Translate

Showing posts with label रामविलास शर्मा. Show all posts
Showing posts with label रामविलास शर्मा. Show all posts

Saturday, February 17, 2024

महाकवि निराला का हिंदू मन


नईदिल्ली के प्रगति मैदान में आयोजित विश्व पुस्तक मेला आज समाप्त हो जाएगा। इस वर्ष विश्व पुस्तक मेला में प्रकाशकों और पाठकों की भागीदारी ने पुस्तकों के प्रति आश्वस्ति को गाढा किया। इस बार पुस्तक मेले में श्रीराम साहित्य कई प्रकाशकों के यहां प्रमुखता से प्रदर्शित की गई थी। पाठक उन पुस्तकों को खरीद भी रहे थे। पुस्तक मेला मेरे लिए उन पुस्तकों की खोज और क्रय का अवसर होता है जो सामान्य तौर पर बाजार में नहीं मिलती है। इसी तरह की पुस्तकों की तलाश में जब वाणी प्रकाशन के स्टाल पर पुस्तकें देख रहा था तो नजर सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ की पुस्तक रामायण विनय-खण्ड पर पड़ी। इस पुस्तक की मुझे जानकारी नहीं थी। यह पुस्तक तुलसीदास कृत श्रीरामचरितमानस के कुछ अंशों का अवधी से हिंदी अनुवाद जैसा है। इसपर बाद में चर्चा होगी। पर इस पुस्तक के बारे में जो जानकारी मिली वो दिलचस्प है। वाणी प्रकाशन के अरुण माहेश्वरी से जब इस पुस्तक के बारे में पूछा तो उन्होंने एक किस्सा बताया। कोरोना महामारी के कुछ वर्षों पहले की बात है। अरुण माहेश्वरी किसी काम से काशी गए हुए थे। काशी के गोदौलिया क्षेत्र में पटरी पर पुस्तकें बेचनेवाले एक व्यक्ति की दुकान पर पहुंचे। वहां उपलब्ध पुस्तकों को उलटने पुलटने लगे। अचानक उनकी नजर पटरी पर लगी दुकान के एक छोर पर गई। वहां कुछ प्रकाशित पन्ने रखे हुए थे। जिज्ञासावश अरुण जी ने उन पन्नों को उठाया तो वो निराला की पुस्तक रामायण, विनय खण्ड के छपे हुए फर्मे थे। जाहिर तौर पर वो बिक्री के लिए रखे गए थे। अरुण जी उन छपे हुए फर्मों को खरीद लिया। काशी में उन्होंने निराला जी की इस पुस्तक के बारे में पूछताछ की। वहां कई तरह की बातें पता चलीं। किसी ने बताया कि ये पुस्तक जिस प्रेस को छपने दी गई थी वो प्रेस बंद हो गया। तबतक पुस्तक के फर्मे छप चुके थे। प्रेस बंद होने के बाद उन फर्मों को रद्दी में बेच दिया गया होगा। आदि । उन छपे हुए पन्नों को लेकर अरुण माहेश्वरी दिल्ली लौट आए। 

दिल्ली में उन्होंने कवि केदारनाथ सिंह, अब स्वर्गीय, से मिलकर उनको वो पन्ने दिखाए। केदारनाथ सिंह ने उन पन्नों को पढ़ने के बाद कहा कि ये निराला जी का ही लिखा है और उन्होंने इस पुस्तक को बचपन में देखा था। उसकी भाषा और डा रामविलास शर्मा का लिखा प्रथम संस्करण की भूमिका स्पष्ट कर रही थी ये निराला की ही पुस्तक है। डा रामविलास शर्मा की भूमिका पर 1 जून 1949 की तिथि अंकित है। फिर इस पुस्तक को पुनर्प्रकाशित करने की योजना बनी। केदारनाथ सिंह ने पुस्तक पर एक टिप्पणी लिखी, निरालाकृत इस काव्यानुवाद को मैंने तब देखा जब मैं बनारस में स्कूल का छात्र था। यह भी याद है कि यह संभव हुआ था त्रिलोचन जी के कारण, जिन्हें इस काव्यानुवाद की प्रर्ति राष्ट्रभाषा विद्यालय, काशी से प्राप्त हुई थी। निराला जी उन दिनों अस्वस्थ थे और विद्यालय के प्रधानाचार्य गंगाधर मिश्र के आवास पर विश्राम कर रहे थे। यह अनुवाद कार्य वहीं संपन्न हुआ था और उस समय काशी के अखबारों में इसकी चर्चा भी हुई थी। निराला जी रामायण (श्रीरामचरितमानस) का खड़ी बोली में भाषांतर कर रहे हैं। इसको लेकर वहां के साहित्यिक जगत में एक उत्सुकता भी थी। प्रतियां कम छपीं थी। इस कारण कम लोगों तक पहुंच सकीं। केदारनाथ सिंह ने ये भी स्पष्ट किया है कि यह पूरी रामायण का अनुवाद नहीं है केवल उसके विनयपरक छंदों का भाषांतरण इस पुस्तक में किया गया है। यहां एक प्रश्न उठता है कि निराला जी ने भाषांतरण के लिए श्रीरामचरितमानस को ही क्यों चुना। इसका उत्तर निराला की टिप्पणी से मिलता है, श्रीमद् गोस्वामी तुलसीदास जी का रामचरित-मानस या रामायण भारत की सर्वोत्तम काव्यकृति है, इसको इस समय यहां का वेद कहते हैं। इसके संबंध की बहुत सी बातें प्रकाश में नहीं आयीं। काफी अंधेरा है, अधिकार और अधिकारियों का प्रमाद भी।... जिन प्रांतो के विद्यार्थी अवधी नहीं जानते उनके लिए सुविधा हुई है। ऐसे भी नवें दसवें में इसका प्रचलन करने से विद्यार्थियों की खड़ी बोली अधिक पुष्ट हो जाएगी, इसका प्रमाण अधिकारीवर्ग पढ़ते ही समझ जाएंगे। आशा है पाठक पढ़कर राष्ट्रभाषा के विस्तार के प्रयत्न में हमारा उत्साह बढ़ाएंगे। रामविलास शर्मा इस पुस्तक के बारे में कहते हैं कि यह रामचरितमानस तक पहुंचने के लिए ऊंची नीची धरती पर रचे हुए एक नए मार्ग के समान है। इस पुस्तक के लिए निराला को तैयार करनेवाले श्री राष्ट्रभाषा विद्यालय के प्रधानाचार्य गंगाधर मिश्र ने उद्देश्य को और स्पष्ट किया था। उनका मानना था कि निराला श्रीरामचरितमानस के अनुवाद से इस ग्रंथ को सांस्कृतिक शिक्षा का आधार ग्रंथ बनाना चाहते थे। जिससे राष्ट्र की आत्यात्मिक चेतना जागरूक हो सके।  

