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Saturday, December 27, 2025

धर्म-परंपराओ को अपनाना आवश्यक


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत जब भी हिंदू धर्म या हिंदू राष्ट्र की बात करते हैं तो विपक्षी दल विशेषकर वामपंथी और उनका इकोसिस्टम उछलने लगता है। वो धर्म को राजनीति से दूर रखने की वकालत करने लग जाते हैं। इसी तरह से जब प्रधानमंत्री मोदी हिंदू धर्म की बात करते हैं या हिंदू या सनातन धर्म के प्रतीकों को रेखांकित करते हैं तो कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी दल के नेता इसको धर्म और राजनीति का घालमेल बताने लग जाते हैं। संविधान और उसके अनुच्छेदों को उद्धृत करने लगते हैं। दुनिया के अन्य देशों का उदाहरण देने में प्राणपन से जुट जाते हैं। जहां तक मुझे स्मरण है कि कुछ वर्षों पूर्व जब बराक ओबामा अमेरिका के राष्ट्रपति थे तो एक रिपोर्ट आई थी जिसमें भारत में धार्मिक असहिष्णुता की बात की गई थी। अब तो अमेरिका में भी बदलाव की बयार देखने को मिल रही है। वहां खुल कर ईसाई धर्म की और उसकी रक्षा की विस्तार से बातें की जा रही है। पिछले दिनों अमेरिका में चार्ली किर्क की फ्रीडम टी शर्ट पहनने वाली एक महिला जेनी को जब सार्वजनिक रूप से प्रताड़ित किया गया तो पूरे अमेरिका में उसके समर्थन की लहर दौड़ गई। देखते देखते जेनी के समर्थन में ढाई लाख डालर से अधिक की क्राउड फंडिंग हो गई। उनका अमेरिका फेस्ट के मंच पर अभिनंदन किया गया। चार्ली किर्क अमेरिका का दक्षिणपंथी राजनीतिक कार्यकर्ता था जो अमेरिकी समाज की परंपराओं  को लेकर निरंतर मुखर रहता था। इस वर्ष उनकी हत्या कर दी गई थी। अमेरिका में चार्ली किर्क को परंपरावादी माना जाता था। राष्ट्रपति ट्रंप से उनके करीबी रिश्ते थे।

अभी क्रिसमस बीता है। क्रिसमस के पहले अमेरिका में कमला हैरिस का एक वक्तव्य खूब वायरल हुआ। अमेरिकी राष्ट्रपति की चुनावी रैली में कमला ने कहा था ‘हाउ डेयर यू विश क्रिसमस’। करीब 15 दिनों तक कमला हैरिस के इस वीडियो को चलाकर उनकी आलोचना की गई। प्रतीत होता है कि इसका उद्देश्य कमला हैरिस और उनकी पार्टी को धर्म विरोधी बताने का था। ऐसा इसलिए भी लगता है कि व्हाइट हाउस ने क्रिसमस के अवसर पर एक्स पर पोस्ट किया, वी आर सेइंग मेरी क्रिसमस अगेन। इसके बाद क्रिसमस ट्री की फोटो और अमेरिका का झंडा लगया गया है। इस पोस्ट में क्रिसमस ट्री के आगे डोनाल्ड ट्रंप की फोटो थी और उनके आफिशियल हैंडल को टैग किया गया। इस पोस्ट को कमला हैरिस के लिए संदेश के तौर पर देखा गया। इतना ही नहीं डोनाल्ड ट्रंप ने अपने एक्स हैंडल से जो पोस्ट किया वो और भी मारक है- ‘सभी को मेरी क्रिसमस। उन नीच रैडिकल लेफ्ट को भी जो अमेरिका को ध्वस्त करने के हर संभव प्रयास से जुड़े हुए हैं लेकिन बुरी तरह असफल हो रहे हैं। अब हमारी कोई सीमा खुली हुई नहीं है, पुरुष महिलाओं के वस्त्र में नहीं हैं और कानून का पालन करवाने वाली एजेंसियां कमजोर नहीं हैं। हमारा स्टाक मार्केट रिकार्ड स्तर पर है। महंगाई नहीं है। बीते कल हमारी जीडीपी 4.3 पर थी जो उम्मीद से दो प्वाइंट अधिक है। टैरिफ से खरबों डालर मिले जिससे हम समृद्ध हुए। हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा उच्चतम स्तर पर है। पूरी दुनिया में हमारा सम्मान बढ़ा है। भगवान! अमेरिका पर कृपा बनाए रखें।‘ ट्रंप का ये एक्स पोस्ट पूरी तौर पर राजनीतिक है और क्रिसमस और भगवान को केंद्र में रखकर लिखा गया है। कल्पना कीजिए अगर हमारे देश में प्रधानमंत्री मोदी या राष्ट्रपति इस तरह की पोस्ट लिख दें तो कैसा बवाल मचता। 

धर्म के नाम पर अमेरिका में इतना ही नहीं हो रहा है। व्हाइट हाउस ने 26 दिसंबर को राष्ट्रपति ट्रंप का एक वक्तव्य जारी किया जिसमें लिखा है कि आज रात को कमांडर इन चीफ के तौर पर मेरे निर्देश पर संयुक्त राज्य ने आई एस आई एस के नीच आतंकवादियों पर पूरी ताकत के साथ मारक हमला किया। ये वही आतंकवादी हैं जो पिछले कई दिनों से निर्दोष ईसाइयों पर हमला कर रहे हैं और उनकी जान ले रहे हैं। इस संदेश से ये स्पष्ट है कि पूरी दुनिया में अगर ईसाइयों पर कहीं हमला होगा तो अमेरिका उसमें प्रभावी हस्तक्षेप करेगा। इसकी एक पृष्ठभूमि है। दो नवंबर को ट्रंप ने नाइजीरिया सरकार को चेतावनी दी थी कि अगर वहां की सरकार इस्लामिक आतंकवादियों को ईसाई जनता को मारने से नहीं रोकेगी तो हर तरह के प्रतिबंध लगाए जाएंगे। ट्रंप ने अपनी सेना को युद्ध के लिए तैयार रहने का निर्देश दिया था। अगर नाइजीरिया सरकार अपने देश में निर्दोष और मासूम ईसाइयों की हत्या नहीं रोकती है तो हमलावरों पर उससे अधिक त्वरा से हमला होगा जैसे आतंकवादी वारदात को अंजाम देते हैं। ये वही दौर था जब ईसाई समुदाय के लोगों ने ट्रंप से नाइजीरिया में ईसाइयों की हत्या को रोकने की मांग की थी। अमेरिका के इस कदम को अगर कूटनीतिक स्तर पर देखा जाए तो जिस तरह से बंग्लादेश में हिंदूओं पर हमले हो रहे हैं वैसे में भारत को हिंदुओं की रक्षा का अधिकार मिलता है। 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने शताब्दी वर्ष में कुटुंब प्रबोधन की बात कर रहा है। परिवार को जोड़ने और और परिवार की महत्ता पर बल देने का उपक्रम जारी है। इस कार्यक्रम से संघ विरोधियों के पेट में दर्द हो रहा है। कुछ लोग इसको आधुनिक सोच के विपरीत बताने में जुटे हैं। वो व्यक्तिगत अधिकारों और अपना जीवन अपनी मर्जी से जीने के अधिकारों की बात करते हुए संविधान को बीच में लाते हैं। जबकि संविधान कहीं से भी कुटुंब का विरोधी नहीं है। कुछ दिनों पहले सरसंघचालक मोहन भागवत ने हिंदू दंपति को तीन बच्चा पैदा करने की सलाह दी थी। उस समय इसको लेकर खूब हंगामा हुआ । खुद को प्रगतिशील समझने और घोषित करनेवाले राजनीतिक विश्लेषकों ने मोहन भागवत की आलोचना की थी। अनेक प्रकार के तर्क दिए गए थे जबकि मोहन भागवत ने विशेषज्ञों की राय के आधार पर कहा था कि जिस समुदाय में जन्म दर तीन से कम होते हैं वो विलुप्त हो जाते हैं। प्रगतिशील और आधुनिकता का दंभ भरनेवालों को अमेरिका को देखना चाहिए। वहां परिवार, शादी, बच्चे की महत्ता पर खूब चर्चा हो रही है। एलान मस्क और अमेरिका के उफराष्ट्रपति जे डी वांस अपने बच्चों के साथ ओवल आफिस में देखे जाते हैं। गर्व से वो परिवार की बात करते हैं। प्रेस सेक्रेट्री कैरोलिन लेविट जब गर्भवती होती है तो इसकी घोषणा होती है। वहां समलैंगिक अधिकारों या लिवइन का हो हल्ला अब नहीं मच रहा है। अपनी जड़ों की ओर लौटने की बात हो रही है। अगर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हिंदुओं से तीन बच्चा पैदा करने की अपेक्षा कर रहा है तो न तो ये पुरातन सोच है और ना ही आधुनिकता विरोधी। आज वैश्विक स्तर पर अपनी परंपराओं और धर्म से जुड़ने का आग्रह बढ़ा है। इसको जो नहीं समझ पा रहे हैं वो हाशिए पर जा रहे हैं।    


Saturday, August 30, 2025

ध्वस्त होता झूठा नैरेटिव

समाचार चैनलों पर चलवनेवाली डिबेट में कई लोग डंके की चोट पर ये पूछते हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का स्वाधीनता आंदोलन से क्या संबंध था। फिर स्वयं ही निर्णयात्मक उत्तर देते हैं कि संघ का स्वाधीनता आंदोलन में ना तो कोई योगदान था ना ही संबंध। ये नैरेटिव वर्षों से चलाया जा रहा है। हर कालखंड में कई लोग इसको गाढ़ा करने के उपक्रम में जुटे रहते हैं। अब भी हैं। लेख आदि में भी इस बात का उल्लेख प्रमुखता से किया जाता है कि संघ का देश के स्वतंत्रता आंदोलन में कोई योगदान रहा ही नहीं है। ऐसा करके वो जनमानस में भ्रामक अवधारणा का रोपण करते चलते हैं। जब तटस्थ विश्लेषक तथ्य रखने लगते हैं तो उनको दबाने का प्रयास किया जाता है। अर्धसत्य को सामने रखकर उनको चुप कराने का प्रयास किया जाता है। कहा भी गया है कि अगर एक झूठ को बार-बार कहेंगे तो उसको सच नहीं तो सच के करीब तो मान ही लिया जाएगा। तब ऐसा और भी संभव हो जाता है जब कहे हुए को पुस्तकों के माध्यम से पुष्ट किया जाता रहा हो। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और स्वाधीनता आंदोलन के संबंध में ऐसा ही होता आ रहा है। ऐसा कहनेवाले कुछ तथ्यों को दबा देते हैं। वो ये नहीं बताते हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना 1925 में हुई थी और देश 1947 में आजाद हो गया। उस समय संघ की ताकत कितनी रही होगी, एक संगठन के तौर पर संघ का कितना विस्तार रहा होगा, संघ से कितने कार्यकर्ता जुड़े होंगे, इसको बगैर बताए निर्णय हो जाता है। जैसे-जैसे संघ का विस्तार होता गया ये नैरेटिव जोर-शोर से चलाया जाने लगा। संघ शताब्दी वर्ष में इस विमर्श को और गाढ़ा करने का उपक्रम हो रहा है बल्कि कह सकते हैं कि संगठित होकर किया जा रहा है।

