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Saturday, May 24, 2025

पलामू से फ्रांस तक


कान फिल्म फेस्टिवल और प्रख्यात फिल्मकार सत्यजित राय का विशेष रिश्ता रहा है। फेस्टिवल में उपस्थित दर्शक राय की फिल्मों को दीवानगी की हद तक पसंद करते हैं। सत्यजित राय की 1970 में प्रदर्शित फिल्म अरण्येर दिन रात्रि को तकनीक का उपयोग कर प्रदर्शन योग्य बनाया गया। इस वर्ष जब रिस्टोर्ड फिल्म का कान फिल्म फेस्टिवल के दौरान प्रदर्शन किया गया तो दुनिया भर के फिल्मों से जुड़े दिग्गज इसे देखने पहुंचे। करीब 55 वर्ष पूर्व सत्यजित राय ने ये फिल्म बनाई थी। ये फिल्म बांग्ला के मशहूर लेखक सुनील गंगोपाध्याय के इसी नाम से प्रकाशित उपन्यास पर आधारित है। इस फिल्म के बनने की कहानी भी बेहद दिलचस्प है। इस फिल्म के कलाकारों में से किसी एक को कभी सुना था कि इसकी शूटिंग बिहार में हुई थी। पता करने पर मालूम हुआ कि शूटिंग अविभाजित बिहार के पलामू क्षेत्र में हुई थी। जब सत्यजित राय ने सुनील गंगोपाध्याय के 120 पेज के इस उपन्यास को पढ़ा तो काफी प्रभावित हुए। उपन्यास की कहानी पलामू के जंगल में ही सेट है। सत्यजित राय रेकी के लिए पलामू पहुंचे। काफी घूमने के बाद उन्होंने केचकी और कोयल नदी के आसपास के जंगल को अपनी फिल्म की शूटिंग के लिए चुना। 

झारखंड जनसंपर्क विभाग के अधिकारी आनंद के मुताबिक 1969 में अरणेयर दिन रात्रि की शूटिंग पलामू टाइगर रिजर्व के केचकी, गारू, छिपादोहर और बेतला में हुई थी। एक सीन की शूटिंग चंदवा में भी की गई थी। फिल्म की शूटिंग के लिए सत्यजित राय पूरी टीम के साथ पलामू पहुंचे थे। अभिनेत्री शर्मिला टैगोर, सिमी ग्रेवाल, अभिनेता सौमित्रो चटर्जी, टीनू आनंद, गौतम घोष, सोमित भांजा उनके साथ थे। सभी करीब तीन महीने तक पलामू में रहे थे। दरअसल फिल्म की कहानी चार दोस्तों के के इर्द गिर्द घूमती है जो शहरी जिंदगी से ऊबकर जंगल पहुंचते हैं। वहीं उनकी मुलाकात जंगल में रहनेवाली महिलाओं से होती है। इन्हीं पात्रों के सहारे कहानी आगे बढ़ती है। सत्यजित राय ने जिस तरह से शूटिंग में प्राकृतिक दृश्यों और लाइट्स का उपयोग किया है वो देखने लायक है। आज की अभिनेत्रियों के लिए मुंबई जैसे महानगरों में शूटिंग के दौरान वैनिटी वैन खड़ी होती हैं। वो एक-दो सीन शूट करके आराम या अन्य कार्य करती हैं। कल्पना करिए 1969 में पलामू के जंगलों में शूटिंग के दौरान शर्मिला टैगोर और सिमी को कितनी परेशानी  हुई होगी। न तो वाशरूम की सुविधा और ना ही शूटिंग के अंतराल के दौरान आराम की व्यवस्था। सूरज की रोशन  के हिसाब से शूटिंग करनी होती थी। सत्यजित राय और फिल्म के कलाकार केचकी और कोयल नदी के संगम के पास बने डाक बंगला में रहते थे। इस डाकबंगला को माओवादियों ने उड़ा दिया था। अब फिर से उसका पुनर्निमाण कर रहरने योगय् बनाया गया है। 


Saturday, September 3, 2022

राजनीति के ‘रंगबाज’ और ‘महारानी’

मंडल कमीशन की सिफारिशें लागू होने के बाद बिहार में सामाजिक बदलाव की बयार बही थी। लगभग उसी समय बिहार में कई ऐसे बाहुबली भी उभरे जो बाद में राजनीति के रास्ते विधानसभा और संसद के सदस्य बने। इनमें पप्पू यादव से लेकर आनंद मोहन तक और शहाबुद्दीन से लेकर सूरजभान सिंह तक का नाम शामिल है। बाद के दिनों में भी ये क्रम चलता रहा और स्थानीय स्तर के अपराधी भी विधानसभा पहुंचने लगे। इन आपराधिक प्रवृत्ति वाले नेताओं का लगभग सभी राजनीतिक दल ने अपने हित में उपयोग किया। किसी ने आपराधिक पृष्ठभूमि वाले इन नेताओं उपयोग सरकार बनाने के लिए समर्थन जुटाने में किया तो किसी ने सरकार बचाने के लिए। 1990 के बाद के दशकों में बिहार की राजनीति का अपराधीकरण तेज हुआ। उसी समय राजनीति के अपराधीकरण पर देशव्यापी चर्चा हुई थी। चुनाव में बूथ लूटने और कब्जा करने की घटनाएं भी खूब हुई, चुनावी हिंसा भी। ये वही दौर था जब बिहार में जाति और विचारधारा के नाम पर सामूहिक नरसंहार हुए। नक्सलियों ने विचारधारा और समानता हासिल करने की आड़ में नरसंहार किए तो जाति आधारित निजी सेनाओं के बीच भी खूनी खेल खेला गया। जातियों के नए नेता पैदा होते चले गए। जातियों के बीच चौड़ी होती खाई को नेताओं ने अपने वोटबैंक के तौर पर उपयोग करना आरंभ कर दिया। पाटने की कोशिश किसी ने नहीं की। लालू प्रसाद यादव जैसे गरीब परिवार से आनेवाले व्यक्ति बिहार के मुख्यमंत्री बने तो सामाजिक न्याय का नारा जोरशोर से लगा। उनपर जब घोटाले का आरोप लगा तो उन्होंने अपने राजनीतिक सहयोगियों को नजरअंदाज करते हुए अपनी पत्नी राबड़ी देवी को बिहार का मुख्यमंत्री बना दिया। कहना न होगा कि उस समय बिहार में राजनीति और अपराध की दुनिया में बहुत कुछ घट रहा था जो किसी फिल्मी पटकथा से कम रोचक और दिलचस्प नहीं था। बिहार में उन्हीं दिनों की राजनीतिक घटनाओं और बाहुबलियों को केंद्र में रखकर कई बेवसीरीज बने भी और अब भी बन रहे हैं।