अगर हमें निराला की रचनाओं पर समग्रता में विचार करें तो महाकवि निराला का मन बार बार हिंदू धर्म और परंपराओं में रमता हुआ दिखता है। उनकी कुछ कविताओं के आधार पर उनको कम्युनिस्ट और जनवाद आदि से जोड़कर हिंदुत्व और भारतीयता से दूर करने का खेल खेला गया। तोड़ती पत्थर कविता को कई बार उद्धृत किया गया। उस कविता में वर्णित गरीबी और मजदूरों की मेहनत को बार-बार रेखांकित करके विचारधारा विशेष का कवि घोषित किया गया। दूसरी तरफ सनातन धर्म और भारतीयता पर लिखे उनके लेखों को पाठकों की नजरों से ओझल करने का षडयंत्र किया गया। निराला जब समन्वय पत्रिका के संपादक थे तब उन्होंने श्रीरामचरितमानस के सातो कांडों की मौलिक व्याख्या करते हुए कई निबंध लिखे थे। रामविलास शर्मा ने माना है कि निराला की काव्य रचना पर तुलसीदास का प्रभाव था। यह प्रभाव भावों और विचारों के अलावा छंद रचना और ध्वनि पर भी दिखता है। इस सबंध में निराला के प्रबंध काव्य तुलसीदास को भी देखा जाना चाहिए। इन रचनाओं और कृतियों पर अकादमिक जगत में कम विचार हुआ। निराला पर काम करनेवाले आलोचकों ने उनके इस पक्ष पर ध्यान नहीं दिया। निराला पर विदेशी लेखकों और रविन्द्रनाथ ठाकुर के प्रभाव की चर्चा मिलती है। उनकी इतनी आलोचना हुई थी कि रामविलास शर्मा को कहना पड़ा था, निराला जो चार लाइनें बेहोशी में लिख देगा, वह चार जनम तुम होश में भी न लिखा पावोगे। उनके निधन के बाद भी उनपर आरोप लगते रहे, जीवनकाल में तो लगे ही थे। इस तरह के मसलों में उलझाकर निराला के लेखन के सनातन भाव तक जाने से पाठकों को रोका गया। निराला के तुलसी या श्रीरामचरितमानस पर लिखे लेखों अथवा गीताप्रेस गोरखपुर से निकलनेवाली पत्रिका कल्याण के उनके लेखों को मिलाकर निराला के हिंदू मन की चर्चा नहीं की गई। निराला तुलसी साहित्य के गहन अध्येता भी थे और उनके लेखों और प्रबंध काव्य में ये दिखता भी है। श्रीरामचरितमानस के विनयपरक छंदों का भाषांतरण करके उसको व्याप्ति दिलाने का प्रयत्न किया था। निराला के हिंदू मन को पाठकों के सामने लाने का प्रयत्न किया जाना चाहिए। यह कार्य कठिन भी नहीं है। पहले तो उनके सनातन और हिंदुत्व  को आधार बनाकर लिखे ग्रंथों और रचनाओं को पुस्तकालयों की धूल से बाहर लाकर पाठकों तक पहुंचाने का प्रयास हो। अकादमिक जगत में उन रचनाओं पर चर्चा हो, शोधार्थियों को उनपर शोध के लिए प्रेरित किया जाए। निराला रचनावली में अगर उनकी इन रचनाओं का समावेश नहीं है तो उसमें भी इन सारी रचनाओं को डालकर उसका पुनर्प्रकाशन करवाया जाए। निराला की रचनाओं को लेकर जो नैरेटिव गढ़ा गया उसको निगेट करने के लिए यह आवश्यक है कि निराला को समग्रता में पाठकों के सामने पेश कर दिया जाए। पाठकों में स्वयं निर्णय करने की क्षमता विकसित हो चुकी है। अमृतकाल में यह आवश्यक है।   


