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Monday, November 22, 2010

सिद्दांत पर भारी सत्ता लोलुपता

एक लाख छिहत्तर हजार करोड़ के टू जी स्पेक्ट्रम घोटाला और उसके पहले हजारो करोड़ के कॉमनवेल्थ घोटाला और मुंबई के आदर्श सोसाइटी घोटालों के शोरगुल के बीच सुदूर दक्षिण के राज्य कर्नाटक के मुख्यमंत्री येदुरप्पा पर भी जमीन के घोटाले के संगीन इल्जाम लगे हैं । दरअसल यह पहली बार हो रहा है कि देश के दूसरे सबसे बड़े राजनैतिक दल भारतीय जनता पार्टी के किसी मुख्यमंत्री पर भ्रष्टाटाचार के इतने संगीन आरोप लगे हों । हो सकता है कि इस घोटाले के बाद येदुरप्पा को राहत मिल जाए और वो कर्नाटक के मुख्यमंत्री बने रहें । लेकिन अगर हम पार्टी विद अ डिफरेंस का दावा करनेवाली भारतीय जनता पार्टी में घट रही राजनीतिक घटनाओं का विश्लेषण करें तो इस पार्टी के सिद्धांतों और कार्यकलाप में कई अहम बदलाव रेखांकित किए जा सकते हैं । दो साल पहले बनी कर्नाटक की सरकार पर आए दिन स्थायित्व पर खतरा मंडराता रहता है । मुख्यमंत्री येदुरप्पा पर अपने बेटों को फायदा पहुंचाने के आरोप के पहले पिछले पंद्रह महीने में वहां तीन मंत्रियों को भ्रष्टाचार के आरोप में बर्खास्त किया गया । तीन मंत्रियों में कृष्णैय्या सेट्टी को पैसा कमाने के लिए अपने पद के दुरुपयोग की वजह से हटाया गया । एक और मंत्री हलप्पा पर बलात्कार का आरोप लगा था जिसके बाद उन्हें मंत्रीपद से हाथ धोना पड़ा । यह सिलसिला यहीं नहीं रुका, सरकारी नौकरियों में धांधली के आरोप में रामचंद्र गौड़ा की बर्खास्तगी हुई । एक और मंत्री डी सुधाकर पर भी सरकारी कार्यक्रमों में नियमों के विपरीत धन आवंटन का गंभीर आरोप लगा । कयास लगाए जा रहे थे कि येदुरप्पा अपने मंत्रिमंडल में बदलाव के वक्त इनकी छुट्टी कर देंगे लेकिन सुधाकर किसी तरह से बचने में कामयाब रहे । इसके अलावा कर्नाटक के रेड्डी बंधुओं की ख्याति किसी से छुपी नहीं है । उनके खिलाफ भी सीआईडी और लोकायुक्त की जांच चल रही है । सूबे में अवैध खनन का मामला सुपीम कोर्ट तक आया था । पिछले साल तो रेड्डी बंधुओं ने केंद्रीय नेताओं की शह पर पूरी कर्नाटक सरकार को बंधक बना लिया था और उनके खिलाफ किसी तरह की कार्रवाई करने में खुद को अक्षम पाने के बाद कर्नाटक के मुख्यमंत्री दिल्ली आकर फूट-फूटकर रोए भी थे । बाद में किसी तरह से समझौता हुआ और सरकार बच पाई । एक लाचार मुख्यमंत्री के रूप जाने वाले येदुरप्पा ने बाद में मंत्रिमंडल में बदलाव कर सरकार पर अपनी मजबूत पकड़ होने के संकेत तो दिए हैं लेकिन तीन दलित मंत्रियों को एक साथ हटाने का एक गलत संदेश पूरे प्रदेश में गया । लेकिन येदुरप्पा सरकार पर अपनी मजबूत पकड़ बनाए रखने में कामयाब नहीं हो पा रहे हैं ।
दूसरी अहम राजनीतिक घटना जो बीजेपी में हुई वो थी झारखंड में जेएमएम के साथ सरकार बनाना । झारखंड में सत्ता में वापस आने के लिए भारतीय जनता पार्टी ने बार-बाऱ धोखा देने वाले और पार्टी की सरेआम फजीहत करानेवाले शिबू सोरेन की पार्टी झारखंड मुक्ति मोर्चा से समझौता कर सरकार बनाई । भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी जेएमएम के नेताओं के साथ गलबहियां करते बीजेपी नेताओं की तस्वीर देशभर के अखबारों में प्रमुखता से छपी । इन तस्वीरों से बीजेपी का चाल चरित्र और चेहरा तीनों उजागर हो गए । झारखंड मुक्ति मोर्चा के सुप्रीमो शिबू सोरेन पर भ्रष्टाचार से लेकर हत्या तक के कई मुकदमे चल रहे हैं । अपने पीए शशिनाथ झा की हत्या के संगीन इल्जाम भी उनपर हैं । सीबीआई की चार्जशीट में तो हत्या के अलावा भी कुछ इतर कारण भी दर्ज हैं । कहा तो यह भी जाता है कि सत्ता मोह में पार्टी ने इतनी हड़बड़ी दिखाई कि अध्य़क्ष गडकरी ने वरिष्ठ नेताओं तक को इस गठजोड़ की भनक नहीं लगने दी । राजनीतिक हलकों में तैर रही खबरों के मुताबिक पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी ने संघ के अपने आकाओं से हरी झंडी लेकर ना केवल सत्ता वापसी की रणनीति बनाई बल्कि उसे अंजाम तक भी पहुंचाया । अगर इन बातों में जरा भी सचाई है तो वह और भी चौंकानेवाली है क्योंकि राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ सार्वजनिक जीवन में शुचिता की बात जोर शोर से करता रहा है ।
लंबे समय तक राष्ट्रीय स्वंयसंवक संघ के प्रचारक रहे और बाद में भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष बने पंडित दीन दयाल उपाध्याय ने बाइस से पच्चीस अप्रैल उन्नीस सौ पैंसठ के बीच पांच लंबी तकरीर दी थी । राजनैतिक अवसरवाद पर जोर देते हुए पंडित जी ने कहा था- किसी भी सिद्धांत को नहीं मानने वाले अवसरवादी लोग देश की राजनीति में आ गए हैं । राजनीतिक दल और राजनेताओं के लिए ना तो कोई सिद्धांत मायने रखता है ना ही उनके सामने कोई व्यापक उद्देश्य या फिर कोई एक सर्वमान्य दिशा निर्देश हैं । कोई भी नेता किसी पार्टी को छोड़कर दूसरी पार्टी में जाने को गलत नहीं मानता । राजनीति दलों के गठबंधन और विलय में भी कोई सिद्धांत या मतभेद काम नहीं करता है - वो विशुद्ध रूप से चुनाव में जीत हासिल करने के लिए या सत्ता पाने के लिए किया जा रहा है । पंडित जी ने यह सब सन पैंसठ में कहा था । उन्हें क्या मालूम कि जिस पार्टी को उन्होंने अपनी मेहनत और निष्ठा से खड़ा किया है वह भी उन्ही रास्तों पर चल पड़ेगी जिसके वो खिलाफ थे । झारखंड में तो साफ तौर पर यह रेखांकित किया जा सकता है कि सिर्फ सत्ता हासिल करने के लिए बीजेपी ने जेएमएम के साथ हाथ मिलाया ।
अपने उसी भाषण में पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी ने यह भी कहा था कि राजनीति दलों और नेताओं के इन्हीं कृत्यों की वजह से जनता के मानस में उनको लेकर एक अविश्वास की स्थिति पैदा होती जा रही है । राजनीतिज्ञों को लेकर शायद ही कोई वजह बची हो जिसकी बिना पर देश की जनता के बीच उनकी साख कायम हो सके । यह स्थिति बेहद चिंतनीय है । सवाल यह उठता है कि क्या आज की भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ अपने नेता दीनदयाल उपाध्याय के सिद्धांतो से अलग रास्ते पर चल निकली है । क्या यही वजह है कि कांग्रेस सरकार पर लगातार भ्रष्टाचार के दलदल में डूबते जाने के बावजूद बीजेपी कोई राजनीतिक फायदा नहीं उठा पा रही है । कर्नाटक और झारखंड में पार्टी के कृत्यों से आज देश के जनमानस में पार्टी की साख कायम नहीं हो पा रही है । पार्टी नेतृत्व को लेकर देश की जनता और उनके खुद के कॉडर के मन में एक दुविधा की स्थिति है । अब वक्त आ गया है जब बीजेपी और संघ के नेताओं को बैठकर आत्ममंथन करना चाहिए और सत्तालोलुप पार्टी नेताओं पर लगाम लगानी चाहिए ताकि पंडित उपाध्याय जैसे संघ के नेताओं की आत्मा को शांति मिल सके ।

Tuesday, November 9, 2010

भविष्य को नर्क बनने से रोको

कानपुर में दस साल की लड़की दिव्या के साथ कक्षा में ही बलात्कार की घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है । दस साल की मासूम के साथ पहले कक्षा में दरिंदों ने बलात्कार किया । इस वारदात के बाद स्कूल प्रशासन ने उसके कपड़े बदलवाकर घर भिजवा दिया । स्कूल में हुए इस वहशियाना हरकत से को वो मासूम झेल नहीं पाई और बाद में अस्पताल में उसकी मौत हो गई । इस घटना में स्कूल प्रशासन की संवेदनहीनता और स्थनीय पुलिस की लापरवाही से पूरी इंसानियत शर्मसार हो गई है । दस साल की स्कूली छात्रा से विद्या के मंदिर में ऐसा घिनौना खेल खेला गया जिससे एक बार फिर से बच्चों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं । हाल के दिनों में स्कूलों में बच्चों के यौन शोषण की घटनाएं बढ़ी हैं ।इन बढ़ती घटनाओं पर अंकुश लगाने के लिए कड़े कानून की आवश्यकता है । जब भी कोई ऐसी वारदात सामने आती है और मीडिया में इस पर हंगामा मचता है तो केंद्र सरकार चिंता जताती है लेकिन फिर सो जाती है । स्कूली बच्चों की सुरक्षा को लेकर कड़े कानून बनाने के सवाल पर संबद्ध मंत्रालय की ढिलाई से सरकार भी कठघरे में आ जाती है । दिल्ली में एक कैब ड्राइवर की बच्चों के यौन शोषण की करतूत का पर्दाफाश हुआ था तब भी महिला और बाल विकास मंत्रालय ने इस तरह की वारदातों को रोकने के लिए कठोर कानून बनाने का आश्वासन दिया था । अब संसद का शीतकालीन सत्र आनेवाला है तो प्रस्तावित कानून को लेकर मंत्रालय की सक्रियता सामने नहीं आ रही है ।
कुछ दिनों पहले मद्रास हाईकोर्ट ने एक फिजिकल ट्रेनिंग इंस्ट्रक्टर की निचली अदालत द्वारा दी गई दस साल की सजा बरकरार रखी थी । इंस्ट्रक्टर ने चौथी कक्षा में पढ़नेवाली एक छात्रा का बलात्कार किया था । आरोप साबित होने पर निचली अदालत ने उस दस साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी । अपने फैसले के दौरान मद्रास हाईकोर्ट के विद्वान न्यायाधीश ने कहा था कि हमारे समाज में बच्चों की बढ़ती यौन शोषण की घटनाओं के खिलाफ राज्य और केंद्र सरकार के अलावा गैर सरकारी संस्थाएं सक्रिय हैं और उसपर काबू पाने के लिए कई तरह के उपाय किए जा रहे हैं । कानून मंत्रालय ने इस दिशा में कठोर कानून बनाने की दिशा में पहल भी की है लेकिन समाज में इस तरह के बढ़ते खतरे पर लगाम लगाने के लिए एक बेहद ही कड़े कानून की आवश्यकता है । इस तरह की घटनाओं में जो मुजरिम होता है वह छात्रों और उसके परिवारवालों के विश्वास की हत्या करता है । स्कूली बच्चों के यौन शोषण के अपराधियों से जबतक कड़ाई से नहीं निबटा जाएगा तबतक इसी वारदातों पर काबू पाना मुश्किल है ।
दरअसल यौन शोषण या रेप के केस में अदालती कार्रवाई में होनेवाली देरी और कानूनी उलझनों और पेचीदिगियों से मामला उलझ जाता है और कानून की खामियों का फायदा उठाकर आरोपी बच निकलते हैं । स्कूल में घटी वारदातों में स्कूल प्रशासन आमतौर पर मामले को दबाना चाहता है जिससे न्याय की उम्मीद और धूमिल हो जाती है । चाहे कानपुर का केस हो या फिर चेन्नई के स्कूल में चौथी कक्षा की छात्रा से रेप का मामला हो दोनों जगह यह देखा गया कि शुरुआत में स्कूल मामले को हल्के में लेकर दबाने की कोशिश करते हैं । इससे केस कमजोर होता है, अदालती प्रक्रिया में देरी होती है । हमारे देश में रेप को लेकर जो कानून हैं उसमें जल्दी न्याय मिलना मुश्किल होता है । चेन्नई रेप केस में चौथी की बच्ची को इंसाफ मिलने में तकरीबन आठ साल लगे । यह तो उसी बच्ची के परिवारवालों की हिम्मत थी जिसकी वजह से मुजरिम को सजा मिली । इस तरह के केस में जरूरत इस बात की है कि कानूनन त्वरित कार्रवाई हो, मुजरिमों को सख्त से सख्त सजा मिले । इसके अलावा कानून में इस बात का भी प्रावधान हो कि अगर स्कूल इस तरह के मामले को दबाने की कार्रवाई करता है तो स्कूल प्रबंधन को भी सजा हो ।
इस तरह के मामले में सख्त कानून के अलावा स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा को लेकर एक राष्ट्रीय नीति की भी जरूरत है । जिसमें स्कूलों के अलावा विभिन्न शिक्षा बोर्डों को भी शामिल किया जाए । अभी अलग अलग शिक्षा बोर्ड और अलग अलग सूबों में इस तरह के केस के लिए अलग-अलग गाइडलाइंस है । एकीकृत गाइडलाइंस में स्कूलों को यह निर्देश दिए जाएं कि वो अपने यहां होनेवाली शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई करे । स्कूल प्रबंधन के लिए यह अनिवार्य करने की आवश्यकता है कि ऐसे मामलों में फौरन पुलिस को इत्तला करे और मुजरिमों को पकड़ने में पुलिस का सहयोग करने के अलावा जांच में भी सहयोग करे । अगर स्कूल ऐसा नहीं करता है तो संस्थान को बंद करने तक का कानूनी प्रावधान होने चाहिए । अगर ऐसा हो पाता है तो देश के भविष्य इन बच्चों का भविष्य नर्क बनने से बच जाएगा ।

