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Saturday, June 7, 2025

कम्युनिस्ट नैरेटिव के नामवर आलोचक

हिंदी आलोचना में नामवर सिंह का नाम आदर के साथ लिया जाता रहा है। आरंभिक दिनों में उन्होंने विपुल लेखन किया। कालांतर में लेखन उनसे छूटा। वो भाषण और व्याख्यान की ओर मुड़ गए। दोनों स्थितियों में नामवर सिंह ने कम्युनिस्ट पार्टी के लिए कार्य किया। उनके निर्देशों के आधार पर नैरेटिव बनाने और बिगाड़ने का खेल खेला। आलोचना में भी उन्होंने नैरेटिव ही गढ़ा। उनके लेखों के विश्लेषण से ये स्पष्ट है। नामवर सिंह के शिष्यों ने उनके व्याख्यानों का लिप्यांतरण करके पुस्तकें प्रकाशित करवाईं। पिछले दिनों नामवर सिंह के पुत्र विजय प्रकाश सिंह और उनके जीवनीकार अंकित नरवाल ने एक पुस्तक संकलित-संपादित की, जमाने के नायक। प्रकाशन वाणी प्रकाशन से हुआ है। पुस्तक की भूमिका में नरवाल ने नामवर सिंह के बनने और सुदृढ होने को रेखांकित किया। उनकी प्रशंसा की, जो स्वाभाविक ही है। इस पुस्तक के लेखों में नामवर सिंह की आलोचना में फांक दिखती है। आलोचक कम पार्टी कार्यकर्ता अधिक लगते हैं। जिन साहित्यिक घटनाओं और कथनों को उद्धृत करके स्थापना देते हैं वो उनकी आलोचकीय ईमानदारी और विवेक
को संदिग्ध बनाती है। राष्ट्रीय पुस्तक न्यास से प्रकाशित पुस्तक ‘लेनिन और भारतीय साहित्य’ से साभार नामवर सिंह का एक लेख इस पुस्तक में है। नामवरीय आलोचना का ऐसा उदाहरण जो उनकी छवि को धूमिल करता है। नामवर सिंह 1917 के बाद भारत की राजनीति को लेनिन से जोड़कर रूसी क्रांति के प्रभाव की पताका फहराते हैं। साहित्य में भी।  वो लिखते हैं, साहित्य का इस वातावरण से सर्वथा अस्पृष्ट रहना असंभव था। 1936 में प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना आकस्मिक नहीं बल्कि इन घटनाओं की सहज परिणति थी जिसके संगठनकर्ता लेनिन के विचारों को मानने वाले नौजवान कम्युनिस्ट थे, किंतु जिसमें निराला और पंत जैसे हिंदी के कवियों ने सहर्ष भाग लिया और अखिल भारतीय ख्याति के कथाकार प्रेमचंद ने जिसके अधिवेशन की अध्यक्षता की।

