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Saturday, September 2, 2023

पुरस्कारों में ‘सिस्टम’ का दखल


दिल्ली में आयोजित एक साहित्यिक समारोह में काफी दिनों बाद जाना हुआ। आमतौर पर साहित्यिक समारोहों के पहले और बाद में कुछ मित्र एक जगह जमा होकर साहित्यिक विषयों पर चर्चा करते हैं। उस आयोजन में कई मित्र मिल गए। शाम हो गई थी और दो घंटे के आयोजन के बाद सबको चाय की तलब हो रही थी। तय हुआ कि कहीं बैठकर चाय पी जाए। हम पांच मित्र पास की एक चाय दुकान पहुंचे। चाय बनाने को कहा गया। चाय आते ही चर्चा आरंभ हो गई। विभिन्न विधाओं में हो रहे साहित्यिक लेखन से चर्चा आरंभ हुई और फिर कब वो पुरस्कारों पर चली गई पता ही नहीं चला। कुछ ही दिनों पहले वर्ष 2023 के लिए श्रीलाल शुक्ल स्मृति इफको सम्मान की घोषणा हुई थी। इस वर्ष का सम्मान हिंदी उपन्यासकार मधु कांकरिया को देने की घोषणा हुई थी। ये पुरस्कार उर्वरक क्षेत्र की सहकारी संस्था इंडियन फारमर्स फर्टिलाइजर कोआपरेटिव (इफको) लिमिटेड की ओर से दिया जाता है। सम्मानित होनेवाले साहित्यकार को ग्यारह लाख रुपए का चेक, एक प्रतीक चिन्ह और प्रश्स्ति पत्र दिया जाता है। मधु कांकरिया को पुरस्कार की घोषणा पर चर्चा होने लगी। उनका आरंभिक उपन्यास पत्ताखोर मैंने पढ़ा था। मुझे पसंद आया था इस कारण मैंने चयन की प्रशंसा कर दी। मेरी प्रशंसा सुनकर  एक मित्र ने कहा, काश! उपन्यासों की विषयवस्तु और लेखन शैली के आधार पर पुरस्कार दिए जाते। अगर ऐसा होता तो श्रीलाल जी की स्मृति में दिया जानेवाला ये पुरस्कार चित्रा मुद्गल या मैत्रेयी पुष्पा आदि को दिया जाना चाहिए था। उसके मुताबिक ये पुरस्कार एक विचारधारा विशेष से जुड़े लेखकों को दिया जाता है। उसका इशारा वामपंथी लेखकों की ओर था। हम पांच मित्रों में से दो तो घोर और घोषइत तौर पर वामपंथी लेखक थे। उनमें से एक ने फौरन इसका प्रतिवाद किया और कहा कि चित्रा जी और मैत्रेयी जी इस पुरस्कार या सम्मान के लिए उचित पात्रता नहीं रखती हैं। बेहतर होता कि पुरस्कार के निर्णय की आलोचना करने से पहले उसके नियमों को देखा जाता। इस पुरस्कार के नियमों के अनुसार न तो चित्रा जी की पात्रता है और न ही मैत्रेयी जी की। मेरे चेहरे पर सहमति का भाव उभरा था। मैंने तो उत्साह में कह भी दिया कि प्रत्येक पुरस्कार की पात्रता की नियमावली होती है। निर्णायक मंडल उसके आधार पर ही आपस में विचार विमर्श करता है और फिर किसी एक लेखक का चयन किया जाता है।

जिस मित्र ने चित्रा जी और मैत्रेयी जी का नाम लिया था वो अपने मोबाइल में कुछ ढूंढने में व्यस्त था। अचानक उसका चेहरा चमका और वो कुछ पढने लगा- मूर्धन्य कथाशिल्पी श्रीलाल शुक्ल की स्मृति में वर्ष 2011 में शुरु किया गया यह सम्मान प्रत्येक वर्ष हिंदी के ऐसे लेखक को दिया जाता है जिसकी रचनाओं में मुख्यत: ग्रामीण और कृषि जीवन तथा विस्थापन, हाशिए का समाज और भारत के बदलते यथार्थ का चित्रण किया गया हो। उसके इतना कहते ही एक वामपंथी मित्र ने कहा कि तुमलोग हर जगह व्हाट्सएप युनिवर्सिटी का ज्ञान देने लगते हो। ये साहित्य की दुनिया है यहां व्हाट्सएप फार्वर्ड से कुछ भी न तो साबित होगा न ही स्थापित। जब वो ये तंज कर रहा था तो नियम पढनेवाला