Saturday, November 6, 2010

फासीवाद का दर्शन

चीन से एक दिल दहला देनेवाली खबर आई है । कानून का जबरदस्ती और कड़ाई से पालन करवाने की कई खबरें चीन से आती ही रहती हैं लेकिन अभी जो खबर बाहर निकल कर आई है वो एक विकसित राष्ट्र और शासन करनेवाली पार्टी की विचारधारा पर कलंक की तरह है । चीन के पूर्वी तट के पास सीमिंग में एक छत्तीस वर्षीय महिला ने एक बच्चे के रहते दूसरे संतान को जन्म देने का इरादा किया और गर्भवती हो गई । जब उसका गर्भ आठ महीने का हो गया तो सरकारी अधिकारियों को इस बात का पता चला । इस जानकारी के बाद तकरीबन दो दर्जन सरकारी चीनी अधिकारियों ने उस महिला के घर पर धावा बोल दिया । आठ माह की गर्भवती पर सरकारी अधिकारियों ने लात-घूंसों की बरसात कर दी । उसके दोनों हाथ पीछे बांधकर उसके सिर को दीवार से टकराया और पेट पर कई प्रहार किए ताकि गर्भपात हो जाए । जब वो कामयाब नहीं हुए तो सरकारी अधिकारियों ने आईयिंग नाम की उस महिला को घसीट कर अस्पताल में भर्ती करवाया और गर्भपात का इंजेक्शन लगवा कर जबरन आठ माह के गर्भ को गिरवा दिया ।
बच्चा पेट में इतना बड़ा हो गया था कि गर्भपात के बावजूद उसके कुछ अंश पेट में रह गए थे जिसको निकालने के लिए आईयिंग की मंजूरी के बगैर ऑपरेशन भी करना पड़ा, एक ऐसा ऑपरेशन जिसमें उसकी जान भी जा सकती थी। इंसानियत को शर्मसार कर देनेवाली यह घटना चीन में होने वाली अन्य ज्यादतियों की तरह दबकर रह जाती । लेकिन उस महिला ने अस्पताल में अपने फोटो खींचने की इजाजत दे दी । नतीजा यह हुआ कि उसी दास्तां और चोट के निशान वाले फोटोग्राफ इंटनेट के जरिए सारी दुनिया के सामने आ गए ।
दरअसल चीन ने बढ़ती जनसंख्या का पर काबू करने के लिए एक संतान नीति लागू किया हुआ है । वहां जुड़वां बच्चों के अपवाद को छोड़कर दूसरी संतान पैदा करने पर पूरी तरह से पाबंदी है। इस नीति का उल्लंघन करनेवाले को भारी जुर्माना चुकाना पड़ता है । इस कानून की आड़ में ही कानून का पालन करवाने की जिम्मेदारीवाले सरकारी अफसरों ने हैवानियत का नंगा नाच किया । चीन के उन सरकारी अधिकारियों को ना तो उस महिला का दर्द समझ में आया , ना ही उस महिला के पति की भवानाओं को समझने की कोशिश की और ना ही उनपर उस महिला के दस साल की बच्ची की गुहार काम आई जो पिछले आठ महीने से अपने घर में छोटे भाई बहन की राह देख रही थी । चीन में जिस विचारधारा के आधार पर वहां का शासन चल रहा है वहां ना तो भावनाओं की कद्र है ना ही संवेदना के लिए कोई जगह है । वहां तो दबाई जाती है सिर्फ आवाज । थ्येनमान चौक पर छात्रों को टैंक से कुचले जाने की घटना अब भी लोगों के जेहन में है ।
हाल ही में प्रकाशित एमनेस्टी इंटरनेशनल की रुपोर्ट के मुताबिक चीन में अब भी पांच लाख लोग बगैर किसी गंभीर इल्जाम के जेल की हवा खा रहे हैं । वहां बगैर किसी जुर्म के घर में कैद कर देना, लोगों की व्यक्तिगत आजादी पर सरकारी निगरानी, आम आदमी की आवाज को दबाने के लिए पुलिस फोर्स का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल आम बात है । चीन की जेल में बंद मानवाधिकार कार्यकर्ता ली जियाबो को जब शांति का नोबल पुरस्कार दिया गया तो उसके बाद वहां की सरकार की भौंहे तन गई । चीनी सरकार को लगा कि ली जियाबो को नोबल पुरस्कार मिलने से देश में मानवाधिकार के लिए काम करनेवाले लोगों की सक्रियता बढ़ सकती है लिहाजा ली के नजदीकी लोगों की निगरानी तेज कर दी गई । बगैर किसी शक या संदेह के हफ्तेभर में तकरीबन चालीस लोगों को हाउस अरेस्ट कर दिया गया । ली के समर्थक संगठनों पर जबरदस्ती शुरू कर दी गई । ली जियाबो से नजदीकी के शक में शंघाई के एक हाउस चर्च पर पहले निगरानी शुरू की गई फिर कई दिनों तक पुलिस ने उसे अपने घेर में ले लिया । चर्च के नेता झू योंग और उनकी पत्नी के घर से निकलने पर ना केवल पाबंदी लगा दी गई बल्कि घर का जरूरी सामान खरीदने के लिए पुलिस के घेरे में निकलने पर मजबूर किया गया । जनता की सरकार और लोगों के बीच समानता के सिद्धांत की वकालत करनेवाली इस विचारधारा के साथ सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि यहां कहा कुछ जाता है और किया कुछ जाता है । दरअसल ऐसा सिर्फ चीन में नहीं होता है जहां भी इस विचारधारा का बोलबाला है वहां ऐसी ही तानाशाही पूर्ण रवैया देखने को मिलता है ।
हमारे देश में भी वामपंथी विचारधारा को माननेवाले हमेशा से तानाशाही और फासीवाद के विरोध करते रहे हैं । उनका यह विरोध सिर्फ दिखावे के लिए और अपने हित में उसका उपयोग करने के लिए होता है । चीन में हुई उस मार्मिक घटना के बारे में जानते ही जेहन में कौंध गई प्रख्यात कवि और शायर कैफी आजमी की बेगम शौकत कैफी की किताब- याद की रहगुजर- का एक प्रसंग। कैफी के एक साल के लड़के खैयाम की असायमयिक मौत हो गई थी जिसने उनको और उनकी पत्नी शौकत को अंदर से तोड़कर रख दिया था । हर वक्त, हर पल अपने पहले संतान की मौत का गम झेल रही शौकत और उनके पति कैफी दोनों वामपंथी विचारधारा से जुड़े संगठन भारतीय जन नाट्य संघ यानि इप्टा में सक्रिय थे । जलसे, जुलूस, प्रदर्शन रोज के काम थे । लेकिन जब बेटे का गम लिए शौकत अपने कॉमरेडों के पास जाती तो उनके साथी कन्नी काट जाते थे, साथियों की संवेदनहीनता से शौकत को बेहद दुख पहुंचा । अपनी किताब में शौकत ने इस दर्द को बयां करते हुए लिखा- अहिस्ता अहिस्ता मुझे एहसास होने लगा कि लोग गमजदा लोगों से घबराने लगते हैं और चुपचाप उठकर चले जाते हैं । मैंने यह सोचकर अपने गम पर काबू पाने की कोशिश शुरू की ।
लेकिन पूरा मामला यहीं खत्म नहीं होता है । संवेदनहीनता की पराकाष्ठा पर पहुंचना अभी बाकी था । कुछ दिनों बाद शौकत आजमी फिर से गर्भवती हुई । अपने पहले बच्चे की मौत का गम भुलाने की कोशिश में लगी शौकत के लिए यब सुकून देनेवाला पल था । लेकिन अपना सबकुछ पार्टी पर न्योछावर करने के लिए उनकी पार्टी ने क्या हुक्म सुनाया आप शौकत की ही जुबानी सुनिए- शबाना होने को थी । क्योंकि मेरा पहला बच्चा गुजर गया था इसलिए मैं तो बहुत खुश थी लेकिन पार्टी को यह बात पसंद नहीं आई । ऑर्डर हुआ एबॉर्शन करवा दिया जाए । क्योंकि कैफी अंडर-ग्राउंड हैं । मैं बेरोजगार हूं । बच्चे की जिम्मेदारी कौन लेगा । मुझे बेहद तकलीफ पहुंची । यह आपबीती है एक ऐसे कॉमरेड की और एक ऐसे पार्टी की जो जनपक्षधरता और वयक्तिगत आजादी का सबसे ज्यादा शोर मचाती है, जो तानाशाही के खिलाफ होने का लगातार दंभ भरती है । लेकिन वक्त पड़ने पर इस विचारधारा का पालन करने और करवानेवाले सबसे बड़े तानाशाह के तौर पर उभरते हैं।
अभी ज्यादा दिन नहीं बीते हैं जब पार्टी की बात नहीं माने जाने पर सीपीएम ने अपने वरिष्ठ सदस्य सोमनाथ चटर्जी को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया । अगर सोमनाथ चटर्जी की मानें तो इस निष्कासन के पहले ना तो उन्हें कोई नोटिस दिया गया और ना ही पार्टी की नीति निर्धारण करनेवाली सर्वोच्च समिति पोलित ब्यूरो के सभी सत्रह सदस्यों की सहमति ली गई । सिर्फ पांच सदस्यों ने महासचिव के इशारे पर आनन फानन में सोमनाथ चटर्जी जैसे पार्टी के कद्दावर नेता को बाहर का दरवाजा दिखा दिया । अपनी किताब -–कीपिंग द फेथ- मेमॉयर ऑफ अ पार्लियामेंटेरियन में यह दावा किया है उनका निष्कासन पार्टी के संविधान के खिलाफ और अलोकतांत्रिक था । पार्टी संविधा तो दूर की बात है, राजनीति में एक सामान्य परंपरा है कि नोटिस देने के बाद पार्टी से निष्कासन होता है । लेकिन सोमनाथ के मामले में सीपीएम ने इस सामान्य से नियम का भी पालन नहीं किया । ये कुछ ऐसे उदाहरण हैं जो उस विचारधारा से जुड़े लोगों, संगठन और सरकार के हैं जो सबसे ज्यादा जनपक्षधरता,सबसे ज्यादा लोकतांत्रिक प्रक्रिया, नागरिक स्वतंत्रता, समान अधिकार, समान अवसर आदि के बारे में दुहाई देते हैं । कथनी और करनी के इसी फर्क ने इस विचारधारा की बुनियाद पर टिकी कई शक्तिशाली व्यवस्थाओं से लोगों का मोहभंग कर दिया । नतीजा यह हुआ कि किसी जमाने में विश्व में एक वैकल्पिक विचारधारा के रूप में देखे जानेवाली यह व्यवस्था अब चीन और कुछ अन्य देशों में सरकार के सहारे अपने अस्तित्व को बचाने की लड़ाई लड़ रही हैं ।

Sunday, October 17, 2010

सोनिया की जीवनी के बहाने

अभी कुछ दिनों पहले की ही बात है जब स्पेनिश लेखक जेवियर मोरो की किताब द रेड साड़ी को लेकर कांग्रेस पार्टी के नेताओं ने अच्छा खासा बवाल मचाया था । दरअसल स्पेनिश लेखक जेवियर मोरो की ये किताब कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष सोनिया गांधी के जीवन पर आधारित है । लेखक मोरो का दावा है कि यह पूरी किताब सोनिया के बचपन से लेकर उनकी राजीव गांधी से मुलाकात और शादी से लेकर सास इंदिरा गांधी के साथ बिताए दिनों के अलावा राजीव गांधी की हत्या का बाद सोनिया की मानसिकता का चित्रण करती है । दरअसल मोरो की इस किताब से इस बात के संकेत मिलते हैं कि सोनिया गांधी अपने पति की हत्या के बाद भारत छोड़कर इटली जाना चाहती थी । मोरो की किताब में पृष्ठ संख्या सोलह पर इस बात का उल्लेख है कि सोनिया ने सोचा कि उस देश में क्यों रहना जो अपने ही बच्चों को खा जाता है । इसके अलावा पृष्ठ संख्या एक सौ छिहत्तर पर भी इस बात के संकेत हैं कि गांधी परिवार में राजीव की मौत के बाद इटली जाने पर चर्चा होती थी । इस किताब में कई ऐसे प्रसंग है जहां ये लगता है कि लेखक ने सोनिया की जिंदगी के यथार्थवादी पहलुओं में अपनी कल्पना का तड़का लगाया है । जैसे पृष्ठ संख्या एक सौ तिरसठ पर कहा गया है कि रात के तीन बजे सोनिया ने राजीव को कहा कि देश में इमरजेंसी लगाने के ड्राफ्ट में उन्होंने इंदिरा गांधी की मदद की थी ।
ये कुछ ऐसी बातें हैं जिससे साबित होता है कि जेवियर मोरो ने सोनिया की इस जीवनी में कल्पना के आधार पर कई प्रसंग जोड़े हैं । खुद लेखक ने भी माना है कि यह सोनिया की फिक्सनलाइज्ड बायोग्राफी है । लेकिन यहां सवाल यह खड़ा होता है कि किसी जीवित व्यक्ति की काल्पनिक जीवनी लिखने का अधिकार किसी को भी कैसे मिल सकता है । जबतक इस आत्मकथा पर विवाद नहीं खड़ा हुआ था तब तक तो इसको सोनिया गांधी ती जीवनी बताकर ही प्रचारित किया जा रहा था और बेचा भी जा रहा था । सबसे पहले ये जीवनी अक्तूबर दो हजार आठ में स्पेनिश में छपी और बाद में इसका अनुवाद इटैलियन, फ्रैंच और डच में हो चुका है । एक अनुमान के मुताबिक अबतक इस किताब की तीन लाख प्रतिया बिक चुकी हैं । जाहिर है लेखक ने तीन भाषाओं के बल पर एक बडा़ बाजार और पाठक वर्ग हासिल कर लिया है ।
अब जेवियर मोरो इसको अंग्रेजी में प्रकाशित कर भारतीय बाजार के अलावा अन्य यूरोपीय देशों और अमेरिका के बाजार में सोनिया गांधी के नाम को भुनाना चाहते हैं । जैसा कि उपर संकेत किया गया है कि इसमें इटली में सोनिया के बचपन को प्रमुखता से छापा गया है । मोरो लिखते हैं- सोनिया के पैदा होने पर लुजियाना के घरों में परंपरा के अनुसार गुलाबी रिबन बांधे गए । चर्च ने सोनिया को नाम दिया एडविजे एनटोनियो अलबिना मैनो । लेकिन उनके पिता स्टीफैनो ने उन्हें सोनिया नाम दिया । रूसी नाम रखकर वो उन रूसी परिवारों का शुक्रिया अदा करना चाहते थे जिन्होंने द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान उनकी जान बचाई थी । सोनिया के पिता स्टीफैनो, मुसोलिनी की सेना में थे जो रूसी सेना से पराजित हो गई थी । सोनिया जियोवेनो के कॉन्वेंट स्कूल में गई लेकिन उतनी ही पढाई की जितनी की जरूरत थी । यानि वो अच्छी विद्यार्थी नहीं थी लेकिन पढ़ाई में कमजोर होने के बावजूद वो हंसमुख और दूसरों की मदद को तत्पर रहती थी । कफ और अस्थमा की शिकायत की वजह से वो बोर्डिंग स्कूल में अकेले सोती थी । आगे जाकर तूरीन में पढ़ाई के दौरान सोनिया के मन में एयर होस्टेस बनने का अरमान भी जगा था ले किन वो सपना जल्द ही बदल गया । उसके बाद सोनिया विदेशी भाषा की शिक्षक या फिर संयुक्त राष्ट्र में अनुवादक बनने की ख्वाहिश पालने लगी ।
उपरोक्त प्रसंगों के सामने आते ही कांग्रेस के नेताओं ने आपत्ति जतानी शुरू कर दी । कांग्रेस का आरोप है कि मोरो ने वास्तविकता से छेड़छाड़ की है लेकिन मोरो का दावा है कि उसकी किताब एक वृहद और लंबे रिसर्च का नतीजा है । जेवियर मोरो के मुताबिक तथ्यों और घटनाओं की सत्यता को जानने परखने के लिए उन्होंने खुद सोनिया के होम टाउन लुजियाना में काफी वक्त बिताया । उसका तो यह भी दावा है कि उसवे किताब छपने के पहले उसकी पांडुलिपि सोनिया गांधी की बहन नाडिया को भी दिखाई थी क्योंकि वो स्पैनिश जानती थी । इसके अलावा मोरो ने किताब छपने के बाद सोनिया को भी उसकी एक प्रति भेजी । मोरो का कहना है कि नाडिया ने किताब पर कोई आपत्ति दर्ज नहीं की जबकि सोनिया की तरफ से कोई जबाव ही नहीं मिला ।
कांग्रेस नेताओं की आपत्तियों और लेखक को कानूनी नोटिस के हो हल्ले के बीच जेवियर मोरो की किताब सोनिया और उसके इर्द गिर्द के विवादों और घटनाओं में सिमटकर रह गई। जबकि इस किताब में बीजेपी की सांसद और सोनिया की देवरानी मेनका गांधी के बारे में ज्यादा विस्फोटक प्रसंग छपे हैं, जो घटनाओं के चश्मदीदों के बयानों पर आधारित होने की वजह से ज्यादा प्रामाणिक प्रतीत होते हैं । इस किताब में मोरो ने मेनका और इंदिरा गांधी की पहली मुलाकात का बड़ा ही दिलचस्प विवरण दिया है । जब मेनका पहली बार इंदिरा गांधी से मिलने पहुंची तो बेहद डरी और सहमी हुई थी । बावजूद इसके जब वो अपनी होनेवाली सास को अपना परिचय देने लगी तो यह बात छुपा गई कि वो एक तौलिया कंपनी के विज्ञापन की मॉडल है । इंदिरा गांधी मेनका से पहली मुलाकात के बाद उसके और उसके परिवार के बारे में और ज्यादा जानकारियां इकट्ठा करना चाहती थी लेकिन संजय गांधी बेहद जल्दबाजी में थे और उन्होंने मंगनी कर ली । जब सगाई के बाद दोनों परिवार साथ खाने बैठे तो और बातचीत के दौरान इंदिरा गांधी को इस बात का एहसास हुआ कि मेनका और उसके परिवार के लोग ना तो उतने पढ़े लिखे हैं और ना ही विचारों में आधुनिक ।
बेटे संजय गांधी की जिद की वजह से तेइस सितंबर उन्नीस सौ चौहत्तर को गांधी के पारिवारिक मित्र मोहम्मद युनुस के घर पर संजय और मेनका परिणय सूत्र में बंध गए । यहां पर जेवियर मोरो ने इस बात के संकेत दिए हैं कि मेनका को गांधी परिवनार में एडजस्ट करने में सोनिया से ज्यादा दिक्कत हुई । मेनका को सिगरेट पीने की आदत थी जबकि संजय ध्रूमपान को सख्त नापसंद करते थे, इंदिरा गांधी बीमारी की वजह से और सोनिया अस्थमा की वजह से धुंआ बरदाश्त नहीं कर पाती थी । एक बार तो मेनका के व्यवहार से राजीव गांधी काफी खिन्न हो गए थे । हुआ यह था कि मेनका सोफे पर बैठकर सिगरेट पी रही थी और सोनिया घर के काम में हाथ बंटा रही थी । इसको देखकर राजीव गांधी को बेहद कोफ्त हुई थी जिसे उन्होंने जाहिर भी किया था ।
एक और बेहद ही दिलचस्प वाकया इस किताब में है । एक बार मशहूर लेखक खुशवंत सिंह जब गांधी परिवार से मिलने उनके घर गए तो वहां कुत्तों के बीच जबरदस्त झगड़ा चल रहा था । किताब के मुताबिक मेनका के आइरिश वुल्फहाउंड और सोनिया के शांत से अफगानी कुत्ते के बीच लड़ाई चल रही थी । सोनिया दोनों को अलग करना चाह रही थी लेकिन मेनका इस झगड़े से मजा ले रही थी क्योंकि उसे मालूम था कि उसका कुत्ता सोनिया के कुत्ते से मजबूत था । मेनका ने सोनिया पर अपनी श्रेष्ठता साबित करने के लिए खुशवंत सिंह के साथ मिलकर सूर्या पत्रिका भी निकाली थी ।
लेखक ने इंदिरा गांधी की सचिव उषा के हवाले से लिखा है कि मेनका बेहद ही बुद्धिमती लेकिन महात्वाकांक्षी थी । उसे हर वक्त यह लगता था कि जल्द ही संजय गांधी भारत के प्रधानमंत्री बनेंगे, और वो गाहे बगाहे इस बात तो सार्वजनिक रूप से कहती भी थी । लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था । सतहत्तर में कांग्रेस की कारी हार के बाद जब संजय गांधी की एक विमान दुर्घटना में मौत हो गई तो इंदिरा गांधी मेनका को लेकर बेहद चिंतित रहने लगी । उन्होंने अपनी दोस्त पुपुल जयकर से अपनी चिंता जताते हुए कहा भी था कि मेनका की मां की महात्वाकांक्षा उसको संजय की जगह लेने के लिए प्रेरित करेगी । इस सोच को बल मिला खुशवंत सिंह के एक लेख से जिसमें उन्होंने खुलेआम इस बात की वकालत की थी कि संजय की मौत के उनकी राजनीतिक वारिस मेनका हैं । खुशवंत सिंह ने यह भी लिखा कि मेनका संजय गांधी की तरह बहादुर हैं और दुर्गा की अवतार हैं । जाहिर है खुशवंत सिंह के इस लेख से इंदिरा गांधी आहत हुई क्योंकि बांग्लादेश युद्द में विजय के बाद इंदिरा गांधी की तुलना दुर्गा से होने लगी थी । खुशवंत की इस तुलना से इंदिरा गांधी के मन में इस बात का संदेह पैदा हो गया कि मेनका की रजामंदी के बाद ही खुशवंत ने वो लेख लिखा ।
उसके बाद संजय पर लिखी किताब को लेकर विवाद और बढ़ा । राजीव गांधी की राजनीति में आने पर मेनका की आपत्तियों से इंदिरा गांधी बेहद खफा रहने लगी । लेकिन जब सन उन्नीस सौ बयासी में मेनका ने इंदिरा गांधी के मना करने के बावजूद लखनऊ में लंबा चौड़ा भाषण दे डाला तो इंदिरा गांधी ने मेनका के खिलाफ निर्णय लेने का मन बना लिया । मेनका के लखनऊ से वापस लौटते ही गुस्से से भरी इंदिरा गांधी ने उसको तत्काल घर से बाहर निकल जाने का हुक्म सुना दिया । घर से बाहर निकालने के वक्त हुए हाई वोल्टेज ड्रामा पर भी मोरो ने विस्तार से लिखा है ।
ये सारी बातें लिखते हुए मोरो ने किताब में एक डिस्क्लेमर भी लगाया है - बातचीत, संवाद और स्थितियां लेखक के व्याख्या पर आधारित है और यह जरूरी नहीं है कि वो प्रामाणिक भी हो । लेकिन यहां एक बार फिर से सवाल खडा़ हो जाता है कि किसी भी जीवित वयक्ति की जीवनी को फिक्शनलाइज कैसे किया जा सकता है । क्या लेखकीय आजादी के नाम पर कुछ भी काल्पनिक लिखने की इजाजत किसी लेखक को दी जा सकती है । इन्हीं सवालों और कानूनी पचड़ों के बीच भारतीय पाठकों को इस किताब का बेसब्री से इंतजार है ।