इसी पुस्तक में एक और लेख संकलित है, गोर्की और हिंदी साहित्य। यहां वो जोर देकर कहते हैं कि, तथ्य है कि गोर्की की मृत्यु से तीन महीने पहले प्रेमचंद प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना में योग देकर भारत में प्रगतिशील साहित्य के आंदोलन का सूत्रपात कर चुके थे। प्रगतिशील लेखक संघ के प्रथम अधिवेशन के अध्यक्ष पद से उन्होंने जो भाषण दिया था, वो गोर्की के विचारों का भारतीय भाष्य मात्र नहीं बल्कि भारत को अपने ऐतिहासिक संदर्भ में निर्मित साहित्य का सर्जनात्मक दस्तावेज है। यहां वो फिर से ये कहते हैं कि प्रेमचंद ने प्रगतिशील लेखक संघ के पहले अधिवेशन की अध्यक्षता की। नामवर ऐसा कहते हुए कहीं भी किसी सोर्स का उल्लेख नहीं करते हैं। सुनी-सुनाई बातें बार-बार लिखते हैं। नामवर सिंह और उन जैसे अन्य पार्टी लेखकों के कहने पर मान लिया गया कि प्रेमचंद ने अध्यक्षता की थी। नामवर को किसी दस्तावेज आदि के आधार पर ये कहना चाहिए था। उल्लेख तो इस बात का भी मिलता है कि प्रेमचंद जैनेन्द्र के कहने पर अधिवेशन में शामिल होने चले गए थे। उनका भाषण देने का कार्यक्रम नहीं था। जब अधिवेशन में पहुंचे तो वहां उपस्थित साहित्यकारों ने उनसे आग्रह किया और वो मंच से बोले। इसको प्रचारित करवा दिया गया कि प्रेमचंद प्रगतिशील लेखक संघ के संस्थापकों में से थे। बाद में संशोधन कर कहा जाने लगा कि वो पहले अधिवेशन के अध्यक्ष थे। अब प्रेमचंद के प्रगतिशील लेख संघ में दिए गए भाषण के अंश को देखते हैं, ‘प्रगतिशील लेखक संघ यह नाम ही मेरे विचार से गलत है। साहित्यकार या कलाकार स्वभावत: प्रगतिशील होता है। अगर वो इसका स्वभाव न होता तो शायद वो साहित्कार ही नहीं होता। उसे अपने अंदर भी एक कमी महसूस होती है, इसी कमी को पूरा करने के लिए उसकी आत्मा बेचैन रहती है।‘ सामान्य सी बात है कि अगर वो अध्यक्षता कर रहे होते तो ये प्रश्न नहीं उठाते। नामवर सिंह कहते हैं कि प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना में उनका योगदान था। अगर योगदान होता तो प्रगतिशीलता के नाम पर प्रेमचंद संघ के संस्थापकों के साथ पहले चर्चा करते। मंच से आपत्ति क्यों करते। अजीब मनोरंजक बात है कि लेखक संघ का नाम तय हो रहा था और स्थापना में योगदान करनेवाले को पता नहीं था। 

नामवर सिंह कम्युनिस्ट पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़े थे। पार्टी के बाहर के लेखकों को वो येन केन प्रकारेण कम्युनिस्ट विचारधारा से प्रभावित साबित करने में लगे रहते थे। इसके लिए चाहे किसी भी शब्द की कैसी भी व्याख्या क्यों न करनी पड़े। इसके पीछे भी लेनिन की सीख थी। उक्त लेख में नामवर सिंह ने उल्लेख किया है, लेनिन का एक निबंध पार्टी साहित्य और पार्टी संगठन, जिसमें पार्टी लेखकों से पूरी पक्षधरता का आग्रह किया गया था। नामवर सिंह ने लेनिन की पक्षधरता वाली बात अपना ली। अब निराला को लेनिन के प्रभाव में बताने के लिए वो उनकी 1920 की एक कविता बादल राग की पंक्तियां लेकर आए। पंक्ति है- तुझे बुलाता कृषक अधीर/ऐ विप्लव के वीर। अब इस पंक्ति में चूंकि कृषक भी है और विप्लव भी तो निराला कम्युनिस्ट हो गए। विप्लव शब्द का प्रयोग निराला बांग्ला के प्रभाव में करते रहे हैं। राम की शक्ति पूजा से लेकर तुलसीदास जैसी उनकी लंबी कविता में भी ये प्रभाव दिखता है। खेत-खलिहान, किसान-मजदूर को बहुत आसानी से नामवर सिंह जैसे नैरेटिव-मेकर्स ने सर्वाहारा बना दिया था। नामवर सिंह ने तो जयशंकर प्रसाद को भी लेनिन से प्रभावित बता दिया। दिनकर की कविता में लेनिन शब्द आया तो उसपर लेनिन के विचारों का प्रभाव। वो स्वाधीनता के आंदोलन और आंदोलनकर्ताओं की भावनाओं को नजरअंदाज करके उसपर लेनिन की छाप बताने में लगे रहे। लेखकों को कम्युनिस्ट घोषित और स्थापित करते रहे, तथ्यों की व्याख्या से छल करते हुए। प्रेमचंद अगर कह रहे हैं कि आनेवाला जमाना अब किसानों मजदूरों का है तो उनको कम्युनिस्ट या लेनिन के प्रभाव वाले बताने में नामवर ने जरा भी विलंब नहीं किया। वो कम्युनिस्टों को लाभ पहुंचानेवाला नैरेटिव गढ़ रहे थे। नामवरी आलोचना का एक और उदाहरण देखिए, ‘निराला ने भी प्रेमचंद की तरह लेनिन पर स्पष्टत: कहीं कुछ नहीं लिखा पर उनकी विद्रोही प्रतिभा में लेनिन का प्रभाव बीज रूप में सुरक्षित अवश्य था।‘ ये विद्रोही प्रतिभा अंग्रेजों के खिलाफ उस दौर के सभी लेखकों कवियों में मिलता है। एक जगह कहते हैं कि प्रेमचंद समाजवादी यथार्थवाद से प्रभावित थे या नहीं, इसका कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है लेकिन इतना निश्चित है कि...। यह वही प्रविधि है जिसका निर्वाह इतिहास लेखन में रोमिला थापर और बिपिन चंद्रा जैसे इतिहासकारों ने किया। वो अपनी स्थापना तो देते हैं लेकिन साथ ही लिख देते हैं, इट अपीयर्स टू बी, पासेबली, प्रोबैबिली आदि। इस प्रविधि का लाभ ये होता है कि आम पाठक वही समझता है जो लेखक कहना चाहता है। कभी अगर स्थापना पर सवाल उठे तो इन शब्दों की आड़ लेकर बचकर निकल सके। आज इस बात की आवश्कता प्रबल होती जा रही है कि नामवर सिंह ने कम्युनिस्ट पार्टी के लिए जो नैरेटिव गढ़ा उसको उजागर किया जाए क्योंकि उस नैरेटिव से किसी भी रचनाकार का सही आकलन संभव नहीं। 


