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Saturday, January 31, 2026

उतरने लगा लेखक संघों के मुखौटे का रंग


हमारे देश में कम्युनिस्ट पार्टियों ने अपने बौद्धिक प्रकोष्ठ बनाए थे। उनका नाम लेखक संगठन रखा था। इन लेखक संगठनों को स्वायत्त होने का वातावरण बनाया गया था। जबकि ये परोक्ष तौर पर राजनतिक दल से जुड़े थे। लंबे समय तक यही होता रहा और इन लेखक संगठनों से जुड़े लोग राजनीतिक बयानबाजी करते रहे। राजनीतिक मुद्दों को अपनी रचनाओं में उठाते रहे। इसका लाभ उनके पितृ संगठन यानि कम्युनिस्ट पार्टियों को मिलता रहा। कालांतर में ये लेखक संगठन एक्सपोज होते चले गए। लेखक संगठन लेखकों के कल्याण के लिए कुछ नहीं करके अपने राजनीतिक आकाओं की लक्ष्य प्राप्ति का वातावरण बनाने में लगे रहे। जैसे-जैसे कम्युनिस्ट पार्टियों में विभाजन होता गया लेखक संगठन भी बंटते चले गए। प्रगतिशील के बाद जनवादी और उसके बाद जन संस्कृति नाम से संगठन बने। जनवादी लेखक संगठन और जन संस्कृति मंच तो अधिकतर वार्षिक आयोजनों तक सिमट कर रह गए हैं। नियमित रूप से फेसबुक आदि पर उनके पदाधिकारी कुछ लिखकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री समझ लेते रहे हैं। फासीवाद और अधिनायकवाद जैसे नारे वर्षों से कागजों में लगते रहे हैं। यही बात अलग अलग तरीके से कम्युनिट पार्टियां भी करती रही हैं। प्रगतिशील लेखक संघ की बिहार ईकाई सक्रिय थी लेकिन अब वहां भी संगठन बंटा नजर आ रहा है। दो अलग अलग गुटों के अपने अपने पदाधिकारी हैं। ये तो इन लेखक संगठनों की स्थिति है, लेकिन अभी एक बहुत ही मजेदार स्थिति पैदा हुई है। कुछ समय पूर्व प्रगतिशील लेखक संगठन ने पूर्व पुलिस अधिकारी और कुलपति विभूति नारायण राय को अपना कार्यकारी अध्यक्ष बना दिया था। 

राय के कार्यकारी अध्यक्ष बनने के बाद भी संगठन के क्रियाकलापों में तेजी आई हो ऐसा दिखा नहीं। एकाध आयोजन आदि हुए लेकिन लेखकों के व्यापक हित में संगठन ने कुछ कार्य किया हो, ज्ञात नहीं हो सका। विनोद कुमार शुक्ल और एक दो अन्य लेखकों ने प्रकाशकों को एकतरफा पत्र भेजकर पुस्तक प्रकाशन  का अधिकार वापस लेने की बात की। लेखक संगठनों ने कभी भी इन मसलों में हस्तक्षेप नहीं किया। न तो प्रकाशकों के हित में और ना ही लेखकों के हित में। इन लेखक संगठनों को ये भी समझ नहीं आ सकी कि कोई लेखक एकतरफा करार को कैसे रद कर सकता है। उसी तरह प्रकाशकों के साथ बैठकर लेखकों को मिलनेवाली रायल्टी पर भी कुछ ठोस नहीं कर सके। इनकी सारी ऊर्जा अपने राजनीतिक आकाओं को प्रसन्न करने में लगी रही। इन लेखक संगठनों ने लेखकीय अस्पृश्यता को भी जमकर बढ़ावा दिया। अपने से अलग विचारधारा वाले लेखकों के साथ संवाद नहीं करना इनकी प्राथमिकता में रहा। इस तरह लेखकों को बांटने का काम भी इन संगठनों ने किया। कभी भी इन लेखक संगठनों ने अलग अलग विचार वाले लेखकों को साथ बैठाकर साहित्यिक प्रवृत्तियों पर चर्चा करने का मंच उपलब्ध नहीं करवाया। परिणाम ये रहा कि इन लेखक संगठनों का दायरा सिकुड़ता चला गया। भारतीय समाज हमेशा से समावेशी रहा है। समाज के इस चरित्र को समझने में कम्युनिस्ट लेखक संगठन असफल रहे और अपने ही बने दायरे में घूमते रहे। विभूति नारायण राय ने प्रगतिशील लेखक संघ के कार्यकारी अध्यक्ष होने के बावजूद जब लेखक संघों की भूमिका पर सवाल उठाए तो उनके  विचार को निजी विचार माना गया। प्रगतिशील लेखक संघ के महासचिव सिरसा ने एक पत्र जारी किया जिसमें राय को कठघरे में खड़ा किया गया। उस पत्र में ही बताया गया कि राय ने एक इंटरव्यू में कहा कि लेखक संगठनों की अब कोई भूमिका नहीं बची है और उनको बंद कर दिया जाना चाहिए। दूसरी टिप्पणी राय की ये थी कि देश में पिछले चार दशकों से भी अधिक समय से सशक्त वामपंथी संघर्ष के अंत के आसार दिखने लगे हैं। दूसरी टिप्पणी को उन्होंने 2025 की उपलब्धि के तौर पर रेखांकित किया। 