Saturday, October 9, 2010

उदासीन हिंदी समाज

आज हिंदी आलोचना के शिखर पुरुष रामविलास शर्मा की जन्मतिथि है । सुबह दफ्तर पहुंचा तो अपने सहयोगी से पूछा कि आपको मालूम है कि आज रामविलास जी का जन्मदिन है तो उन्होंने सहज भाव से कहा कि क्या आज रामविलास पासवान का जन्मदिन है । मैं हतप्रभ रह गया और मुझसे कुछ कहते नहीं बना । हम अपने पूर्वज साहित्यकारों के प्रति इतने उदासीन क्यों है । क्यों नहीं हमारे जेहन में उनका नाम आता है । इस उदासीनता के लिए क्या हमारा हिंदी समाज जिम्मेदार है । या फिर हमारे साहित्यकार खुद जिम्मेदार हैं । इस विषय पर लिखने का मन बना रहा हूं । तबतक आप अपनी प्रतिक्रिया दें ।

Wednesday, October 6, 2010

मतभेद से मजबूत लोकतंत्र

हाल के दिनों में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने सरकार के कामकाज के तरीकों की आलोचना की है या यों कह सकते हैं कि कांग्रेस पार्टी ने सरकार की कई नीतियों पर सवाल खड़े किए हैं या कई मसलों पर पार्टी की राय सरकार से बिल्कुल अलग है । मनमोहन सिंह कहते हैं कि नक्सली इस देश के लिए सबसे बड़ा खतरा है और उनसे सख्ती से निबटने की जरूरत है । लेकिन पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी की राय उनसे इतर है । सोनिया गांधी किसी भी तरह की हिंसा के खिलाफ हैं लेकिन नक्सल समस्या को मानवीय ढंग से देखने और इसकी जड़ तक जाने की वकालत करती हैं । अपनी पार्टी के मुख पत्र कांग्रेस संदेश में सोनिया गांधी ने कहा कि नक्सल समस्या को विकास के आईने में देखने की जरूरत है । समाज के सबसे निचले तबके विकास योजनाओं का कर्यान्वयन नहीं होने से ये समस्या बढ़ी है । सोनिया गांधी ने इसे एक सामाजिक समस्या के तौर पर देखती हैं, जबकि उनकी ही सरकार के गृह मंत्री इसे कानून वयवस्था की समस्या मानते हैं और उससे उसी तरह से निबटने की रणनीति बनाते हैं । पार्टी महासचिव दिग्विजय सिंह ने भी इकनॉमिक टाइम्स में लेख लिखकर देश के गृह मंत्री की उनकी नक्सली समस्या से निबटने की नीति की आलोचना की थी । इन वाकयों से यह साफ-साफ झलकता है कि नक्सल मुद्दे पर पार्टी और सरकार में एक राय नहीं है । अभी उड़ीसा में वेदांता को बॉक्साइट खनन की मंजूरी नहीं दिए जाने के फैसले को भी इसी आलोक में देखा जाना चाहिए । कुछ दिनों पहले प्रधानमंत्री ने संपादकों के साथ अनौपचारिक बातचीत में कहा था कि विकास के हर काम में पर्यावरण का अड़ंगा नहीं लगाना चाहिए । मनमोहन सिंह देश में खुली अर्थवयवस्था के जनक और बाजार के पैरोकार माने जाते हैं । लेकिन बावजूद इसके वेदांता को पर्यावरण के नाम पर ही खनन की इजाजत नहीं दी गई । कुछ लोग इसका श्रेय राहुल गांधी को दे रहा हैं जो इस फैसले के पहले नियामगिरी जाकर वहां के आदिवासियों को इस बात का भरोसा दे चुके थे ।
इस तरह के वाकयों से पूरे देश में एक संकेत गया है कि सोनिया गांधी अब मनमोहन सिंह को पसंद नहीं करती हैं और दोनों के बीच मतभेद पैदा हो गए हैं । मीडिया में भी इस बात पर चर्चा शुरू हो गई कि मनमोहन सिंह की प्रधानमंत्री के रूप में उल्टी गिनती शुरू हो गई है । लेकिन इस मसले पर जल्दबाजी में किसी निर्णय पर पहुंचने के बजाए इसके निहितार्थ को समझने की जरूरत है । सरकार और सत्ताधारी पार्टी के बीच मतभेद होना लोकतंत्र के मजबूत होने की निशानी है। और पिछले एक दशक में हमारे राजनीतिक दलों में यह परिपक्वता आई है ।
अगर हम इतिहास पर नजर डालें तो पहले कांग्रेस में कम से कम इस तरह की परंपरा नहीं थी । जब जवाहरलाल नेहरू देश के प्रधाननमंत्री बने तो कुछ दिनों तक तो आजाद होने का रूमानी एहसास कायम था । बाद में नेहरू जी का कद इतना बड़ा हो गया था कि उनके सरकार की आलोचना उनकी आलोचना मान ली जाती थी । लेकिन जब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनी तो कई मसलों पर मतभिन्नता के चलते कांग्रेस में बंटवारा हुआ । पार्टी पर कब्जे की लड़ाई शुरू हुई जिसमें इंदिरा गांधी को उनकी राजनैतिक कौशल की वजह से जीत मिली । लेकिन जब इमरजेंसी के बाद 1977 में हुए आम चुनाव में कांग्रेस को करारी हार मिली । हताशा और निराशा में डूबी इंदिरा को पार्टी के तीन बड़े नेताओं- जगजीवन राम, हेमवतीनंदन बहुगुणा और नंदिनी सत्पथी ने छोड़ दिया । एक तो चुनाव में हार और फिर अपनों का साथ छोड़ना- इंदिरा गांधी सतर्क हो गई और 1978 में खुद पार्टी की कमान संभाल ली । उन्होंने यह पद 1980 में फिर से प्रधानमंत्री बनने के बाद भी नहीं छोड़ा । यहीं आकर पार्टी ही सरकार और सरकार ही पार्टी बन गई, सरकार से अलग पार्टी की कोई राय ही नहीं थी । इंदिरा गांधी ने प्रयासपूर्वक पार्टी को सरकार का पिछलग्गू बना दिया । नतीजा यह हुआ कि पार्टी सरकार की पिछलग्गू बनी और कैबिनेट प्रधानमंत्री की । अपनी मां के पद चिन्हों पर चलते हुए राजीव गांधी ने भी इस परंपरा को कायम रखा । उन्होंने भी प्रधानमंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष का पद अपने ही पास रखा । वो 1985 से 1991 तक कांग्रेस अध्यक्ष रहे । राजीव गांधी के बाद जब नरसिंह राव प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने भी पार्टी पर अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए अध्यक्ष का पद अपने ही पास रखा । नतीजा पार्टी सरकार की अनुगामी बनी रही ।
लेकिन बाद में जब एनडीए का शासन आया तो लगा कि यह परंपरा टूटने वाली है । अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने तो उस वक्त कुशाभाई ठाकरे बीजेपी के अध्यक्ष थे । कालांतर में भी बीजेपी के कई अध्यक्ष बदलते रहे लेकिन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने संगठन पर काबिज होने की कोशिश नहीं की । लेकिन नेहरू की ही तरह अटल बिहारी वाजपेयी का कद भी इतना बड़ा हो गया था कि वो पार्टी से उपर हो गए थे । उनकी सरकार के कामकाज की आलोचना भी अटल बिहारी की वयक्तिगत आलोचना मान ली जाती थी । जिस जिसने भी अटल जी के सरकार की नीतियों की आलोचना की वो संगठन में दरकिनार कर दिए गए चाहे वो गोविंदाचार्य हों या फिर कल्याण सिंह । ये दीगर बात है कि बाद में इन दोनों नेताओं ने अटल जी पर वयक्तिगत हमले किए। लेकिन अगर कुछ देर के लिए बीजेपी को छोड़ दिया जाए और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उससे जुड़े संगठनों की बात की जाए तो वहां सरकार की नीतियों की आलोचना होती थी या फिर ये संगठन सरकार से अलग राय जाहिर करते थे । एनडीए शासन काल में सरकार खुले बाजार और वैश्वीकरण के पक्ष में थी और सरकारी कंपनियों में कई डिसइंवेस्टमेंट हुए । तब संघ से जुड़े संगठन सरकारी कंपनियों में विनिवेश के फैसले की खुले आम आलोचना कर रहे थे । पार्टी से ही संबंद्ध उसके अनुषांगिक संगठन स्वदेशी जागरण मंच ने सरकार की खुले बाजार की नीति का सार्वजनिक तौर पर विरोध किया था । रामजन्मभूमि के मसले पर भी वीएचपी ने सरकार की नीतियों की खुलेआम आलोचना की थी । लेकिन बीजेपी में आतंरिक लोकतंत्र अपेक्षाकृत कम है । जसवंत सिंह को किताब लिखकर अपनी राय जाहिर करने पर पार्टी से निकाल दिया जाता है, आडवाणी को जिन्ना पर अपनी राय जाहिर करना भारी पड़ा था और उन्हें भी पार्टी अध्यक्ष पद से हटाया गया था ।
लेकिन जिस तरह से कांग्रेस में इन दिनों डेमोक्रेसी दिख रही है उसका श्रेय सोनिया गांधी की कार्यशैली को जाता है । दो हजार चार में जब यूपीए की सरकार बनी तो प्रधानमंत्री पद ठुकराने के बाद सोनिया ने पार्टी को सरकार से अलग पहचान देने की कोशिशें शुरू कर दी । कई मंत्रियों को शपथ लेने के बाद पार्टी का पद छोड़ना पड़ा । यूपीए -1 के वक्त यह काम थोड़ा धीमा अवस्य रहा लेकिन अब पार्टी में इंटरनल डेमोक्रेसी साफ तौर रेखांकित की जा सकती है । राहुल गांधी पार्टी में एक अलग सत्ता केंद्र हैं लेकिन वो भी अपनी राय खुलकर सामने रख रहे हैं और कई बार उनकी राय अपनी ही सरकार की नीतियों के खिलाफ दिखाई देती है । कश्मीर में जारी संकट के बीच उमर अब्दुल्ला को उन्होंने खुलेआम सपोर्ट किया लेकिन सोनिया गांधी की राय उस मसले पर अलग है । उसी तरह प्रणब मुखर्जी की नक्सलियों पर सोनिया गांधी से इतर राय है और वो इसे सार्वजनिक तौर पर उसे जाहिर भी कर चुके हैं । उपर से देखने पर तो यह लगता है कि देश में सबसे बड़ी पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र है जहां सबको अपनी राय खुलकर रखने की आजादी है जो दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के मेच्योर होने की निशानी है ।

Saturday, October 2, 2010

पुरस्कारों का ‘खेल’