Saturday, May 14, 2022

फिल्मों के स्वावलंबन का सफर


आज पूरा देश स्वाधीनता का अमृत महोत्सव मना रहा है। अमृत महोत्सव के अवसर पर हमें इस बात पर भी विचार करना चाहिए कि भारतीय फिल्मों ने स्वाधीनता के बाद जो स्वावलंबन की राह पकड़ी वो कैसी थी, उनमें किस तरह की बाधाएं आ रही थीं। स्वाधीनता के बाद के भारतीय फिल्म के परिदृश्य पर विचार करने से पहले फिल्मों को लेकर दो बयान पर नजर डाले लेते हैं। पहला बयान रूस के कम्युनिस्ट नेता लेनिन का और दूसरा है महात्मा गांधी का। रूस की क्रांति के बाद लेनिन ने कहा था कि ‘हमारे लिए सिनेमा सभी कलाओं से अधिक महत्वपूर्ण है। सिनेमा केवल लोगों के मन बहलाव का नहीं बल्कि सामाजिक शिक्षा, संवाद स्थापित करने तथा हमारी विशाल जनसंख्या को एकसूत्र में बांधने का सशक्त साधन भी है।‘ रूसी क्रांति के दो साल बाद वहां के फिल्म उद्योग का राष्ट्रीयकरण करके उसको एक मंत्रालय के अधीन कर दिया गया था। इसके ठीक दस साल बाद भारत में स्वाधीनता संग्राम तेज हुआ। गांधी इसके सर्वमान्य नेता के तौर पर स्थापित हुए। उस वक्त तक गांधी फिल्म की शक्ति को पहचान नहीं पाए। पहचान तो वो बाद में नहीं पाए। गांधी फिल्मों को एक बुराई की तरह देखते थे। 1929 में वो बर्मा (अब म्यांमार) गए थे। वहां उनको एक नाटक देखना पड़ा। देखना पड़ा इस वजह से क्योंकि वो सोच कर गए थे कि मजदूरों की किसी सभा में जाना पड़ा रहा है। लेकिन जब वहां पहुंचे तो  नाटक का मंचन हो रहा था। गांधी ने वहां एक भाषण दिया जो गांधी वांग्मय में संकलित है। गांधी ने कहा, ‘सार्वजनिक नाटकघरों में जाने के अन्य जो भी परिणाम हो यह तो निश्चित ही है कि नाटकों ने अनेकानेक युवकों का आचरण और चरित्र भ्रष्ट कर दिया है। आप पक्की उम्र के लोग चाहे अपने को नाटकों के दुष्प्रभाव से बिल्कुल बरी मान लें, लेकिन आपको अपने छोटे-छोटे बच्चों का भी खयाल करना चाहिये जिनको आपत्तिजनक नाटकों में ले जाकर आप उनके निर्दोष, निष्पाप मन के साथ कितना बड़ा अनाचार कर रहे हैं।  आप चारों ओर नजर तो डालिये वर्तमान व्यवस्था के कुप्रभाव में पनपने वाले सिनेमा, नाटक, घुड़दौड़, शराबखाने और अफीमघर इत्यादि के रूप में समाज के ये सभी शत्रु चारों और से मुंह बाए हमारी घात में खड़े हैं।‘  सिनेमा को गांधी समाज का शत्रु मानते थे लेकिन लेनिन उसको सामाजिक शिक्षा का माध्यम मानते थे।  एक तरफ सिनेमा को लेकर लेनिन के विचार तो दूसरी तरफ गांधी के। 

