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Saturday, March 28, 2026

रचनात्मक स्वतंत्रता के नाम पर बेइमानी


इन दिनों पूरे देश में फिल्म धुरंधर, द रीवेंज की सफलता की चर्चा हो रही है। इस फिल्म के निर्देशक आदित्य धर के निर्देशन के साथ-साथ इस फिल्म के कलाकारों के अभिनय की प्रशंसा हो रही है। इस फिल्म ने बाक्स आफिस पर कमाई का कीर्तिमान रच दिया है। करीब चार घंटे की इस फिल्म को देखने के लिए सिनेमा हाल में दर्शकों की भीड़ उमड़ रही है। फिल्म धुरंधर 2 की सफलता पर कवि-लेखक चेतन कश्यप से बात हो रही थी। धुरंधर के संवाद, पुराने फिल्मी गीतों का बैकग्राउंड म्यूजिक की तरह उपयोग पर चर्चा हुई। निर्देशक रामगोपाल वर्मा की फिल्म धुरंधर पर की गई टिप्पणी और रणवीर सिंह और अमिताभ बच्चन के अभिनय की तुलना भी की गई। दीवार में अमिताभ बच्चन का दोनों पैर उठाकर टेबल पर रखनेवाले सीन और धुरंधर- 2 में ल्यारी पर कब्जे के बाद रणवीर सिंह का रहमान की कुर्सी पर बैठ कर सामने की टेबल पर दोनों पैर रखने के सीन की तुलना की गई। इसके बाद फिल्म के क्राफ्ट पर चर्चा चली। फिल्म के क्राफ्ट पर चर्चा होते-होते शैलेन्द्र की फिल्म
‘तीसरी कसम’ पर कैसे बात चली गई ठीक से याद नहीं। बात रेणु जी की कहानी और फिल्म की कहानी पर होने लगी। मूल कहानी का बड़ा हिस्सा फिल्म में नहीं है। इसी क्रम में चेतन ने बताया कि फिल्म तीसरी कसम की पटकथा तीसरी कसम के नाम से ही प्रकाशित हो चुकी है। तुरंत ही पटकथा की पुस्तक मंगवाई गई। जबतक फिल्म तीसरी कसम की पटकथा आती तबतक रेणु की संपूर्ण कहानियां से तीसरी कसम, अर्थात मारे गए गुलफाम निकालकर पढ़ी गई। चूंकि क्राफ्ट पर बात हुई थी इस कारण यूट्यूब पर उपलब्ध तीसरी कसम देखी। ये सब होने के बाद जब पटकथा वाली पुस्तक आई तो उसको भी पढ़ा। 

पटकथा वाली पुस्तक के पृष्ठ संख्या 96 पर एक दृष्य का वर्णन है। जिसमें नौटंकी देखने के क्रम में एक दर्शक, शिवरतन, हीरामन और लालमोहर के बीच नायिका हीराबाई को लेकर संवाद है। प्रकाशित पटकथा के अनुसार शिवरतन का एक दर्शक की हीराबाई पर टिप्पणी पर संवाद है ‘अरे, पौडर से दांत धो लेती होगी...बड़ी चालाक रंडी है। हीरामन गुस्से में कहता है, ए! क्या बे-बात की बकते हो? कंपनी की औरत को रंडी कहते हो। शिवरतन- एक बार नहीं सौ बार कहेंगे। तुमको इससे क्या? हीरामन- मैं तुम्हारी जीभ खींच लूंगा...। शिवरतन लापरवाही से हंसता है- अरे-जा-जा रंडी के भड़ुए...! हीरामन- मारो साले को! लालमोहर- मारो!! लालमोहर हाथ की दुआली से हर आदमी को पटापट पीटता जाता है। हीरामन शिवरतन को पटककर छाती पर सवार है...आओ! एक-एक की गरदन उतार लूंगा! पलटदास घुस्सा लगाते हुए कहता है – साला! सिया सुकमारी को रंडी कहता है। सो भी हिंदू होकर! धुन्नीराम भाग खड़ा होता है। कलरव, कोलाहल—हल्ला...! हीराबाई पर्दे को हटाकर देखती है और अचरज से उसका मुंह खुल जाता है।...मारपीट जारी है।‘ इस संवाद को पढ़ते ही कुछ खटका। लगा कि कहानी में तो कुछ और है। वापस कहानी पर गया। कहानी में रेणु ने लिखा है- ‘पौडर से दांत धो लेती होगी। हरगिज नहीं। कौन आदमी है बात की बेबात करता है। कंपनी की औरत को पतुरिया कहता है। तुमको बात क्या लगी ? कौन है रंडी का भड़वा ? मारो साले को! मारो! तेरी..! लालमोहर दुआली से पटापट पीटता जा रहा है सामने के लोगों को।‘ पलटदास एक आदमी की छाती पर सवार है- ‘साला, सिया सुकुमारी को गाली देता है, सो भी मुसलमान होकर।‘ रेणु की कहानी में जिस संवाद में मुसलमान कहा जाता है वो पटकथा तक पहुंचते पहुंचते हिंदू हो जाता है। 