मित्र मुस्करा रहा था। इस बीच दूसरे वामपंथी मित्र ने भी अपने कामरेड की बातों से सहमति जताते हुए प्रश्न उछाला, साहित्य में भी अब व्हाट्सएप ज्ञान चलाओगे क्या। मुस्कुरा रहे मित्र ने फिर से अपने मोबाइल को देखा और विनम्रता से कहा कि आप दोनों ठीक कह रहे हैं। मैंने व्हाट्यएप पर ही आए संदेश को पढ़ा। लेकिन ये फार्वर्ड संदेश बल्कि इफको की प्रेस रिलीज है। अगर प्रेस रिलीज में सही लिखा गया है तो समकालीन रचनाकारों में मैत्रेयी पुष्पा से अधिक किसने ग्रामीण जीवन औऐर हाशिए के समाज पर लिखा है। चाक से लेकर अलमा कबूतरी जैसे उनके उफन्यासों को याद करिए। चित्रा जी ने भी हाशिए के समाज पर भी लिखा है। बदलते भारत के यथार्थ का चित्रण भी उनकी रचनाओं में है। वो निरंतर बोले जा रहा था। दोनों कामरेड असहमत थे। लेकिन उनके पास तर्क नहीं थे तो उन्होंने निर्णायक मंडल के विवेक की आड़ ली। 

बात निर्णायक मंडल के विवेक पर आ गई थी। मैंने पिछली बार की तरह ही तर्क दिया कि पुरस्कार तो निर्णायक मंडल ही तय करेगा। उसको मधु कांकरिया की रचनाएं बेहतर दिखी होंगी। मैं ये कहकर चर्चा समाप्त करना चाहता था। परंतु जिस मित्र ने रचना के आधार पर पुरस्कार की बात आरंभ की थी वो तो डटा हुआ था। उसने कहा अच्छा चलो जरा निर्णायक मंडल के नाम देख लेते हैं। उसने फिर मोबाइल में व्हाट्सएप खोला और इफको की प्रेस रिलीज से पढ़कर बताया कि निर्णायक मंडल में असगर वजाहत, अनामिका, प्रियदर्शन, रवीन्द्र त्रिपाठी, मुरली मनोहर प्रसाद सिंह और उत्कर्ष शुक्ल थे। नाम सुनकर मेरे वामपंथी मित्र ने तर्क उछाला कि इतने वरिष्ठ लेखकों के निर्णायक मंडल के निर्णय पर प्रश्न कैसे खड़ा किया जा सकता है। इतना सुनते ही वो बोले कि कि जरा निर्णायक मंडल में शामिल लेखकों की विचारधारा और लेखक संगठनों से जुड़ाव देख लो। असगर वजाहत और मुरली मनोहर प्रसाद सिंह तो जनवादी लेखक संघ से सक्रिय रूप से संबद्ध हैं। अनामिका को छोड़कर जो दो लोग हैं उनका रुझान भी वामपंथ की ओर है जो साहित्य जगत में ज्ञात है। युवा लेखक की मैं नहीं जानता। इतना सुनते ही दोनों वामपंथी मित्र भड़क गए। कहने लगे कि लेखक संगठनों से जुड़े होने का क्या मतलब है। सरकारी पुरस्कारों पर टिप्पणी करने लगे कि सरकार भी तो अपने लोगों को पुरस्कृत करती है। अपनी विचारधारा के लोगों को सम्मानित करती है आदि आदि। 

हम चारों मित्र इस चर्चा में शामिल थे। हमारा पांचवां मित्र चुपचाप चाय पी रहा था और मुस्कुरा रहा था। जैसे बातचीत का आनंद ले रहा हो। अचानक वो पुरस्कारों पर सवाल उठानेवाले मित्र को देखकर बोला कि भाई, तुमको द कश्मीर फाइल्स फिल्म का वो संवाद याद करना चाहिए जिसमें कहा गया है कि सरकार भले बदल गई हो लेकिन सिस्टम तो हमारा ही चलता है। वही सिस्टम चल रहा है। सिस्टम के पसंदीदा लोग पुरस्कृत हो रहे हैं। देखा नहीं कुछ दिनों पहले भारत सरकार ने केंद्रीय हिंदी निदेशालय, दिल्ली और केंद्रीय हिंदी संस्थान के सभी पुरस्कार बंद कर दिए। उधर वित्त मंत्रालय के अधीन आनेवाले बैंक आफ बड़ौदा ने 61 लाख रुपए के पुरस्कार बांट दिए। उसकी निर्णायक समिति देख लो। अध्यक्षता बुकर पुरस्कार विजेता गीतांजलिश्री ने की और उसमें अरुण कमल, पुष्पेश पंत, अनामिका आदि थे। इनमें