अभी कुछ अरसा पहले डाक से एक बेहद दिलचस्प पत्र प्राप्त हुआ । मध्य प्रदेश से लिखा गया यह खत एक परिपत्र की शक्ल में था, जो एक साथ तकरीबन कई लेखकों-पत्रकारों को भेजा गया प्रतीत होता है । दिलचस्प इसलिए था कि उसमें इस बात का प्रस्ताव दिया गया था कि अगर आप अमुक पुरस्कार पाना चाहते हैं तो सौ रुपये के डिमांड ड्राफ्ट और अपनी किताब की दो प्रतियों के साथ प्रविष्टि भेजें । इस मनोरंजक पत्र को पढ़ने के बाद मुझे लगा कि किसी ने मजाक किया है लेकिन चंद दिनों पहले जब मैंने अमुक पुरस्कार के ऐलान की खबर की पढ़ी तो मुझे लगा कि वह खत तो गंभीरता पूर्वक लिखा गया था । जिन लेखक महोदय को उक्त पुरस्कार देने का ऐलान किया गया है उन्होंने अवश्य ही सौ रुपये के डिमांड ड्राफ्ट के साथ पुरस्कार के लिए आवेदन किया होगा । तो हिंदी के लेखकों में पुरस्कार लोलुपता इतनी बढ़ गई है कि वो पुरस्कार पाने के लिए आवेदन करने लगे हैं । अब तक तो पुरस्कार के लिए घेरेबंदी की खबरें ही सामने आती रही थी लेकिन आवेदन कर पुरस्कार मेरे लिए चैंकानेवाली खबर थी ।
दरअसल हाल के दिनों में हिंदी में दिए जाने वाले पुरस्कारों की विश्वसनीयता और साख बेहद कम हुई है । कुछ अरसा पहले साहित्य अकादमी और ज्ञानपीठ पुरस्कार हिंदी में सबसे ज्यादा प्रतिष्ठित पुरस्कार थे । ज्ञानपीठ की प्रतिष्ठा और साख तो अब भी कायम है लेकिन साहित्य अकादमी पुरस्कारों की साख पर पिछले कई वर्षों में अनेकों बार बट्टा लगा है । इसके लिए हिंदी के वो प्रगतिशील शिखर लेखक-आलोचक कम जिम्मेदार नहीं हैं जो कई वर्षों तक साहित्य अकादमी के कर्ता-धर्ता रहे । बाद में जब साहित्य अकादमी में सत्ता परिवर्तन हुआ तो हिंदी के संयोजक ने समर्थन देने के एवज में सौदेबाजी कर अपने चहेते लेखक को पुरस्कार दिलवाया । उनके बाद जो आलोचक महोदय हिंदी के संयोजक बने उन्होंने भी उस परंपरा को कायम रखा । साहित्य अकादमी के इस सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार का खेल उसके ऐलान होने के काफी पहले ही शुरु हो जाता है । प्रक्रिया के मुताबिक अकादमी, जिस वर्ष पुरस्कार दिए जाने हैं उसके पहले के एक वर्ष को छोड़कर, तीन वर्षों की अवधि में प्रकाशित कृतियों की एक आधार सूची बनाती है । यानि इस वर्ष दिए जानेवाले पुरस्कार के लिए दो हजार नौ से दो हजार सात के बीच प्रकाशित कृतियों पर विचार किया जाएगा । इस अवधि में प्रकाशित कृतियों की एक आधार सूची को हिंदी के एडवायजरी बोर्ड के सदस्यों को भेजी जाती है और उनसे सूची में से तीन किताबों का चयन कर सुझाव देने का अनुरोध किया जाता है । लेकिन यहां सिर्फ तीन कृतियों की सिफारिश की कोई पाबंदी नहीं है, बोर्ड सदस्य अगर चाहें तो तीन से ज्यादा कृतियों की भी सिफारिश कर सकते हैं । जब सदस्यों की सिफारिश अकादमी को प्राप्त हो जाती है तो उसके बाद हर विधा के लिए अलग अलग सूची बनाई जाती है । मोटे तौर पर एडवायजरी बोर्ड के सदस्यों की राय के आधार पर हर विधा की तीन तीन किताबों का चयन किया जाता है । इन्हीं तीन किताबों में से जूरी एक कृति को चुनती है जिसको पुरस्कृत किया जाता है ।
लेकिन यह प्रक्रिया उपर से देखने में जितनी दोष-रहित लगती है व्यवहार में उतनी ही दोषपूर्ण है । किताबों की आधार सूची से लेकर जूरी के चयन तक में तिकड़मों का बड़ा खेल खेला जाता है ।अपनी किताब को आधार सूची में डलवाने से लेकर ही यह खेल शुरु हो जाता है जिसके लिए तमाम तरह के दंद-फंद किए जाते हैं । जब एक बार आधार सूची में नाम आ जाता है तो उसके बाद अपनी लेखनी से क्रांति का दावा करनेवाले ये तथाकथित प्रतिशील लेखक एडवायजरी बोर्ड के सदस्यों के पास से अपना नाम भिजवाने की जुगत में लग जाते हैं । येन केन प्रकारेण बोर्ड के सदस्य से अपना नाम प्रस्तावित करवाने के लिए सम्मानित लेककगण एड़ी चोटी का जोड़ लगा देते हैं । फिर घेरेबंदी शुरु होती है जूरी के सदस्यों के चयन की । जूरी में तीन सदस्य होते हैं जिनका चुनाव साहित्य अकादमी का अध्यक्ष करता है । इसलिए पुरस्कार के लिए लालायित तमाम तिकड़मी लेखक अध्यक्ष के पास अपनी गोटी फिट करने में लग जाते हैं, उनकी गणेय़ परिक्रमा शुरू हो जाती है । पुरस्कार के लिए किताबों के अंतिम चयन के लिए जूरी की जो बैठक होती है उसमें भाषा के संयोजक की कोई भूमिका नहीं होती वो सिर्फ बैठक का संयोजन और शुरुआत भर करते हैं । हलांकि उर्दू के एक आलोचक के अकादमी अध्यक्ष बनने के पहले जब हिंदी आलोचना के शिखर पुरुष हिंदी के संयोजक हुआ करते थे तब ये स्थिति नहीं थी । तब उनकी मर्जी चला करती थी । नियमों को दरकिनार करते हुए वो जिसे चाहते उसे पुरस्कार दिला देते थे । लेकिन अकादमी के चुनाव में जब उस गुट का सफाया हो गया उसके बाद से स्थिति पूरी तरह बदल गई । पहले भाषा के संयोजक की मर्जी चला करती थी अब अध्यक्ष की चलने लगी । भाषा संयोजक अकादमी के संविधान के तहत बैठक की सिर्फ प्रोसिंडिंग शुरु करते हैं । लेकिन एक बार फिर से अध्यक्ष बदले तो स्थितियां बदल गई । अब हिंदी के लिए पूर्व अध्यक्ष और भाषा संयोजक की राय हावी होने लगी ।
पुरस्कार के निर्णय के लिए जब अंतिम बैठक होती है तो जूरी के सदस्य अलग अलग कृतियों पर विचार करते हैं और फिर या तो सर्वसम्मति से या बहुमत के आधार पर फैसला लेते हैं । ऐसा कम ही देखने में आया है कि सर्वसम्मति से किसी कृति को पुरस्कृत किया गया हो । ज्यादातर फैसले बहुमत यानि दो –एक से होते है । इससे एक तो ये लगता है कि जूरी में कृति की गुणवत्ता को लेकर जोरदार बहस हुई और लोकतांत्रिक तरीके से फैसला हुआ । लेकिन होता ये सिर्फ दिखावा है । जब जूरी के तीन सदस्यों का चुनाव किया जाता है तभी ये तय कर लिया जाता है कि दो सदस्य अध्यक्ष की मनमाफिक काम करनेवाले हों और तीसरा घोर विरोधी । इससे होता ये है कि कमिटी के गठन पर कोई विवाद नहीं हो पाता है और सारा काम पूर्व निर्धारित रणनीति के हिसाब से हो जाता है । जूरी के फैसले के बाद उसे एक्जीक्यूटिव कमिटी की स्वीकृति के लिए भेजा जाता है और वहां से स्वीकृति मिलने के बाद अंतिम मुहर अध्यक्ष लगाते हैं ।
राज्यों की हिंदी अकादमियों में तो पुरस्कारों की स्थिति और भी खराब है। सारा कुछ सेटिंग-गेटिंग के सिद्धांत पर चलता है । अभी कुछ दिनों पहले दिल्ली की हिंदी अकादमी के पुरस्कारों को लेकर अच्छा खासा विवाद भी हुआ था । दिल्ली की हिंदी अकादमी हिंदी के लेखकों को हर साल पुरस्कृत करती है । इसके लिए वो अखबारों में विज्ञापन देकर शहर के नामचीन लोगों और लेखकों की राय आमंत्रित करती है । उसके बाद कार्यकारिणी की बैठक में पुरस्कार का फैसला होता है । इन पुरस्कारों में कार्यकारिणी के सदस्य जिसे चाहते हैं उसको पुरस्कृत कर देते हैं । कई बार तो कार्यकारिणी के सदस्यों ने खुद को पुरस्कृत कर लिया, भले ही उसके पहले उनको कार्यकारिणी से इस्तीफा देना पड़ा । हलांकि अकादमी के सबसे बड़े पुरस्कार श्लाका सम्मान को लेकर बड़ा विवाद कभी नहीं हुआ लेकिन साहित्यकार सम्मान और अन्य पुरस्कारों के चयन पर कई बार उंगलियां उठी । दिल्ली की हिंदी अकादमी के अलावा बिहार राष्ट्रभाषा परिषद और बिहार का राजभाषा विभाग भी थोक में हिंदी के लेखकों को पुरस्कृत करती है । बिहार सरकार के राजभाषा विभाग के पुरस्कारों को नियमविरुद्ध प्रसातावित करने के लिए पिछले वर्ष रद्द करना पड़ा । चयन समिति के सदस्य हिंदी के वरिष्ठ आलोचक ने अपने कहानीकार अनुज का नाम प्रस्तावित कर दिया लेकिन वहां नियम है कि चयनकर्ता को यह लिखकर देना होता है कि पुरस्कृत लेखकों में कोई उनका संबंधी नहीं है । इसी नियम ने भाइयों का खेल बिगाड़ दिया और छोटे भाई पुरस्कार से वंचित रह गए ।
ये चंद उदाहरण हैं हिंदी साहित्य के, जो ये दर्शाते हैं कि हिंदी में पुरस्कारों के लेकर लेखक कितने बेचैन हैं और उन्हें हथियाने के लिए तमाम तरह के हथकंडों का इस्तेमाल करने से भी उन्हें गुरेज नहीं । पहले मीडिया का इतना फैलाव नहीं था और उस तरह के षडयंत्र सामने नहीं आ पाते थे लेकिन मीडिया के विस्तार के बाद इस तरह की तमाम खबरें सामने आने लगी । इन खबरों के प्रकाशन के बाद हिंदी के पाठकों के मन में अपने आदर्शवादी लेखकों को लेकर एक खास तरह की दुविधा पैदा होने लगी । लिखते कुछ और आचरण कुछ की दुविधा ने पाठकों के मानस पर हिंदी लेखकों की छवि पर प्रहार कर उसे खंडित किया । जब साख पर बट्टा लगता है और विश्वसनीयता संदिग्ध होती है तो स्थिति बेहद चिंतनीय हो जाती है । हिंदी के वरिष्ठ लेखकों को यह समझना होगा कि कुछ लेखकों की वजह से हिंदी लेखक समाज की साख पर बट्टा लग रहा है । अगर इसे समय रहते ठीक नहीं किया गया तो एक समय ऐसा भी आ सकता है जब हिंदी के पाठक अपने ही लेखकों को रिजेक्ट करना शुरू कर दें । वह स्थिति पूरे हिंदी लेखक समाज के लिए बेहद खराब होगी । पुरस्कारों के पीछे भागने की लेखकों की जो ललक है वो सिर्फ इस वजह से है कि उन्हें जल्दी प्रसिद्धि मिले और वो मशहूर हो जाएं वो यह भूल जाते हैं कि यह प्रसिद्धि तात्कालिक होती है । तभी तो अज्ञेय जी ने कहा था कि अगर किसी लेखक को माराना हो तो उसे पुरस्कृत कर दो । अज्ञेय जी की यह बात बाद में साबित भी हुई ।
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Monday, September 27, 2010

बाजार को भुनाने की चाहत

पिछले लगभग एक दशक के प्रकाशनों पर नजर डालें तो हम पाते हैं कि कई वरिष्ठ पत्रकारों/संपादकों की मीडिया और उससे जुड़ें विषयों पर किताबें प्रकाशित हुई हैं । इन पुस्तकों में जो समानता दिखाई देती है वो यह है कि पत्रकारों, संपदकों ने पूर्व में लिखे लेखों को संयोजित कर एक थीम, आकर्षक शीर्षक और चर्चित समकालीन वरिष्ठ पत्रकार की गंभीर भूमिका के साथ पुस्तकाकार छपवाया है । मेरे जानते इसकी शुरुआत उदयन शर्मा के लेखों के संग्रह के प्रकाशित होने के साथ हुई थी । उसके बाद आलोक मेहता और मधुसूदन आनंद के प्रयासों राजेन्द्र माथुर के लेखों का संग्रह सपनों में बनता देश छपा था। ये दोनों प्रयास अपने वरिष्ठों के निधन के बाद उनके लेखन से अगली पीढ़ी को परिचित करवाने की एक ईमानदार कोशिश थी । लेकिन बाद में कई वरिष्ठ पत्रकारों के लेखों के संग्रह प्रकाशित होने शुरी हुए । दो हजार तीन में प्रभाष जोशी के लेखों का संग्रह हिंदू होने का धर्म छपा, जिसमें उन्होंने लगभग पचास पन्नों की लंबी भूमिका लिखी । लगभग उसी वक्त अरविंद मोहन की किताब मीडिया की खबर प्रकाशित हुई थी । दो हजार आठ में एक बार फिर से प्रभाष जोशी के अखबारी लेखों के चार संकलन एक साथ प्रकाशित हुए । सिर्फ प्रभाष जोशी या अरविंद मोहन ही इस सूची में नहीं है । कई वरिष्ठ लेखकों ने इस तरह की किताबें छपवाई हैं । जब ये किताबें छप कर बाजार में आ रही थी तो वो दौर मीडिया के विस्तार का दौर था और अखबारों और न्यूज चैनलों के विस्तार की वजह से पत्रकारिता पढ़ाने के संस्थान धड़ाधड़ खुल रहे थे, जिसमें पढ़नेवाले छात्रों की संख्या बहुत ज्यादा थी । यह महज एक संयोग था या फिर बाजार को ध्यान में रखकर ऐसा हो रहा था इसका निर्णय होना अभी शेष है । लेकिन जिस तरह से पूर्व प्रकाशित अखबारी लेखों का संकलन पत्रकारिता को ध्यान में रखकर किया गया या जा रहा है उससे यह तो साफ प्रतीत होता ही है कि यह बाजार को भुनाने की या फिर बाजार से अपना हिस्सा लेने की कोशिश है ।
अब इस कड़ी में प्रिंट और टीवी में काम कर चुके पत्रकार प्रभात शुंगलू की किताब - यहां मुखौटे बिकते हैं प्रकाशित हुई है । इस किताब का ब्लर्ब राजदीप सरदेसाई ने लिखा है । राजदीप के मुताबिक प्रभात अलग अलग विषयों पर लिखते हैं । चाहे वो धारा 377 हो या फिर एमएफ हुसैन लेकिन इन सबके बीच प्रभात के लेखन में एक बात समान है - वह है भारत के संविधान में मौजूद उदारवादी मूल्यों में उनकी अटल प्रतिबद्धता । राजदीप के अलावा प्रभात ने अपने पत्रकार बनने और टीवी में आने के बाद फिर से लिखना शुरू करने की दिलचस्प दास्तां लिखी है । प्रभात के लेखन में अंग्रेजी के शब्द बहुतायत में आते हैं और लेखक के मुताबिक वो आम बोलचाल की भाषा है । इसके लिए उनके अपने तर्क भी हैं और तथ्य भी । पर मेरा मानना है कि दूसरी भाषा के शब्दों से परहेज ना करें लेकिन अगर आप हिंदी में लिख रहे हैं और वहां दूसरी भाषा से बेहतर और आसान शब्द मौजूद हैं तो फिर आम बोलचाल के नाम पर दुराग्रह उचित नहीं है । लेकिन प्रबात के लेखों में यह चीज एक जिद की तरह आती है गोया वो कोई नया प्रयोग कर रहे हैं या कोई नई भाषा गढ़ रहे हैं ।
इस किताब में तीन अलग अलग खंड हैं- सियासत, शख्सियत और समाज । इन तीन खानों में प्रभात ने अपने लेखों का बांटा है । प्रभात की एक खासियत है कि वो गंभीर विषयों पर भी व्यंग्यात्मक शैली में अपनी कलम चलाते हैं । चाहे वो कौन बनेगा वीक प्रधानमंत्री हो या फिर यहां मुखौटे बिकते हैं या फिर पांडु ब्रदर्स एंड सन्स हो या फिर हुसैन,तुम माफी मत मांगना हर जगह एक तंज नजर आता है जिसे प्रभात की शैली के तौर पर रेखांकित किया जा सकता है । कौन बनेगा वीक प्रधानमंत्री में आडवाणी पर तंज कसते हुए प्रभात कहते हैं- एक पल के लिए अगर मान भी लें कि आप प्रधानमंत्री बन भी जाते हैं तो क्या आज शपथ लेकर कह पाएंगे कि सत्ता का कंट्रोल और रिमोट कंट्रोल दोनों आपके हाथ में होगा - राजनाथ, जेटली नरेन्द्र मोदी और वरुण गांधी के हाथ में नहीं । मोहन भागवत के हाथ में नहीं । प्रमोद मुथल्लिक के हाथ में नहीं । वहीं पांडु ब्रदर्स एंड सन्स में प्रभात गठजोड़ की राजनीति पर व्यंग्यात्मक शैली में लिखते हैं- अजित सिंह ने फिर बीजेपी का दामन थामा है । कैलकुलेशन किया 4 सीटें भी जीती दो मिनिस्टर बर्थ पक्की । एक अपनी और एक अनु की । गडकरी के बीजेपी अध्यक्ष का पद संभालने के बाद अपने लेख कुहासे में नेतृत्व में प्रभात लिखते हैं - पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद भी गडकरी का नागपुर प्रेम कुलांचे मारता नजर आया । आगे लिखते हैं कि गडकरी पांव छूने को चाटुकारिता मानते हैं लेकिन अद्यक्ष बनने के बाद राजनाथ, आडवाणी सुषमा के पांव छूकर आशीर्वाद लिया वो शीर्ष नेताओं के प्रति उनकी श्रद्धा थी । अब गड़करी हनुमान होते तो अपना सीना चीरकर दिखला देते ।
प्रभात शुंगलू की इस किताब में चूंकि अखबारी लेखों के संग्रह हैं इसलिए कई बातें संपूर्णता में नहीं आ पाई । कई लेख विस्तार की मांग करते हैं जैसे करगिल से जुड़े प्रभात के लेखों में एक अलग किताब की गुंजाइश नजर आती है । प्रभात शुंगलू करगिल युद्ध को कवर करनेवाले गिने चुने पत्रकारों में एक हैं, उन्हें उस दौर के अपने अनुभवों पर गंभीरता पूर्वक विस्तार से लिखना चाहिए ताकि एक स्थायी महत्व की किताब सामने आए, जल्दबाजी में करगिल पर अखबार के स्पेस के हिसाब से लिखकर और फिर उसे अपनी किताब में छपवाकर प्रबात ने अपरिपक्वता का परिचय दिया है । यहां मुखौटे बिकते हैं प्रभात शुंगलू की पहली किताब है और पहली बार किताब छपने के उत्साह में कई हल्की चीजें भी चली गई हैं, जिनका कोई स्थायी महत्व नहीं है, जैसे मुंबई की अस्मिता से खिलवाड़ जैसे लेखों का स्थायी महत्व नहीं हो सकता है । इस किताब का सिर्फ इतना महत्व है दो हजार नौ के शुरुआत से लेकर लगभग सवा साल की महत्वपूर्ण घटनाएं और इसपर लेखक का नजरिया आपको एक जगह मिल जाएगा । प्रभात की यह किताब इस बात का संकेत जरूर देती है कि अगर वो गंभीरता से विषय विशेष पर और उसके हर पहलू पर विस्तार से लिखें तो गंभीर किताब बन सकती है ।

