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Tuesday, February 21, 2017

सियासत की विरासत से परहेज क्यों ?

अभी हाल ही में तमिलनाडू में जिस तरह का सियासी ड्रामा हुआ उसपर विराम तो लग गया है लेकिन अंदेशा इस बात का है कि ये विराम अस्थायी है । जयललिता की विरासत को लेकर पनीरसेल्वम और शशिकला के खेमे के बीच जोर आजमाइश के कई दौर अभी बाकी हैं । अम्मा की जगह चिनम्मा आ तो गईं लेकिन उनकी रहनुमाई कई अन्य नेताओं को मंजूर नहीं है । वो तो सुप्रीम कोर्ट ने शशिकला को जेल भेज दिया नहीं तो पलानीस्वामी की जगह वही तमिलनाडू की कमान संभालती । दरअसल यह पूरा खेल जयललिता की राजनीतिक विरासत पर कब्जे को लेकर है । जयललिता ने पार्टी में दूसरे नंबर का नेता बनाया ही नहीं या फिर किसी को इस तरह का दर्जा नहीं दिया । लिहाजा जब उनकी मृत्यु हुई तो एआईएडीएमके में उनकी विरासत को लेकर ड्रामेबाजी शुरू हो गई । दरअसल यह सिर्फ तमिलनाडू की सियासत में नहीं हुआ है । इस तरह के वाकए सभी राजनीतक दलों में देखने को मिलते हैं । हाल ही में इसका नमूना उत्तर प्रदेश में देखने को मिला था जहां मुलायम सिंह यादव की विरासत को लेकर उनके बेटे अखिलेश यादव और उनके छोटे भाई शिवपाल यादव के बीच तलवारें खिचीं थी । उपर से देखने पर ये भले ही अमर सिंह या फिर अन्य मसलों को लेकर अधिकारों की लड़ाई लगे लेकिन दरअसल ये पूरा झगड़ा मुलायम की विरासत पर कब्जे की जंग को लेकर है । अखिलेश को लगता है कि मुलायम सिंह यादव के पुत्र होने की वजह से उनकी सियासी विरासत पर उनका हक है, उधर शिवपाल सिंह यादव लगातार इस बात का संकेत देते रहते हैं कि नेताजी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर उन्होंने समाजवादी पार्टी को खड़ा किया है । जहां जहां कुनबा बड़ा है वहां सत्ता का ये संघर्ष भी बड़ा है और हर कोई अपने हिस्से को लेकर सजग और आक्रामक दिखाई देता है । इन दोनों दलों के अलावा अगर दो हजार तेरह और चौदह की देश की राजनीति पर नजर डालें तो उस दौर में भारतीय जनता पार्टी में भी नेतृत्व को लेकर अच्छी खासी मशक्कत हुई थी । नरेन्द्र मोदी अपनी कुशल रणनीति और मजबूत छवि की बदौलत भले ही बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व पर काबिज हो गए लेकिन उस वक्त भी लालकृष्ण आडवाणी के सियासी ड्रामे के बाद । गोवा में पार्टी की बैठक से लेकर लालकृष्ण आडवाणी के खत तक में यह संघर्ष देखने को मिला था । बीजेपी में नेतृत्वन की विरासत को लेकर उठा बवंडर की प्रकृति भले ही तमिलनाडू और उत्तर प्रदेश की समाजवादी पार्टी के तूफान से अलग हो लेकिन दोनों जगह विरासत ही सियासी अखाड़ेबाजी का आधार बनी ।
अभी भले ही एआईएडीएमके में जारी सियासी झगड़े पर डीएमके इपनी राजनीतिक गोटियां सेट करने में लगा है लेकिन अलग अलग मौके पर पांच बार तमिलनाडू में सत्ता संभालने वाले करुणानिधि के कुनबे में भी जो कलह हुआ था उसके पीछे भी वजह तमिल राजनीति के इस पुरोधा की राजीतिक विरासतत ही थी । करुणानिधि के बेटों अड़ागिरी और स्टालिन के बीच विरासत को लेकर जमकर झगड़ा हुआ था । एम के स्टालिन ने बहुत करीने से डीएमके कार्यकर्ताओं के बीच अपने को करुणानिधि के वारिस के तौर पर स्थापित करना शुरू कर दिया था उधर अड़ागिरी मदुरै और उसके आसपास के इलाकों में