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Saturday, February 15, 2025

तिरुपति मंदिर जैसी हो दर्शन व्यवस्था


प्रयागराज में जारी महाकुंभ में लगभग 50 करोड़ श्रद्धालुओं ने पवित्र स्नान किया। महाकुंभ में स्नान के साथ बड़ी संख्या में श्रद्धालु अयोध्या और काशी में पहुंच रहे हैं। अयोध्या में इतनी संख्या में श्रद्धालु पहुंच गए कि कई दिनों तक स्कूल बंद करना पड़ा। रामपथ को वाहनों के लिए बंद करना पड़ा। अयोध्या के निवासियों को रामपथ पर स्थित चिकित्सालय तक पहुंचने में संघर्ष करना पड़ा। आसपास के जिलों से आनेवाले रास्तों पर वाहनों पर सख्ती की गई। अयोध्या में प्रभु श्रीराम के नव्य और भव्य मंदिर का निर्माण कार्य जैसे जैसे आगे बढ़ रहा है वैसे वैसे वहां श्रद्धालुओं की संख्या भी बढ़ रही है। पिछले वर्ष श्रीराम मंदिर को दर्शन के लिए खोला गया था। मंदिर परिसर में अब भी कई तरह के निर्माण कार्य चल रहे हैं। परकोटा से लेकर अन्य स्थानों पर मंदिर के भव्य स्वरूप को अंतिम रूप दिया जा रहा है। जानकारों के मुताबिक मंदिर में एक लाख व्यक्ति प्रतिदिन दर्शन का अनुमान लगाकर तदनुसार व्यवस्था की गई है। ऐसा प्रतीत होता है कि श्रद्धालुओं की संख्या अनुमानित संख्या से अधिक हो जा रही है। दर्शकों को व्यवस्थित करने के लिए स्कूल बंद करने पड़ते हैं, अयोध्या शहर के लोगों को घरों से निकलने में परेशानी होती है। रामपथ के आसपास वाहनों पर प्रतिबंध को लेकर मुश्किल होती है। व्यवस्था संभालने में पुलिस को भी काफी मशक्कत करनी पड़ती है। अभी मंदिर का कार्य चल रहा है तो इसके पूर्ण होने के साथ सुचारू रूप से प्रभु के दर्शन की व्यवस्था पर विचार करना चाहिए। 

अयोध्या में दो तरह से श्रद्धालु दर्शन करते हैं, एक तो आम दर्शन जिसमें श्रद्धालु पंक्तिबद्ध हो जाते हैं और धीरे धीरे चलते हुए दर्शन करके मंदिर परिसर से बाहर आ जाते हैं। इसके अलावा एक सुगम दर्शन होता है। इसकी लेन अलग है। इसमें पासधारक ही प्रवेश कर सकते हैं। इस लेन में जाने के लिए पास प्रशासन, पुलिस और श्रीराम जन्मभूमि तीर्थक्षेत्र ट्रस्ट से जारी होता है। तीसरा अतिविशिष्ट पास जारी होता है जिसके धारक रंगमंहल बैरियर के पास से मंदिर में प्रवेश करते हैं। दर्शन के लिए किसी प्रकार का कोई शुल्क नहीं लिया जाता है। श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए पिछले वर्ष तो काफी इंताजम किए गए थे, लेकिन धीरे धीरे ये सुविधाएं कम होती चली गईं। अयोध्या पहुंचनेवाले श्रद्धालुओं को धर्मशालाओं और आश्रमों का आसरा रह गया। कई नए होटल खुले जरूर हैं लेकिन वो श्रद्धालुओं की संख्या के आधार पर अपने कमरों की दर तय करते हैं। जो कई बार बहुत अधिक हो जाता है। ऐसा लगता है कि अभी ट्रस्ट की प्राथमिकता में मंदिर परिसर का निर्माण है, इस कारण श्रद्धालुओं की सुविधाओं की ओर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया जा रहा है। किंतु यही उचित समय है कि श्रीरामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र श्रद्धालुओं की सुविधाओं और अयोध्या पहुंचनेवाले भक्तों की संख्या को ध्यान में रखते हुए योजनाबद्ध तरीके से निर्माण कार्य करे। दर्शन के लिए जिस प्रकार के लेन आदि की व्यवस्था करनी है या राम मंदिर के आसपास के क्षेत्र में वैकल्पिक मार्ग की व्यवस्था करनी है उसपर गंभीरता से विशेषज्ञों के साथ विचार करके निर्णय लिया जाना चाहिए। अगर ऐसा हो पाता है तो दीर्घकाल तक श्रद्धालुओं की संख्या से ना तो अयोध्यावासियों को कोई तकलीफ होगी और ना ही प्रभु श्रीराम के दर्शन के लिए पहुंचनेवाले भक्तों को। 