Saturday, July 2, 2022

लड़खड़ाती हिंदी आलोचना


समकालीन हिंदी साहित्य में होनेवाले विमर्शों में अधिकतर लेखक आलोचना को लेकर उदासीन दिखाई पड़ते हैं। कुछ युवा और कई अधेड़ होते लेखक तो आलोचना के अंत की घोषणा करते नजर आते हैं। फेसबुकजीवी लेखक तो आलोचना की आवश्यकता को ही नकार रहे हैं। उनके मुताबिक साहित्य को न तो आलोचक की आवश्यकता है और न ही आलोचना की। हिंदी आलोचना पर कई तरह के आरोप लगते हैं। कुछ कहते हैं कि आलोचना रचना केंद्रित नहीं रही और वो लेखक केंद्रित हो गई है। आलोचकों के अलग अलग खेमे हैं और वो अपने खेमे के लेखकों की औसत रचनाओं को भी कालजयी साबित करने में जुटे रहते हैं। इसकी वजह से आलोचना की साख छीजती है। इसमें दो राय नहीं कि आलोचक की व्यक्तिगत रुचि और संबंधों के निर्वाह की वजह से आलोचना विधा को नुकसान पहुंचा है। इसके अलावा एक महत्वपूर्ण तथ्य को भी रेखांकित किया जाना चाहिए। इस वक्त जो आलोचक सक्रिय हैं उनकी तैयारी भी उतनी नहीं है कि वो किसी रचना को व्याख्यायित करके पाठकों के सामने उसके अर्थ खोल सकें। आलोचना पर लगनेवाले तमाम आरोप सही हो सकते हैं लेकिन जो लोग आलोचना की आवश्यकता पर प्रश्न उठाते हैं उनको समझना चाहिए कि आलोचना के बिना रचना और रचनाकार की प्रतिष्ठा स्थापित नहीं हो सकती है। 

स्वाधीनता के बाद से देखें तो हिंदी साहित्य की अलग अलग विधा में अलग अलग तरह की प्रवृत्तियां दिखाई पड़ती हैं। उदाहरण के लिए कहानी में नई कहानी, अकहानी, आंचलिक कहानी, सचेतन कहानी, समांतर कहानी आदि का दौर दिखाई देता है। कविता में भी नई कविता,अकविता, प्रयोगवादी कविता, प्रगतिवादी कविता की चर्चा होती है। कविता और कहानी की इन प्रवृत्तियों को स्थापित करने में आलोचकों की बड़ी भूमिका रही है। समकालीन हिंदी साहित्यिक परिदृश्य में कोई विशेष प्रवृति नजर नहीं आती है, क्यों? क्योंकि समकालीन दौर के आलोचक इस विधा को गतिशील बनाए रखने में चूक गए। आलोचना के कई दशक पुराने औजारों के आधार पर ही रचना को परखने की ऐतिहासिक भूल हुई। हिंदी आलोचना पर तमाम तरह के आरोप लगते हैं, लेकिन आलोचना की दयनीय स्थिति क्यों हुई इसके पीछे के कारणों को जानने की गंभीर कोशिश नहीं होती। ये कोशिश इसलिए नहीं होती है कि अगर इन कारणों तक पहुंचेगें तो हिंदी आलोचना के पुराने गढ़ और मठ ध्वस्त होने लगेंगे। पाश्चात्य आलोचना के सिद्धांतों की नकल करते हुए पूर्व में जो विद्वतापूर्ण व्याख्याएं की गईं है वो सारी मान्यताएं संदेह के घेरे में आ जाएंगी। संस्कृत काव्यशास्त्र में रचना को समझने की जो प्रविधि है वो बेहद वैज्ञानिक है। इसमें जिस शब्द शक्ति की बात है वो पाश्चात्य आलोचना में कहां दिखाई देती है। हमारे देश का रस सिद्धांत या ध्वनि सिद्धांत कितनी बारीकी से कविता को विन्यस्त करता है इसकी कल्पना भी आई ए रिचर्ड्स को नहीं थी। जिस विदेशी लेखक को रस सिद्धांत या धव्नि सिद्धांत के बारे में जानकारी नहीं थी उससे सीखकर भारतीय आलोचक हिंदी कविता की व्याख्या कर रहे थे। ठीक से याद नहीं आ रहा है लेकिन कहीं पढ़ा था कि संस्कृत के अलंकारशास्त्र और उपमा के बारे में पश्चिमी आलोचकों की अज्ञानता उनको हास्यास्पद बना देती है। 

पश्चिम के आलोचकों के अलावा हिंदी आलोचना में मार्क्सवादी सिद्धातों के आधार पर रचना की आलोचना की गई। इस विचारधारा के लेखकों ने मार्क्सवादी सिद्धांतों की जड़ता को अपनी ताकत बनाने की कोशिश की। परिणाम ये हुआ कि मार्क्सवादी आलोचना जड़ होती चली गई और उनका विकास अवरुद्ध होता गया। रामचंद्र शुक्ल के बाद आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी और रामविलास शर्मा ने रचना से मुठभेड़ करते हुए आलोचना के अपने प्रतिमान बनाए। कुछ हद तक नामवर सिंह ने भी। नामवर के बाद जो भी ख्यात आलोचक हुए वो रचना से टकराने में हिचकते नजर आते हैं। मार्क्सवादी विचारधारा के प्रभाव में वो रचना को लेकर समाज की ओर जाते तो हैं लेकिन समग्रता से मूल्यांकन नहीं कर पाते हैं। इसका एक और दुपरिणाम ये हुआ कि रचना को खोलने के जो औजार रामचंद्र शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी, रामविलास शर्मा के यहां दिखाई देते हैं वो बाद के आलोचकों के यहां नहीं दिखते हैं। इन औजारों की अनुपस्थिति के कारण हिंदी आलोचना की धार कुंद होती चली गई और इस विधा में एक वैचारिक सन्नाटा पसरता चला गया। अशोक वाजपेयी कभी कभार आलोचना में तलवारबाजी करते हैं लेकिन वो भी इस विधा को गतिशील नहीं बना पाते हैं। उनकी अपनी सीमाएं हैं जिसको वो पार नहीं कर पाते हैं। बाद के आलोचकों ने भी रचना के पाठ में समय के साथ हो रहे बदलाव को पकड़ने की कोशिश नहीं की और वो आलोचना के नए प्रतिमान गढ नहीं पाए।  