लगा कि एक बार फिल्म देखनी चाहिए कि फिल्म के संवाद में क्या कहा गया है। यूट्यूब पर उपलब्ध फिल्म के क्रेडिट में स्क्रीनप्ले नवेंदु घोष का और कहानी-डायलाग फणीश्वरनाथ रेणु का है। फिल्म में गाना आता है, पान खाए सैंया हमार। उसके फौरन बाद ये सीन है। फिल्म के संवाद में न तो हिंदू है न मुसलमान। वहां हीराबाई के दांत पर टिप्पणी है, उसको अपशब्द कहे गए हैं लेकिन सिया सुकुमारी वाला संवाद नहीं है। प्रश्न यह उठता है कि अगर कहानी में मुसलमान था तो उसको पटकथा में हिंदू क्यों और किसने कर दिया। जानकारों का मानना है कि ये काम संवाद या स्क्रीनप्ले लिखनेवाले कर सकते हैं। शाट लेते समय निर्देशक इंपर्वोवाइज करने के लिए बदलाव कर सकते हैं। रेणु जी ने जब कहानी में मुसलमान लिखा तो पटकथा में उसको हिंदू लिखने का कोई स्पष्ट कारण समझ नहीं आता है। संभव है कि नवेन्दु घोष ने स्क्रीनप्ले लिखते समय ये बदलाव कर दिया होगा क्योंकि वो कम्युनिस्ट थे। हिंदी फिल्मों में कम्युनिस्ट संवाद लेखकों ने इस तरह के कई कारनामे किए हैं। इस फिल्म के निर्माता शैलेन्द्र भी प्रगतिशील लेखक संघ और भारतीय जन नाट्य संघ में सक्रिय थे इस कारण संभव है कि इस बदलाव पर उनको आपत्ति ना हुई हो। अब प्रश्न उठता है कि अगर पटकथा में उक्त संवाद था तो फिल्म में क्यों नहीं है? दो बात हो सकती है, एक तो ये कि इस संवाद को शूट ही नहीं किया गया हो। मारपीट का दृष्य तो है, छाती पर चढ़कर पीटने का भी लकिन उसके बाद ही इतना हो-हल्ला हो जाता है कि थोड़ी देर तक संवाद की गुंजाइश ही नहीं बनती। उसके बाद निर्देशक ने पुलिस की एंट्री करवा दी। दृष्य बदला तो संवाद बदल गए। दूसरी बात ये कि मारपीट के दौरान ये दृष्य शूट किया गया। जब फिल्म सेंसर बोर्ड गई हो तो बोर्ड ने इस संवाद को हटाने के लिए कहा होगा। इस कारण ये संवाद फिल्म में नहीं है। क्योंकि एक हिंदू के मुंह से सिया को गाली दिलवाना आपत्तिजनक है। 

इस पूरे प्रसंग को देखने के बाद ये अनुमान कि.या जा सकता है कि हिंदी फिल्मों में कम्युनिस्ट और कथित प्रगतिशील लेखकों ने रचनात्मक स्वतंत्रता के नाम पर जाने क्या-क्या किया। रचनात्मक स्वतंत्रता के नाम पर बुरे पात्रों का धर्म बदल दिया जाता रहा। फिल्म की कहानी या दृष्य या संवाद बदल कर हिंदुओं को नीचा दिखाने प्रवत्ति उक्त प्रसंग से गाढ़ी होती है। पूर्व में भी कई फिल्मों के संवाद में हिंदुओं को नीचा दिखाने और मुसलमानों को बेहतर दिखाने की प्रवृत्ति को रेखांकित किया जाता रहा है। अधिकतर फिल्मों में हिंदू पात्रों के सामने मुस्लिम पात्रों को बेहतर दिखाया जाता है। किसी फिल्म में हिंदू पात्र मंदिर की सीढ़ियों पर चढ़ना नहीं चाहता और जब मजबूरी में उसको मंदिर जाना पड़ता है तो भगवान से उसकी खुश होने की बात करता है। किसी देवता की मूर्ति के पीछे खड़े होकर भगवान की आवाज में किसी लड़की से बात करने जैसे दृष्य तो हिंदी फिल्मों के दर्शकों ने देखा ही है। प्रश्न ये उठता है कि जो लोग गंगा-जमुनी तहजीब की बात करते हैं उनमें से अधिकतर इस तरह की हरकतों में क्यों लिप्त नजर आते हैं। स्वंय को तरक्कीपसंद और नास्तिक कहकर नैतिकता की मीनार पर खड़े होकर पूरे देश को भाषण पिलाने वाले लेखक भी इस तरह की रचनात्मक बेईमानी करते पाए जाते हैं। उनसे जब इस बाबत प्रश्न पूछो तो पलटवार करते हुए आपसे पूछेंगे कि क्या आप अपने मुल्क को सीरिया बनाना चाहते हैं। नहीं साहब! हम अपने मुल्क को सीरिया बिल्कुल नहीं बनाना चाहते हैं पर लेखकों से ईमानदार और वस्तुनिष्ठ होने की अपेक्षा अवश्य करते हैं।