पिछले दिनों तिरुपति में बालाजी के मंदिर जाकर दर्शन करने का सौभाग्य मिला। वहां दर्शन की व्यवस्था देखकर मन में ये विचार आया कि श्रीरामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के ट्रस्टियों को वहां जाकर श्रद्धालुओं और मंदिर परिसर की व्यवस्था को देखना चाहिए। अगर उनको उचित लगे तो उस व्यवस्था को बेहतर करके उसको राम मंदिर परिसर में लागू करने का प्रयास करना चाहिए। तिरुपति से जैसे ही आप तिरुमला की पहाड़ी स्थित मंदिर में दर्शन करने के लिए यात्रा आरंभ करते हैं तो उसके पहले आपको आनलाइन दर्शन का टिकट और मंदिर के आसपास रहने की व्यवस्था कर लेनी होगी। अन्यथा आपको नीचे तिरुपति में रुकना होगा। अगर आप विशिष्ट या सुगम दर्शन करना चाहते हैं तो तिरुमला तिरुपति देवस्थानम के कार्यालय में संपर्क करना होगा। वहां आपको अपने आधार कार्ड के साथ आवेदन करना होगा। इसके बाद से सारी व्यवस्था आनलाइन। अगर आपका आवेदन स्वीकृत हो जाता है तो आपके मोबाइल पर एक लिंक आएगा। उस लिंक से आपको पेमेंट करना होगा। पेमेंट होते ही आपके मोबाइल पर ही पास आ जाएगा। जिसमें दर्शन का समय और गैट आदि का उल्लेख होता है। वहां सर्व दर्शन, शीघ्र दर्शन और ब्रेक दर्शन की व्यवस्था है। सबके लिए अलग अलग शुल्क है।  अगर आपने तिरुमला में रात में रुकने की व्यवस्था करनी है तो आनलाइन बुकिंग करनी होगी। तिरुमला तिरुपति देवस्थानम के कार्यालय में जाकर अपने लिए कमरा आवंटित करवाना होगा। सबकुछ व्यवस्थित। आपकी फोटो ली जाएगी फिर पैसा जमा करने के लिए बगल के काउंटर पर भेजा जाएगा। आनलाइन पैसे जमा होंगे। कमरे के किराए जितना ही सेक्युरिटी जमा करवाना होता है। फिर आपके मोबाइल पर कमरा आवंटन की जानकारी और एक कोड आ जाएगा। उसको लेकर बताए हुए स्थान पर पहुंच जाइए। कमरा तैयार मिलेगा। कमरा में चेक इन करते ही एक कोड आपके मोबाइल पर आएगा। जब आप कमरा छोड़ रहे हों तो आपको ये कोड बताना होता है। फिर वापस उसी कार्यालय में जाना होता है जहां आपने पैसे जमा करवाए थे। वहां इस कोड को बताते ही आपको मोबाइल पर सेक्युरिटी मनी के रिफंड की जानकारी आ जाएगी। कहीं भी नकद से लेन देन नहीं। कहीं भी किसी प्रकार का बिचौलिया या एजेंट नहीं। 

सर्वदर्शन और शीघ्रदर्शन के श्रद्धालुओं को दर्शन के लिए मंदिरर के गर्भगृह तक पहुंचने में जितना भी समय लगे उनको पंक्ति में ही बने रहना होता है। 12-13 घंटे भी लगते हैं तो मंदिर प्रशासन श्रद्धालुओं का पूरा ख्याल रखते हैं। भोजन, फल और बच्चों के लिए दूध आदि की नियमित अंतराल पर व्यवस्था होती है। दर्शन के लिए जो रास्ता बनाया गया है उस रास्ते में वाशरूम की व्यवस्था है। चौबीस घंटे वहां सफाई कर्मचारी तैनात रहते हैं। एकदम स्वच्छ व्यवस्था। किसी भी श्रद्धालु को किसी प्रकार की परेशानी न हो इसका विशेष ध्यान रखा जाता है। ब्रेकदर्शन के लिए जब सर्वदर्शन की लाइन रोकी जाती है तब भी किसी को किसी तरह की परेशानी नहीं होती है क्योंकि सब पारदर्शी तरीके से किया जाता है। बताय जाता है कि तिरुमला तिरुपति देवस्थानम के चेयरमैन बी आर नायडू सक्रिय रूप से व्यवस्था पर नजर रखते हैं। दर्शन के बाद नीचे पहुंचने के लिए 40 मिनट का समय तय है। अगर आपका वाहन 40 मिनट के पहले नीचे के बैरियर तक पहुंचता है तो आपको जुर्माना देना होगा। ये व्यवस्था वाहनों की गति सीमा को कंट्रोल करने के लिए बनाई गई है। जिस प्रकार से मंदिरों में हिंदुओं की आस्था बढ़ रही है उसको ध्यान में रखते हुए दर्शन की व्यवस्था को बहुत बेहतर करने की आवश्यकता है। जिस प्रकार से युवाओं की सनातन में आस्था बढ़ रही है तो उनकी आस्था को गाढा करने के लिए आवश्यक है कि मंदिरों की व्यवस्था तिरुमला बालाजी मंदिर जैसी हो। 