पिछले दिनों सुधीश पचौरी की एक पुस्तक आई है ‘नयी साहित्यिक सांस्कृतिक सिद्धान्तकियां’। इस पुस्तक में सुधीश पचौरी ने आलोचना के नए प्रतिमान स्थापित करने की कोशिश की है। उन्होंने रचना से टकराने और फिर उसके आधार पर उसको व्याख्यित करने का आग्रह किया है। सुधीश पचौरी स्पष्ट रूप से कहते हैं कि रचना सिर्फ रचना नहीं होती वह एक जटिल और पेचीदा नेटवर्क का हिस्सा होती है। इसको वो अलग तरीके से सामने रखते हैं। इस संदर्भ में वो जायसी की पद्मावत और तुलसीदास के रामचरित मानस का उदाहरण देकर नया प्रतिमान गढ़ने का प्रयास करते हैं। वो बताते हैं कि रामचंद्र शुक्ल ने करीब नब्बे वर्ष पहले जायसी के पद्मावत की भूमिका लिखी थी और उसे प्रेमगाथाओं की काव्य परंपरा में ऊंचा स्थान दिया था। इसमें उन्होंने लौकिक प्रेम की अलौकिकता के बारे में बताया था। शुक्ल जी का ये पाठ ही पद्मावत का अंतिम पाठ बन गया। उनकी स्थापना है कि जैसे ही संजय लीला भंसाली ने 2017 में फिल्म पद्मावत बनानी आरंभ की तो इसका नया पाठ सामने आने लगा। जैसे जैसे फिल्म को लेकर विवाद बढ़ा तो पद्मावत के तीन पाठ सामने आए। सुधीश पचौरी मानते हैं कि पद्मावत का पहला पाठ फिल्मी पाठ था जिसे निर्माता निर्देशक बना रहा था जो दो सौ करोड़ रुपए की आर्थिकी से जुड़ा था। दूसरा पाठ कर्णी सेना का क्षत्रियवादी (जातिवादी) पाठ था जिसमें इस्लाम विरोधी पाठ भी सक्रिय था। तीसरा पाठ राजनीतिक रहा जिसको संसद की बहसों और चुनाव के दौरान देखा गया। उनके मुताबिक इसके बाद पद्मावत का अकादमिक पाठ भी बदला। इसी तरह से जब तुलसीदास ने रामचरित मानस की रचना की थी तो उस समय का उसका पाठ अलग था और अब बिल्कुल अलग है। अब उसको पावर टेक्सट कहा जा सकता है। 

अपनी इस पुस्तक में सुधीश पचौरी ने हिंदी आलोचना की सीमाओं पर ठीक से विचार किया है। वो मानते हैं कि आरंभ में हिंदी आलोचना खुद को संस्कृत से जोड़कर देखती थी। धीरे-धीरे वो इससे दूर होती चली गई। बाद में अंग्रेजी साहित्य शास्त्र ने उसकी जगह ले ली। वो बेहद तल्ख अंदाज में कहते हैं कि संस्कृत का काव्यशास्त्र जो हिंदी को उत्तराधिकार में मिला था उसकी कुंजियां बना ली गईं लेकिन उसमें गहरे नहीं उतरा गया। इसलिए उसका नया संस्कार नहीं हो सका। सुधीश पचौरी ने अपनी इस पुस्तक में भारतीय काव्यशास्त्र की परंपरा से रस, छंद, अलंकार, रीति, वक्रोक्ति, ध्वनि आदि पर विस्तार से प्रकाश डाला है। उन्होंने ध्वनि सिद्धांत के पुनर्पाठ की बात भी की है और इसकी पश्चिम के सिद्धांत और सिद्धांतकारों की स्थापनाओं से तुलना करके इसकी श्रेष्ठता साबित की है। हिंदी आलोचना को अगर कठघरे में खड़ा करना है तो इस तरह से करना होगा जैसे सुधीश पचौरी ने किया है। अगर हमें हिंदी आलोचना की दुर्दशा की बात करनी है तो उसकी भूल गलतियों को लेकर गंभीरता से विमर्श करना होगा।न इसका महत्वपूर्ण लाभ ये होगा कि जो ऐतिहासिक भूलें हुई हैं उसका परिमार्जन हो सकेगा।

