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Saturday, May 29, 2021

नए अंदाज में रामकथा का चित्रण


पिछले दिनों राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित समीक्षक विनोद अनुपम जी से बात हो रही थी। बात फिल्मों से होते हुए वेब सीरीज ‘रामयुग’ पर जा पहुंची। उन्होंने बहुत ही दिलचस्प बात कही कि राम कथा दुनिया की एकमात्र ऐसी कहानी है जिसके क्लाइमेक्स को जानने की उत्कंठा नहीं होती, बस उससे गुजरते जाने का मन करता है। कोरोना संक्रमण के पहले दौर में दूरदर्शन पर रामानंद सागर के रामयण को फिर से दिखाया गया था। दर्शकों ने उसको खूब पसंद किया था। व्यूअरशिप के कई नए कीर्तिमान बने थे। जब कोरोना संक्रमण का दूसरा दौर आया तो लगभग उसी समय एमएक्स प्लेयर पर वेब सीरीज ‘रामयुग’ रिलीज की गई। इस वेब सीरीज को लेकर इन दिनों काफी चर्चा हो रही है। चर्चा इसके कथा कहने के अंदाज को लेकर हो रही है। ‘रामयुग’ में कहानी का आरंभ ‘स्वर्णमृग’ प्रसंग से होता है और फिर कहानी आगे बढ़ती जाती है। ‘रामयुग’ में कहानी फ्लैशबैक के सहारे आगे बढ़ती है। आठ एपिसोड की इस सीरीज में इसी प्रविधि को अपनाया गया है। कहानी कहने के अंदाज के अलावा इसके फिल्मांकन से लेकर, कलाकारों की वेशभूषा और संवाद अदायगी तक में एक नयापन है। इस वेब सीरीज के निर्देशक कुणाल कोहली हैं, संवाद लेखक कमलेश पांडेय हैं और रामायण सलाहकार स्वर्गीय नरेन्द्र कोहली हैं। ‘रामयुग’ का राम या रावण या अन्य पात्र राजा रवि वर्मा के राम के चित्र या रामानंद सागर के राम की वेशभूषा से मुक्त होकर आधुनिक गेटअप में हैं। राम के चरित्र के साथ कोई बदलाव नहीं किया गया है लेकिन एक संदेश ये है कि हर युग का अपना राम और अपना रावण होता है। रामयुग की एक और विशेषता है कि इस सीरीज में भले ही राम को आधुनिक रूप में दिखाने की कोशिश की गई हो लेकिन उनके मर्यादा पुरुषोत्तम के चरित्र को उसी तरह से पेश किया गया है जैसा कि वाल्मीकि ने ‘रामायण’ में या तुलसीदास ने ‘श्रीरामचरितमानस’ में किया है। इस कहानी में ज्यातार प्रसंग श्रीरामचरितमानस से लिए गए हैं लेकिन कुछ प्रसंगों का फिल्मांकन वाल्मीकि के रामायण के अनुसार किया गया है, जैसे राम रावण युद्ध के समय का जो दृश्य है या फिर मेघनाथ और कुंभकर्ण से युद्ध के समय दृश्य रामायण से लिया गया प्रतीत होता है। 

‘रामयुग’ की कहानी में कई बदलाव भी किए गए हैं, हो सकता है कि विद्वान पटकथा लेखक और सलाहकार ने राम कथा को अलग अलग ग्रंथों से लिया होगा। जैसे मेघनाद के संहार का जो प्रसंग ‘रामयुग’ में दिखाया गया है उसका उल्लेख न तो श्रीरामचरितमानस में मिलता है और न ही वाल्मीकि के रामायण में। रामयुग में जब मेघनाद का संहार करने के लिए लक्ष्मण पहुंचते हैं तो वो नदी में पूजा कर रहा होता है। इस वेब सीरीज में लक्ष्मण को देखकर मेघनाद कहता है कि निहत्थे पर वार करना उचित नहीं होता है लेकिन लक्ष्मण उसको याद दिलाते हैं कि रावण ने जब सीता का हरण किया था तो वो निहत्थी थीं, जटायु को जब रावण ने मारा था तब पक्षीराज निहत्थे थे। इतना कहने के बाद लक्ष्मण ने मेघनाथ पर बाण से वार कर उसका वध कर दिया। युद्ध के पहले पूजा का प्रसंग श्रीरामचरितमानस में भी है, लेकिन वहां इस बात उल्लेख है कि जब मेघनाद साधना कर रहा था और लक्ष्मण वहां अंगद, नील, नल, मयंद और हनुमान के साथ पहुंचे थे। अपनी साधाना में बाधा देखकर मेघनाद बहुत नाराज हुआ था और उसने लक्ष्मण पर प्रचंड त्रिशूल से वार किया था। मेघनाथ के उस वार को  लक्ष्मण जी ने अपने बाण से काट दिया था। तुलसीदास जी कहते भी हैं, ‘प्रभु कहं छांड़ेसि सूल प्रचंडा, सर हति कृत अनंत जुग खंडा’। यहां पर मेघनाद और लक्ष्मण के बीच युद्ध होता है लेकिन ‘रामयुग’ में  मेघनाद के निहत्था होनेपर वध दिखाना हैरत में डालता है। संभव है लेखकों ने किसी और भाषा के रामायण से इस प्रसंग को उठाया हो। 

‘रामयुग’ में कहानी चूंकि फ्लैशबैक प्रविधि के साथ चलती है और आठ एपिसोड में खत्म करने का दबाव रहा होगा इसलिए कई प्रसंगों को छोटा किया गया है। कई प्रसंगों को अपेक्षाकृत कम नाटकीय दिखाया गया है। युद्ध में कुंभकर्ण तो बहुत ही जल्दी मार डाला जाता है। राम उसके दोनों हाथ काटते हैं और फिर गरदन। इस वेब सीरीज में राम तलवार से कुंभकर्ण की गर्दन काटते दिखाए गए हैं जबकि श्रीरामचरितमानस में तो राम अपने बाणों से उसकी गरदन काटते हैं और कुंभकर्ण का कटा हुआ सर रावण के आगे जाकर गिरता है जिसको देखकर रावण बहुत व्याकुल हो उठता है। तुलसीदास कहते भी हैं- ‘सो सिर परेउ दसानन आगें, बिकल भयउ जिमि फनि मनि त्यागें।‘ लेकिन सीरीज में ऐसा नहीं चित्रित किया गया है। वेब सीरीज में रावण वध के प्रसंग को थोड़ा नाटकीय किया गया है। दस रावण चारो तरफ से घेरकर राम के साथ युद्ध करते हैं। रावण वध का प्रसंग श्रीरामचरितमानस से लिया गया है। वेब सीरीज में राम अपने बाण से रावण की नाभि पर वार करते हैं क्योंकि उनको विभीषण ने बताया था कि रावण की नाभिकुंड में अमृत का निवास है और वो उसके ही बल पर जीता है। तुलसीदास जी लिखते भी हैं कि, ‘सायक एक नाभि सर सोषा, अपर लगे भुज सिर करि रोषा’। यानि कि एक बाण ने रावण नाभि के अमृतकुंड को सोख लिया और बाकी तीस बाण उसके सिरों और भुजाओं में जा लगे। वाल्मीकि रामायण में पूरा प्रसंग अलग है। यहां रावण का वध ब्रह्मा जी के दिए अस्त्र से होता है जिसका निर्माण ब्रह्मा जी ने इंद्र के लिए किया था। उस बाण का संधान कर राम ने रावण की छाती पर वार किया जिससे उसकी मौत हो गई। वाल्मीकि रामायण में संस्कृत में जो लिखा है जिसका हिंदी में अनुवाद ये है कि शरीर का अंत कर देनेवाले उस महान वेगशाली बाण ने छूटते ही दुरात्मा रावण के हर्दय को विदीर्ण कर डाला।  

रामयुग को लेकर कुछ लोगों ने आपत्तियां भी जताई हैं कि इसमें मूल कथा से छेड़छाड़ की गई है। लेकिन इस सीरीज को देखने के बाद ये लगता है कि पटकथा लेखक ने कुछ छूट जरूर ली है लेकिन ये छूट रचनात्मक दायरे में है। ऐसा लगता है कि इस सीरीज के निर्माता और पटकथा लेखक ने रामकथा को आधुनिक और समकालीन बनाने के लिए इस तरह का बदलाव किया है। यह अकारण नहीं है कि राम जब वनवास में होते हैं तो बेहद करीने से ट्रिम की गई दाढ़ी रखते हैं, रावण का हाव भाव एक दंभी खलनायक की तरह का है। ये बदलाव सकारात्मक इस वजह से कहे जा सकते हैं क्योंकि आज के युवा अपने आपको इस कथा से एकाकार कर सकते हैं। इस सीरीज के लेखक बार-बार रावण और राम के मुंह से ये बात कह कर इन बदलावों का औचित्य भी साबित करते हैं। हर युग का अपना राम होता है, हर युग का अपना रावण होता है। कहने का मतलब ये कि हर युग में अच्छाई और बुराई का स्वरूप होता है। इस सीरीज को देखते हुए नरेन्द्र कोहली जी का भी स्मरण हो आया क्योंकि उनसे जब भी बात होती थी तो वो रामकथा को इसी स्वरूप में देखते थे। वो हमेशा वानरों को वनवासी के तौर पर देखते थे।  उनका मानना था कि रामकथा हर युग में अपने बदले हुए स्वरूप में सामने आती है। मूल कथा तो राम, सीता के बीच रावण के आ जाने की ही है। कथा कहने की प्रविधि और घटनाएं और परिस्थियों में अंतर हो सकता है। यही ‘रामयुग’ में दिखता है।  