अपनी ताकत बढ़ाने में जुटे थे । दोनों के बीच के संघर्ष में करुणानिधि ने स्टालिन को चुना और अड़ागिरी पार्टी से बाहर हो गए । पारिवारिक सत्ता संग्राम में भाई भतीजों के बीच भी मलाई बंटती है और कालांतर में वो भी इस संघर्ष में इस या उस पक्ष के साथ हो जाते हैं । ये मुलायम परिवार में भी देखने को मिला और यही करुणानिधि के परिवार में भी रेखांकित किया जा सकता है । आंध्र प्रदेश की राजनीति में भी एन टी रामाराव की विरासत को लेकर उनके परिवार में संघर्ष हुआ था । एन टी रामाराव को तो उनके दामाद ने चंद्रबाबू नायडू ने ही मुख्यमंत्री की कुर्सी से अपदस्थ कर दिया क्योंकि उनको शक था कि एनटीआर अपनी दूसरी पत्नी लक्ष्मी पार्वती को सत्ता सौंपना चाहते थे । उस वक्त एनटी रामाराव के बेटों ने चंद्रबाबू का साथ दिया था लेकिन मुख्यमंत्री बनते ही को नायडू ने सबको किनारे लगा दिया । अब्दुल्ला परिवार के बेटों और दामाद के बीच सत्ता को लेकर विवाद हुआ था । कुछ दिनों पहले जब महागठबंधन ने बिहार विधानसबा चुनाव में बीजेपी को मात देकर सत्ता हासिल की तो लालू यादव के कुनबे में उनके बेटों और बेटी के बीच उपमुख्यमंत्री पद को लेकर मतभेद की खबरें आई थी । एक बेटे को उपमुख्यमंत्री बनाने के बाद दूसरे को मंत्री और बेटी को राज्यसभा में भेजकर इस झगड़े को सुलझाने का प्रयास किया गया लेकिन यहां भी यह कितना स्थायी है यह भविश्य के गर्भ में है ।   इन पार्टियों में इस तरह का झगड़े इस, वजह से भी होते हैं कि ये किसी एक शख्स के इर्दगिर्द चलनेवाले दल हैं और किसी विचारधारा से इनका बहुत लेना देना होता नहीं है । विचारधाराओं के आधार पर चलनेवाली पार्टियों में सत्ता संघर्ष का इतना वीभत्स रूप दिखाई नहीं देता है ।
कांग्रेस में विरासत को लेकर सियासी संघर्ष इस वजह से देखने को नहीं मिलता है क्योंकि इस पार्टी में ज्यादातर एक परिवार के लोग ही नेतृत्व देते रहे । इंदिरा गांधी को नेहरू और शास्त्री के निधन के बाद नेतृत्व के लिए कठिनाई का सामना करना पड़ा था और पार्टी टूटी भी थी । लेकिन परिवार के करिश्मे और इंदिरा गांधी के सियासी कौशल ने उनको स्थापित कर दिया था । कालांतर में जब राजीव गांधी की हत्या के बाद सोनिया ने राजनीति में नहीं आने का एलान किया था तब नेतृत्व की विरासत को लेकर एक बार पार्टी में फिर टूटी थी और नारायण दत्त तिवारी और अर्जुन सिंह ने कांग्रेस तिवारी बना ली थी । यह तो इतिहास है कि सोनिया के राजनीति में उतरने के फैसले के बाद सीताराम केसरी के साथ क्या हुआ था । जिस तरह से इन नेताओं की विरासत को लेकर जंग होती है वो कबीलाई सरदारों की जंग की तरह नजर आती है । फर्क सिर्फ इतना है कि कबीलाओं में सत्ता को लेकर हिंसक झगड़े हुआ करते थे लेकिन इस जंग में खून नहीं बहता है । सत्ता को लेकर सियासी दांव पेंच तो उसी तरह के चलते हैं ।
