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Saturday, August 2, 2025

जमीनी कहानियां और काल्पनिक जवान


राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार की घोषणा के साथ ही इंटरनेट मीडिया पर शाह रुख खान को लेकर टिप्पणियां आने लगीं। शाह रुख को फिल्म जवान के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार देने की घोषणा की गई । यह पुरस्कार उनको विक्रांत मैसी के साथ दिया जाएगा। पुरस्कार की घोषणा होते ही इंटरनेट मीडिया पर लिखा जाने लगा कि शाह रुख को 2004 में स्वदेश के लिए पुरस्कार दिया जाना चाहिए था। उस वर्ष सैफ अली खान को उनकी फिल्म हम तुम के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार दिया गया था। लिखा गया कि सैफ की मां शर्मिला टैगोर उस वक्त केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड की अध्यक्ष थीं इस कारण उनको पुरस्कार मिल गया। पर कहानी दूसरी है। 2004 में जब स्वदेश फिल्म आई थी तो शाह रुख के अभिनय की सराहना हुई थी। राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार नहीं मिला था जिसका मलाल शाह रुख को है। एक अवसर पर शाह रुख का दर्द झलका भी था। उन्होंने कहा था कि स्वदेश के लिए उनको राष्ट्रीय पुरस्कार मिलना चाहिए था। शाह रुख को स्वदेश के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार नहीं मिलने का किस्सा दिलचस्प है। 2004 के लिए जब राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार तय करने के लिए जूरी बैठी तो उनके सामने शाह रुख की फिल्म स्वदेश भी आई थी। जूरी के सदस्यों में निर्देशक टी एस नागबर्ना भी शामिल थे। जब स्वदेश रिलीज हुई थी तब निर्देशक टी एस नागबर्ना ने आरोप लगाया था कि स्वदेश उनकी फिल्म चिगुरिदा कनासू की नकल है। 2004 के राष्ट्रीय अवार्ड की जूरी के चेयरमैन सुधीर मिश्रा थे। जूरी के सामने जब स्वदेश का प्रदर्शन हुआ तो नागबर्ना ने वहां भी अपना आरोप दोहराया। उनके ऐसा कहने पर जूरी के कुछ सदस्यों ने नागबर्ना की फिल्म देखने की इच्छा जताई। चेयरमैन समेत कई सदस्य शाह रुख के अभिनय की प्रशंसा कर रहे थे। नागबर्ना ने जूरी सदस्यों को चिगुरिदा कनासू दिखाई । स्वदेश और चिगुरिदा कनासू में बहुत अधिक समानता पाई गई थी। फिल्म को देखने के बाद निर्णय हुआ कि स्वदेश के लिए शाह रुख खान को पुरस्कार नहीं दिया जा सकता। राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार के चयन का आधार अभिनय तो होता ही है, फिल्म की कहानी और समाज पर उसके प्रभाव पर भी चर्चा की जाती है। किसी भी रीमेक को या दूसरी भाषा में बनी फिल्म की कहानी पर बनी फिल्म को पुरस्कृत नहीं किया जाता है। 

अब बात कर लेते हैं फिल्म जवान की जिसमें नायक के तौर पर शाह रुख खान सिस्टम को चुनौती देते है। संवैधानिक व्यवस्थाओं पर चोट करते हैं। फिल्म में देश की स्वास्थ्य व्यवस्था बेहतर करने के लिए मंत्री का अपहरण करना जैसी घटनाएं हैं। क्या जूरी के सदस्यों ने जवान पर निर्णय करते हुए ये नहीं सोचा होगा कि जिस फिल्म की कहानी में संवैधानिक व्यवस्थाओं को चुनौती दी जा रही है उसके अभिनेता को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार कैसे दिया जा सकता है। ये फिल्म एक्शन थ्रिलर है जिसमें भरपूर हिंसा है। जनता को ये फिल्म खूब पसंद आई थी। फिल्म ने एक हजार करोड़ से अधिक का कारोबार किया था। उन चर्चाओं के दौरान जवान में शाह रुख खान की अभिनय की बहुत प्रशंसा हुई हो ऐसा याद नहीं पड़ता। जूरी के अध्यक्ष आशुतोष गोवारिकर और अन्य सदस्यों को शाह रुख खान के अभिनय में वो तत्त्व अवश्य दिखे होंगे जो अन्य समीक्षक भांप नहीं पाए। शाह रुख शानदार अभिनेता हैं, उन्होंने वर्षों तक अपने अभिनय से इसको साबित भी किया था। फिल्म स्वदेश और फिल्म हम तुम या यों कहें कि शाह रुख और सैफ के साथ दो संयोग हैं। जब सैफ को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार मिला था तब उनकी मां शर्मिला टैगोर केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड की अध्यक्ष थीं। शाह रुख को नेशनल अवार्ड मिला है तो जूरी के चेयरमैन आशुतोष गोवारिकर हैं जो स्वदेश के निर्देशक थे। यहां ये भी बताते चलें कि शाह रुख को पहली बार नेशनल अवार्ड मिला है। 

शाह रुख के साथ विक्रांत मैसी को 12वीं फेल के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार दिया जाएगा। 12वीं फेल के लिए विक्रांत मैसी का चयन अच्छा है। विक्रांत मैसी ने अपने अभिनय कौशल से सिनेप्रेमियों का ध्यान खींचा है। हाल ही में आई उनकी फिल्म साबरमती रिपोर्ट में भी उनका अभिनय शानदार है। 12वीं फेल को बेस्ट फीचर फिल्म का अवार्ड भी दिया जाएगा। वास्तविक जीवन की घटनाओं से प्रेरित इस फिल्म में सभी कलाकारों ने बेहतरीन अभिनय किया था। इस फिल्म के निर्देशक विधु विनोद चोपड़ा थे ने नेशनल अवार्ड की घोषणा के बाद इसको अपनी टीम के उत्कृष्ट काम को श्रेय दिया है। कम बजट में बनी इस फिल्म ने अपनी लागत से करीब तीन गुणा अधिक कारोबार किया था। नेशनल फिल्म अवार्ड में कारोबार कोई आधार नहीं होता लेकिन इस कलात्मक फिल्म ने बगैर किसी हिंसा या आयटम सांग के लोकप्रियता हासिल की थी। 

अभिनेत्री रानी मुखर्जी को भी पहली बार नेशनल अवार्ड मिलेगा। उनकी फिल्म मिसेज चटर्जी वर्सेस नार्वे के लिए उनको ये अवार्ड दिया जाएगा। संयोग देखिए कि ये फिल्म भी 12वीं फेल की तरह वास्तविक जीवन की घटना पर आधारित है। यह फिल्म एक बंगाली हिंदू अप्रवासी की कहानी है। इसमें भारतीय मूल्यों और पाश्चात्य मान्यताओं की टकराहट है। बंगाली महिला अपने बच्चों के साथ सोती है, अपने हाथ से खाना खिलाती है इस कारण नार्वे में उसको बच्चों से अलग कर दिया जाता है। वो कानूनी लड़ाई भी हारती है लेकिन उसका बच्चों को अपने पास लाने का संघर्ष जारी रहता है। उसी संघर्ष की कहानी है ये फिल्म। रानी मुखर्जी ने इसके पहले भी कई बेहतरीन फिल्में की हैं, जिनपर उनको राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार दिया जा सकता था। फिल्म ब्लैक और हिचकी में उनका अभिनय शानदार था। संभव है कि जिस वर्ष रानी की ये फिल्में आई हों उस वर्ष किसी और फिल्म में किसी और अभिनेत्री ने बेहतर अभिनय किया हो। ब्लैक और हिचकी दो ऐसी फिल्में हैं जो रानी मुखर्जी की अभिनय प्रतिभा के लिए और फिल्म की विषयवस्तु और ट्रीटमेंट के लिए याद किया जाता है। फिल्म हिचकी में रानी मुखर्जी ने जिस विषय पर काम किया था वो लगभग अनजाना था। ये ब्रैड कोहेन की आत्मकथा ‘फ्रंट आफ द क्लास, हाउ टौरेट सिंड्रोम मेड मनी टीचर आई नेवर हैड’ पर आधारित है। कहा जाता है कि इस फिल्म में अभिनय के पहले रानी घंटों तक इस सिंड्रोम को समझने का प्रयास करती थी। इस सिंड्रोम से ग्रस्त लोग कैसे व्यवहार करते हैं उसको जानने  में लंबा समय बिताया था। पर्दे पर ये मेहनत दिखी भी थी। 