Saturday, October 2, 2021

तुलसीदास की उपेक्षा असंभव


हमारे देश में और पूरी दुनिया में रामकथा एक ऐसी कथा है जिसके कई पाठ उपलब्ध हैं। रामकथा को देश, काल और परिस्थिति के अनुसार लेखकों ने अपने विवेक के आधार पर लिखा। उपलब्ध रामकथाओं में गोस्वामी तुलसीदास की श्रीरामचरितमानस की लोकप्रियता असंदिग्ध है। जब तुलसीदास ने श्रीरामचरितमानस की रचना की थी तब भारतवर्ष पर विदेशी आक्रांताओं का कब्जा था। उस दौर में हमारे देश की संस्कृति को, रीति रिवाजों को, खानपान को, स्थापत्य कला आदि को बदलने का उपक्रम लगातार चल रहा था। हमारी आस्था के केंद्रों को नष्ट किया जा रहा था। तलवार के जोर पर समाज की संरचना भी बदली जा रही थी। अपनी संस्कृति और समृद्ध विरासत के प्रति लोगों की आस्था डिगने लगी थी। ऐसे विकट समय में तुलसीदास ने श्रीरामचरितमानस की रचना की और देश के सामने राम के रूप में एक ऐसा नायक प्रस्तुत किया जो विकट परिस्थितियों में अपने धर्म पर अडिग रहते हुए आकांता का समूल नाश करता है। ये ग्रंथ उस समय की मांग थी। इस विषय पर कई शोध हो चुके हैं और कई विद्वानों ने लिखा है। यहां इस पृष्ठभूमि को बताने का उद्देश्य ये है कि देश को जब 1947 में लंबे कालखंड के बाद विदेशी आक्रांताओं से मुक्ति मिली तब भी तुलसीदास रचित श्रीरामचरितमानस की लोकप्रियता में किसी तरह की कमी नहीं आई बल्कि ये बढ़ी ही। स्वाधीनता के बाद अगर अकादमिक जगत पर नजर डालते हैं तो वहां तुलसीदास और श्रीरामचरितमानस को लेकर एक उदासीनता दिखाई देती है। इस उदासीनता की वजह अकादमिक जगत पर वामपंथी विचारधारा के अनुयायियों का दबदबा रहा। 
तुलसीदास को हिंदू समाज का पथभ्रष्टक तक कहा गया और इस तरह की पुस्तकें भी प्रकाशित हुईं। तुलसीदास के पाठ को कमतर करके आंकने के अनेक प्रयास हुए। पाठ्यक्रमों में इस तरह के लेखों को प्राथमिकता दी गई जिसमें तुलसीदास की उपेक्षा हो। इस संबंध में याद पड़ता है ए के रामानुजन के एक लेख की जिसका नाम है, थ्री हंड्रेड रामायणाज, फाइव एक्जांपल एंड थ्री थाट्स आन ट्रांसलेशन। ए के रामानुजन ने देश विदेश में लिखे गए कई रामकथाओं का उदाहरण दिया। अलग अलग तरह की कथाएं बताईं लेकिन आपको ये जानकर हैरानी होगी कि रामानुजन ने अपने इस लेख में तुलसीदास का नाम सिर्फ एक जगह उल्लिखित है वहां भी तुलसी कहा गया है। दो स्थानों पर रामचरितमानस का उल्लेख मिलता है। एक जगह अहिल्या की कथा के संदर्भ में और दूसरी जगह कंबन का प्रभाव बताने के क्रम में। अब इस विद्वान को क्या कहा जाए कि वो जब रामकथा के विभिन्न पाठ का उल्लेख करता है तो उसको तुलसीदास के श्रीरामचरितमानस से कोई उद्धरण याद नहीं पड़ता। ये जानबूझकर इस ग्रंथ से कोई उद्धरण नहीं उठाते। याद पड़ता है जब 2011 में दिल्ली विश्विद्यालय के पाठ्यक्रम से इस लेख को हटाया गया था तब वामपंथी शिक्षकों, लेखकों और इतिहासकारों ने वितंडा खड़ा कर दिया था। जबकि उस लेख को हटाने का निर्णय विश्वविद्यालय की विद्वत परिषद में हुआ था। उस वक्त रामानुजन के लेख के पक्ष में कई वामपंथी लेखकों ने बड़े-बड़े लेख लिखे थे। वो लेख अकादमिक कम राजनीतिक अधिक थे। ए के रामानुजन के लेख की सीमा उसमें तुलसीदास के पाठ की अनुपस्थिति है। इसके अलावा रामानुजन ने जिन रामायण या जिन ग्रंथों की चर्चा की है उनकी रचना के समय व्याप्त स्थिति और परिस्थिति पर प्रकाश नहीं डाला है। अगर वो ऐसा कर पाते तो लेख अधिक अर्थपूर्ण होता। 

अगर रामानुजन के पूरे लेख को पढ़ें तो यह स्पष्ट होता है कि वो कोई नई बात नहीं कह रहे थे। ये सर्वज्ञात है कि रामकथा के अनेक रूप अनेक भाषाओं में उपलब्ध हैं। तुलसीदास ने स्वयं कहा है कि हरि अनंत हरिकथा अनंता, कहहिं सुनहिं बहु विधि सब संता। इसका अर्थ है कि तुलसीदास के समय से या उसके पहले से ही यह बात ज्ञात है कि रामकथा के अलग अलग स्वरूप हैं। रामकथा की व्याप्ति इतनी अधिक है कि फिल्मों में भी अलग अलग रूपों में ये दिखती रही है। सचिन भौमिक और राज कपूर की मुलाकात का प्रसिद्ध किस्सा है। सचिन भौमिक काम की खोज में राज कपूर के पास पहुंचे थे। उनको अपनी कहानी सुनाई। देर तक राज कपूर ने कहानी सुनी और अंत में कहा कि आप चाहे जिस तरह से कहानी सुनाओ लेकिन इतना याद रखना कि फिल्मों में तो एक ही कहानी होती है, राम थे, सीता थीं और रावण आ गया। ये बात राज कपूर जैसे उत्कृष्ट कलाकार को समझ आती थी लेकिन वामपंथी लेखकों को नहीं। इसलिए रामानुजन का लेख कोई नई दृष्टि देनेवाला नहीं है, बल्कि वो अलग अलग जगह व्याप्त रामकथाओं को एक जगह समेटने की कोशिश मात्र है। रामानुजन के लेख में नया सिर्फ ये था कि उसमें तुलसीदास की उपेक्षा की गई। इस उपेक्षा की वजह से इस लेख को खास विचारधारा के लोगों ने पसंद किया था। 