प्रगतिशील लेखक संघ के महासचिव के हस्ताक्षर से जारी पत्र में लिखा गया है कि प्रगतिशील लेखक संघ का राष्ट्रीय नेतृत्व अपने कार्यकारी अध्यक्ष के विचारों से सहमत नहीं है। माओवाद के खात्मे पर सिरसा के पत्र में लिखा है कि जिन जगहों से माओवादी के सफाए को विभूति जी ने अमित शाह की उपलब्धि के तौर पर रेखांकित किया है वो सभी आदिवासी क्षेत्र हैं। जिनको माओवादी कहकर मारा गया है उन घनाओं पर भी झूठे एनकाउंटकर के आरोप लगे हैं। सिरसा के इस पत्र का विभूति नारायण राय ने उत्तर दिया और लिखा कि लेखक संगठनों को अब व्हाट्सएप लेखक संगठन कहना उचित होगा। राय ने अपने पत्र में अपनी विचारधारा का प्रदर्शन भी किया, लेकिन बहुत ही सधे तरीके से सिरसा को और उनकी आलोचना करनेवालों की ठीक से खबर भी ले ली। विभूति नारायण राय ने सिरसा के पत्र का जो उत्तर दिया है उसमें अपने इस्तीफे की पेशकश भी कर दी और संगठन के दायित्वों से मुक्त होने की बात लिखी। विभूति ने लिखा कि संगठन अनुशासन से चलता है लेकिन साहित्येतर अनुशासन किसी भी लेखक के लिए आत्महत्या जैसा है। हलांकि लेखक संघ ने उनका इस्तीफा स्वीकार नहीं किया है। संभव है कि विभूति के तार्किक पलटवार को झेल पाने में संगठन सक्षम नहीं हो। राय ने दक्षिणपंथी सच्चिदानंद जोशी और रामबहादुर राय को कार्यक्रम में बुलाने पर भी अपना पक्ष रखा और माओवाद के खात्मे वाली टिप्पणी पर भी। प्रगतिशील लेखक संगठन के इस विवाद ने एक बार फिर से कम्युनिस्टों की बराबरी और समानता के दावों और नारों की पोल खोल दी है। कम्युनिस्ट दावे बराबरी की करते हैं लेकिन वैचारिक आधार पर समाज को बांटनेवाली ये विचारधारा अपने विरोधियों को एक मिनट भी झेल नहीं सकती। इनका चरित्र समावेशी बिल्कुल नहीं है। ये दूसरों पर फासीवादी होने का आरोप जड़ते हैं लेकिन इनका स्वयं का चरित्र फासीवादी है। ये अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात करते हैं लेकिन अगर इनके संगठन से जुड़ा कोई व्यक्ति भी सच कहने का साहस करे तो संगठन से जुड़े लोग झुंड बनाकर उनपर आक्रमण करते हैं। उनको नेतृत्व का भी शह प्राप्त होता है। 