Saturday, February 17, 2024

महाकवि निराला का हिंदू मन


नईदिल्ली के प्रगति मैदान में आयोजित विश्व पुस्तक मेला आज समाप्त हो जाएगा। इस वर्ष विश्व पुस्तक मेला में प्रकाशकों और पाठकों की भागीदारी ने पुस्तकों के प्रति आश्वस्ति को गाढा किया। इस बार पुस्तक मेले में श्रीराम साहित्य कई प्रकाशकों के यहां प्रमुखता से प्रदर्शित की गई थी। पाठक उन पुस्तकों को खरीद भी रहे थे। पुस्तक मेला मेरे लिए उन पुस्तकों की खोज और क्रय का अवसर होता है जो सामान्य तौर पर बाजार में नहीं मिलती है। इसी तरह की पुस्तकों की तलाश में जब वाणी प्रकाशन के स्टाल पर पुस्तकें देख रहा था तो नजर सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ की पुस्तक रामायण विनय-खण्ड पर पड़ी। इस पुस्तक की मुझे जानकारी नहीं थी। यह पुस्तक तुलसीदास कृत श्रीरामचरितमानस के कुछ अंशों का अवधी से हिंदी अनुवाद जैसा है। इसपर बाद में चर्चा होगी। पर इस पुस्तक के बारे में जो जानकारी मिली वो दिलचस्प है। वाणी प्रकाशन के अरुण माहेश्वरी से जब इस पुस्तक के बारे में पूछा तो उन्होंने एक किस्सा बताया। कोरोना महामारी के कुछ वर्षों पहले की बात है। अरुण माहेश्वरी किसी काम से काशी गए हुए थे। काशी के गोदौलिया क्षेत्र में पटरी पर पुस्तकें बेचनेवाले एक व्यक्ति की दुकान पर पहुंचे। वहां उपलब्ध पुस्तकों को उलटने पुलटने लगे। अचानक उनकी नजर पटरी पर लगी दुकान के एक छोर पर गई। वहां कुछ प्रकाशित पन्ने रखे हुए थे। जिज्ञासावश अरुण जी ने उन पन्नों को उठाया तो वो निराला की पुस्तक रामायण, विनय खण्ड के छपे हुए फर्मे थे। जाहिर तौर पर वो बिक्री के लिए रखे गए थे। अरुण जी उन छपे हुए फर्मों को खरीद लिया। काशी में उन्होंने निराला जी की इस पुस्तक के बारे में पूछताछ की। वहां कई तरह की बातें पता चलीं। किसी ने बताया कि ये पुस्तक जिस प्रेस को छपने दी गई थी वो प्रेस बंद हो गया। तबतक पुस्तक के फर्मे छप चुके थे। प्रेस बंद होने के बाद उन फर्मों को रद्दी में बेच दिया गया होगा। आदि । उन छपे हुए पन्नों को लेकर अरुण माहेश्वरी दिल्ली लौट आए। 

दिल्ली में उन्होंने कवि केदारनाथ सिंह, अब स्वर्गीय, से मिलकर उनको वो पन्ने दिखाए। केदारनाथ सिंह ने उन पन्नों को पढ़ने के बाद कहा कि ये निराला जी का ही लिखा है और उन्होंने इस पुस्तक को बचपन में देखा था। उसकी भाषा और डा रामविलास शर्मा का लिखा प्रथम संस्करण की भूमिका स्पष्ट कर रही थी ये निराला की ही पुस्तक है। डा रामविलास शर्मा की भूमिका पर 1 जून 1949 की तिथि अंकित है। फिर इस पुस्तक को पुनर्प्रकाशित करने की योजना बनी। केदारनाथ सिंह ने पुस्तक पर एक टिप्पणी लिखी, निरालाकृत इस काव्यानुवाद को मैंने तब देखा जब मैं बनारस में स्कूल का छात्र था। यह भी याद है कि यह संभव हुआ था त्रिलोचन जी के कारण, जिन्हें इस काव्यानुवाद की प्रर्ति राष्ट्रभाषा विद्यालय, काशी से प्राप्त हुई थी। निराला जी उन दिनों अस्वस्थ थे और विद्यालय के प्रधानाचार्य गंगाधर मिश्र के आवास पर विश्राम कर रहे थे। यह अनुवाद कार्य वहीं संपन्न हुआ था और उस समय काशी के अखबारों में इसकी चर्चा भी हुई थी। निराला जी रामायण (श्रीरामचरितमानस) का खड़ी बोली में भाषांतर कर रहे हैं। इसको लेकर वहां के साहित्यिक जगत में एक उत्सुकता भी थी। प्रतियां कम छपीं थी। इस कारण कम लोगों तक पहुंच सकीं। केदारनाथ सिंह ने ये भी स्पष्ट किया है कि यह पूरी रामायण का अनुवाद नहीं है केवल उसके विनयपरक छंदों का भाषांतरण इस पुस्तक में किया गया है। यहां एक प्रश्न उठता है कि निराला जी ने भाषांतरण के लिए श्रीरामचरितमानस को ही क्यों चुना। इसका उत्तर निराला की टिप्पणी से मिलता है, श्रीमद् गोस्वामी तुलसीदास जी का रामचरित-मानस या रामायण भारत की सर्वोत्तम काव्यकृति है, इसको इस समय यहां का वेद कहते हैं। इसके संबंध की बहुत सी बातें प्रकाश में नहीं आयीं। काफी अंधेरा है, अधिकार और अधिकारियों का प्रमाद भी।... जिन प्रांतो के विद्यार्थी अवधी नहीं जानते उनके लिए सुविधा हुई है। ऐसे भी नवें दसवें में इसका प्रचलन करने से विद्यार्थियों की खड़ी बोली अधिक पुष्ट हो जाएगी, इसका प्रमाण अधिकारीवर्ग पढ़ते ही समझ जाएंगे। आशा है पाठक पढ़कर राष्ट्रभाषा के विस्तार के प्रयत्न में हमारा उत्साह बढ़ाएंगे। रामविलास शर्मा इस पुस्तक के बारे में कहते हैं कि यह रामचरितमानस तक पहुंचने के लिए ऊंची नीची धरती पर रचे हुए एक नए मार्ग के समान है। इस पुस्तक के लिए निराला को तैयार करनेवाले श्री राष्ट्रभाषा विद्यालय के प्रधानाचार्य गंगाधर मिश्र ने उद्देश्य को और स्पष्ट किया था। उनका मानना था कि निराला श्रीरामचरितमानस के अनुवाद से इस ग्रंथ को सांस्कृतिक शिक्षा का आधार ग्रंथ बनाना चाहते थे। जिससे राष्ट्र की आत्यात्मिक चेतना जागरूक हो सके।  