अगर हम इन पारिवारिक पार्टियों में जारी संघर्ष पर नजर डालें और उसके पीछे की वजहों का विश्लेषण करें तो यह साफ तौर पर नजर आता है कि सियासी विरासत के अलावा अकूत संपत्ति पर हक को लेकर भी ये झगड़े होते हैं । जिस तरह से हाल के दिनों में निजी कंपनियों का दबदबा देश में बढ़ा है या उनका कारोबार उन क्षेत्रों में भी फैला है जिनमें पहले सरकारी कंपनियों का एकाधिकार था, उसके बाद से क्षेत्रीय नेताओं पर आय से अदिक संपत्ति के मामले भी बढ़े हैं । राजनीति में पैसों का जो खेल होता है उसके केंद्र में हमेशा से नेता ही होता है और परिवार के लोगों को इसकी जानकारी होती है । राजनीति में पैसों के दबदबे से विरासत को लेकर संघर्ष सामने आता है । विरासत की जंग को रोकने के लिए यह आवश्यक है कि पार्टियों में आंतरिक लोकतंत्र को बढ़ावा मिले, हलांकि फिलहाल इसकी कोई सूरत नजर आ नहीं रही है । चुनाव आयोग ही अगर कोई कड़ा कदम उठा सके तो शुरुआत हो सकती है ।


Saturday, November 12, 2016

मुलायम का एक और यू टर्न

कालेधन पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के उठाए कदम के बाद पक्ष और विपक्ष की तकरार के बीच उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की चर्चा भी हो रही थी । पहले दबी जुबान से फिर खुलकर समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी पर ये आरोप लगाए गए कि नोट बंद करने के फैसले से उनका कालाधन बेकार हो गया और सूबे के चुनाव में इसका जबरदस्त असर पड़ेगा । केंद्र सरकार के खिलाफ खुद मोर्चा संभाला नेताजी यानि मुलायम सिंह यादव ने और मोदी पर जमकर हमला बोला । इस कोलाहल के बीच मुलायम सिंह यादव ने ये ऐलान भी कर दिया कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी किसी भी दल से गठबंधन नहीं करेगी । उन्होंने जोर देकर कहा कि समाजवादी पार्टी चुनाव से पहले किसी पार्टी से हाथ नहीं मिलाएगी जिस भी दल को समाजवादी पार्टी के साथ चुनाव लड़ना है उसको अपनी पार्टी का विलय करना होगा । मुलायम सिंह यादव के इस बयान के बाद कई दलों के नेता हतप्रभ हैं । समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन की कोशिशों में लगे कांग्रेस के रणनीतिकार प्रशांत किशोर को भी झटका लगा है । प्रशांत किशोर की शिवपाल यादव से लेकर मुलायम सिंह यादव तक के साथ कई दौर की बातचीत हो चुकी थी । लालू यादव के दखल के बाद यूपी के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने भी प्रशांत से लंबी मुलाकात की थी । इसके पहले जेडीयू के नेता शरद यादव और राष्ट्रीय लोकदल के अजित सिंह की भी मुलायम सिंह यादव से लंबी बात हुई थी । जेडीयू के केसी त्यागी भी इस मुहिम में लगे थे । माना जा रहा था कि प्रशांत किशोर ने यूपी विधानसभा चुनाव के पहले बिहार की तरह महागठबंधन का दांव फिर चला था लेकिन मुलायम सिंह यादव के बयान ने उसमें पलीता लगा दिया है ।
अब मुलायम सिंह यादव के गठबंधन नहीं करने के बयान के कई राजनीतिक निहितार्थ हैं । इस तरह का संदेश दिया जा रहा था कि शिवपाल यादव विधानसभा चुनाव के पहले कई दलों के साथ गठबंधन के पक्ष में थे और उनकी इस चाहत को अमर सिंह दिल्ली में बैठकर अंजाम तक पहुंचाने की रणनीति बना रहे थे । ये बात भी सामने आ रही थी कि अखिलेश यादव किसी भी पार्टी के साथ गठबंधन के खिलाफ हैं । चंद दिनों पहले उन्होंने प्रशांत किशोर से मिलने से इंकार कर दिया था और काफी मान मनौव्वल के बाद और लालू यादव की बात रखते हुए पीके से मुलाकात की थी । लखनऊ की सियासी गलियारे में जब ये बात फैली की पीके-अखिलेश की मुलाकात में गठबंधन पर चर्चा हुई तो अखिलेश की त्योरियां एक बार फिर चढ़ गईं । क्या मुलायम सिंह यादव ने अखिलेश यादव के दबाव में गठबंधन नहीं करने का एलान कर शिवपाल यादव को कोई संदेश दिया है । यहां यह बताना जरूरी है कि जब समाजवादी पार्टी का झगड़ा चरम पर था तब प्रोफेसर रामगोपाल यादव पर यह आरोप लगा था कि उन्होंने बीजेपी के इशारे पर नेताजी को बिहार विधानसभा चुनाव के पहले महागठबंधन में शामिल होने से मना करा दिया था । अब तो रामगोपाल पार्टी में नहीं हैं तो सवाल यही कि नेताजी ने किस राजनीति के तहत शिवपाल को ये झटका दिया है ।