तुलसीदास और उनकी रामकथा को लेकर तरह तरह की भ्रांतियां फैलाने की कोशिश समय समय पर होती रही हैं। खासतौर पर जब अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का आंदोलन जोर पकड़ने लगा तो वामपंथी लेखकों ने राम के अस्तित्व पर ही प्रश्न खड़ा करना आरंभ कर दिया। तुलसीदास को धार्मिक लेखक कहकर उनका मूल्यांकन करने लगे। वामपंथी लेखकों को इस बात में महारत हासिल है कि वो अपनी राजनीति के लिए किस उक्ति को चुनें और किसको छोड़ दें। किस विद्वान को उद्धृत करें और किसको उपेक्षित कर दें। तुलसीदास की रचनाओं को कमतर दिखाने के लिए उन्होंने इस प्रविधि का सहारा लिया। उन्होंने तो सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की राय को भी ओझल कर दिया। रामविलास शर्मा ने निराला की साहित्य साधना में लिखा है,अंग्रेजी और बांग्ला के अनेक कवियों के नाम गिनाने के बाद एक दिन निराला बोले- ‘इन सब बड़ेन क पढ़ित है तो ज्यू जरूर प्रसन्न होत है पर जब तुलसीदास क पढ़ित है तो सबका अलग धरि देइत है। हमार स्वप्न इहै सदा रहा कि गंगा के किनारे नहाय के भीख मांगिके रही और तुलसीदास कै पढ़ी। (इन सब बड़े लोगों को पढ़ता हूं तो मन प्रसन्न होता है, पर जब तुलसीदास को पढ़ता हूं तो सबको अलग रख देता हूं। हमारा हमेशा से यही स्वप्न रहा है कि गंगा किनारे स्नान करके भीख मांग के रहें और तुलसीदास को पढ़ें)। हिंदी के सबसे बड़े कवियों में से एक निराला का ये कथन वामपंथियों के सामने एक चुनौती थी लिहाजा इसको ओझल कर दिया गया। 

तुलसीदास की इस बात को लेकर आलोचना करने की कोशिश की गई कि वो महिलाओं के विरोधी थे और वर्णाश्रम व्यवस्था के पोषक थे। लेकिन यहां भी अगर समग्रता में देखें तो तुलसीदास के यहां महिलाओं को प्रतिष्ठित किया गया है और सभी को समान माना गया है। ऐसे कई पद श्रीरामचरितमानस में हैं। उनके लेखन में इतनी शक्ति है कि वो आलोचकों को लगातार चुनौती देते रहते हैं। तुलसीदास को जो टेक्सट है उसको पावर टेक्सट कहा जा सकता है। ऐसा टेक्सट जिसने पीढ़ियों को न केवल प्रभावित किया बल्कि उनको संस्कारित भी किया। तुलसीदास को समझने के लिए उसके सही अर्थों को उद्घाटित करने के लिए भारतीय संदर्भों को समझना होगा। रामायण के अलग अलग रूपों को उद्धृत करके और रामकथा के अलग अलग स्वरूपों को सामने रखकर तुलसीदास की काव्य प्रतिभा के तेज को कम नहीं किया जा सकता है। तुलसीदास ने अपने समय में उत्कृष्ट साहित्य रचा, ऐसा साहित्य जिसने देश की संस्कृति पर हो रहे हमलों का न केवल प्रतिकार किया बल्कि उसके खिलाफ उठ खड़े होने की प्रेरणा भी दी। 

