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Saturday, January 5, 2019

चुनिंदा चुप्पी की शिकार बौद्धिकता


बौद्धिकता की बुनियाद ईमानदारी होती है। बुद्धिजीवियों से ये अपेक्षा की जाती है कि वो सार्वजनिक रूप से सही को सही और गलत को गलत कहने का साहस रखते हैं। लेकिन हमारे देश में बहुधा बौद्धिक जगत में इस तरह की ईमानदारी दिखाई नहीं देती है। खासकर साहित्य,कला और संस्कृति के क्षेत्र में जब किसी प्रकार का बदलाव होता है तो एक खास किस्म की राजनीति दिखाई देती है। ये एक विचारधारा विशेष से जुड़े बौद्धिकों में खासतौर पर लक्षित की जाती है। अभी जब मध्यप्रदेश में सरकार ने साहित्य, कला, शिक्षा और संस्कृति से जुड़े फैसले लेने शुरू किए हैं तो इस तरह की चुप्पी देखी जा सकती है। कमलनाथ ने मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री का पद संभालने के बाद एक आदेश के जरिए तमाम समितियों को भंग करने का फरमान जारी कर दिया था। किसी भी समिति के कार्यकाल के खत्म होने का इंतजार नहीं किया गया। राज्य सरकार की अलग अलग संस्थाओं की सलाहकार समिति में नामित सदस्यों को भी हटा देने का आदेश हुआ। पिछले पंद्रह साल से मध्य प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार थी और वहां की कमेटियों में शिवराज सरकार के पसंद के लोग नामित थे। अब कमलनाथ सरकार अपनी पसंद के लोगों को वहां नामित करने जा रही है। जब मध्यप्रदेश सरकार ने ये फरमान जारी किया तो बौद्धिक जगत मे कोई हलचल नहीं हुई। किसी बौद्धिक मंच पर कमलनाथ सरकार के इस फैसले को लेकर सवाल खड़े हुए हों ये जानकारी नहीं मिल पाई। किसी को भी इसमे फासीवाद आदि नजर नहीं आया, किसी ने भी सरकार की मनमानी पर मुंह नहीं खोला। हो सकता है कहीं छिटपुट विरोध हुआ हो लेकिन किसी कला साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में काम करनेवाले संगठनों ने कोई विरोध नहीं जताया। किसी ने कमलनाथ सरकार से ये अपेक्षा नहीं की कि उनको सलाहकार समितियों के कार्यकाल खत्म होने का इंतजार करना चाहिए। हाल ही में भोपाल के माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति जगदीश उपासने ने इस्तीफा दे दिया। इस तरह की खबर आई कि उनको राज्य सरकार की तरफ से साफ संदेश दे दिया गया था कि वो त्यागपत्र दे दें अन्यथा उनको हटा दिया जाएगा। हुआ भी ऐसा ही। लेकिन इसको किसी भी तरह से संस्थाओं के कामकाज में सरकारी हस्तक्षेप के तौर पर नहीं देखा गया।
अब जरा कुछ साल पीछे चलते हैं। 2014 में नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में केंद्र में सरकार बनी। उस समय के परिदृश्य को याद करें कि कितना शोर शराबा हुआ था कि सरकार शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र में अपने लोगों को बैठाना चाहती हैं। स्मृति ईरानी के मानव संसाधन विकास मंत्री रहने के दौरान तो पूरा बवाल इसी बात को लेकर मचता रहा था कि सरकार विश्वविद्यालयों में अपने लोगों को कुलपति के तौर पर नियुक्त करना चाहती है। संगीत नाटक अकादमी से लेकर अलग अलग सरकारी कमेटियों में संचालन समिति और कार्यसमिति में नियुक्तियों को लेकर भी सरकार को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश हुई। लेकिन अगर संगीत नाटक अकादमी की समिति को देखें तो उसमें तो