हाल में दो वेबसीरीज आई है जिसके केंद्र में बिहार की राजनीति, बिहार के बाहुबली और बिहार की राजनीतिक और आपराधिक घटनाएं हैं। जी 5 पर बाहुबलियों को केंद्र में रखकर एक सीरीज आती है जिसका नाम है ‘रंगबाज’। इस वेब सीरीज के पहले सीजन में उत्तर प्रदेश के खतरनाक अपराधी श्रीप्रकाश शुक्ल के कारनाओं पर आधारित पूर्वांचल की राजनीति को दिखाया गया था। इसमें हरिशंकर तिवारी और वीरेन्द्र शाही के बीच चलनेवाले खूनी खेल को फिक्शनलाइज किया गया था। रंगबाज का पहला सीजन 22 दिसंबर 2018 को रिलीज हुआ था। इस शृंखला में 20 दिसंबर 2019 को राजस्थान के गैंगस्टर आनंदपाल सिंह के अपराध पर सीरीज आई। इस कहानी में राजस्थान की राजनीति के उन आयामों को भी दर्शकों के सामने पेश किया गया है जिसके बारे में देश दुनिया को जानकारी कम थी। ‘रंगबाज फिर से’ नाम से के बाद इस वर्ष 29 जुलाई को ‘रंगबाज, डर की राजनीति’ के नाम से बिहार के सिवान के बाहुबली नेता शहाबुद्दीन के बनने और उनके मिटने की कहानी को दर्शकों के सामने पेश किया गया है। रंगबाज के इस सीजन में बिहार में सामाजिक न्याय के दौर की राजनीति के दांव पेंच और अपने राजनीतिक लक्ष्य को हासिल करने के लिए हिंसा का सहारा लेने के बारे में विस्तार से बताया गया है। शहाबुद्दीन के किरदार के साथ विनीत कुमार सिंह ने न्याय किया है। वेब सीरीज के इस सीजन की स्क्रिप्ट बहुत कसी हुई है। इसमें शहाबुद्दीन की प्रेमकथा वाले प्रसंग को भी उभारा गया है। शहाबुद्दीन के चरित्र के क्रूरतम पक्ष पर अपेक्षाकृत कम फोकस किया गया है। चंदा बाबू, जिनके बेटों की हत्या हुई थी, के दर्द और संघर्ष को उभारने में निर्देशक लगभग नाकाम रहे हैं। कहा जा सकता है कि ये सीजन शहाबुद्दीन पर केंद्रित है इस वजह से चंदा बाबू पर ज्यादा फोकस नहीं किया गया है। अगर चंदा बाबू के दर्द और संघर्ष को उभारा गया होता तो शहाबुद्दीन के कारनामों को अधिक प्रामाणिकता के साथ पेश किया जा सकता था। दरअसल इस तरह से सीरीज के लेखक सुनी सुनाई बातों, पुस्तकों और इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्री के आधार पर कहानी कंस्ट्रक्ट करते हैं। उनको उस दौर के समाचरपत्रों को भी देखना चाहिए और कहानी लिखने के पहले प्राथमिक स्त्रोतों तक पहुंचना चाहिए था।

बिहार के मुख्यमंत्री रहते हुए लालू प्रसाद यादव जब घोटाले के भंवर में फंसे तो उन्होंने अपनी पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बना दिया था। उस घटना पर केंद्रित वेब सीरीज महारानी का दूसरा सीजन भी आया है। दूसरे सीजन में निर्देशक और लेखक ने इसकी कहानी को बहुत अधिक काल्पनिक बनाकर फिल्मी बनाने की कोशिश की है। इसमें पति पत्नी के बीच के संघर्ष में ‘वो’ की एंट्री कहानी को ‘पति पत्नी और वो’ की ओर ले जाती है। केंद्रीय पात्र भीमा भारती का अपनी पार्टी की कार्यकर्ता कीर्ति सिंह के साथ प्रेम चलता है। फिल्मी अंदाज में तीज वाले दिन जब भीमा भारती अपनी प्रेमिका कीर्ति सिंह के साथ अकेले कमरे में होते हैं तो रानी भारती की एंट्री कराई जाती है। ये बेहद पुराना फार्मूला रहा है। इस सीरीज में भी जब ये प्रसंग आता है तो दर्शक चौंकता नहीं है क्योंकि उसको पता है कि आगे क्या होनेवाला है। प्रेम प्रसंग के अलावा इसमें राजनीति की तमाम साजिशें हैं, तिकड़में हैं, डरा धमकाकर नेताओं को अपने पाले में लाने की कोशिश भी है। पूरी कहानी अविभाजित बिहार में चलती है जहां शिबू सोरेन का किरदार भी महत्वपूर्ण पात्र के रूप में सामने आता है। झारखंड राज्य को लेकर सियासी सौदेबाजी भी है। इसके अलावा कई किरदार बिहार की समकालीन राजनीति के नेताओं से मेल खाते हैं। बहुत वर्षों पहले पटना में एक विधायक ने एक लड़की के साथ रेप किया था। वो आपराधिक वारदात देश भर में चर्चित हुआ था। उस घटना को भी महारानी सीजन 2 में दिखाकर इसको बिहार की कहानी बताने और बनाने की कोशिश निर्माताओं ने की है। और तो और इसमें चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर के चरित्र से मेल खाता एक महिला पात्र गढ़ा गया है जो हमेशा लैपटाप पर आंकड़ों का खेल करती है। अपने नेता की छवि निर्माण में लगी रहती है।