Thursday, September 23, 2010

संवैधानिक संस्था की साख पर बट्टा

एक बार फिर देश में एक संवैधानिक पद पर हुई नियुक्ति विवादों के घेरे में आ गई है । मुख्य सतर्कता आयुक्त के पद पर भारत सरकार के दूरसंचार सचिव की नियुक्ति लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज के विरोध को दरकिनार करते हुए कर दी गई । मुख्य सतर्कता आयुक्त का चुनाव प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय कमिटी करती है जिसमें प्रधानमंत्री के अलावा गृह मंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता होते हैं । अब तक परंपरा यह रही है कि आम सहमति के आधार पर ही मुख्य सतर्कता आयुक्त का चयन होता है लेकिन इस बार लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज की आपत्तियों को धता बताते हुए दूरसंचार सचिव पी जे थॉमस के नाम पर मुहर लगा दी गई । आम सहमति की परंपरा इसलिए बनाई गई थी ताकि इस संवैधानिक संस्था में शासक दल और विपक्षी दल दोनों का विश्वास बना रहे । उसकी जांच पर किसी तरह का सवाल ना उठे और विपक्षी दल भी सीवीसी की जांच पर पक्षपात का आरोप ना लगा सकें, इसलिए जब इस संस्था का गठन किया गया था तो यह तय किया गया था कि सीवीसी के चयन में नेता प्रतिपक्ष की राय को अहमियत दी जाएगी । लेकिन यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि प्रधानमंत्री की मौजूदगी वाली इस समिति ने मान्य परंपरा का ध्यान नहीं रखा ।
पी जे थॉमस के मुख्य सतर्कता आयुक्त बनने के बाद यह सवाल सुरसा की तरह मंह बाए खड़ा हो गया है टू जी स्पेक्ट्रम आवंटन के घोटाले की जांच वो वयक्ति कैसे कर सकता है जो इस पद पर आने के पहले खुद दूरसंचार सचिव रहा हो । यह भी तथ्य है कि टू जी स्पेक्ट्रम का आवंटन थॉमस के मंत्रालय में आने के पहले हो चुका था लेकिन साथ ही दूसरा तथ्य यह भी है कि बीते अगस्त में जब जब पी जे थॉमस दूरसंचार सचिव थे तो उस वक्त मंत्रालय ने एक नोट तैयार किया था जिसमें यह कहा गया था कि स्पेक्ट्रम आवंटन नीतिगत मामला है और इसमें जिसमें सीवीसी या सीएजी की जांच की कोई भूमिका बनती नहीं है । इस नोट के अलावा भी दूरसंचार मंत्रालय के सचिव होने के नाते थॉमस कई बार इस तरह के किसी घोटाले से इंकार करते हुए बेहद मजबूती से अपने मंत्रालय का बचाव भी करते रहे हैं । अब जब वही पी जे थॉमस देश के मुख्य सतर्कता आयुक्त बन गए हैं तो क्या यह मान लिया जाए कि टू जी स्पेक्ट्रम आवंटन घोटाले की जांच सीवीसी नहीं करेगी और आवंटन का सच हमेशा के लिए दफन हो जाएगा ।
दूसरी अहम बात जिसको लेकर पी जी थॉमस की नियुक्ति पर विवाद है वो है उनका दागदार दामन । उन्नीस सौ तिहत्तर बैच के भारतीय प्रशासनिक सेवा के अफसर थॉमस का करियर कई बार विवादों में रहा है । थॉमस जब केरल में खाद्य और आपूर्ति विभाग के सचिव हुआ करते थे तो उस वक्त ही मलेशिया से पॉम आयल के आयात को लेकर घपला हुआ था जिसने सुदूर दक्षिण के इस राज्य की राजनीति में भूचाल ला दिया था । उस घोटाले के छींटे थॉमस के दामन पर भी पड़े थे । तब जोर-शोर से यह मांग उठी थी कि खाद्य सचिव होने के नाते पी जे थॉमस की भूमिका की जांच की जाए लेकिन केंद्र सरकार के इजाजत नहीं मिलने से जांच नहीं हो पाई थी । पॉम ऑयल घोटाले का जिन्न एक बार तब फिर बाहर निकला था जब थॉमस को सूबे का मुख्य सचिव बनाने की बात चली थी । शुरुआत में राज्य सरकार ने थोड़ी हिचक जरूर दिखाई थी लेकिन बाद में उनको केरल का मुख्य सचिव बना दिया गया था । इस तरह के अफसर जिनपर कई तरह के आरोप लगे हों और जिनका करियर बेदाग नहीं रहा हो उनको मुख्य सतर्कता आयुक्त बनाने के लिए एक मान्य परंपरा को तोड़ने की क्या आवश्यकता थी । विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने नियुक्ति के पहले की बैठक में इन बातों को लेकर अपनी आपत्ति दर्ज करवा दी थी लेकिन ना तो प्रधानमंत्री ने और ना ही गृह मंत्री ने नेता विपक्ष की राय को तवज्जो दी । सीवीसी के पैनल में दो और अपेक्षाकृत बेहतर नाम थे जिनकी उम्मीदवारी को दरकिनार कर थॉमस के नाम को स्वीकृति दी गई । सवाल यह उठता है कि सरकार थॉमस को लेकर इतना आग्रही क्यों थी । क्या यहां भी मनमोहन सिंह के सामने गठबंधन सरकार की मजबूरी थी । क्या यहां भी दूरसंचार मंत्री ए राजा या फिर उनकी पार्टी के सुप्रीमो करुणानिधि की सिफारिश थी जिसे ठुकराना मनमोहन सिंह के लिए मुश्किल था क्योंकि करुणानिधि की पार्टी के सांसदों के बल पर यूपीए-2 की बुनियाद टिकी है ।
इन सबसे इतर जो एक बड़ा सवाल है वो यह कि इस संवैधानिक संस्था में अब विपक्षी दलों का कितना विश्वास रह जाएगा । जिसके मुखिया का दामन ही दागदार हो और प्रमुख विपक्षी दल उनपर आरोपों की झड़ी लगा रहे हों उनकी जांच पर वो कैसे भरोसा करेगी । होना तो यह चाहिए था कि सरकार एक ऐसे वयक्ति को इस पद पर नियुक्त करती जिनका करियर बेदाग होता और उसकी छवि ऐसी होती जिसपर सहज किसी को भी भरोसा हो सकता था । अगर देश के मुख्य सतर्कता आयुक्त की विश्वसनीयता पर जरा भी सवाल खड़ा होता है तो वो इस संवैधानिक संस्था को ना केवल कमजोर करता है बल्कि लोगों का भरोसा भी खत्म करता है । इस मामले में यही हुआ है जिससे मनमोहन सरकार की छवि को तो धक्का लगा ही है इस संवैधानिक संस्था की साख पर भी बट्टा लगा है ।

Monday, September 13, 2010

पाठकों से छल करते कहानीकार

चंद दिनों पहले की बात है मेरी पत्नी किताबों की दुकान से चित्रा मुदगल की किताब- गेंद और अन्य कहानियां खरीद लाई । इस संग्रह के उपर दो मासूम बच्चों की तस्वीर छपी है और नीचे लिखा है बच्चों पर केंद्रित कहानियों का अनूठा संकलन । मुझे भी लगा कि पेंग्विन से चित्रा जी कहानियों का नया संग्रह आया है । लेकिन जब मैंने उसे उलटा पुलटा तो लगा कि उसमें तो चित्रा जी की पुरानी कहानियां छपी हैं । उसके बाद जब मैंने अपनी वयक्तिगत लाइब्रेरी को खंगालना शुरू किया तो पता चला कि चित्रा मुदगल के पांच कहानी संकलन मेरे पास हैं । भूख जो ज्ञानगंगा, दिल्ली से प्रकाशित हुई है, दस प्रतिनिधि कहानियां जो किताबघर प्रकाशन से प्रकाशित हुई हैं, चर्चित कहानियां जो सामयिक प्रकाशन से प्रकाशित हुई हैं, इसके अलावा डायमंड बुक्स से प्रकाशित संग्रह भी मेरी नजर से गुजर चुका है । और अंत में सामयिक प्रकाशन ने ही चित्रा मुदगल की संपूर्ण कहानियों का संग्रह आदि-अनादि के नाम से तीन खंडों में छापा है । इन सारे संग्रहों में घूम फिर कर वही-वही कहानियां प्रकाशित हैं । हिंदी साहित्य में यह काम सिर्फ चित्रा मुदगल ने नहीं किया है । ज्यादातर कहानीकारों ने साहित्य में ये घपला किया है । हिंदी साहित्य को लंबे समय से नजदीक से देखनेवालों का कहना है कि हिंदी में ये खेल हिमांशु जोशी ने शुरू किया । जानकारों की मानें तो इस प्रवृत्ति के प्रणेता हिमांशु जोशी ही हैं । कहनेवाले तो यहां तक कहते हैं कि जोशी जी की उतनी कहानियां नहीं हैं जितने उनके संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं । कहीं से चर्चित कहानियां, कहीं से प्रतिनिधि कहानियां, कहीं से फलां तथा अन्य कहानियां, कहीं से प्रेम कहानियां, कहीं से बच्चों की कहानियां, कहीं से अमुक वयक्ति की पसंद की कहानियां । हद तो तब हो गई जब कहानीकार अपनी उम्र और सालगिरह के हिसाब से संग्रह छपवाने लगे । ऐसा नहीं है कि सिर्फ हिमांशु जोशी और चित्रा मुदगल ने ही यह काम किया है । हिंदी के कमोबेश सभी कहानीकारों ने इस तरह से पाठकों को छला है । वरिष्ठ कहानीकार गंगा प्रसाद विमल के भी कई संग्रह हैं जिनमें कहानियों का दुहराव है । चंद लोगों के नाम लेने का मकसद सिर्फ इतना है कि मेरी बातें हवाई ना लगे और वो तथ्यों पर आदारित हों ।
दरअसल इस पूरे खेल का मकसद सिर्फ और सिर्फ पैसा कमाना है। पैसा कमाने की इस दौड़ में हिंदी के कहानीकार यह भूल जा रहे हैं कि वो पाठकों के साथ कितना बड़ा छल कर रहे हैं । चमचमाते कवर और नए शीर्षक को देखकर कोई भी पाठक अपने महबूब लेखक- लेखिका की किताबें खरीदे लेता है । लेकिन जब वो घर आकर उसे पलटता है तो अपने को ठगा महसूस करने के अलावा उसके पास कोई चारा नहीं बचता है । पैसे की हानि के साथ साथ टूटता-दरकता है उसका विश्वास । वो विश्वास जो एक पाठक अपने प्रिय लेखक पर करता है । पाठकों के इसी विश्वास की बनियाद साहित्य की सबसे बड़ी ताकत है और जब उसमें ही दरार पड़ती है तो यह सीधे-सीधे साहित्य का नुकसान है जो फौरी तौर पर तो नजर नहीं आएगा लेकिन इसके दूरगामी परिणाम होंगे । जल्दी पैसे कमाने की होड़ में हिंदी का कहानीकार यह भूल जा रहा है कि अगर उसने यह प्रवृत्ति नहीं छोड़ी तो उसको पाठक मिलने बंद हो जाएंगे । अभी ही वो पाठकों की कमी का रोना रोते हैं लेकिन एक अगर एक बार पाठकों का भरोसा लेखकों से उठ गया तो क्या अंजाम होगा इसकी सिर्फ कल्पना की जा सकती है ।
यह घपला सिर्फ इस रूप में नहीं आया है । हिंदी में कई ऐसे कहानीकार हैं जिनकी लंबी कहानी किसी पत्रिका में छपी फिर उसी लंबी कहानी को उपन्यास के रूप में प्रकाशित करवा लिया गया । वर्तमान साहित्य के कहानी महाविशेषांक में हिंदी की बेहद समादृत और वरिष्ठ लेखिका कृष्णा सोबती की लंबी कहानी ऐ लड़की प्रकाशित हुई थी । जिसे बाद में स्वतंत्र रूप से उपन्यास के रूप में छापा-छपवाया गया । इसी तरह से दूधनाथ सिंह की लंबी कहानी नमो अंधकारम भी पहले तो कहानी के रूप में प्रकाशित-प्रचारित हुई लेकिन कालांतर में वो एक उपन्यास के रूप में छपा । यही काम हिंदी के जादुई यथार्थवादी कहानीकार भी कर चुके हैं जिन्होंने हंस में प्रकाशित अपनी लंबी कहानियों को डबल स्पेस में टाइप करवाकर उपन्यास बना दिया । एक ही रचना कहानी भी है और वही रचना उपन्यास भी एक ही समय पर यह कैसे संभव है लेकिन हिंदी में ऐसा धड़ल्ले से हुआ है । यह पाठकों के साथ छल नहीं तो क्या है । अपने फायदे के लिए पाठकों को ठगना कितना अनैतिक है इसका फैसला तो भविष्य में होगा ।
बाजारवाद और बाजार को पानी पी पी कर सोते जागते गरियानेवाले हिंदी के इन लेखकों से यह पूछा जाना चाहिए कि वो बाजार की ताकतों के हाथ क्यों खेल रहे हैं । क्या व्यक्तिगत फायदे के लिए बाजार की शक्तियों के आगे घुटने टेक देने में उन्हें कोई गुरेज नहीं है । सारे सिद्धांत और सारे वाद क्या सिर्फ कागजों में या उनके आग उगलते भाषणों में ही नजर आएंगे या फिर सारी क्रांति पड़ोसी के घर से शुरू होंगी । हिंदी में बार-बार नैतिकता की बात उठाने वाले लेखकों-आलोचकों की इस मसले पर चुप्पी हैरान करनेवाली है । पिछले लगभग दो तीन दशक से कहानीकारों का पाठकों के साथ यह धोखा जारी है लेकिन कहीं किसी कोने से कोई आवाज नहीं उठी । किसी लेखक ने इस प्रवृत्ति पर आपत्ति नहीं उठाई । प्रगतिशीलता और साहित्यक शुचिता की बात करनेवाले वामपंथी लेखकों को भी कहानीकारों का यह छल नजर नहीं आया बल्कि वो तो खुले तौर पर इस खेल में शामिल नजर आते हैं । मार्क्सवाद को अपने कंधे पर ढोनेवाले मार्क्सवादी लेखकों-आलोचकों को यह धोखा नजर नहीं आया या नजर आने के बावजूद आंखें मूंदे बैठे रहे । लेखक संगठनों तक ने इस धोखेबाजी पर कुछ ना बोलना ही उचित समझा । उनसे कोई उम्मीद भी नहीं की जा सकती है क्योंकि लेखक संगठन लगभग मृतप्राय हैं और जो बचे हैं वो भी क्षेत्रीय राजनीतिक दलों की तरह अपने नेताओं के जेबी संगठन मात्र बनकर रह गए हैं ।
कुछ कहानीकारों का यह तर्क है कि अलग-अलग प्रकाशकों से अलग-अलग नामों से कहानी संग्रह छपवाने का मूल मकसद वृहत्तर पाठक समुदाय तक पहुंचना है । अपने इस कृत्य के तर्क में कई कहानीकार यह भी कहते हैं कि एक प्रकाशन से संस्करण खत्म होने के बाद ही वो दूसरे प्रकाशक के यहां से अपनी कहानियां छपवाते हैं । लेकिन यह दोनों तर्क एक सफेद झूठ की तरह है । कई संकलन मेरे सामने रखे हैं जिनका प्रकाशन वर्ष या तो एक ही वर्ष में है या फिर अगले वर्ष । हिंदी प्रकाशन जगत को नजदीक से जानने वालों का मानना है कि अभी हिंदी में यह स्थिति नहीं आई है कि किसी कहानी संग्रह का एक संस्करण छह माह में या एक साल में खत्म हो जाए । इसके पीछे चाहे संग्रह के कम खरीदार हों या फिर प्रकाशकों का घपला । जहां तक वृहत्तर पाठक समुदाय तक पहुंचने की बात है तो यह अलग-अलग नाम से अलग-अलग प्रकाशन संस्थानों से छपवाने से कैसे संभव है ,यह फॉर्मूला भी अभी सामने आना शेष है ।
अब वक्त आ गया है कि हिंदी के तमाम वरिष्ठ लेखक इस बात पर गंभीरता से विचार करें और पाठकों के साथ दशकों से हो रहे इस छल पर मिल बैठकर बात करें और उसे रोकने के लिए तुरंत कोई कदम उठाएं वर्ना हिंदी के पाठक ही इस बात का फैसला कर देंगे । पाठक अगर फैसला करेंगे तो वो दिन हिंदी के कहानीकारों के लिए बहुत बुरा दिन होगा और फिर उस फैसले पर पुनर्विचार का कोई मौका भी नहीं होगा क्योंकि जिस तरह से लोकतंत्र में वोटर का फैसला अंतिम होता है उसी तरह से साहित्य में पाठक का फैसला अंतिम और मान्य होता है ।