द केरल स्टोरी के निर्देशक सुदीप्तो सेन को बेस्ट डायरेक्टर का अवार्ड दिया जाएगा। उन्होंने धारा के विपरीत जाकर फिल्म बनाई। द केरल स्टोरी को लेकर काफी विवाद हुए। मामला कोर्ट में भी गया। कई राज्यों में उसको अघोषित प्रतिबंध भी झेलना पड़ा। इस फिल्म ने भारतीय समाज में धीरे-धीरे जगह बनाते लव जिहाद के खतरों से दर्शकों को अवगत करवाया था। निर्देशक के तौर पर सुदीप्तो सेन ने इस फिल्म से अपनी पहचान स्थापित की। उनको पुरस्कार देना वैकल्पिक धारा की फिल्मों का स्वीकार है। एक और फिल्म ने ध्यान खींचा वो है हिंदी फिल्म कटहल। छोटे बजट की इस फिल्म की खूब चर्चा रही थी। कहानी और उसके ट्रीटमेंट को लेकर। ये फिल्म सामाजिक व्यवस्था पर व्यंग्य है। विधायक के घर में लगे कटहल के पेड़ से दो कटहल गायब हो जाते हैं। कटहल को ढूंढने के लिए पुलिस लगाई जाती है और फिर शुरू होती है कहानी जिसमें महात्वाकांक्षाओं की टकराहट है, जातिगत भेदभाव जैसे मुद्दे हैं। कुल मिलाकर अगर देखें तो 2023 के लिए घोषित राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में हिंदी फिल्मों के कामों को प्रमुखता से रेखांकित किया गया है। 


Sunday, October 31, 2021

अर्थहीन अतिसक्रियता के अराजक मंच


पिछले दिनों अंग्रेजी के एक स्तंभकार ने कांग्रेस पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी का आकलन करते हुए अंग्रेजी में एक लेख लिखा। अपने लेख के लिंक को उन्होंने ट्विटर पर साझा किया और उसमें उन्होंने राहुल गांधी की जगह राजीव गांधी लिखा। थोड़ी ही देर में उन्होंने अपने उस ट्वीट को डिलीट कर दिया। फिर से लिंक साझा किया, इस थोड़ी लंबी टिप्पणी लिखी लेकिन फिर उन्होंने राहुल गांधी की जगह राजीव गांधी लिख दिया। फिर डिलीट कर दिया और तीसरी बार में उन्होंने अपने लेख के अनुसार ट्वीटर टिप्पणी में राहुल गांधी और कांग्रेस लिखा। तबतक कुछ लोग उनसे मजे ले चुके थे। उनको राजीव गांधी की भक्ति से बाहर निकलने की सलाह दे चुके थे। कई ने उनके पहले ट्वीट का स्क्रीन शॉट लेकर उनको राजीव गांधी के प्रभाव से मुक्त होने की सलाह भी दे डाली थी। ट्वीटर की दुनिया में ऐसा कई बार कई लोगों के साथ होता है। दरअसल इंटरनेट मीडिया की इस दुनिया का स्वभाव बिल्कुल अलग है। कई काम जो इंटरनेट मीडिया ने किया उसको रेखांकित करना तो आवश्यक है लेकिन इसके प्रभाव पर भी विचार करना चाहिए। इंटरनेट मीडिया के इन मंचों ने वैसे सभी लोगों को उनके मूल स्वभाव और रूप में दुनिया के सामने प्रस्तुत कर दिया। इस मीडिया ने वैसे सभी स्तंभकारों के पक्ष को भी सामने ला दिया जो ये दावा करते नहीं थकते थे कि वो निष्पक्ष हैं। निष्पक्ष होने का दावा करनेवाले लगभग सभी स्तंभकार, टिप्पणीकारों की सोच का परत दर परत सामने आ गया। ट्वीटर, फेसबुक और अन्य इंटरनेट माध्यम को इस बात का श्रेय दिया जाना चाहिए कि इसने निष्पक्षता की आड़ में इस या उस राजनीतिक दल या विचारधारा का समर्थन करनेवालों के सामने से आड़ हटा दी । 

पिछले दिनों शाह रुख खान के पुत्र आर्यन खान पर नशाखोरी का आरोप लगा। वो जेल गए। अदालती कार्यवाही चली और आखिर में बांबे हाई कोर्ट ने उनको जमानत दे दी। गिरफ्तारी से लेकर जमानत पर बांबे हाईकोर्ट के फैसले तक इंटरनेट मीडिया के माध्यमों पर ट्वीटर और फेसबुक वीरों ने जमकर तलबारबाजी की। अदालत पर सवाल उठाए। नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो और उसके अधिकारियों की मंशा पर प्रश्न खड़े किए गए। केंद्र सरकार को कठघरे में खड़ा करने का प्रयास हुआ। परोक्ष रूप से प्रधानमंत्री मोदी को भी इस विवाद में शामिल करने का प्रयास हुआ। अदालत से पहले इंटरनेट मीडिया पर सक्रिय लोगों ने अपना निर्णय सुना दिया कि आर्यन बेगुनाह है। ये सोचने की जहमत नहीं उठाई कि अगर शाह रुख खान के बेटे को विशेष अदालत ने जमानत नहीं दी तो उसका कोई आधार होगा। उस न्यायाधीश के बारे में विचार नहीं किया गया जिसके फैसले पर पूरे देश की निगाहें टिकी थीं। ये भी नहीं सोचा गया कि मुंबई हाईकोर्ट ने तीन दिनों तक केस की दलीलों को क्यों सुना? केस के मेरिट पर बहस करना वकीलों और उसपर निर्णय सुनाना अदालत का काम है। ट्वीटरवीरों को धैर्य कहां है। वो तो अपने मन का फैसला सुनना चाहते हैं। अगर उनके मनमुताबिक निर्णय नहीं आया या किसी जांच एजेंसी का कोई कदम उनके हिसाब  नहीं है तो बगैर कुछ सोचे समझे आलोचना शुरु कर देते हैं। निर्णयात्मक टिप्पणियां करने लग जाते हैं। यह एक नया ट्रेंड है जो इंटरनेट मीडिया के ये अराजक मंच अपने उपयोगकर्ताओं को देते हैं। लोकतंत्र में आलोचना करने का अधिकार सभी नागरिकों को है, लेकिन उसका कोई आधार तो होना चाहिए। जब मंच ही अराजक होने की छूट देता है तो उपयोगकर्ता क्यों परहेज करें। 