इस पूरे प्रसंग से एक बात साफ हो गई है कि बचे-खुचे लेखक संगठनों में आंतरिक लोकतंत्र और विमर्श की कोई जगह शेष नहीं है। इस प्रसंग में एक और खतरनाक बात सिरसा ने लिखी है। उन्होंने अन्य नामों के साथ उमर खालिद के नाम का भी उल्लेख करते हुए लिखा कि उनको कानूनी शिकंजे में फंसाकर परेशान किया जा रहा है। सिरसा को क्या ये पता नहीं कि देश की अदालतों ने उमर खालिद को जमानत देने से इंकार कर दिया है। वो दंगे का आरोपी है। दरअसल ये होता तब है जब आप राजनीतिक दल के बौद्धिक प्रकोष्ठ की तरह कार्य करते हैं। राजनीतिक दलों की राय पर चलनेवाली बुद्धिजीवियों से लेखकीय स्वतंत्रता की अपेक्षा करना ना सिर्फ बेमानी है बल्कि असंभव भी है। कम्युनिस्ट पार्टियों से संबद्ध इन लेखक संगठनों को अगर पुनर्जीवित होना है तो उनको अपने पितृ संगठनों से मुक्त होकर समावेशी और उदार बनना होगा। भारत में सोवियत रूस या चीन की नीतियां नहीं चल सकतीं, वहां का समाज अलग है और भारत का समाज अलग है।   


Saturday, November 26, 2016

साहित्य का 'समीकरण काल'