Sunday, April 18, 2021

साहित्य का शीर्ष कलश


पिछले दिनों नरेन्द्र कोहली की एक पुस्तक आई थी, ‘समाज जिसमें मैं रहता हूं’। उस पुस्तक की आरंभिक प्रतियों में से एक उन्होंने मुझे भिजवाई थी। ये उनके संस्मरणों और भाषा आदि को लेकर लिखे लेखों का संग्रह है। उनकी इच्छा थी कि मैं इस पुस्तक को पढ़कर उनसे चर्चा करूं। मैंने पुस्तक को तत्काल पढ़कर उनको फोन किया और पुस्तक के बारे में खूब अच्छी अच्छी बातें उनसे कहीं, कई उल्लिखित प्रसंगों पर उनसे चर्चा भी की। बातचीत के दौरान मुझे लगा कि वो अपनी तारीफ से इतर वो कुछ सुनना चाह रहे थे। मेरे पास वो बातें थीं लेकिन मैं कह नहीं पा रहा था। बात आई गई हो गई। इस बीच मैंने उनके प्रकाशक को फोन करके बता दिया कि कोहली जी की उक्त पुस्तक में प्रूफ की अनेक गलतियां हैं जो उनकी प्रतिष्ठा के विपरीत हैं। अभी पांच अप्रैल को उनसे बहुत लंबी बात हुई, देश दुनिया, समाज, राजनीति और साहित्यिक जगत की। उस दौरान भी मेरे दिमाग में ये बात आई कि पुस्तक की खामियों की ओर उनका ध्यान दिला दूं , लेकिन हिम्मत नहीं पड़ी। लेकिन मेरे मन के किसी कोने में अंतरे में ये बात अटकी हुई थी कि कोहली जी को ये तो बताना ही होगा कि उनकी पुस्तक में भी कमियां हैं। ये इस वजह से भी था कि वो हमेशा शब्दों के प्रयोग और उसको लिखने के तरीके को लेकर सचेत रहते थे। अगले दिन उनको व्हाट्सएप पर संदेश भेजा, ‘आपकी पुस्तक में प्रूफ की कई गलतियां हैं जो नहीं होनी चाहिए थीं’। तुरंत जवाबी संदेश आया, ‘तुमने सही प्रतिक्रिया देने में बहुत देर कर दी, पता नहीं क्यों?’ मैंने लिखा, ‘आपसे डरकर’ । उनका उत्तर, ‘सत्य कहने में भय किस बात का और तुम कब से डरकर सत्य बोलने से बचने लगे?’ मैंने हाथ जोड़ लिए। मेरी कोहली जी से ये अंतिम बातचीत थी, लेकिन इस बातचीत ने मुझे बहुत शक्ति दी थी। वो इसी तरह से बातचीत के दौरान और कभी कभार संदेश भेजकर मुझे शब्दों के प्रयोग और मेरे लेख पर प्रतिक्रिया दिया करते थे, ये उनका सिखाने का तरीका था। 

नरेन्द्र कोहली से मेरा परिचय मेरे मित्र और वाणी प्रकाशन के अरुण माहेश्वरी ने करवाया था। वर्ष ठीक से याद नहीं है लेकिन करीब दस साल से अधिक तो हो ही गए होंगे। फिर हम लोगों ने देश-विदेश की कई यात्राएं साथ-साथ कीं। इन यात्राओं के भी कई दिलचस्प किस्से हैं, प्रसंग हैं। कोहली जी की श्रीराम में जबरदस्त आस्था थी। वो हर बात में ये कहा करते थे कि रामजी की यही इच्छा रही होगी। उनकी इस आस्था का प्रकटीकरण तब हुआ जब वो एक कार्यक्रम के सिलसिले में अयोध्या गया। कार्यक्रम की आयोजक मालिनी अवस्थी के सामने उन्होंने शर्त रखी कि वो अयोध्या तभी जाएंगें जब रामलला के दर्शन की व्यवस्था हो पाएगी। आयोजकों ने उनकी बात मानी। वो अयोध्या गए। रामलला के दर्शन भी किए। दर्शन के बाद कोहली जी फफक फफक कर रोने लगे। उन्होंने अपने जीवनकाल में पहली बार अयोध्या में रामलला के दर्शन तक किए जब सुप्रीम कोर्ट का राम जन्मभूमि पर फैसला आ गया। मालिनी अवस्थी और युवा कवि राहुल नील इस पल के गवाह बने थे। बाद में पता चला कि उन्होंने ये तय किया हुआ था कि रामलला के दर्शन करने अयोध्या तभी जाएंगे जब जन्मभूमि के तमाम विवाद समाप्त हो जाएंगे। 

दैनिक जागरण में जब हमने ‘हिंदी हैं हम’ अभियान का आरंभ किया तो नरेन्द्र कोहली जी पहले कार्यक्रम के अतिथि थे। दैनिक जागरण बेस्टसेलर की जब शुरुआत हुई तो पहली सूची नरेन्द्र कोहली ने जारी की थी। संवादी लखनऊ से लेकर बिहार संवादी तक में कोहली जी की भागीदारी रही थी। अपनी भाषा हिंदी को लेकर उनमें एक जबरदस्त प्रेम था और उनका यह प्रेम बहुधा गोष्ठियों में दिख भी जाता था। उनके निधन से हिंदी को अपूरणीय क्षति हुई है। वो हिंदी साहित्य के शीर्ष कलश थे।  


Tuesday, March 30, 2021

समकालीन लेखन के केंद्र में पौराणिक चरित्र


पिछले दिनों दो पुस्तकें एक साथ आईं जिसने बरसबस अपनी ओर ध्यान खींचा। एक पुस्तक है लेखिका कोरल दास गुप्ता की ‘अहिल्या’ और दूसरी है ‘उर्मिला: सीता की बहन की गाथा’ जिसे कविता काणे ने लिखा है। इन दो पुस्तकों के अलावा भी कई ऐसी पुस्तकें आई हैं जो भारतीय पौराणिक चरित्रों को केंद्र में रखकर लिखी गई हैं। दरअसल पिछले कई सालों में अंग्रेजी समेत अन्य भारतीय भाषाओं में पौराणिक चरित्रों पर ढेरों पुस्तकें लिखी गई हैं। हिंदी में भी लेखकों ने इन चरित्रों को विषय बनाना शुरू कर दिया है। समकालीन साहित्यिक परिदृष्य के विश्लेषण से पौराणिक लेखन की ये प्रवृत्ति साफ तौर पर रेखांकित की जा सकती है, ये एक नया ट्रेंड है। आज से अगर तीन दशक पहले के हिंदी के साहित्यिक परिदृश्य को याद करें तो नरेन्द्र कोहली और मनु शर्मा जैसे लेखक ही थे जो पौराणिक कथाओ और चरित्रों को अपने लेखन का विषय बनाते थे। हिंदी में नरेन्द्र कोहली के अलावा कन्नड़, मलयालम और तमिल में पौराणिक पात्रों पर विपुल और उच्च स्तरीय लेखन हुआ है। इक्कीसवीं सदी के आरंभ में साहित्य सृजन के आकाश पर अमीश त्रिपाठी का उदय होता है। उन्होंने शिवत्रयी की पहली किताब ‘द इममॉर्टल्स ऑफ मेलुहा’ लिखा। अंग्रेजी में लिखी इस औपन्यासिक कृति की सफलता ने अमीश को चर्चित लेखक के तौर पर स्थापित कर दिया। 

इन दिनों ये भी लक्षित किया जा सकता है कि भारतीय भाषाओं में पौराणिक पात्रों को लेकर स्वतंत्र पुस्तकों का लेखन और प्रकाशन हो रहा है। भारतीय पौराणिक ग्रंथों में वर्णित पात्रों पर स्वतंत्र रूप से किताबें लिखी जा रही हैं। ना केवल पात्रों बल्कि घटनाओं और स्थानों को केंद्र में रखकर भी लेखन हो रहा है। इन पुस्तकों को पाठक भी मिल रहे हैं। पाठकों की रुचि को ध्यान में रखते हुए प्रकाशकों ने भी पौराणिक कथाओं और स्थितियों पर पुस्तकें लिखवाने का कार्य आरंभ कर दिया, निवेश भी किया। इससे उत्साहित होकर कई नए लेखक भी पौराणिक चरित्रों में कथालेखन का सूत्र ढूंढने लगे। डॉ विनीत अग्रवाल ने ‘परशुराम’ और ‘विश्वामित्र’ जैसे पौराणिक पात्रों को केंद्र में रखकर स्वतंत्र पुस्तकें लिखी। इस तरह की लगभग सारी पुस्तकें पौने दो सौ से लेकर तीन सौ पृष्ठों की होती है। पौराणिक चरित्रों को लेकर जितना भी लेखन हो रहा है उनमें से ज्यादातर के मूल में हमारे दो पौराणिक ग्रंथ हैं- रामायण और महाभारत। रामायण में तो पात्रों की संख्या अपेक्षाकृत कम हैं, लेकिन महाभारत में ढेर सारे पात्र हैं जिनपर अलग पुस्तक लिखी जा रही है। शिखंडी, शकुनि, अश्वत्थामा से लेकर द्रौपदी और दुर्योधन तक पर औपन्यासिक कृति सामने आ रही है। आशुतोष नाड़कर ने ‘शकुनि’ पर किताब लिखी। इस किताब में उन्होंने शकुनि के चरित्रों के विभिन्न आयामों पर लिखा है। प्रेरणा लिमड़ी ने अश्वत्थामा पर एक मुक्कमल किताब लिख दी ‘श्रापित यात्री की अंतहीन यात्रा अश्वत्थामा’। ये पुस्तक पहले गुजराती में प्रकाशित होकर चर्चित हो चुकी थी। बाद में इसका हिंदी अनुवाद प्रकाशित हुआ। अश्वत्थामा के चरित्र के साथ कई किवदंतियां भी जुड़ी हैं। इस किताब में उसको भी लेखिका ने छुआ है। कुछ ऐसी पुस्तकें भी आ रही हैं जो ये दावा करती हैं कि वो काल्पनिक हैं लेकिन अपने शीर्षक और अपनी कथावस्तु,कथाभाषा और कालखंड से पाठकों को ये एहसास दिलाती है कि वो कोई पौराणिक कथा है। जैसे विवेक कुमार ने पिछले दिनों एक पुस्तक लिखी जिसका नाम था ‘अर्थला’। इसको संग्राम सिंधु गाथा के तौर पर पाठकों के सामने पेश किया। लेखक ने लिखा कि ‘यह कथा किसी पुराण में नहीं मिलेगी। यह मेरी कथा है। मैं आपको कोई लोकप्रचलित इतिहास नहीं बताने जा रहा । मैं आपको अपनी कल्पना के धरातल पर खड़ा करना चाहता हूं। वह कल्पना जो मुझे प्रेरित करती है, उत्तेजित करती है, नई सुगंध देती है और इस संसार को देखने का एक विस्तृत, सुंदर और निष्पक्ष दृष्टिकोण सौंपती है।‘ लेखक भले ही कहानी के काल्पनिक होने का दावा करे लेकिन इसको जम्बूद्वीप की सबसे बड़ी रणगाथा बताया गया। देवासुर संग्राम भी कहा गया। कहना ना होगा कि बाजार पौराणिक कथाओं में रुचि ले रहा है लिहाजा लेखक भी उसकी ओर उन्मुख हो रहे हैं। और अब तो वेदों और पुराणों तक में वर्णित पात्रों को लेकर लिखने की भी शुरुआत हो चुकी है। वेद में वर्णित स्त्री पात्रों मैत्रेयी, गार्गी और अपाला पर स्वतंत्र पुस्तकों के आने की चर्चा है। ना सिर्फ वीर और दैवीय चरित्रों पर पुस्तकें आ रही हैं बल्कि असुरों पर भी किताबें लिखी जा रही हॆं। आनंद नीलकंठन ने तो अपने लेखन से एक नया जॉनर ही विकसित कर लिया। वो तो असुर श्रृंखला के अंतर्गत पुस्तकें लिख रहे हैं जिसको आलोचक एक वैकल्पिक साहित्यिक विमर्श के तौर पर भी देख रहे हैं। 