से अधिकांश की विचारधारा ज्ञात है। गीतांजलिश्री राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की मुखर आलोचक हैं, सरकार की भी। अरुण कमल लंबे समय तक प्रगतिशील लेखक संघ में रहे। इन सबने 25 लाख के प्रथम पुरस्कार के लिए उर्दू उपन्यास अल्लाह मियां का कारखाना को चुना। अब दोनों वामपंथी मित्र ढीले पड़ने लगे थे। मैंने सोचा कि बात बदली जाए। मैंने फिल्म की चर्चा आरंभ करने का प्रयास किया। लेकिन पाचवें मित्र रुके नहीं। कहने लगे कि चुनाव वर्ष में सरकार ने अपने अधिकतर साहित्यिक और भाषाई पुरस्कार बंद कर दिए लेकिन सिस्टम वाले पुरस्कार दे रहे हैं। इफको का पुरस्कार भले ही सरकारी नहीं हो लेकिन बैंक आफ बड़ौदा का पुरस्कार तो पूरी तरह से सरकारी है। इफको भी भारत सरकार के सहकारिता मंत्रालय से किसी न किसी तरह से तो जुड़ा ही है। पता नहीं क्यों सरकार ‘सिस्टम’ को खुलकर खेलने का अवसर प्रदान कर रही है। बात राजनीति की ओर मुड़ते देख मैंने चाय पर चर्चा खत्म करवाई। घर लौटते समय पांचवें मित्र की बात दिमाग में कुलबुला रही थी। 


Saturday, August 24, 2019

सोबती पर लिखूंगी संस्मरण- मुद्गल


चित्रा मुद्गल हिंदी की वरिष्ठ कथाकार हैं। अपने जीवन में पचहत्तर बसंत देख चुकी चित्रा मुद्गल पिछल छह दशक से सृजनरत हैं। उनको साहित्य अकादमी समेत कई प्रतिष्ठित पुरस्कार मिल चुके हैं। उन्होंने गुजराती और मराठी में भी कविताएं लिखी हैं। ुउन्होंने दिल्ली शहर के अपने अनुभव मुझसे साझा किए। 
सबसे पहले आपको एक दिलचस्प बात बताऊं क्योंकि उसका दिल्ली से गहरा संबंध है। मेरे पिताजी बड़े जमींदार थे, मां प्रतापगढ़ इलाके के बड़े तालुकेदार घराने की थी, दादी अमेठी की बडे परिवार से थीं। ऐस में जब मैंने फरवरी 1965 में अवधनारायण मुदगल से शादी की तो हमारे पूरे खानदान में हंगामा मच गया। किसी के गले ये बात उतर ही नहीं रही थी कि हमारे परिवार की लड़की अपनी मर्जी से शादी कर लेगी वो भी अपनी जाति से बाहर के लड़के से। हमारे घर में हमेशा ये कहा जाता कि जो भी लड़की ऐसी जुर्रत करेगी उसको आंगन के बाहर के ढंके हुए कुंए में डाल दिया जाएगा और कह दिया जाएगा कि पांव फिसलने से कुंए में गिर गई। जब मैंने अवध से शादी की तो मेरे पिताजी बहुत नाराज हुए। मेरे प्रेम विवाह ने उनको अंदर तक हिला दिया था और वो इसको स्वीकार नहीं कर पा रहे थे। वो इस जुगत में लगे हुए थे कि अवध को किसी तरह से जेल भिजवा दें और फिर मेरी शादी अपनी मर्जी से करवा सकें। वो सोच रहे थे कि जैसे ही अवध जेल जाएगा तो लड़की के सर से मोहब्बत का खुमार उतर जाएगा। हम पिता के सामर्थ्य से डरकर अप्रैल 1965 में मुंबई से दिल्ली आ गए। दिल्ली आकर सबसे पहले सर्वेश्वर भाई साहब के घर पर एक महीना रुके। उसके बाद राजेन्द्र यादव और मन्नू भंडारी के साथ भी महीने भर रुके। लोग कहते हैं कि मैं और अवध शादी कर भागकर दिल्ली आ गए थे। ये बात गलत है। हमें भागने  की जरूरत ही नहीं थी। दो महीने में ही हम फिर वापस मुंबई लौट गए थे। बाद में जब मेरे पिता बीमार पड़े और कोमा में जाने के पहले मेरा हाथ पकड़कर मुझसे कहा कि मैं सोचता था कि मां-बाप अपने बच्चों के लिए सुख खरीद सकते हैं पर अब मुझे लगता है कि सुख खरीदा नहीं जा सकता था। ये मेरे लिए बहुत ही भावुक क्षण था।