हाल ही में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डा मोहन भागवत को दो अवसरों पर सुना। एक पुस्तक विमोचन का कार्यक्रम था। दूसरा संघ शताब्दी वर्ष पर दिल्ली में तीन दिनों का व्याख्यानमाला। सरसंघचालक ने पहले कार्यक्रम में बताया कि अंग्रेज अफसर नागपुर और उसके आसपास चलनेवाली शाखाओं की ना सिर्फ निगरानी करते थे बल्कि हर शाखा से संबंधित जानकारी को जमा कर उसका विश्लेषण भी करते थे। वो आशंकित रहते थे कि अगर शाखाओं का विस्तार हो गया तो अंग्रेजों के लिए दिक्कत खड़ी हो सकती है। व्याख्यानमाला में डा भागवत ने बताया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रथम सरसंघचालक डा हेडगेवार स्वाधीनता आंदोलन में बाल्यकाल से सक्रिय थे। नागपुर के स्कूलों में 1905-06 में वंदेमातरम आंदोलन हुआ था। इसमें शामिल छात्र हेडगेवार ने अंग्रेजों से माफी मांगने से इंकार कर दिया था। उनको स्कूल से निष्कासित कर दिया गया था। बाद में हेडगेवार डाक्टरी की पढ़ाई करने कलकत्ता (अब कोलकाता) गए। पढ़ाई पूरी करने के बाद तीन हजार रु मासिक वेतन वाली नौकरी को ठुकराकर डा हेडगेवार ने देशसेवा की ठानी। वो अनुशीलन समिति में भी शामिल हुए थे। 1920 में उनपर देशद्रोह का मुकदमा चला। कोर्ट में अपने बचाव में उन्होंने स्वयं दलील पेश की थी। उद्देश्य था कि पत्रकार आदि केस सुनने आएंगे तो उनके विचार जनता तक पहुंच पाएंगे। न्यायालय का जब निर्णय आया तो जज ने लिखा, जिन भाषणों के कारण इन पर यह आरोप लगा है, इनका बचाव का भाषण उन भाषणों से अधिक ‘सेडिशियस’ है। उनको एक वर्ष सश्रम कारावास की सजा हुई। जेल से बाहर निकलने के बाद डा हेडगेवार ने 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की। 1930 में जंगल सत्याग्रह आरंभ हुआ तो उन्होने सरसंघचालक का दायित्व छोड़ दिया। आंदोलन में शामिल हुए। उनको फिर से एक वर्ष सश्रम कारावास की सजा हुई। सजा काटकर वापस आने पर सरसंघचालक का कार्यभार संभाला। इस दौरान वो सुभाष चंद्र बोस, महात्मा गांधी, लोकमान्य तिलक, चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह के संपर्क में भी आए। राजगुरु को तो उन्होंने महाराष्ट्र में अंडरग्राउंड रखने में मदद की।  नागपुर में भी रखा। बाद में उनको अकोला भेजने की भी व्यवस्था की। इलके अलावा भी संघ से जुड़े कार्यकर्ताओं की एक लंबी सूची है जो स्वाधीनता आंदोलन में जेल गए थे। पर विचारधारा विशेष के लोगों ने इन तथ्यों को आम जनता से दूर रखा। भ्रामक बातें करते रहे।  

नैरेटिव के खेल को इस तरह से समझा जा सकता है। कम्युनिस्टों ने स्वाधीनता आंदोलन का विरोध किया, अंग्रेजों का साथ दिया, सुभाष बाबू को जापान और जर्मनी के हाथों की कठपुतली बताते हुए धोखेबाज तक कहा। इसकी चर्चा नहीं होती है। बल्कि इस तथ्य को दबा दिया जाता है। इस खेल में ट्विस्ट तब आया जब हिटलर ने सोवियत रूस पर आक्रमण कर दिया। कम्युनिस्ट पहले जिस युद्ध को साम्राज्यवादी ताकतों के विरुद्ध कहते थे उसको ही हिटलर के रूस पर हमले के बाद जनयुद्ध कहने लगे। इसके बाद वो अंग्रेजों के साथ हो गए और उनके हाथ मजबूत करने लगे। जब गांधी ने 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन आरंभ किया तो कम्युनिस्टों ने इस आंदोलन को दबाने में अंग्रेजों का साथ दिया। फिल्म इतिहासकार मिहिर बोस ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि सुभाष बाबू के विश्वस्त कम्युनिस्ट साथी भगत राम तलवार ने अंग्रेजों के लिए जासूसी की थी। विश्व युद्ध समाप्त होने के बाद कम्युनिस्टों ने मुस्लिम लीग की तरह पाकिस्तान बनाने का समर्थन किया था। 1946 में तेलांगना में सशस्त्र विद्रोह आरंभ किया। पहले ये निजाम के खिलाफ था लेकिन स्वाधीनता के बाद ये भारत सरकार के खिलाफ हो गया क्योंकि वो स्वाधीनता के बाद बनी सरकार को राष्ट्रीय धोखा कहते थे। वो तो भला हो स्टालिन का कि 1950 में उन्होंने भारत के कम्युनिस्ट नेताओं को मास्को बुलाकर बात की। उस बातचीत के बाद भारत के कम्युनिस्टों ने सशस्त्र विद्रोह खत्म किया। देश के विरुद्ध सशस्त्र आंदोलन के बावजूद भी नेहरू ने कम्युनिस्टों पर पाबंदी नहीं लगाई। स्टालिन के साथ मीटिंग के बाद कम्युनिस्टों ने 1952 के पहले आमचुनाव में हिस्सा भी लिया था। दरअसल कम्युनिस्टों की आस्था राष्ट्र से अधिक विचार और विचारधारा में रही है। उनके लिए विचारधारा सर्वप्रथम है जबकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लिए राष्ट्र सर्वप्रथम है। यही बुनियादी अंतर है।

कालांतर में कम्युनिस्टों और कांग्रेस के बीच एक अंडरस्टैंडिंग बनी। जब स्वाधीन भारत में स्वाधीनता का इतिहास लेखन आरंभ हुआ तो उपरोक्त तथ्यों को नजरअंदाज कर दिया गया। स्कूल में पढ़ाई जानेवाली पुस्तकों में भी इन बातों को छोड़ दिया गया। परिणाम ये हुआ कि कम्युनिस्टों पर स्वाधीनता आंदोलन में उनकी भागीदारी को लेकर प्रश्न नहीं उठे। एक ऐसा नैरेटिव खड़ा किया जिसमें संघ तो निशाने पर रहा लेकिन कम्युनिस्टों के कारगुजारियों पर चर्चा नहीं हुई। 1925 में ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना हुई थी और 1925 में ही कम्युनिस्ट पार्टी का गठन हुआ था। दोनों संगठनों की स्थापना के सौ वर्ष पूर्ण हो रहे हैं। एक विश्व का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन बनकर निरंतर मजबूत हो रहा है और कम्युनिस्ट पार्टी अपने अतित्व के लिए संघर्ष कर रही है। कहा जा सकता है कि भारत का जनमानस जैसे जैसे परिपक्व हो रहा है वैसे वैसे जनता राष्ट्रहित सोचनेवालों के साथ होती जा रही है।

Saturday, October 12, 2024

शील के साथ सबल राष्ट्र का आह्वान


विजयादशमी पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपनी स्थापना के शताब्दी वर्ष में प्रवेश कर रहा है। इस लंबी यात्रा में संघ ने बहुत उतार चढ़ाव देखे। स्वयंसेवकों की निरंतर तपस्या ने इसको विश्व का सबसे बड़ा संगठन बना दिया। एक ऐसा संगठन जो व्यक्ति निर्माण के माध्यम से राष्ट्र को सशक्त करने में लगा है। ऐसा नहीं है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को 100 वर्ष तक की यात्रा पूरी करने में विरोध नहीं झेलना पड़ा। अकादमिक और पत्रकारिता के क्षेत्र में तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का नाम सुनकर ही आगबबूला होनेवाले लोगों की बड़ी संख्या रही है। अकादमिक जगत में सैकड़ों पुस्तकें लिखी गईं जिनमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के क्रियाकलापों को बिना जाने धारणा के आधार पर निष्कर्ष निकाले गए। अब भी निकाल रहे हैं। अंग्रेजी के कई लेखक जो स्वयं को लिबरल कहते हैं वो सहजता के साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को मिलिटेंट संगठन लिख रहे हैं। संघ को कट्टरपंथी संगठन और प्रगतिशील नहीं माननेवाले अकादमिक जगत के तथाकथित विद्वानों को विजयादशमी के अवसर पर सरसंघचालक मोहन भागवत का व्याख्यान सुनना और समझना चाहिए। अपने इस व्याख्यान में मोहन भागवत जी ने जिस तरह से भारतीय समाज के यथार्थ को उद्घाटित किया उसके गहरे निहितार्थ हैं। समाज में क्या चल रहा है, किस तरह से भारतीय समाज को बांटने की राजनीति हो रही है, किस तरह से भारत को कमजोर करने के लिए अंतराष्ट्रीय स्तर पर रणनीति बनाई जा रही है, किस तरह से देश के कुछ लोगों और समूहों को प्रभावित करके भारत विरोधी ताकतें सक्रिय हैं उन सब पर मोहन भागवत जी ने विस्तार से बोला। समाज को सचेत भी किया।

मोहन भागवत जी ने स्पष्ट रूप से कहा कि पिछले कुछ वर्षों में भारत की धमक पूरे विश्व में बढ़ी है। देशहित की प्रेरणा से युवा शक्ति, मातृशक्ति, उद्यमी किसान, श्रमिक, जवान, प्रशासन, शासन सभी से प्रतिबद्धतापूर्वक अपने कार्य में डटे रहने से विश्वपटल पर भारत की छवि, शक्ति, कीर्ति व स्थान निरंतर उन्नत हो रहा है। यह कहने के बाद वो समाज को चेताते भी हैं, हम सबके इस कृतनिश्चय की परीक्षा लेने के लिए कुछ मायावी षडयंत्र हमारे सामने उपस्थित हुए हैं जिनको ठीक से समझना आवश्यक है। अगर पूरे देश पर नजर डालें तो चारो तरफ के क्षेत्रों को अशांत व अस्थिर करने के प्रयास गति पकड़ते हुए दिखाई देते हैं। मोहन भागवत के भाषण को अगर समग्रता में विश्लेषित करने की कोशिश करें तो इस चेतावनी के बाद वो उन अदृष्य अंतराष्ट्रीय शक्तियों की भी चर्चा करते हैं जो पूरी दुनिया में अपने स्वार्थ के कारण लोकतंत्र के नाम पर दूसरे देशों में गड़बड़ियां फैलाने का कार्य करते हैं। वो अरब स्प्रिंग से लेकर बांग्लादेश में हिंसक तख्तापलट का उदाहरण देते हुए हिंदू समाज को संगठित और सबल बनने की बात को रेखांकित करते हैं।

डा मोहन भागवत समाज में भारतीय संस्कारों के नष्ट करनेवाली शक्तियों की पहचान करते हुए उनसे सतर्क भी करते हैं। डीप स्टेट, वोकिज्म, कल्चरल मार्क्सिस्ट जैसे शब्दों की चर्चा करते हुए इसको सांस्कृतिक परंपराओं का घोषित शत्रु करार देते हैं। वो बेहद तीखे शब्दों में इनपर आक्रमण करते हैं, सांस्कृतिक मूल्यों, परंपराओं तथा जहां जहां जो भी भद्र, मंगल माना जाता है उसका समूल उच्छेद इस समूह की कार्यप्रणाली का अंग है। समाज मन बनाने वाले तंत्र व संस्थानों यथा शिक्षा तंत्र, शिक्षा संस्थान, संवाद माध्यम, बौद्धिक संवाद से अपने प्रभाव में लाना, उनके द्वारा समाज का विचार, संस्कार तथा आस्था को नष्ट करना यह इस कार्यप्रणाली का प्रथम चरण है। इसको हम इस तरह से भी समझ सकते हैं कि हिंदू त्योहारों के समय इस समूह को पर्यावरण की चिंता सताने लगती है। हिंदू धर्म प्रतीकों को पिछड़ेपन की निशानी बताने का अभियान चलाया जाता है। हिंदू समाज की किसी एक घटना से पूरे समाज को प्रश्नांकित किया जाता है। समाज में टकराव की संभावनाओं की निरंतर तलाश की जाती रहती है। जैसे ही कहीं कोई फाल्ट लाइन मिलती है तो ऐसे वातावरण का निर्माण करते हैं कि प्रतीत होता है कि ये समस्या बहुत बड़ी है। प्रत्यक्ष टकराव की जमीन भी तैयार कर दी जाती है। इसको नागरिकता संशोधन कानून के समय, किसान आंदोलन के समय और 2015 के पुरस्कार वापसी अभियान में देखा जा सकता है। किस तरह से एक छोटी सी घटना को इकोचैंबर में बैठे अकादमिक, लेखन, सिनेमा से जुड़े लोगों ने गुब्बारे की तरह फुला दिया था। मोहन भागवत की राय है कि देश में बिना कारण कट्टरपन को उकसानेवाली घटनाओँ में अचानक वृद्धि हो रही है। परिस्थिति या नीतियों को लेकर मन में असंतुष्टि हो सकती है परंतु उसको व्यक्त करने या विरोध करने के प्रजातांत्रिक मार्ग होने चाहिए। उनका अवलंबन न करते हुए हिंसा पर उतर आना और भय पैदा करने के प्रयास करने को वो बेहद तल्ख शब्दों में गुंडागर्दी कहते हैं। अकारण हिंसा फैलाकर तंत्र को बाधित करने के इन प्रयासों को बाबासाहेब अराजकता का व्याकरण कहते थे।