Thursday, July 10, 2025

व्याकुल मन और संवेदना की धुन


किसे पता था कि अपराध कथाओं पर सफल फिल्म बनाने वाला एक निर्देशक दर्द और संवेदना के तार को ऐसे छुएगा कि उसकी फिल्में क्लासिक और कल्ट फिल्म बन जाएंगी। मात्र 39 वर्ष की आयु मिली लेकिन उस लघु अवधि में हिंदी सिनेमा को अपनी कला कौशल से झंकृत कर देने वाले कलाकार का नाम है गुरुदत्त। गुरुदत्त की अपराध कथाओं पर आधारित सफल फिल्मों, बाजी, जाल, बाज और सैलाब, की चर्चा कम होती है। गुरुदत्त को हिंदी सिनेमा में इन्हीं फिल्मों से पहचान मिली थी। गुरुदत्त ने ज्ञान मुखर्जी के सहायक के तौर पर कार्य करना आरंभ किया था। माना जाता है कि हिंदी फिल्मों में ज्ञान मुखर्जी अपराध कथाओं पर आधारित फिल्मों के पहले कुछ निर्देशकों में से एक थे। अब उन कारणों की चर्चा करना आवश्यक प्रतीत होता है कि एक अपराध कथाओं पर फिल्म निर्देशित करनेवाला सिद्धहस्त निर्देशक कैसे इतनी संवेदनशील फिल्मों को कैसे साध सके। गुरुदत्त के शताब्दी वर्ष में जब हम उनकी कलात्मकता पर बात करते हैं तो उनके साथ के लोगों की बात करनी चाहिए जिनके साथ ने गुरुदत्त को महान बनाया। कलाकार गुरुदत्त की शख्सियत तीन व्यक्तियों के बिना पूरी नहीं होती है। यै हैं गीता दत्त, वहीदा रहमान और अबरार अल्वी। जब गुरुदत्त अपनी पहली फिल्म बाजी निर्देशित कर रहे थे तो वो गीता राय को दिल दे बैठे। गुरुदत्त शादी के लिए जल्दी कर रहे थे। दोनों में महीनों तक रोमांस चला और शादी हुई। गीता दत्त के बाद उनकी जिंदगी में वहीदा रहमान का प्रवेश होता है । यहीं से आरंभ होता है प्यार से असफल होकर स्वयं से दूर भागने की उनकी प्रवृत्ति। 