रानी भारती के रोल में हुमा कुरैशी ने बेहतरीन अभिनय किया है लेकिन उनको अपने उच्चारण पर काम करने की जरूरत है। जब वो बिहार की कम पढ़ी लिखी मुख्यमंत्री के रूप में बोलती हैं तो ये उनके बोली से परिलक्षित नहीं होता है। कई स्थितियों में उनका इस तरह का उच्चारण खटकता है। बावजूद इन कमियों के महारानी का सीजन 2 पहले सीजन से बेहतर है। अब निर्माताओं ने तीसरे सीजन का भी संकेत दे दिया है। भीमा भारती की हत्या हो जाती है। दूसरे सीजन के अंत में जिस तरह से वेबसीरीज को मर्डर मिस्ट्री बनाने की कोशिश हुई है उसको देखकर लगता है कि इस सीरीज को लिखनेवालों के सामने राजनीति की जमीन को पकड़े रहने की चुनौती होगी। अन्यथा राजनीति से आरंभ होकर ये वेबसीरीज प्रेम त्रिकोण के रास्ते अपराध कथा में बदल जाएगी। ये अच्छी बात है कि बिहार की राजनीति और यहां की आपराधिक पृष्ठभूमि वाले नेताओं पर मनोरंजन की दुनिया का ध्यान गया है। बिहार में इस तरह के पात्रों और घटनाओं की कमी नहीं है। अभी न बने लेकिन भविष्य में इस बात की संभवाना तो है ही कि जब महारानी का चौथा या पांचवा सीजन आएगा तो उसमें नीतीश कुमार के राजनीतिक दांव-पेंच और अलग अलग पार्टियों के साथ सरकार बनाने की घटनाओं पर भी रोचक कहानी कंस्ट्रक्ट होगी। तब इसको देखना और दिलचस्प होगा।   

Saturday, January 22, 2022

सम्राट अशोक पर अनावश्यक विवाद


बिहार के स्कूल में पढ़ाई के दौरान की एक स्मृति अबतक मानस पटल पर है। कक्षा में छात्रों से बात करते हुए हमारे प्राथमिक विद्यालय के मास्टर साहब कौवा और कान का उदाहरण देकर छात्रों को समझाया करते थे । वो हमेशा कहते थे कि अगर कोई कहे कि कौवा कान लेकर भाग गया तो कौवा के पीछे मत भागो पहले अपने कान को देखो। बिहार में इसका प्रयोग कहावत की तरह भी होता है। अपने गृह राज्य बिहार में सम्राट अशोक पर उठे विवाद के बाद अपने प्राथमिक विद्यालय के इस प्रसंग की लगातार याद आ रही है। बुजुर्ग लेखक दया प्रकाश सिन्हा को उनके नाटक सम्राट अशोक के लिए साहित्य अकादमी का पुरस्कार दिया गया। उनपर आरोप है कि उन्होंने सम्राट अशोक की तुलना मुगल आततायी औरंगजेब से की। उनके खिलाफ भारतीय जनता पार्टी के बिहार के प्रदेश अध्यक्ष संजय जायसवाल ने केस दर्ज करवाया। अपनी शिकायत में उन्होंने आरोप लगाया है कि पुस्तक में सम्राट अशोक की तुलना औरंगजेब से की गई है। यह आश्चर्य का विषय है कि दया प्रकाश सिन्हा ने अपनी पुस्तक सम्राट अशोक में कहीं भी औरंगजेब का नामोल्लेख तक नहीं किया है। अब कोई ये बताए कि बगैर नामोल्लेख के अशोक की तुलना औरंगजेब से कैसे की जा सकती है। सिर्फ भारतीय जनता पार्टी ही नहीं बल्कि जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) के नेता उपेन्द्र कुशवाहा भी दया प्रकाश सिन्हा से पद्मश्री और साहित्य अकादमी पुरस्कार वापस लेने की मांग कर रहे हैं। उपेन्द्र कुशवाहा इन दिनों जेडीयू में हैं इसके पहले वो इस पार्टी में आते जाते रहे हैं। उपेन्द्र कुशवाहा 2014 से लेकर करीब चार साल तक केंद्र में मानव संसाधन विकास मंत्रालय (अब शिक्षा मंत्रालय) में राज्यमंत्री रह चुके हैं। उपेन्द्र कुशवाहा इस बात से खिन्न हैं कि दया प्रकाश सिन्हा ने सम्राट अशोक के बारे में आपत्तिजनक बातें लिखी हैं। 

दया प्रकाश सिन्हा ने अपने नाटक जिन बातों का उल्लेख किया है उसके बारे में इतिहासकार लंबे समय से लिखते रहे हैं। ए एल बैशम, राम शरण शर्मा, रोमिला थापर, डी एन झा, के एम श्रीमाली से लेकर रमाशंकर त्रिपाठी तक ने अपनी पुस्तकों में इन बातों का उल्लेख किया है। करीब चार साल तक उपेन्द्र कुशवाहा केंद्र में शिक्षा राज्य मंत्री रहे ।उनके मातहत एक संस्था है राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद। यहां से राम शरण शर्मा लिखित ग्यारहवीं कक्षा की पाठ्य पुस्तक एनसिएंट इंडिया प्रकाशित है। इसकी पृष्ठ संख्या 100-01 पर इस बात का उल्लेख है कि बौद्ध परंपरा के अनुसार अशोक अपनी आरंभिक जिंदगी में बहुत निर्दयी था और उसने राजगद्दी पाने के लिए अपने 99 भाइयों की हत्या की थी। हलांकि लेखक ये भी कहते हैं कि ये गलत भी हो सकता है क्योंकि बौद्ध लेखकों ने उनकी जीवनी में कई काल्पनिक बातें डाली हैं। सवाल ये उठता है कि अगर ये तथ्य गलत थे तो इसका उल्लेख क्यों किया गया ? छात्रों को सालों से ये क्यों पढाया जा रहा है? शिक्षा राज्य मंत्री रहते हुए उपेन्द्र कुशवाहा ने इसको पाठ्य पुस्तक से हटवाने का उपक्रम क्यों नहीं किया? 

दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी माध्यम कार्यन्वयन निदेशालय की एक पुस्तक है प्राचीन भारत का इतिहास। इस पुस्तक के संपादक हैं इतिहासकार डी एन झा और के एम श्रीमाली। इस पुस्तक के एक लेख के अनुसार, अशोक के संबंध में जानकारी प्राप्त करने के प्रमुख साधन उसके शिलालेख तथा स्तंभों पर उत्कीर्ण अभिलेख हैं। किंतु ये अभिलेख अशोक के प्रारंभिक जीवन पर कोई प्रकाश नहीं डालते। इनके लिए हमें संस्कृत तथा पालि में लिखे हुए बौद्ध ग्रंथों पर निर्भर करना पड़ता है। परंपरानुसार अशोक ने अपने भाइयों का हनन करके सिंहासन प्राप्त किया था (पृ. संख्या 178)। ये पुस्तक पहली बार 1981 में प्रकाशित हुई थी। क्या शिक्षा राज्य मंत्री रहते हुए उपेन्द्र कुशवाहा ने दिल्ली विश्वविद्यालय को इस सबंध में कोई आपत्ति पत्र भेजा था। पहली बार 1942 में प्रकाशित अपनी पुस्तक हिस्ट्री ऑफ एनशिएंट इंडिया में रमा शंकर त्रिपाठी भी लिखते हैं कि सिंहली परंपराओं के अनुसार अशोक ने अपने 99 भाइयों की हत्या करने और खून की नदियां बहाकर गद्दी हासिल की थी। त्रिपाठी भी इस बात का उल्लेख करते हैं कि कुछ विद्वानों को इस पर संदेह है। अपनी पुस्तक ‘द वंडर दैड वाज इंडिया’ में इतिहासकार ए एल बैशम भी बौद्ध सूत्रों के आधार पर लिखते हैं कि अशोक ने विरोधियों की हत्या करके गद्दी हथियाई थी। एक तानाशाह के रूप में अपना शासन किया था (पृ संख्या 53)। बैशम भी यहां जोड़ते हैं कि अशोक के शिलालेखों में इस बात का उल्लेख नहीं मिलता । 