इंटरनेट मीडिया के मंचों पर एक तीसरी प्रवृत्ति दिखाई देने लगी है। ये प्रवृति है समाज में जहर घोलने की कोशिश। जैसे ही शाह रुख खान का पुत्र गिरफ्तार होता है तो इस तरह के ट्वीट आने लगते हैं कि देश के मुस्लिम सुपरस्टार को तंग किया जा जा रहा है। मुस्लिम सुपरस्टार को चुप कराने की साजिश की जा रही है। अब ये प्रवृत्ति कितनी घातक है इसपर विचार किया जाना चाहिए। शाह रुख खान की कला का सम्मान इस देश के हिंदुओं ने भी किया। उन्होंने भी शाह रुख खान की फिल्में देखीं। शाह रुख खान को क्या सिर्फ मुसलमानों ने सुपरस्टार बनाया। क्या सिर्फ मुस्लिम दर्शक शाह रुख खान की फिल्मों के प्रशंसक हैं। बिना ये सोचे समझे कला को भी सांप्रदायिकता का शिकार बनाने की जो मानसिकता है वो भी इसी इंटरनेट मीडिया के मंच पर दिखाई देती है। इस तरह के ट्वीट से समाज बंटता है। समाज में वैमनस्यता फैलती है जो किसी भी तरह से न तो देशहित में है और न ही हमारे अपने हित में । इंटरनेट मीडिया के इन मंचों के अराजक स्वभाव को न तो देशहित की चिंता है और न ही समाज हित की। सांप्रदायिक सोच का खुले आम प्रकटीकरण और उस सोच को मुखर और मौन दोनों तरह का समर्थन मिलता है। क्या इंटरनेट मीडिया के उपयोगकर्ताओं ने कभी ये सोचा कि किसी भी कला को हिंदू मुसलमान में विभक्त करके वो कितना बड़ा अपराध कर रहे हैं। नहीं सोचा। सोचने का समय आ गया है। 

इंटरनेट मीडिया खासकर ट्वीटर पर इन दिनों कुछ लोग अति सक्रियता के शिकार भी नजर आते हैं। छोटी छोटी बातों पर कैंपेन चला देना और फिर संबंधित व्यक्ति या समूह  कंपनी पर हमलावर अंदाज में अपनी बातें करना इसी अति सक्रियता का उदाहरण है। ऐसे कई छोटे छोटे समूह खासतौर पर ट्वीर पर देखे जा सकते हैं जो हर दिन ये ढूंढते हैं कि आज क्या ट्रेंड करवाया जाए। इस अति सक्रियता से कई बार नकारात्मकता का भाव सामने आता है। एक ऐसा नकार जो समाज और देश हित में नहीं होता। लेकिन ट्रेंड करवाने वाले इन समूहों को इसका भान नहीं होता है कि उनके तथाकथित कैंपेन का असर कितना गहरा होता है। पिछले दिनों एक विज्ञापन एजेंसी के बड़े अधिकारी से बात हो रही थी तो उन्होंने बताया कि अब तो विज्ञापन एजेंसियां क्रिएटिव बनाते समय कई बार इस बात को ध्यान में रखकर काम करती हैं कि ये विवादित होगा कि नहीं। कई बार जानबूझ कर विवाद पैदा करनेवाले विज्ञापन बनाए जाते हैं। ट्वीटर पर अतिसक्रिय समूह बहुधा इस तरह के विज्ञापनों को लेकर हो हल्ला मचाने लगते हैं और विज्ञापन एजेंसी का काम पूरा हो जाता है। फिल्मों और वेब सीरीज को लेकर इस तरह के विवादित कैंपेन आपको ट्वीटर पर नियमित अंतराल पर देखने को मिलते हैं। किसी कार्यक्रम में किसी को बुलाने को लेकर आए दिन हो हल्ला मचता ही रहता है। किसी समिति में किसी के नामांकन पर भी पक्ष विपक्ष में टीका टिप्पणी होती ही रहती है।  इसके अलावा इन दिनों इंटरनेट मीडिया पर धर्म को लेकर भी तरह तरह की टिपणियां देखने को मिलती हैं। कई बार कट्टर हिंदू जैसे शब्द भी पढने को मिलते हैं। हिंदू और कट्टरता दोनों नदी के दो किनारे हैं जो कभी मिल ही नहीं सकते। हिंदू विचार  या हिंदू दर्शन से अनभिज्ञ लोग इस तरह की शब्दावली का उपयोग कर खुद को हास्यास्पद बनाते हैं। ट्वीटर पर कोई छोटा मोटा कैंपेन भी चलता है तो ट्विटर पर सक्रिय लोगों का उत्साह देखते ही बनता है। वो ये भूल जाते हैं कि एक सौ तीस करोड़ से अधिक आबादी वाले इस देश में ट्वीटर पर सिर्फ सवा दो करोड़ लोग सक्रिय हैं। फेसबुक पर करीब चौंतीस करोड़। इसमें भी कितने लोग सक्रिय हैं वो देखने पर संख्या और कम हो जाती है। इसलिए ट्वीटर और फेसबुक पर चलनेवाली बहसों का इसका कोई अखिल भारतीय प्रभाव होता होगा, इसमें संदेह है। 