सवाल यह उठता है कि हाल के दिनों में वो क्या वजहें रहीं जिससे इस तरह के लेखन को बढ़ावा भी मिला और पसंद भी किया जाने लगा। अगर हम इसपर गंभीरता से विचार करें तो देश का जो माहौल होता है और जिसकी व्यापक चर्चा होती है लोग उसके बारे में जानना चाहते हैं। उनके अंदर उन बातों को जानने की उत्सुकता पैदा होती है। एक दौर वो भी था जब देश में वामपंथी-समाजवादी सोच का डंका बजा करता था। उस सोच के अंतर्गत इस तरह की चर्चा होती थी जिसमे देसी से अधिक विदेशी लेखकों विद्वानों विचारकों और स्थितियों रिस्थितियों के बारे में विमर्श होता था। विदेशी ज्ञान परंपरा पर अधिक बातें होती थीं।  तब लोग वैश्विक चरित्रों के बारे में ज्यादा जानना चाहते थे इस वजह से उन दिनों उस तरह का लेखन होता था। फिर देश ने सोवियत रूस की सस्ती और अनुदित किताबों को पढ़ना शुरू किया। ये पुस्तकें एक खास मकसद से खास विचारधारा को बढ़ावा देने के लिए बेहद सस्ते दामों पर उपलब्ध करवाई जा रही थी। यह अकारण नहीं है कि भारतीय विश्वविद्यालयों में जब प्रेमचंद पढ़ाया जाता है तो मैक्सिम गोर्की भी साथ याद किए जाते हैं खास तौर पर अपनी पुस्तक मां को लेकर। इस दौर में भारतीय पौराणिक पात्रों और चरित्रों को मिथक कहकर इस अवधारणा को स्थापित करने की कोशिशें भी हुईं। 

समय बदला देश की राजनीति ने करवट ली । पिछले दो दशक से भारतीय ज्ञान परंपरा के बारे में बातें शुरू हो गईं। अपने पौराणिक ग्रंथों के बारे में विचार और शोध होने लगे। भारतीय प्राच्य विद्या को लेकर एक उत्सुकता का माहौल बना। भारतीय राजनीति में जब वामपंथी विचार को वैकल्पिक विचार से चुनौती मिली तो कई राजनेताओं की तुलना पौराणिक चरित्रों से होने लगीं। इन सबका सामूहिक असर ये हुआ कि लोगों के मन में इन सबके बारे में जानने की इच्छा उत्पन्न हुई। लोग खोजने लगे कि अमुक चरित्र कौन था और उसका नाम अमुक नेता से क्यों जोड़ा जा रहा है। जानने की इस कोशिश का एहसास जब भारतीय लेखकों को और प्रकाशकों को हुआ तो पुस्तकों का प्रकाशन शुरू हो गया। आज ना केवल इन चरित्रों को लेकर काल्पनिक कथाएं सामने आ रही हैं बल्कि इनमे से कई चरित्रों को लेकर शोध भी किए जाने लगे हैं। विश्वविद्यालयों में जहां एक दौर में रामायण और महाभारत के चरित्रों को मिथक करार देकर उनको हाशिए पर डाला गया था उन्हीं विश्वविद्यालयों में अब इन चरित्रों को लेकर गोष्ठियां और सेमिनार हो रहे हैं। यह हिंदी साहित्य जगत के लिए या यों कहें कि भारतीय सृजनात्मकता के लिए बेहतर स्थिति है। लेकिन जरूरत इस बात की भी है कि पौराणिक चरित्रों के बारे में गंभीरता से शोध हो, हमारे प्राचीन ग्रंथों को पाठ्यक्रमों में शामिल करके आनेवाली पीढ़ी को अपनी समृद्ध विरासत से परिचित करवाया जाए। 