स्वतंत्रता के बाद भारतीय फिल्मों की चुनौतियों पर बात करने के पहले गांधी के विचारों का ध्यान ऱखना होगा। 1947 में जब देश स्वाधीन हुआ तो फिल्म उद्योग के लोगों ने महात्मा गांधी को एक कार्यक्रम में आमंत्रित करना चाहा। उस समय गांधी के सचिव ने आयोजकों को उत्तर दिया था कि फिल्म से संबंधित किसी भी कार्यक्रम में गांधी जी को बुलाने के बारे में सोचिए भी नहीं क्योंकि फिल्मों को लेकर बापू की राय अच्छी नहीं है। कई जगह इस बात का उल्लेख मिलता है कि चक्रवर्ती राजगोपालाचारी भी फिल्मों को पाप फैलाने का माध्यम मानते थे और कहा करते थे कि फिल्में पश्चिम के घटिया मूल्यों को भारतीय समाज पर थोपतीं है। ये ठीक है कि दूसरे विश्वयुद्ध के पहले और बाद में भी विदेशी फिल्में बड़ी संख्या में भारत में आ रही थीं। उनका प्रदर्शन भी सफलतापूर्वक होता था। उनमें से कई फिल्मों में नग्नता होती थी। लेकिन ये भी उतना ही सच है कि दर्जनों भारतीय निर्माता निर्देशक अपने पौराणिक चरित्रों और संत महात्माओं को केंद्र में रखकर फिल्में बना रहे थे। जो काफी सफल भी हो रही थी। 1917 में दादा साहब फाल्के ने ‘लंका दहन’ के नाम से एक फिल्म बनाई थी। 1918 में श्रीनाथ पाटणकर ने ‘राम वनवास’ के नाम से एक ऐतिहासिक फिल्म बनाई। पाटणकर ने इसके बाद ‘सीता स्वंयवर’, ‘सती अंजनि’ और ‘वैदेही जनक’ नाम से फिल्में बनाईं थीं। मूक फिल्मों के दौर में तकरीबन हर वर्ष राम कथा पर केंद्रित फिल्में बनती थीं, इनमें से अहिल्या उद्धार, श्रीराम जन्म, लव कुश, राम रावण युद्ध, सीता विवाह, सीता स्वयंवर और सीता हरण आदि प्रमुख फिल्में हैं। बोलती फिल्मों के दौर में भी रामकथा को आधार बनाकर कई फिल्में बनीं। प्रकाश पिक्चर्स ने वाल्मीकि रामयाण पर आधारित चार फिल्में बनाईं, ‘भरत मिलाप’, ‘रामराज्य’, ‘राम वाण’ और ‘सीता स्वयंवर’। इन फिल्मों में राम का किरदार प्रेम अदीब और सीता की भूमिका शोभना समर्थ ने निभाई थी। बावजूद फिल्मों को लेकर गांधी के विचार नहीं बद सके थे। उसका असर प्रत्यक्ष और परोक्ष असर भारत के फिल्म उद्योग पर पड़ा। फिल्मों को लेकर सरदार पटेल और नेहरू के विचार गांधी से अलग थे। गांधी के जीवनकाल में ही पटेल ने मुंबई (तब बांबे) में फिल्म उद्योग के लोगों की एक सभा में उनको भरपूर सहयोग का वादा किया था। गांधी के निधन के बाद नेहरू ने भी फिल्मों को लेकर सकारात्मक रुख दिखाया था। 