रोमिला थापर ने 1963 में एक पुस्तक लिखी जिसका नाम है ‘अशोक एंड द डिक्लाइन आफ द मौर्याज’। ये आक्सफोर्ड युनिवर्सिटी प्रेस से प्रकाशित है। अपनी इस पुस्तक में रोमिला थापर ने अशोक के बारे में विस्तार से लिखा है। इस पुस्तक की पृष्ठ संख्या 20 से लेकर 30 तक में रोमिला थापर ने विभिन्न बौद्ध सूत्रों के आधार पर अशोक के बारे में विस्तार से लिखा है। रोमिला थापर लिखती हैं कि अशोक अपने आरंभिक दिनों में सुंदर नहीं दिखते और उनके पिता बिंदुसार उनको पसंद नहीं करते थे। बाद के पृष्ठों पर लिखा है कि दिव्यावदान के मुताबिक जब अशोक के पिता बिंदुसार की मृत्यु हो रही थी तो वो अपने पुत्र सुसीम को राजा बनाना चाहते थे लेकिन उनके मंत्रियों ने अशोक को गद्दी पर बिठा दिया। महावंस और दीपवंस के अनुसार अशोक ने बिंदुसार की अन्य पत्नियों से जन्मे अपने 99 भाइयों की हत्या करवाई। तारानाथ के अनुसार अशोक ने अपने जीवन के आरंभिक वर्ष आनंद और मनोरंजन में व्यतीत किए जिसकी वजह से उनको कामाशोक आदि कहा गया। अपनी इस पुस्तक में रोमिला थापर ने विस्तार से अशोक के स्वभाव, महिलाओं के प्रति उनके व्यवहार,परिवार के सदस्यों के आपसी संबंधों आदि को बौद्ध सूत्रों के आधार पर पाठकों के समक्ष रखा है। रोमिला थापर की इस पुस्तक के दस से अधिक रिप्रिंट हो चुके हैं। रोमिला थापर ने ये पुस्तक 1963 में लिख दी थी अन्यथा अब तो उनको भी केस मुकदमा झेलना पड़ता।

इस देश में तो भगवान राम के बारे में भी जाने लोग क्या क्या कहते रहे हैं। सीता निर्वासन के प्रसंग को लेकर फूहड़ बातें भी लिखी गईं। एम एफ हुसैन तो देवी देवताओं के नग्न चित्र तक बनाते रहे। महात्मा गांधी के बारे में कितनी तरह की बातें कही जाती रही हैं। करीब दस साल पहले तेलुगू के एक लेखक वाई लक्ष्मण प्रसाद को साहित्य अकादमी ने उनकी पुस्तक द्रौपदी पर पुरस्कृत किया था। उस पुस्तक में द्रौपदी को लेकर अमर्यादित टिप्पणी की गई थी। भाषा बेहद निम्न स्तर की थी। जब इन मसलों का विरोध होता था तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पैरोकारों के पेट में दर्द होने लगता था। चूंकि दया प्रकाश सिन्हा कभी भारतीय जनता पार्टी से जुड़े रहे हैं तो अभिव्यक्ति के सारे पहरेदार अचानक खामोश हो गए हैं। दया प्रकाश सिन्हा ने अपने नाटक में सम्राट अशोक के बारे में कोई नई बात नहीं बात लिखी है। इतिहासकार ये लिखते रहे हैं।उनके विरोध की वजह अकादमिक न होकर राजनीतिक प्रतीत होती है। क्या बिहार की राजनीति में कुछ नया घटित होनेवाला है जिसकी पृष्ठभूमि तैयार की जा रही है या उपेन्द्र कुशवाहा अपनी प्रासंगिकता सिद्ध करने के लिए इस मुद्दे को हवा दे रहे हैं। इतिहास अशोक को सम्राट अशोक मानता है और अंग्रेजी में उनको ‘अशोक द ग्रेट’ कहा जाता है। उनके बारे में तमाम तरह के तथ्य खुलेंगे लेकिन अशोक ने जिस तरह से ‘दिग्विजय’ के स्थान पर ‘धम्मविजय’ के सिद्धांतों को अपनाया वो अतुलनीय है। 

Tuesday, July 12, 2011

बिहार में 'सांस्कृतिक क्रांति'