कम्युनिस्ट पार्टी के कार्ड होल्डर का भी मोदी सरकार के दौर में मनोनयन हुआ और वो अब भी समिति में बने हुए हैं। अगर सरकार असहिष्णु होती तो कम से कम कार्ड होल्डर को तो जगह नहीं ही मिलती। इन अकादमियों ने वामपंथी लेखकों और कलाकारों को सम्मानित और पुरस्कृत भी किया ही, उनके रिश्तेदारों तक को भी पुरस्कृत करने में किसी तरह का भेदभाव नहीं किया। फिर भी सरकार पर आरोप लगते रहे। आरोप लगाने का भी एक अलग तंत्र है। आरोप लगाओ और दबाव बनाते रहो।   
स्वायत्ता पर आसन्न खतरे को लेकर भी सवाल उठे थे। अभिव्यक्ति की आजादी पर बढ़ रहे खतरे को लेकर भी खूब हो-हल्ला मचा। उस वक्त इस बात की आशंका भी जताई गई थी कि नई सरकार संस्थाओं का भगवाकरण करने में जुटी है। कालांतर में इस बात को लेकर भी विरोध प्रदर्शन आदि हुए कि सरकार कला, साहित्य, शिक्षा और संस्कृति की स्वायत्त संस्थाओं पर कब्जा करना चाहती है । पुणे के फिल्म संस्थान से लेकर इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में हुई नियुक्तियों पर सवाल खड़े होने लगे। सीपीएम के नेता सीताराम येचुरी ने इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में अध्यक्ष के पद पर राम बहादुर राय की नियुक्ति पर सवाल उठाया था। इस बात की आशंका भी व्यक्त की गई थी कि सरकार देश का इतिहास बदलने की मंशा से काम कर रही है। सांस्कृतिक संस्थाओं में नियुक्ति का इतना विरोध शुरू हो जाता था कि मंत्रियों ने यथास्थितिवाद का देवता बने रहने में बी अपनी भलाई समझी। इन संस्थाओं में नियुक्तियां धीमी कर दी गई। मोदी सरकार पर यह आरोप लगता रहा है कि साहित्यक,सांस्कृतिक संस्थाओं से लेकर विश्यविद्यालयों तक में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की मर्जी और सलाह से ही नियुक्तियां करती हैं। लेकिन ये देखना दिलचस्प होगा कि कमलनाथ सरकार पर इस तरह किसी संगठन या पार्टी के इशारे पर नियुक्तियों के आरोप लगते हैं या नहीं।
जिस भी राजनीतिक दल की सरकार होती है वो अपनी विचारधारा को बढ़ावा देने के लिए तमाम तरह के काम करती है। विचारधारा को मजबूती देने के लिए यह आवश्यक होता है वो इसको मानने और प्रचारित करनेवालों को मजबूती दे। मजबूती देने के नाम पर विरोधियों को ठिकाने लगाने का खेल भी हमारे देश ने देखा है। जब दो हजार चार में यूपीए की सरकार बनी थी उस वक्त भी सोनल मानसिंह को संगीत नाटक अकादमी से और अनुपम खेर को सेंसर बोर्ड से हटा दिया गया था। ये सीपीएम के नेता हरकिशन सिंह सुरजीत के इशारे पर किया गया था। सुरजीत ने उस वक्त लेख लिखकर इन दोनों को हटाने की मांग की थी। केंद्र की मोदी सरकार इस मायने में थोड़ी अलग है। यह वामपंथियों की तरह अपनी विरोधी विचारधारा माननेवालों को अस्पृश्य नहीं मानती है। उनसे दूरी नहीं बनाती या सायास उनको हाशिए पर धकेलने के लिए संगठित प्रयास नहीं करती है। ज्यादा पुरानी बात नहीं है जब भारतीय जनता पार्टी या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विचार से सहमत विद्वानों को सरकारी सस्थाओं में प्रवेश तक नहीं था। संघी कहकर उनका मजाक उड़ाया जाता था । फेलोशिप से लेकर तमाम तरह कि नियुक्तियों में प्राथमिक शर्त यह होती थी कि वो संघ की विचारधारा को मानने वाला नहीं हो। साहित्य अकादमी से लेकर अन्य अकादमियों के