हिंदी साहित्य में फेसबुक अब एक अनिवार्य तत्व की तरह उपस्थित है । कई साहित्यकार इस माध्यम को लेकर खासे उत्साहित रहते हैं । उनका मानना है कि फेसबुक ने नए-पुराने लेखकों को एक खुला मंच दिया जहां आकर वो अपनी बात कर सकते हैं । इस मंच पर वो अपनी रचनाएं लिख सकते हैं, यहां अपनी राय प्रकट करने के साथ-साथ बहस मुहाबिसे में भी हिस्सा ले सकते हैं । इस माध्यम की वकालत करनेवालों को ये अभिव्यक्ति का ऐसा मंच मानते हैं जहां कोई बंदिश नहीं है । लेकिन एक दूसरा पक्ष भी है जो इस असीमित अधिकार को लेकर सशंकित रहता है और उनका तर्क होता है कि इससे साहित्य में अराजकता को बढ़ावा मिलता है । सोशल मीडिया के इन दो पक्षों पर ही बहस होती रहती है लेकिन इसका एक तीसरा और दिलचस्प पक्ष भी है । फेसबुक आपको साहित्यक समीकरणों को समझने में मदद तो करता ही है कई बार इन समीकरणों को उघाड़कर रख देता है । हिंदी साहित्य में लेखकों के बीच समीकरण बनते बिगड़ते रहते हैं । इस बात को फेसबुक पर इनकी गतिविधियों से सहजता के साथ रेखांकित किया जा सकता है । हिंदी साहित्य का ये दौर समीकरणों का दौर है जहां ज्यादातक लेखक आत्ममुग्धता, आत्मश्लाघा और आत्मप्रशंसा में डूबे हैं । आत्ममुग्धता, आत्मश्लाघा और आत्मप्रशंसा ही साहित्य में नए समीकरणों को जन्म देती रहती है । इस वक्त साहित्य की दुनिया में हर रोज नए ध्रुवों और गुटों का जन्म होता है और इस जन्म की सूचना आपको फेसबुक पर मिल जाती है । फेसबुक के लोकप्रिय होने के पहले तो होता ये था कि लेखकों को किसी के पक्ष में दिखने या खड़े होने के लिए लेख आदि लिखने पड़ते थे लेकिन फेसबुक ने वो काम आसान कर दिया । अब आप लाइक या कमेंट या शेयर कर किसी के पक्ष में खड़े हो जाते हैं । कुछ सालों पहले जब महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति विभूति नारायण राय ने ज्ञानोदय पत्रिका में इंटरव्यू दिया था और उस इंटरव्यू के बाद छिनाल विवाद छिड़ा था तो मैत्रेयी पुष्पा ने उनके खिलाफ विरोध का झंडा बुलंद किया था । भारतीय ज्ञानपीठ के दफ्तर के बाहर मैत्रेयी पुष्पा के साथ नारे लगानेवाले साहित्यकार कालांतर में एक एक करके उनका साथ छोड़ गए । बिछड़े सभी बारी बारी बारी की तर्ज पर कोई वर्धा विश्वविद्यालय से जुड़ गया तो कोई कुलपति विभूति नारायण राय से किसी और तरह से उपकृत होकर उनके साथ हो लिया । इसी तरह से युवाओं को लेकर भी साहित्य में एक लंबी बहस चली थी जिसमें एक तरफ मैत्रेयी पुष्पा थीं और दूसरी तरफ कई लेखिकाएं । उस वक्त मैत्रेयी जी का खुलकर और लिखकर विरोध करनेवाली कई लेखिकाएं इन दिनों मैत्रेयी पुष्पा के साथ मंच साझा करती नजर आ रही हैं । मैत्रेयी पुष्पा भी उन लेखिकाओं के कार्यक्रमों में शिरकत कर रही हैं । तो इस तरह से अगर देखा जाए तो साहित्य जगत की इन जीवंतताओं का पता फेसबुक से ही चलता है । जीवंतता इस वजह से कह रहा हूं कि इसको गंभीरता से नहीं लिया जा सकता है और मनोरंजन के तौर पर इसका आनंद उठाना चाहिए क्योंकि ये मंच सबको एक्सपोज करता चलता है । एक्सपोज इस वजह से कि जोकमेंट किए जाते हैं वो बहुधा व्यक्तिगत हो जाते हैं । चंद सालों पहले एक लेखिका ने दूसरी लेखिका के खिलाफ फर्जी आईडी से कई आपत्तिजनक पोस्ट डाले थे । तब शायद उनको मालूममहीं रहा होगा कि कंप्यूटर और इंटरनेट के कनेक्शन की वजह से पोस्ट डालने वाले की पहचान हो सकती है । उस वक्त ये हुआ भी था और साहित्य जगत में बहुत बवाल खड़ा हुआ था ।  
गुटबाजी के इस खुले खेल के अलावा भी फेसबुक साहित्यक माहौल को जीवंत बनाए रखता है । फेसबुक को अगर आप नियमितता के साथ फॉलो करेंगे तो वहां आपको दो तीन लेखकों का एक ग्रुप नजर आएगा जो हर दिन किसी ना किसी तरह का विवाद उठाने के उपक्रम में जुड़े रहते हैं । ऐसा प्रतीत होता है कि इन लेखकों का ये छोटा गुट सुबह तय कर लेता है कि आज फलां लेखक को या फलां लेखिका को घेरना है और उसपर येनकेन प्रकारेण साहित्यक या साहित्येतर वजह से हमले करने हैं । अपनी योजना पर अमल करते हुए विवादित पोस्ट लिखे जाते हैं । उसके बाद होता है कि उन लेखकों से जुड़े छोटे-मोटे लेखक या लेखक बनने के लिए संघर्ष कर रहे कुछ लोग अति उत्साह में आकर इस या उस पक्ष पर हमलावर हो जाते हैं । साहित्य के इस खेल में बहुधा भाषिक मर्यादा की लक्षम्णरेखा लांघी जाती है, जिससे बचा जाना चाहिए । फेसबुक पर साहित्य से जुड़े कई लोग आपको ऐसे मिल जाएंगे जो अपने मठाधीश के हर पोस्ट पर किसी ना किसी तरह की टिप्पणी अवश्य करते हैं । वाह से लेकर आह टाइप की । फेसबुक पर कोई एक मठाधीश नहीं है यहां तो बडे. मंझोले और छोटे मठाधीश आपको मिल जाएंगे । कई मठाधीश तो इतने असहिष्णु हैं कि वो अपना मर्यादित विरोध नहीं झेल पाते हैं और विरोध के तर्क देनवाले को ब्लॉक कर अपना परचम लहराते रहते हैं ।