अगर हमें निराला की रचनाओं पर समग्रता में विचार करें तो महाकवि निराला का मन बार बार हिंदू धर्म और परंपराओं में रमता हुआ दिखता है। उनकी कुछ कविताओं के आधार पर उनको कम्युनिस्ट और जनवाद आदि से जोड़कर हिंदुत्व और भारतीयता से दूर करने का खेल खेला गया। तोड़ती पत्थर कविता को कई बार उद्धृत किया गया। उस कविता में वर्णित गरीबी और मजदूरों की मेहनत को बार-बार रेखांकित करके विचारधारा विशेष का कवि घोषित किया गया। दूसरी तरफ सनातन धर्म और भारतीयता पर लिखे उनके लेखों को पाठकों की नजरों से ओझल करने का षडयंत्र किया गया। निराला जब समन्वय पत्रिका के संपादक थे तब उन्होंने श्रीरामचरितमानस के सातो कांडों की मौलिक व्याख्या करते हुए कई निबंध लिखे थे। रामविलास शर्मा ने माना है कि निराला की काव्य रचना पर तुलसीदास का प्रभाव था। यह प्रभाव भावों और विचारों के अलावा छंद रचना और ध्वनि पर भी दिखता है। इस सबंध में निराला के प्रबंध काव्य तुलसीदास को भी देखा जाना चाहिए। इन रचनाओं और कृतियों पर अकादमिक जगत में कम विचार हुआ। निराला पर काम करनेवाले आलोचकों ने उनके इस पक्ष पर ध्यान नहीं दिया। निराला पर विदेशी लेखकों और रविन्द्रनाथ ठाकुर के प्रभाव की चर्चा मिलती है। उनकी इतनी आलोचना हुई थी कि रामविलास शर्मा को कहना पड़ा था, निराला जो चार लाइनें बेहोशी में लिख देगा, वह चार जनम तुम होश में भी न लिखा पावोगे। उनके निधन के बाद भी उनपर आरोप लगते रहे, जीवनकाल में तो लगे ही थे। इस तरह के मसलों में उलझाकर निराला के लेखन के सनातन भाव तक जाने से पाठकों को रोका गया। निराला के तुलसी या श्रीरामचरितमानस पर लिखे लेखों अथवा गीताप्रेस गोरखपुर से निकलनेवाली पत्रिका कल्याण के उनके लेखों को मिलाकर निराला के हिंदू मन की चर्चा नहीं की गई। निराला तुलसी साहित्य के गहन अध्येता भी थे और उनके लेखों और प्रबंध काव्य में ये दिखता भी है। श्रीरामचरितमानस के विनयपरक छंदों का भाषांतरण करके उसको व्याप्ति दिलाने का प्रयत्न किया था। निराला के हिंदू मन को पाठकों के सामने लाने का प्रयत्न किया जाना चाहिए। यह कार्य कठिन भी नहीं है। पहले तो उनके सनातन और हिंदुत्व  को आधार बनाकर लिखे ग्रंथों और रचनाओं को पुस्तकालयों की धूल से बाहर लाकर पाठकों तक पहुंचाने का प्रयास हो। अकादमिक जगत में उन रचनाओं पर चर्चा हो, शोधार्थियों को उनपर शोध के लिए प्रेरित किया जाए। निराला रचनावली में अगर उनकी इन रचनाओं का समावेश नहीं है तो उसमें भी इन सारी रचनाओं को डालकर उसका पुनर्प्रकाशन करवाया जाए। निराला की रचनाओं को लेकर जो नैरेटिव गढ़ा गया उसको निगेट करने के लिए यह आवश्यक है कि निराला को समग्रता में पाठकों के सामने पेश कर दिया जाए। पाठकों में स्वयं निर्णय करने की क्षमता विकसित हो चुकी है। अमृतकाल में यह आवश्यक है।   