विजयादशमी पर डा मोहन भागवत के भाषण को दो हिस्सों में बांटकर देखा जाना चाहिए। पहला हिस्सा जिसमें वो सबल राष्ट्र की बात करते हैं। वो हिंदुओं के संगठित होने की अपेक्षा करते हैं। कहते हैं कि इस देश को एकात्म, सुख शांतिमय, समृद्ध और बल संपन्न बनाना यह सबकी इच्छा है और सबका कर्तव्य भी है। इसमें हिंदू समाज की जिम्मेवारी अधिक है। यहां वो बहुत अच्छा उदाहरण देते हैं, समाज स्वयं जगता है, अपने भाग्य को अपने पुरुषार्थ से लिखता है तब महापुरुष, संगठन, संस्थाएं, शासन, प्रशासन आदि सब सहायक होते हैं। शरीर की स्वस्थ अवस्था में क्षरण पहले आता है बाद में रोग उसको घेरते हैं। वो जब सबलता की बात करते हैं तो एक सुभाषित के माध्यम से कहते हैं कि दुर्बलों की परवाह तो देव भी नहीं करते। अपने भाषण के दूसरे हिस्से में वो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष में संगठन की कार्ययोजना प्रस्तुत करते हैं। सामाजिक समरसता, पर्यावरण, संस्कार जागरण, नागरिक अनुशासन और स्व गौरव आदि की बात करते हैं। वो इस बात की अपेक्षा भी जताते हैं कि संवाद माध्यमों का उपयोग करनेवालों को इनका उपयोग समाज को जोड़ने के लिए करना चाहिए ना कि तोड़ने के लिए, सुसंस्कृत बनाने के लिए हो ना कि अपसंस्कृति फैलाने के लिए। अपने व्याख्यान में उन्होंने ओटीटी प्लेटफार्म पर चलनेवाली सामग्री की गुणवत्ता को लेकर चिंता प्रकट की। ओटीटी पर आनेवाली सामग्री पर कानून के नियंत्रण पर भी बल दिया। यह सरकार के लिए भी एक संदेश है। जब संस्कारों और उसके क्षरण की बातें होंगी या जब सरकार के विरुद्ध जन के मानस में गलत छवि आरोपित करने की बात होगी तो ओटीटी प्लेटफार्म्स पर परोसी जानेवाली मनोरंजन सामग्री पर विचार करना ही होगा। समाज को संगठित करते हुए सबल बनाने की बात करते हुए मोहन भागवत ने ये भी स्पष्ट किया कि सबलता शील के साथ आनी चाहिए। विश्व मंगल की अवधारणा पर आधारित व्यवस्था में भारत को एक सबल राष्ट्र के तौर पर स्थापित करने के लिए प्रत्येक भारतवासी को कार्य करना चाहिए। उन तत्वों की पहचान करके उनको परास्त करना होगा जो भारत के सिस्टम में रहते हुए भारत को कमजोर करने के प्रयत्न में लगे रहते हैं।

 

Saturday, June 15, 2024

अहंकार के छद्म विमर्श से राजनीति


अहंकार। लोकसभा चुनाव के परिणाम के बाद इस शब्द पर काफी चर्चा हो रही है लोकसभा चुनाव के पहले और चुनाव के दौरान एरोगेंट शब्द की चर्चा थी। केंद्र सरकार के मंत्रियों की बात हो या फिर भारतीय जनता पार्टी के बड़े नेताओं की। आसानी से उनके स्वभाव के साथ एरोगेंट शब्द चिपका दिया जाता था। एरोगेंट से अगली कड़ी के रूप में अहंकार आया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तक को अहंकारी कहा गया। अमेठी में स्मृति इरानी की चुनावी हार को उनके अहंकार से जोड़ा गया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जब संसद में एक अकेला सब पर भारी बोला था तभी से उनके साथ एरोगेंट शब्द चिपकाने का अभियान विपक्षी दलों और उनके इकोसिस्टम ने चलाया। एक प्रधानमंत्री के तौर पर जब वो अपने विकास कार्यों को गिनाते थे, अपने संबोधन में मैं का प्रयोग करते थे तो इस मैं को भी एरोगेंट के कोष्ठक में डाल दिया जाता था। इकोसिस्टम से जुड़े विश्लेषकों ने मोदी के भाषणों के चुनिंदा अंश को उठाकर उनके व्यक्तित्व के साथ एरोगेंट शब्द चिपकाने का खेल खेला। यह अभियान लंबे समय से चल रहा था। चुनाव के दौरान इसमें तेजी आई। इसी तरह स्मृति इरानी के व्यक्तित्व के साथ भी एरोगेंट शब्द चिपकाने का खेल चला। कभी किसी सरकारी अधिकारी को जनता के पक्ष में काम करने को लेकर उनके संवाद के अंश काटकर तो कभी किसी पत्रकार को उनके उत्तर को एरोगेंट कहा गया। चुनाव में जब अमेठी गया था तो वहां पता चला कि एक व्यक्ति की हत्या हो गई थी। उस इलाके के प्रभावशाली लोग हत्या के आरोपी को बचाने में लगे थे। स्मृति इरानी को जब पता चला तो वो पीड़ित के पक्ष में खड़ी हो गईं। हत्यारोपी के विरुद्ध कानून सम्मत कार्य करने के लिए पुलिस को कहा। तब उस इलाके के प्रभावशाली लोगों ने कहा कि स्मृति एरोगेंट हो गई है और किसी की नहीं सुनती। इसको इकोसिस्टम ने आगे बढ़ाया।

चुनाव परिणाम में जब भारतीय जनता पार्टी को अपेक्षित सफलता नहीं मिली। सबसे बड़े दल और चुनाव पूर्व गठबंधन के तौर पर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को बहुमत मिला और नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में सरकार बन गई। मंत्रिमंडल का गठन हो गया। मंत्रिमंडल गठन के बाद राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कार्यकर्ता विकास वर्ग के अपने संबोधन में अपनी बातें रखीं। उसमें भी अहंकार शब्द का प्रयोग किया गया। फिर क्या था इकोसिस्टम को मसाला मिल गया। उसको नरेन्द्र मोदी को नसीहत के तौर पर पेश किया जाने लगा। पृष्ठभूमि बनाई ही जा चुकी थी। सरसंघचालक के बयान से निकलनेवाले संदेश को समझना है तो उसको समग्रता में देखना होगा। पहले बात कर लेते हैं अहंकार की। सरसंघचालक मोहन भागवत ने अपने उद्बोधन में कहा, जो सेवा करता है, जो वास्तविक सेवक है, जिसको वास्तविक सेवक कहा जा सकता है उसको कोई मर्यादा रहती है यानी वो मर्यादा से चलता है। काम सब लोग करते हैं, लेकिन कार्य करते समय मर्यादा का पालन करना। जैसा कि तथागत ने कहा है—कुशलस्य उपसंपदा, यानी अपनी आजीविका पेट भरने का काम सबको लगा ही है, करना ही चाहिए। अपने शरीर को भूखा नहीं रखना है, लेकिन कौशल पूर्वक जीविका कमानी है और कार्य करते समय दूसरों को धक्का नहीं लगना चाहिए। ये मर्यादा भी उसमें निहित है। ऐसी मर्यादा रखकर हम लोग काम करते हैं। काम करने वाला उस मर्यादा का ध्यान रखता है। वो मर्यादा ही अपना धर्म है, संस्कृति है। जो पूज्य महंत गुरुवर्य महंत रामगिरी जी महाराज जी ने अभी बहुत मार्मिक कथाओं से थोड़े में बताई, उस मर्यादा का पालन करके जो चलता है, कर्म करता है, कर्मों में लिप्त नहीं होता, उसमें अहंकार नहीं आता। वही सेवक कहलाने का अधिकारी रहता है।

उपर्युक्त वक्तव्य में से अगर सिर्फ अंतिम वाक्य को निकालकर उसको नरेन्द्र मोदी या उनकी सरकार के मंत्रियों के क्रियाकलापों और व्यवहार से जोड़ दिया गया। सरसंघचालक ने अपने वक्तव्य के इस हिस्से में सेवा और मर्यादा की बात की। इसके लिए उन्होंने तथागत और महंत रामगिरी जी को उद्धृत किया। इसमें राजनीति की बात तो कहीं है नहीं, समाज सेवा की बात है जो वो संघ शिक्षा वर्ग के प्रतिभागियों को समझा रहे हैं। इसी तरह से मणिपुर को लेकर उनकी चिंता भी समाज की चिंता है। जब वो कहते हैं कि समाज में जगह-जगह कलह नहीं चलता। एक साल से मणिपुर शांति की राह देख रहा है। उससे पहले 10 साल शांत रहा। ऐसा लगा कि पुराना ‘गन कल्चर’ समाप्त हो गया। परन्तु अचानक जो कलह वहां पर उपज गई या उपजाई गई, उसकी आग में वह अभी तक जल रहा है, त्राहि-त्राहि कर रहा है। कौन उस पर ध्यान देगा? प्राथमिकता देकर उसका विचार करना हमारा कर्तव्य है। इकोसिस्टम के लोग इस अंश को लेकर भी मोदी पर हमलावर होने का प्रयास करते नजर आ हैं। कुछ लोग तो यहां तक कह जा रहे हैं कि संघ प्रमुख ने पहली बार मणिपुर की स्थिति पर अपनी बात रखी है। दरअसल ऐसे लोगों को संघ की कार्य करने की पद्धति का अल्पज्ञान है। मोहन भागवत ने 2023 के विजयदशमी के अपने भाषण में भी मणिपुर के हालात पर चिंता प्रकट की थी। इसके बाद संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने मणिपुर पर बयान जारी किया था। संघ निरंतरता में मणिपुर की स्थिति को लेकर चिंता प्रकट कर रहा है। इसको मोदी की आलोचना करार देना इकोसिस्टम की राजनीतिक चाल है।

संघ प्रमुख के बयान को आंशिक रूप से उद्धृत कर संघ और भाजपा में काल्पनिक टकराव बतानेवाले विश्लेषक यह भूल जा रहे हैं कि मोहन भागवत ने अपने भाषण में मोदी सरकार की भूरि-भूरि प्रशंसा की है। वो कहते हैं कि पिछले दस वर्षों में बहुत कुछ अच्छा हुआ। आधुनिक दुनिया जिन मानकों को मानती है, जिनके आधार पर आर्थिक की स्थिति का मापन किया जाता है उनके अनुसार भी हमारी आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी हो रही है। हमारी सामरिक स्थिति निश्चित रूप से पहले से अधिक अच्छी है। दुनियाभर में हमारे देश की प्रतिष्ठा बढ़ी है। इतनी स्पष्टता के बावजूद अगर विपक्ष को उस बयान पर राजनीति ही करनी है तो उनको मोहन भागवत के भाषण का वो अंश देखना चाहिए जहां तकनीक के सहारे असत्य परोसने की बात उन्होंने कही और प्रश्न उठाया कि क्या शास्त्र का, विज्ञान का, विद्या का यह उपयोग है? इसके बाद अपना मत प्रकट किया कि सज्जन विद्या का ये उपयोग नहीं करते। दरअसल विपक्षी दल और उनका पूरा इकोसिस्टम चुनाव में अपनी हार की खीझ मिटाने के लिए वाराणसी, अमेठी और फैजाबाद लोकसभा सीट के चुनाव परिणामों पर केंद्रित हो गया है। अमेठी में भारतीय जनता पार्टी की हार के अनेक कारण हैं जबकि स्मृति इरानी के अहंकार को एकमात्र कारण बताया जा रहा है। लोगों के साथ खड़े होने और शक्तिशाली लोगों के सामने निर्बल को प्राथमिकता देने को अहंकार कहकर प्रचारित किया गया। वाऱाणसी में भाजपा की जीत का अंतर कम होने को मोदी के अहंकार से जोड़ दिया गया। फैजाबाद की हार को प्रभु श्रीराम से जोड़ दिया गया। गजब है राजनीति का खेल और गजब है (कु) तर्क गढ़ने का हुनर।    