Saturday, May 12, 2018

विभाजन, युद्ध और प्यार की फिल्में


हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के बंटवारे के बाद से दोनों देशों के बीच का रिश्ता ऐसा है जो एक दूसरे मुल्क की रचनात्मकता को भी गहरे तक प्रभावित करता रहा है। साहित्य, कला, संगीत, फिल्म में इस रिश्ते और उसके साथ साथ घटित होनेवाली घटनाओं पर बहुतायत में लिखा और रचा गया है। दोनों देशों की आवाम से लेकर वहां के हुक्मरानों के बीच एक ऐसा रिश्ता है जिसमें नफरत और प्यार दोनों दिखाई देता है। विभाजन पर भीष्म साहनी ने ‘तमस’ जैसा उपन्यास लिखा तो इंतजार हुसैन ने भी दोनों देशों के रिश्तों पर कई बेहतरीन कहानियां लिखीं।कई पाकिस्तानी शायरों को भारत में ज्यादा पाठक मिले तो लता मंगेशकर और मुहम्मद रफी के दीवाने पाकिस्तान में भी हैं। यह सूची बहुत लंबी है। लेकिन हाल के दिनों में पाकिस्तान ने जिस तरह से भारत की सरजमीं पर नफरत और आतंक को अंजाम देना शुरू किया तो उसके बाद से ये रिश्ता प्यार का कम नफरत का ज्यादा हो गया। लगभग हर दिन भारतीय सीमा पर पाकिस्तान की तरफ से गोलीबारी, भारतीय फौज पर हमले, कश्मीर में आतंकवादियों के मार्फत अपने नापाक मंसूबों को अंजाम देने की कोशिशों ने पाकिस्तान को एक ऐसे पड़ोसी में तब्दील कर दिया जिससे एक दूरी जरूरी हो गई। पाकिस्तानी कलाकारों का आतंक की घटनाओं पर चुप रहना भारतीयों को उद्वेलित करता रहता है। इसका खामियाजा भी उन कलाकारों को भुगतना पड़ा।
पाकिस्तान के साथ बदलते रिश्तों का प्रकटीकरण हिंदी फिल्मों में भी देखने को मिलता है, कभी प्रत्यक्ष तो कभी परोक्ष रूप से । इस पार और उस पार के प्यार की कई दास्तां रूपहले पर्द पर आई। दोनों देशों के बीच लड़े गए युद्ध को लेकर भी कई फिल्में बनीं, चाहे वो 1965 का युद्ध हो या फिर 1971 का युद्ध या फिर करगिल युद्ध हो। इसके अलावा दोनों देशों के विभाजन की आड़ में सांप्रदियकता और महिलाओं पर होनेवाले अत्याचार पर भी कई फिल्में बनीं। दोनों देशों के तनावपूर्ण रिश्तों और युद्ध के माहौल में जासूसों की अहम भूमिका है। रॉ और इंटेलिजेंस ब्यूरो जैसी संस्थाओं के जाबांजों को केंद्र में रखकर भी लगातार फिल्में बनीं और बन भी रही हैं। इन फिल्मों में से कई फिल्में तो उपन्यासों पर भी बनीं। अभी अभी रिलीज हुई फिल्म ‘राजी’ भी सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट कमांडर हरिंदर एस सिक्का के उपन्यास ‘कॉलिंग सहमत’ पर बनी है। इस फिल्म में एक कश्मीरी लड़की की शादी पाकिस्तान फौज के आला अफसर के बेटे से होती है जो खुद पाकिस्तानी फौज में अफसर होता है। कश्मीरी लड़की का नाम सहमत है और इसकी भूमिका निभाई है आलिया भट्ट ने। सहमत पाकिस्तान फौज के उस आला अफसर के घर में बहू बनकर रहती है, परिवार का दिल जीतती है लेकिन वो दरअसल होती है रॉ की एजेंट जो अपने वतन के लिए अपनी जान खतरे में डालकर, अपना सबकुछ दांव पर लगाकर ये काम करने को राजी होती है। दिल्ली युनिवर्सिटी की एक मासूम सी लड़की वतन पर कुर्बान होने की अपनी पारिवारिक विरासत को आगे बढ़ाती है। कहा जा रहा है कि ये एक सच्ची कहानी है। आलिया ने अपने शानदार अभिनय से इस किरदार को एक ऊंचाई दी है। फिल्म के आखिरी हिस्से में ‘रॉ’ के ऑपरेशन में उसका पति मारा जाता है, तब वो दोनों देशों के बीच जाकी हिंसा और उसको रास्ते में आनेवाले लोगों को मार डालने की एजेंसियों की ट्रेनिंग को अंजाम देने के काम से ऊब चुकी होती है। अपने मिशन में कामयाब होकर जब सहमत वापस अपने मुल्क लौटती है तो उसे पता चलता है कि वो गर्भवती है। अस्पताल के बेड पर बैठी सहमत कहती है कि वो अपना गर्भ नहीं गिराएगी क्योंकि वो और कत्ल नहीं करना चाहती है। यह वाक्य बहुत कुछ कह जाता है। कहानी बहुत अच्छी है जिसका ट्रीटमेंट भी सधा हुआ है, गुलजार के गीत है, उनका बेटी मेघना का निर्देशन है। पूरी फिल्म के दौरान एक रोमांच बना रहता है कि आगे क्या? किसी भी कहानी की सफलता यही होती है कि पाठक या दर्शक को हमेशा ये लगता रहे कि आगे क्या होगा। नामवर सिंह ने इस आगे क्या जानने की पाठकों की उत्सकुता को कहानी की विशेषता बताया था। उनका मानना है कि कहानी ही पाठकों को आगे देखने या चलने के लिए प्रेरित करती है जबकि कविता तो पीछे लेकर जाती है । अगर अच्छी कविता होती है तो उसके पाठ के बाद श्रोता कवि से एक बार फिर से उन पंक्तियों को दुहराने को कहते हैं। नामवर सिंह के इस कथन के आलोक में अगर देखें तो फिल्म ‘राजी’ दर्शकों को जबरदस्त सस्पेंस से गुजारती है। हर वक्त दर्शकों के मन में ये चलता रहता है कि अब सहमत के साथ क्या होगा, उसको लेकर एक डर बना रहता है।यह उत्सकुकता अंत तक बनी रहती है।   
हिंदी फिल्मों में भारत-पाकिस्तान के विभाजन और उसमें हिंदू मुस्लिम, पारसी, सिख परिवारों के द्वंद पर भी कई फिल्में आईं। भारत पाकिस्तान विभाजन को केंद्र में रखते हुए और उसके वजहों को दर्शाती पहली फिल्म मानी जाती है ‘धर्मपुत्र’ ।ये फिल्म यश चोपड़ा ने बनाई थी और 1961 में रिलीज हुई थी। ये फिल्म आचार्य चतुरसेन शास्त्री की इसी नाम की कृति पर आधारित थी। ये फिल्म कट्टरता, सांप्रदायिकता आदि आदि को शिद्दत से रेखांकित करती है।ये पारिवारिक फिल्मी कहानी है जिसमें दो परिवारों का द्वंद सामने आता है। इसके बाद एक फिल्म इस्मत चुगताई की कहानी पर आई ‘गरम हवा’। ये फिल्म काफी चर्चित रही थी और उसको काफी प्रशंसा और पुरस्कार दोनों मिले थे। इसको एस एस सथ्यू ने निर्देशित किया था। इस फिल्म को कला फिल्मों की शुरुआत के तौर पर भी माना जाता है। फिल्म भले ही आगरा के इर्द गिर्द है लेकिन इसका व्यापक फलक भारत-पाकिस्तान रिश्ता और बंटवारे के बाद का द्वंद है। साहित्यक कृतियों पर बनने वाली इस तरह की फिल्मों की एक लंबी सूची है । भीष्म साहनी के बेहद चर्चित उपन्यास ‘तमस’ पर इसी नाम से अस्सी के दशक में टेली-फिल्म का निर्माण हुआ था। इस फिल्म में भारत विभाजन के बाद हिंदू और सिख परिवारों की यंत्रणाएं चित्रित हुई थीं। खुशवंत सिंह के उपन्यास ‘ट्रेन टू पाकिस्तान’ पर इसी नाम से फिल्म बनी थी। इसमें भी विभाजन की त्रासदी है।  
विभाजन के बाद भारत पाकिस्तान में हुए युद्ध पर भी कई फिल्में बनीं। फिल्म ‘राजी’ जिस तरह से 1971 के भारत पाकिस्तान युद्ध की पृष्ठभूमि पर है इसी तरह सत्तर के दशक के शुरुआती वर्ष में चेतन आनंद ने ‘हिन्दुस्तान की कसम’ के नाम से एक फिल्म बनाई थी। इस फिल्म में 1971 के युद्ध के दौरान भारतीय वायुसेना के शौर्य को दिखाया गया था। इस फिल्म में वायुसेना के वेस्टर्न सेक्टर के अभियान ‘ऑपरेशन कैक्टस लिली’ को केंद्र में रखा गया था। इसी नाम से एक और फिल्म बनी थी जिसमें अजय देवगन और अमिताभ बच्चन थे। आमतौर पर माना जाता है कि भारत पाकिस्तान युद्ध या दोनों देशों के रिश्तों पर बनी हिंदी फिल्में अच्छा कारोबार करती हैं लेकिन इन दोनों फिल्मों ने औसत कारोबार किया था। दूसरी बार बनी ‘हिन्दुस्तान की कसम’ को तो बंपर ओपनिंग मिली थी लेकिन वो अपनी सफलता को कायम नहीं रख पाई थी।
विभाजन की विभीषिका और भारत पाक युद्ध के अलावा दोनों देशों के प्रेमी-प्रमिकाओं को केंद्र में रखकर भी दर्जनों फिल्में बनीं। सनी देवल की ‘गदर एक प्रेम कथा’ जाट सिख लड़के और एक मुस्लिम लड़की के प्रेम पर आधारित एक्शन फिल्म थी। इस फिल्म को भी लोगों ने काफी पसंद किया था। इसी तरह से यश चोपड़ा की फिल्म ‘वीर जारा’ भी लोगों को खूब पसंद आई। इसमें एक एयरफोर्स अफसर वीर को पाकिस्तानी लड़की जारा से प्रेम हो जाता है। तमाम मुश्किलों और बाधाओं के बाद भी दोनों मिल जाते हैं। नफरत पर प्रेम की जीत का संदेश। सलमान खान ने भी कई फिल्में की। ‘बजरंगी भाई जान’ में एक पाकिस्तानी लड़की जो भटक कर हिन्दुस्तान आ जाती है उसको उसके घर तक पहुंचाने के लिए पवन कुमार चतुर्वेदी, जिसकी भूमिका सलमान ने निभाई है, जान की बाजी लगा देता है। अंत में फिर नफरत पर प्यार की जीत। कबीर खान की इस फिल्म को जमकर दर्शक मिले। कबीर खान ने ही ‘एक था टाइगर’ बनाई जिसमें एक भारतीय एजेंट महिला पाकिस्तानी एजेंट से प्यार हो जाता है। इसका सीक्वल भी बना, ‘टाइगर जिंदा है’। इसमें तो उत्साही निर्देशक ने रॉ और पाकिस्तान का बदनाम खुफिया एजेंसी आईएसआई को साथ ऑपरेशन करते भी दिखा दिया, जो कल्पना की हास्यास्पद परिणति है। नफरत पर प्यार की जीत दिखाने के चक्कर में इस तरह की हास्यास्पद स्थितियों के चित्रांकन से बचना चाहिए अन्यथा दर्शकों का विवेक फिल्म को नकार भी सकता है।