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने अपनी मशहूर किताब संस्कृति के चार अध्याय में कहा है कि – विद्रोह, क्रांति या बगावत कोई ऐसी चीज नहीं है जिसका विस्फोट अचानक होता है । घाव भी फूटने के पहले बहुत दिनों तक पकता रहता है । दिनकर जी की ये पंक्तियां उनके अपने गृह राज्य पर भी पूरी तरह से लागू होती है। बिहार में लालू यादव और उनकी पत्नी श्रीमती रावड़ी देवी के तकरीबन डेढ दशक के शासन काल में सूबे की सारी संस्थाएं एक एक कर नष्ट होती चली गई या फिर प्रयासपूर्वक उनको बरबाद कर दिया गया । जो बिहार में एक जमाने में शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र में विश्व में मशहूर था, जहां नालंदा विश्वविद्यालय जैसे उच्च कोटि के शिक्षा केंद्र हुआ करते थे, उन पंद्रह सालों के दौरान सबकुछ खत्म सा हो गया । जिस बिहार में कला संस्कृति की एक समृद्ध परंपरा थी वहां कला –संस्कृति मजाक बनकर रह गए । जो सूबा शिक्षा का अप्रतिम केंद्र हुआ करता था वहां से हर साल उच्च शिक्षा के लिए हजारो छात्र पलायन कर दिल्ली और अन्य शहरों का रुख करने लगे । जिस सूबे में ज्ञान की गंगा बहा करती थी वहां अपराध और रंगदारी का बोलबाला हो गया । राज्य के संवैधानिक मुखिया होने के नाते यह सारी जिम्मेदारी लालू-रावड़ी की की बनती है कि उन्होंने बिहारी गौरव को बिहारी गाली में तब्दील कर दिया । लालू यादव का फूहड़पन और उनके रिश्तेदारों के रंगदारी के किस्सों पर फिल्में बननी लगी और उन फिल्मों के अहम किरदारों में आपको उन लोगं की झलक साफ तौर पर दिखाई देने लगी । बिहारी शब्द हास्य और व्यंग्य का प्रतीक बन गया । लेकिन जैसा कि दिनकर जी ने लिखा है कि विद्रोह क्रांति या बगावत कोई ऐसी चीज नहीं कि उसका विस्फोट अचानक होता है । उसी तरह जनता के गुस्से का विस्फोट होने में सालों लग गए । बिहार की जनता ने समझदारी दिकाते हुए सूबे में सरकार बदल दी । पहले तो कुछ अंदेशे के साथ लेकिन दूसरी बार जब भरोसा हो गया तो प्रचंड बहुमत के साथ। इस प्रचंड बहुमत के साथ ही जनता की आशाएं और आकांक्षाएं भी सातवें आसमान पर जा पहुंची है ।
यह वर्ष बिहार राज्य के स्थापना के सौ वर्ष के रूप में साल भर जश्न के रूप में मनाया जा रहा है । राज्य की नीतीश सरकार ने साल भर के कई कार्यक्रम बनाए हैं जिनमें राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर गोष्ठी सेमिनार तो हैं ही उसके अलावा कई पुस्तकों का प्रकाशन और सांस्कृतिक रूप से लुप्त हो रही कलाओं के संरक्षण का काम भी शुरू किया गया है । इस काम में बिहार का कला संस्कृति मंत्रालय बेहद शिद्दत से जुटा है । इसी कड़ी में मंत्रालय ने बिहार विहार नाम से एक कॉफी टेबल बुक का प्रकाशन किया है । इस किताब में बिहार की कला संस्कृति एवं युवा विभाग की मंत्री सुखदा पांडे ने मर्म पर चोट की है – मैकाले के हवाले से उन्होंने लिखा है – हिंदुस्तानी यदि अपनी सांस्कृतिक और वैचारिक इतिहास को जान जाएं तो हम उनको गुलाम नहीं कर पाएंगे इस लिए उन्हें उनके इतिहास को नहीं जानने दो । बिहार में तकरीबन डेढ दशत में यही हुआ । बिहार की नई पीढ़ी को उसके सांसक्कृति और वैचारिक इतिहास की जानकारी से वंचित रखने का षडयंत्र रचा जाता रहा और प्रयासपूर्वक ऐसा किया भी गया । लेकिन अब सुखदा पांडे के नेतृत्व में बिहार का यह मंत्रालय मैकाले के इस सिद्धांतो को झुठलाने में लगा है । सुखदा पांडे शिक्षण कार्य से जुड़ी रही हैं और उनसे .ह उम्मीद भी की जा सकती है कि कला और संस्कृति के क्षेत्र में बिहार के गौरव को वापस लाने में महती भूमिका निभाएंगी ।
बिहार के गौरवशाली इतिहासल को सामने लाने के लिए संस्कृकि मंत्रालय ने एक किताब बिहार-विहार छापी है य़ इस किताब का संपादन राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त लेखक विनोद अनुपम ने किया है । विनोद अनुपम ने अएपने संपादकीय में बिहारकी होने की पीड़ा से ही सुरुआत की है कि किस तरह से जब वो 1992 में फिल्म एप्रिशिएशन का कोर्स करने के लिए पुणे गए थे तो उनके साथ के लोगों को इस बात का आश्चर्य होता था और व्यंग्यात्मक लहजे में पूछते थे कि कैसा है आपका बिहार । विनोद अनुपम के मुताबिक - अब बदलते वक्त में भी लोग बिहार के बारे में जानना चाहते हैं लेकिन अब वो लोग बिहार के इतिहास के बारे में जानना चाहते हैं, बिहार में हो रहे नवीनतम बदलाव के बारे में जानना चाहते हैं । जनता वह सबकुछ जानना चाहती है जो शायद हम भी नहीं जानते। शायद इसलिए कि उन्हें पता है कि बदलाव की इबारत बिहार से ही लिखी जानी है , देश में भविष्य की रोशनी बिहार से ही आनी है । बिहार को करीब से जानने की इसी क्षुधा की पूर्ति की छोटी सी कोशिश है – बिहार विहार । दरअसल इस कॉफी टेबल बुक से बिहार की संस्कृति और समृद्ध लोक कलाओं की एक छोटी से झलक भर ही मिलती है । संकेत मिलते हैं कि हमारे बिहार की कला परंपराएं कितनी समृद्ध रही है । बिहार का होने के बावजूद इस किताब को पढ़ने के बाद मेरी जानकारी में भी जबरदस्त इजाफा हुआ । इस किताब से भी एक दिलचस्प प्रसंग जुड़ा है । विनोद अनुपम ने जब फोन पर मुझे कहा कि बिहार की कला संस्कृति पर वो बिहार सरकार की तरफ से प्रकाशित होनेवाली कॉफी टेबल बुक का संपादन कर रहे हैं तो मुझे लगा था कि वो मजाक कर रहे हैं । पहले तो मुझे लगा था कि सरकार की कला संस्कृति में क्यों दिलचस्पी होगी । और उसपर से कॉफी टेबल बुक । जब भी हमारी बातचीत होती थी तो विमोद अनुपम उलके बारे में बताते थे लेकिन हर बार मैं सोचता था कि वो दिवास्वप्न देख रहे हैं और मैं सपने तोड़ने में यकीन नहीं रखता हूं इसल वजह से उनको कुछ कहता नहीं था लेकिन कालांतर में पता चला कि बिहार विहार को जो सपना था और जिसे मैं दिवा-स्वपन सोच समझ रहा था, दरअसल वो हकीकत था और सपना पूरा भी हुआ ।
कॉफी टेबल बुक की योजना के बारे में विवेक कुमार सिंह ने अपनी पूर्व पीठिका में लिखा है – देश विदेश में घूमते हुए मुझे कॉफी टेबल बुक की उपयोगिता का एहसास हुआ। विषय विशेष में रुचि जगाने के लिए कॉफी टेबल बुक हमेशा से एक बेहतर माध्यम रही है । यह विषय की विस्तार से जानकारी भले ही ना दे, उसके प्रति दिलचस्पी अवश्य जगाती है । बिहार विहार की परिकल्पना बिहार के प्रति दुनिया की दिलचस्पी जगाने के लिए ही की गई है । विवेक कुमार सिंह को नजदीक से जानने वाले यह बताते हैं कि इस प्रशासनिक अधिकारी ने बिहार में कला संस्कृति के विकास के लिए बहुच कार्य किए हैं और कई मृत प्राय संस्थाओं में नई जान फूंक दी थी । लेकिन कॉफी टेबल बुक की उपयोगिता उसकी उपलब्धता पर भी निर्भर करती है । अगर बिहार सरकार सिर्फ किताब छापकर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेगी तो इसका उद्देश्य पराजित हो जाएगा । जरूरत इस बात की है कि इस किताब को उन खास लोगों तक पहुंचाया जाए जहां से किसी भी सूबे की छवि निर्मित होती है । अन्यथा यह किताब भी अन्य सरकारी प्रकाशनों की तरह गोदाम में धूल फांक रही होगी और इसके प्रकाशम से जुड़े लोग अपनी पीठ थपथपा रहे होंगे ।
इस किताब में बेहद श्रमपूर्वक सामग्री का चयन किया गया है लेकिन इसमें जो चित्र लगे हैं वो इस किताब की कमजोरी हैं । हो सकता है वक्त की कमी के चलते ऐसा हुआ हो या फिर कोई और कारण रहे हों लेकिन सामग्री के हिसाब से ना तो चित्रण कमजोर हैं चाहे वो रामलीला के पहले के चित्र हों राजाओं का चित्रण हो । लेकिन हमें इस प्रयास की सराहना करनी चाहिए ताकि भविष्य में इस तरह की और सामग्री सामने आएं, कमजोरियां तो दूर हो ही जाती है । बस जैसा कि मैंने उपर भी कहा कि इसे टारगेट पाठक वर्ग तक पहुंचावने का काम होना चाहिए ।