Saturday, July 30, 2022

उपन्यास सम्राट प्रेमचंद का हिंदू मन


आज उपन्यास सम्राट प्रेमचंद की जयंती है। 1880 में आज के ही दिन प्रेमचंद का जन्म हुआ था। आज एक बार फिर मार्क्सवादी लेखक और मार्क्सवाद में आस्था रखनेवाले प्रेमचंद को कम्युनिस्ट और प्रगतिशील और जाने किन विशेषणों से विभूषित करेंगे। इस तरह की प्रवृति बहुत लंबे समय से हिंदी साहित्य में चल रही है। प्रेमचंद के लेखन का मूल्यांकन करते समय मार्क्सवादी आलोचकों ने समग्रता में उनके कृतित्व को ध्यान में नहीं रखा। प्रेमचंद की उन कृतियों को या उन कार्यों को जानबूझकर ओझल कर दिया गया जिससे उनकी एक अलग ही छवि बनती है। प्रेमचंद को जबरन मार्क्सवादी बताने का ये खेल हिंदी साहित्य में लंबे समय तक चलता रहा। स्कूल और कालेज की पुस्तकों में प्रेमचंद की रचनाओं की व्याख्या इस तरह से की जाती रही कि उनकी आस्था मार्क्सवाद में थी और उनकी रचनाओं में ये प्रतिबंबित होती थी। विश्वविद्यालयों के हिंदी विभागों में मार्क्सवादियों का बोलबाला रहा है जिसकी वजह से छात्रों के मानस पर प्रेमचंद की मार्क्सवादी लेखक की छवि अंकित करवाने में उनको अधिक परेशानी नहीं हुई।  जिस भी लेखक ने प्रेमचंद की रचनाओं को समग्रता में सामने लाने का प्रयत्न किया उनको हाशिए पर रखने का उपक्रम मार्क्सवादियों ने चलाया, खासतौर पर विश्वविद्यालयों में। परिणाम ये हुआ कि लंबे कालखंड तक प्रेमचंद की रचनाओं का मूल्यांकन एकतरफा होता रहा। छात्र भी प्रेमचंद के लेखकीय व्यक्तित्व के एक ही रूप से परिचित होते रहे। ये सिर्फ प्रेमचंद के साथ ही नहीं किया गया बल्कि हिंदी के तमाम लेखकों के साथ ऐसा किया गया। निराला के उन लेखों को साहित्य जगत में सामने ही नहीं आने दिया गया जो उन्होंने कल्याण पत्रिका में लिखे थे। निराला ने कल्याण पत्रिका के अलग अलग अंकों में कई लेख लिखे थे लेकिन उसपर हिंदी में चर्चा नहीं हुई। 

प्रेमचंद की रचनाओं में हिंदू संस्कृति को लेकर कितना कुछ लिखा गया है या उनकी कहानियों में हिंदू संस्कृति किस तरह से मुखर हुई है इसपर प्रेमचंद साहित्य के विद्वान कमलकिशोर गोयनका ने काफी लिखा है। गोयनका को विचारधारा विशेष के विरुद्ध जाकर लिखने की कीमत भी चुकानी पड़ी। अपमान झेलना पड़ा।  साहित्यिक मंच पर सरेआम धमकियां दी गईं। लेकिन कहते हैं न कि सत्य को बहुत दिनों तक रोका नहीं जा सकता है। अब प्रेमचंद के अनेक रूप उपस्थित हो रहे हैं। पिछले दिनों विश्वविद्यालय प्रकाशन, काशी ने प्रेमचंद के संपादन में 1933 में प्रकाशित हंस पत्रिका के काशी अंक का पुनर्प्रकाशन किया। अक्तूबर-नवंबर 1933 में प्रकाशित पत्रिका के इस अंक के लेखों को देखकर संपादक प्रेमचंद की रुचि का पता चलता है। प्रेमचंद के संपादन में निकली इस पत्रिका में एक लेख प्रकाशित है, काशी: हिंदू संस्कृति का केंद्र। इसमें लेखक ने लिखा है- ‘मध्य युग में देश पर बाहरवालों के कितने ही हमले हुए। उत्तर भारत का कोई भी प्रसिद्ध नगर उनके विनाशकारी प्रभाव से नहीं बचा। काशी पर भी सुल्तान नियाल्तगीन, कुतबुद्दीन इबुक के, तथा मुगल-काल में भी कितने ही हमले हुए, परंतु काशी की महिमा का मुख्य आधार व्यापारिक अथवा राजनीतिक महत्ता कभी नहीं रहा, उसका अटूट संबंध तो धर्म और संस्कृति से था। यदि कोई विजयी शासक नगर में लूटपाट मचा देता, मंदिर या मूर्तियों को विध्वंस्त करवा देता, अथवा लोगों का दमन करने लगता तो यह अवश्य था कि काशी कुछ दिनों के लिए श्रीविहीन हो जाती परंतु उसपर कोई वास्तविक प्रभाव न पड़ता था। हर साल फिर ग्रहण पड़ते, अमावस्या और एकादशी आतीं और उनके साथ ही साथ आता- स्त्री-पुरुषों का विशाल जनसमूह जो काशी की गलियों, घाटों और मंदिरों में समा जाता। फिर सदा की भांति प्रात: और संध्या आरती, काशी नगरी में घंटे और शंख के गंभीर निनाद के साथ भक्तों की कंठ ध्वनि मिलकर फिर वही अपूर्व समां बांध देती, मानो कुछ हुआ ही न हो।‘  इस उद्धरण से कई बातें स्पष्ट रूप से सामने आती हैं। पहला ये कि बाहर से कई हमले काशी पर हुए, मुगलों ने भी किए। मंदिर और मूर्तियां नियमित अंतराल पर तोड़ गए, लेकिन हिंदू संस्कृति में वो ताकत है कि वो इन हमलों को न केवल झेल गई बल्कि वापस उठ खड़ी हुई। प्रेमचंद अपने संपादन में इस तरह के लेख प्रकाशित करके उस वक्त अपना सोच देश के सामने रख रहे थे। 