दरअसल यूपी में समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन को लेकर जेडीयू के नेता ज्यादा उत्साहित नहीं थे । जेडीयू के नेताओं को लग रहा था कि मुलायम सिंह यादव इस मसले पर गंभीर नहीं हैं । जानकारों का कहना है कि इस वजह से ही पांच नवंबर को समाजवादी पार्टी की सिल्वर जुबली जलसे में नीतीश कुमार शामिल नहीं हुए थे । लेकिन कांग्रेस के रणनीतिकार प्रशांत किशोर इस मुहिम को हवा दे रहे थे और उनके दबाव की वजह से जेडीयू बातचीत में शामिल हो रही थी लेकिन यहां भी इस मसले पर नीतीश कुमार ने कभी भी मुलायम सिंह यादव से बातचीत नहीं की थी । लालू यादव भले ही इस गठबंधन के लिए उत्साहित थे हलांकि ना तो लालू यादव का और ना ही नीतीश कुमार का कोई ज्यादा असर उत्तर प्रदेश में है । अजित सिंह भले ही पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कुछ सीटों पर असर रखते हों । मुलायम सिंह यादव के बयान के बाद सबसे बुरी स्थिति में कांग्रेस पहुंच गई है । उसके रणनीतिकार इस मसले पर लीड लेते हुए दिख रहे थे लिहाजा सबसे ज्यादा किरकिरी उनकी ही हुई है । कांग्रेस के नेताओं को अब समझ नहीं आ रहा है कि मुलायम सिंह यादव के गठबंधन नहीं करने के बयान पर किस तरह की प्रतिक्रिया दी जाए । लिहाजा उनके नेता कन्नी काटते नजर आ रहे हैं ।

मुलायम सिंह यादव को नजदीक से जाननेवालों का दावा है कि नेताजी कभी भी किसी भी मसले पर यू टर्न ले सकते हैं । पाठकों को याद होगा कि राष्ट्रपति के चुनाव के वक्त वो ममता बनर्जी के साथ बैठक कर निकले थे और वहां लगभग तय हो गया था कि वो ए पी जे अब्दुल कलाम को समर्थन देंगे लेकिन घर पहुंचते ही वो पलट गए थे । ऐसे कई राजनीतिक यू टर्न मुलायम सिंह यादव के निर्णयों में देखने को मिल सकते हैं । हलांकि ये बात भी तय है कि यूपी में जिन भी दलों से समाजवादी पार्टी के गठबंधन की बात चल रही थी वो लगभग बेअसर पार्टियां हैं । अगर गठबंधन होता भी तो फायदा इन दलों को ही होता, समाजवादी पार्टी को कोई फायदा होता दिख नहीं रहा था । ये सब भांपते हुए मुलायम ने अपने ऐलान से परिवार से लेकर नेताओं तक को एक संदेश दे दिया ।    

Thursday, October 6, 2016

डेमोक्रेसी और कुनबापरस्ती

अमेरिका के ब्राउन युनिवर्सिटी में इंटरनेशनल स्टडीज और सोशल साइंसेज के प्रोफेसर आशुतोष वार्ष्णेय ने अपनी किताब बैटल्स ऑफ वन, इंडियाज इंप्रोबेबल डेमोक्रेसी में लिखा है कि भारत में अपनी पहचान को लेकर सजग रहनेवालों की बीच की खाई क्षेत्रीय रही है जिससे देश की केंद्रीय सत्ता के खिलाफ एकजुटता संभव नहीं हो पाई । इसी तरह से वो जाति को राज्य की राजनीति के बीच विभाजक की भूमिका में देखते हैं जो किसी राज्य विशेष को गणतंत्र को मजबूत चुनौती देने से रोकता है । इसके आदार पर कहा जा सकता है कि जातियों के नेता एक राष्ट्र के तौर