पुरस्कारों में विरोधी विचारधारा के विद्वानों के नाम पर पुरस्कारों के लिए विचार ही नहीं होता था। यहां तो मोदी सरकार की खुलेआम आलोचना करनेवालों को पुरस्कृत किया जाता है, उनकी पुस्तकें प्रकाशित होती हैं। साहित्य अकादमी के चुनाव में सरकार के नामित प्रतिनिधि हार जाते हैं लेकिन फिर भी साहित्य अकादमी की स्वायत्तता को कम करने की कोशिश नहीं होती। इस वर्ष हुए साहित्य अकादमी के अध्यक्ष के चुनाव के पहले संस्कृति मंत्रालय से संयुक्त सचिव ने एक उम्मीदवार विशेष के पक्ष में पत्र भी लिखा था लेकिन उसका कोई असर चुनाव पर नहीं हुआ।
दरअसल हमारे देश के बौद्धिक वर्ग में वामपंथियों का बोलबाला रहा है, इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी के बाद से बौद्धिक समाज की राजनीति को वामपंथियों को आउटसोर्स कर दिया। अकादमियां और विश्वविद्लायों को वामपंथियों के हवाले कर दिया। वहां की नियुक्तियां और कमेटियों आदि में उस विचारधारा से जुड़े लोगों की नियुक्तियां होने लगी थी। इसकी ऐतिहासिक वजह भी थी क्योंकि प्रगतिशील लेखक संघ ने इमरजेंसी का समर्थन किया था। अभिव्यक्ति की आजादी के चैंपियनों ने इमरजेंसी के वक्त सरकार और इंदिर गांधी को लेकर जिस तरह की वफादरी दिखाई थी उसका ईनाम उनको सालों तक मिलता रहा था। मोदी सरकार बनने के बाद और राज्यों में भी कांग्रेस पार्टी की हार के बाद ऐसा लगने लगा था कि वामपंथी लेखकों के लिए पद आदि का जुगाड़ होना मुश्किल होगा लेकिन मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में भारतीय जनता पार्टी की हार के बाद उनके चेहरे खिले हुए हैं क्योंकि इनके स्वार्थपूर्ति का रास्ता खुलता नजर आ रहा है। मध्यप्रदेश सरकार के फैसलों से इनके अरमान जाग गए हैं। भारतीय जनता पार्टी की सरकार जिस तरह से सहम सहम कर कला, संस्कृति और साहित्य जगत के फैसले ले रही है उनके बरख्श अगर इन फैसलों को देखे तो तुलनात्मक विवेचना रोचक हो सकता है। केंद्र के संस्कृति मंत्रालय से संबंद्ध कितने संस्थानों में अबतक पद खाली हैं उसका आकलन करने पर भी जो तस्वीर बनेगी वो भी दिलचस्प होगी। यहां तक कि राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के निदेशक का पद भी अब तक नहीं भरा जा सका है। इस मामले में भारतीय जनता पार्टी को कांग्रेस और वामपंथी सरकारों के फैसलों को देखना चाहिए ताकि वो भी कला, संस्कृति और साहित्य के क्षेत्र को प्रथामिकता पर रखकर फैसले ले सकें।

Saturday, June 24, 2017

संस्थाओं को खत्म करने की कवायद!

अब से करीब तीन साल पहले मई, दो हजार चौदह में जब केंद्र में नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में सरकार बनी थी तो उन्होंने कई प्रयोग किए। कई संस्थाओं के नाम से लेकर उसके काम काज में भी आमूल-चूल परिवर्तन किए गए। ऐसी ही एक संस्था थी योजना आयोग। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने योजना आयोग का पुनर्गठन करते हुए उसका नाम बदलकर नीति आयोग कर दिया और टीम इंडिया की अवधारणा को मजबूत करने के लिहाज से उसके कामकाज में भी बदलाव किए गए। जाहिर सी बात है नीति आयोग की टीम में भी नए चेहरों को जगह दी गई। इस बात पर भी जोर था कि लालफीताशाही को हतोत्साहित किया जाए और देश को मजबूत करने की दिशा में ठोस नीतियां बनाकर उनका किय्रान्वयन किया जाए। यह एक बहुत ही अच्छी सोच थी जिसका अमूमन हर तरफ स्वागत ही हुआ था। शुरुआत में नीति आयोग ने बेहतर तरीके से काम भी किया, अब भी कर रहे होंगे लेकिन हाल के दिनों में नीति आयोग ने कुछ विवादास्पद सुझाव देकर सरकार को बैकफुट पर जाने को मजबूर कर दिया। कुछ दिनों पहले नीति आयोग ने कृषि पर कर लगाने का प्रस्ताव देकर सरकार की किरकिरी करवा दी थी। नीति आयोग के सदस्य बिबेक देबरॉय ने आयोग की एक बैठक में किसानों को खेती से होनेवाली आय पर टैक्स लगाने का सुझाव दिया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में हुई नीति आयोग की इस बैठक में बिबेक देबरॉय ने तीन साल की कार्ययोजना को पेश करते समय कृषि से होनेवाली आय को आयकर के दायरे में लाने की वकालत की। बिबेक देबरॉय ने कहा था कि आयकर का दायरा बढ़ाने का यह एक तरीका हो सकता है। बिबेक ने तमाम तरह के आयकर कानूनों का हवाला देते हुए अपना पक्ष रखा था। नीति आयोग के विजन डॉक्यूमेंट में एक हेडर है- इनकम टैक्स ऑन एग्रिकल्चर इनकम जो कहता है कि ‘अभी खेती से होनेवाली आय में हर तरह की ठूट मिली है चाहे किसानों को कितनी भी आय हो। जबकि कृषि से होनेवाली आय में छूट देने का उद्देश्य किसानों को संरक्षण देना था। कभी कभार इस छूट का बेजा इस्तेमाल भी होता है और खेती के अलावा अन्य आय को भी कृषि आय के रूप में दिखाकर टैक्स में छूट हासिल किया जाता है। काले धन की समस्या से निबटने के लिए इस तरह के चोर दरवाजों को बंद करना होगा।‘ नीति आयोग के सदस्य बिबेक देबरॉय के इस बयान के बाहर आते ही पूरे देश में हंगामा मच गया। किसानों का मुद्दा हमेशा से हमारे देश में संवेदनशील रहा है । सरकार की किरकिरी होते देख वित्त मंत्री अरुण जेटली ने स्वयं मोर्चा संभाला और साफ कर दिया कि सरकार का कृषि से होनेवाली आय को कर के दायरे में लाने का कोई इरादा नहीं है । वित्त मंत्री अरुण जेटली के बयान के अड़तालीस घंटे भी नहीं बीते थे कि केंद्र सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रह्मण्यम ने भी खेती पर टैक्स की बात कहकर सरकार को फिर धर्मसंकट में डाल दिया था। खेती से होनेवाली आय पर टैक्स लगाने के नीति आयोग के प्रस्ताव को लेकर घिरी सरकार अभी संभली भी नहीं थी कि नीति आयोग ने एक और सुझाव दे डाला जिसपर सरकार ने अमल करना भी शुरु कर दिया है।
यह सुझाव है कई मंत्रालयों के अंतर्गत काम कर रही स्वायत्त संस्थाओं के अलग अलग संस्थाओं में विलय करने का और कुछ संस्थाओं को कंपनी की तरह बनाने का। नीति आयोग ने कुछ छह सौ उनासी संस्थाओं को चिन्हित किया है जिन्हें चरणबद्ध तरीके से पुनर्गठन के नाम पर अलग अलग संस्थाओं में मिलाकर नई पहचान देने का काम शुरू किया जा चुका है। पहले चरण में उन स्वायत्त संस्थाओं को चिन्हित किया गया है जो सोसाइटीज एक्ट के तहत निबंधित होकर काम करते हैं । सुझाव है कि भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद, इंडियन काउंसिल ऑफ फिलॉसफिकल रिसर्च और  इंडियन काउंसिल ऑफ सोशल साइंस रिसर्च को एक साथ मिलाकर एक नई संस्था का गठन किया जाए या फिर इन सबको जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के साथ विलय कर दिया जाए। इसी तरह से सिंधी भाषा के प्रचार प्रसार के लिए बनी संस्था नेशनल काउंसिल फॉर प्रमोशन