हंस पत्रिका के इसी अंक में प्रेमचंद ने  काशी विश्वनाथ मंदिर पर भी एक लेख प्रकाशित किया। इस लेख का एक महत्वपूर्ण अंश देखा जाना चाहिए, ‘काशी के श्रीविश्वनाथ मंदिर में स्वयंजात ज्योति:स्वरूप लिंग हैं, इनके ही दर्शन और अर्चन से भक्त लोग अपनी समस्त कामनाओं की पूर्ति के साथ-साथ मोक्ष जैसा अलभ्य प्राप्त करने काशी आते हैं। स्वर्गीय महारानी अहित्याबाई ने पंच मंडप-संयुक्त एक विशाल मंदिर बनवा दिया। 51 फीट ऊंचा यह वर्तमान मंदिर कीमती लाल पत्थरों से बना है। इसके बाद ही सन् 1839 ई. में सिख जाति के मुकुटमणि पंजाब केशरी स्वर्गीय महाराजा रणजीत सिंह ने मंदिर के ऊपरी हिस्से को स्वर्ण मंडित करके उसकी सौगुनी शोभा बढ़ा दी।‘  इस लेख की ही कुछ और पंक्तियां, मुसलमान शासकों ने प्राचीन मंदिर को तोड़ा था, उन्हीं ने वर्तमान मंदिर के सिंहद्वार के सामने एक नौबतखाना बनवा दिया, जहां अबतक नौबत बजती है, जिसके ऊपर से विजातीय लोग दर्शन किया करते हैं। केवल दर्शन ही नहीं अंग्रेज लोग पूजोपहार और दक्षिणा भी दे जाते हैं। सम्राट पंचम जार्ज से लेकर प्रत्येक वायसराय विश्वनाथ-दर्शन कर चुके हैं। अभी हाल ही में जब लार्ड इरविन आए थे तब श्रद्धा के साथ चांदी के पूजा-पात्र उपहारस्वरूप भेंट कर गए थे। इस तरह विश्वनाथ इस समय समस्त जातियों द्वारा सम्मानित और पूजित होकर काशी में सुख से विराज रहे हैं।‘ 

उपरोक्त दोनों उद्धरणों में एक बात जो समान है कि मुस्लिम आक्रांताओं ने काशी में मंदिर और मूर्तियां तोड़ीं। इस पत्रिका के कई अन्य लेखों में भी मंदिरों के तोड़े जाने का प्रसंग आया है। एक और लेख है काशी का इतिहास उसमें भी लेखक ने विस्तार से काशी पर हुए अनके हमलों का उल्लेख किया है। इसमें इस बात का जिक्र भी है कि शाहजहां ने भी काशी में मंदिर तुड़वाए थे। धर्मांध औरंजगजेब ने यहां के मंदिर तुड़वाने की आज्ञा प्रचलित की जिनके चिन्ह स्वरूप ज्ञानवापी और बेनीमाधन की मस्जिदें अभी तक मौजूद हैं। औरंगजेब ने तो काशी का नाम बदलकर मुहम्मदाबाद रखा था पर वो प्रचलित नहीं हो पाया। लेकिन मुगलकाल में काशी की जो टकसाल थी वहां के कुछ सिक्कों और कागजों में ये नाम मिलता है। मंदिरों और मूर्तियों को तोड़े जाने के अलावा प्रेमचंद के संपादन में निकले इस अंक से एक और ध्वनि निकलती है वो है हिंदू धर्म और संस्कृति की । 

इस अंक से प्रेमचंद की हिंदू धर्म और संस्कृति में आस्था का पता चलता है। बार बार मंदिरों के तोड़े जाने का उल्लेख इस बात की ओर संकेत करता है कि संपादक इससे आहत था।  उसको अपनी पत्रिका के माध्यम से आमजन तक पहुंचाना भी चाहता था क्योंकि अगर इन लेखों में प्रयुक्त वक्तव्यों, उद्धरणों और घटनाओं के आवरण को हटाकर भीतर छिपी मूल भावनाओं को देखें आपको प्रेमचंद का हिंदू मन दिखाई देगा। वो हिंदू मन जो अपने मंदिरों के तोड़े जाने से आहत है, वो हिंदू मन जो अपनी संस्कृति पर हुए हमलों से दुखी है, वो हिंदू मन जो सनातन संस्कृति की शक्ति को जानता है, वो हिंदू मन जो अपनी परंपरा से विद्रोह का खोखला नारा नहीं लगता बल्कि अपनी परंपरा को अपनी लेखनी से समृद्ध करता है। जो मार्क्सवादी लेखक विचारधारा की शिलाखंड पर बैठकर प्रेमचंद के साम्यवादी होने का शोर मचाते हैं उनको प्रेमचंद के संपादन में प्रकाशित पत्रिकाओं के अंक देखने चाहिए। 