1979 से लेकर 1982 का दौर मेरे लिए बहुत उथल पुथल का रहा। मेरे पति अवध ‘सारिका’ पत्रिका में काम करते थे। प्रबंधन ने ‘सारिका’ को दिल्ली शिफ्ट करने का फैसला लिया। प्रबंधन कमलेश्वर से छुट्टी पाना चाहता था। उनको लगता था कि कमलेश्वर नौकरी तो ‘सारिका’ की करते हैं लेकिन जुटे फिल्म लिखने में रहते हैं। इसको खत्म करने के लिए ‘सारिका’ को मुंबई से दिल्ली शिफ्ट कर दिया गया। अवध को ‘सारिका’ का सहायक संपादक बनाकर दिल्ली भेजा गया। जब हम दिल्ली आए तो लारेंस रोड में रहने लगे। पर मेरा मुंबई आना जाना-लगा रहता था। बच्चों की पढ़ाई थी और मैं भी वहां ट्रेड यूनियन में सक्रिय थी। लारेंस रोड के बाद हमारा नया ठिकाना बना था दरियागंज, वहां भी हम रहे। जब अवध को सारिका का संपादक बनाया गया तो हमें ग्रेटर कैलाश में शिफ्ट करने का विकल्प दिया गया था, पर हमारे दोस्तों ने सलाह दी कि अपने जैसे लोगों के बीच रहना चाहिए। फिर हमलोग मयूर विहार फेज 1 में शिफ्ट कर गए। उस समय मयूर विहार में अदभुत माहौल था। काला जल जैसा कालजयी उपन्यास लिखने वाले शानी के फ्लैट पर हर दिना लेखकों का जमावड़ा लगता था। साहित्यिक अड्डेबाजी होती थी, कहानियों से लेकर दुनिया जहान की बातें होती थीं। शाऩी के घऱ होनेवाली उस बैठक में विष्णु खरे और प्रयाग शुक्ल लगभग नियमित थे, बाद में विजयमोहन सिंह भी आने लगे। शानी की पत्नी मुझे टिफिन में अच्छा खाना बनवाकर भेजती थी। वो मजाक में कहती भी थीं कि बेचारी ठकुराइन को ब्राह्मण से शादी कर घास-फूस खाना पडता है। मयूर विहार में मैंने कई घर बदले लेकिन आजतक वो इलाका छोड़ा नहीं। मैं कृष्णा सोबती जी के पड़ोस में भी लंबे समय तक रही और उनकी कई निजी बातों की साक्षी रही। मेरे नए उपन्यास में इऩ बातों पर लिखने की सोच रही हूं।   
(अनंत विजय से बातचीत पर आधारित)

Saturday, April 27, 2019

चुनावी कोलाहल में साहित्य का अर्धसत्य


लोकसभा चुनाव के तीन चरण संपन्न हो चुके हैं और चार चरण के चुनाव होना शेष है। चुनावी कोलाहल के बीच साहित्य, कला और संस्कृति से जुड़े सैकड़ों लोग खुलकर नरेन्द्र मोदी के पक्ष और विपक्ष में सामने आ रहे हैं। अबतक कई तरह की अपील जारी की चुकी हैं। किसी अपील में मोदी का नाम है तो किसी में बगैर मोदी के नाम के अपील जारी की गई है। जब भी कोई अपील जारी की जाती है तो उसके पक्ष और विपक्ष में सोशल मीडिया पर शोर-शराबा शुरू हो जाता है। इसी शोर शराबे के बीच हिंदी की वरिष्ठ और सम्मानित लेखिका मृदुला गर्ग ने फेसबुक पर एक टिप्पणी लिखी जिसपर विवाद हो रहा है। मृदुला गर्ग ने अपनी टिप्पणी में लिखा- ‘कभी सोचा नहीं था कि एक वक़्त ऐसा भी आएगा जब हिन्दी के लेखक जिनमें साहित्य अकादमी से पुरस्कृत लेखक भी हैं, ताल ठोंक कर सत्तासीन राजनीतिक पार्टी को दुबारा सत्ता में लाने के लिए प्रचारक की भूमिका निभाएंगे। अपनी ही अभिव्यक्ति पर रोक का उत्सव मनाएंगे! किसलिए? क्या प्राप्त करना चाहते हैं? अपनी शर्म और साहित्यिक गरिमा का मटियामेट कर लिया तो कम अज़ कम दूसरों को तो न बरगलायें।‘ दरअसल इस टिप्पणी में मृदुला गर्ग ने नाम नहीं लिया पर स्पष्ट रूप से उनका इशारा हिंदी की ही एक वरिष्ठ लेखिका चित्रा मुदगल की ओर था। 23 अप्रैल को पोस्ट की गई मृदुला गर्ग की इस टिप्पणी की पृष्ठभूमि यह है कि 20 अप्रैल 2019 को भारतीय साहित्यकार संगठन ने दिल्ली में एक प्रेस कांफ्रेंस करके मोदी के समर्थन में देश भर के 410 लेखकों की एक अपील जारी की थी। इस अपील में चित्रा मुद्गल का भी नाम था। उसके बाद ही मृदुला गर्ग की टिप्पणी आई।