Saturday, March 4, 2023

ज्ञान परंपरा का प्रचार आवश्यक


हाल ही में नागपुर में एस्ट्रोनामी पार्क के शुभारंभ के अवसर पर राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत के वक्तव्य के कुछ अंशों की चर्चा हो रही है। चर्चा इस बात की हो रही है कि मोहन भागवत ने कहा कि हमारे प्रचीन ग्रंथों की समीक्षा होनी चाहिए। इसको कुछ विद्वान इतिहास के पुनर्लेखन से जोड़कर देखने लगे हैं तो कुछ को पाठ्य पुस्तकों में बदलाव की आहट सुनाई दे रही है। कुछ तो प्रचीन श्रुतियों के आधार पर ग्रंथों के होने न होने पर टीका टिप्पणी कर रहे हैं। आवश्यकता इस बात की है कि मोहन भागवत के बयान को समग्रता में समझा जाए। अगर उनके चौंतीस-पैंतीस मिनट के वक्तव्य को ध्यान से सुना जाए तो उन्होंने कई महत्वपूर्ण बातें कही हैं। भारत के गौरवशाली इतिहास को रेखांकित किया गया है। एस्ट्रोनामी पार्क के उद्घाटन में जब वो बोल रहे थे तो उन्होंने काल-गणना की भारतीय ज्ञान पद्धति पर विस्तार से प्रकाश डाला था। उन्होंने इस संबंध में भारत के अलग अलग प्रांतों में प्रचलित सूर्य और चंद्र की गति पर आधारित काल गणना पद्धति के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने ग्रह नक्षत्रों की स्थिति और उसकी भारतीय पद्धति से पहचान की बात भी की। इसी क्रम में उन्होंने भारत के मौखिक इतिहास का उल्लेख करते हुए कहा कि हर अन्वेषण में हमारे पूर्वजों का किया कुछ न कुछ है। जो परंपरा से चला आ रहा है। पहले हमारे यहां ग्रंथ नहीं थे इसलिए ये बातें मौखिक परंपरा से चलीं। बाद में ग्रंथ हुए जो कुछ समय बाद इधर उधर हो गए। फिर इसमें कुछ स्वार्थी लोग घुस गए जिन्होंने उन ग्रंथों में कुछ कुछ घुसा दिया जो बिल्कुल गलत है। मोहन भागवत ने इसके अलावा यह भी कहा कि विदेशी आक्रमणों की वजह से हमारी ज्ञान परंपरा खंडित हो गई, जो व्यवस्थाएं थीं वो तहस नहस हो गईं। नियमित अंतराल पर हुए आक्रमणों की वजह से हमारी जो व्यवस्थाएं थीं वो तहस नहस हो गईं। इस पृष्ठभूमि में भागवत जी ने कहा कि उन ग्रंथों की पारंपरिक ज्ञान की एक बार समीक्षा की आवश्यकता है। 

मोहन भागवत के इस वक्तव्य में तीन महत्वपूर्ण बातें हैं जिनको रेखांकित किया जाना चाहिए और उसपर देशव्यापी विमर्श भी होना चाहिए। कुछ बातों पर तो विमर्श हो भी रहा है। मोहन भागवत ने जब भारतीय ज्ञान परंपरा की बात की तो उन्होंने यह भी कहा कि आज के विद्वानों का दायित्व है कि वो भारतीय ज्ञान परंपरा के बारे में समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में लेख लिखकर नई पीढ़ी को उनकी भाषा में अवगत करवाएं। किस प्रकार से ग्रह और नक्षत्र की स्थिति होती हैं और वो कैसे कृषि और किसानों के लाभ पर आधारित है। उन्होंने एक दो उदाहरण भी दिए। उन्होंने एक तरह से उन सेमिनारवीरों को नसीहत भी दे डाली जो भारतीय ज्ञान परंपरा आदि जैसे शब्दों का उपयोग तो बार बार करते हैं लेकिन उस बारे में विस्तार में नहीं जाते। जब वो ग्रंथों में स्वार्थी तत्वों की छेड़छाड़ की बात करते हैं तो वो इतिहास लेखन के बारे में संकेत करते हैं। इतिहास लिखना क्या होता है। वैसा लेखन जिसमें भूतकाल की गतिविधियों का लेखा जोखा होता है। इतिहास कभी बदलता नहीं है, उसको देखने की दृष्टि अलग अलग हो सकती है। इतिहास तो समय के पन्नों पर दर्ज होता चलता है। इतिहासकार जब वस्तुनिष्ठ नहीं होकर किसी विचारधारा विशेष के प्रभाव या दबाव में अपनी दृष्टि को संकुचित कर लेते हैं तो समय के पन्नों पर दर्ज घटनाएं विसंगतियों के साथ सामने आती हैं। इतिहास में कई बार पुरानी स्थापनाओं को खारिज करके नई स्थापनाएं दी जाती हैं। उदाहरण के लिए स्वाधीनता के अमृत महोत्सव के अवसर पर आदिवासी नायकों या गुमनाम नायकों के योगदान के बारे में देश की जनता को बताया गया वो इतिहास के एक नए आयाम को जनता के सामने रखने का उपक्रम था। किसी भी देश का इतिहास सिर्फ राजा रानियों या वीर सेनाननियों की गाथाओं का वर्णन नहीं होता है बल्कि उस समय की आम जनता के क्रियाकलापों का लेखा-जोखा ही उसको पूर्णता प्रदान करता है। मोहन भागवत अपने वक्तव्य में इसकी ही अपेक्षा करते नजर आ रहे हैं। 

अपनी उपरोक्त अपेक्षा को प्रकट करने के क्रम में मोहन भागवत ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति और उसके अंतर्गत बन रहे पाठ्यक्रम का उल्लेख भी किया। उन्होंने कहा कि नई शिक्षा नीति के अनुसार पाठ्यक्रम बन रहा है और कक्षा छह तक पाठ्यक्रम बन भी गया है। इस पाठ्यक्रम में कई नई बातों को भी समाहित किया गया है जो पहले के पाठ्यक्रमों में नहीं थीं। आगे भी जो पाठ्यक्रम तैयार होगा उसमें भी नई बातों को समाहित किए जाने के संकेत उन्होंने दिए। मोहन भागवत ने कहा कि एक बार पाठ्यक्रम सामने आ जाए तो उसकी समीक्षा की जाएगी, चर्चा की जाएगी और प्रयास यही रहेगा कि वो ज्ञान परंपरा के अनुसार ठीक है। इस तरह की चीजों के आने से ज्ञान भी बढ़ेगा और स्वाभिमान भी। यहां भी उन्होंने ये अपेक्षा जताई कि भारतीय ज्ञान परंपरा की कुछ प्राथमिक बातें हम अपने घर में भी बच्चों को बता सकते हैं। मोहन भागवत ने विस्तार से धर्म और विज्ञान के अंतर्संबंधों पर प्रकाश डाला। उन्होंने स्पष्ट किया कि धर्म और विज्ञान साथ चल सकते हैं। उनके अनुसार हमारे धर्म की परंपरा में फेथ और बिलीफ जैसे शब्द नहीं हैं हमारे यहां अनुभव और प्रतीति को प्रमुखता दी गई है। उन्होंने उदाहरणों के साथ बताया कि हमारा धर्म वैज्ञानिक है। विज्ञान का दायित्व है कि वो धर्म को साथ लेकर चले। मानव कल्याण उसका उद्देश्य हो।  

मोहन भागवत ने एक और महत्वपूर्ण बात कही कि जनता को सरकार पर निर्भरता कम करनी चाहिए। आजकल ये स्वाभाविक अपेक्षा रहती है कि हर काम सरकार ही करे। यह पद्धति भारत की नहीं रही है कि सरकार ही सबकुछ करे। नौकरी भी दे, खाने को भी दे, टीवी भी दे और उसके बदले राज्य पूरी संपत्ति अरापने हाथ में रख ले। भारत में स्वायत्तशासी व्यवस्था थी। राजा का कर्तव्य सीमा का संरक्षण, कानून व्यवस्था और अधर्म का निर्धारण करना था। बाकी सारी बातें प्रजा के हाथों में थीं। मोहन भागवत ने माना कि वो जमाना चला गया और अब नया जमाना है जिसमें अपेक्षा रहती है कि सरकार ही सबकुछ करे। उन्होंने कहा कि करे तो करे लेकिन मोहन भागवत ने एकबार फिर से उस प्रश्न को छेड़ दिया है कि सरकार का दायित्व क्या हो जनता का क्या? इस बारे में कई बार चर्चा होती है कि सरकर क्या क्या करे। हमारे देश में एक सरकारी उपक्रम अब भी सिर्फ यात्रा टिकट करवाने का काम करती है। क्या सरकार का ये दायित्व होना चाहिए कि एक पूरा महकमा सिर्फ रेल और जहाज के टिकटों की व्यवस्था करने में लगे। जिस तरह से जमाना बदला और सरकार पर निर्भरता बढ़ी उसी तरह से एक बार फिर समय बदल रहा है और सरकार पर निर्भरता कम से कम करने की आवश्यकता है। 

मोहन भागवत ने जिस तरह से अपनी ज्ञान परंपरा के प्राथमिक ज्ञान की बात को महत्ता दी, धर्म और विज्ञान को साथ चलने की सलाह दी, परोक्ष रूप से सरकार पर निर्भरता कम करने की बात की अगर हम इसको समग्रता में देखें तो ग्रंथों को ठीक करने की बात नेपथ्य में चली जाती है। महत्वपूर्ण है कि भारत की जो ज्ञान परंपरा है उसका परिचय भारत की नई पीढ़ी को मिले और इसके लिए शिक्षण संस्थान और उसके कर्ताधर्ता सिर्फ मौखिक बात नहीं करें बल्कि प्रमाणिक रूप से उस ज्ञान परंपरा को सरल भाषा में जनता के सामने रखें। मोहन भागवत के वक्तव्य के इस निहितार्थ को समझकर अनुशासनबद्ध तरीके से काम करने की आवश्यकता है। 


Saturday, June 11, 2022

सत्य को भी चाहिए शक्ति का आधार


शुक्रवार को जुमे की नमाज के बाद देश के कई राज्यों में जिस तरह से उपद्रव और बवाल हुआ उसके बाद हिंदुओं और मुसलमानों के रिश्तों को लेकर चर्चा आरंभ हो गई है। न्यूज चैनलों और इंटरनेट मीडिया पर पर कई स्वयंभू विचारक नए नए सिद्धांत पेश कर रहे हैं। कुछ लोग राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत के हाल में संघ शिक्षा वर्ग के तृतीय वर्ष के समापन समारोह में दिए उनके वक्तव्य को उद्धृत कर रहे हैं। कुछ उत्साही विश्लेषक मोहन भागवत के वक्तव्य के उस अंश को उद्धृत करते हुए उनकी आलोचना कर रहे हैं जहां उन्होंने ज्ञानवापी के संदर्भ में अपनी बात रखी। वो लगातार चीख रहे थे कि संघ ने मुसलमानों को लेकर अपना स्टैंड बदल लिया है और अब संघ अपनी मुस्लिम विरोध की छवि में सुधार करना चाहता है। इंटरनेट मीडिया पर हिंदुत्व की ध्वजा लेकर विचरण करनेवाले कई विद्वान तो मोहन भागवत के इस बयान की तुलना लालकृष्ण आडवाणी के जिन्ना के मजार पर लिखी टिप्पणी से कर बैठे। उनकी इन बचकानी टिप्पणियों पर बात करने से पहले जरा देख लेते हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा क्या था। 

सरसंघचालक ने कहा था कि ज्ञानवापी का अपना एक इतिहास है जिसको हम बदल नहीं सकते हैं। इसको न आज के हिंदू ने बनाया न आज के मुसलमानों ने बनाया। ये उस समय घटा। इस्लाम बाहर से आया, आक्रामकों के साथ आया। उस आक्रमण में भारत की स्वतंत्रता चाहनेवाले व्यक्तियों का मनोधैर्य खर्च करने के लिए देवस्थान तोड़े गए, जिनकी संख्या हजारों में है। उनमें से कइयों का हिंदुओं की आस्था में विशेष स्थान है। आगे उन्होंने कहा कि हिंदुओं को लगता है कि पुनर्उत्थान का कार्य करना चाहिए। राममंदिर का एक आंदोलन हुआ अब उस तरह का आंदोलन नहीं करना है। लेकिन इश्यू जो मन में हैं वो उठते तो हैं। वो किसी के विरुद्ध नहीं हैं। ...आपस में मिल बैठकर सहमति से रास्ता निकालना चाहिए। हर बार सहमति से रास्ता नहीं निकलता तो संविधान सम्मत न्याय व्यवस्था को मानना चाहिए और उसपर प्रश्न चिन्ह नहीं लगाना चाहिए। इसी क्रम में वो कहते हैं कि ज्ञानवापी में हिंदुओं की श्रद्धा है लेकिन हर मस्जिद में शिवलिंग क्यों देखना। उसके आगे भी उनका वक्तव्य चलता है जिसमें वो बाहर से आई पूजा पद्धति को अपनाने वालों को भी भारतीय बताते हैं। उनके और हिंदुओं के पूर्वजों के एक होने की बात करते हैं। लेकिन उनका पूरा जोर शक्ति पर होता है। 