ऑफ सिंधी लैंग्वेज को मैसूर से सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ लैंग्लेज के साथ और उर्दू के विकास के लिए गठित नेशनल काउंसिल ऑफ प्रमोशन ऑफ उर्दू को जामिया मीलिया या मौलाना आजाद उर्दू विश्वविद्यालय के साथ जोड़ दिया जाए। अब तक करीब चालीस संस्थाओं के विलय या उसको बंद करने पर काम शुरू हो चुका है। नीति आयोग के सुझावों के मुताबिक पुणे की फिल्म और टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया और सत्जित राय फिल्म और टेलीविजन संस्थान को मिलाकर एक कर देने का। इसी तरह से देश की प्रतिष्ठित पत्रकारिता संस्थान इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन को जामिया मीलिया यूनिवर्सिटी या जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के साथ विलय का प्रस्ताव है। तर्क ये दिए जा रहे हैं कि जिन छह सौ उनासी स्वायत्त संस्थाओं को चिन्हित किया गया है उनपर बहत्तर हजार करोड़ का खर्च हो रहा है । एक तर्क यह भी है कि इनमें से कई संस्थाएं एक ही तरह के काम कर रही हैं, लिहाजा उनका विलय जरूरी है। इस प्रस्ताव पर काफी तेजी से काम हो रहा है और इन संस्थाओं को आपत्तियां भेजने की खानापूरी करने को भी कहा गया है। जब ये संस्थाएं आपत्ति भेज रही हैं तो उनको कहा जा रहा है कि विलय की तैयारी करिए। पुनर्गठन या फिर वित्तीय अनुशासन बहाल करने के नामपर यह प्रस्ताव देखने में अवश्य अच्छा लगता है लेकिन इसके नतीजे बहुत गंभीर होने वाले हैं।
इस वर्ष केंद्र सरकार दीन दयाल उपाध्याय की जन्मशती वर्ष मना रही है और उनके सिद्धातों को, उनके विचारों को फैलाने का काम भी कर रही है। दीनदयाल उपाध्याय जी की पूरी सैद्धांतिकी विकेन्द्रकरण को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से बढ़ावा देती है। पंडित जी के जन्मशती वर्ष में बजाए विकेन्द्रीकरण को बढ़ावा देने के ये सरकार केंद्रीकरण को बढ़ावा दे रही है। इसपर ध्यान देने की जरूरत है। आश्चर्य की बात है कि स्वायत्त संस्थाओं को मजबूत करने के नाम पर इनका व्यावसायीकरण करने की योजना परवान चढ़ाई जा रही है और हमारा बौद्धिक वर्ग खामोश है। पहले इस तरह की कई संस्थाओं को अपने खर्च का तीस फीसदी खुद से जुटाने का आदेश दिया गया था और अब उनके सामने अस्तित्व का संकट खड़ा किया जा रहा है।
अब अगर हम एक दो उदाहरण से इस प्रस्ताव की खामियों को समझने की कोशिश करें तो वो खतरे साफ हो जाते हैं। केंद्रीय हिंदी संस्थान को संभवत: इलाहाबाद विश्वविद्यालय या काशी हिंदू विश्वविद्यालय में विलय करने का विकल्प दिया गया है। इस संस्था को कमजोर कर सरकार हिंदी के साथ चाहे अनचाहे अन्याय कर रही है। यह संस्थान हिंदी के विकास और प्रचार प्रसार के लिए गंभीरता से काम कर रही है। यहां प्रतिवर्ष बयालीस देशों के दो सौ छात्र हिंदी सीखते हैं जो अपने अपने देश में जाकर हिंदी का प्रचार प्रसार करने में सहयोग करते हैं। इस संस्थान में गैर हिंदी प्रदेशों के शिक्षकों को प्रशिक्षित किया जाता है। ये संस्था अनुवादकों को तैयार करती है। इसी तरह से एक और संस्थान है, केंद्रीय हिंदी निदेशालय, यह संस्था भी अपने प्रकाशनों और आयोजनों से हिंदी को समृद्ध कर रही है। अब इनको उन विश्वविद्यालयों के साथ जोड़ने की बात की जा रही है जो खुद जांच के दायरे में है। इनमें से कई विश्वविद्यालयों को मंत्रालय लगभग निकम्मा या बदतर परफार्मेंस करनेवाले की श्रेणी में रखती है। अगर विश्वविद्यालयों के साथ इन संस्थानों को जोड़ दिया तो ये भी उसी तरह की संस्कृति के शिकार हो जाएंगे।