Saturday, May 28, 2022

औरंगजेब पर अज्ञान का प्रदर्शन


काशी में ज्ञानवापी परिसर स्थित मस्जिद के सर्वे और अदालती कार्यवाही के बाद कई तरह के इतिहासकार सामने आने लगे हैं। वामपंथी रुझान और वामपंथी विचारधारा के पोषक कुछ साहित्यकार और लेखक भी इस विषय पर अपने अज्ञान का सार्वजनिक प्रदर्शन कर रहे हैं। कई तो मुगल बादशाह औरगंजेब के समर्थन में भी तर्क खोजकर ला रहे हैं। इंटरनेट मीडिया पर इस तरह के मनोरंजक टिप्पणियां देखी जा सकती हैं। एक लेखक महोदय तो किसी किताब से हवाले से ये तक लिख गए कि मंदिर के तहखाने में बलात्कार हुआ था और औरंगजेब को पता चला तो उसने उस जगह को अपवित्र मानकर मंदिर को ध्वस्त करवा दिया। इस मनोरंजक तर्क को लिखते समय लेखक महोदय ये भूल गए कि अगर कोई जगह अपवित्र हो गई तो वहां मंदिर गिराकर मस्जिद कैसी बनवाई जा सकती है। क्या मंदिर को ध्वस्त करके मस्जिद बनाकर किसी जगह को पवित्र किया जा सकता है? बलात्कार को लेकर अगर औरंगजेब इतना ही संवेदनशील था तो बीजापुर और गोलकुंडा आक्रमण के समय बलात्कर की असंख्य घटनाओं पर उसका दिल क्यों नहीं पसीजा था। दक्षिण भारत पर औरंगजेब के आक्रमण के समय जितनी बलात्कार की घटनाएं हुई उसकी तुलना सिर्फ 1971 में पूर्वी पाकिस्तान (अब बंगलादेश) में पाकिस्तानी सैनिकों की क्रूरता से की जा सकती है। दरअसल वामपंथियों का और स्वयं को धर्मनिरपेक्ष बतानेवाले लेखकों और इतिहासकारों का ये पुराना शौक रहा है। उनके लेखन में विदेशी आक्रांताओं को लेकर एक खास किस्म की उदारता दिखाई देती है। इसके पीछे की वजह क्या है ये पता नहीं लेकिन इतना अवश्य कहा जा सकता है कि इस प्रकार के स्वयंभू इतिहासकार समाज के लिए खतरनाक हैं। इनकी अज्ञानता की वजह से और गलत स्थापनाओं के कारण दो समुदायों के बीच नफरत पैदा होती है। 

औरंगजेब को लेकर वामपंथी लेखकों को सर जदुनाथ सरकार की पुस्तक पढ़नी चाहिए जिससे इस क्रूर शासक के बारे में सबकुछ स्पषट हो जाएगा। पांच खंडों में प्रकाशित सरकार की पुस्तक ‘हिस्ट्री आफ औरंगजेब’ में जदुनाथ सरकार ने सप्रमाण बताया है कि किस फरमान के अंतर्गत काशी के मंदिर को तोड़ा गया था। उन्होंने फरमान का स्त्रोत भी बताया है, छद्म इतिहासकार की तरह सिर्फ मनगढ़ंत बातें नहीं की है । एजेंडा के तहत इतिहास लेखन या टिप्पणी करनेवालों ने सर जदुनाथ सरकार की पुस्तक या तो पढ़ी नहीं या पढ़कर भी अनभिज्ञ बने रहते हैं। हिंदुओं से घृणा करनेवाले शासक औरंगजेब के पक्ष में वामपंथी इतिहासकार पहले भी अनेक तरह के छद्म रचते रहे हैं। कुछ दशक पहले ये थ्योरी पेश करने की कोशिश की गई थी औरंगजेब हिंदुओं को लेकर उदार था। इसके लिए ये तर्क दिया जाता था कि उसने मनसबदारी प्रथा को बढ़ावा दिया। उसके कालखंड में अकबर के समय से अधिक हिंदू मनसबदार थे। यह सही है कि औरंगजेब के कालखंड में हिंदू मनसबदारों की संख्या अधिक थी लेकिन इसकी वजह उसका हिंदू प्रेम नहीं बल्कि मनसबदारी को बढ़ावा देना था। औरंगजेब के समय हिंदू मनसबदारों की संख्या जरूर अधिक दिखाई देती है लेकिन अगर इसको आनुपातिक तौर पर देखा जाए तो वो कम थी। अर्धसत्य बताना मार्क्सवादियों की पुरानी आदत रही है। तभी तो किसी ने व्यग्यात्मक लहजे में कहा था कि मार्क्सवादी इतिहासकारों के पास ईश्वर से भी अधिक ताकत होती है क्योंकि ईश्वर अतीत नहीं बदल सकता है लेकिन इस विचारधारा के इतिहास लेखकों के पास अतीत को बदलने की शक्ति होती है। हिंदुओं पर लगनेवाला कर जजिया को अकबर ने खत्म किया था लेकिन औरंगजेब ने उस कर को फिर से लागू कर दिया था। उसने हिंदुओं की तीर्थयात्रा पर भी कर लगा दिया था। जदुनाथ सरकार ने अपनी पुस्तक में श्रमपूर्वक औरंगजेब के सारे कारनामों को कलमबद्ध किया है। इस वजह से मार्क्सवादी इतिहासकार सामूहिक रूप से एजेंडे के तहत जदुनाथ सरकार का नाम सुनते ही अलग रास्ते पर चले जाते हैं। 