इस पृष्ठभूमि के बावजूद भारतीय फिल्म उद्योग लगातार बढ़ता रहा तो इसके पीछे की वजह फिल्मों को लेकर इससे जुड़े लोगों का इस विधा में विश्वास था। स्वाधीनता के बाद 1948 में एक फिल्म रिलीज हुई थी, जिसका नाम था चंद्रलेखा। इस फिल्म का निर्माण मद्रास की जैमिनी स्टूडियो ने किया था और इसके निर्देशक एस एस वासन थे। ये भव्य फिल्म तीस लाख रुपए की लागत से तैयार हुई थी। सालभर में करीब दो करोड़ रुपए का कारोबार इस फिल्म ने किया था। यहीं से हिंदी फिल्मों को सफलता का एक सूत्र मिला जिसको कई फिल्म निर्माताओं ने अपनाया। ये सूत्र था एक नायिका और उसको चाहनेवाले दो अभिनेता। ये फार्मूला कई सालों तक चलता रहा। अब भी गाहे बगाहे किसी न किसी फिल्म में ये कथानक देखने को मिल जाता है। 1950 के आसपास कुछ ऐसी घटनाएं घटीं जिसने भारतीय फिल्मों के स्वरूप को बहुत हद तक प्रभावित किया। भारत सरकार ने 1949 में एस के पाटिल की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई जिसको फिल्म उद्योग की स्थिति के बारे में आकलन करने और उसमें बेहतकी के लिए सुझाव का जिम्मा सौंपा गया। 1951 में राजकपूर की फिल्म अवारा रिलीज हुई। इस फिल्म को देश के अलावा विदेश खासतौर पर रूस में अपार लोकप्रियता मिली। इसके सालभर बाद 1952 में देश के चार महानगरों में फिल्म फेस्टिवल का आरंभ हुआ। बांबे ( तब मुंबई ), दिल्ली, चेन्नई (तब मद्रास) और कोलकाता (तब कलकत्ता) में भारतीय के साथ साथ विदेशी फिल्मों का प्रदर्शन हुआ। इसने भारतीय फिल्म उद्योग को विदेश की कलात्मक फिल्मों से परिचय करवाया। जापान, रूस और इंगलैंड से फिल्में आईं। इस आयोजन से हमारे देश में फिल्म संस्कृति के विकास की नींव पड़ी। 

स्वाधीनता के पहले जिस स्टूडियो व्यवस्था की नींव पड़ी थी वो आज बहुत सफल है। आज फिल्मों के निर्माण की दर्जन भर से अधिक कंपनियां करोड़ों और कुछ तो अरबों रुपए का कारोबार कर रही हैं। अगर हम स्टूडियो के व्यावसायीकरण की बात करें तो इसका आरंभ स्वाधीनता के पहले ही हो गया था। फरवरी 1934 में हिमांशु राय ने बम्बई टाकीज के लिए पच्चीस लाख रुपए जुटाने के लिए सौ रुपए के पच्चीस हजार शेयर जारी किए थे। देविका रानी ने लिखा था कि ‘1935 में जब हमने बम्बई के मलाड में बम्बई टाकीज स्थापित किया तो तो उसे एक व्यापार की तरह चलाया। हमारी कंपनी के पास श्रेष्ठ उपकरण थे- बेल एंड हावेल कंपनी के कैमरे थे और आरसीए ध्वनि पद्धति थी।‘ इसके पहले भी फिल्म कंपनियां फिल्मों का निर्माण कर रही थीं लेकिन हिमांशु राय ने उसको एक अलग आयाम दिया। आज भारतीय फिल्म उद्योग जगत दुनिया के सबसे बड़े फिल्म उद्योगों में शामिल हो चुका है और निरंतर मजबूत हो रहा है।