पर प्रकारांतर से भारतीय गणतंत्र को मजबूती प्रदान करते हैं । यह लोकतंत्र का एक श्वेत पक्ष हो सकता है लेकिन इसका एक स्याह पक्ष भी है । जातियों पर आधारित क्षेत्रीय दलों के नेताओं का परिवारवाद को बढ़ावा देना लोकतंत्र की बुनियादी अवधारणा को निगेट करना है । हमारे देश में इसका नमूना कई प्रदेशों में देखने को मिलता है । उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव और उनका परिवार, बिहार में लालू यादव और उनका कुनबा, तमिलनाडू में करुणानिधि और उनका परिवार, आंध्र प्रदेश में एन टी रामाराव और उनका परिवार, जम्मू कश्मीर में शेख अबदुल्ला और उनका परिवार । इन बड़े उदाहरणों के अलावा कई छोटे छोटे उदाहरण भी इस वक्त भारतीय राजनीति में मौजूद हैं । जैसे उत्तर प्रदेश में ही अगर देखें तो अपना दल के नेता सोनेलाल पटेल और उनका परिवार । लोकतंत्र में परिवारवाद को बढ़ावा देने के झंझटों से भले ही अलग अलग जातियों के एकजुट होने का खतरा पैदा नहीं होता हो लेकिन इससे लोकतंत्र अलग तरीके से कमजोर होता है ।
राजनीतिक विश्लेषक और शोधकर्ता इसको इस तरह से भी देखते हैं कि यादवों के अलग अलग सूबों में अलग अलग नेता हैं लिहाजा उनका एक साथ खड़े होकर किसी स्थापित मान्यता को चुनौती देना संभव नहीं दिखता है । संभव है कि राजनीति शास्त्र के सिद्धातों की कसौटी पर ये सैद्धांतिकी मजबूत नजर आए लेकिन जिस तरह से इन नेताओं की विरासत को लेकर जंग होती है वो कबीलाई सरदारों की जंग की तरह नजर आती है । फर्क सिर्फ इतना है कि कबीलाओं में सत्ता को लेकर हिंसक झगड़े हुआ करते थे लेकिन इस जंग में खून नहीं बहता है । सत्ता को लेकर सियासी दांव पेंच तो उसी तरह के चलते हैं और अंत में कबीले के सरदार के फैसलों को मानने के लिए सभी बाध्य होते हैं । हाल ही में इसका नमूना उत्तर प्रदेश में देखने को मिला जहां यादवों के नेता मुलायम सिंह यादव की विरासत को लेकर उनके बेटे और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और उनके छोटे भाई और सूबे में मंत्री शिवपाल यादव के बीच तलवारें खिचीं थी । उपर से देखने पर ये भले ही अमर सिंह या फिर अन्य मसलों को लेकर अधिकारों की लड़ाई लगे लेकिन दरअसल ये पूरा झगड़ा मुलायम की विरासत पर कब्जे की जंग को लेकर है । अखिलेश को लगता है कि मुलायम सिंह यादव के पुत्र होने की वजह से उनकी सियासी विरासत पर उनका हक है, उधर शिवपाल सिंह यादव लगातार इस बात का संकेत देते रहते हैं कि नेताजी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर उन्होंने समाजवादी पार्टी को खड़ा किया है । जहां जहां कुनबा बड़ा है वहां सत्ता का ये संघर्ष भी बड़ा है और हर कोई अपने हिस्से को लेकर सजग और आक्रामक दिखाई देता है ।
सुदूर दक्षिण में भी अगर देखें तो अलग अलग मौके पर पांच बार तमिलनाडू में सत्ता संभालने वाले करुणानिधि के कुनबे में भी जो कलह हुआ था उसके पीछे भी वजह तमिल राजनीति के इस पुरोधा की राजीतिक विरासतत ही थी । करुणानिधि के बेटों अड़ागिरी और स्टालिन के बीच जमकर झगड़ा हुआ । एम के स्टालिन ने बहुत करीने से डीएमके कार्यकर्ताओं के बीच अपने को करुणानिधि के वारिस के तौर पर स्थापित करना शुरू कर दिया था उधर अड़ागिरी मदुरै और उसके आसपास के इलाकों में अपनी ताकत बढ़ाने में जुटे थे । दोनों के