अब अगर हम विचार करें तो फेसबुक ने साहित्यक माहौल में अवश्य ही अनेक आयाम जोड़ दिए हैं लेकिन इन आयामों से साहित्य को क्या हासिल हो रहा है । हासिल हो रहा है भगवानदास मोरवाल सरीखे वरिष्ठ लेखकों का जो फेसबुक के मंच को अपनी किताब के प्रमोशन के लिए इस्तेमाल करते हैं । अपनी किताब के प्रमोशन का कोई भी मौका हाथ से जाने नहीं देना चाहते हैं बल्कि मौके पैदा कर लेते हैं । फेसबुक का ये इस्तेमाल तो कोलकाता की साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त लेखिका अलका सरावगी ने भी अपनी किताब जानकीदास तेजपाल मैनशन के प्रकाशन के वक्त किया था । उन्होंने भी जमकर अपनीकिताब का प्रचार किया था । तब उसको लेकर भी विवाद खड़ा करने की कोशिश की गई थी । लेकिन देश में इंटरनेट के बढ़ते घनत्व के मद्देनजर फेसबुक जैसा माध्यम लेखकों को पाठकों तक पहुंचने का माध्यम बन सकता है । हलांकि इस माध्यम को चलानेवाले इसमें कारोबार की असीम संभवानाओं के मद्देनजर पोस्ट की पहुंच को सीमित कर दे रहे हैं बावजूद इसके लेखकों को इसका इस्तेमाल करना चाहिए । लेखकनुमा विवादप्रिय लोग तो कर ही रहे हैं, जेनुइन लेखकों को भी करना चाहिए । 