Saturday, February 15, 2020

वैचारिक जकड़न से आजाद होते उपन्यास

हिंदी कथा परिदृश्य की अगर बात करें तो हम पाते हैं कि पिछले कुछ सालों में इसने अपने भूगोल का विस्तार किया है। वामपंथी विचार के प्रभाव में खास तरह की कहानियां या उपन्यास लिखे जा रहे थे। ये दौर बहुत लंबे समय तक चला और एक खास तरह की फॉर्मूलाबद्ध कहानियां और उपन्यास लिखे जाते रहे। एक गरीब होगा, उसका संघर्ष होगा, समाज के प्रभावशाली व्यक्ति के गरीबों के शोषण का चित्र होगा, उसमें लंबे लंबे वैचारिक आख्यान होगें और फिर कई बार सुखांत को कई बार दुखांत होगा। ये कथा-प्रविधि चलती रही। कुछ लेखक इससे हटकर भी लिखते रहे लेकिन जोर इसी तरह के लेखन का रहा। दुनिया को बदलने का स्वप्न देखनेवाले कथा लेखक अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता की वजह से अपनी कहानियों या उपन्यासों को भी दुनिया को बदलने का औजार बनाते चले गए।  जब इस तरह के औजार के प्रयोग हुआ तो उसने हिंदी के पाठकों को चौंकाया। लेकिन जब यही प्रविधि ज्यादातर लेखक लगातार उपयोग करने लगे तो पाठकों के बीच एक खास किस्म की ऊब पैदा हुई।
विचारधारा की जकड़न वाले ऐसे कथा लेखक इस बात का प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से उद्घोष भी करते रहे कि वो विचारधारा के पोषण के लिए और उसको मजबूत करने के लिए लिखते हैं। वो पाठकों की परवाह भी नहीं करते थे, बाजार की परवाह करना तो खैर उनकी मातृ-विचार के खिलाफ ही था। इसका दुष्परिणाम हिंदी साहित्य को झेलना पड़ा। एक समय ऐसा भी आया जब हिंदी साहित्य जगत में पाठकों की कमी को लेकर विमर्श शुरू हो गया। बड़े बड़े संस्थानों से लेकर साहित्यिक पत्रिकाओं में हिंदी के पाठकों की कमी का रोना रोते हुए लेख आदि छपने लगे। पाठकों की कमी की बात जब मुखर होने लगी तो उसी दौर में ये बाते में भी सामने आने लगीं कि हिंदी के कहानी संग्रह और उफन्यासों का संस्करण तीन सौ प्रतियों का होने लगा। लेकिन कभी भी इस बात की पड़ताल करने की कोशिश नहीं की गई कि पाठक क्यों कथा साहित्य से दूर जाने लगे हैं। लेखकों ने पाठकों की रुचि का ध्यान नहीं रखा और कहते भी थे कि वो रुचि का ध्यान रखकर लेखन नहीं कर सकते हैं। अगर बाजार की भाषा में इसको समझने की कोशिश करें तो कह सकते हैं कि वामपंथी लेखकों ने उपभोक्ता यानि पाठकों की रुचि का ध्यान नहीं रखा। वो रवीन्द्रनाथ टैगोर का कहा भी भूल गए। टैगौर साहब ने साहित्य की सामग्री नामक अपने लेख की शुरुआत में ही कहा था- ‘केवल अपने लिए लिखने को साहित्य नहीं कहते हैं- जैसे पक्षी अपने आनंद के उल्लास में गाता है उसी प्रकार हम भी अपने आनंद में विभोर होकर केवल अपने लिए ही लिखते हैं, मानो श्रोता या पाठक का उस से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं होता। यह बात बिल्कुल निर्विवाद रूप से नहीं कही जा सकती कि पक्षी जब गाता है तब वह पक्षी समाज जरा भी उसके ध्यान में नहीं होता। यदि नहीं होता को न सही, इस बात पर तर्क करने से लाभ ही क्या है? परंतु यह तो मानना ही पड़ेगा कि लेखक की रचना का प्रधान लक्ष्य पाठक-समाज होता है।‘ लेकिन वामपंथी लेखकों ने पाठक समाज को ध्यान में नहीं रखा उनका लक्ष्य तो कथा साहित्य से अपनी विचारधारा को पुष्ट करना था।  
जब वामपंथी विचारधारा का पराभव शुरू हुआ तो हिंदी साहित्य का कथा लेखन भी इस वैचारिक लेखन से मुक्त होने लगा। इसके बीच आर्थिक उदारीकरण के बाद के दौर में ही कथाभूमि में पड़ने शुरू हो गए थे। इक्कीसवीं सदी के आरंभ में बदलाव का ये पौधा उगना शुरू हो गया था और लोगों ने इससे अलग हटकर उपन्यास लिखना शुरू कर दिया था। इसी दौर में मैत्रेयी पुष्पा के उपन्यासों ने अपनी नवीनता की वजह से हिंदी के पाठकों का ध्यान आकृष्ट किया था। भगवानदास मोरवाल का उपन्यास ‘रेत’ और मैत्रेयी पुष्पा का उपन्यास ‘अल्मा कबूतरी’ ने पाठकों को कथा के ऐसे प्रदेश से परिचय करवाया जिस ओर जाने से हिंदी के उपन्यास लेखक हिचकते थे। इन दोनों उपन्यासों में लेखकों ने जिन समुदायों को कथा के केंद्र में रखा है उसके जीवन को पाठकों के सामने पेश करने की कोशिश की, मोरवाल ने कुछ हिचक के साथ तो मैत्रेयी ने बोल्ड होकर। हम इन दोनों उपन्यासों को विचारधारा से मुक्त होने का प्रस्थान बिंदु मान सकते हैं। हलांकि मोरवाल के उपन्यासों में उसके अवशेष यदा कदा दिख जाते हैं।
इसके बाद के कथा लेखन खास तौर पर उपन्यासों को देखें तो वहां वैचारिक प्रतिबद्धता को पाठकों की रुचि ने विस्थापित कर दिया। नए लेखकों ने विश्वविद्यालय कैंपस की जिंदगी को विषय बनाया और पाठकों ने उनको खूब पसंद किया। इनमें से कुछ लेखक अब कैंपस से बाहर निकल गए हैं और उन्होंने अपने दायरे का विस्तार कर लिया जबकि कई लेखक अब भी कैंपस के ही चक्कर लगा रहे हैं। इनमें से जो लेखक कैंपस से बाहर निकल गए हैं उनकी व्याप्ति बढ़ी है और जो कैंपस में ही अटके हैं उनसे अपेक्षा की जा रही है कि वो अपनी कथाभूमि का विस्तार करें। पिछले दो तीन सालों को देखें तो कथा भूमि का और विस्तार दिखाई देता है। अब उपन्यासों के विषयों में पहले की अपेक्षा अधिक विविधताएं दिखाई देने लगी हैं। हिंदी का लेखक समाज बहुत बड़ा है और उसी अनुपात में पुस्तकें भी प्रकाशित होती हैं। लेकिन जिन उपन्यासों ने अपनी विषयगत नवीनता की वजह से लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा उसमें पर्यावरण पर लिखा उपन्यास है, उसमें समाज में व्याप्त कानूनी असामनता को लेकर लिखा गया उपन्यास है। पिछले वर्ष के अंतिम महीने में दो ऐसे उपन्यास आए जिसने अपनी विशयगत नवीनता से पाठकों को चौंकाया। रत्नेश्वर ने फिर से पर्यावरण को अपने उपन्यास का विषय बनाया। उनका उपन्यास एक लड़की पानी पानी ने पाठकों का ध्यान अपनी ओर खींचा। इसमे रत्नेश्वर ने पानी की समस्या को बेहद रोचक तरीके से उठाया है। स उपन्यास के केंद्र में पानी की समस्या है, उपन्यास के पात्रों के बीच पानी की कमी को लेकर चलनेवाला विमर्श है जो भविश्य के खतरों के प्रति लोगों को आगाह भी करती है। इसी तरह से भगवानदास मोरवाल ने अपने नए उपन्यास वंचना में महिलाओं और बच्चों के लिए बनाए गए कानून की खामियों को विषय बनाया है। इस उपन्यास में मोरवाल ने बेहद सधे हुए अंदाज में संवेदनशील तरीके से उन स्थितियों की चर्चा की है। इन दोनों उपन्यासों में लेखकों के सामने अपनी कृतियों को पठनीय बनाए रखने की चुनौती थी जिसका सामना दोनों ने बखूबी किया। इस तरह के विषय हिंदी उपन्यासों के लिए पहले बिल्कुल नहीं सोचे गए थे। अगर लिखे गए हों तो संभव है कि मेरी नजर में ना आए हों। मार्क्सवादी लेखकों ने तो पर्यावरण को इस वजह से अपने लेखन में तवज्जो नहीं दी क्योंकि उनके आराध्य ने ही इस विषय पर कुछ नहीं देखा। दुनिया बदवे का स्वप्न देखते देखते बदलती हुई दुनिया उऩसे छूट गई।
ऐतिहासिक, पौराणिक और मिथकीय चरित्रों पर पहले भी लेखन होता था और अब उसमें काफी वृद्धि हुई है। राष्ट्रवाद के दौर में पाठकों की रुचि को ध्यान में रखकर ढेर सारे लेखकों ने महाभारत और रामायण के चरित्रों को लेकर उपन्यास लिखे। पहले नरेन्द्र कोहली ने अकेले इन विषयों पर विपुल लेखन किया जिसे बाद में अमीश से लेकर कई अन्य लेखकों ने बढाया। लेकिन पिछले ही साल नरेन्द्र कोहली का एक उपन्यास सागर मंथन प्रकाशित हुआ जिसमें उन्होंने कथा के एक बिल्कुल नए क्षेत्र में प्रवेश किया जिसमें पौराणिकता के साथ साथ विज्ञान भी है। इस तरह से हम कह सकते हैं कि जो हिंदी में कथा साहित्य का जो मौदूदा दौर है उसको विचारधारा की गुलामी से मुक्त होने का दौर कह सकते हैं। उसको वर्तमान और भविष्य की चिंताओं को अपने अपने उपन्यासों का विषय बनाकर पाठकों के समक्ष ले जाने का जोखिम उठाने का दौर है। इस दौर को पाठकों या व्यापक हिंदी समाज की रुचियों की पूर्ति का दौर भी कह जा सकता है। यह अकारण नहीं है कि अब प्रकाशक लगातार सार्वजनिक तौर पर अपनी पुस्तकों के नए संस्करणों की बात करने लगे हैं। वो खुलकर ये बताने लगे हैं कि अमुक उपन्यास या अमुक पुस्तक की इतनी प्रतियां बिकीं। इस बदलाव को एक सुखद बदलाव के तौर पर भई देखा और रेखांकित किया जाना चाहिए। ये दौर उन आलोचकों के लिए भी चुनौती का दौर है जो सिर्फ उन्हीं पुस्तकों पर विचार करते रहे हैं जो उनकी विचारधारा के करीब रही है।

Thursday, August 15, 2019

दिल्ली विश्वविद्यालय में पनपा प्रेम


इस वक्त हिंदी के सबसे समादृत लेखकों में से एक नरेन्द्र कोहली ने लंबे समय तक दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापन किया। उन्होंने भारतीय पौराणिक चरित्रों पर विपुल लेखन किया है। उनको पद्मश्री सम्मान से नवाजा गया है। अभी वे केंद्रीय फिल्म प्रमाणण बोर्ड के सदस्य हैं। उन्होंने दिल्ली के अपने शुरुआती दिनों को मुझसे साझा किया। 

मैं 1961 में यानि आज से 68 साल पहले जमशेदपुर से दिल्ली आया। मैंने जमशेदपुर के कॉपरेटिव कॉलेज से बीए किया था और एम की पढ़ाई के लिए दिल्ली आया। उस वक्त डाक से ही नामांकन आदि हो जाते थे। मुझे रामजस कॉलेज का छात्रावास मिला था और मैं दिल्ली रेलवे स्टेशन पर उतरकर सीधे छात्रावास में रहने चला गया था। उस समय दिल्ली विश्वविद्यालय में एमए के लिए भी किसी कॉलेज में नामांकन होता था और क्लास के लिए पोस्ट ग्रेजुएट विभाग में जाना पड़ता था। 1963 में मैंने एमए पास किया और उसी वर्ष मुझे डी ए वी कॉलेज में सहायक व्याख्याता की नौकरी मिल गई जहां मेरा वेतन सवा तीन सौ रुपए प्रतिमाह था। उस वक्त डीएवी कॉलेज पहाड़गंज थाने के पीछे चला करता था। तब डीएवी कॉलेज ईवनिंग कॉलेज हुआ करता था जो कि मुझे बहुत पसंद नहीं था। मुझे लगता था कि शादी-वादी करनी है और जीवन व्यवस्थित करना है तो किसी और कॉलेज में नौकरी करनी चाहिए। 1965 में मैं गवर्नमेंट डिग्री कॉलेज, जो अब मोतीलाल नेहरू क़लेज है, में व्याख्याता बनकर आ गया। यहां मेरा वेतन भी करीब साढे चार सौ रुपए प्रतिमाह हो गया था। 1965 में ही मैंने विवाह का इरादा किया। दिल्ली विश्वविद्यालय में मधुरिमा मुझसे एक साल जूनियर थी। उससे विभाग में देखा देखी होती थी, थोड़ी बातचीत, कभी कभार कटाक्ष आदि भी होता था। हम दोनों एक दूसरे के प्रति आकर्षित थे,, प्रेम भी करते थे पर प्रपोज नहीं कर पाए थे। जब मेरी मौकरी लग गई और मधु फाइनल इयर में आ गई तो एक दिन हमने तय किया कि अब शादी कर लेनी चाहिए। शादी के बाद हमलोग बंगाली मार्केट इलाके में बाबर प्लेस में रहने आ गए। किसी सरकारी बाबू का घर था जो हमने किराए पर लिया था। ये 1967 की बात है उस वक्त बाबर प्लेस के घर का किराया काफी कम था। दो साल बाद हम ग्रेटर कैलाश वन के एस ब्लॉक में रहने आ गए।
मई 1967 में ग्रेटर कैशाल इलाका काफी खाली था। हर दूसरे घर पर टू लेट का बोर्ड लगा था। उस इलाके में अगर आप किराए का मकान देखने जाते तो मकान मालिक आपकी बांहें पकड़कर अपना घर किराया पर देने को तैयार होते थे। हमने 275 रु प्रतिमाह के किराए पर घर लिया और वहां 17 वर्षों तक रहे। उस वक्त ग्रेटर कैलाश इतना खाली था कि आप अभी कल्पना नहीं कर सकते। हमें शॉपिंग आदि करने के लिए साउथ एक्सटेंशन जाना पड़ता था या फिर लाजपत नगर। हमारे देखते देखते ग्रेटर कैलाश में भीड़ इतनी बढ़ गई क्या कहने। 17 साल बाद जब हमने पीतमपुरा में अपना घर बनाया और किराए का मकान छोड़ा तो ग्रेटर कैलाश का चेहरा पूरी तरह बदल गया था। हम 17 साल तक 275 रु प्रतिमाह के किराए पर ही रहे। मकान मालिक अमेरिका में रहता था और कभी कभार ही किराया बढ़ाने को कहता लेकिन कभी बढ़ाया नहीं। जब हम मकान खाली कर रहे थे तो उस वक्त घर खाली करने का रेट तीन लाख रुपए था जो मकान मालिक अपने किराएदार को देता था। लेकिन मैंने कोई पैसा नहीं लिया क्योंकि मुझे ये अनुचित लगा था।
1983 के नवरात्रों में मैं पीतमपुरा में रहने आ गया था। मैंने कहीं पढ़ा था कि ये इलाका पृथ्वीराज चौहान के नाम पर था और पहले इसका नाम पृथोपुरा होता था जो बाद में पीतमपुरा हो गया। और अब तो डीडीए ने इसका नाम बदलकर मौर्य एंक्लेव कर दिया है। पीतमपुरा में जिस सड़क पर हमारा घर था वहां कोई ट्रैफिक नहीं होता था लेकिन अब तो उस सड़क को पार करने में दस मिनट लग जाते हैं। शादी के पहले हमलोग बहुधा फिल्में देखने जाते थे। हमारा पसंदीदा सिनेमा हॉल रिवोली, रीगल और ओडियन हुआ करता था। लेकिन मुझे नाटक देखना ज्यादा पसंद था। बंद थिएर में मुझे अजूब सी घुटन होती है। और पिछले लगभग 35 साल से मैंने थिएटर में जाकर कोई फिल्म नही देखी। नाटक के समय पर भी यानि शाम में जब उसका मंचन होता है तो ट्रैफिर इतना होता है कि देखने जाने की हिम्मत नहीं होती है। दिल्ली काफी बदल गई है, भीड़ और गाड़ियों ने इस शहर की शक्ल पूरी तरह से बदल दी है।
(अनंत विजय से बातचीत पर आधारित)     