Friday, December 30, 2016

‘रईस’ और ‘काबिल’ की जंग

शाहरुख खान अपनी फिल्म ‘रईस’ की रिलीज के पहले राज ठाकरे के दरबार में मत्था टेकने को लेकर विवाद से उबरे भी नहीं थे कि एक दूसरा विवाद खड़ा हो गया है । दो हजार सोलह ने जाते जाते बॉलीवुड में रिलीज वॉर का एलान कर दिया है । शाहरुख खान की फिल्म ‘रईस’ को छब्बीस जनवरी को रिलीज करना तय हुआ था । ‘रईस’ की रिलीज डेट को देखते हुए राकेश रोशन ने अपने बेटे की फिल्म ‘काबिल’ को ‘रईस’ के एक दिन पहले यानि पच्चीस जनवरी को रिलीज करने का एलान कर दिया था । हाल ही में जब ‘रईस’ का ट्रेलर रिलीज किया जा रहा था तो फिल्म के निर्माता ने ‘रईस’ की रिलीज डेट को भी गणतंत्र दिवस के एक दिन पहले यानि पच्चीस जनवरी कर दिया । अब इस खबर के बाहर आते ही राकेश रौशन आगबूबूला हो गए । अपने बेटे ऋतिक की डूबती नैया को पार लगाने के लिए उनको ‘काबिल’ से बड़ी उम्मीदें थी लेकिन किंग खान की लोकप्रियता को देखते हुए अब उनको डर सताने लगा है । उन्होंने बड़े तल्ख अंदाज में कहा कि वो जो भी डेट तय करते हैं ‘रईस’ वाले उसका ही पीछा करने लग जाते हैं । राकेश रोशन ने कहा कि वो फिल्मों के पुराने स्कूल ऑफ थॉट्स के हैं जहां दूसरे फिल्मकारों की रिलीज डेट से टकराने की सोच कभी नहीं रही । राकेश रोशन का कहना था कि उनकी फिल्म तो तैयार है और वो चाहते तो ‘दंगल’ से या फिर ‘बेफिके’ के साथ ‘काबिल’ को रिलीज कर सकते थे लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया । दरअसल राकेश रोशन को दो हजार सात का वाकया याद होगा जब शाहरुख खान की फिल्म ‘मोहब्बतें’ और ऋतिक की फिल्म ‘मिशन कश्मीर’ एक साथ रिलीज हुई थी । उस वक्त विधु विनोद चोपड़ा ने ‘मोहब्बतें’ के साथ ही ‘मिशन कश्मीर’ को रिलीज करने का फैसला लिया था जो उनके लिए घातक साबित हुआ था और ऋतिक और प्रीति जिंटा की जोड़ी भी उस फिल्म को नहीं बचा पाई थी ।    
दरअसल वॉलीवुड में ये माना जाता है कि किंग खान की फिल्मों से पंगा लेना आसान नहीं होता है । उनके साथ रिलीज होनेवाली ज्यादातर फिल्में फ्लॉप ही होती रही हैं । दो हजार सात में भी जब शाहरुख की फिल्म ‘ओम शांति ओम’ के सामने रणबीर कपूर और सोनम की डेब्यू फिल्म ‘सांवरिया’ रिलीज हुई थी तो उसने बॉक्स ऑफिस पर पानी भी नहीं मांगा था । जबकि ‘सांवरिया’ के साथ ये दो डेब्यू स्टार के अलावा संजय लीला भंसाली जैसा डायरेक्टर भी था । दो हजार छह में सलमान और शाहरुख की फिल्मों में भी मुकाबला हुआ था जब ‘डॉन’ और ‘जानेमन’ एक साथ रिलीज हुई थी । तब भी किंग खान ही भारी पड़े थे और सलमान और अक्षय मिलकर भी फिल्म ‘जानेमन’ को बचा नहीं पाए थे । किंग खान के सामने कोई टिक नहीं पाता है । दो हजार चार में अक्षय कुमार की फिल्म ‘एतराज’ और शाहरुख की ‘वीर जारा’ एक साथ रिलीज हुई थी । ‘एतराज’ की स्टोरी सॉलिड थी और प्रियंका चोपड़ा और अक्षय कुमार की जोड़ी उन दिनों चर्चा में भी थी, बावजूद इसके ‘वीर जारा’ ने अपनी कामयाबी का परचम लहरा दिया क्योंकि उस वक्त किंग खान का जादू दर्शकों के सर चढ़कर बोलता था । शाहरुख खान ने तो अमिताभ बच्चन और गोविंदा को भी पछाडा था जब ‘बड़े मियां छोटे मियां’ रिलीज हुई थी तो उसी दिन शाहरुख और काजोल की फिल्म ‘कुछ कुछ होता है’ रिलीज हुई थी । ‘कुछ कुछ होता है’ ने डेविड धवन,गोविंदा और अमिताभ बच्चन की तिकड़ी को बहुत पीछे छोड़ दिया था । राकेश रोशन को इस इतिहास का ज्ञान है लिहाजा वो इस बात से घबराए हुए हैं कि अगर ‘रईस’ और ‘काबिल’ एक साथ रिलीज हुई  तो ‘काबिल’ का क्या हश्र होगा ।
बॉलीलुड में रिलीज वॉर होते रहे हैं । अभी कुछ महीनों पहले ‘शिवाय’ और करण जौहर की फिल्म ‘ऐ दिल है मुश्किल’ को लेकर बड़ा विवाद उठा था । अजय देवगन और करण जौहर के झगड़े के बीच कमाल खान कूद पड़े थे । पैसों के लेनदेन की बातें भी हुई थी । कई बार तो ये झगड़े फिल्मों की पब्लिसिटी को लेकर भी उटाए जाते हैं । जैसे किसी जमाने के फ्लॉप एक्टर रहे कमाल खान का अजय देवगन और कपण जौहर के झगड़े में कूदना किसी की समझ में नहीं आया था । या तो कमाल खान ने पैसे के लिए वो विवाद खड़ा किया था या फिर फिल्म को पब्लिसिटी दिलाने के लिए ये खेल खेला गया था । हलांकि ‘शिवाय’ ने भी अच्छा बिजनेस किया लेकिन वो ‘ऐ दिल है मुश्किल से’ कमाई के मामले में पिछड़ गई और फायदा करण जौहर की फिल्म को हो गया । अजय देवगन पहले भी अपनी फिल्म के रिलीज के डेट्स को लेकर आदित्य चोपड़ा से भिड़ चुके हैं । दो हजार बारह की बात है जब अजय की फिल्म ‘सन ऑफ सरदार’ और आदित्य चोपड़ा की फिल्म ‘जबतक है जान’ की रीलिज डेट टकरा गई थी तब भी अजय नाराज हो गए थे । उन्होंने आरोप लगाया था कि उनकी फिल्म को कम स्क्रीन मिल रहे हैं । उस वक्त भी मामला कोर्ट तक पहुंचा था ।
रिलीज को लेकर तो अमिताभ बच्चन की आईक़निक फिल्म ‘शोले’ का टकराव ‘जय संतोषी मां’ से हुआ था । ‘जय संतोषी मां’ बेहद हिट रही थी और ‘शोले’ शुरुआत में पिट गई थी । उस वक्त जब ‘शोले’ की समीक्षा छपी थी तो एक लेख का शीर्षक था- शोले जो भड़क ना सका । ‘जय संतोषी मां’ ने तो इतिहास ही रच दिया था । फिल्मों की डेट पहले अनाउंस हो जाती है तो फिर निर्माता क्यों नहीं एडजस्ट करते हैं । जैसे पहले ये खबर आई थी कि सलमान की ‘सुल्तान’ और शाहरुख की ‘रईस’ ईद के मौके पर रिलीज होगी लेकिन शाहरुख ने होशियारी दिखाई और ‘रईस’ की रिलीज डेट का टाल दिया । शाहरुख का पता है कि इस वक्त सलमान की फिल्में उनसे ज्यादा चल रही हैं लिहाजा उन्होंने ‘डॉन’ और ‘जानेमन’ की टक्कर में ‘डॉन’ की जीत को भुलाकर अपनी फिल्म की रिलीज टाल दी । नए साल में ये देखना दिलचस्प होगा कि ‘रईस’ शाहरुख की सफलता के इतिहास को दोहराते हुए ‘काबिल’ को पटखनी देता है या फिर ऋतिक रौशन, शाहरुख के विजय रथ को रोक देते हैं ।   