Monday, May 19, 2014

राजनीति, महिला और विद्रूपता

राजेन्द्र यादव को अपने जीवन काल में इस बात का अफसोस था कि राजनीतिक हत्या पर हिंदी में कोई उपन्यास नहीं लिखा गया । वो हमेशा कहते थे कि हिंदी के उपन्यास लेखक राजनीति की बजबजाती दुनिया पर तो लिख लेते हैं लेकिन राजनेताओं के हत्या के इर्दगिर्द रचना करने का साहस उनमें नहीं है । उन्होंने एक बार कहा था कि वेद प्रकाश शर्मा इकलौते हिंदी के लेखक हैं जिन्होंने वर्दी वाला गुंडा नामक उपन्यास लिखा जो पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या पर आधारित है । लेखक ने प्लॉट अवश्य वहां से उठाया है लेकिन उसमें कल्पना के आधार पर काफी घटनाओं और स्थितियों का समावेश किया है । राजेन्द्र यादव की इस बात से असहमति का कोई आधार नहीं है साथ ही इस बात से भी अलग राय नहीं हो सकती है कि राजनीति को केंद्र में रखकर कई उपन्यास लिखे गए । श्रीलाल शुक्ल के राग दरबारी से लेकर विभूति नारायण राय के तबादला तक भारतीय समाज में राजनीति के खेल पर से पर्दा हटाने की कोशिश की गई है । प्रेमचंद के जमाने में गांव के लोग अपनी सारी बदमाशियों के बावजूद कुछ मूल्यों पर डटे रहते थे लेकिन वही गांव जब श्रीलाल शुक्ल के उपन्यास राग दरबारी में चित्रित होता है तो उसका स्वरूप बदल चुका होता है ।  राजनीति की गंदगी गांव के जिंदगी में इस तरह से रच बस गई कि पंचायतों और ग्रामसभाओं के चुनाव में उस तरह के तमाम हथकंडे और दंद-फंद अपनाए जाने लगे जो प्रदेश और देश की राजनीति में अपनाए जाते थे । उससे आगे बढ़ते हुए विभूति नारायण राय के उपन्यास तबादला में तो वो राजनीति और घिनौने रूप में उपस्थित होती है । यह उपन्यास मूलत उत्तर प्रदेश के सर्वजनिक निर्माण विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार की कहानी है जिसमें तबादला तंत्र को प्रभावित करनेवाले राजनेताओं अफसरों और दलालों की साठगांठ का वर्णन है । सरकारी तंत्र के विद्रूप के अलावा इस उपन्यास में स्त्री शोषण का भी एक आयाम है । यही आयाम अब रजनी गुप्त के नए उपन्यास ये आम रास्ता नहीं है के केंद्र में है । रजनी गुप्त के इस उपन्यास में शीर्षक के नीचे कोष्ठक में लिखा है – राजनीति के चक्रव्यूह में स्त्री । इससे पाठकों को इस बात का अंदाज हो जाता है कि उपन्यास की कहानी क्या कहती है ।