सरकार को अपने लोक कल्याणकारी स्वरूप को नहीं भूलना चाहिए। किसी भी संस्था को बनाना बहुत मुश्किल होता है और उसको खत्म करने में ज्यादा वक्त नहीं लगता है। जब इन संस्थाओं का गठन किया गया था तब से लेकर अबतक इनमें जो काम हुआ है उसका ऑडिट होना चाहिए। उसके बाद ही किसी तरह का फैसला होना चाहिए। अगर इन संस्थाओं में संतोषजनक काम नहीं हुआ तो उसके लिए कोशिश करनी चाहिए। संस्थाओं को खत्म कर देने से कुछ हजार करोड़ रुपए की बचत हो सकती है लेकिन उससे जो भाषा, कला और संस्कृति को नुकसान होगा उसका आंकलन नीति आयोग के अफसर नहीं कर सकते। वैसे भी अगर देखा जाए तो भाषा के लिए काम रही संस्थाओं पर सरकार प्रतिवर्ष, एक अनुमान के मुताबिक, चार सौ करोड़ ही खर्च करती है। इन संस्थाओं को कंपनियों में बदलकर उनसे मुनाफे की अपेक्षा नहीं की जा सकती है क्योंकि ये जो काम कर रही हैं उसको नफे नुकसान के पैमाने पर मापा नहीं जा सकता है। 

Sunday, May 28, 2017

तीन साल में चले अढाई कोस

दो हजार चौदह में केंद्र में नरेन्द्र मोदी की सरकार बनने के बाद साहित्य,संस्कृति और कला के क्षेत्र में बदलाव की आहट सुनाई दी थी। आजादी के बाद पहली बार केंद्र में किसी गैर कांग्रेसी सरकार को जनता ने पूर्ण बहुमत से सत्ता सौंपी थी। बहुमत के अलावा एक और बात जिसको रेखांकित किया जाना आवश्यक है वह ये कि इस सरकार को बौद्धिक समर्थन के लिए वामपंथियों के आवश्यकता नहीं थी। केंद्र में बनी नई सरकार का वैचारिक धरातल भी कांग्रेस से अलग था। आजादी के बाद से कला, साहित्य और संस्कृति से जुड़े संस्थानों पर वामपंथ की तरफ झुकी विचारधारा लेखकों, कलाकारों आदि का बोलबाला था। दो हजार चौदह के लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद यह तय हो गया था कि इन संस्थाओं में भी बदलाव होंगे। हुए भी, लेकिन जिस तरह का बदलाव अपेक्षित था, वो सरकार बनने के तीन साल बाद भी हो नहीं पाया है। सरकार पर आरोप लगे कि वो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुडे लोगों को चुन चुन कर इन संस्थाओं की कमान सौंप रही है। यहां यह याद दिलाना आवश्यक है कि जब गजेन्द्र चौहान को फिल्म इंस्टीट्यूट पुणे का चेयरमैन नामित किया गया तो खासा हो हल्ला मचा था। गजेन्द्र चौहान की योग्यता पर सवाल उठाए गए। कहा गया कि गजेन्द्र की एकमात्र योग्यता उऩका बीजेपी और संघ से जुड़ा होना है और उन्होंने महाभारत सीरियल में युधिष्ठिर की भूमिका निभाई थी। संभव है कि गजेन्द्र चौहान में उतनी योग्यता नहीं रही हो, लेकिन जो योग्यता को आधार बनाकर गजेन्द्र की आलोचना कर रहे थे उनको अपना अतीत शायद याद नहीं था। वामपंथी मित्रों से योग्यता के आधार पर नियुक्ति की बात सुनना बहुत ही हास्यास्पद लगता है। उन्होंने हमेशा से योग्यता पर प्रतिबद्धता को तरजीह दी है। अपनी विचारधारा में दीक्षित होने वालों को पहले वो सहेजते थे। बहुधा अपने प्रतिबद्ध लेखकों को बड़ा बनाने का सारा उपक्रम करने के बाद फिर नियुक्ति आदि करते रहे थे। पहले किसी लेखक को चुनते थे और उसको