आधुनिक तरीके से लिखनेवाले लेखक अमीश त्रिपाठी, कवि और संगीत मर्मज्ञ यतीन्द्र मिश्र के अलावा गीतकार और सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष प्रसून जोशी ने अपने विचार रखे। इसका संचालन वाणी ने किया था। कहानी की ताकत और किस्सागोई पर एक पैनल में बेहद रोचक चर्चा हुई। अगर हम बॉलीवुड को देखें या फिर पूरे भारतीय भाषा की फिल्मों को देखें तो बच्चों की फिल्मों का अनुपात बहुत कम होता है। एक सत्र बच्चों के सिनेमा पर भी केंद्रित था जिसमें प्रसून जोशी और नितेश तिवारी जैसे वक्ता मौजूद थे। चर्चाओं का फलक इतना बड़ा था कि एक पूरा सत्र टैगोर के संसार पर केंद्रित था। आज के जमाने में डिजीटल प्लेटफॉर्म को लेकर बात ना हो तो आयोजन अधूरा सा लगता है। मशहूर फिल्मकार भारतबाला ने इस विषय पर एक सत्र संचालित किया।

दो सत्र बेहद रोचक रहे जिसमें एक तो था ‘अपनी अगली फिल्म कैसे बनाएं’ जिसमें करण जौहर के अलावा एकता कपूर, सिद्धार्थ रॉय कपूर और स्टार फॉक्स के सीईओ विजय सिंह ने अपनी बातें रखीं। दूसरा सत्र ‘नए यथार्थ से मुठभेड़’ पर केंद्रित था। इन दोनों सत्रों में करण जौहर ने बेहद सधे अंदाज में अपनी बात रखी। एकता कपूर हमेशा की तरह संक्षिप्त पर दू द प्वाइंट रहीं। करण जैहर ने एक सत्र में सोशल मीडिया पर फिल्म समीक्षा को लेकर अपनी नाराजगी जाहिर की । उन्होंने कहा कि जिस तरह से इन दिनों ट्वीटर आदि पर फिल्मों की लाइव समीक्षा होती है वो अच्छा संकेत नहीं है। इन सत्रों की परिकल्पना करनेवाली समिति की अध्यक्ष वाणी त्रिपाठी टिक्कू के मुताबिक इस आयोजन का मकसद देश में सिनेमा लिटरेसी को बढ़ावा देना है। इन सत्रों में लोगों की उपस्थिति ने इस बात के संकेत दे दिए हैं कि इस तरह का प्रयोग लोगों को पसंद आया। कुल मिलाकर अगर हम देखें तो बेवजह के विवादों को उठाने की कोशिशों को सकारात्मक पहल ने हाशिए पर पहुंचा दिया।