Thursday, September 9, 2010

स्त्री, दलित, मुसलमान- बजाते रहो

दिल्ली के साहित्यिक प्रेमियों को हर साल 28 अगस्त का इंतजार रहता है । साहित्यिकारों को तो खासतौर पर । हर साल यह दिन दिल्ली में एक उत्सव की तरह मनाया जाता है । दिल्ली के सारे साहित्यकार एक जगह इकट्ठा होते हैं, जमकर खाते पीते हैं । महानगर की इस भागदौड़ और आपाधापी की जिंदगी में कई लोग तो ऐसे भी होते हैं जो साल भर बाद इस दिन ही मिलते हैं । उत्सव सरीखे जश्न का यह मौका होता है वरिष्ठ लेखक और हंस के संपादक राजेन्द्र यादव के जन्मदिन का । मैं नब्बे के दशक के शुरुआत में दिल्ली आया । शुरुआत के कुछ वर्ष छोड़ दें तो तब से लेकर तकरीबन हर साल यादव जी के जन्मदिन के जश्न का गवाह रहा हूं, एक बार तो बिन बुलाए भी पहुंच गया। कई लोगों से मैं पहली बार राजेन्द्र यादव के जन्मदिन के मौके पर ही मिला । हिंदी के वरिष्ठतम लेखकों में से एक श्रीलाल शुक्ल जी से मेरी पहली मुलाकात राजेन्द्र जी के जन्मदिन के मौके पर हुई थी । उस वर्ष राजेन्द्र जी का जन्मदिन कवि उपेन्द्र कुमार के पार्क स्ट्रीट के सरकारी बंगले पर ही मनाया गया था । श्रीलाल जी से मुलाकात और साहित्यकार के अलावा उनके सतरंगे वयक्तित्व से परचित होना मेरे लिए एक सुखद आश्चर्य की तरह था । यादव जी के जन्मदिन के मौके पर ही मैंने प्रभाष जोशी को उनका पांव छूते देखा । खैर ये अवांतर प्रसंग हैं जिसपर फिर कभी विस्तार से चर्चा होगी ।
इस बार अपने जन्मदिन से कुछ रोज पहले राजेन्द्र जी की तबियत इतनी बिगड़ गई थी कि उन्हें अस्पताल में भर्ती करवाना पड़ा था । पता चला था कि शरीर में सुगर की कमी हो गई । अस्पताल से भरपूर मिठास लेकर यादव जी घर लौटे थे । मेरी इस दौरान लगातार बात होती रही , मैं लगातार पूछता रहा कि इस बार जन्मदिन का जश्न कहां हो रहा है । लेकिन यादव जी टालते रहे । फिर एक दिन फोन किया और जश्न-ए-जन्मदिन के बारे में दरियाफ्त की तो पता चला कि वो तो अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान यानि एम्स में भर्ती हैं । जब और हालचाल जानने की कोशिश में बात आगे बढ़ी तो राजेन्द्र जी ने बताया कि वो कुछ टेस्ट के लिए भर्ती हुए हैं, चिंता की बात नहीं है । बातचीत करने के बाद लगा कि शायद इस बार यादव जी का जन्मदिन ना मनाया जाए । लेकिन सत्ताइस अगस्त की शाम को लेखक अजय नावरिया का एक संदेश प्राप्त हुआ- राजेन्द्र यादव जी अपनी जिंदगी के बयासीवें साल में प्रवेश कर रहे हैं , इस मौके पर प्रेस क्लब में होने वाले आयोजन में आप आमंत्रित हैं । संदेश के बाद अजय नावरिया ने फोन भी किया । पता चला कि आयोजकों ने यह तय किया है कि इस बार यादव जी का जन्मदिन बेहद करीबी लोगों के साथ मनाया जाए । अजय नावरिया को उनकी इस मुहिम में साथ मिला उत्साह और उर्जा से लबरेज पत्रकार गीताश्री का । नियत समय पर हमलोग दिल्ली के रायसीना रोड स्थित प्रेस क्लब में इकट्ठा हुए । तीस चालीस आमंत्रित लोगों के साथ राजेन्द्र जी ने केक काटा । सबने हैप्पी बर्थ डे टू यू गाया, तालियां बजीं । लेकिन सबसे दिलचस्प रहा राजेन्द्र जी के दोस्त डाक्टर सक्सेना का गिफ्ट । सक्सेना जी ने यादव जी को एक ढोल दिया, जिसके एक ओर चिपका था- दलित, दूसरी ओर मुसलमान और तीसरी ओर स्त्री । संदेश यह था कि राजेन्द्र जी साहित्य में दलित, मुसलमान और स्त्रियों की समस्याओं का ढोल पीटते हैं तो अब उनके गले में असल की ही ढोल डाल दी जाए । डॉक्टर सक्सेना इसके पहले भी राजेन्द्र जी को बेहद अजूबे गिफ्ट देते रहे हैं । इसके पहले उन्होंने एक ऐसा मुखौटा भेंट किया था जिसमें दस सिर लगे थे यानि एक लेखक का दस चेहरा । उसके पहले हुक्का भेंटकर सबकों चौंका चुके थे । जिस तरह से सबको यादव जी के जन्मदिन का इंतजार रहता है उसी तरह हर किसी की यह जानने में भी दिलचस्पी रहती है कि डॉक्टर सक्सेना इस बार क्या भेंट लेकर आनेवाले हैं ।
बेहद आत्मीयता से फिर खाने-पीने का दौर शुरू हुआ । गीताश्री एक बेहतरीन होस्ट की तरह सबके खाने-पीने का ध्यान रख रही थी । जैसे ही उन्हें ये जानकारी मिलती कि कोई बगैर खाए जाने की बात कर रहा है किसी को उसके पीछे लगा देती और तबतक निश्चिंत होकर नहीं बैठती थी जबतक कि वो खाना खा नहीं लेता । इस आयोजन में निर्मला जैन, भारत भारद्वाज, असगर वजाहत, पंकज विष्ठ. साधना अग्रवाल के अलावा वरिष्ठ पत्रकार शाजी जमां, आशुतोष, अजीत अंजुम, परवेज अहमद और श्रीनंद झा भी मौजूद थे । अशोक वाजपेयी थोड़ी देर से जरूर पहुंचे लेकिन अंत तक डटे रहे । यहां भी अशोक जी के साथ एक मजेदार वाकया हुआ । अशोक जी राजेन्द्र जी, मिर्मला जैन के साथ बैठे बातें कर रहे थे । अचानक डॉक्टर सक्सेना अशोक जी के पास पहुंचे और कहा- अशोक जी जनसत्ता का आपका कॉलम बहुत अच्छा रहता है । आपकी भाषा बेहद शानदार है । यहां तक तो अशोक जी के चहरे पर वही भाव थे जो अपनी प्रशंसा सुनकर किसी भी वयक्ति के चहरे पर हो सकती है । लेकिन इसके बाद डॉक्टर सक्सेना ने जो कहा उससे अशोक जी के चेहरे की चमक गायब हो गई । डॉक्टर सक्सेना ने उनकी भाषा की प्रशंसा करते करते यह कह डाला कि आपकी भाषा में वही रवानगी और ताजगी है जो किसी जमाने में शिवानी के लेखन में महसूस की जा सकती थी । यह अगर सक्सेना जी का व्यंग्य था तो बेहद शानदार था और अगर अनजाने में गंभीरता पूर्वक यब बात कही गई थी तो अशोक जी कभी कभार में इसकी खबर जरूर लेंगे ।
सभी लोग यादव जी से मजे ले रहे थे और उन्हें बयासी साल का होने पर बधाई दे रहे थे । राजेन्द्र जी भी इस बेहद आत्मीय आयोजन से प्रसन्न दिख रहे थे । अपने साथी लेखकों से चुटकी भी ले रहे थे । यादव जी की जो एक खूबी है वो यह है कि उनके साथ रहकर साहित्यिक, गैर साहित्यिक, बच्चा, बूढ़ा, जवान कोई भी बोर नहीं हो सकता। यादव जी जैसे बयासी साल के जवान का जन्मदिन और गीताश्री जैसी जिंदादिल होस्ट ने राजेन्द्र जी के जश्न-ए-सालगिरह को एक यादगार लम्हा बना दिया था । अंत में मैं इतना ही कह सकता हूं कि – तुम जियो हजारों साल, साल के दिन हों पचास हजार ।