अब जरा मृदुला गर्ग की टिप्पणी का विश्लेषण करते हैं। मृदुला जी ने कभी सोचा भी नहीं था कि हिंदी के लेखक सत्तासीन राजनीतिक पार्टी को दुबारा सत्ता में लाने के लिए प्रचारक की भूमिका निभाएंगीं। उनकी इस टिप्पणी से ऐसा प्रतीत होता है कि हिंदी के लेखकों ने पहली बार सत्तासीन राजनीतिक दल के पक्ष में कोई बयान जारी किया है। उन्हें शायद स्मरण नहीं रहा हो कि अटल बिहारी वाजपेयी के पक्ष में भी लेखकों ने एक अपील जारी की थी। वो भी तब सत्तासीन ही थे। प्रगतिशील लेखकों ने इमरजेंसी के दौरान इंदिरा गांधी के पक्ष में अपील जारी की थी, तब इंदिरा गांधी भी सत्तासीन ही थीं। राज्यों के विधानसभा चुनाव के दौरान भी कई ऐसे मसले मिल जा सकते हैं जहां हिंदी के लेखकों ने सत्तासीन पार्टी के दुबारा सत्ता में लाने के लिए अपील की हो। इस वाक्य में मृदुला जी ने जिस तरह से प्रचारक शब्द का उपयोग किया है वो ये संकेत देने के लिए है कि ये लोग राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ से जुड़े हैं। अपनी उसी टिप्पणी में मृदुला गर्ग ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए लिखा कि मोदी के समर्थन में सामने आए लेखक अपनी ही अभिव्यक्ति की रोक का उत्सव मनाएंगे। लेकिन इस टिप्पणी में वो अपनी अभिव्यक्ति की रोक वाली टिप्पणी के समर्थन में कोई तर्क नहीं दे पाईं। 2014 में मोदी के सत्ता संभालने के बाद लेखकों के एक खास वर्ग ने इस बात को जमकर प्रचारित किया कि देश में अभिव्यक्ति की आजादी खतरे में है। अघोषित आपातकाल जैसे जुमले भी उछाले गए। लेकिन इन बयानों को पुष्ट करनेवाले तथ्य कभी सामने नहीं आए। जब अभिव्यक्ति की आजादी का गला घोंटा गया था तब तो प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े लेखक इंदिरा गांधी के समर्थन में नारे लगा रहे थे। जब वामपंथी शासन काल के दौरान बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन को पश्चिम बंगाल से निकाला जा रहा था तब भी लेखक बिरादरी खामोश थी। मृदुला गर्ग अपनी टिप्पणी में यह भी जानना चाहती हैं कि मोदी के समर्थन में अपील जारी करनेवाले लेखक क्या प्राप्त करना चाहते हैं?  उनको यह समझना होगा कि हर कदम कुछ प्राप्त करने के उद्देश्य से नहीं उठाए जाते। अगर वो चित्रा मुदगल पर तंज कर रही थीं, या उऩके दिमाग में चित्रा जी को अटल बिहारी वाजपेयी के शासन के दौरान प्रसार भारती का सदस्य बनाए जाने का प्रसंग था तो उनको याद रखना चाहिए कि इंद्र कुमार गुजराल जब देश के प्रधानमंत्री बने थे तो उन्होंने अपनी पसंद के लेखक राजेन्द्र यादव को प्रसार भारती का सदस्य बनाया था। जैसे जैसे मृदुला जी की टिप्पणी आगे बढ़ती गई वो और तल्ख होती चली गई। उन्होंने इन लेखकों पर साहित्यिक गरिमा को मटियामेट करने का आरोप भी जड़ा और दूसरो को न बरगलाने की नसीहत भी दी। किसी दल के पक्ष में मतदान की अपील जारी करने से