अपने वक्तव्य के आरंभ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने बहुत स्पष्टता के साथ राष्ट्र और राष्ट्रीयता की बात रखी। विस्तार से धर्म और स्व को परिभाषित किया। समन्वय, संतुलन, सबको साथ लेकर चलने, सबकी उन्नति करना ही स्व है और उसके आधार पर ही देश के तंत्र को स्थापित करने की बात होती है। धर्म के संरक्षण के लिए मोहन भागवत जी ने स्पष्ट किया कि वो दो प्रकार से होता है। एक तो जब धर्म पर आक्रमण होता है तो उसको आक्रमण से बचाना होता है, बलिदान देना होता है। लड़ाई भी करनी पड़ती है। इसके अलावा धर्माचरण के माध्यम से धर्म की अभिवृद्धि की बात भी उन्होंने की। संघ प्रमुख ने जो बात रखी वो कोई नई बात नहीं कही है। नए विचारकों के लिए ये नई बात हो सकती है लेकिन मुसलमानों को लेकर संघ का ये विचार वर्षों से रहा है। हिंदुत्व और आक्रामक हिंदुत्व को परिभाषित करनेवाले राजनीतिक विश्लेषक गुरुजी गोलवलकर का नाम लेना नहीं भूलते हैं और ना ही भूलते हैं उनकी पुस्तक ‘वी आर आवर नेशनहुड डिफाइंड’ को। इस पुस्तक के आधार पर वो मुसलमानों के प्रति संघ की सोच को व्याख्यायित करते हैं। लेकिन हिंदुत्व को या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सोच को विश्लेषित करनेवाले नए विचारक इस तथ्य से या तो अनभिज्ञ हैं या फिर उसको जानबूझकर उजागर नहीं करते कि जिस वक्त गुरु गोलवलकर ने ये पुस्तक लिखी थी वो न तो संघ के पदाधिकारी थे और न ही सरसंघचालक। मुसलमानों को लेकर संघ का क्या सोच रहा है इसको जानने के लिए गुरू गोलवलकर और पत्रकार सैफुद्दीन जिलानी की 30 जनवरी 1970 की बातचीत देखनी चाहिए। ये बातचीत नरेन्द्र ठाकुर के संपादन में प्रकाशित पुस्तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का दृष्टिकोण में संकलित है। इसमें जब सैफउद्दीन साहब ने मुसलमानों को लेकर उनके दृष्टिकोण के बारे में पूछा तो गुरुजी का कहना था कि हमें ये बात हमेशा ध्यान में रखनी होगी कि हम सबके पूर्वज एक ही हैं। हम सब उनके वंशज हैं। आप अपने-अपने धर्मों का प्रामाणिकता से पालन करें परंतु राष्ट्र के मामले में हम सबको एक रहना चाहिए। राष्ट्रहित के लिए बाधक सिद्ध होनेवाले अधिकारों और सहूलियतों की मांग बंद होनी चाहिए। हम हिंदू हैं, इसलिए हम विशेष सहूलियतों या अधिकारों की कभी बात नहीं करते। इसी बातचीत में गुरूजी एक जगह कहते हैं कि भारतीयकरण का अर्थ सबको हिंदू बनाना तो नहीं है। तो अगर गुरू गोलवलकर की बातों को ध्यान से देखें तो यही लगेगा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वर्तमान सरसंघचालक मोहन भागवत उन्हीं बातों को समकालीन परिप्रेक्ष्य में आगे बढ़ा रहे हैं। संघ अपनी नीति पर कायम है, न तो कोई स्टैंड बदला है और न ही राष्ट्रविरोधियों को लेकर साफ्ट हुआ है। 

हिंदू धर्म और संघ की नीतियों के नए विश्लेषकों को मोहन भागवत जी के हाल के भाषण को फिर से सुनना समझना चाहिए। इस भाषण में मोहन भागवत ने एकाधिक स्थान पर शक्ति की महत्ता को रेखांकित किया है। वो तो यहां तक कहते हैं कि सत्य को भी शक्ति का आधार चाहिए होता है। बिना शक्ति के दुनिया नहीं मानती। उनके वक्तव्य की बारीकियों को समझे बिना किसी तरह का विश्लेषण अधूरा लगता है। वो हिंदू समाज को शक्ति देने की बात कर रहे हैं। बार बार कर रहे हैं, क्योंकि उनका मानना है कि बगैर शक्ति के दुनिया आपकी बात मानना तो दूर सुनेगी भी नहीं। आज अगर भारत में हिंदुओं की बात सुनी जा रही है तो उसके पीछे समाज की शक्ति है। वो स्पष्ट तौर पर कहते हैं कि दुनिया में दुष्ट लोग हैं जो हमको जीतना चाहेंगे इसलिए शक्ति की आराधना करनी चाहिए। उनके लगभग इकतीस मिनट के भाषण में हिंदू समाज को शक्ति देने की बात प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से कई बार आती है। मोहन भागवत की आलोचना करनेवाले व्याख्याकारों और टीकाकारों को उनके वक्तव्य को समग्रता में देखना चाहिए। संघ प्रमुख ने न तो संघ का कोई स्टैंड बदला है न ही वो मुसलमानों को खुश करने के लिए ऐसी बात कर रहे हैं। संघ हमेशा से भारतीय मुलमानों को यहां का मानता है। उनको आक्रमणकारियों के साथ जोड़कर नहीं देखता है और यही अपेक्षा करता है कि इतिहासकार और भारतीय मुसलमान भी अपने को भारतीय मानें और आक्रांताओं के साथ खुद को जोड़कर नहीं देखें। नए नए संघ विचारक बने टीवी चैनलों की खिड़कियों पर रात दिन टंगे रहनेवाले स्वयंभू विद्वान किसी भी चीज को समग्रता में नहीं देख पाते हैं। नतीजा यह होता है कि किसी वक्तव्य के एक छोटे हिस्से के आधार पर उसका मूल्यांकन करके निर्णय देने लग जाते हैं और दोष के शिकार हो जाते हैं। हर मस्जिद में शिवलिंग खोजने का जो बयान है उसके पहले भी काफी देर तक हिंदू समाज को शक्ति देने की, धर्म की, स्व की, धर्माचरण के बारे में कहा गया लेकिन न तो उसको सुनने की किसी को फुर्सत है और न ही उसकी बारीकियों को विश्लेषित करने की कला। इसका नुकसान ये होता है कि समाज में गलत संदेश जाता है और भ्रम की स्थिति बनती है। इससे बचा जाना चाहिए।  


Saturday, March 5, 2022

प्रामाणिक लेखन से छंटेगा कोहरा


सरस्वती नदी को केंद्र में रखकर संपादित पुस्तक ‘द्विरूपा सरस्वती’ के लोकार्पण समारोह में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने अपने वक्तव्य में भारतीय इतिहास और उसकी सत्यता पर पूर्व में उठाए गए सवालों पर कटाक्ष किया। उन्होंने अंग्रेजों की मंशा को रेखांकित करते हुए बताया ‘अंग्रेजों ने बताया कि भारत का न तो कोई रणगौरव है और न ही धनगौरव । वेद पुराण सब भांग के नशे में गाए गए गीत हैं। भारतीय इतिहास कपोल कल्पित है।‘ ये बताते हुए मोहन भागवत ने इस बात पर बल दिया कि भारतवर्ष की प्राचीनता और सनातनता के सातत्य को स्थापित करना होगा। इसके लिए विद्वानों और नई पीढ़ी को प्रमाण देना होगा क्योंकि इतिहास के प्रमाण बदल दिए गए, भाषा बदल दी गई और गुलामी के कालखंड में बदले हुए प्रमाण और भाषा को ही प्राथमिकता दी गई। सरसंघचालक ने अपने संक्षिप्त वक्तव्य में कई सूत्र दिए। नई पीढ़ी को प्रमाण देने की बात बेहद अहम है। इसके लिए आवश्यक है कि शिक्षा की हमारी वर्तमान प्रणाली में प्राथमिक स्तर से सुधार हो। प्राचीनता और सनातनता के सातत्य को स्थापित करने के लिए आवश्यक है कि ऐसी पुस्तकें तैयार की जाएं जो प्रमाणिक तरीके से विदेशी इतिहासकारों के मतों का निषेध करे और भारतीय मत और सिद्धांत को स्थापित करे। यह रास्ता बहुत कठिन है लेकिन भारत और भारतीयता से प्रेम करनेवाले और उसके गौरव को स्थापित करने के उद्देश्य से लेखन करनेवालों को इस कठिन राह पर आगे बढना ही होगा।

इतिहास लेखन बेहद श्रमसाध्य कार्य है। इसमें तथ्यों की प्रधानता होनी चाहिए। उसके बाद व्याख्या को महत्व देना चाहिए। तथ्यों की अनदेखी करने से इतिहास का स्वरूप बदलता है। व्याख्या में भाषा का स्थान बेहद महत्वपूर्ण होता है । इतिहासकार जब शब्दों का चयन करता है तो उसी मंशा स्पष्ट हो जाती है। अगर हम प्राचीन भारतीय इतिहास को लिख रहे होते हैं और वर्ण के स्थान पर अगर जाति का प्रयोग कर देते हैं तो अर्थ ही बदल जाता है। प्राचीन भारतीय इतिहास लेखन में जब सबाल्टर्न को केंद्र में रखकर लेखन किया गया तो इस तरह के शब्दों के प्रयोग ने पूरा परिदृश्य ही बदल दिया। यही गलती सामंती व्यवस्था को व्याख्यायित करते समय भी हुई। विदेशी इतिहासकार ने यूरोपीय सिद्धांतों के आधार पर भारत के समाज को समझने की कोशिश की। डेमोक्रेसी या लोकतंत्र को विदेशी अवधारणा मानने और प्रचारित करने के चक्कर में इतिहासकारों ने भारत की जनपद व्यवस्था या वैशाली में प्रचलित गणतंत्रीय व्यवस्था को जानबूझकर ओझल कर दिया । मध्यकाल में जब धर्म की व्याख्या की गई तो वहां भी इतिहासकारों ने यूरोपीय अर्थ के आधार पर इस शब्द की व्याख्या की और अर्थ का अनर्थ कर दिया। ऐसे कई उदाहरण दिए जा सकते हैं। आधुनिक भारत का इतिहास लिखने के क्रम में भी तथ्यों को ओझल कर दिया गया। छवि निर्माण के लिए गलत  व्याख्या की गई। स्वाधीनता आंदोलन और उसके बाद के भारत के इतिहास में भी इस तरह की कई गड़बड़ियां दिखाई देती हैं। ऊपरी तौर पर इस कालखंड का विवेचन वैज्ञानिक तरीके किया प्रतीत होता है लेकिन अगर हम उसकी तह में जाते हैं और घटनाओं और व्यक्तियों का सूक्ष्मता से आकलन करते हैं तो समग्र तस्वीर नहीं दिखती। 

अगर स्वाधीनता के ठीक पहले और उसके बाद की घटनाओं पर नजर डालें तो इतिहास लेखकों ने भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के प्रसंग में बहुधा उन तथ्यों की अनदेखी कि जिससे नेहरू की प्रचलित छवि खंडित होती है। इसको कई उदाहरणों से समझा जा सकता है। 3 जून 1947 की माउंटबेटन योजना में भारत विभाजन को सैद्धांतिक स्वीकृति दी गई थी। भारत और पाकिस्तान के बीच बंटवारे और सीमा निर्धारण के लिए सर सिरिल रेडक्लिफ को चुना गया था। वो कभी भारत नहीं आए थे और इसको ही आधार बनाकर उनकी निष्पक्षता को प्रचारित किया गया। रेडक्लिफ को अंतराष्ट्रीय सीमा निर्धारण का कोई अनुभव नहीं था। वो कानूनी विशेषज्ञ थे। रेडक्लिफ 8 जुलाई 1947 को भारत पहुंचे तब उनको पता चला कि उनको पांच सप्ताह में सीमा निर्धारण का काम पूरा करना है। यहां तक तो ठीक था।  लेकिन उसके बाद इस बात की चर्चा कम ही मिलती है कि नेहरू बंटवारे को लेकर जल्दबाजी में थे।  वो चाहते थे कि बंटवारे और सीमा निर्धारण का काम जल्द से जल्द हो जाए। वो तो इसके लिए भी तैयार थे कि अस्थायी सीमा निर्धारण करके बंटवारे के काम को अंजाम दे दिया जाए। नेहरू का मत था कि नये देश बाद में आपसी सहमति के आधार पर सीमाओं को ठीक कर लेंगे। इन तथ्यों का उल्लेख पत्रकार और इतिहासकार लेनार्ड मोस्ले की 1961 में प्रकाशित पुस्तक द लास्ट डेज आफ ब्रिटिश राज में मिलता है। ये पुस्तक जवाहरलाल नेहरू के जीवन काल में ही प्रकाशित हो गई थी। इसमें उल्लिखित तथ्यों का कोई खंडन हुआ हो, ऐसा ज्ञात नहीं है। नेहरू की इस जल्दबाजी को इतिहासकारों ने ओझल कर दिया और उनकी एक दूसरी तरह की छवि निर्मित की गई। 