Saturday, August 3, 2019

लेखक संघों की सियासत का स्याह चेहरा


कम्युनिस्ट पार्टियों से संबद्ध लेखकों के अपने-अपने संगठन हैं। सीपीआई की प्रगतिशील लेखक संघ है, सीपीएम की जनवादी लेखक संघ है, सीपीआई-एमएल की जन संस्कृति मंच है। इन लेखक संगठनों की स्थापना चाहे जिस भी उद्देश्य से हुई हो लेकिन पिछले कई वर्षों में ये अपने अपने राजनीतिक दलों के बौद्धिक प्रकोष्ठ बनकर रह गए हैं। जो इनका पितृ-संगठन जो करता है ये उसके पीछे-पीछे चलते हैं। बहुधा अपने राजनीतिक दलों की नीतियों को बौद्धिक जामा पहनाने का काम भी करते हैं। एक और संगठन है जिसका नाम है दलित लेखक संघ। ये दलित लेखकों के हितों को लेकर चलने का दावा करता है लेकिन इसके ज्यादातर कार्यक्रम जनवादी लेखक संघ से संबद्ध ही नजर आते हैं। इस संगठन में पिछले दिनों काफी विवाद हुआ था जिसके बाद भारतीय दलित लेखक संघ की स्थापना हुई जिसके अध्यक्ष इन दिनों अजय नावरिया हैं। उसके बाद एक अंबेडकरवादी लेखक संगठन भी बना जो अभी ठीक से सक्रिय भी नहीं हो पाया है। इन लेखक संगठनों के बारे में बताने की वजह इनका एक साझा बयान है। ये बयान 29 जुलाई 2019 को जारी किया गया। पहले ही बताया जा चुका है कि लेखकों के हितों से अधिक इनको अपने राजनीतिक आकाओं की चिंता रहती है लिहाजा इनका साझा बयान भी राजनीति की बिसात का एक मोहरा है। लेखक संगठन है, जाहिर है कुछ पढ़े लिखे लोग इसके साथ जुड़े हैं, लेकिन जो बयान जारी हुआ है उसकी भाषा से घृणा की बू आती है। लेखकों के संगठन के बयान में अगर घृणा नजर आए तो समझ लीजिए कि उसमें कोई ना कोई राजनीतिक हित है। इनके साझा  बयान का एक हिस्सा देखिए- लेखक-कलाकार हमेशा से सत्ता के विरोध में रहे हैं, लेकिन मोदीराज में सत्ता के विरोध का विरोध एक स्थायी रुझान बनता जा रहा है| जब 2015 में लेखकों-कलाकारों-वैज्ञानिकों ने अपने पुरस्कार लौटा कर सत्ताधारी दल की असहिष्णुता का विरोध किया तो एक हिस्सा, भले ही इस हिस्से के लोगों का कद अपने-अपने कार्यक्षेत्र में उतना बड़ा न हो, उनके विरोध में उठ खड़ा हुआ| जब 23 अक्टूबर 2015 को प्रो. कलबुर्गी की शोकसभा की मांग के साथ लेखक-कलाकार साहित्य अकादमी के कार्यकारी मंडल की बैठक के मौक़े पर अपना मौन जुलूस लेकर पहुंचे, तब वहां भी भाजपा समर्थक लेखकों-कलाकारों का एक जमावड़ा इनके विरोध में मौजूद पाया गया जिसमें नरेन्द्र कोहली जैसे औसत दर्जे के लोकप्रिय लेखक को छोड़ दें तो कोई प्रतिष्ठित नाम नहीं था|’  चार लेखक संगठनों का ये बयान नरेन्द्र कोहली को औसत दर्जे का लोकप्रिय लेखक कह रहा है। लेखक संगठनों के बयान से ये अपेक्षा की जाती है कि वो शब्दों के चयन में सावधान रहें। नरेन्द्र कोहली इस वक्त हिंदी के सबसे समादृत लेखक हैं जिनकी व्याप्ति समाज के हर वर्ग में है। वो हिंदी के इकलौते लेखक हैं जिनके लेखन के, जिनकी कृतियों के लाखों मुरीद हैं। अब जरा उन नामों को देख लिया जाए जो इन चार लेखक संगठनों की नुमाइंदगी करते हैं। इस साझा बयान पर जिनके हस्ताक्षर हैं। जनवादी लेखक संघ से मुरली मनोहर प्रसाद सिंह हैं, प्रगतिशील लेखक संघ से राजेंद्र राजन हैं, जन संस्कृति मंच से मनोज कुमार सिंह और दलित लेखक संघ से हीरा लाल राजस्थानी हैं। आज इनसे ये पूछा जाना चाहिए कि मुरली मनोहर प्रसाद सिंह की हिंदी जगत में एक लेखक के रूप में कितनी स्वीकार्यता या प्रतिष्ठा है। दिल्ली विश्वविद्यालय में शिक्षक रहे मुरली बाबू शिक्षक राजनीति करते रहे और कभी कभार कोई किताब आदि छप जाती थी। उनका हिंदी साहित्य को क्या और कितना योगदान है ये पाठकों के सामने आना शेष है। औसत तो दूर की बात इनको लेखक के रूप में कौन जानता है? दूसरा हस्ताक्षर है प्रगतिशील लेखक संघ के राजेन्द्र राजन का। उनके लेखकीय योगदान के बारे में किसी को कुछ नहीं पता। जन संस्कृति मंच के मनोज कुमार सिंह हैं, उनका लेखकीय कर्म और संस्कृति के लिए किया जानेवाला कार्य भी अभी पाठकों या दर्शकों के समक्ष नहीं है। चौथे हैं हीरालाल राजस्थानी जो दलित लेखक संघ के नुमाइंदे के तौर पर इस साझा बयान पर उपस्थित हैं। हीरालाल राजस्थानी दिल्ली में चित्रकारी सिखाते हैं, क्या लिखते हैं या साहित्य में किस विधा में सिद्धहस्त हैं इसके बारे में अभी जानकारी सार्वजनिक होना शेष है। ये चारो मिलकर नरेन्द्र कोहली को औसत लेखक करार दे रहे हैं। है न आश्चर्य की बात। किसी को भी किसी का अपमान करने का हक नहीं है, इस वजह से इन चार लोगों के बारे में किसी प्रकार का विशेषण इस्तेमाल नहीं करूंगा लेकिन इनको सोचना चाहिए कि जिस नरेन्द्र कोहली को ये औसत कह रहे हैं उनके पासंग बराबर भी इनका लेखकीय योगदान होता तो इनकी बातों को गंभीरता से लिया जा सकता था।      
इस साझा बयान की भाषा ऐसी है जो इन लेखक संगठन से जुड़े लोगों के पढ़े लिखे होने पर भी संदेह पैदा करती है। या हो सकता है कि हाशिए पर चले जाने की कुंठा से ऐसी ही भाषा उपजती हो। अब जरा इस भाषा को देखिए जो साझा बयान का हिस्सा है, ‘जब 49 नामचीन कलाकारों-बुद्धिजीवियों ने, जिन पर यह देश गर्व और भरोसा करता है, प्रधानमंत्री मोदी के नाम खुला पत्र लिखा है तो जवाब में प्रधानमंत्री ने नहीं, उनके 62 निर्लज्ज समर्थकों ने पत्रोत्तर लिख भेजा है| यह पत्रोत्तर अडूर गोपालकृष्णन, मणि रत्नम, अनुराग कश्यप, आशीष नंदी, अपर्णा सेन, सुमित सरकार, श्याम बेनेगल, शुभा मुदगल जैसे लोगों द्वारा उठाये गए एक भी सवाल का जवाब नहीं देता, बस पलट कर कुछ और सवाल उठाते हुए यह साबित करने की बेहद लचर कोशिश करता है कि मूल पत्र में आयी शिकायतें राजनीतिक पक्षधरता से निकली हैं|’  मोदी के समर्थक हुए तो आप निर्लज्ज हो गए और अगर आपने उनका विरोध किया तो महान हो गए। अब ये लोग खुद तय करें कि निर्लज्जता क्या है।
अब जरा बात प्रगतिशील लेखक संघ की कर ली जाए। प्रगतिशील लेखक संघ के संस्थापकों में से एक सज्जाद जहीर की पुत्री और वरिष्ठ लेखिका नूर जहीर ने प्रगतिशील लेखक संघ के अंदर की बजबजाहट को उघाड़ को सामने रख दिया है। मामला ये है कि प्रगतिशील लेखक संघ का एक सम्मेलन पूर्व पुलिस अधिकारी और लेखक विभूति नारायण के सौजन्य से आयोजित हो रहा है। विभूति नारायण राय ने लेखिकाओं को लेकर एक टिप्पणी की थी जिसपर काफी बवाल मचा था। बाद में विभूति नारायण राय पर सवाल उठानेवाले ज्यादातर लेखक उनके शरणागत हो गए थे, कुछ को तो उन्होंने उपकृत भी किया लेकिन अब एक बार फिर से नूर जहीर ने उस प्रश्न को उठाकर प्रगतिशील लेखक संघ को कठघरे में खड़ा कर दिया है। नूर जहीर कहती हैं, ‘प्रगतिशील लेखक संघ में बीस साल से बढ़ते हुए पुरुषवाद को देख रही हूं, यह भी जानती हूँ कि पुरुषवाद अकेले नहीं पनपता, जातिवाद और सांप्रदयिकता उसके हाथ मे हाथ डाले चलतीं हैं। ऐसे मे अगर कुछ लेखक या लेखिकाएं बिगाड़ नहीं करना चाहती और चुप्पी बनाए रखतीं हैं तो यह उनका निजी मामला है। मैंने खुद कभी फायदा या नुकसान को देखकर ‘स्टैंड’ नहीं लिया है । एक सवाल और एक अपने तजुर्बे की बात कह रहीं हूँ, पहला ये कि ऐसा क्या मिल रहा है एक पैतृक्तावादी पुरुष को जोड़े रखने से ? नाम, पैसा, यश, सहूलियतें? और दूसरे पुरुषवाद एक बीमारी है जिसे यदि फैलने से नहीं रोका गया तो वह चुप्पीधारियों को भी नहीं छोड़ेगी।‘ अब ये तो नूर जहीर ही जानें या फिर प्रगतिशील लेख संघ के लोग जानें कि वहां पिछले बीस साल से किस प्रकार का पुरुषवाद बढ़ रहा है? अगर किसी संगठन के संस्थापक की बेटी और सम्मानित लेखिका को उस संगठन के बारे में इतनी तल्ख टिप्पणी करनी पड़ रही हो तो ये तय करना आसान है कि ‘निर्लज्जता’ कहां है। अभी ज्यादा दिन नहीं बीते हैं जब इन लेखक संगठनों से जुड़े एक कवि ने हिंदी कवयित्री अनामिका को लेकर बेहद आपत्तिजनक टिप्पणी की थी। इन्हीं लेखक संगठनों से जुड़े एक लेखक ने वाराणसी में अपनी पत्नी के साथ सरेआम अभद्रता की थी लेकिन इन संगठनों के कार्ताधर्ताओं ने मुंह पर पट्टी बांध ली थी। ये जब नैतिकता आदि की बात करते हैं तो खोखले लगते हैं। ये लेखक संगठन अब राजनीति की ऐसी दुकान बन गए हैं जिनके मालिक का दीवाला निकल चुका है और वहां काम करनेवाले कर्मचारीनुमा लेखक अच्छे दिन की आस में अपने मालिक की सेवा किए जा रहे हैं।
आमतौर पर मैं कविताएं कम पढ़ता हूं। लेकिन इन लेखक संगठनों के साझा बयान को पढ़ने के बाद धूमिल की एक कविता की चंद पंक्तियां याद आ गईं- वे सब के सब तिजोरियों के दुभाषिये हैं/ वे वकील हैं/ वैज्ञानिक हैं/ अध्यापक हैं/ नेता हैं/ दार्शनिक हैं/ लेखक हैं/ कवि हैं/ कलाकार हैं/ यानी कि- कानून की भाषा बोलता हुआ अपराधियों का एक संयुक्त परिवार है।