Friday, December 16, 2016

निगेटिव रोल वाले एक्टर से तौबा

हाल ही में रिलीज रणवीर सिंह की फिल्म बेफिक्रे में जिस तरह से फिल्म की हिरोइन बोल्ड सीन्स देती है या फिर हीरो के साथ इंटीमेट होती है उससे लगता है कि अब फिल्में में हिरोइनें सबकुछ करने के लिए तैयार हैं । एक जमाना था जब दर्शकों को सेड्स करने के लिए हिंदी फिल्मों में वैंपिस कैरेक्टर हुआ करती थी । गाउन में बॉडी एक्सपोजर के साथ हेलेन के लटकों झटकों को कौन भूल सकता है । कम कपड़ों में डांस करनेवाली उस पात्र को लेकर दर्शक खासे उत्साहित रहा करते थे । इसी तरह से अभिनेत्री बिंदू को अब भी लोग याद करते हैं उनकी बोल्ड सीन्स और खास मौकों पर निचले होठ को दांत से काटने की अदा को । ये दौर हिंदी फिल्मों में बहुत लंबे समय तक चला । बाद में जयश्री टी ने भी इस परंपरा को आगे बढ़ाने की कोशिश की लेकिन तबतक इस तरह के बोल्ड और निगेटिव रोल के लिए अलग से किसी कलाकार को रखने की जरूरत होती थी । ये वो दौर था जब फिल्मों की हिरोइनें निगेटिव रोल को लेकर बेहद सतर्क रहती थीं । उनको लगता था कि अगर वो निगेटिन रोल करेंगी तो समाज में उनकी छवि दरक जाएगी जिसका आगे चलकर उनको नुकसान होगा । लिहाजा फिल्मकारों को अपनी फिल्म के लिए अलग से एक बिंदास या बुरी लड़की की इमेज वाली अभिनेत्री को रखना पड़ता था । बाद में धीरे-धीरे ये परंपरा टूटने लगी । हिरोइनें बोल्ड होने लगीं, उनको अंग प्रदर्शन से परहेज नहीं रहा, उनके शरीर पर कपड़े कम होने लगे, वो डिस्को में हीरो के साथ बिंदास अदा के साथ डांस करती नजर आने लगीं । जब हिरोइनें ये करने लगीं तो इसको आइटम सांग कहा जाने लगा । शुकुआत में इन आइटम नंबर के लिए भी बिंदास बालाओं को रखा गया लेकिन मुख्य किरदार निभाने वाली हिरोइनें ही इस तरह की भूमिका के लिए तैयार होने लगीं या फिर टॉप की हिरोइन भी आइटम नंबर के लिए तैयार होने लगी । दर्शकों को मैं तो यूपी बिहार लूटने आई में शिल्पा शेट्टी की दिलकश अदा अब भी याद हैं । जब शिल्पा ने शेट्टी ने फिल्म शूल में इस गाने पर परफॉर्म किया तो वो अपने करियर के शिखर पर थीं । बाद में तो करीना कपूर और कटरीना कैफ जैसी टॉप की हिरोइन्स ने आइटम करना शुरू कर दिया । चिकनी चमेली से लेकर पटाइले सैंया मिस्ड कॉल से । इसके अलावा भी करीना और कटरीना कैफ कई आइटम सांग पर थिरकती नजर आईं । जब दो हजार ग्यारह में डर्टी पिक्चर रिलीज हुई तो विद्या बालन के रोल ने अबतक के तमाम टैबू को खत्म कर दिया । उ लाला उ लाला में जब वो नसीरुद्दीन शाह के साथ ट्राली पर थिरकती हैं तो उसका ही एक डॉयलॉग जेहन में आता है फिल्म का मतलब – एंटरटेनमेंट, एंटरटेनमेंट और सिर्फ एंटरटेनमेंट ।