बीच के संघर्ष में करुणानिधि ने स्टालिन को चुना और अड़ागिरी पार्टी से बाहर हो गए । पारिवारिक सत्ता संग्राम में भाई भतीजों के बीच भी मलाई बंटती है और कालांतर में वो भी इस संघर्ष में इस या उस पक्ष के साथ हो जाते हैं । ये मुलायम परिवार में भी देखने को मिला और यही करुणानिधि के परिवार में भी रेखांकित किया जा सकता है । आंध्र प्रदेश की राजनीति में भी एन टी रामाराव की विरासत को लेकर उनके परिवार में संघर्ष हुआ था । एन टी रामाराव को तो उनके दामाद ने चंद्रबाबू नायडू ने ही मुख्यमंत्री की कुर्सी से अपदस्थ कर दिया क्योंकि उनको शक था कि एनटीआर अपनी दूसरी पत्नी लक्ष्मी पार्वती को सत्ता सौंपना चाहते थे । उस वक्त एनटी रामाराव के बेटों ने चंद्रबाबू का साथ दिया था लेकिन मुख्यमंत्री बनते ही को नायडू ने सबको किनारे लगा दिया । अब्दुल्ला परिवार के बेटों और दामाद के बीच सत्ता को लेकर विवाद हुआ था । अभी हाल में बिहार में जब लालू यादव की पार्टी सत्ता में लौटी थी तो उनके बेटों और बेटी के बीच उपमुख्यमंत्री पद को लेकर मतभेद की खबरें आई थी ।

इन पार्टियों में इस तरह का झगड़े इस, वजह से भी होते हैं कि ये किसीएक शख्स के इर्दगिर्द चलनेवाले दल हैं और किसी विचारधारा से इनका बहुत लेना देना होता नहीं है । विचारधाराओं के आधार पर चलनेवाली पार्टियों में सत्ता संघर्ष का इतना वीभत्स रूप दिखाई नहीं देता है । चुनाव की बुनियाद पर टिकी हमारे देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था और नेशनहुड की बहस के बीच इस प्रवृत्ति पर गंभीरता से विचार की जरूरत है । 

Sunday, April 20, 2014

ध्रुवीकरण का बैतलवा फिर डार पर

लोकसभा के पांचवें चरण का चुनाव खत्म हो चुका है । तकरीबन आधी लोकसभा सीटों के उम्मीदवारों की किस्मत ईवीएम में बंद हो चुकी है । लेकिन अब भी चुनाव के कई चरण बाकी हैं लिहाजा सभी राजनीतिक दलों ने चुनाव प्रचार में अपनी ताकत झोंकी हुई है । एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप और सियासी हमले तेज हो गए हैं ।  दोनों राजनीतिक दल, कांग्रेस और बीजेपी अपनी-अपनी उपलब्धियों का गुणगान करने में लगे हैं लेकिन सियासी हमलों में उपलब्धियों का बखान पृष्ठभूमि में चला गया है । चुनावी रण में पार्टियां अपनी बुनियादी मुद्दों से भटकती नजर आ रही हैं और एक बार फिर से मतदाताओं के ध्रुवीकरण करने में जुटे हैं । भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी ने जब अपने चुनाव प्रचार अभियान की शुरूआत की थी तो उनका मुख्य मुद्दा विकास था । विकास के अलावा वो अपनी सभाओं में भ्रष्टाचार और महंगाई के खिलाफ जंग का एलान करते थे । मोदी के राष्ट्रीय राजनीति के क्षितिज पर उदय के साथ उनकी छवि निर्माण में लगी टीम ने गुजरात के विकास मॉडल और उसमें नरेन्द्र मोदी की भूमिका को योजनाबद्ध तरीके से बढ़ाया । नतीजा यह हुआ कि देशभर के मतदाताओं के बीच मोदी की विकास पुरुष की छवि पेश हुई । एक ऐसा शख्स जो मजबूती से निर्णय ले सकता है और विकास की राह में आनेवाली सारी बाधाएं दूर करने की क्षमता रखता है । इसी तरह से अगर हम कांग्रेस की बात करें तो राहुल गांधी हों या सोनिया गांधी दोनों ने अपनी सभाओं में सबसे ज्यादा ढिढोरा जनता को पिछले दस साल में दिए गए अधिकारों का पीटा । चाहे वो मनरेगा हो, सूचना का अधिकार हो ,शिक्षा का अधिकार हो, भोजन की गारंटी हो या फिर भूमि सुधार कानून हो । उधर तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो ममता बनर्जी ने वामदलों के कुशासन और बंगाल की खस्ता हालत को फिर से चुनावी मुद्दा बनाया । उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में सांप्रदायिक दंगों के बावजूद समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने खुलकर ध्रुवीकरण की राजनीति नहीं की । उत्तर प्रदेश में विपक्षी दलों ने बदहाल कानून व्यवस्था को चुनावी मुद्दा बनाया । लेकिन जैसे जैसे चुनावी प्रक्रिया आगे बढ़ने लगी तो सभी दलों ने गियर बदला और विकास, भ्रष्टाचार और महंगाई के मुद्दे को पृष्ठभूमि में डालते हुए इस तरह के बयान देने शुरू कर दिए जिससे दो समुदायों के बीच ध्रुवीकरण तेज हो सके । कांग्रेस ने जवाहरलाल नेहरू के उस प्रसिद्ध कथन को भुला दिया जिसमें हमारे देश के प्रथम प्रधानमंत्री ने कहा था- हम चाहे किसी भी धर्म के हों सभी भारत माता की संतान हैं और हमारे अधिकार समान हैं । हम किसी भी तरह की सांप्रदायिकता और संकीर्ण सोच को बढ़ावा नहीं दे सकते हैं । कोई भी देश तबतक महान नहीं हो सकता जबतक कि वहां की जनता अपने कार्य और सोच में संकीर्ण हो ।‘ अब जरा सोचिए जवाहरलाल नेहरू की राजनीति की विरासत संभालने वाले किस तरह से उसी संकीर्ण सोच को बढ़ावा दे रहे हैं । दरअसल कांग्रेस के रणनीतिकारों को जब लगा कि पार्टी लोकसभा चुनाव में कमजोर पड़ रही तो उन्होंने एक बार फिर से सेक्युलर और कम्युनल कार्ड खेलने की रणनीति बनाई । गुजरात दंगों को लेकर देश का मुसलमान नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व को लेकर सशंकित रहता है । कांग्रेस शुरू से इस कोशिश में थी कि लोकसभा चुनाव के पहले मुसलमानों को मोदी का भय दिखाकर अपने पक्ष में किया जाए । लेकिन मोदी लगातार विकास, महंगाई और भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाकर कांग्रेस की इस रणनीति की हवा निकाल रहे थे । जब भारतीय जनता पार्टी ने हिंदू वोटरों को लुभाने के लिए रामदेव और श्रीश्री रविशंकर का सहारा लिया तो कांग्रेस ने इसके काट के लिए दिल्ली के जामा मस्जिद के शाही इमाम अहमद बुखारी को अपने पाले में किया । अभी हाल ही में राजनाथ सिंह कल्बे जव्वाद और फिरंगी महली के दर पर दस्तक दे आए । बेवजह का विवाद भी खड़ा कर आए ।

सोनिया गांधी के सिपहसालारों ने दिल्ली के ख्यात अहमद बुखारी से उनकी मुलाकात करवाई । इस मुलाकात के बाद सोनिया ने उनसे अपील की सेक्युलर वोटों का बंटवारा नहीं हो । पहले से लिखी गई स्क्रिप्ट के मुताबिक सोनिया की अपील पर बुखारी ने फौरन अमल किया और मुसलमानों से कांग्रेस को वोट देने की गुजारिश कर डाली । ये अलग बात है कि बुखारी की मुसलमानों के बीच इतनी भी साख नहीं है कि उनके कहने से सैकड़ों वोट भी पड़ सके लेकिन जामा मस्जिद और उसके शाही इमाम के प्रतीकात्मक महत्व को वो भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं । पुरानी दिल्ली इलाके में एक जुमला खूब चलता है कि जामा मस्जिद की सीढियों के नीचे बुखारी की कोई नहीं सुनता । उनके भाई ने भी बुखारी की बात नहीं मानने की अपील कर दी थी । उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के पहले बुखारी मुलायम सिंह यादव के साथ थे । जब मुलायम सिंह यादव ने उनके रिश्तेदार को मंत्री बनाने से मना कर दिया बुखारी बिदक गए । मुसलमान वोटों की ठेकेदारी का बुखारी का लंबा इतिहास रहा है । हर चुनाव के पहले वो राजनीति सौदेबाजी के बाद इस या उस पक्ष में वोट देने की अपील करते हैं ।