इस उपन्यास की केंद्रीय पात्र मृदु है जो पिछड़े वर्ग से आती है और अपने पति और दो बच्चों के साथ खुशी-खुशी पारिवारिक जीवन बिता रही होती है । उसकी जिंदगी में बेहद अहम मोड़ तब आता है जब वो एक दिन एक व्यूटी कांटेस्ट में चुन ली जाती है । घरेलू महिला होने के बावजूद मृदु के जीने का सलीका अन्य महिलाओं से अलहदा है । वो बिंदास है, वो खूबसूरत है, फर्राटेदार अंग्रेजी बोलती है और समाज के लिए कुछ करना भी चाहती है । इस उपन्यास में लेखिका ने साफ तौर पर इस बात को उकेरा है कि राजनीति के दलदल में महिलाओं के लिए खुद को बचा लेना लगभग असंभव सा है । इस उपन्यास से यह ध्वनित होता है महिलाओं को अगर राजनीति में ऊपर चढ़ना है तो उन्हें अपने शरीर को पायदान की तरह इस्तेमाल करना होगा । यह बात पात्रों के बीच होनेवाली बातचीत और स्थितियों से कई बार स्पष्ट होती है । एक अंग्रेजी पत्रिका में हिंदी की मशहूर लेखिका रमणिका गुप्ता, जो कि खुद लंबे समय तक राजनीति में रही हैं, ने माना था कि किस तरह से राजनेता महिलाओं के साथ व्यवहार करते हैं । किस तरह से खूबसूरत महिलाओं को अपने आपको बचाने के लिए जद्दोजहद करनी पड़ती है जो ज्यादातर नाकाम रहती है । अपने इस उपन्यास में रजनी गुप्त ने राजनीति की इस विद्रूपता को उजागर तो किया ही है लेकिन इसके साथ एक महात्वाकांक्षी पति के नापाक इरादों को भी उघाड़ कर रख दिया है । मृदु का पति अपनी तरक्की के लिए अपनी खूबसूरत पत्नी का इस्तेमाल करना चाहता है । वो अच्छी पोस्टिंग के लिए उसे मंत्री और आला अधिकारियों के पास भेजता है लेकिन मृदु अपने दृढ स्वभाव और दबंगई की वजह से बच कर निकल आती है । अपने पति की इस नीच हरकत से वो प्रतिक्रयावादी हो जाती है और पति की नाराजगी मोल लेकर राजनीति की ओर कदम बढ़ा देती है । वहां उसे एक नेता मिलता है जिसके साथ लांग ड्राइव पर जाना और उसकी नजदीकी उसे अच्छी लगती है । लेकिन नियति का चक्र कुछ ऐसा चलता है कि वो सबकुछ छोड़छाड़ कर पीड़ित लड़कियों के आश्रम में पहुंच जाती है । डेढ सौ पन्ने के इस छोटे से उपन्यास में कई कथाएं एक साथ चलती हैं । राजनीति के अलावा यह उपन्यास उसके दोनों बेटों के मनोभावों और पिता के बहकावे में आकर मां के साथ बदतमीजियों की दास्तान भी कहता है । मां के लिए अपने संतान की तड़प स्वाभाविक है लेकिन पिता अपनी चालों से इसको और बढ़ाता रहता है । इस उपन्यास में कई ऐसे विषय हैं जिसको पाठक हाल की घटनाओं से जोड़कर देख सकते हैं । लेकिन एक लेखक के लिए यही तो सफलता है कि वो किस तरह से अपने आसपास घट रही घटनाओं को अपनी रचना का विषय बनाकर समाज को झकझोरता है । रजनी गुप्च के इस उपन्यास में राजनीति के अलावा किशोर मन के मनोविज्ञान का भी चतित्रण है । किशोर मन का यह मनोविज्ञान रजनी के पिछले उपन्यास कुल जमा बीस का विषय भी रहा है । कुल मिलाकर हम कह सकते हैं कि रजनी गुप्त का यह नया उपन्यास इस विषय को स्पर्श करने का एक सार्थक प्रयास है । 