जब प्यासा फिल्म बन रही थी तो इस बात की चर्चा थी कि इसकी कहानी गुरुदत्त की निजी जिंदगी पर आधारित है। पर ये कहानी सिर्फ गुरुदत्त की कहानी नहीं है। इसमें लेखक अबरार अल्वी की जिंदगी की घटनाएं भी शामिल हैं। ये भी कहा जाता है कि इस फिल्म की कहानी गुरुदत्त ने लिखी थी। पर अबरार अल्वी ने बताया था कि गुरुदत्त ने सिर्फ छह पन्ने की कहानी लिखी थी और उसमें नायिका सिर्फ मीना थी। गुलाबो का चरित्र तो अबरार अल्वी ने जोड़ा। दरअसल जब अबरार मुंबई आए थे तो वो एक वेश्या के पास जाते थे। उस वेश्या के साथ के उनके अनुभव और गुरुदत्त की प्रेमिका रही मीना के किस्से को जोड़कर प्यासा की कहानी बुनी गई थी। गुरुदत्त की एक और अदा थी कि वो किसी चीज से बहुत जल्दी संतुष्ट नहीं होते थे। कई बार तो उन्होंने कई रील शूट होने के बाद फिल्म को रद करके नए सिरे से शूट किया। प्यासा फिल्म के कई रील शूट हो चुके थे। गुरुदत्त को अपना रोल पसंद नहीं आ रहा था। उन्होंने सोचा कि इस भूमिका के लिए दिलीप कुमार बेहतर अभिनेता हैं। वो दिलीप साहब के पास पहुंच गए। दिलीप कुमार ने कई शर्तें रखीं। गुरुदत्त ने सभी मान लीं। दिलीप कुमार ने डेट्स दीं लेकिन तय समय पर स्टूडियो के सेट पर नहीं पहुंचे। घंटों की प्रतीक्षा के बाद गुरुदत्त ने फिर से मेकअप किया और फिल्म पूरी की। फिल्म के प्रीमियर पर दिलीप कुमार, निर्देशक के आसिफ और बी आर चोपड़ा के साथ पहुंचे थे। फिल्म समाप्त होने के बाद दिलीप कुमार ने बी आर चोपड़ा से कहा, थैंक गाड, मैं बाल-बाल बच गया, इस फिल्म की भूमिका करता तो खूब हंसी उड़ती। ये अलग बात है कि बाद के दिनों में दिलीप कुमार को प्यासा में काम नहीं करने का अफसोस रहा। प्यासा लोगों को खूब पसंद आई थी और फिल्म जबरदस्त हिट रही। 

प्यासा के बाद गुरुदत्त ने फिल्म कागज के फूल बनाई। इसमें भी वो अशोक कुमार को लेना चाहते थे। फिल्म बाजी के समय से ही गुरुदत्त की इच्छा थी कि वो अशोक कुमार को डायरेक्ट करें लेकिन कई तरह की समस्याओं के कारण अशोक कुमार फिल्म नहीं कर पाए। गुरुदत्त ने चेतन आनंद से संपर्क किया। उन्होंने इतने पैसे मांग लिए कि गुरुदत्त को फिर से खुद ही मेकअप करवाकर फिल्म करनी पड़ी। फिल्म को दर्शकों ने नकार दिया। इस फिल्म में भी गुरुदत्त ने नायक की पीड़ा को उभारने का प्रयास किया लेकिन वो दर्शकों के गले नहीं उतरी। प्यासा का नायक बेहद गरीब था उसके दुख को दर्शकों ने स्वीकार कर लिया। कागज के फूल के नायक की अमीरी उसके दुख से दर्शकों को जोड़ नहीं पाई। एक अमीर आदमी का पारिवारिक दुख दर्शकों के गले नहीं उतर सका। फिल्म बेहद कलात्मक बनी पर भावनात्मक संघर्ष का चित्रण कमजोर माना गया। इस फिल्म की असफलता ने गुरुदत्त को अंदर से तोड़ दिया। तबतक उनकी पारिवारिक जिंदगी संघर्ष के रपटीली पथ पर आ चुकी थी। शराब की आदत बढ़ने लगी थी। वहीदा रहमान के साथ उनके संबंधों की चर्चा चरम पर थी। इस दौर में ही उन्होंने फिल्म चौदहवीं का चांद बनाने की सोची। फिल्म बन गई। इसके प्रदर्शन में बाधा खड़ी हो गई। ये फिल्म मुस्लिम समाज पर बनी है। देश का विभाजन हो चुका था। फिल्म डिस्ट्रीव्यूटर्स का मानना था कि विभाजन के बाद मुस्लिम समाज का बड़ा हिस्सा पाकिस्तान चला गया था। मुस्लिम समाज की कहानियों का बाजार सिकुड़ गया था। दरवाजा और चांदनी चौक जैसी फिल्में फ्लाप हो गई थीं। किसी तरह गुरुदत्त ने डिस्ट्रीव्यूटर्स को तैयार किया। फिल्म जबरदस्त हिट रही। 

इसके बाद गुरुदत्त ने साहब बीवी और गुलाम बनाई। मीना कुमारी से छोटी बहू का ऐसा अभिनय करवाया कि उनकी भूमिका अमर हो गई। इस फिल्म के दौरान भी अनेक बधाएं आईं। ऐसा प्रतीत होता है कि जिंदगी और कारोबार की बाधाएं और उससे उपजे दर्द से गुरुदत्त को बेहतर करने की उर्जा मिलती थी। वो व्याकुल मन से अपने दर्द को रूपहले पर्दे पर इस तरह से पेश करते थे कि दर्शक उसके मोहपाश में बंधता चला जाता था। कागज के फूल भले ही फ्लाप रही हो लेकिन आज उसकी कलात्मकता भारतीय फिल्म को गर्व का अवसर देती है। गुरुदत्त ने अपनी छोटी सी जिंदगी में हिंदी सिनेमा को वो ऊंचाई दी जहां पहुंचना किसी भी निर्देशक के लिए एक सपने जैसा है। फिल्मकार गुरुदत्त में बेहतर करने की जो ललक थी वो उनको हमेशा व्याकुल कर देती थी। व्याकुलता और दर्द ने असमय गुरुदत्त की जीवन लीला समाप्त कर दी। 