Monday, April 25, 2011

इज्जत की जमींदारी

शादी के ग्यारह साल बाद ससुराल जाने का मौका मिला । लंबा अंतराल इस वजह से कि ससुराल के सबलोग बिहार के ऐतिहासिक शहर गया में बस गए थे । शादी भी वहीं से हुई और जब भी जाना हुआ गया ही गया । पत्नी के पैतृक गांव यानि अपनी असली ससुराल जाने का अवसर, जैसा कि उपर बता चुका हूं शादी के ग्यारह साल बाद मिला । इतने लंबे अंतराल के बाद वहां पिछले साल दिवंगत हुए अपने श्वसुर की बरसी में गया था। हमें जाना था गया से तकरीबन साठ-सत्तर किलोमीटर दूर औरंगाबाद जिले के रायपुर बंधवा गांव में, हमलोग गया से चलकर दो घंटे में वहां पहुंचे । बिहार की सड़के पिछले सालों में बेहद अच्छी हो गई हैं और रास्ते में पड़नेवाले आजादी के पूर्व बने सारे सड़क पुल के समांतर नए पुल बन रहे थे । जब मैं रास्ते में था तो सोच रहा था कि लगभग एक दशक पूर्व अपनी शादी में मुझे जमालपुर से गया के लगभग सौ एक सौ दस किलोमीटर का सफर तय करने में ग्यारह घंटे लगे थे । तब बिहार में लालू राज था और सड़कें लगभग गायब हो चुकी थी । खैर यह अवातंर प्रसंग है । मैं बात कर रहा था अपने बंधवा सफर की । औरंगाबाद जिले के बंधवा तक जाने का रास्ता पूरी तरह से नक्सल प्राभवित इलाका गोह, हसपुरा से होकर जाता था । लेकिन टाटा मैजिक से दो घंटे का सफर बेखौफ होकर तय किया । रास्ते में सबकुछ सामान्य लग रहा था । रास्ते में मिलनेवाले कस्बानुमा बाजार में खूब भीड़ भाड़ और चहल पहल थी, किसी भी तरह के डर का वातावरण नहीं दिख रहा था, कहीं कोई पुलिसवाला भी नहीं दिखा, अर्धसैनिक बल के जवान तो दूर की बात । हमलोग दोपहर बाद बंधवा पहुंचे । वहां का घर पुराने जमाने का बना था, मिट्टी की मोटी-मोटी दीवारें और खूब उंचाई पर छत । गांव में घुसते ही एक बोर्ड दिखाई दिया - यह गांव राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना के तहत उर्जाकृत ग्राम है । लेकिन घर पहुंचते ही राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना की पोल खुल गई । वहां तक बिजली के तार-खंभे तो हैं लेकिन बिजली नहीं है । कई घरों में सोलर एनर्जी से काम चल रहा था । मेरे लिए बिना बिजली के रहने का यह नया अनुभव नहीं था लेकिन एक लंबे अंतराल के बाद बगैर बिजली के चार-पांच दिन गुजारा था । यह एक संयोग ही बना कि जब पहली बार भारत ने क्रिकेट का वर्ल्ड कप जीता था तब भी मैंने रेडियो पर ही भारत के जीत की दास्तां सुनी थी और इस बार भी क्रिकेट के महायुद्ध में जब भारत श्रीलंका को पराजित कर रहा था तो मैं रेडियो से ही चिपक कर बैठा था । लेकिन सबसे मजेदार बात यह थी कि एक ओर जहां टीवी और बिजली से दूर था वहीं मेरा मोबाइल मुझे बाहर की दुनिया से जोड़े हुथा और मुझे अपडेट रख रहा था । उन पांच दिनों में मैंने मोबाइल इंटरनेट का जमकर इस्तेमाल किया, फेसबुक और ट्विटर से वर्ल्ड कप पाइनल के दौरान लोगों के जोश और उत्साह का अंदाज मिल रहा था ।
रायपुर बंधवा के अपने बंगले पर जब हमलोग शाम को बैठे तो लोगों के आने जाने का सिलसिला शुरू हो गया । चूंकि मैं घर का दामाद था इस लिए मुझे खास तौर पर इज्जत बख्शी जा रही थी। गांव में मेरे दिवंगत श्वसुर प्रोफेसर प्रियव्रत नारायण सिंह की काफी इज्जत थी । गांव से बाहर रहने के बावजूद उनका दिल गांव में ही बसता था । हर साल दो तीन बार गांव जरूर जाते थे । शाम को जब मैं और मेरी पत्नी के बड़े भाई राजेश जी गांव में घूमने निकले तो इस इज्जत का एहसास और गहरा हो गया । रास्ते में हर छोटा बडा़ आदमी राजेश जी को सलाम मालिक कह रहा था । जमींदारी तो 1953 में ही चली गई थी लेकिन इज्जत की जमींदारी अब भी कायम थी । कई लोग जो हमसे मिलने आ रहे थे वो राजेश जी और उनके चाचा के सामने कुर्सी या बेंच पर बैठने की बजाए जमीन पर बैठ रहे थे । मुझे यह सामंती लग रहा था लेकिन जब उनसे बात हुई तो पता चला कि यह उनके सम्मान देने का एक तरीका है, उन्हें कोई इसके लिए फोर्स नहीं करता है । यह सदियों से चली आ रही एक परंपरा है जिसे निभाया जा रहा है । यहां मेरे दिमाग में एक बात बार-बार उठ रही थी कि सुदूर गांव में हर कोई एक दूसरे को विश करने के लिए सलाम का इस्तेमाल कर रहा था । बोलचाल में उर्दू के लफ्जों का जमकर इस्तेमाल हो रहा था। उर्दू को मुसलमानों की भाषा कहने वालों को उन इलाकों में जाकर देखना चाहिए कि जहां कोई मुस्लिम आबादी नहीं है वहां भी बगैर किसी औपचारिक शिक्षा के, सिर्फ परंपरा के सहारे लोग उर्दू का इस्तेमाल कर रहे थे । भाषा के बीच दरार पैदा करनेवाले लोगों को एसी कमरों से बाहर निकलकर लोगों के बीच जाने की जरूरत है।