Saturday, July 13, 2019

फूहड़ता की चपेट में व्यंग्य लेखन


कुछ वर्ष पहले की बात है, शायद 2017 की, जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में हिंदी के सर्वाधिक समादृत लेखकों में से एक नरेन्द्र कोहली जी का साक्षात्कार का अवसर मिला था। वो साक्षात्कार कोहली जी के समग्र लेखन पर था, लिहाजा मुझे ये छूट मिल गई थी कि मैं प्रश्नों को अपने मन मुताबिक बना सकूं। उनके बातचीत करने के पहले लगभग सप्ताह भर मैंने उनके लेखन को लेकर शोद किया था, उनके लेख आदि पढ़े थे। लगभग घंटे भर के उस साक्षात्कार में मैने उनसे बेहद संकोच के साथ पहला प्रश्न किया था। प्रश्न उनके व्यंग्य लेखन से जुड़ा था। मैंने जानना चाहा था कि जब दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में उनके जुड़वां बच्चों में से एक की मृत्यु हो गई थी, वो और उनका पूरा परिवार अवसादग्रस्त था तो ऐसे में उन्होंने व्यंग्य लेखन की शुरूआत कैसे की। कोहली जी ने तब कहा था कि ‘जब मेरा बच्चा बीमार हो, अस्पताल में डॉक्टर उसकी तरफ ध्यान नहीं दे रहे हों, अस्पताल में प्रधानमंत्री आ जाए और आप अंदर घुस नहीं सकते हो और आपका बच्चा मरनेवाला हो तो उस समय जो मन में कड़वाहट होती है, जो आक्रोश होता है, जो कटाक्ष है वो सिवाए व्यंग्य के कहां प्रकट हो सकता है। अस्पताल के प्रति, सिस्टम के प्रति, प्रधानमंत्री के प्रति कटुता तो व्यंग्य में ही आएगी, इसलिए मैंने वहीं से व्यंग्य लिखना शुरू किया। एक स्थिति कोहली जी की है जहां सिस्टम के खिलाफ उनका आक्रोश उनकी व्यंग्य रचनाओं में आता है। एक दूसरी आज के व्यंग्य लेखन का परिदृष्य है, जहां आपको सिस्टम के खिलाफ आक्रोश लगभग नहीं के बराबर दिखता है। व्यंग्य के नाम पर जिस तरह की फूहड़ता देखने को मिल रही है वो इस विधा के होने पर ही सवाल खड़े कर रही है। व्यंग्य लेखन और चुटकुला लेखन का भेद लगभग मिट गया है। ज्यादातर व्यंग्य लेखक फूहड़ता और चुटकुलेबाजी में इस कदर लीन हैं कि उनको इस बात का भान ही नहीं हो रहा है कि वो हिंदी की एक विधा का आधारभूक स्वभाव ही बदल दे रहे हैं। यह गहन शोध की मांग करता है कि व्यंग्य लेखन कब और किन परिस्थितियों में चुटकुला लेखन बन गया। हास्य और व्यंग्य के बीच एक बहुत ही बारीक रेखा हुआ करती थी लेकिन ये बारीक रेखा कब और कैसे मिट गई इसपर विचार करना होगा। पहले हास्य और व्यंग्य कहा जाता था लेकिन धीरे-धीरे हास्य-व्यंग्य हो गया। अब ये सायास हुआ या अनायास, इसपर व्यंग्य विधा से जुड़े लेखकों को और फिर आलोचकों को विचार करना चाहिए। मंथन होगा तो उससे कुछ सूत्र निकल कर सामने आएंगें।
हम अगर इसर विचार करें तो यह पाते हैं कि व्यंग्य लेखन में फूहड़ता का प्रवेश इसके सार्वजनिक मंचन या वाचन से मजबूती पाता है। व्यंग्य के नाम पर इस मंच से इस तरह की रचनाओं का वाचन होता है जो इसको हास्य या चुटकला बना देता है। मंचीय व्यंग्यकारों के सामने ये चुनौती होती है कि वो श्रोताओं को बांधकर रखें। श्रोताओं को बांधकर रखने का दबाव और लेखक की फौरन लोकप्रिय होने की चाहत उसको फूहड़ता की ओर ले जाती है। व्यंग्य के नाम पर फूहड़ता की इस विधा का विकास कालांतर में स्टैंडअप कॉमेडी के लोकप्रिय होते जाने से भी हुआ। जिस तरह की भाषा और जिस तरह की जुमलेबाजी कॉमेडियन करते हैं वो कभी-कभी तो बेहद अश्लील या द्विअर्थी होती है । मंचन का आयोजन करनेवालों को इसका एक फायदा यह मिलता है कि दर्शकों को मजा आता है और दर्शक उनको सुनने के लिए रुके रहते हैं। हाल के दिनों में इस तरह के स्टैंडअप कलाकारों को यूट्यूब पर जिस तरह की सफलता मिल रही है वो भी व्यंग्य विधा के सामने एक चुनौती की तरह खड़ी है। व्यंग्य जब लेखन से उठकर मंचन तक पहुंचा तो उसमें ह्रास दिखाई दिया। अब उससे आगे जाकर जब टीवी पर शोज होने लगे तो इसमें और भी गिरावट या मिलावट देखने को मिली। इनके सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी लोकप्रियता को बनाए रखने की होती है। पिछले दो तीन सालों से कमेडी शोज का जोर समाज में बढ़ा है, इनके दर्शक बढ़े हैं। । इन कॉमेडी शोज की बदौलत ही मनोरंजन की दुनिया को कपिल शर्मा और सुनील ग्रोवर जैसा स्टार मिला। इन्हीं कमेडी शोज में एक और प्रवृत्ति देखने को मिली। वो प्रवृत्ति है कि पुरुषों को महिला के किरदार में पेश करने की। कपिल शर्मा के शो में तो सुनील ग्रोवर,किक्कू शारदा और अली असगर को महिला पात्रों के तौर पर पेश किया जाता है। अब इसपर विचार किया जाए कि क्यों पुरुषों को महिलाओं के तौर पर पेश किया जाता है? इसके पीछे की मंशा क्या हो सकती है? क्या इनके माध्यम से फूहड़ता को पेश करने में निर्माताओं को सहूलियत होती है? क्या इनके मुंह से अश्लील या फिर द्विअर्थी बातें कहवाने से आसोचना से बचा जा सकता है? अगर इन शोज के कई एपिसोड को देखें तो कुछ ऐसा ही लगता है। जिस तरह से महिला पात्र बने ये पुरुष शोज पर आनेवाली महिलाओं से बात करते हैं या इनकी जो अदाएं होती हैं वो कोई अभिनेत्री निभाती तो उसपर आपत्ति हो सकती थीं। जिस तरह से ये पात्र पुरुष और महिला मेहमानों को आलिंगबद्ध करते हैं या फिर उनके साथ फ्लर्ट करते हैं उसमें सब कुछ छुप सा जाता है। महिला बनी अभिनेताओं की आड़ में इस ओर किसी का ध्यान जाता ही नहीं। इन कॉमेडी शोज में जिस तरह से इन चरित्रों के माध्यम से महिलाओं का व्यवहार दर्शकों के सामने पेश किया जाता है, जिस तरह से इनके चरित्र का चित्रण होता है उसपर किसी महिला संगठन ने आज तक आपत्ति जताई हो ये ज्ञात नहीं हो सका है। महिला अधिकारों का झंडा-डंडा लेकर चलनेवाली एक्टिविस्टों ने भी कभी महिलाओं के इस तरह के चित्रण पर आपत्ति नहीं उठाई। क्या ये माना जाए कि महिलाओं के इस पुरुषोचित चित्रण पर उनका ध्यान नहीं गया या फिर वो जानबूझकर खामोश हैं। इस तरह के पात्रों की लोकप्रियता से कितना नुकसान होता है इसपर ध्यान देने की जरूरत है। तर्क यह दिया जा सकता है कि हमारे लोक में इस तरह की रीति पहले से चली आ रही है। बिहार और पूर्व उत्त्कर प्रदेश के कुछ इलाकों में लड़कों के लड़कियों का वेश धरकर नाचने-गाने का प्रचलन काफी पुराना है। कई पुस्तकों में भी इस तरह के चरित्रों का उल्लेख मिलता है। बिहार के एक मुख्यमंत्री को इस तरह के पात्रों का नृत्य बहुत पसंद आता था। उनकी रैली से लेकर उनकी सभा तक में इनका नृत्य होता ही था। खैर ये एक अलग प्रसंग है जिसपर कभी विस्तार से चर्चा होगी। हम बात कर रहे थे कि व्यंग्य विधा के चुटकुले में तब्दील हो जाने की।
विधागत ह्रास की यह प्रवृत्ति बेहद चिंता की बात है। उपरोक्त कुछ वजहों के अलावा भी इसके अन्य कारण हैं जो व्यंग्य की पहचान खत्म कर रहे हैं। जिस तरह का व्यंग्य लेखन इन दिनों हो रहा है और गंभीर व्यंग्यकार उसको ना केवल देख रहे हैं बल्कि बढ़ावा दे रहे हैं वो भी बहुत हद तक व्यंग्य विधा के लिए नुकसानदायक ही है। व्यंग्य को हास्य बना देने का सबसे बड़ा नुकसान यह हुआ कि इसके आलोचक भी धीरे-धीरे कम होते चले गए। व्यंग्य आलोचना के नाम पर एक तीन-चार नाम ही याद आते हैं। उनमें से भी कुछ तो बिगाड़ के डर से ईमान की बात नहीं कहने के लिए जाने जाते हैं। बिगाड़ का जो डर है न वो भी एक बहुत महत्वपूर्ण कारक है। यह प्रवृत्ति अन्य विधाओं में भी उपस्थित है लेकिन व्यंग्य के आलोचकों के बीच बहुत मजबूती के साथ इसकी उपस्थिति व्यंग्य को सही रास्ते पर आने की राह में बाधा बनकर खड़ी हो जा रही है। कहानी, कविता, उपन्यास में भी आलोचक कम हो गए हैं लेकिन अब भी वहां कुछ लोग ऐसे हैं बचे हैं जिन्हें बिगाड़ का डर नहीं लगता और वो सच्ची बात कहने में हिचकते नहीं हैं। इसका एक फायदा यह होता है कि लेखक सतर्क रहते हैं और हल्का-फुल्का लिखने के पहले उनके मन में ये चलता रहता है कि उनकी रचनाओं को आलोचना की कसौटी पर कसा जाएगा। व्यंग्य लेखकों के चेतन या अवचेतन मन में ये नहीं चलता होगा क्योंकि वहां इस तरह की परंपरा बची नहीं कि कोई उनकी रचनाओं को आलोचना की कसौटी पर कसेगा। उनके लिए तो फेसबुक पर चंद लाइक्स, किसी गोष्ठी में चंद तालियां और किसी कॉमेडी शो में वाह-वाह की गूंज ही काफी है। आज इस बात की जरूत है कि व्यंग्य विधा से जुड़े लोग इन कारणों पर मंथन करे, साहित्य समाज में इसपर चर्चा हो और इस विधा को फूहड़ता से बताने का कोई रास्ता तलाशा जाए।  
      