Monday, April 28, 2014

परिधि से केंद्र में लाने की चुनौती

आदरणीय प्रकाश करात जी,
लोकसभा की आधी से ज्यादा सीटों पर चुनाव संपन्न हो चुके हैं । लोकतंत्र का यह महापर्व अब अपने अंतिम पड़ाव की ओर बढ़ चला है । यह चुनाव इस मायने में ऐतिहासिक लग रहा है कि इस बार विचारधारा पर व्यक्ति हावी हो गया है। धर्मनिरपेक्षता की राजनीति करनेवाले फासीवाद के आगमन की आशंका जता रहे हैं । इस चुनावी कोलाहल के बीच वामपंथी दलों का हाशिए पर चला जाना हमारे लोकतंत्र का एक ऐतिहासिक मोड़ है । उन्नीस सौ सड़सठ में आलोचना पत्रिका के एक अंक में हिंदी के मूर्धन्य आलोचक रामविलास शर्मा का एक साक्षात्कार छपा था । अपने उस साक्षात्कार में रामविलास शर्मा ने कहा था कि अगर देश में कभी फासीवाद आया तो उसकी जिम्मेदारी वामपंथी दलों की होगी । मुझे नहीं मालूम कि आपने हिंदी के इस महान लेखक का नाम आपने सुना है या उनके लेखन से आप परिचित हैं या नहीं लेकिन आपको याद दिला दें कि कमोबेश देश में इस वक्त भी कमोबेश वैसे ही हालात हैं । तब भी विपक्षी दल बिखरे हुए थे और इस वक्त भी । अगर देश में फासीवाद आया, जिसकी आशंका आपकी जमात के लोग जता रहे हैं, तो सही में इसकी जिम्मेदारी वामपंथी दलों की ही होगी । हाल के वर्षों में जिस तरह से वामपंथी दल शिथिल पड़ गए वो हमारे लोकतंत्र के लिए चिंताजनक है । लोकसभा चुनाव की गहमागहमी और नेताओं की जुबानी जंग और मीडिया में कयासों के शोरगुल में वामपंथी दलों की भूमिका पर चर्चा ही नहीं हो पा रही है । वामपंथी दल भी चुनाव के दौरान अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने में नाकाम हो रहे हैं । पूरे देश में राजनीति पंडित इस चुनाव में राजनीतिक दलों की आसन्न जीत और हार का कयास लगा रहे हैं । कुछ भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में लहर बता रहे हैं तो कईयों का मानना है कि दक्षिण और पूर्वोत्तर राज्यों में भारतीय जनता पार्टी की कमजोरी मोदी के कथित विजय रथ को रोक सकती है । सबके अपने अपने तर्क और कारण हैं । जीत हार के इन तर्कों, कारणों और दावों प्रतिदावों के बीच एक बात जो खामोश मजबूती के साथ दिखाई दे रही है वो है इन चुनावों में वामपंथी दलों का अप्रसांगिक होना । कुछ राजनीति विश्लेषकों का तो यहां तक कहना है कि कांग्रेस और भाजपा भले ही जीत के दावों में उलझी हो लेकिन इस लोकसभा चुनाव में वामदलों की हार में किसी को संदेह नहीं है । इस लोकसभा चुनाव में वामपंथी समूह की सबसे बड़ी पार्टी सीपीएम, जिसके आप महासचिव हैं, निष्क्रिय दिखाई दे रही है । क्यों नहीं वामपंथी समूह गैर कांग्रसी और गैर भाजपा दलों के बीच की धुरी बन पा रहे हैं । ज्यादा पुरानी बात नहीं है , नब्बे के दशक में क़मरेड हरकिशन सिंह सुरजीत ने अपने राजनैतिक कौशल से कई बार गैर बीजेपी और गैर कांग्रेस दलों को एकजुट किया था और सरकार बनवाने में अहम भूमिका निभाई थी । उसके बाद भी दो हजार चार में कांग्रेस की अगुवाई वाली सरकार के गठन में वामदलों की बेहद अहम भूमिका थी । अब सिर्फ इतने दिनों में क्या हो गया कि तमिलनाडू में एआईएडीएमके के साथ गठबंधन के एलान के चंद दिनों बाद जयललिता उससे बाहर निकल आती हैं । गुजरात में प्रोग्रेसिव फ्रंट आकार भी नहीं ले पाता है । सांप्रदायिकता के नाम पर दिल्ली में गैर कांग्रसी और गैर भाजपा दलों को एकजुट करने का उनका प्रयास परवान नहीं चढ पाता है । क्या साख का संकट है या फिर नेतृत्व का । आपको इस बात पर मंथन करना चाहिए कि उन्नसी सौ बावन में जब देश के पहले आमचुनाव का नतीजा आया था तो प्रमुख विपक्षी दल के तौर पर उभरने वाली पार्टी महज साठ साल में अप्रासंगिक होती क्यों दिख रही है । क्या वजह है कि पश्चिम बंगाल और केरल जैसे मजबूत गढ़ के अलावा बिहार और महाराष्ट्र के कुछ इलाकों में मजबूत प्रदर्शन करनेवाली पार्टी अब वहां काफी कमजोर दिखाई देती है । बिहार के बेगूसराय को पूरब का लेनिनग्राद कहा जाता था लेकिन वहां भी पार्टी को नीतीश कुमार के सहारे की जरूरत है ।
मान्यवर क्या आपको नहीं लगता कि वामदलों का समूह अपनी दुर्दशा के लिए खुद जिम्मेदार हैं । उन्नीस सौ सैंतालीस में जब देश आजाद हुआ था तो सीपीआई ने इसको आजादी मानने से इंकार करते हुए उसको बुर्जुआ के बीच का सत्ता हस्तांतरण करा दिया था । भारतीय जनमानस को नहीं समझने की शुरुआत यहीं से होती है । जब पूरा देश आजादी के जश्न में डूबा था और नवजात गणतंत्र अपने पांव पर खड़े होने के लिए संघर्ष कर रहा था तो आपकी विचारधारा ने गणतंत्र के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह की शुरुआत कर देश की जनता को एक गलत संदेश दिया था । उस वक्त रूसी तानाशाह स्टालिन ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए इस विद्रोह को खत्म करने में भारत की मदद की थी । महात्मा गांधी को भी 1947 में कहना पड़ा था - कम्यूनिस्ट समझते हैं उनका सबसे बड़ा कर्तव्य, सबसे बड़ी सेवा (देश में ) मनमुटाव पैदा करना, असंतोष को जन्म देना है । वे यह नहीं सोचते कि यह असंतोष, ये हड़तालें अंत में किसे हानि पहुंचाएंगी । अधूरा ज्ञान सबसे बड़ी बुराइयों में से एक है ....कुछ लोग ये ज्ञान और निर्देश रूस से प्राप्त करते हैं । हमारे कम्युनिस्ट इसी हालत में जान पड़ते हैं ....ये लोग अब एकता को खंडित करनेवाली उस आग को हवा दे रहे हैं, जिसे अंग्रेज लगा गए थे । गांधी के इस कथन को वामदलों के समूह ने कई कई बार साबित किया । आप इस तथ्य से इंकार नहीं कर सकते कि सीपीआई के विभाजन के बाद वो रूस के इशारों पर चलती रही और अलग होकर बनी पार्टी सीपीएम की आस्था चेयरमैन माओ में थी । राजनीतिक विश्लेषक और इतिहासकार एंथोनी पैरेल ने ठीक ही कहा था- भारतीय मार्क्सवादी भारत को मार्क्स के सिद्धांतों के आधार पर बदलने की कोशिश करते हैं और वो हमेशा मार्क्सवाद को भारत की जरूरतों के अनुरूप ढालने की कोशिशों का विरोध करते रहे हैं । नतीजा यह हुआ कि मार्क्सवाद को भारतीय परिप्रेक्ष्य में विकसित और व्याख्यायित करने की कोशिश ही नहीं की गई । नुकसान यह हुआ कि मार्क्सवाद को भारतीय दृष्टि देने का काम नहीं हो पाया ।