इन पांच दिनों तक वहां रहने के दौरान कई अनुभव हुए । एक दिन अचानक दोपहर में घर के बरामदे पर बैठा था तो दर्जनों बच्चे थाली पीटते हुए सामने से गुजरे । पूछने पर पता चला कि ये बच्चे मिड डे मील स्कीम के तहत खाना खाने स्कूल जा रहे हैं । और दरियाफ्त की तो आगे पता चला कि बच्चों का नामांकन तो स्कूल में कर दिया गया है लेकिन उनकी पढ़ाई और उनके स्कूल में उपस्थिति ज्यादातर रजिस्टर में ही दर्ज होती है । बच्चे स्कूल में पढ़ने की बजाए दोपहर का खाना खाने आते हैं । दस बजे के करीब से स्कूल में खाना बनना शुरू हो जाता है और बारह-एक बजे तक बच्चों को खाना खिलाकर स्कूल के मास्टर लोग फारिग हो जाते हैं । उसी तरह से आंगनबाड़ी केंद्र का काम भी चल रहा था । लेकिन गांव के ही लोगों ने बताया कि मिड डे मील में जमकर घपला होता है । रजिस्टर में फर्जी छात्रों के नाम भी दर्ज होते हैं और जिले के आला शिक्षा अधिकारियों की मिलीभगत से यह फर्जीवाड़ा धड़ल्ले से चलता है । बातों -बातों में बता चला कि वहां एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र भी है जिसमें तैनात डॉक्टर घंटे -डेढ़ घंटे के लिए केंद्र में आते हैं । गांव के लोग इस बात से ही खुश दिखे कि कम से कम घंटे भर के लिए तो डॉक्टर गांव में होता है । नीतीश राज के पहले तो स्वास्थ्य केंद्र का ताला ही महीनों में खुलता था । यह भी पता नहीं चलता था कि किसी डॉक्टर की तैनाती वहां है या नहीं । लेकिन बड़ा सवाल अब भी है कि क्या नीतीश कुमार शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में और सुधार कर पाएंगे । क्या केंद्र पर तैनात डॉक्टर पूरे समय तक मौजूद रहेंगे । क्या होटल में तब्दील हो रहे स्कूलों को विद्या का मंदिर बना पाएंगे । नितीश कुमार को प्रदेश की जनता ने प्रचंड बहुमत के साथ जिताकर दुबारा सत्ता तो सौंप दी लेकिन अब जनता की प्रचंड अपेक्षा भी है जिसपर नीतीश कुमार को खड़ा उतरना होगा । अगर वो ऐसा कर पाते हैं तो इतिहास पुरुष हो जाएंगे और इगर उसमें कोई कमी रह जाती है तो इतिहास पुरुष बनने की बजाए इतिहास में खो जाने का खतरा भी उत्पन्न हो जाएगा ।
बंधवा में चार पांच दिन रहने के बाद हमलोग दोपहर बाद फिर से गया के लिए रवाना हो गए । देवकुंड, अमझरशरीफ से होते हुए हमलोग हसपुरा के रास्ते जा रहे थे । शाम घिरने लगी थी लेकिन डर कहीं नहीं था, खुली गाड़ी में अंधेरे में सफर जारी था । मुझे याद है जब शादी के बाद मैं अपने ससुराल गया जाया करता था तो शाम ढलने के बाद भी मेरे श्वसुर जी पास के बाजार में भी नहीं जाने देते थे । एक अजीब तरह का डर और अपराधियों का खौफ लोगों के मन में इतने अंदर तक था कि हर कोई शाम ढ़लने के पहले घर लौट आता था लेकिन सिर्फ पांच साल में एक वयक्ति ने पूरी फिजां ही बदल दी । अंत में मैं एक मजेदार वाकया सुनाता हूं जो वहीं किसी ने मुझे सुनाया - हसपुरा से एक लड़का गोह जाने के लिए बस में चढ़ा और उसने किराए के तौर पर पंद्रह रुपए निकाल कर दिए । कंडक्टर ने कहा कि किराए के बीस रुपए बनते हैं । दोनों मे बकझक होने लगी । रंगदार टाइप के उस लड़के ने कंडक्टर पर धौंस जमाते हुए कहा कि तुम मुझे जानते नहीं मैं तो पंद्रह रुपए ही दूंगा । तो कंडक्टर ने जबाब दिया कि तुम भूल गए हो कि लालू यादव का राज खत्म हुए छह साल हो गए हैं और अगर तुम तत्काल से किराए के बाकी पैसे नहीं दोगे तो या तो बस से उतार दूंगा और अगर रंगदारी करोगो तो थाने में बंद करवा दूंगा । तो समाज के आम आदमियों में कानून के प्रति जो यह विश्वास कायम हुआ है है वो बहुत कुछ कह जाता है ।