साहित्यिक गरिमा कैसे मटियामेट हो गई ये भी बतातीं तो बेहतर रहता। जहां तक बरगलाने की बात है तो यह कहा जा सकता है कि अपनी टिप्पणी में अर्धसत्य पेश करके मृदुला गर्ग ही हिंदी समाज को भ्रमित कर रही हैं। महाभारत के युद्ध में तो अर्धसत्य को अश्वत्थामा को मारने और द्रोणाचार्य को कमजोर करने के लिए अर्धसत्य का सहारा लिया गया था। तब अर्धसत्य को हथियार बनाया था धर्मराज युधिष्ठिर ने। यहां भी मृदुला जी बेहद सम्मानिक हैं, उनसे अर्धसत्य की अपेक्षा नहीं की जाती है बल्कु उऩसे समग्रता की अपेक्षा की जाती है। उनकी टिप्पणी के आखिरी वाक्य में जो गुस्सा और शब्दों का चयन है वो भी अनपेक्षित है। यहां यह भी याद दिलाना जरूरी है कि चित्रा मुदगल अचानक से पाला बदलकर किसी पक्ष में खड़ी नहीं हो गई हैं। उनका स्टैंड पूरे हिंदी जगत को पहले से ज्ञात रहा है। इसलिए जो लोग चित्रा जी की अब लानत-मलामत कर रहे हैं उनको अपने स्टैंड पर फिर से विचार करना चाहिए।
मृदुला गर्ग को यह जानना जरूरी है कि इस वक्त जारी चुनाव में देशभर के कई वामपंथी लेखक जिनमें नरेश सक्सेना जैसे वरिष्ठ कवि भी हैं, बेगूसराय में पार्टी विशेष के पक्ष में प्रचार कर रहे हैं। वो ये तर्क दे सकती हैं कि ये लोग सत्ता के खिलाफ संघर्ष में शामिल हैं। अगर वो सत्ता के खिलाफ संघर्ष है तो यहां भी पलटकर उनसे ये सवाल पूछा जा सकता है कि वो क्या प्राप्त करना चाहते हैं। यहां प्राप्ति की अपेक्षा का प्रश्न ज्यादा समीचीन होगा क्योंकि वामपंथी लेखकों का इतिहास रहा है कि वो सत्ता के साथ रहकर सत्ता सुख भोगते रहे हैं। कांग्रेस ने अभी हाल ही में जिस तरह से राजस्थान और मध्यप्रदेश में लेखकों को सरकारी पद देकर उपकृत किया है उससे उनका ये इतिहास और मजबूत होता है। मृदुला गर्ग की टिप्पणी पर जब इतिहास की याद दिलाई गई तो प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े एक लेखक ने इसको मोदी फॉर्मूला करार दिया कि ‘अब’ को दबाने के लिए ‘तब’ की बात की जाती है। वो यह भूल गए कि अतीत से पिंड छुड़ाना आसान नहीं होता।
लेखक को हमेशा सत्ता के खिलाफ होना चाहिए ये बात बहुधा सुनाई देती है। लेकिन उनको सत्ता के खिलाफ क्यों होना चाहिए, इस बारे में कहीं कुछ ठोस सुनने को नहीं मिलता है। दरअसल वामपंथियों ने यह बहुत सुंदर तर्क गढ़ा कि लेखक को प्रतिपक्ष की आवाज होना चाहिए। इस तर्क को जनता के बीच ले जाकर पुष्ट भी किया जाता रहा। पार्टी प्रतिबद्धता वाले लेखक जो अपने को वैचरिक प्रतिबद्धता वाले लेखक भी कहते और प्रचारित करते रहे, उनमें से कइयों ने अपने लेखन से भी इस अवधारणा को पुष्ट करने की कोशिश की। लेकिन अगर हम इस सिद्धांत की कसौटी पर वामपंथ से जुड़े लेखकों को कसते हैं तो बिल्कुल ही अलग तस्वीर नजर आती है। वो तस्वीर है प्रतिपक्ष की इस सैद्धांतिकी के मुखौटे की जिसके पीछे होता है स्वार्थसिद्धि का पूरा ताना बाना। इस बात पर देशव्यापी बहस होनी चाहिए कि लेखक की भूमिका क्या हो, क्या वो संविधान में मिले अपने अधिकारों के हिसाब से काम करे या बरसों से फैलाए जा रहे भ्रम का शिकार होते रहें। जितना अधिकार मृदुला जी को अपनी बात रखने का, मोदी का विरोध करने का, सत्ता का विरोध करने का है उतना ही हक चित्रा जी को अपनी