Friday, August 6, 2010

काश पूछो कि मुद्दआ क्या है / विभूति नारायण राय

नया ज्ञानोदय के अगस्त 2010 अंक मे छ्पे मेरे इंटरव्यू पर हुई प्रतिक्रियाओ से एक बात स्पष्ट हो गयी कि मैने अपनी लापरवाही से एक गम्भीर विमर्श का हेतु बन सकने का मौका गवां दिया ।मैने कुछ ऐसे शब्दो का प्रयोग किया जिनसे बचा जा सकता था ।मुझे जैसे ही यह अहसास हुआ कि मेरी भाषा से हिन्दी की बहुत सी लेखिकाओं को कष्ट हुआ है मैने अपनी गल्ती का अहसास किया और बिना शर्त माफी मांग ली ।मैं शर्मिन्दा हूँ कि मेरी असावधानी से बहुत से ऐसे लोग आहत हुए जो मेरे वर्षों पुराने मित्र रहे है,इनमे बडी सख्यां में लेखिकायें भी हैं पर मेरे मन मे उनके लिये सम्मान भी बढा है कि मित्रता की परवाह किये बगैर उन्होने मेरी मजम्मत की । हालाकि कुछ लोग जो इस मामले को अन्य कारणों से जिन्दा रखना चाह्ते हैं, इन्टरव्यू में उठाये गये मुद्दों पर बहस न कर के अभी भी उन शब्दों के वाक्जाल मे उलझे हुए हैं जिनपर मै खुद खेद प्रकट कर माफी मांग चुका हूँ । मै मानता हूं कि इन लोगों की उपेक्षा कर अब मै मुद्दों पर बहस की अपेक्षा कर सकता हूं ।
इंटरव्यू पर शुरुआती प्रतिक्रिया उन लोगों की तरफ से आयी जिन्होने उसे पढा ही नही था ।अब जब कि अधिकतर लोगों नें इंटरव्यू पढ लिया है मुझे लगता है उसमें उठाये गये प्रश्नों पर बातचीत होनी चाहिये । संक्षेप में कहूँ तो मेरे मन में मुख्य शकां यह है कि महिला लेखन मे देहकेन्द्रित लेखन को कितना स्थान मिलना चाहिए । एक मित्र ने आपत्ति की कि यह प्रश्न पुरुषों के लेखन पर भी उठना चाहिये । सही है पर विमर्श सिर्फ वंचित या हाशिये पर पहुचे हुए तबकों के लेखन से निर्मित होता है । मसलन दलित लेखन जैसा विमर्श निर्मित करता है वैसा विमर्श ब्राह्मण लेखन नही कर सकता । दलित लेखन जहाँ मानव मुक्ति की कामना करता है या उसका मुख्य संघर्ष दबे कुचलों को उनका खोया सम्मान वापस लौटाने के लिये होगा वहीं यदि ब्राह्मण लेखन जैसा कोई लेखन किया जाय तो स्वाभाविक है कि उसकी चिंता का केन्द्र मनुष्य विरोधी वर्ण व्यवस्था को वैध ठहराने के लिये तर्क तलाशना होगा और मुझे नही लगता कि ऐसे लेखन से कोई उल्लेखनीय विमर्श निर्मित होगा । इसी प्रकार महिला लेखन के केन्द्र मे स्त्री मुक्ति के प्रश्न महत्वपूर्ण होंगे । स्त्री मुक्ति में अपनी देह पर स्त्री का अधिकार एक महत्वपूर्ण तर्क है पर और भी गम है जमानें में मोहब्बत के सिवा । मेरा मानना है कि स्त्री देह पर अंतिम अधिकार उसका है पर साथ मे मै यह भी मानता हूँ कि भारत के सदंर्भ में स्त्री मुक्ति से जुडे और भी महत्वपूर्ण मुद्दे हैं । आज भी परिवारों में निर्णय लेने का अधिकार सिर्फ पुरुषों को है , स्त्रियाँ केवल उन्हें लागू करती हैं । तमाम बहस मुबाहिसों के बावजूद घरेलू श्रम के लिये उसका पारिश्रमिक तय नही हो पा रहा है । पंचायती राज्य की संस्थाओं में आरक्षण के बल पर चुनी गयी महिलाओं मे से बहुत सी अभी भी घरों में कैद हैं और उनके प्रधान पति कागजों पर उनकी मुहरें लगाते हैं । बहुत से ऐसे मुद्दे है जिनपर बहस होनी चाहिये । अंत मे , इन सबसे महत्वपूर्ण यह प्रश्न कि क्या स्त्री मुक्ति आइसोलेशन मे हो सकती है ? क्या आदिवासियों , अल्पस्ंख्यकों या दलितों के प्रश्नों से जोडे बिना इस मुद्दे पर कोई बडी बहस खडी की जा सकती है । अगर एक बार यह सहमति बन सके तो गुजरात जैसी स्थिति से बचा जा सकता है जिसमे महिलाओं ने भी अल्पसख्यकों के सहांर मे हिस्सा लिया था ।मुझे 1990 का इलाहाबाद याद आ रहा है जहां मैं नियुक्त था और जो मडंल कमीशन की सिफारिशें लागू करने के खिलाफ चल रहे आन्दोलन का केन्द्र था । मैने आन्दोलनकारियों के साथ सख्ती की तो बहुत सारे दूसरे तबकों के अतिरिक्त विश्वविद्यालय की सवर्ण लड्कियों ने मेरे खिलाफ मोर्चा निकाला और अपनी पूरी कोशिशों के बावजूद मैं उन्हें यह नही समझा पाया कि उन्हें पिछ्डों के साथ खडा होना चाहिये । यदि उनके अन्दर यह समझ होती कि वे तो पिछडों में भी पिछ्डी हैं तो सम्भवत: उन्हे मेरी बात ज्यादा आसानी से समझ मे आ जाती। एक बार फिर अपने शब्दों के लिये माफी मांगते हुये मै अनुरोध करूंगा कि इन मुद्दों पर भी बातचीत की जाय।