Saturday, February 24, 2018

पौराणिक पात्रों पर लेखन की चुनौतियां


इन दिनों हिंदी से लेकर अन्य भारतीय भाषाओं के अलावा अंग्रेजी में भी पौराणिक कथाओं और चरित्रों के बारे में बहुत लिखा जा रहा है। महाभारत के पात्र, रामायण के पात्र और पुराणों में वर्णित घटनाओं, उपनिषदों के प्रसंगों के अलावा देवी देवताओं के प्रचलित और गैर प्रचलित किस्सों को केंद्र में रखकर दर्जनों उपन्यास लिखे जा चुके हैं और अब भी लिखे जा रहे हैं । पौराणिक कथाओं पर लिखनेवाले लेखकों की सूची बहुत लंबी है और हिंदी समेत अन्य भारतीय भाषा के पाठकों को उनके बारे में ज्ञात भी है। इसलिए उसको दुहराने का कोई अर्थ नहीं है। पहले भी लेखक पौराणिक कथाओं को अपने लेखन में विषय बनाते थे लेकिन वो अपेक्षाकृत कम होते थे। जैसे अगर हम देखें तो हजारी प्रसाद द्विवेदी, अमृतलाल नागर और आचार्य चतुरसेन शास्त्री के यहां भी इस तरह का लेखन मिलता है लेकिन उन्होंने योजनाबद्ध तरीके से बहुत ज्यादा नहीं लिखा। हिंदी के अलावा अन्य भारतीय भाषाओं में भी यही स्थिति थी। हिंदी में नरेन्द्र कोहली, मराठी में शिवाजी सावंत और अन्य भाषाओं में इसी तरह कम लेखक इस तरह के विषयों को उठा रहे थे या फिर पौराणिक चरित्रों पर लिख रहे थे। बहुतायत में लिखी जा रही इन पुस्तकों में हर लेखक अलग अलग तरीके से पौराणिक या मिथकीय चरित्रों को व्याख्यित करता है। उदाहरण के तौर पर अगर हम देखें तो अमीश ने राम-त्रयी के अपने उपन्यास सीता, मिथिला की योद्धा में सीता की एकदम अलग तरह की छवि गढ़ी है। उनको योद्धा के तौर पर सामने रखा। जबकि सीता की छवि सुकुमारी की रही है। अमीश ने सीता को लेकर कथा का जो वितान रचा है वो उनकी शोध और सोच का हिस्सा हो सकता है। उसमें रोचकता भी है, पढ़ते समय पाठकों के दिमाग में आगे क्या जैसी जिज्ञासा भी जगती है। लेकिन कई लोगों को अमीश के उस उपन्यास में सीता के चरित्र चित्रण को लेकर आपत्तियां भी हैं। होनी भी चाहिए। एक जाग्रत समाज से ये अपेक्षा भी की जाती है वो किसी कृति पर रचनात्मक आपत्तियां उठाए। इससे ही तो विमर्श की जमीन तैयार होती है,, संवाद का माहौल बनता है। लेकिन आपत्तियों का ठोस आधार होना भी उतना ही आवश्यक है।
अब प्रश्न यह उठता है कि पौराणिक कथाओं को लिखते हुए लेखक जब रचनात्मक छूट लेता है तो क्या वो परंपरा या इतिहास के साथ खिलवाड़ करता है या एक नया इतिहास गढ़ता है। इतिहास के साथ खिलवाड़ या नया इतिहास गढ़ने की बात पर विचार करने से लगता है कि इसके अलावा भी एक पक्ष है वो ये है कि कुछ लेखक बगैर इतिहास से खिलवाड़ किए बिना उपलब्ध प्रामाणिक या लिखित जानकारी के आधार पर पात्रों को समकालीन बनाने का जतन करते हैं। जैसे नरेन्द्र कोहली। कुछ लोग जनश्रुतियों के आधार पर, लोक में व्याप्त छवियों के आधार पर पौराणिक चरित्रों को व्याख्यायित करने की कोशिश करते हैं। जैसे देवदत्त पटनायक। कुछ लेखक अपने हिसाब से पौराणिक चरित्रों को गढ़ने की कोशिश करते हैं और कुछ लोग उससे भी आगे जाकर पौराणिक चरित्रों का अपनी विचारधारा के आधार पर आकलन करने लग जाते हैं। विचारधारा की कसौटी पर कसते हुए पौराणिक चरित्रों को या तो गिराने का लेखन किया जाता है या फिर खलनायकों को नायक बनाने की कोशिश की जाती है। इसका एक उदाहरण महाभारत का चरित्र कर्ण है। महाभारत के इस पात्र को शिवाजी सावंत ने अपनी कृति ‘मृत्युंजय’ में नायक के तौर पर स्थापित करने की कोशिश की है। वैसा नायक जो बुरा काम करते हुए भी समाज में नायक की प्रतिष्ठा हासिल करता है। लेकिन जब हम नरेन्द्र कोहली के ‘महाभारत’ पर लिखी कृतियों में कर्ण के चरित्र को देखते हैं तो वहां वो बेहद क्रूर और खलनायक नजर आता है। एक बार मैंने नरेन्द्र कोहली जी से प्रश्न पूछा था कि आपके यहां कर्ण इतना क्रूर और कुटिल क्यों दिखाई देता है, जबकि अन्य लेखक उसको वंचितों का प्रतिनधित्व मानते हुए सहानुभूतिपूर्वक उस चरित्र का चित्रण करते हैं। तब कोहली जी ने कहा था कि ‘उनका कर्ण महाभारत का वास्तविक कर्ण है।‘ उन्होंने कहा कि- ‘महाभारत में जो- दुर्योधन, दुशासन, शकुनि और कर्ण की चांडाल चौकडी है, उसका वो सबसे दुष्ट पात्र है। द्रोपदी का चीरहरण करने के लिए किसने कहा, कौन व्यक्ति था जो चाहता था कि वो राजपरिवार में रहे, राजकुमारों के बराबर रहे, धृतराष्ट्र उसको अपना पुत्र मान ले।‘ कोहली ने ये भी कहा कि ‘अगर हम महाभारत में चित्रित कर्ण के चरित्र को देखते हैं तो पाते हैं कि जितने भी युद्ध हुए उसमें सबसे पहले कर्ण भागता है, लोगों को ये मालूम महीं है, लोगों ने महाभारत को नहीं पढा है, लोगों ने इधर उधर की सुनी सुनाई बातें या बंबइया फिल्मों में कर्ण के चरित्र को देखा है या पारसी थिएटर में महावीर कर्ण, महादानी कर्ण वगैरह वगैरह देखा है जो कि मूल महाभारत के कर्ण से अलग है। पांडव जब वन में जाते हैं तो उनको चिढाने के लिए जाने का सुझाव किसने दिया, कर्ण ने। कर्ण ने द्यूत सभा में द्रौपदी को जो कहा है वो सुनिए, कर्ण ने युद्ध के समय शल्य को मद्र देश की स्त्रियों के विषय में जो कुछ कहा है, उससे उसकी घटिया सोच के बारे मे पता चलता है। इन दोनों बातों को पढ़ने से ही पता चल जाएगा कि कर्ण की स्त्रियों को लेकर सोच क्या थी। कितनी अपमानित करनेवाली बातें हैं उसको जानने के लिए महाभारत को पढ़ना आवश्यक है। और ये जो दलित या जाति आदि की बात होती है वो तो उस काल में था ही नहीं वो तो इस समय की बात है, चाहे उसको शिवाजी सावंत ने उठाया हो चाहे किसी अन्य लेखक ने। ये बातें आज की मानसिकता को उसपर आरोपित करना है। कर्ण तो राजपरिवार में पला, राजकुमारों के साथ पला.राजमहल में रहा, उसको कौन सी कमी थी सिवाए इसके कि वो धृतराष्ट्र का पुत्र कहला नहीं सका।‘
पौराणिक कथाओं में कल्पना का पुट लगाकर विपुल लेखन हो रहा है, फिक्शन में ये बातें उचित हो सकती हैं लेकिन जब आप किसी मूल ग्रंथ में वर्णित पात्रों के चरित्र को बदलने की कोशिश करते हैं तो लेखन पर सवाल उठने लगते हैं। होना यह चाहिए कि अगर जब लेखक किसी पौराणिक चरित्र को उठाता है और उसको मूल ग्रंथ का चरित्र बताता है तो लेखक को मूल चरित्र के निकट से निकट जाने की कोशिश करनी चाहिए। यह तो संभव है कि लेखक पौराणिक चरित्रों या कथाओं को सामयिकता, सार्थकता और प्रासंगिकता की कसौटी पर कसे, क्योंकि कोई भी रचना समय से मुक्त तो हो नहीं सकती है। लेकिन आधुनिकता के नाम या समकालीनता के नाम पर या नया लिखने के नाम पर जब मूल चरित्र को बदलने की कोशिश होती है तो वो हास्यास्पद हो जाती है।
पौराणिक चरित्रों को लेकर संकट सिर्फ लेखन में ही नहीं सार्वजनिक बातचीत में भी बहुत होती है। सीता और राम के संबंधों को लेकर बहुत सारे विमर्श होते रहते हैं। स्त्रियों के पक्ष में डंडा-झंडा लेकर चलनेवाले रचनाकार राम को सीता के घर से निकालने के प्रसंग को लेकर बहुधा सवाल खड़े करते हैं। लेकिन कुछ शोध ऐसे भी आए हैं जिनमें ये माना गया है कि राम द्वारा सीता की अग्नि परीक्षा और राज्य से बाहर निकालने की कथा वाल्मीकि रामायण में बाद में प्रक्षिप्त की गई है। इसका आधार यह माना जाता है कि अधर्म पर धर्म की विजय की कहानी तो रावण के वध के बाद ही समाप्त हो जाती है। तुलसीदास के रामचरित मानस में तो ये प्रसंग है ही नहीं। स्रावजनित विमर्श में कई बार जब राम को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश होती है तो कई संदर्भ इसी तरह से जोड़े घटाए जाते हैं। समग्रता में तर्क सामने नहीं आते हैं क्योंकि मूल ग्रंथ के चरित्र तक जाने और उसके जानने की कोशिश के बगैर ही किसी पात्र या चरित्र के बारे में राय बना ली जाती है। पौराणिक कथाओं पर लिखना या पौऱाणिक चरित्रों के बारे में लिखना बहुत सावधानी की मांग करता है, बहुत गहरे अध्ययन की मांग करता है। यहां लेखक को उसी तरह का संतुलन रखना पड़ता है जैसे नट रस्सी पर चलते हुए रखता है। जरा सी चूक उसको नीचे गिरा सकती है या जरा सी असावधानी से लेखक की साख धूल में मिल सकती है।