Saturday, September 4, 2010

हिंदी साहित्य में लालूवाद

अभी इस बात को ज्यादा दिन नहीं बीते हैं जब झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कौड़ा पर अरबों रुपये के घोटाले के आरोप लगे । मधु कौड़ा से जुड़ी खबरें हर रोज मीडिया में सुर्खियां बनती रही । उसके कई सहयोगियों के नाम भी सामने आने लगे । मधु कौड़ा और उनके सहयोगियों के बारे में तफ्तीश शुरू हुई । इस बीच अचानक से बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और पूर्व रेल मंत्री लालू यादव ने एक प्रेस कांफ्रेंस आयोजित कर यह सफाई दी कि उनका मधु कौड़ा से कोई लेना देना नहीं है । लालू की इस सफाई से लोगों को हैरानी भी हुई । कई पत्रकारों ने प्रेस कांफ्रेंस में उनसे सवाल भी पूछा कि वो क्यों सफाई दे रहे हैं,जबकि उनका नाम कहीं से मधु कौड़ा के घोटाले में शामिल नहीं है । लालू यादव ने अपने ही अंदाज में बात को हवा में उड़ा दिया और कहा कि उन्हें अपने स्त्रोंतो से पता चला कि लोग उनपर शक कर रहे हैं सो उन्होंने मुनासिब समझा कि सफाई दी जाए । ठीक इसी तरह का वाकया अब हिंदी साहित्य में सामने आया है । विभूति-कालिया प्रकरण में जब विवाद ठंड़ा पड़ने लगा तो अचानक से पिछले हफ्ते हिंदी के वरिष्ठ कवि और ललित कला अकादमी के अध्यक्ष अशोक वाजपेयी ने जनसत्ता के अपने कॉलम कभी-कभार में लालू यादव के तर्ज पर इस विवाद को पर्दे के पीछे से हवा देने के आरोपों पर अपनी सफाई दी । अशोक वाजपेयी ने लिखा- इस बीच एक और अफवाह फैलाई गई । कुंवर नारायण और मैं इस प्रसंग में ज्ञानपीठ की अध्यक्ष इंदु जैन से मिले हैं । अव्वल तो इस प्रसंग को लेकर कुंवर जी से मेरी बात तक नहीं हुई । दूसरे इंदू जैन से कोई बीस बरस पहले नाश्ते पर एक सौजन्य भेंट हुई थी जब मुझे नवभारत टाइम्स के संपादक का पद ऑफर किया गया था । उसके बाद उनसे कभी नहीं मिला । तीसरे जो कुछ मैं इस विवाद में चाहता हूं उसे खुलकर बता चुका हूं – गुप कोई काम करना मेरी आदत में शामिल नहीं है । पर इस झूठ को सरासर फैलाने का काम शुरू किया गया । इस प्रकरण में अशोक जी ने के विक्रम सिंह से लेकर विजय मोहन सिंह और केदार नाथ सिंह का नाम भी लिया । लेकिन सवाल यह उठता है कि अशोक जी को सफाई देने की जरूरत क्यों पड़ी । ऐसी कौन सी अफवाह फैलाई जा रही थी कि अशोक जी जैसे गंभीर लेखक को अपने लोकप्रिय साप्ताहिक स्तंभ में सफाई देने की जरूरत पड़ी ।
दूसरी बात जो अशोक वाजपेयी ने अपने स्तंभ में उठाई वो नैतिकता और लेखकों के अपमान की । अशोक वाजपेयी के मुंह से नैतिकता की बात भी उसी तरह लगती है जैसे कि लालू यादव के मुंह से । साहित्य जगत उन्नीस सौ चौरासी के अशोक वाजपेयी के बयान को भूला नहीं है । भोपाल गैस त्रासदी के आसपास ही अशोक वाजपेयी ने एशिया पोएट्री का आयोजन किया था । तब वो मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के चहेते अफसर और भारत भवन के कर्ता-धर्ता थे । जब भोपाल गैस त्रासदी में हजारों लोगों की जान गई तो उसी शहर में कविता पर उक्त आयोजन पर सवाल खड़े होने लगे थे। तब अशोक वाजपेयी ने बयान दिया था कि मरनेवालों के साथ कोई मर नहीं जाता । अशोक वाजपेयी का वह बयान बेहद अमानवीय और मनुष्यता के खिलाफ था और एक लेखक और वयक्ति की संवेदनहीनता का सबसे बड़ा नमूना।
साहित्य में स्वतंत्रता और जनपक्षधरता की बात करनेवाले अशोक वाजपेयी मूलत: नौकरशाह हैं और भारत में अफसरशाही की कंडीशनिंग इस तरकह से होती है कि वहां ना तो संवेदना के लिए कोई जगह होती है और ना ही नैतिकता के लिए । आप खुद इस बात का अंदाजा लगाइये कि जिस शहर में तकरीबन पच्चीस हजार लोग काल के गाल में समा गए हों उसी शहर के अफसर अशोक वाजपेयी का उक्त बयान कितना संवेदनहीन है । उस एक बयान के लिए ही अशोक वाजपेयी को माफ नहीं किया जा सकता है । आज अशोक वाजपेयी नैतिकता की दुहाई देते हैं लेकिन तब उनकी नैतिकता कहां चली गई थी जब संस्कृति मंत्रालय में संयुक्त सचिव रहते हुए साहित्य अकादमी का पुरस्कार हथिया लिया था । गौरतलब है कि साहित्य अकादमी एक स्वायत्त संस्था है लेकिन वो संबद्ध तो संस्कृति मंत्रालय से ही है । नैतिकता का उपदेश देने के पहले अशोक जी को खुद के गिरेबां में झांक कर देख लेना चाहिए । यहां भी वो लालू यादव के पद चिन्हों पर ही चलते नजर आ रहे हैं । घोटालों के आरोप से घिरे लालू यादव भी गाहे बगाहे नैतिकता और राजनैतिक शुचिता की बात करते हैं ।
अशोक वाजपेयी ने लिखा है कि हिंदी लेखक समाज अपने सदस्यों के अपमान करनेवालों को सुख चैन से अपनी कुर्सी पर बैठने नहीं देगा । जो निर्लज्ज फिर भी उंची कुर्सी पर जमे हैं वे खुद जानते हैं कि उनका कद कितना नीचा हो गया है । आज अशोक वाजपेयी को हिंदी साहित्य समाज के अपमान की याद आ रही है लेकिन वो खुद हिंदी के लेखकों का कितनी बार अपमान कर चुके हैं , कितनी बार उसका मजाक उड़ा चुके हैं यह उनको याद दिलाने की जरूरत है । अशोक वाजपेयी जब साहित्य अकादमी के अध्यक्ष पद का चुनाव हारे थे तब हिंदी के लेखकों के खिलाफ विषवमन किया था । अपनी हार से तिलमिलाए अशोक वाजपेयी ने कहा था कि – जिन हिंदी के लेखकों को महीनों-महीने रखा, खिलाया पिलाया, हवाई जहाज से यात्राएं करवाई उन्होंने ही मुझे धोखा दिया । उनके निशाने पर हिंदी के एक वरिष्ठ आलोचक और एक कवि थे । आज वही अशोक वाजपेयी हिंदी के लेखकों के अपमान करनेवालों के निर्लज्ज कह रहे हैं । क्या यही भाषा एक वरिष्ठ लेखक को इस्तेमाल करनी चाहिए । क्या लिखते लिखते अशोक वाजपेययी मर्यादा भूल जाते हैं या फिर व्यक्तिगत खुन्नस लेखक पर हावी हो जा रहा है । जिनको वो निर्लज्ज कह रहे हैं उनका कद साहित्य में अशोक वाजपेयी से कई गुना बड़ा है, उम्र में तो उनसे बड़े हैं ही ।
अपने उसी स्तंभ में अशोक वाजपेयी साहित्य के परिसर को मूल्यों का परिसर बताते हुए विभूति नारायण राय और रविन्द्र कालिया पर वार करते हैं । अभी इस बात को ज्यादा दिन नहीं बीते हैं जब अशोक वाजपेयी महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति थे । तब उनपर एक बड़े परिसर में मूल्यों के दायित्व का निर्माण करने की महती जिम्मेदारी थी लेकिन उस वक्त भी वहां क्या-क्या गुल खिले थे वो किसी से छिपे नहीं हैं इस विषय पर कभी विस्तार से चर्चा होगी । अशोक जी हिंदी के मूर्धन्य रचनाकार हैं, किसी भी विवाद पर पूरा हिंदी जगत उनसे बगैर किसी पूर्वग्रह के हस्तक्षेप की उम्मीद करता है । लेकिन इस पूरे विवाद में अशोक जी पूर्वग्रहों से उपर नहीं उठ सके ।

Wednesday, August 18, 2010

कारण कवन नाथ मोहे मारा

नया ज्ञानोदय के अगस्त 2010 अंक मे छ्पे मेरे इंटरव्यू पर हुई प्रतिक्रियाओ से एक बात स्पष्ट हो गयी कि मैने अपनी लापरवाही से एक गम्भीर विमर्श का हेतु बन सकने का मौका गंवा दिया । मैने कुछ ऐसे शब्दो का प्रयोग किया जिनसे बचा जा सकता था। मुझे जैसे ही यह अहसास हुआ कि मेरी भाषा से हिन्दी की बहुत सी लेखिकाओं को कष्ट हुआ है मैने अपनी गलती का अहसास किया और बिना शर्त माफी मांग ली ।मैं शर्मिन्दा हूँ कि मेरी असावधानी से बहुत से ऐसे लोग आहत हुए जो मेरे वर्षों पुराने मित्र रहे है,इनमे बडी सख्यां में लेखिकायें भी हैं पर मेरे मन मे उनके लिये सम्मान भी बढा है कि मित्रता की परवाह किये बगैर उन्होने मेरी मजम्मत की। हालाकि कुछ लोग जो इस मामले को अन्य कारणों से जिन्दा रखना चाह्ते हैं, इन्टरव्यू में उठाये गये मुद्दों पर बहस न कर के अभी भी उन शब्दों के वाक्जाल मे उलझे हुए हैं जिनपर मै खुद खेद प्रकट कर माफी मांग चुका हूँ । मै मानता हूं कि इन लोगों की उपेक्षा कर अब मै मुद्दों पर बहस की अपेक्षा कर सकता हूं ।
यह कहना है महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय का । दरअसल जिस बात पर विभूति अपने साथी लेखकों और हिंदी समाज से माफी मांग रहे हैं वो पूरा विवाद विभूति के ही एक साक्षात्कार से उठा । नया ज्ञानोदय के सुपर बेवफाई विशेषांक में विभूति नारायण राय का एक लंबा इंटरव्यू प्रकाशित हुआ है जिसमें एक सवाल के जबाव में विभूति कहते हैं - पिछले वर्षों में हमारे यहां जो स्त्री विमर्श हुआ है वह मुख्यरूप से शरीर केंद्रित है । यह भी कह सकते हैं कि वह विमर्श बेवफाई के विराट उत्सव की तरह है । लेखिकाओं में होड़ लगी है यह साबित करने के लिए कि उनसे बड़ी छिनाल कोई नहीं है । मुझे लगता है कि इधर प्रकाशित एक बहु प्रमोटेड और ओवर रेटेड लेखिका की आत्मकथा का शीर्षक कितनी बिस्तरों पर कितनी बार हो सकता है । इस इंटरव्यू के प्रकाशित होने के बाद हिंदी के लेखकों के बीच इस पर विमर्श शुरू हो गया था । लेकिन बड़े पैमाने पर इसका विरोध तो तब शुरू हुआ जब अचानक से एक दिन दिल्ली से प्रकाशित एक अंग्रेजी दैनिक ने इस खबर को प्रमुखता से प्रकाशित कर विवाद खड़ा कर दिया । अंग्रेजी अखबार के संवाददाता ने छिनाल शब्द का अंग्रेजी अनुवाद प्रोस्टीट्यूट कर दिया । जिससे अर्थ का अनर्थ हो गया । छिनाल उन स्त्रियों को कहा जाता है जो कुलटा होती हैं या फिर स्त्रियोचित मर्यादा को भंग कर अपनी मर्जी से कई पुरुषों से संबंध बनाती है । लेकिन वो किसी भी हाल में वेश्या नहीं होती । महिला लेखिकाओं के लिए कहा गया यह शब्द बिल्कुल आपत्तिजनक है लेकिन वेश्या जितना अपमानजनक नहीं है । यह गाली है और किसी भी लेखक को अपनी बिरादरी की महिलाओं के लिए इस शब्द के प्रयोग की इजाजत नहीं दी जा सकती है ।
जैसा कि उपर संकेत दिया जा चुका है कि यह इंटरव्यू लगभग हफ्तेभर से छपकर विवादित नहीं हो पा रहा था क्योंकि हिंदी सत्ता की भाषा नहीं है, सत्ता की भाषा तो अंग्रेजी है । अंग्रेजी अखबार के गैर जिम्मेदाराना अनुवाद ने आग में घी का काम किया और विरोध की चिंगारी को भड़का दिया । लेखिलाओं का जितना अपमान विभूति नारायण राय किया उससे ज्यादा बड़ा अपमान तो अंग्रेजी के वो अखबार कर रहे हैं जो लगातार लेखिकाओं को वेश्या बता रहे हैं । मीडिया में इसके उछलने के बाद विभूति नारायण राय पर चौतरफा हमला शुरू हो गया । हिंदी के लेखकों के अलावा कई महिला संगठनों ने महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति को लेखिकाओं के खिलाफ इस अमर्यादित टिप्पणी को लेकर कठघरे में खड़ा किया और उनके इस्तीफे और बर्खास्तगी की मांग होने लगी।
मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल और राष्ट्रीय महिला आयोग तक भी ये मामाला पहुंच गया । लगभग मृतप्राय लेखक संगठनों में भी जान आ गई और उन्होंने भी विभूति नारायण राय के खिलाफ एक निंदा बयान जारी कर दिया । चौतरफा घिरे विभूति नारायण राय को मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने तलब किया और उनके यहां से निकलकर राय ने बिना शर्त लिखित माफी मांग ली । फिर अखबार में लेख लिखकर भी माफी मांगी। विभूति के विरोध के अलावा लेखकों ने नया ज्ञानोदय और उसके संपादक के खिलाफ भी मोर्चा खोला । ज्ञानोदय छापने वाली संस्था भारतीय ज्ञानपीठ के दफ्तर पर प्रदर्शन भी किया । विरोध बढ़ता देखकर नया ज्ञानोदय के संपादक
रवीन्द्र कालिया ने इसे संपादकीय भूल मानते हुए खेद प्रकट किया और नया ज्ञानोदय का उक्त अंक बाजार से वापस मंगाकर विवादास्पद शब्द को हटाकर पत्रिका को फिर से छापने का वादा किया । लेकिन बावजूद इसके लेखकों का एक वर्ग इन दोनों का फांसी पर लटकाने को आमदा है । इनकी मांग है कि विभूति नारायण राय और कालिया को उनके पद से बर्खास्त किया जाए । इसके लिए बकायादा एक मोर्चे का गठन भी किया गया है । लेकिन माफी मांग लेने के बाद विरोध जारी रखने का औचित्य समझ में नहीं आता ।
विरोध पर डटे रहने के कुछ साहित्येत्तर कारण हो सकते हैं- या तो विभूति से व्यक्तिगत खुन्नस, कालिया से नाराजगी या फिर सत्ता प्रतिष्ठान के खिलाफ गुस्से का दिखावा । किसी भी साहित्यिक मुद्दे पर लेखकों की इतनी सक्रियता चौंकानेवाली है । कुछ दिनों पहले हिंदी के ही एक अन्य लेखक भगवान दास मोरवाल के उपन्यास रेत के खिलाफ जब ‘गिहार’ समाज के प्रतिनिधित्व का दावा करनेवाले एक संगठन- भारतीय आदिवासी गिहार विकास समिति ने उत्तर प्रदेश के छिबरामऊ की अदालत में उपन्यासकार के खिलाफ मुकदमा दर्ज करवाया तो कहीं से कोई विरोध की आवाज तो दूर मोरवाल के समर्थन में किसी लेखक ने बयान तक नहीं दिया । लेखक संगठन तक कुंभकर्णी नींद सोते रहे । आज भी मोरवाल अकेले उस लड़ाई को लड़ रहे हैं । जमानत लेने से लेकर तमाम अदालती झंझटों से अकेले निबट रहे हैं । तसलीमा नसरीन को जब पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकार ने कोलकाता से निकाला तो बयानबाजी की रस्म अदायगी की गई । कहीं भी धरना प्रदर्शन तो दूर की बात कोई हस्ताक्षर अभियान तक नहीं चला । हिंदी के एक स्वनामधन्य आलोचक, जो दिल्ली विश्वविद्यालय में शिक्षक थे, को जब एक दलित छात्रा के यौन शोषण के आरोप में जब विश्वविद्यालय ने उन्हें हटा दिया तब भी उनका
विरोध किसी लेखक या लेखक संगठन ने नहीं किया । दरअसल हिंदी साहित्य में विभूति नारायण राय और रवीन्द्र कालिया के खेद प्रकट करने के बाद जो विरोध हो रहा है उसके पीछे कहीं ना कहीं कुछ दूसरे कारण हैं जो कम से कम साहित्यिक तो नहीं है । अब विशाल हिंदी समाज को यह तय करना है कि ये विरोध कितना जायज और किस उद्देश्य के लिए किया जा रहा है ।

Tuesday, August 10, 2010

पच्चीस का ‘हंस’