सोमनाथ मंदिर के पुनर्निमाण के समय नेहरू और राजेन्द्र प्रसाद के बीच मतभेद हुआ। नेहरू के बारे में इस तरह की बातें लिखी गईं कि वो धर्म को शासन से अलग रखना चाहते थे आदि आदि। उनके पत्रों को इसका आधार बनाया गया लेकिन नेहरू की मानसिकता को समझने के लिए इतिहासकारों ने पर्याप्त शोध नहीं किया। जो पत्र सामने आए उसके आधार पर नेहरू की छवि बना दी गई। नेहरू का सोमनाथ मंदिर को लेकर जो स्टैंड था उसके पीछे मंशा कुछ और थी। इसको समझने के लिए 14 अगस्त 1947 की एक घटना का विवरण देखना होगा। शाम को संविधान सभा के अध्यक्ष डा राजेन्द्र प्रसाद के घर एक समारोह का आयोजन किया गया था। तंजावुर के हिंदू पुरोहितों ने पूजा पाठ और हवन का जिम्मा संभाला था। वो पवित्र जल लेकर भी आए थे। राजेन्द्र प्रसाद और नेहरू हवन कुंड के सामने बैठे और महिलाओं ने उनके माथे पर तिलक लगाया। नेहरू ने भी तिलक लगाया और हवन भी किया क्योंकि उनके मित्रों ने उनको समझाया था कि सत्ता प्राप्त करने का हिंदू तरीका यही है। इसका उल्लेख ‘आफ्टरमाथ आफ पार्टिशन इन साउथ एशिया’ नाम की पुस्तक में मिलता है। 

ऐसी ही एक घटना 1952 के लोकसभा चुनाव के समय की है। फूलपुर में नेहरू की सभा थी। सभास्थल के रास्ते एक स्थानीय राजा अपने हाथी से निकलना चाहता था। अफसर उनको निकलने नहीं दे रहे थे। हो हल्ला होने लगा। नेहरू को जब पता चला तो वो राजा के पास पहुंचे और ‘महाराज की जय हो’ के नारे लगाए। राजा खुश हो गए और जनता से नेहरू को वोट देने की अपील कर डाली। बाद में नेहरू ने युवा अफसर को समझाया कि ‘राजा को जय-जयकार की जरूरत थी और मुझे वोट की। मैंने राजा को उनका चाहा दिया और उन्होंने मुझे।‘  ऐसी कई अन्य घटनाएँ हैं जिससे नेहरू की छवि सत्ता के लिए हड़बड़ी में रहे एक नेता की बनती है। लेकिन आधुनिक भारत के इतिहास की पुस्तकों में ये छवि नदारद है। उदाहरण के लिए नेहरू से जुड़े प्रसंगों को गिनाया लेकिन अगर इसी तरह से वामपंथियों की स्वाधीनता आंदोलन में भूमिका पर समग्रता में विचार हो तो प्रचलित मान्यताओं से अलग ही तस्वीर निकलकर आएगी। मोहन भागवत जब प्रमाण के साथ इतिहास लेखन की बात करते हैं तो वो तथ्यों के साथ समग्रता की अपेक्षा करते हैं। इस कार्य में देश के केंद्रीय विश्वविद्यालयों को नेतृत्व करना होगा। देश में 50 से अधिक केंद्रीय विश्वविद्यालय हैं। सालभर में एक विश्वविद्यालय से एक भी प्रमाणिक पुस्तक का प्रकाशन इतिहास लेखन की कमियों को दूर कर सकता है।  

Saturday, April 10, 2021

परंपरा के पुनर्स्थापन का हो प्रयास


देशभर में कला, संस्कृति और भाषा से जुड़ी कई इमारतें हैं जिनका अपना एक इतिहास है। चाहे वो दिल्ली का त्रिवेणी कला संगम हो, श्रीराम सेंटर हो, रवीन्द्र भवन हो या भोपाल का भारत भवन हो, मुंबई की जहांगीर आर्ट गैलरी या पृथ्वी थिएटर हो। ये सूची बहुत लंबी हो सकती है। इस तरह की इमारतों से या इनमें होनेवाली गतिविधियों से उस शहर की कला और संस्कृति प्रेम का एक लैंडस्केप बनता है। एक ऐसा लैंडस्केप जिससे वहां के लोगों की रुचियों का आभास भी मिलता है। दिल्ली में अभी हाल ही में एक कला संकुल का लोकार्पण हुआ, नाम है संस्कार भारती कला संकुल। इसमें कला दीर्घा से लेकर कई हॉल हैं जहां बैठकर कला संस्कृति के विभिन्न विषयों पर चर्चा आदि हो सकती है। ये उम्मीद की जानी चाहिए कि इस कला संकुल से देश की राजधानी का सांस्कृतिक लैंडस्केप और बेहतर होगा। भविष्य में जो होगा उसके बारे में तो उम्मीद ही जताई जा सकती है लेकिन जो सामने घटता है उसपर चर्चा की जा सकती है। संस्कार भारती कला संकुल के लोकार्पण समारोह के दौरान जो बातें कही गईं उस पर ध्यान गया ।संस्कार भारती कला संकुल का लोकार्पण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने किया था। कोरोना की वजह से कला संकुल के परिसर में ही समारोह हुआ था। इसके लोकार्पण समारोह में मोहन भागवत ने भारतीय कला और कला परंपरा को लेकर कई महत्वपूर्ण बातें कहीं। मोहन भागवत ने कहा कि भारत की कला रंजन मात्र नहीं है। वो इसके उद्गम को ओमकार के उच्चरण से जोड़कर देखते हैं। उन्होंने कला को परिभाषित करते हुए न केवल इसको एक दार्शनिक रूप दिया बल्कि उसको समकालीन समस्याओं से जोड़ने का प्रयास भी किया। कला को परिभाषित करने के क्रम में मोहन भागवत ने इतिहास में भी आवाजाही की और उसको सत्य और शिवत्व की अभिव्यक्ति और अनुभूति से जोड़ा। उन्होंने स्पष्ट किया कि पश्चिम के देशों में मनोरंजन को सुख से जोड़ा गया जबकि हमारे यहां इसको आंतरिक अनुभूति से जोड़कर एक पूर्णता का दर्शन प्रतिपादित किया गया। पश्चिम में कला से जो रंजन होता है उससे भौतिक सुख की प्राप्ति होती है लेकिन उस भौतिक सुख में एक अधूरापन भी महसूस होता है। जबकि भारतीय कला में जो शक्ति है वो मनुष्य को उसके मूल तक ले जाती है और वहां जो सुख की भावना पैदा होती है वो मानव मन में उपजनेवाले अधूरेपन को दूर करने का रास्ता दिखाती है। यह उल्लास से शांति की ओर ले जाती है। मोहन भागवत ने विस्तार से कला के संस्कारों और समाज पर उसके प्रभाव पर भी प्रकाश डाला। 

कला संकुल के शुभारंभ के अवसर पर कला को लेकर कही गई बातों पर अगर हम विचार करें तो इसके सूत्र हमको काफी पीछे लेकर जाते हैं। वासुदेव शरण अग्रवाल ने भी भारतीय कला पर विचार करते हुए लिखा है, ‘वैदिक काल से धर्म और कला का घनिष्ठ संबंध बना रहा है। धर्म और दर्शन के उदार क्षेत्र में संयम और तप के जिन आदर्शों की कल्पना समय-समय पर प्रकट होती रही, उसी को मूर्तिमान रूप में जनता के समक्ष प्रस्तुत करने के लिए कलाकारों ने प्रयत्न किया। एक प्रकार से भारतीय धर्म, जीवन की पूर्णता को लिए हुए, नृत्य, गीत, अभिनय और कला की प्रवृत्तियों में फला-फूला। इसका प्रभाव धर्म और जीवन दोनों पर अच्छा हुआ। धर्म के प्रांगण में वसंत लक्ष्मी की शोभा का अवतार कला से हुआ। दूसरी ओर धर्म के निर्मल आदर्शों को प्राप्त करके कला का स्वरूप निखर गया।‘ वासुदेव शरण अग्रवाल भी ये मानते हैं कि ‘शिव की सत्ता मणि-दीप की तरह कला के प्रासाद को आलोकित करती है।‘ वासुदेव शरण अग्रवाल ने भारत की कला और संस्कृति को लेकर विपुल लेखन किया है और स्थापना दी है कि कला, वैदिक काल से लेकर आधुनिक काल तक समाज को उस दिशा में ले जाने का काम करती है जहां पूर्णता की अनुभूति हो। 

कला का यह स्वरूप हमारे समाज में बहुत लंबे समय तक चला। जब हमारा देश स्वतंत्र हुआ तो अंग्रेज भारत छोड़कर चले गए लेकिन हम उनकी जीवन शैली की बहुत सारी बातों को आधुनिकता मानकर या समझकर अपनाने लगे थे। बाद के वर्षों में ये और भी ज्यादा बढ़ा। हमने पश्चिम के देशों का अंधानुकरण करना आरंभ किया। ये अंधानुकरण इस वजह से भी होने लगा कि हमारा समाज नए के प्रति आस्थावान होने लगा था। नए के प्रति आसक्ति गलत नहीं है लेकिन नए और पुराने में एक संतुलन होना चाहिए था। नए को अपनाने और पुरान को छोड़कर आगे बढ़ने की बढ़ती प्रवृत्ति की वजह से हमसे हमारी परंपरा का सिरा छूटने लगा था। हम आधुनिकता के नाम पर और बाद के दिनों में उत्तर आधुनिकता के नाम पर अपनी कला को भी उधर मोड़ने लगे थे। जब देश में मार्क्सवाद का जोर बढ़ा तो इस दर्शन से प्रभावित लोगों ने उसकी मान्यताओं को, सिद्धातों को साहित्य और कला में भी लागू करना शुरू कर दिया। परिणाम यह हुआ कि हमारी कला की जो आधारभूत मान्यताएं थीं वो नेपथ्य में चली गईं। इसको कई उदाहरणों से समझा जा सकता है। हमारे देश में चित्रकला या मूर्तिकला की जो परंपरा रही है उसमें सौंदर्य और प्रेम का स्पष्ट चित्रण दिखाई देता है, इसको हिमाचल की चित्र शैली से लेकर राजस्थानी चित्र शैली में देखा जा सकता है। मंदिरों के प्रांगण में बनी मूर्तियों में लक्षित किया जा सकता है। राजस्थानी शैली के कई चित्रों में स्त्री मन के प्रेम का एक अटूट प्रवाह दिखाई देता है। कालांतर में इसकी जगह ऐसी चित्रकलाओं ने ले लिया जिनको समझने के लिए जतन करना पड़ता था। उसी दौर में कुछ ऐसे चित्रकार भी हुए जो मार्क्सवाद के दर्शऩ से प्रभानित थे, उन्होंने देश की आस्था को अपमानित करनावाले चित्र भी बनाए। उन चित्रों पर विवाद तो हुआ, चित्रकार ने सुर्खियां भी बटोरीं लेकिन कला समृद्ध न हो पाई। कुछ इसी तरह की बात साहित्य में भी रेखांकित की जा सकती है। हमारे यहां जिस तरह की कविताएं लिखी जाती थीं जिसमें एक गेयता होती थी बाद में आधुनिकता के नाम पर या नए के नाम पर ऐसी कविताएं लिखी जाने लगीं जो गद्य जैसी होती थीं। कविता से लय गायब कर दिया गया। एक दौर में तो भूखी पीढ़ी के नाम से ऐसे लेखक आए जिन्होंने कविता के नाम पर स्तरहीन लेखन किया। आधुनिकता के नाम पर इस तरह के लेखन के बाद साहित्य और कला में उत्तर आधुनिकता का दौर भी आया। ये तो और भी समझ से परे था। आधुनिकता की इस प्रवृत्ति ने कला को अनुभूति से दूर कर दिया। 