ये तो रही बोल्ड गानों की बात लेकिन ऐसा क्या हुआ कि हिंदी फिल्मों की हिरोइनें निगेटिव रोल भी करने लगीं । दरअसल जब काजोल की फिल्म गुप्त जब उन्नीस सौ सत्तानवे में रिलीज हुई तो उसने बॉक्स ऑफिस पर जबरदस्त सफलता हासिल की । इस फिल्म में काजोल निगेटिव रोल में थी और उनके साथ मनीषो कोइराला और बॉबी देयोल थे लेकिन इसको काजोल की फिल्म मानी गई । इस फिल्म की सफलता ने बॉलीवुड की हिरोइंस को निगेटिव रोल की तरफ कदम बढ़ाने का रास्ता खोल दिया । उसके बाद तो जैसे फिल्मों की हिरोइनों को किसी तरह के रोल से परहेज ही नहीं रहा । लेकिन इसका नतीजा यह हुआ है कि हिंदी फिल्मों में हेलेन और बिंदू जैसी अभिनेत्रियों के लिए जगह ही खत्म हो गई । आर्थिक उदारीकरण की बयार के बाद तो हिंदी फिल्मों में भी उदारीकरण का दौर शुरू हो गया और उसको सबसे पहले अपनाया हिंदी फिल्मों की हिरोइंस ने । ऐसा नहीं है कि हिंदी फिल्मों से सिर्फ खलनायिकाओं की भूमिका खत्म हुई बल्कि अब तो विशेषज्ञ खलनायकों की भी कमी महसूस की जाती है । हिंदी फिल्मों में खलनायकों की एक लंबी परंपरा रही है । जिसके चरिए और कमीनापन में वक्त के साथ साथ बदलाव देखने को मिलता रहा है ।  जीवन जैसे खलनायक के बाद प्रेम चोपड़ा, अमरीश पुरी, कुलभूषण खरबंदा जैसे खलनायकों का दौर रहा । इन सबके बीच प्राण साहब को कोई कैसे भूल सकता है जिन्होंने अपनी खलनायकी की भूमिका से  से फिल्मों को एक नई मुकाम दी । आज से चार दशक पहले फिल्म शोले में रमेश सिप्पी ने जिस गब्बर सिंह के किरदार को पेश किया था वो किरदार कई फिल्मों में मजबूती के साथ खड़ा रहा लेकिन बाद में उसकी भूमिका भी कम होती चली गई । इसके साथ कादर खान, शक्ति कपूर और गुलशन ग्रोवर ने भी अपनी अदायगी और फिल्मी पर्दे की बदमाशियों की वजह से दर्शको के बीच सोकप्रियता हासिल की । जब अस्सी के दशक की शुरुआत में फिल्म जितेन्द और श्रीदेवी फिल्म तोहफा रिलीज हुई थी तो उस फिल्म के साथ शक्ति कपूर एक जुमला आउउ भी लोगों की जुबान पर चढ़ गया था । किसी भी किरदार की सफलता उसके संवाद के लोगों की दुबान पर चढ़ जाने से आंकी जा सकती है । फिल्म शोले के बाद गब्बर और कालिया के बीच का संवाद खूब दोहराया जाता था । उसके बाद लंबे समय तक जो भी फिल्में आईं उसमें अमरीश पुरी, कादर खान और गुलशन ग्रोवर की उपस्थिति लगभग आवश्यक रहती थी । लेकिन धीरे –धीरे नायक और खलनायक के बीच का भेद भी खत्म होने लगा था । शाहरूख खान की फिल्म बाजीगर का कैरेक्टर, फिल्म वास्तव में संजय दत्त का कैरेक्टर, अजनबी में अक्षय कुमार की भूमिका इस दीवार को तोड़ने की बुनियाद रख रहा था । धीरे धीरे ये हुआ कि फिल्मों से खलनायक गायब होते चले गए । उधर सलमान खान की फिल्मों में जो खलनायक होते हैं उनके लिए पिटने के अलावा करने के लिए कुछ और होता नहीं है लिहाजा नए अभिनेताओं ने उस ओर जाने में कोई रुचि नहीं दिखाई । फिल्मकारों को भी नायकों के तौर पर नए खलनायक मिलने लगे तो उन्होंने भी हिरोज़ से इस तरह के रोल करवाने शुरू कर दिए ।