Sunday, April 5, 2009

बिहार में नीतीश की ‘जय हो’

लगभग चार सालों के बाद कुछ दिनों पहले मुझे बिहार जाने का मौका मिला । जब ट्रेन गया रेलवे स्टेशन पर रुकी और मैं उतरा तो सबकुछ आशा के अनुरूप ही था । शोरगुल-भीडभाड़, धक्का-मुक्की । किसी तरह बाहर आया तो बेतरतीब ढंग से गाड़ियां खड़ी थी । किसी तरह पार्किंग से निकलकर अपने गंतव्य की तरफ बढ़ा तो रास्ते में एक निर्माणाधीन फ्लाईओवर दिखा, बेसाख्ता मुंह से निकला, बिहार में फ्लाईओवर । लेकिन लगभग हफ्ते भर गया में रहने के दौरान समाज के हर तबके से बातचीत करने के बाद ये लगा कि कुछ बदलाव तो है । बिहार के कई शहरों में हर ओर बेहतरी के लिए काम हो रहा है । मुझे विश्वास है कि अगर आनेवाले दिनों में राजनैतिक नेतृत्व में यही इच्छा शक्ति रही तो बिहार भी किसी अन्य विकसित राज्य से कम नहीं होगी । बिहार में रहने के दौरान दौरान मेरी बातचीत समाज के कई तबके के लोगों से हुई । सब लोग कमोबेश नीतीश सरकार से संतुष्ट नजर आए । अखबारों में अपराध की खबरें बिल्कुल ही कम नजर आई । बातचीत से ये लगा राज्य में बेहतर शिक्षा का माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है ।
मैं चार साल के बाद अपने गृह राज्य गया था, जाहिर है कानून व्यवस्था को लेकर मेरे मन में उसी जमाने की स्थिति चल रही थी । खबरिया चैनल में काम करते हुए बिहार के बाहुबली विधायकों के कारनामे आते ही रहते थे । जाहिर है जब बिहार में विकास की हचलच और उच्च शिक्षा में सुधार महसूस किया तो स्वाभाविक रूप से बाहुबलियों के बारे में जानने की इच्छा हुई । बातों बातों में टाल क्षेत्र के एक बड़े जमींदार से इसकी चर्चा कर दी । उन्होंने जो कहानी बताया उसे सुनकर दिल को बड़ा ही सुकून मिला । पता ये चला कि नीतीश सरकार ने चुनचुनकर बाहुबलियों के इलाके में ऐसे अफसरों की तैनाती कर दी है, जिन्होंने बाहुबलियों पर नकेल कस दी है । इस बात का समाज पर मनोवैज्ञानिक असर हुआ और छुटभैये अपराधियों और अपराध पर खुद-ब-खुद लगाम लग जाती है । इस दौरान मेरी बात मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के धुर विरोधियों से भी हुई । सबों से बात करके ये नतीजा निकला कि राज्य में कानून और व्यवस्था की हालात में सुधार हुआ है । ये नहीं है कि स्थिति बिल्कुल सुधर गई है । लेकिन अपहरण और दिन दहाड़े गाड़ी लूट या फिर शो रूम से गाड़ी उठा ले जाने जैसी घटना लगभग बंद हो गई है । छोटे मोटे अपराध तो अब भी हो रहे हैं लेकिन लोगों के मन में इस बात का विश्वास पैदा हुआ है कि अपराधी पकड़े भी जा सकते हैं । शासन में लोगों का विश्वास जमना लोकतंत्र की मजबूती की निशानी है और पिछले तीन वर्षों के शसान काल में नीतीश सरकार ने लोगों के मन में ये विश्वास तो पैदा कर ही दिया है । राष्ट्रकवि दिनकर ने भी संसकृति के चार अध्याय में लिखा है कि विद्रोह, क्रांति या बगावत ऐसी चीज नहीं जिसका विस्फोट अचानक होता है । घाव भी फूटने के पहले अनेक काल तक पकते रहते हैं । अगर दिनकर जी की बातों में हम बदलाव को भी जोड़ लें तो बिहार के संदर्भ में सटीक बैठेगी । किसी भी तरह के बदलाव के लिए वक्त और राजनैतिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता होती है । उसके बगैर न तो विकास हो सकता है और न ही बदलाव । मैं नीतीश कुमार की बहुत सी नीतियों का समर्थक नहीं हूं लेकिन ये देखना और सुनना अछ्छा लगता है कि मेरे राज्य का कोई मुख्यमंत्री कंप्यूटर और विदेशी निवेश की बात करता है . सन 1991 में भारत की इकॉनोमी में बदलाव शुरु हुए लेकिन बिहार में सिवाए दूरसंचार के किसी भी क्षेत्र में उस तरह से बदलाव महसूस नहीं किया जिस तरह से देश के अन्य राज्यों का विकास हुआ । बिहार में लगभग दो दशकों तक विकास की बात ही नहीं हुई । बात हुई तो भूरा बाल की, जातिवाद की, और नरसंहार और प्रतिनरसंहार की। नीतीश कुमार के पूर्ववर्ती मुख्यमंत्रियों ने न तो राज्य में कंप्यूटरीकरण और न ही विदेशी निवेश की बात की, प्रयास तो दूर की बात । आज जब हर राज्य में जमकर विदेशी निवेश हो रहा है तो बिहार में इसके लिए प्रयास शुरु हुए हैं । लगभग दो दशक पीछे चल रहा है बिहार । राज्य में किसी तरह का कोई निवेश नहीं हुआ तो इसके लिए सिर्फ शीर्ष राजनैतिक नेतृत्व और उनकी सोच जिम्मेदार है । अगर बिहार में निवेशकों के लिए माहौल बनाया जाता और प्रयास किए जाते तो कोई वजह नहीं थी इस राज्य में निवेश नहीं होता । लेकिन अब राज्य में इस तरह की बातें भी होने लगी है तो जाहिर तौर पर काम भी शुरु हो गया है । जरूरत सिर्फ इस बात की है कि राजनैतिक इच्छा शक्ति बनी रहे और अभी नीतीश कुमार जिस तरह बिना किसी दबाव मे आए काम कर रहे हैं उसी तरह करते रहें, तो भूरा बाल साफ करने की बात करनेवाले लोग साफ हो जा सकते हैं । लोकसभा चुनाव में जनता विकास के दुश्मनों को करारा जवाब देने का मन बना चुकी है ।