संस्कार भारती कला संकुल के शुभारंभ के अवसर पर जिस भारतीय कला और संस्कृति की बात हुई है उसपर कलाप्रेमियों को, कलारसिकों को गंभीरता से विचार करना होगा। भारतीय कला के उस गौरवशाली परंपरा को बढ़ाने के लिए जतन करने होंगे। नए और पुराने के बीच समन्वय और संतुलन बनाकर कला को समृद्ध करना होगा। इस तरह का एक इकोसिस्टम बनाना होगा जिसमें नवोदित कलाकारों का अपनी कला परंपरा से परिचय हो सके। उन बाधाओं को या तत्वों को चिन्हित करना होगा जो आधुनिकता के नाम पर हमारी कला परंपरा को नेपथ्य में धकेलने का काम अब भी कर रहे हैं। संस्कार भारती कला संकुल अगर इस उपक्रम का केंद्र बन पाती है तो ये इमारत न सिर्फ दिल्ली के कला जगत के लैंडस्केप को खूबसूरत बना पाएगी बल्कि पूरे देश के कला जगत को भी एक राह दिखा पाएगी। अन्यथा हमारे महानगरों में उगनेवाले कंक्रीट के जंगलों में तो कई इमारतें बगैर किसी पहचान के निर्जीव खड़ी ही हैं। 

Saturday, October 17, 2020

अपनी जड़ों की ओर लौटता भारत


एक कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने अपने भाषण में कहा कि ‘किसान क्षेत्र के हित के लिए करनेवाला हमारा संगठन सर्वमान्य संगठन बन गया है, और ऐसे हमारे संगठन को अनुकूलता भी प्राप्त हो गई है। क्योंकि जो हमारा विचार है, विज्ञान ने ही ऐसी करवट ले ली है कि हमने जिन तत्वों का उद्घोष अपनी स्थापना के समय से हम करते आए, विरोधों के बावजूद, उनको मान्यता देने के बजाए दूसरा कोई पर्याय रहा नहीं अब दुनिया के पास। कृषि के क्षेत्र में और जो कॉलेज में से पढ़ा है ऐसा कोई व्यक्ति आपकी सराहना करे ऐसे दिन नहीं थे। आज हमारे महापात्र साहब भी आपके कार्यक्रम में आकर जैविक खेती का गुणगान करते हैं। जैविक खाद के बारे में पचास साल पहले विदर्भ के नैड़प काका बड़ी अच्छी स्कीम लेकर केंद्र सरकार के पास गए थे। ये स्कीम अपने भारत की है, भारत के दिमाग से उपजी है, केवल मात्र इसके लिए उसको कचड़े में डाला गया। आज ऐसा नहीं है। पिछले छह महीने से जो मार पड़ रही है कोरोना की, उसके कारण भी सारी दुनिया विचार करने लगी है और पर्यावरण का मित्र बनकर मनुष्य और सृष्टि का एक साथ विकास साधनेवाले भारतीय विचार के मूल तत्वों की ओर लौट रही है, आशा से देख रही है।‘ मोहन भागवत के भाषण के इस छोटे से अंश में कई महत्वपूर्ण बातें हैं जिनकी ओर उन्होंने संकेत  किया है। पहली बात तो ये कि आज भारत और भारतीयता को प्राथमिकता मिल रही है। भारतीय पद्धति से की गई खोज या नवोन्मेष को या भारतीय पद्धतियों को मान्यता मिलने लगी है। मोहन भागवत ने ठीक ही इस बात को रेखांकित किया कि पूरी दुनिया भारत की ओर आशा से देख रही है।

मोहन भागवत के इस वक्तव्य के उस अंश पर विचार करने की जरूरत है जिसमें वो कह रहे हैं कि पूरी दुनिया पर्यावरण का मित्र बनकर मनुष्य और सृष्टि का एक साथ विकास साधने वाले भारतीय विचार के मूल तत्वों की ओर लौट रही है। दरअसल हमारे देश में हुआ ये कि मार्कसवाद के रोमांटिसिज्म में पर्यावरण की लंबे समय तक अनदेखी की गई। आजादी के बाद जब नेहरू से मोहभंग शुरू हुआ या यों भी कह सकते हैं कि नेहरू युग के दौरान ही मार्क्सवाद औद्योगीकरण की अंधी दौड़ में शामिल होने के लिए उकसाने वाला विचार लेकर आया। औद्योगिकीकरण में तो विकास पर ही जोर दिया जाता है और कहा भी जाता है कि किसी भी कीमत पर विकास चाहिए। अगर विकास नहीं होगा तो औद्योगिकीकण संभव नहीं हो पाएगा।लेकिन किसी भी कीमत पर विकास की चाहत ने प्रकृति को पूरी तरह से खतरे में डाल दिया। औद्योगिकीकरण का समर्थन करनेवाली विचारधारा में प्रकृति का आदर करने की जगह उसकी उपेक्षा का भाव है। ये उपेक्षा इस हद तक है कि मार्क्स ने ‘मास्टरी ओवर नेचर’ की बात की है यानि प्रकृत्ति पर प्रभुत्व। सृष्टि के इस महत्वपूर्ण अंग, प्रकृति पर प्रभुत्व की कल्पना मात्र से ही इस बात का सहज अंदाज लगाया जा सकता है कि मार्क्सवाद के सिद्धांत में बुनियादी दोष है। क्या ये मनुष्य के लिए संभव है कि वो प्रकृत्ति पर प्रभुत्व कायम कर सके। लेकिन मार्क्स ऐसा चाहते थे। उनके प्रकृत्ति को लेकर इस प्रभुत्ववादी नजरिए को उनके अनुयायियों ने जमकर बढ़ाया। इस बात का उल्लेख यहां आवश्यक है कि स्टालिन ने सोवियत रूस की सत्ता संभालने के बाद संरक्षित वन क्षेत्र को नष्ट किया। औद्योगिक विकास के नाम पर पर्यावरण पर प्रभुत्व स्थापित करने की कोशिश की। नतीजा क्या हुआ ये सबके सामने है। बाद में इस गलती को सुधारने की कोशिश हुई लेकिन तबतक बहुत नुकसान हो चुका था। खैर ये अवांतर प्रसंग है इस पर फिर कभी विस्तार से चर्चा होगी। अभी तो इसके उल्लेख सिर्फ ये बताने के लिए किया गया कि साम्यवादी और समाजवादी विचारधारा की बुनियाद प्रकृति को लेकर बेहद उदासीन और प्रभुत्ववादी रही है। इसके विपरीत अगर हम विचार करें तो भारतीय विचार परंपरा में प्रकृत्ति को भगवान का दर्जा दिया गया है। हम तो ‘क्षिति जल पावक गगन समीरा’ को मानने वाले लोग हैं। इस पंचतत्व का निषेध या उससे आगे जाकर कुछ और नया खोज वैज्ञानिक अभी तक कर नहीं पाए हैं सिवा इसके कि वो इन पंच तत्वों के अंदर के अवयवों को ढूंढ निकालने का दावा कर रहे हैं। हमारी परंपरा में तो नदी पर्वत और जल को पूजे जाने की परंपरा रही है। कभी भी आप देख लें किसी भी शुभ अवसर पर प्रकृत्ति को भी याद किया जाता है। 

मोहन भागवत ने इस ओर भी इशारा किया है कि कोरोना के बाद स्थितियां बहुत बदल गई हैं। सचमुच बहुत बदली हैं और भारतीय ज्ञान परंपरा में जिन औषधियों की चर्चा मिलती हैं आज वो अचानक बेहद महत्वपूर्ण हो गई हैं। हमारे जो वामपंथी प्रगतिशील मित्र आयुर्वेद का मजाक उड़ाया करते थे उनको सुबह शाम काढ़ा पीते या फिर गिलोई चबाते देखा जा सकता है। आज पूरी दुनिया में भारतीय खान-पान की आदतों को लेकर विमर्श हो रहा है। हमारे यहां तो हर मौसम के हिसाब से भोजन तय है। मौसम तो छोड़िए सूर्यास्त और और सूर्योदय के बाद या पहले क्या खाना और क्या नहीं खाना ये भी बताया गया है। आज पश्चिमी जीवन शैली के भोजन या भोजन पद्धति से इम्यूनिटी बढ़ने की बात समझ में नहीं आ रही है। आज भारतीय पद्धति से भोजन यानि ताजा खाने की वकालत की जा रही है, फ्रिज में रखे तीन दिन पुराने खाने को हानिकारक बताया जा रहा है। कोरोना काल में पूरी दुनिया भारतीय योग विद्या को आशा भरी नजरों से देख रही है। आज जब कोरोना का कोई ज्ञात ट्रीटमेंट नहीं है तो ऐसे में श्वसन प्रणाली को ठीक रखने, जीवन शैली को संतुलित रखने की बात हो रही है। भारत में तो इन चीजों की एक सुदीर्घ परंपरा रही है। स परंपरा को अंग्रेजी के आभिजात्य मानसिकता और वामपंथ के विदेशी ज्ञान ने पिछले कई दशकों से नेपथ्य में धकेलने की कोशिश की। सफल भी हुए। मोहन भागवत जी ने विदर्भ के एक किसान का जो उदाहरण दिया वो बेहद सटीक है। किसी भी प्रस्ताव को इस वजह से रद्दी की टोकरी में फेंका जाता रहा कि वो भारतीय परंपरा और प्राचीन ग्रंथों पर आधारित होती थी। अब देश एक बार फिर से अपनी जड़ों और अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरास की ओर लौटता नजर आ रहा है। 

अगर इस बात पर गंभीरता से विचार किया जाए तो हम ह पाते हैं कि हमारे देश में कथित तौर पर प्रगतिशील विचारों के शक्तिशाली होने की वजह से आधुनिकता के नाम पर पश्चिमी विचारों का अंधानुकरण शुरू हो गया। भारतीय विचारों को, भारतीय चिकिस्ता पद्धति को, भारतीय दर्शन को, भारतीय पौराणिक लेखन को सायास पीछे किया गया। उसको दकियानूसी, पुरानतनपंथी या परंपरावादी आदि कहकर उपहास किया गया। पश्चिमी आधुनिकता के आख्यान का गुणगान या उसके बढ़ते प्रभाव ने भारतीय जीवन शैली और भारतीय पद्धति को प्रभावित करना शुरू कर दिया। नतीजा यह हुआ कि हमारे देश में एक ऐसा समाज बनने लगा था जो पूरी तरह से न तो भारतीयता में यकीन करता था और न ही पूरी तरह से पश्चिमी रीति-रिवाज को आत्मसात कर पा रहा था। पश्चिमी आधुनिकता और भारतीयता के इस द्वंद ने लंबे समय तक भारतीय ज्ञान पद्धति को प्रभावित किया। कोरोना की वजह से और देश में बदले राजनीति हालात ने एक अवसर प्रदान किया है जिसकी वजह से एक बार फिर से देश अपनी जड़ों की ओर लौटता दिख रहा है।   


Sunday, November 8, 2015

बिहार में फिर नीतीशे कुमार

बिहार की राजनीति में महागठबंधन की ऐतिहासिक जीत ने एक बार फिर से साबित कर दिया कि देश में लोकतंत्र की जड़ें गहरी हो चुकी हैं । बीजेपी की तमाम चुनावी रणनीति को महागठबंधन ने मात दी । एक बार फिर से बिहार की राजनीति में लालू यादव को पुनर्जीवन मिला है और नीतीश कुमार ने अपनी धमक साबित की है । दरअसल अगर हम महागठबंधन की इस जीत के पीछे की वजहों पर गौर करें तो मोटे तौर पर तीन चार वजहें नजर आ रही है । बिहार चुनाव की बिसात अभी बिछी थी और दोनों तरफ से चालें चली जारही थीं । उसी वक्त पहले चरण के पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सुप्रीमो मोहन भागवत का आरक्षण को लेकर एक बयान आया । इस बयान में आरक्षण पर फिर से विचार करने की बात कही गई थी लेकिन मोहन भागवत के बयान को लेकर लालू यादव ने ऐसा माहौल बना दिया कि बीजेपी आरक्षण के खिलाफ है । लालू यादव ने बेहद चतुराई के साथ मोहन भागवत के बयान के एक अंश को लेकर आक्रमक हो गए । पूरे बिहार में घूम घूमकर ये कहने लगे कि बीजेपी आरक्षण के खिलाफ है । मोहन भागवत के बयान के आधार पर लालू यादव ने बिहार विधानसभा चुनाव को अगड़े और पिछड़े की लड़ाई में तब्दील कर दिया । नतीजा यह हुआ कि बीजेपी बैकफुट पर आ गई । केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने सफाई दी और उसके नेता ये कहते हुए घूमने लगे कि बीजेपी आरक्षण के पक्ष में है । बीजेपी के स्टार प्रचारकों ने पीएम नरेन्द्र मोदी की जाति को प्रचारित करना शुरू कर दिया । उनको पिछड़ा और अति पिछड़ा बताया जाने लगा । यहीं से रणनीतिक चूक हुई और बीजेपी के हाथ से विकास के नारे का सिरा छूटा और वो लालू के अखाडे में जाकर उनसे लड़ने लगे । इस हड़बडाहट का नतीजा पूरे चुनाव प्रचार के दौरान दिखा । चुनावी रणनीति में ये बात कही जाती है कि विरोधी को अपने अखाड़े में लाने की रणनीति पर काम होना चाहिए और लालू यादव ने इस रणनीति पर तुलनात्मक रूप से बेहतर काम किया और नतीजा सबके सामने है । इस चुनाव में सजायाफ्ता मुजरिम लालू यादव तो चुनाव नहीं लड़ रह थे लेकिन बिहार की जनता के मानस को पकड़कर उन्होंने एनडीए को पटखनी दी और बार फिर से खुद को भी भारतीय राजनीति में प्रासंगिक बना दिया । लालू यादव बिहार चुनाव के नतीजों में सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरे और करीब पचहत्तर सीटों पर जीत हासिल की । जेडीयू दूसरे और बीजेपी तीसरे नंबर की पार्टी बनकर रह गई ।  बीजेपी का विकास का मुद्दा और सवा लाख का स्पेशल पैकेज नेपथ्य में चला गया उसको भी नीतीश कुमार ने चुनावी हवा बताने में कामयाबी हासिल कर ली ।