बात रखने का, मोदी का समर्थन करने का है। मोदी के विरोध से मृदुला जी के साहित्य अकादमी पुरस्कार की चमक ना तो बढ़ जाएगी और ना ही मोदी के समर्थन से चित्रा जी के साहित्य अकादमी पुरस्कार में की चमक कम हो जाएगी। दोनों हिंदी की सम्मानित लेखिका बनी रहेंगी क्योंकि अंतत: एक लेखक का मूल्यांकन उसकी कृतियों से होता है। अगर कृतियों से इतर लेखक का मूल्यांकन करने की कोशिश की जाएगी तो बड़ी-बड़ी छवियां इस तरह से धराशायी होंगी जिसका दृष्य सोवियत रूस में लेनिन की गिरती मूर्ति से भी भयावह हो सकता है।     



Saturday, April 1, 2017

संवाद से बढ़ेगा दायरा

आज हिंदी में इस बात को लेकर बहुधा सवाल खड़े होते हैं कि कोई कालजयी कृति क्यों सामने नहीं रही । कालजयी ना भी तो अपने समय को झकझोर देनेवाली कहानी या उपन्यास क्यों नहीं लिखे जा रहे हैं । क्या वजह है कि असगर वजाहत की ‘कैसी आई लगाई’ चित्रा मुद्गल की ‘आवां’, भगवानदास मोरवाल का ‘काला पहाड़’ जैसे उपन्यास नहीं लिखे जा रहे हैं । पिछले दो तीन सालों में कुछ उपन्यास आए लेकिन वो सामान्य उपन्यासों की तरह छपे, बिके, कुछ चर्चा हुई, कुछ मित्रों ने लिख दिया लेकिन पाठकों के बीच ललक जैसी बात नहीं दिखाई दी । अल्पना मिश्र का ‘अंधियारे तलछट में चमका’ हो, जयश्री राय का ‘दर्दजा’ हो, प्रियदर्शन का ‘जिंदगी लाइव’ हो, पंकज सुबीर का ‘अकाल में उत्सव’ हो, भगवानदास मोरवाल का ‘नरक मसीहा’ हो या फिर अखिलेश का उपन्यास ‘निर्वासन’ हो, इन सबकी चर्चा हुई, पाठकों ने पसंद भी किया लेकिन उस ऊंचाई तक नहीं पहुंच पाई जिसतक ‘आवां’, ‘चाक’ या ‘काला पहाड़’ पहुंचे थे । इसकी वजह क्या रही होगी । यह सवाल बार-बार कई मंचों पर उठाते रहे हैं, विरोध और प्रतिरोध के बावजूद । आज की आत्ममुग्ध पीढ़ी के लेखक इस बात को मानने को तैयार नहीं है लेकिन इस प्रश्न का उत्तर ही उनको बेहतर लिखने की राह पर ले जा सकते है ।
क्या लेखकों का अनुभव संसार सिकुड़ता जा रहा है या फिर लेखक पाठकों की बदलती रुचि को नहीं पकड़ पा रहे हैं । इस बारे में कुछ भी प्रामाणिकता से कहना मुश्किल है लेकिन एक चीज जो साफ तौर पर लक्षित की जा सकती है वह है लेखकों के बारे में, उनकी रचना प्रक्रिया के बारे में पाठकों को जानकारी नहीं होना । पहले पत्र-पत्रिकाओं में लेखकों की रचना प्रक्रिया नियमित रूप से छपा करती थी । इसका फायदा यह होता था कि पाठकों को यह पता चलता था कि किसी भी रचना को लेकर लेखक के मन में क्या चल रहा है । उसका मानसिक संघर्ष कैसा था या उसको किसी उपन्यास या कहानी को लिखने में किस प्रक्रिया से गुजरना पड़ा था । इसका फायदा यह होता था कि पाठकों के मन में एक उत्सकुता का भाव तो उत्पन्न होता ही था, लेखक के संघर्ष में उसको खुद का संघर्ष भी दिखता था । कहना ना होगा कि इस प्रक्रिया के सामने आने से लेखकों और पाठकों के बीच एक तादात्मय स्थापित होता था । इस संबंध से रचना को वृहत्तर पाठक वर्ग में स्वीकृति मिलती थी । अब क्या हो रहा है कि लेखकों की रचनाएं तो आ रही हैं पर पाठकों को उनकी रचना प्रक्रिया को जानने का अवसर नहीं मिल रहा है । पत्र-पत्रिकाओं में लेखकों की रचना प्रक्रिया पर बात नहीं होती । ना ही कोई ऐसा कार्यक्रम होता है जिसमें लेखकों से उनकी रचना प्रक्रिया पर बात हो सके । इस वक्त दर्जनों लिटरेचर फेस्टिवल हो रहे हैं जिसमें हिंदी के लेखकों को बुलाया जाता है, उनसे बातचीत की जाती है लेकिन बहुधा उनकी कृतियों पर बात की जाती है या फिर साहित्य की उन प्रवृत्तियों पर बात की जाती है जिनमें विवाद की गुंजाइश नजर आती है ।  