Tuesday, September 26, 2023

क्लासिक फिल्मों की जीवंत अभिनेत्री


कौन कल्पना कर सकता है कि जिस लड़की को कैमरा एंगल के बारे में, फ्रेमिंग के बारे में, क्लोजअप शाट में चेहरे के भावों को बदलने के बारे में, अन्य शाट्स में शरीर के मूवमेंट के बारे में जानकारी न हो उसको एक दिन भारतीय फिल्मों का सर्वोच्च सम्मान दादा साहब फाल्के सम्मान से सम्मानित किया जाएगा। उस लड़की ने दशकों तक हिंदी फिल्मों के दर्शकों के बीच लोकप्रियता बटोरी। जिसने अपने अभिनय क्षमता से प्यासा जैसी फिल्म में गुलाबो के चरित्र को अमर कर दिया। जिसको शाट्स का नहीं पता था, जिसको मूवमेंट का नहीं पता था उसने जब पर्दे पर जाने क्या तूने कही, जाने क्या मैंने कही गाया तो उसके सभी मूवमेंट और शाट्स परफेक्ट लगते हैं। सिर्फ इस गाने में ही नहीं बल्कि देवानंद के साथ फिल्म गाइड में कांटो से खींच के आंचल गाती हैं तो ट्रैक्टर से लेकर ऊंट तक में उनके चेहरे पर जो भाव आते हैं वो इस गीत की खूबसूरती में चार चांद लगा देते हैं। शोख, चुलबुली अदा के साथ जब भरटनाट्यम में पारंगत वहीदा रहमान नृत्य करती हैं तो चेहरे के भाव जीवंत हो उठते हैं। इसके पीछे की भी एक दिलचस्प कहानी है। एक ही स्टूडियो में सीआईडी और प्यासा की शूटिंग होती थी। गुरुद्दत सीआईडी के प्रोड्यूसर थे और प्यासा के निर्देशक। फिल्म सीआईडी के निर्देशक राज खोसला जब वहीदा रहमान के शाट्स के व्याकरण को नहीं समझ पाने को लेकर निराश हो जाते तो गुरुदत्त के पास पहुंच जाते। फिर गुरुद्दत सीआईडी के सेट पर आते और वहीदा को अभिनय करके बताते कि इस तरह से इस शाट्स में मूवमेंट करना है और चेहरे पर भाव लाने हैं। साथ ही गुरुद्दत वहीदा को नसीहत देते कि उनकी नकल न करे। वो कहते कि तुम अपनी तरह से करो क्योंकि अभिनेता और अभिनेत्री के भाव अलग होंगे। इसके बाद तो वहीदा रहमान ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। 

वहीदा रहमान को इस बात के लिए भी याद किया जाता है कि उन्होंने अपने दौर में डायलाग डिलीवरी के अंदाज को बदल दिया। नाटकीय संवाद को उन्होंने स्वाभाविक अंदाज में कहना आरंभ किया था। याद कीजिए प्यासा का एक दृश्य। नायक विजय के पास पैसे नहीं होने की वजह से रेस्तरां का वेटर उसकी थाली खींचता है तो वहीं थोड़ी बैठी गुलाबो खान के पैसे देती है। गुलाबो उससे कहती है कि खाना खा लो, तुम्हें मेरी कसम। दुखी विजय कहता है आप अपनी कसम क्यों देती हैं, आप ठीक तरह से मुझे जानती भी नहीं। इसके बाद कुछ और संवाद और फिर गुलाबो का उत्तर, जब तुम्हारी नज्मों  और गजलों से, जब तुम्हारे ख्यालात और और जज्बात को जान लिया तो अब जानने को क्या बचा है। इस संवाद का दृश्यांकन भी बेहतरीन है और वहीदा की संवाद कला भी एकदम स्वाभाविक। यह अकारण नहीं है कि सीआईडी और प्यासा दोनों फिल्मों ने सिल्वर जुबली मनाई थी। ये बहुत कम अभिनेत्रियों के साथ होता है कि उनके जीवन काल में उनकी फिल्म क्लासिक का दर्जा पा ले। वहीदा की दो फिल्म प्यासा और गाइड अपने प्रदर्शन के साठ-सत्तर वर्ष बाद भी पसंद की जाती हैं। 