वामदलों के भारतीय जनमानस को नहीं समझने का एक और उदाहरण है इमरजेंसी का समर्थन । इंदिरा गांधी ने जब देश में नागरिक अधिकारों को मुअत्तल कर आपातकाल लगाने का फैसला हुआ था तो चेयरमैन एस ए डांगे ने इंदिरा गांधी के इस तानाशाही फैसले का समर्थन किया था । उसका ही अनुसरण करते हुए दिल्ली की एक सभा में प्रगतिशील लेखक संघ ने भी भीष्म साहनी की अगुवाई में इमरजेंसी के पक्ष में प्रस्ताव पारित किया था । ऐसे फैसले तभी होते हैं जब आप जनता का मूड नहीं भांप पाते हैं या फिर अपने निर्णयों के लिए रूस या चीन की ओर ताकते हैं । पार्टी कैडर की नाराजगी को भी डांगे ने रूस के इशारे पर नजरअंदाज किया और आंख मूंदकर इंदिरा गांधी के सभी फैसलों का समर्थन करने लगे । इससे पार्टी और चेयरमैन डांगे दोनों का नुकसान हुआ था । इमरजेंसी के फैसले के समर्थन के बाद लाख कोशिशों के बावजूद एस ए डांगे मुख्यधारा में नहीं लौट पाए और सीपीआई भी मजबूती से खड़ी नहीं हो पाई । यूपीए वन के दौर में जिस तरह से आपने न्यूक्लियर डील पर सरकार से समर्थन वापस लिया और लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी के खिलाफ कार्रवाई की वो भी गलत आकलन के आधार पर फैसले का सर्वोत्तम उदाहरण है । उस वक्त भी आपके नेतृत्व पर सवाल खड़े हुए थे । अपनी किताब – कीपिंग द फेथ-मेमॉयर ऑफ अ पार्लियामेंटिरियन में सोमनाथ चटर्जी ने विस्तार से इस पूरे प्रसंग पर लिखकर आपको कठघरे में खड़ा किया है । उन्होंने आपके तानाशाही मिजाज पर भी तंज कसते हुए लिखा है कि उनको पार्टी से निकालने का फैसला पोलित ब्यूरो के पांच सदस्यों ने ही ले लिया जबकि सत्रह लोग इसके सदस्य थे । उन्होंने आप पर पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की राय की अनदेखी का आरोप भी लगाया है । करात साहब जिस तरह से आपने केरल के आपकी पार्टी के मजबूत नेता पिनयारी विजयन का समर्थन किया, विजयन की छवि पूरे देश में जगजाहिर है, उससे भी पार्टी की नैतिक आभा कम हुई है ।  करात साहब मुझे लगता है कि वामदलों के समूह में आपकी पार्टी सबसे बड़ी है इस नाते आपकी जिम्मेदारी है कि आप देश की राजनीति को व्यक्ति केंद्रित होने से रोकें ।
करात साहब आप इस तथ्य की ओर भी गंभीरता से विचार करें कि दिल्ली में गैर सरकारी संगठन के माध्यम से काम करनेवाला एक शख्स किस तरह से पूरे देश की राजनीति को हिला रहा है । अरविंद केजरीवाल नाम के इस शख्स की राजनीति से हो सकता है आपका मतभेद हो लेकिन उसने एक साथ कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी दोनों को चुनौती दी । आज हालत यह है कि वामपंथी दलों से जुड़े लोग आम आदमी पार्टी में अपना ठौर ढूंढ रहे हैं । अरविंद केजरीवाल ने अपनी नैतिक आभा और जनता के मुद्दों से जुड़कर खुद को भारतीय राजनीति में प्रासंगिक बना लिया । करात साहब आपकी पार्टी और आपके लाल समूह का तो आधार ही लोक है लेकिन अगर आप गंभीरता से विचार करेंगे तो पाएंगे कि आपलोग जन और लोक से दूर होते चले गए । जनता के बीच जाकर उनकी समस्याओं को उठाना और उन समस्याओं पर जनांदोलन करना आपलोगों ने छोड़ दिया । बाजारवाद और नवउदारवाद के इस दौर का सबसे ज्यादा असर देश के श्रमिकों पर पड़ा है । पूंजी के आगमन और पूंजीवाद के जोर ने श्रमिकों के हितों के रखवाले संगठनों को कमजोर कर दिया । ये आपके दलों के अनुषांगिक संगठन थे । बाजार के खुलने के बाद जिस तरह से भारत में अथाह पूंजी का आगमन हुआ उसने देश के कई हिस्सों के इंडस्ट्रियल एरिया को तबाह कर दिया । लेकिन आपलोग कोई आंदोलन खड़ा नहीं कर पाए । एसईजेड जैसे क्षेत्रों का चलन शुरू हुआ जहां श्रमिकों के अधिकारों की बातें बेमानी होने लगी । लेकिन आपलोग खामोश रहे या विरोध की रस्म अदायगी की । करात साहब किसी भी संगठन या पार्टी को प्रासंगिक बनाए रखने की जिम्मेदारी उसके नेता पर होती है उसका एहसास आपको होगा । जरूरत इस बात की है कि आप गंभीरता से मंथन करें और वामदलों को एक बार फिर से देश की राजनीति की परिधि से उठाकर केंद्र में स्थापित करें ।
 

Saturday, October 9, 2010

उदासीन हिंदी समाज

आज हिंदी आलोचना के शिखर पुरुष रामविलास शर्मा की जन्मतिथि है । सुबह दफ्तर पहुंचा तो अपने सहयोगी से पूछा कि आपको मालूम है कि आज रामविलास जी का जन्मदिन है तो उन्होंने सहज भाव से कहा कि क्या आज रामविलास पासवान का जन्मदिन है । मैं हतप्रभ रह गया और मुझसे कुछ कहते नहीं बना । हम अपने पूर्वज साहित्यकारों के प्रति इतने उदासीन क्यों है । क्यों नहीं हमारे जेहन में उनका नाम आता है । इस उदासीनता के लिए क्या हमारा हिंदी समाज जिम्मेदार है । या फिर हमारे साहित्यकार खुद जिम्मेदार हैं । इस विषय पर लिखने का मन बना रहा हूं । तबतक आप अपनी प्रतिक्रिया दें ।