मुझे याद आता है  जब चंद सालों पहले भगवानदास मोरवाल का उपन्यास रेत या मैत्रेयी पुष्पा का उपन्यास अल्मा कबूतरी छपा था तो लेखकों ने बताया था कि कैसे वो उन समुदायों के लोगों के बीच गए उनसे बात की उनकी जिंदगी को करीब से जिया । इसका फायदा यह हुआ कि पाठकों को उपन्यासों में एक प्रामाणिकता का बोध हुआ जिसने कालांतर में इन कृतियों को बेहतक बनाने में या उनको स्थापित करने में मदद की । अब तो ये हो रहा है कि कल्पना के आधार पर देश विदेश की कहानियां लिखी जा रही हैं । इसमें बुराई नहीं है लेकिन काल्पनिकता कभी भी प्रामाणिकता का स्थान नहीं ले सकती है ।  
तकनीक के विस्तार ने, इंटरनेट के फैलते घनत्व ने लेखकों को पाठकों तक आसानी से पहुंचने का एक मंच दिया है । जरूरत इस बात की है कि हिंदी के लेखक इस सुविधा का लाभ उठाएं । फेसबुक पर हाल के दिनों में जिस तरह से वीडियो पोस्ट करने की या लाइव करने की सहूलियत मिली है उसका लाभ हिंदी के लेखकों को उठाना चाहिए । इसमें ज्यादा कुछ तामझाम की जरूरत भी नहीं पड़ती है । आप कैमरे वाले फोन और बेहतर इंटरनेट कनेक्शन के साथ बैठ जाएं और फेसबुक लाइव के जरिए अपने पाठकों से रूबरू हों, उनके सवालों का जवाब दें, अपनी रचना प्रक्रिया पर बात करें और अपनी कृति को लेकर उत्सुकता का वातवरण बनाए । विदेशों में लेखक इस तरह संवाद कर रहे हैं । कई बार खुद तो कई बार किसी सेलिब्रिटी के साथ बैठकर अपनी कृतियों पर बात करते हैं । यह भी देखा गया है कि विदेशों के लेखक पाठकों के साथ अपनी कृति को लेकर सवाल जवाब भी करते हैं । फेसबुक लाइव के दौरान सवाल जवाब का विकल्प भी है । फेसबुक लाइक्स से आगे जहां और भी है, इस बात को हिंदी के लेखकों को समझना होगा और उसको अपने और साहित्य के हक में इस्तेमाल करना होगा । पाठकों से संवाद का यह इकलौता मंच नहीं है, ट्विटर, व्हाट्स एप जैसे मंच का इस्तेमाल भी लेखकों को पाठकों तक अपनी बात पहुंचाने के लिए करना चाहिए । हैरी पॉटर सिरीज की मशहूर लेखिका जे के रॉलिंग तो अपनी नई कृति के प्रकाशन के पहले अपने पाठकों और प्रशंसकों के साथ संवाद ही नहीं करती है बल्कि कोई सवाल उछालकर अपने प्रशंसकों को उकसाती भी है । कई बार उसका जवाब देकर तो कई बार उसको रीट्वीट करके ।
अब ये सवाल पूछा जा सकता है कि इन सबको अपनाकर पाठकों को झकझोर देनेवाली कहानियां या उपन्यास कैसे लिखे जा सकते हैं । सवाल बाजिब है लेकिन जब पाठकों को किसी कहानी के पीछे की कहानी पता चलेगी या फिर लेखक के उन अनुभवों का अंदाजा लगेगा जिससे प्रभावित होकर उसने कोई रचना लिखी है तो पाठक उसको दूसरे तरीके से देखगें । रचना की प्रक्रिया को जाने बगैर कोई कृति बहुत सपाट लग सकती है लेकिन अगर उसको जान लेंगे और समग्रता में उसको देखेंगे तो, संभव है उसके कई अर्थ उद्घाटित हों । सपाट रचना के अर्थ उद्घाटित होते ही उसके बेहतर रचना के कोष्टक में शामिल होने की संभावना बढ़ जाती है ।