Wednesday, July 28, 2021

गाइड में लीला नहीं बन पाई 'रोजी'


नौसेना अधिकारी के एम नानावटी की जिंदगी और उनके अपनी पत्नी के प्रेमी को गोलीमार देने की घटना हर दौर में फिल्मकारों को अपनी ओर आकर्षित करती रही है। सुनील दत्त ने जब फिल्म निर्माण के क्षेत्र में कदम रखने की सोची तो उनको नानावटी की स्टोरी पसंद आई और उन्होंने उसपर फिल्म बनाने का ताय किया। उन्होंने ‘ये रास्ते हैं प्यार के’ नाम से नानवटी की कहानी पर फिल्म बनाई। इसमें सुनील दत्त के साथ रहमान थे और नायिका के तौर पर मिस इंडिया रही लीला नायडू को चुना गया था। फिल्म बनी लेकिन बहुत चल नहीं पाई लेकिन लीला नायडू की खूबसूरती और अदायगी का हिंदी फिल्मकारों ने नोटिस लिया। नानावटी की कहानी पर बाद में गुलजार के निर्देशन में ‘अचानक’ फिल्म बनी जिसको ख्वाजा अहमद अब्बास ने लिखा था। इसमें विनोद खन्ना लीड रोल में थे। कई वर्षों बाद अक्षय कुमार अक्षय कुमार को लीड रोल में लेकर एकबार फिर इस कहानी पर ‘रुस्तम’ बनी। बाद की दोनों फिल्में सफल रहीं लेकिन ‘ये रास्ते हैं प्यार के’ को दर्शकों का प्यार नहीं मिल पाया। 1963 में ‘ये रास्ते हैं प्यार के’ रिलीज हुई थी। इसी समय विजय आनंद ने आर के नारायणन की कहानी पर ‘गाइड’ फिल्म बनाने की सोची थी तो उनके जेहन में रोजी की भूमिका के लिए लीला नायडू का नाम ही आया। वो लीला की खूबसूरती से बहुत प्रभावित थे और उनको लगता था कि ‘गाइड’ में रोजी की भूमिका के लिए वो उपयुक्त अदाकारा हैं। इस बात का कई जगह उल्लेख मिलता है कि विजय आनंद ने लीला नायडू से इस रोल के लिए बात कर ली थी। जब फिल्म के फ्लोर पर जाने का समय आया और उसका स्क्रीनप्ले लिख लिया गया तो विजय आनंद को महसूस हुआ कि रोजी के रोल में तो वही अभिनेत्री सफल हो सकती हैं जो बेहतरीन डांसर भी हो। लीला नायडू नृत्यकला में उतनी पारंगत नहीं थीं लिहाजा विजय आनंद को अपना फैसला बदलना पड़ा और लीला नायडू की जगह वहीदा रहमान को चुना गया। बाद की बातें तो इतिहास हैं। 

फिल्म ‘गाइड’ तो लीला नायडू को नहीं मिली लेकिन उसी समय इस्माइल मर्चेन्ट ने एक कंपनी बनाई और फिल्म ‘द हाउसहोल्डर’ का निर्माण किया। इस फिल्म में लीला नायडू को लिया गया था। ‘द हाउसहोल्डर’ के बनने की प्रक्रिया में सत्यजित राय बहुत गहरे जुड़े थे और वो लीला नायडू से प्रभावित हो गए थे। उन्होंने लीला नायडू, शशि कपूर और मर्लेन ब्रांडो को लेकर एक फिल्म बनाने की योजना बनाई थी, पर ये योजना परवान नहीं चढ़ सकी। दरअसल लीला नायडू मुंबई फिल्म जगत की ऐसी अदाकारा थीं जो बेहद खूबसूरत थीं लेकिन उनकी फिल्मों को बहुत अधिक सफलता नहीं मिली। इनके पिता वैज्ञानिक थे और लंबे समय तक पेरिस में रहे। लीला नायडू अपने माता पिता की इकलौती संतान थीं। स्विट्जरलैंड में पली बढ़ी और वहीं उन्होंने एक्टिंग की ट्रेनिंग भी ली। 1954 में वो मिस इंडिया बनीं और इसके आठ साल बाद उनको सुनील दत्त ने फिल्म का ऑफर दिया। फिल्मी दुनिया में आने के पहले उन्होंने ओबरॉय होटल चेन के मालिक मोहन सिंह ओबरॉय के बेटे तिलक राज ओबरॉय से विवाह कर लिया था। ये शादी बहुत लंबी नहीं चल सकी और दो बेटियों के जन्म के बाद दोनों में तलाक हो गया। बाद में लीला ने लेखक कवि डाम मारिस से दूसरी शादी कर ली। लीला नायडू ने एकाध और फिल्में की लेकिन बहुत सफलता नहीं मिल पाई। बाद के दिनों में वो अपने दूसरे पति से भी अलग हो गई और अकेले रहने लगीं। मुंबई के कोलाबा इलाके के अपने फ्लैट में अंतिम दिनों में रहीं और वहीं 29 जुलाई 2009 को उनका निधन हो गया। 