पुरस्कार, सम्मान आदि देकर बड़ा बना देते थे और फिर किसी संस्थान को उनके जिम्मे सौंप देते थे। यह इतने योजनाबद्ध तरीके से होता था कि लगे कि सरकार ने प्रतिबद्धता को नहीं बल्कि प्रतिभा को जगह दी है। पर यह कोई नियम नहीं था । कई बार तो मनमाने तरीके से भी नियुक्तियां कर दी जाती थीं। यहां यह स्मरण करना उचित होगा कि मार्च दो हजार नौ में सुरभि बनर्जी को कोलकाता विश्वविद्यालय का कुलपति नियुक्त कर दिया गया था। उस वक्त सुरभि बनर्जी जी की ज्ञात योग्यता इतनी थी कि उन्होंने ज्योति बसु की जीवनी लिखी थी। तब किसी कोने अंतरे से इस नियुक्ति को लेकर आवाज नहीं उठी थी । तब योग्यता आदि के बारे में भी सवाल नहीं उठे थे। ना ही सरकार पर किसी तरह का कोई आरोप लगा था। यह तो एक उदाहरण है, इस तरह की ना जाने कितनी नियुक्तियां हुई होंगी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर आरोप लगानेवाले यह भी भूल जाते है कि उस वक्त नियुक्तियों में अजय भवन के संदेश के क्या मायने हुआ करते थे। या प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ और जन संस्कृति मंच की नीतियां और नियुक्तियां कहां से तय होती थीं। ये सब अपने राजनीतिक अकाओं के कृपाकांक्षी हुआ करते थे। कृपा मिलती भी थी।
नरेन्द्र मोदी की सरकार पर दूसरा बड़ा आरोप, जो वामपंथियों का है वो है पाठ्यपुस्तकों आदि में बदलाव करने की योजना पर काम करने का। उनका आरोप है कि मौजूदा सरकार की मंशा देश के इतिहास को बदलने की है। इतिहास के पुनर्लेखन को लेकर विवाद उठाने की कोशिश लगातार की जाती रही है। सवाल यही है कि अगर इतिहास लेखन में एक पक्ष रेखांकित होने से रह गया तो क्या उसको देश के इतिहास में जगह देने की कोशिश करना गलत है। क्या भारतीय चिंतन पद्धति से इतिहास लेखन में कोई बुराई है। सरकार पर इतिहास के भगवाकरण का आरोप लगानेवाले इन मित्रों को पश्चिम बंगाल सरकार के वर्षों पूर्व जारी एक प्रपत्र को देखना चाहिए। पश्चिम बंगाल सरकार की ने अट्ठाइस अप्रैल उन्नीस सौ नवासी को अपने पत्रांक एसवाईएल/89/1 के द्वारा राज्य के सभी माध्यमिक विद्यालयों के प्रधानाध्यापकों को निर्देश जारी किया था। उस निर्देश में लिखा था- ‘मुस्लिम काल की कोई आलोचना या निंदा नहीं होनी चाहिए, मुस्लिम शासकों और आक्रमणकारियों द्वारा मंदिर तोड़े जाने का जिक्र कभी नहीं होना चाहिए।‘ इसके साथ ही यह आदेश भी दिया गया था कि इतिहास की पुस्तकों से क्या क्या हटाना है। क्या यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि उस समय पश्चिम बंगाल में किस विचारधारा या पार्टी की सरकार थी। अब अगर पूर्व में इतिहास के साथ इस तरह की छेड़छाड़ की गई हो तो इतिहास का पुनर्लेखन करने की योजना बनाना कैसे गलत हो सकता है । इतिहास के तथ्यों के साथ इस तरह की अक्षम्य छेड़छाड़ की गई लेकिन फिर भी उस वक्त का बौद्धिक वर्ग खामोश रहा था । क्या राजनीति के आगे मशाल बनकर चलनेवाला साहित्य विचारधारा का पिछलग्गू बन गया था। या प्रत्य़क्ष और परोक्ष फायदे के लिए चुप रह गया था। या राजनीतिक आका के फैसलों पर ऊंगली उठाने की हिम्मत नहीं कर पाए थे ।