दरअल अगर हम उपलब्ध ऐतिहासिक साक्ष्यों को समग्रता में देखते हैं तो ये पता चलता है कि विदेश से आए मुस्लिम शासकों ने हिंदुओं पर कितना और किस तरह से घृणित अत्याचार किए। 1953 में केंद्र सरकार की सहमति के बाद अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग ने फारसी और अरबी में उपलब्ध ऐतिहासिक महत्व की सामग्री और स्त्रोत का हिंदी में अनुवाद और प्रकाशन आरंभ किया था। हिंदी में अनुवाद का कार्य सैयद अतहर अब्बास रिजवी ने किया था। इस योजना के अंतर्गत तुगलककालीन भारत के नाम से 1956 में पहली बार पुस्तक छपी। बाद में राजकमल प्रकाशन ने 2008 और 2016 में इन पुस्तकों का पुर्नप्रकाशन किया। 1320 से लेकर 1359 तक का तुगलक वंश का इतिहास तमाम तरह के अरबी फारसी के ऐतिहासिक पुस्तकों और यात्रियों के विवरणों के आधार पर प्रस्तुत किया गया है। तीन खंडों में प्रकाशित इस पुस्तक के पहले खंड में इब्ने बत्तूता का यात्रा विवरण भी है। इसमें बत्तूता ने मुहम्मद बिन तुगलक के शासनकाल में ईद के विशेष दरबार  की चर्चा की है। वो कहते हैं, ‘ईद के दिन महल में फर्श बिछाए जाते हैं और उन्हें बड़े सुंदर ढंग से सजाया जाता है। दरबार के कक्ष के बाहर वारगाह खड़ी की जाती है । यह एक बहुत बड़े मंडप के समान होती है (पृ 188)।‘ इसमें आगे दरबार और अवसर विशेष पर लगनेवाले सिंहासन की भव्यता का वर्णन है। आगे वो लिखते हैं, ‘हाजिब तथा नकीब अपने स्थानों पर खड़े होते हैं। तत्पश्चात गायक तथा नर्तकियां प्रविष्ट होती हैं। सर्वप्रथम काफिर (हिंदू) राजाओं की पुत्रियां जो उस वर्ष युद्ध में बंदी बनाई जाती हैं, आकर गाती नाचती हैं। तत्पश्चात वो अमीरों और मुख्य परदेशियों को प्रदान कर दी जाती हैं। इसके उपरांत अन्य काफिरों की पुत्रियां आकर नाचती गाती हैं। जब वे नाच गा चुकती हैं तो सुल्तान उन्हें अपने भाइयों, संबंधियों और मलिकों के पुत्रों आदि को दे देता है। सुल्तान ये दरबार अस्त्र की नमाज के पश्चात करता है। दूसरे दिन पुन: इसी प्रकार अस्त्र के उपरांत दरबार होता है। इसमें गायकायें लाई जाती हैं। जब वे नाच जा चुकती हैं तो सुल्तान उन्हें ममलूक के अमीरों (मुख्य दासों) को दे देता है (पृ 189)।‘ आगे बत्तूता सातवें दिन तक का विवरण देता है। ईद के समय लगनेवालों इन दरबारों में हिंदू राजाओं की बेटियों के साथ तुगलक क्या सलूक करता है वो स्पष्ट है। इस पुस्तक में इस तरह की कई घटनाओं का वर्णन है। सुल्तान के कर्मचारियों के खाने के लिए चावल कूटने के लिए लाई जानेवाली स्त्रियों की मृत्य का प्रसंग भी ह्रदय विदारक है। वो लिखते हैं कि सुल्तान के महल में सैकड़ों स्त्रियां नित्य मृत्यु को प्राप्त होती थीं।... जब वो रुग्ण हो जाती थीं धूप में पड़ जाती थीं और मर जाती थीं। (पृ.297)। क्या कभी इसपर मार्क्सवादियों ने समग्रता में विचार किया। क्या स्त्री विमर्श के झंडाबरदारों ने इसपर ध्यान दिया। 

दरअसल मुगलों समेत तमाम विदेशी आक्रांताओं ने हिन्दुस्तान की जनता पर भयानक अत्याचार किए। कईयों के शासन काल में सैकड़ों मंदिर तोड़े गए और इन सबके प्रमाण उपलब्ध हैं। जरूरत इस बात की है कि उन उपलब्ध प्रमाणों को जनता के सामने लाया जाय। सत्य और तथ्य के सामने आने से कई तरह की गलतफहमियां दूर होती हैं। जो लोग औरंगजेब से लेकर तुगलक और बाबर का गुणगान करके देश की जनता को बरगलाने का काम करते हैं वो एक्सपोज होंगे। जो भ्रमित होकर औरंगजेब को अपना पूर्वज मानते हैं उनके सामने भी अपने अतीत पर पुनर्विचार करने का अवसर पैदा होगा। आजादी के अमृत महोत्सव वर्ष में अगर इतिहास को तथ्यों के आधार पर लिखने और उसके प्रकाशन का कार्य आरंभ हो सके तो अच्छा रहेगा। इसको एक मिशन के तौर पर आरंभ करके पूरा करना चाहिए। ये कार्य देशहित में आवश्यक है।