Saturday, January 28, 2017

लेखन को सम्मान

पूरी दुनिया में रामकथा अलग अलग रूपों में मौजूद है । हमारे देश में ही लगभग हर भाषा में राम कथा मौजूद हैं । वाल्मीकि रामायण के अलावा हर भाषा में रामकथा लिखे गए जिनमें देश काल और परिस्थिति के हिसाब से बदलाव भी लक्षित किया जा सकता है । हमारे समय में रामकथा को आधुनिकता के साथ पेश करनेवाले नरेन्द्र कोहली को भारत सरकार ने पद्धश्री से सम्मानित करने का एलान किया है । यह हिंदी के उन लेखकों का भी सम्मान है जो किसी वाद या पंथ के खूंटे से बंधे बगैर पाठकों को ध्यान में रखकर लेखन करते हैं । नरेन्द्र कोहली को एक खास विचारधारा के लोगों ने लगातार साहित्य की कथित मुख्यधारा से अलग रखा और कोशिश करके उनको हाशिए से साहित्य के केंद्र में नहीं आने दिया । यह तो पाठकों के साथ की ताकत थी अपने लेखन पर भरोसा कि नरेन्द्र कोहली उपेक्षा के इस दंश को झेल गए । लगभग छह दशकों से लेखन कर रहे नरेन्द्र कोहली को अब जाकर पद्म सम्मान के लायक समझा गया जबकि पिछले दिनों तो ऐसे ऐसे लोगों को पद्म पुरस्कार दिए गए जिनके बारे में लिखना भी व्यर्थ है । नरेन्द्र कोहली यह मानते हैं कि विचारधारा के ध्वजवाहकों ने उनकी साहित्यक हत्या की कोशिश की लेकिन अपने लेखन के दम पर वो प्रासंगिक बने रहे । खैर यह अवांतर प्रसंग है । हाल के दिनों में पौराणिक कथाओं और आख्यानों को लेकर एक उत्सुकता का वातावरण बना है । हिंदी में नरेन्द्र कोहली के लेखन के बाद अंग्रेजी में भी कुछ युवा लेखकों ने पौराणिक आख्यानों को लेकर लेखन प्रारंभ किया है । नरेन्द्र कोहली ने हिंदी के जिस विशाल पाठकवर्ग को अपने साथ जोड़ा उसमें अंग्रेजी के लेखकों को भी संभावनाएं नजर आईं । परोक्ष रूप से एक कार्यक्रम में अमिष त्रिपाठी ने इस बात को स्वीकार भी किया । यह अच्छी बात है कि साहित्य का एक वर्ग वापस अपनी जड़ों की ओर लौट रहे हैं ।

नरेन्द्र कोहली ने व्यंग्य लेखन भी किया ।व्यंग्य लेखन की शुरुआत की कहानी भी बेहद मार्मिक है । सत्तर के दशक की बात उनके घर जुड़वा बच्चों ने जन्म लिया । जन्म के बाद ही दोनों बहुत बीमार पड़ गए और उनको दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में भर्ती करवाना पड़ा जहां उनकी बच्ची की मौत हो गई और बेटा लंबी बीमारी से उबर कर घर लौटा । नरेन्द्र कोहली ने बातचीत में बताया कि अपने बच्चों की बीमारी के वक्त उन्होंने व्यवस्थागत संवेदनहीनता को बेहद नजदीक से देखा । यह संवेदनहीनता ही उनको व्यंग्य लेखन की ओर ले गया । विवेकानंद पर भी उन्होंने– तोड़ो कारा तोड़ो -के नाम से दो खंड लिखे । उन्होंने रामकथा पर भी विस्तार से लिखा और तुलसी और वाल्मीकि के रामायण को आधुनिक परिप्रेक्ष्य में व्याख्यायित किया । महाभारत के चरित्रों को केंद्र में रखकर भी नरेन्द्र कोहली ने विपुल लेखन किया । महाभारत को पढ़ते हुए बहुधा उसके पात्रों को याद रखना मुश्किल होता है लेकिन कोहली जी ने बेहद कुशलता से कुछ पात्रों को पकड़े रखा और बाकियों को छोड़कर रोचकता के साथ प्रस्तुत कर दिया । रामकथा और महाभारत पर लिखने के बाद कोहली जी ने गीता पर लिखना प्रारंभ किया । वाणी प्रकाशन से प्रकाशिक अपनी पुस्तक शरणम में वो स्वीकार करते हैं कि उनको ना तो संस्कृत का ज्ञान था और ना ही गीता के दर्शन का लेकिन अपने परिवार में गीता के पाठ ने उनको गीता पर लिखने के लिए प्रेरित किया। सतहत्तर साल की उम्र में भी कोहली जी का लगातार लेखन आश्वस्तिकारक है । उनके लेखन को लेकर हिंदी साहित्य में व्याप्त उदासीनता बी अब दरकने लगी है यह भी संतोष की बात है । कोहली जी को पद्म सम्मान मिलने पर बधाई ।