बीजेपी से बिहार में दूसरी रणनीतिक चूक हुई पीएम मोदी और अमित शाह के चेहरे को लेकर । बीजेपी ने अपने तमाम पोस्टरों और प्रचार सामग्री पर नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की तस्वीरें छापी । इसका नतीजा यह हुआ कि नीतीश कुमार को एक और मौका मिला और उन्होंने बिहारी और बाहरी का मुद्दा उछाल दिया । बिहार की जनता को वो ये समझाने में कामयाब हो गए कि सूबे में बीजेपी के पास कोई नेता नहीं है और बाहरी यानि दोनों गुजराती नेता ही बिहार की किस्मत तय करेंगे । बिहार के लोग राजनीतिक तौर पर बेहद जागरूक होते हैं और उनके मन में ये बात बैठने लगी । जब यह बात बहुत बढ़ गई तबतक बिहार में दो फेज के चुनाव हो गए थे । फिर ये बात जोर शोर से प्रचारित की जाने लगी कि बीजेपी चुनाव हार रही है और पहले दो चरणों में बिहारी और बाहरी का मुद्दा हावी हो गया । फिर ये खबर आई कि मोदी ने अपनी कुछ रैलियां रद्द की हैं । प्रचार सामग्री में बिहार के स्थानीय नेताओं को जगह मिलनी शुरू गई और रातों रात मोदी और अमित शाह के साथ बिहार बीजेपी के नेताओं की तस्वीर नजर आने लगी । इसके साथ ही बीजेपी ने दूसरे राज्यों के कार्यकर्ताओं को बूथ मैनेजमेंट मे लगाया । इसका असर भी स्थानीय कार्यकर्ताओं पर उल्टा पड़ा । मोनवैज्ञानिक रूप से बेहद संवेदनशील बिहारियों को लगा कि इतने सालों से उन्होंने मेहनत की और जब वक्त आया तो बाहर क लोगों को उनके ऊपर बिठा दिया गया । बीजेपी अपने स्थानीय कार्यकर्ताओं की भावनाओं को समझ नहीं पाई । इस बात को इससे भी समझा जा सकता है कि बिहार से बीजेपी के आधे से अधिक सांसद चुनाव प्रचार से दूर रह । बीजेपी ने टिकट बंटवारे में भी कई गलतियां की और सुखदा पांडे जैसी नेताओं का टिकट काटकर नाराजगी मोल ले ली । जिस तरह से दिल्ली में बीजेपी ने किरण बेदी पर दांव लगाकर स्थानीय नेताओं के खफा कर दिया था कुछ उसी तरह की गलती बिहार में मांझी को ज्यादा भाव देकर हुई । जीतन राम मांझी की बिहार की राजनीति में ना तो साख थी और ना ही वोटबैंक । इससे इतर जिस तरह से गौमांस और बीफ पर पोलराइज करने की कोशिश की गई उसका भी अपेक्षित असर नहीं हुआ । सीमांचल इलाके में असदुद्दीन ओवैसी भी खुच नहीं कर पाए । विपक्ष ओवैशी और बीजेपी के मिले होने को प्रचारित करने में कामयाब रहा । इसके अलावा नीतीश कुमार की बेहतर छवि का भी महागठबंधन की जीत में अहम रोल रहा । मोदी के आक्रामक भाषणों में जहां नीतीश कुमार पर विश्वासघात से लेकर खाने की थाली छीनने से लेकर डीएनए की बातें की गई उसका भी असर उल्टा हुआ । नीतीश कुमार लालू यादव  नरेन्द्र मोदी ने बिहार में तीस बड़ी रैलियां की उसके जवाब में नीतीश ने छोटी रैलियों का फॉर्मूला अपनाते हुए सवा दो सौ से ज्यादा रैलियां की और जनता तक पहुंचे । नीतीश कुमार का हर घर दस्तक का नारा भी जनता को अपने पाले में लाने में कामयाब हुआ । बिहार के नतीजे का भारतीय राजनीति पर दूरगामी असर होगा और 2019 के लोकसभा चुनाव तक होनेवाले विधानसभा चुनावों को यह प्रभावित करेगा ।



Thursday, November 6, 2014

संघ का यूपी-बिहार प्लान

वीर सावरकर ने एक बार खफा होकर लिखा था कि संघ के स्वयंसेवकों की समाधि पर लगे पत्थर पर लिखा होगा – ये पैदा हुआ, इसने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ज्वाइन किया और इसकी मृत्यु हो गई । दरअसल वीर सावरकर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से इस बात को लेकर खफा थे कि संघ उनकी राजनीतिक गतिविधियों में मदद नहीं कर रहा था । हलांकि काफी वर्षों बाद सावरकर ने ये माना था कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का राजनीति में नहीं जाने का फैसला अच्छा और सही था । इसी तरह से इकतीस जनवरी 1934 को कांग्रेस के खजांची और मशहूर उद्योगपति जमनालाल बजाज जब गणपत राव की मार्फत डॉ हेडगवार से मिले और उनसे कांग्रेस की छतरी तले काम करने का अनुरोध किया । डॉ हेडगवार ने जमनालाल जी के प्रस्ताव पर कहा कि वो ऐसे स्वयंसेवक तैयार करना नहीं चाहते जो नेताओं की राजनीति के लिए इस्तेमाल हों । वक्त के साथ हालात बदले और संघ की सोच भी बदलती चली गई । संघ और राजनीति का साथ तो 1951 में भारतीय जनसंघ की स्थापना के साथ ही शुरू हो गया था लेकिन पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान तमाम तरह की हिचक भी खत्म हो गई । पहले संघ के लोग कहते थे कि संघ का राजनीति से कोई लेना देना नहीं है लेकिन अब इस तरह के बयान सुनने में नहीं आ रहे ।  संघ अब भी मूलत: एक सांस्कृतिक संगठन है जो देश के नागरिकों के चरित्र निर्माण के माध्यम से राष्ट्र निर्माण के लिए प्रतिबद्ध है लेकिन अब वो अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए सत्ता और शासन का इस्तेमाल भी करने में परहेज नहीं करता है । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को करीब से जानने वाले या संगठन के क्रियाकलापों पर नजर रखनेवाले यह जानते हैं कि संघ प्रमुख नागपुर के अलावा किसी एक स्थान पर ज्यादा वक्त तक नहीं रुकते हैं । पिछले दिनों लखनऊ में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने हफ्ते भर से अधिक वक्त बिताया । क्यों । यह जानना दिलचस्प है । सतह पर जो जानकारी तैर रही थी वो यह थी कि लखनऊ में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की बैठक थी लिहाजा संघ प्रमुख वहां थे । यह देखा गया है कि इस तरह की बैठकों के दौरान संघ प्रमुख इतने लंबे वक्त तक उस स्थान पर टिकते नहीं है । लखनऊ में संघ प्रमुख का टिकना वृहत्तर संघ परिवार के मिशन यूपी और अविभाजित बिहार का हिस्सा था । यूपी में लोकसभा चुनाव में बंपर सफलता के बाद संघ और बीजेपी का अगला लक्ष्य सूबे में सरकार बनाना है । यूपी में करीब ढाई साल बाद चुनाव होना है । उस चुनाव की रणनीति बननी शुरू हो गई है । इसके अलावा अगले साल बिहार में और अगले महीने झारखंड में भी चुनाव है । इन राज्यों में संघ के कार्यकर्ता पिछले कई सालों से सक्रिय हैं लेकिन पिछले एक दशक में इस सक्रियता में कमी देखने को मिली । नब्बे के दशक में जब से बिहार और उत्तर प्रदेश में सामाजिक न्याय के आंदोलन को मजबूती मिलनी शुरू हुई तो संघ की शाखाओं में स्वयंसेवकों की संख्या में कमी आने लगी ।
अब लोकसभा चुनाव में बीजेपी को मिली सफलता से संघ नेतृत्व भी खासा उत्साहित है । इस लोकसभा चुनाव में मतदाताओं ने जात-पात से उपर उठकर वोट दिया। सामाजिक न्याय और दलितों की राजनीति करनेवाली पार्टियां बुरी तरह से परास्त हुई । इन पार्टियों की इसी पराजय में संघ को संभावना नजर आ रही है । इसी संभावना को हकीकत में बदलने के लिए संघ पूरी तौर पर सक्रिय है । इसी कड़ी में यूपी से ताल्लुक रखनेवाले कृष्ण गोपाल को संघ और बीजेपी के बीचत के समन्वय का काम सौंपा गया है । संघ ने 2012 में ही ये भांप लिया था कि बगैर उत्तर प्रदेश और बिहार पर कब्जा किए देश की राजनीति पर पकड़ मजबूत नहीं की जा सकती है । जनवरी 2012 में संगम पर मोहन भागवत ने संघ के दरवाजे सबके लिए खुले होने की बात कहकर सभी जातियों को संकेत दिया था । उसी साल मोहन भागवत ने लखनऊ के प्रबुद्ध वर्ग के लोगों के साथ मुलाकात कर उनकी राय ली थी । जानकारों का कहना है कि दो हजार बारह से संघ ने जो मिशन यूपी शुरू किया था उसका लाभ 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान देखने को मिला । अब एक बार फिर से संघ ने मिशन यूपी पार्ट टू शुरू किया है लेकिन इस बार यूपी के साथ साथ उसके एजेंडे पर बिहार और झारखंड भी है । लखनऊ में केंद्रीय कार्यकारिणी मंडल की बैठक में संघ ने आतंकवाद, धर्मांतरण और सुरक्षा जैसे मुद्दों की बजाए स्वच्छता, पर्यावरण और कम्युनिटी लीविंग जैसे विषयों को अपने एजेंडे में शामिल किया । ये ऐसे मुद्दे हैं जो सीधे सीधे जनता से जुड़ते हैं । इतिहास गवाह है कि इन मुद्दों को उठानेवाले नेताओं और संगठनों को व्यापक जनस्वीकार्यता मिली है। संघ ने इसी जनस्वीकार्यता को बढ़ाने के लिए दलितों और पिछडो़ं के बीच समरसता बढ़ाने पर भी जोर दिया । मोहन भागवत ने साफ कहा कि जब तक समाज साथ में खड़ा नहीं होगा, नेता, नारा, पार्टी, सरकार और चमत्कार से समाज का भला नहीं हो सकता । इसी वाक्य के मद्देनजर संगठन के विस्तार को मजबूती देने और विवादास्पद मुद्दे को ठंडे बस्ते में रखने का निर्णय लिया । यह अकारण नहीं कि राम मंदिर के मुद्दे को राष्ट्र का मुद्दा बताकर हल्का कर दिया गया और यह तय किया गया कि केंद्र की सरकार के लिए फिलहाल मुसीबत नहीं खड़ा करना है । मिशन यूपी और बिहार की सफलता के लिए एक बार संघ की सक्रियता बीजेपी को सांगठवनिक तौर पर मजबूती दे सकती है । परिणाम तो जनादेश से पता चलेगा ।