लोकसभा चुनावों पर गहरी नजर रखनेवाले राजनीति विश्लेषकों का कहना है कि जब कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व ध्रुवीकरण की राजनीति की ओर बढ़ता दिखा तो फिर नीचे के नेता और कार्यकर्ता बेकाबू होने लगे । उत्तरप्रदेश के सहारनपुर से कांग्रेस प्रत्याशी ने भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी की बोटी बोटी काटने जैसा घोर आपत्तिजनक बयान दिया तो वसुंधरा राजे भी मुख्यमंत्री पद की मर्यादा भूल गई । उन्होंने भी कह डाला कि चुनाव के नतीजे आने दीजिए तब पता चलेगा कि किनकी बोटियां कटेंगी । इन बयानबाजियों और चुनाव नजदीक आता देख बीजेपी के रणनीतिकारों को लगा कि कहीं वो पिछड़ वना जाएं तो खुद मोदी ने भी मांस के निर्यात और पिंक रिवोल्यूशन की बातें करके ध्रुवीकरण को हवा दी । मोदी के विश्वस्त सिपहसालार और उत्तर प्रदेश में चुनाव के प्रभारी अमित शाह तो एक और कदम आगे चले गए । उन्होंने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के शामली और बिजनौर में अपमान का बदला लेने वाला बयान दे डाला । अमित शाह ने कहा कि आदमी भूखा और प्यासा तो रह सकता है, लेकिन अगर अपमानित हो जाता है तो चैन से नहीं रह सकता है । अमित शाह ने कहा कि अपमान का बदला तो लेना पड़ेगा । गौरतलब है कि यह मुजफ्फरनगर का वही इलाका है जहां कुछ महीनों पहले सांप्रदायिक दंगों में पचास से ज्यादा मुसलमान मारे गए थे । अमित शाह के इस बयान को अगर उन दंगों से जोड़कर देखें तो ध्रुवीकरण का लक्ष्य नजर आता है ।
मौका भांपते ही समाजवादी पार्टी इसमें कूद पड़ी और उत्तर प्रदेश के ताकतवर मंत्री आजम खान ने तो सारी हदें पार कर दी । सारी राजनीतिक मर्यादा का उल्लंघन करते हुए उन्होंने अमित शाह को गुंडा नंबर एक और कातिल तक कह डाला । बाद में ये बयान दे दिया कि करगिल में मुसलमानों ने विजय दिलवाई । यह भारतीय राजनीति का इतना निचला स्तर है कि इसकी जितनी भर्त्सना  की जाए वो कम है । फौज का जवान वर्दी पहनने के बाद ना तो हिंदू होता है और ना मुसलमान वो सिर्फ हिन्दुस्तनी होता है । चुानवी फायदे के लिए इस तरह से फौज पर टिप्पणी नेताओं की कुत्सित मानसिकता को उजागर करता है । दरअसल नेताओं की ध्रुवीकरण की इन कोशि्शों को चुनाव आयोग की कमजोरी से बल मिलता है । चुानव आयोग इस तरह की बयानबाजियों के मसले में नोटिस जारी करने की मामूली सी कार्रवाई करता है, चंद दिनों तक रैली करने पर पाबंदी लगाता है लेकिन सख्त कार्रवाई नहीं कर इनके हौसले को हवा देता है । इस तरह की बयानबाजियों और संप्रदाय के आधार पर वोटरों को बांटने की कोशिशों पर चुनाव आयोग को बेहद सख्त कदम उठाने होंगे । कानूनी दांव पेंच से बच निकलने के नेताओं की कोशिशों पर भी रोक लगाना होगा । भारत विविध धर्मों और संप्रदायों का देश है और वोट और सत्ता के लिए इसके सामाजिक तानेबाने को छिन्न भिन्न करने की इजाजत किसी भी कीमत पर नहीं दी जा सकती है ।