Saturday, March 29, 2014

वहीदा के बहाने....

हाल के दिनों में हिंदी लेखन में एक खास किस्म का बदलाव देखने को मिला है । हिंदी के भी कुछ लेखक भारतीय फिल्मों पर, फिल्मों में काम करनेवाले अभिनेताओं, कलाकारों, संगीतकारों और फोटोग्राफर से लेकर निर्देशकों पर लिखने लगे हैं । इसे एक अच्छी शुरुआत का संकेत माना जा सकता है । हिंदी में लंबे समय तक यथार्थवादी लेखन के नाम पर फिल्म लेखन को हेय की दृष्टि से देखा जाता था । विचारधारा विशेष में फिल्म को बुर्जुआ संस्कृति का पोषक और संवाहक माना जाता था लिहाजा उसपर लिखना तो दूर की बात उसके बारे में विचार करना या बोलना भी गुनाह माना जाता था । वामपंथ के प्रभाव में जबतक हिंदी लेखन रहा तबतक फिल्म और संगीत पर लेखन हाशिए पर ही रहा जबकि फिल्म एक खास किस्म की रचनात्मकता को प्रदर्शित करने का एक ऐसा माध्यम है जिसके कई ओर छोर हैं, कई आयाम हैं जिनपर बातचीत होनी चाहिए । एक लंबे कालखंड के बाद वामपंथ से मोहभंग और हिंदी जगत में उसका दबदबा कम होने के बाद हिंदी के लेखकों ने फिल्म और फिल्मी दुनिया पर लिखना शुरू किया । भारत सरकार में अफसर पंकज राग ने धुनों की यात्रा नाम की भारी भरकमन किताब लिखी  जिसे एक तरह से हिंदी में भारतीय फिल्म संगीत का इनसाइक्लोपीडिया कहा जा सकता है । मधुप शर्मा ने भी फिल्म पर कई किताबें लिखी । युवा कवि और संस्कृतिकर्मी यतीन्द्र मिश्र की भी हाल में पेंग्विन प्रकाशन से एक किताब आई है – हमसफर, हिंदी सिनेमा और संगीत । यतीन्द्र ने इस किताब में हिंदी सिनेमा के संगीत के इतिहास को केंद्र में रखा है । इस किताब का ब्लर्ब महान गायिका लता मंगेशकर ने लिखा है और पिछले दिनों पटना लिटरेचर फेस्टिवल में गुलजार ने इसको विमोचित किया। इस किताब की खास बात यह है कि इसके साथ एक गाने की सीडी भी है जिसमें कुंदन लाल सहगल से लेकर भूपेन हजारिका और अीमरबाई कर्नाटकी से लेकर अलका याज्ञनिक तक के गीत हैं । किताब के साथ सीडी लगाने का प्रयोग पहले भी हुआ है । यतीन्द्र मिश्र ने श्रमपूर्व शोध के आदार पर इस किताब में कई जानकारियां दी हैं । यतीन्द्र मिश्र इन दिनों लता मंगेशकर भी एक किताब लिख रहे हैं जो उनसे बातचीत पर आधारित होगी । जानकारी के मुताबिक यतीन्द्र मिश्र ने कई घंटे की बातचीत रिॉर्ड कर ली है । अबी अभी इसी तरह से अंग्रेजी की लेखिका नसरीन मुन्नी कबीर ने अपने जमाने की सुपरस्टार रही फिल्म अभिनेत्री वहीदा रहमान से बातचीत के आधार पर एक बेहद दिलचस्प किताब लिखी है – कनवरसेशन विद वहीदा रहमान । इसके पहले भी नसरीन मुन्नी कबीर ने गुलजार, जावेद अख्तर, ए आर रहमान से बातचीत के आधार पर किताबें लिखी हैं । नसरीन मुन्नी कबीर की गुरुदत्त पर लिखी किताब खासी चर्चित हुई थी । वहीदा रहमान पर लिखी अपनी इस नई किताब में नसरीन मुन्नी कबीर ने वहीदा रहमान से जुड़ी कई दिलचस्प कहानियां लिखी है । वहीदा रहमान और गुरुदत्त के रिश्तों के बारे में फिल्मी दुनिया में कई तरह की किवदंतियां हैं । नसरीन मुन्नी कबीर से बातचीत में वहीदा रहमान ने बेहद गरिमापूर्ण तरीके