दरअसल वामपंथी दलों के शासन काल के दौरान पश्चिम बंगाल के विद्यालयों से लेकर विश्वविद्यालयों में नियुक्ति आदि में ही नहीं, उनका रोजमर्रा का संचालन भी पार्टी ही करती थी। यहां तक कि किसी विश्वविद्यालय आदि की परीक्षा की तिथि बढ़ानी चाहिए या नहीं, यह भी पार्टी ही तय करती थी। उन्नीस सौ निन्यानबे में कोलकाता के एक प्रमुख अंग्रेजी अखबार ने इस बारे में विस्तार से आंकलन प्रस्तुत किया था, प्रमाण भी पेश किए थे। अब ये लोग अगर मौजूदा सरकार पर शिक्षा के भगवाकरण और संस्थाओं की स्वयत्ता खत्म करने आदि का आरोप लगाते हैं तो उन आरोपों में नैतिक दम नहीं दिखता है, बल्कि अपनी सत्ता जाने या मनचाहा नहीं कर पाने की खीज दिखाई देती है। आरोपों का असर भी कम होता है।
अब अगर हम इन आरोपों से इतर हटकर पिछले तीन सालों में साहित्यक और सांस्कृतिक संस्थाओं के काम-काज पर नजर डालें तो बहुत ज्यादा फर्क दिखाई नहीं पड़ता है। साहित्य अकादमी में तो चुने हुए अध्यक्ष होते हैं। वहां किसी तरह के बदलाव की ज्यादा गुंजाइश है नहीं । जो भी बदलाव वहां देखने को मिल सकत हैं वो अगले साल होनेवाले सामान्य परिशद के चुनाव में ही देखने को मिल सकते हैं । ललित कला अकादमी में काफी दिनों तक विवाद आदि चला। नई सरकार आने के बाद बर्खास्त किए गए विवादित सचिव सुधाकर शर्मा की बहाली फिर उनको हटाए जाने को लेकर संस्कृति मंत्रालय भी विवादों के घेरे में आया। ललित कला अकादमी इतनी विवादित हो चुकी थी कि जब उसका नियंत्रण सरकार ने अपने हाथों में लिया तो ज्यादा हो हल्ला नहीं हुआ। हर बात को अभिव्यक्ति की आजादी के खतरे से जोड़कर देखनेवाले और सांस्कृतिक संगठनों पर भगवा झंडा फहराने का आरोप जड़नेवाले बयानवीर भी इस मसले पर लगभग खामोश रहे।
दरअसल इन अकादमियों में स्वयत्ता के नाम पर जारी अराजकता को रोके जाने की सख्त आवश्यकता है। साहित्य और कला को लेकर जिस तरह के स्वायत्त संस्था की कल्पना की गई थी उसका इमरजेंसी के बाद क्षरण हो गया। भीष्म साहनी की अगुवाई में प्रगतिशील लेखक संघ ने इमरजेंसी में इंदिरा गांधी का समर्थन किया । जिसके एवज में इंदिरा गांधी ने साहित्यक सांस्कृतिक संस्थाओं को कालांतर में वामपंथियों के हवाले कर दिया। उसके बाद इन संस्थाओं में पुरस्कारो से लेकर विदेश यात्राओं की रेवड़ियां अपने अपनों को बंटने लगी। अभी हाल के दिनों में ललित कला अकादमी के पूर्व अध्यक्ष अशोक वाजपेयी की उस वक्त की विदेश यात्राओं को लेकर कई बातें सामने आई हैं जिसकी भी जांच किए जाने की जरूरत है। साहित्य और कला को लेकर जिस तरह की स्वायत्ता की कल्पना इनकी स्थापना के वक्त की गई थी उसको फिर से स्थापित करने की जरूरत है। यूपीए सरकार के दौरान इन संस्थाओं के कामकाज को लेकर एक हाई पॉवर कमेटी का गठन हुआ था। उसके पहले संसदीय कमेटी ने इन संस्थाओं के क्रियाकलापों पर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की थी। इस रिपोर्ट में कई तरह की गड़बड़ियों की ओर इशारा किया गया था। उस वक्त भी इन संस्थाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही की बात तो हुई थी पर इसपर कितना काम हो पाया यह कम से कम सार्वजनिक तो नहीं ही हो पाया है। इस सरकार के सामने अब चुनौती ये है कि नियक्तियों से आगे जाकर इन संस्थाओं के कामकाज को ठीक करे। यहां व्याप्त गड़बड़ियों पर ऊंगली रखने की जरूरत है। अगर ऐसा हो पाता है तो साहित्य-संस्कृति के लिए बड़ा काम होगा अन्यथा तो सब चल ही रहा है और चलता भी रहेगा।