Saturday, July 2, 2016

बयानों से बेनकाब चेहरे

फिल्म अभिनेता इरफान खान अपनी फिल्म मदारी के प्रमोशन में निकले थे और उस दौरान दिए उनके एक बयान से बवंडर खड़ा हो गया । दरअसल इरफान खान ने बकरीद के मौके पर बकरों की कुर्बानी पर सवाल खड़ा किया था । इरफान खान ने कहा कि दो बकरे खरीद कर उसका वध कर देना कोई कुर्बानी नहीं है । इससे कोई पुण्य नहीं मिलनेवाला है । कुर्बानी का अर्थ है कि हम अपनी कोई प्रिय वस्तु किसी को दे दें, जिसके साथ हमारा प्यार का संबंध हो । इरफान के इस बयान के बाद बवाल मच गया और कई मुस्लिम उलेमाओं और धर्मगुरुओं ने इरफान के बयान की लानत मलामत शुरू कर दी । एक मौलाना ने कहा कि इरफान को इस्लाम की जानकारी नहीं है और वो अपनी अज्ञानता में इस तरह के बयान दे रहे हैं । इरफान का जिस तरह से विरोध हो रहा है उसको देखते हुए लगता है कि आनेवाले दिनों में उनके खिलाफ फतवा भी जारी हो जाए । इरफान खान ने जो कहा है उसको लेकर गंभीर चर्चा के बगैर खारिज कर देना उचित नहीं होगा । इस्लाम में कुर्बानी की प्रथा बहुत पुरानी है और शरीयत के मुताबिक सबसे प्यारी चीज की कुर्बानी का प्रावधान है । इरफान भी यही कह रहे हैं । लेकिन विवाद की शुरुआत तब हुई जब इरफान ने बकरीद के ठीक पहले ये बयान दे दिया कि बकरीद में दो बकरों को खरीद कर उसकी कुर्बानी के पुण्य नही मिलता है । दरअसल बकरीद पर बकरों की बलि की परंपरा बहुत पुरानी है और उस दिन कुर्बान किए गए बकरों का एक तिहाई जरूरतमंदों को, एक तिहाई दोस्तों को और तोहफे के तौर पर देने का रिवाज रहा है । बाकी बचा एक तिहाई हिस्सा कुर्बानी देनेवाला खुद रखता है । खैर हम इस परंपरा में औरर उसके पालन करनेवालों की श्रद्धा में नहीं उलझना चाहते हैं । सवाल यही है कि अगर इरफान खान ने कोई सवाल उठाया है तो बजाए उसकी लानत मलामत करने के उसपर विमर्श होना चाहिए । जिन भी उलेमाओं को उनके इस कथन से विरोध है वो अपनी बात तर्कों के साथ रखें । इरफान को मूर्ख और मूढ़ कहने और उनके खिलाफ आग उगलने से वही होगा जो इरफान अपेक्षा कर रहे थे । धर्मगुरुओं के विरोध पर इरफान खान ने अपने तेवर और सख्त कर लिए हैं । उन्होंने साफ तौर पर कहा कि वो धर्मगुरुओं से डरनेवाले नहीं हैं । इरफान ने ट्वीट किया- ‘प्लीज भाइयो जो मेरे बयान से नाराज हैं वो या तो आत्मविश्लेषण करने को तैयार नहीं हैं या निष्कर्ष पर पहुंचने की जल्दबाजी में हैं ।‘ इरफान ने आगे लिखा कि – ‘मेरे लिए धर्म निजी आत्मविश्लेषण की तरह है, यह मेरे लिए दया, विवेक और संयम का स्त्रोत है ना कि रूढ़िवादिता और कट्टरवाद का । धर्मगुरू मुझे डरा नहीं सकते हैं । थैंक गॉड में ऐसे देश में नहीं रहता हूं जिसे धर्म के ठेकेदार चलाते हैं ।‘ इरफान ने अपने इस ट्वीट में कई सारी ऐसी बातें कह दीं जो कि विचार करने को मजबूर करती है ।  
इरफान ने साफ तौर पर कहा है कि धर्म बेहद निजी मामला है लेकिन उसमें विरोधाभास दिखाते हुए वो धर्म को लेकर, उसकी परंपराओं को लेकर सार्वजनिक तौर पर अपनी बातें भी रख रहे हैं । संभव है कि वो अपने धर्म की कुछ बातों पर अपनी आपत्ति दर्ज करवाकर उसमें बदलाव की ख्वाहिश रखते होंगे । बकरों की कुर्बानी पर दिए उनके बयान को इस आलोक में देखा जाना चाहिए। लेकिन धर्मगुरुओं को नाराज होने और इरफान को उलजलूल कहने का हक क्यों होना चाहिए । जब इरफान पर हमले हो रहे हैं तो सवाल उठता है कि इस वक्त अभिव्यक्ति की आजादी के झंडाबरदार कहां हैं । समाज में बोलने की आजादी के अधिकार के निरंतर ह्रास को लेकर छाती कूटनेवाला समुदाय इस वक्त इरफान के पक्ष में क्यों नहीं मजबूती से खड़ा हो रहा है । इरफान को जिस तरह से घेरने की कोशिश की जा रही है उसको लेकर उसके पक्ष में कहीं से किसी तरह की हलचल दिखाई नहीं दे रही है । देश में असहिष्णुता को लेकर बयान देनेवाले शाहरुख खान भी बॉलीवुड के अपने साथी कलाकार इरफान के पक्ष में खड़े दिखाई नहीं देते । शाहरुख खान को इरफान को चुप करवा देने की कोशिशों में कोई असहिष्णुता अबतक नजर नहीं आई है । उन दिनों जब देश में असहिष्णुता के मुद्दे पर अवॉर्ड वापसी का कोलाहल था और उसके पक्ष विपक्ष में तर्क दिए जा रहे थे तब शाहरुख खान ने ट्वीट किया था कि – ‘लोग बगैर सोचो समझे बयानबाजी करते हैं । धार्मिक असहिष्णुता...और इस देश में धर्मनिरपेक्ष नहीं होना एक देशभक्त के तौर पर सबसे बड़ा अपराध है ।‘ शाहरुख की बात सही है लेकिन अब जब इरफान ने जब इस्लाम की परंपरा पर सवाल खड़ा किया है और चंद मुस्लिम उलेमाओं द्वारा उनको खामोश करने की कोशिश हो रही है, तो पूरे देश को शाहरुख के उसी तरह के ट्वीट का इंतजार है । अगर धार्मिक असहिष्णुता उस वक्त गलत थी तो अब भी गलत होनी चाहिए । क्या धार्मिक असहिष्णुता का सवाल सिर्फ हिंदू कट्टरपंथियों के बयानों पर ही दिखाई देने लगता है । इसी तरह से बहुत संभव है कि आमिर खान को इरफान की आलोचनाओं के बाद भी डर नहीं लग रहा होगा और वो अपनी पत्नी से देश में डर लगने जैसी बातचीत नहीं कर रहे होंगे क्योंकि ये इस्लाम से जुड़ा मामला है । अगर ऐसा होता तो आमिख खान जरूर सामने आते और अपनी मन की बात को सामने रखते । तो क्या ये मान लिया जाए कि इस्लाम की परंपराओं की बात आते ही समाज के ये नायक खामोश हो जाते हैं । उनका ना तो देश में डर लगता है और ना ही देश की फिजां में कोई बुराई नजर आती है । मेरा मानना है कि ये मामला चूंकि एक धर्म विशेष से जुड़ा है लिहाजा हर कोई खामोशी की चादर ओढ़ कर सुविधा की नींद सो रहा है । अगर यही मामला हिंदी धर्म से जुड़ा होता तो अभिव्यक्ति की आजादी के चैंपियन अबतक उछलकूद मचा रहे होते । सवाल यही है कि क्या इरफान को भारतीय संविधान अभिव्यक्ति की आजादी नहीं देता है । क्या इरफान खान क खिलाफ मुस्लमि धर्मगुरुओं को लेकर दिए जानेवाले बयानों में किसी को भी असहिष्णुता नहीं दिखाई दे रही है । ये सब कई ऐसे प्रश्न हैं जो लगातार पूछे जाने चाहिए और सुविधा की खामोशी अख्तियार करनेवालों से तो अवश्य ही पूछे जाने चाहिए । दरअसल हमारे देश में अभिवयक्ति की आजादी आदि के मुद्दे पर हमारे चैंपियन अलग अलग धर्मों को लेकर अलग अलग रुख अपनाते रहे हैं । अब अगर इरफान ने इस्लाम की परंपराओं को लेकर कोई सवाल खड़ा किया है तो उसको धमका कर या विरोध का भय दिखाकर चुप करवा देना कहां तक जायज है । क्या इस्लाम में जारी परंपराओं पर बोलने का हक किसी को नहीं है और कोई बोले तो उसको ईशनिंदा की श्रेणी में डाल देना चाहिए । तब तो इरफान ने ठीक ही खुदा का शुक्रिया अदा किया है कि वो भारत जैसे देश में रह रहे हैं जहां धर्म के ठेकेदार देश नहीं चला रहे हैं । इरफान के बयान से एक बार फिर से सेलेक्टिव सेक्युलरिज्म का आंदोलन चलानेवालों के चहरे बेनकाब हो रहे हैं ।
कुछ लोगों का तर्क है कि इरफान अपनी फिल्म मदारी को हिट कराने के लिए जानबूझकर विवाद खड़ा करना चाहते हैं ताकि उनकी फिल्म को फायदा हो सके । हो सकता है ऐसी दलील देनेवालों के तर्क में दम हो । लेकिन अगर इरफान अपनी फिल्म को हिट कराने के लिए भी खुद को विवादित बना कर चर्चित होना चाहते हैं तब भी उनके अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार को कोई कैसे रोक सकता है । संभव है कि इरफान को लगा होगा कि इस्लाम की परंपराओं के खिलाफ बयान देकर वो फिल्म को सफल करवा ले जाएंगे । अगर ऐसा है तो बजाए इरफान का विरोध करने के उनके इस डिजायन को उभारा जाना चाहिए । उलेमाओं को धर्म की दुहाई देकर उसकी परंपराओं और शरीया की आड़ में इरफान का विरोध करने की बजाय साफ कर देना चाहिए कि वो अपनी फिल्म को सफल बनाने के लिए इस तरह के हथकंडे अपना रहे हैं । बजाए इसके वो भी उल्टे भड़काऊ बयान देकर इरफान की रणनीति को सफल बना रहे हैं । इस विवादित बयान को लेकर भले ही कुछ दिनों में बयानों की जंग ठंडी पड़ जाए लेकिन इसका असर लंबे समय तक देखा जा सकेगा और मुझे लगता है कि ये कई तरह के गंभीर विमर्श को जन्म देने का पुख्ता आधार भी प्रदान करेगा ।