से अपने और गुरुदत्त के रिश्तों पर कुछ भी बोलने से इमंकार कर दिया । वहीदा ने कहा कि उन्हें पता है कि वो सार्वजनिक जीवन में हैं लेकिन उनका इस बात में यकीन है कि किसी का भी निजी जीवन हमेशा निजी ही रहना चाहिए । इस किताब में वहीदा ने अपने बचपन, फिल्मी दुनिया में प्रवेश, स्त्यजित रे की फिल्म अभिजन आदि से जुड़ी अपनी यादें ताजा और साझा की हैं । सोलहवां साल फिल्म के दौरान राज खोसला और वहीदा के बीच तनातनी हो गई थी । फिल्म के दौरान एक बार फिर से राज खोसला और वहीदा रहमान के बीच ड्रेस को लेकर झगड़ा हुआ था । विवाद की वजह एक ब्लाउज बना । फिल्म के निर्देशक राज खोसला चाहते थे कि वहीदा सामने से खुला ब्लाऊज पहने लेकिन वहीदा को इस बात पर आपत्ति थी । उनका तर्क था कि किरदार की मांग के मुताबिक नायिका के ड्रेस में खुलापन नहीं होना चाहिए क्योंकि जब नायक उससे पूछता है कि तुम्हारा नाम क्या हा तो नायिका कहती है लाजवंती । यह सुनकर नायक कहता है कि तभी तो तुमको इतनी लज्जा आती है । वहीदा का तर्क था कि फिल्म के संवाद और दृश्य के मुताबिक नायिका का खुले ड्रेस में आना उचित नहीं होगा । वहीदा के इस तर्क पर राज खोसला भड़क गए और चिल्लाते हुए कहा कि अब निर्देशन भी सीखना पड़ेगा । विवाद काफी बढ़ गया और राज खोसला ने तो यहां तक कह डाला कि तुम ना तो मधुबाला हो, ना ही मीना कुमारी और ना ही नर्गिस । अंतत चली निर्देशक की ही लेकिन एक पूरे दिन की शूटिंग इस विवाद की भेट चढ़ गया ।
इसी तरह से वहीदा रहमान और सत्यजित रे के बीच की पहली मुलाकात की भी दिलचस्प कहानी इस किताब में है । सत्यजित रे ने वहीदा रहमान को अपनी फिल्म में काम करने का प्रस्ताव बी के करंजिया के माध्यम से पत्र लिखकर भेजा था । प्रस्ताव मिलने के कुछ दिनों बाद वहीदा और स्तयजित रे के बीच बातचीत हुई । पहली बातचीत में ही सत्यजित रे ने वहीदा से कहा कि वो छोटे बजट की फिल्म बनाते हैं और वहीदा को हिंदी फिल्मों में काम करने के लिए काफी पैसे मिलते हैं । रे ने कहा कि उनके पास इतने पैसे नहीं हैं कि वो वहीदा को साइन कर सकें लेकिन वो चाहते हैं कि वहीदा उनकी फिल्म में काम करें । यह पूरा प्रसंग बातचीत के आधार पर सामने आया है जो सत्यजित रे जैसे जीनियस निर्देशक की मनस्थिति और फिल्म को लेकर उनके कमिटमेंट को सामने लाता है । जरूरत इस बात की है कि हिंदी में भी इस तरह के ज्यादा प्रयास हों। हिंदी फिल्मों के योगदान को बिल्कुल भी खारिज नहीं किया जा सकता है । हिंदी के प्रचार प्रसार में भी हिंदी फिल्मों का बड़ा योगदान है । जोहानिसबर्ग में हुए विश्व हिंदी सम्मेलन के दौरान मॉरीशस के मंत्री ने इस बात को स्वीकार किया था कि हिंदी फिल्में और सीरियल्स हिंदी को बढ़ावा दे रही हैं । हिंदी के कर्ताधर्ताओं को फिल्मों पर लिख रहे लेखकों को उचित सम्मान देना होगा और बेवजह के तर्कों के आदार पर खारिज करने की प्रवृत्ति से बचना होगा । इसका सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि हिंदी में रचनात्मक लेखन का दायरा बढ़ेगा जो हमारी भाषा के हित में होगा ।