आज से पच्चीस साल पहले जब अगस्त 1986 में राजेन्द्र यादव ने हंस पत्रिका का पुर्नप्रकाशन शुरू किया था तब किसी को भी उम्मीद नहीं रही होगी कि यह पत्रिका निरंतरता बरकरार रखते हुए ढाई दशक तक निर्बाध रूप से निकलती रहेगी, शायद संपादक को भी नहीं । उस वक्त हिदी में एक स्थिति बनाई या प्रचारित की जा रही थी कि यहां साहित्यिक पत्रिकाएं चल नहीं सकती । सारिका बंद हो गई, धर्मयुग बंद हो गया जिससे यह साबित होता है कि हिंदी में गंभीर साहित्यक पत्रिका चल ही नहीं सकती । लेकिन तमाम आशंकाओं को धता बताते हुए हंस ने अगस्त में अपने पच्चीस साल पूरे करते हुए यह सिद्ध कर दिया कि हिंदी में गंभीर साहित्य के पाठक हैं और पिछले पच्चीस सालों में इसे शिद्दत से साबित भी कर दिया । मेरे जानते हिंदी में व्यक्तिगत प्रयास से निकलने वाली हंस इकलौती कथा पत्रिका है जो लगातार पच्चीस सालों से प्रकाशित हो रही है और इसका पूरा श्रेय जाता है इसके संपादक और वरिष्ठ लेखक राजेन्द्र यादव को । जब इस पत्रिका का प्रकाशन शुरू हुआ था तब इस बात को लेकर खासी सुगबुगाहट हुई थी कि यह प्रेमचंद की पत्रिका हंस है या दिल्ली के हंसराज कॉलेज की पत्रिका हंस । लेकिन कालांतर में इस पत्रिका ने साबित कर दिया कि वह सचमुच में प्रेमचंद वाला हंस ही है । राजेन्द्र यादव स्वंय प्रतिष्ठित साहित्यकार हैं और नई कहानी आंदोलन के अवांगार्द । बहुत पहले यादव जी ने एक आलोचनात्मक पुस्तक लिखी थी- प्रेमचंद की विरासत बाद में कहानीकार होते हुए भी उन्होंने प्रेमचंद की विरासत को ही अपनाया और हंस का पुनर्प्रकाशन किया । पिछले पच्चीस सालों में हंस ने हिंदी साहित्य को ना केवल एक नई दिशा दी बल्कि उसने दलित और स्त्री विमर्श के साथ-साथ तत्कालीन प्रासंगिक मुद्दों को उठाकर हिंदी साहित्यिक पत्रकारिता का एक नया इतिहास भी लिखा और साहित्यिक पत्रकारिता के कुछ नए मानक भी स्थापित किए तरह की खुली बहस से दूसरी पत्रिका के संपादकों के हाथ पांव फूल जाते थे उसे राजेन्द्र यादव ने हंस में जोरदार तरीके से उठाया । खुद अपने संपादकीय में बिना किसी डर-भय और लाग लपेट के यादव जी ने अपनी बातें कहकर बहस में सार्थक हस्तक्षेप किया । अपने प्रकाशन के शुरुआती दिनों से ही हंस ने साहित्यिक माहौल को गर्मागर्म बनाए रखा और जो मुर्दनीछाप शास्त्रीय किस्म का माहौल था उसे सक्रिय करते हुए जुझारू तेवर भी प्रदान किए । हो सकता है कि राजेन्द्र यादव के स्टैंड से आप सहमत ना हों लेकिन पच्चीस बरसों की लंबी अवधि में यादव जी ने अनेक विचारोत्तेजक मुद्दे पर बहस चलाई और साहित्यकि माहौल को सजीव बनाए रखा । यादव जी के एजेंडे में सिर्फ साहित्यिक मुद्दे ही नहीं रहे । अनेक सामाजिक मु्द्दों को भी हंस ने अपनी परिधि में लेकर सार्थक बहसें चलाई । आज अगर दलित विमर्श या दलित चेतना, स्त्री विमर्श या स्त्री चेतना हमारे समय की महत्वपूर्ण प्रवृतियों के रूप में व्यापक रूप से मान्यता पा चुके हैं तो इसका काफी श्रेय हंस और इसके संपादक राजेन्द्र यादव को जाता है ।
इसके अलावा हंस ने पच्चीस सालों में तकरीबन चार पीढियों को साहित्य में दीक्षित करने का काम भी किया । मुझे मेरा साहित्यिक संस्कार जरूर परिवार से मिला लेकिन मुझे यह स्वीकार करने में तनिक भी हिचक नहीं है कि हंस ने उसे परिष्कृत किया । हंस को पढ़ते हुए ही कई मसलों को देखने समझने की नई दृष्टि भी मिली ।
इसके अलावा जो एक बड़ा काम यादव जी ने हंस के माध्यम से किया को यह कि कहानीकारों की एक लंबी फौज खड़ी कर दी । यह कहते हुए मुझे कोई संकोच या किसी तरह का कोई हिचक नहीं है कि पिछले ढाई दशक की हिंदी की महत्वपूर्ण कहानियां हंस में ही छपी । एक बार बातचीत में यादव जी ने इस बात को स्वीकार करते हुए कहा था – अगर झूठी शालीनता ना बरतूं तो कह सकता हूं कि हिंदी में अस्सी प्रतिशत श्रेष्ठ कहानियां हंस में ही प्रकाशित हुई हैं और ऐसे एक दर्जन से ज्यादा कवि हैं जिनकी पहली कविताएं हंस में ही छपी और आज उनमें से कई हिंदी के महत्वपूर्ण रचनाकार हैं। यादव जी की इस बात में कोई अतिशयोक्ति नहीं है , हंस ने अपने प्रकाशन के शुरुआती वर्षों में ही उदय प्रकाश की तिरिछ, शिवमूर्ति कू तिरिया चरित्तर, ललित कार्तिकेय का तलछट का कोरस, रमाकांत का कार्लो हब्शी का संदूक, चंद्रकिशोर जायसवाल की हंगवा घाट में पानी रे और आनंद हर्षुल की उस बूढे आदमी के कमरे में छापकर हिंदी कथा साहित्य का एक नया जीवनदान दिया । बाद में भी हंस में ही छपी उदय प्रकाश की चर्चित कहानियां – और अंत में प्रार्थना, पीली छतरी वाली लड़की, अरुण प्रकाश की जल प्रांतर, अखिलेश की चिट्ठी, स्वयं प्रकाश की अविनाश मोटू उर्फ..., सृंजय की कॉमरेड का कोट आदि कहानियों ने भी कथा साहित्य को झकझोर दिया था ।
यह लेख तो हंस के पच्चीस साल पूरे होने पर उसेक मूल्यांकन के तौर पर लिख रहा हूं लेकिन इसी महीने राजेन्द्र यादव बयासी साल के हो रहे हैं । उम्र के इस पड़ाव पर भी वो जिस मुस्तैदी और लगन के साथ हंस का संपादन करते हैं और पत्रिका को नियत समय पर निकालते हैं वो किसी के लिए भी रश्क की बात हो सकती है । अगर आप उनके संपर्क में हैं तो वो लगातार आपको कुछ नया करने के लिए उकसाते रहेंगे और तबतक नहीं मानेंगे जबतक कि वो आपसे कुछ करवा ना लें । एक संपादक के तौर पर राजेन्द्र यादव बेहद ही लोकतांत्रिक हैं । हंस में पाठकों के जो पत्र छपते हैं वो इस बात की ताकीद करते हैं कि राजेन्द्र यादव अपनी आलोचना को भी बेहद प्रमुखता से प्रकाशित करते हैं । आप उनके लेखन और विचार से अपनी असहमति लिखकर या मौखिक भी दर्ज करा सकते हैं । उनसे बातचीत करते वक्त आपको इस बात का बिल्कुल भी एहसास नहीं होगा कि आप हिंदी के इतने बड़े लेखक या संपादक से बात कर रहे हैं । उनका वयक्तित्व आतंकित नहीं करता बल्कि रचनाशीलता के लिए उकसाता है । उनके लेखन में ही नहीं बल्कि उनके स्वभाव में भी एक खिलंदड़ापन और छेड़छाड़ की प्रवृत्ति है । यादव जी अपने बातचीत में ही नहीं अपने लेखन में भी समकालीन बने रहना चाहते हैं । हाल के दिनों में उनके संपादकीय में गजब की पठनीयता आ गई है । यादव जी पर संपादकीय में अंग्रेजी के शब्दों के इस्तेमाल पर आलोतना भी झेलनी पड़ती रही है । अशोक वाजपेयी कहते हैं- अपने संपादकीयों में जिस तरह हर तीसरे वाक्य में बेवजह अंग्रेजी के वाक्य ठूंसते हैं, जबकि उनके लिए हिंदी में काफी दिनों से प्रचलित पर्याय सुलभ हैंट यह अंतत उन्हें बौद्धिक रूप से एक भाषा विपन्न लेखक बल्कि संपादक सिद्ध करता है । अशोक वाजपेयी और नामवर सिंह से यादव जी की नोंक झोंक चलती रहती है । लेकिन इन लोगों की इस नोंक झोंक से साहित्यिक परिदृश्य सजीव बना रहता है । हमारी कामना है कि यादव जी दीर्घायु हों और हंस का संपादन पचास साल तक करते रहें ।

Friday, August 6, 2010

काश पूछो कि मुद्दआ क्या है / विभूति नारायण राय

नया ज्ञानोदय के अगस्त 2010 अंक मे छ्पे मेरे इंटरव्यू पर हुई प्रतिक्रियाओ से एक बात स्पष्ट हो गयी कि मैने अपनी लापरवाही से एक गम्भीर विमर्श का हेतु बन सकने का मौका गवां दिया ।मैने कुछ ऐसे शब्दो का प्रयोग किया जिनसे बचा जा सकता था ।मुझे जैसे ही यह अहसास हुआ कि मेरी भाषा से हिन्दी की बहुत सी लेखिकाओं को कष्ट हुआ है मैने अपनी गल्ती का अहसास किया और बिना शर्त माफी मांग ली ।मैं शर्मिन्दा हूँ कि मेरी असावधानी से बहुत से ऐसे लोग आहत हुए जो मेरे वर्षों पुराने मित्र रहे है,इनमे बडी सख्यां में लेखिकायें भी हैं पर मेरे मन मे उनके लिये सम्मान भी बढा है कि मित्रता की परवाह किये बगैर उन्होने मेरी मजम्मत की । हालाकि कुछ लोग जो इस मामले को अन्य कारणों से जिन्दा रखना चाह्ते हैं, इन्टरव्यू में उठाये गये मुद्दों पर बहस न कर के अभी भी उन शब्दों के वाक्जाल मे उलझे हुए हैं जिनपर मै खुद खेद प्रकट कर माफी मांग चुका हूँ । मै मानता हूं कि इन लोगों की उपेक्षा कर अब मै मुद्दों पर बहस की अपेक्षा कर सकता हूं ।
इंटरव्यू पर शुरुआती प्रतिक्रिया उन लोगों की तरफ से आयी जिन्होने उसे पढा ही नही था ।अब जब कि अधिकतर लोगों नें इंटरव्यू पढ लिया है मुझे लगता है उसमें उठाये गये प्रश्नों पर बातचीत होनी चाहिये । संक्षेप में कहूँ तो मेरे मन में मुख्य शकां यह है कि महिला लेखन मे देहकेन्द्रित लेखन को कितना स्थान मिलना चाहिए । एक मित्र ने आपत्ति की कि यह प्रश्न पुरुषों के लेखन पर भी उठना चाहिये । सही है पर विमर्श सिर्फ वंचित या हाशिये पर पहुचे हुए तबकों के लेखन से निर्मित होता है । मसलन दलित लेखन जैसा विमर्श निर्मित करता है वैसा विमर्श ब्राह्मण लेखन नही कर सकता । दलित लेखन जहाँ मानव मुक्ति की कामना करता है या उसका मुख्य संघर्ष दबे कुचलों को उनका खोया सम्मान वापस लौटाने के लिये होगा वहीं यदि ब्राह्मण लेखन जैसा कोई लेखन किया जाय तो स्वाभाविक है कि उसकी चिंता का केन्द्र मनुष्य विरोधी वर्ण व्यवस्था को वैध ठहराने के लिये तर्क तलाशना होगा और मुझे नही लगता कि ऐसे लेखन से कोई उल्लेखनीय विमर्श निर्मित होगा । इसी प्रकार महिला लेखन के केन्द्र मे स्त्री मुक्ति के प्रश्न महत्वपूर्ण होंगे । स्त्री मुक्ति में अपनी देह पर स्त्री का अधिकार एक महत्वपूर्ण तर्क है पर और भी गम है जमानें में मोहब्बत के सिवा । मेरा मानना है कि स्त्री देह पर अंतिम अधिकार उसका है पर साथ मे मै यह भी मानता हूँ कि भारत के सदंर्भ में स्त्री मुक्ति से जुडे और भी महत्वपूर्ण मुद्दे हैं । आज भी परिवारों में निर्णय लेने का अधिकार सिर्फ पुरुषों को है , स्त्रियाँ केवल उन्हें लागू करती हैं । तमाम बहस मुबाहिसों के बावजूद घरेलू श्रम के लिये उसका पारिश्रमिक तय नही हो पा रहा है । पंचायती राज्य की संस्थाओं में आरक्षण के बल पर चुनी गयी महिलाओं मे से बहुत सी अभी भी घरों में कैद हैं और उनके प्रधान पति कागजों पर उनकी मुहरें लगाते हैं । बहुत से ऐसे मुद्दे है जिनपर बहस होनी चाहिये । अंत मे , इन सबसे महत्वपूर्ण यह प्रश्न कि क्या स्त्री मुक्ति आइसोलेशन मे हो सकती है ? क्या आदिवासियों , अल्पस्ंख्यकों या दलितों के प्रश्नों से जोडे बिना इस मुद्दे पर कोई बडी बहस खडी की जा सकती है । अगर एक बार यह सहमति बन सके तो गुजरात जैसी स्थिति से बचा जा सकता है जिसमे महिलाओं ने भी अल्पसख्यकों के सहांर मे हिस्सा लिया था ।मुझे 1990 का इलाहाबाद याद आ रहा है जहां मैं नियुक्त था और जो मडंल कमीशन की सिफारिशें लागू करने के खिलाफ चल रहे आन्दोलन का केन्द्र था । मैने आन्दोलनकारियों के साथ सख्ती की तो बहुत सारे दूसरे तबकों के अतिरिक्त विश्वविद्यालय की सवर्ण लड्कियों ने मेरे खिलाफ मोर्चा निकाला और अपनी पूरी कोशिशों के बावजूद मैं उन्हें यह नही समझा पाया कि उन्हें पिछ्डों के साथ खडा होना चाहिये । यदि उनके अन्दर यह समझ होती कि वे तो पिछडों में भी पिछ्डी हैं तो सम्भवत: उन्हे मेरी बात ज्यादा आसानी से समझ मे आ जाती। एक बार फिर अपने शब्दों के लिये माफी मांगते हुये मै अनुरोध करूंगा कि इन मुद्दों पर भी बातचीत की जाय।

Thursday, August 5, 2010

विवादित इंटरव्यू के बाद निभूति नारायण राय की सफाई

विभूति नारायण राय के इंटरव्यू पर पूरे हिंदी साहित्य में घमासान मचा है । कुलपति विभूति नारायण राय के माफी मांगने के बावजूद उनकी बर्खास्तगी की मांग हो रही है । हमें लगता है कि अगर किसी को उसकी गलती का एहसास हो जाए और वो उसपर सार्वजनिक रूप से लिखित और मौखिक माफी मांग ले तो उसे माफ कर दिया जाना चाहिए । इस पूरे मसले पर विभूति नारायण राय ने हाहाकार के लिए एक लेख लिखने का वादा किया है । जो जल्द ही प्रकाशित होगा । विवादित इंटरव्यू के बाद विभूति नारायण राय का ये पहला लेख जल्द ही हाहकार पर प्रकाशित होगा

Tuesday, August 3, 2010

'छिनाल' और 'लफंगे' से शर्मसार हिंदी साहित्य

पिछले वर्षों में हमारे यहां जो स्त्री विमर्श हुआ है वह मुख्यरूप से शरीर केंद्रित है । यह भी कह सकते हैं कि वह विमर्श बेवफाई के विराट उत्सव की तरह है । लेखिकाओं में होड़ लगी है यह साबित करने के लिए कि उनसे बड़ी छिनाल कोई नहीं है । मुझे लगता है कि इधर प्रकाशित एक बहु प्रमोटेड और ओवर रेटेड लेखिका की आत्मकथा का शीर्षक कितनी बिस्तरों पर कितनी बार हो सकता है । इस तरह के उदाहरण बहुत सी लेखिकाओं में मिल जाएंगे - यह कहना है महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के कुलपति विभूति नारायण राय का । विभूति का यह विवादास्पद साक्षात्कार भारतीय ज्ञानपीठ की मासिक पत्रिका नया ज्ञानोदय में प्रकाशित हुआ है । तकरीबन हफ्तेभर पहले जब पत्रिका का अंक बाजार में आया तो हिंदी के लेखकों के बीच इस साक्षात्कार को लेकर कानाफूसी शुरू हो गई थी लेकिन खुला विरोध नहीं हो रहा था । अचानक से एक दिन दिल्ली से प्रकाशित एक अंग्रेजी दैनिक ने इस खबर को प्रमुखता से प्रकाशित कर विवाद खड़ा कर दिया । अंग्रेजी अखबार के नादान संवाददाता ने छिनाल शब्द का अंग्रेजी अनुवाद प्रोस्टीट्यूट कर दिया । जिससे अर्थ का अनर्थ हो गया । दरअसल छिनाल शब्द भोजपुरी के छिनार शब्द का परिष्कृत रूप है । यह एक आंचलिक शब्द है जिसका प्रयोग बिहार और उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में किया जाता है । छिनाल उन स्त्रियों को कहा जाता है जो कुलटा होती हैं या फिर स्त्रियोचित मर्यादा को भंग कर अपनी मर्जी से कई पुरुषों से संबंध बनाती है । लेकिन वो किसी भी हाल में वेश्या नहीं होती । बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के भोजपुरी इलाकों में शादी ब्याह के मौके पर गाए जानेवाले लोकगीतों में महिला और पुरुष दोनों को छिनाल या छिनार कहा जाता है । शादी ब्याह के मौके पर जब महिलाएं मंगलगीत गाती हैं तो उसमें दूल्हे की मां और मौसी और फूआ को गाली दी जाती है तो उनमें छिनार शब्द का प्रयोग किया जाता है । तो यह शब्द बिल्कुल आपत्तिजनक है लेकिन वेश्या जितना अपमानजनक नहीं है । यह गाली है और किसी भी लेखक को अपनी बिरादरी की महिलाओं के लिए इस शब्द के प्रयोग की इजाजत नहीं दी जा सकती है ।
जैसा कि उपर संकेत दिया जा चुका है कि यह इंटरव्यू लगभग हफ्तेभर से छपकर विवादित नहीं हो पा रहा था क्योंकि हिंदी सत्ता की भाषा नहीं है, सत्ता की भाषा तो अंग्रेजी है । और अंग्रेजी अखबार के गैर जिम्मेदाराना अनुवाद ने आग में घी का काम किया और विरोध की चिंगारी को भड़ा दिया । लेखिलाओं का जितना अपमान विभूति नारायण राय ने किया उससे ज्यादा बड़ा अपमान तो अंग्रेजी के वो अखबार कर रहे हैं जो लगातार लेखिकाओं को वेश्या बता रहे हैं । न्यूज चैनलों को भी इस मसालेदार खबर में संभावना दिखी और एक दूसरे से आगे निकलने की होड़ में उन्होंने छिनाल और वेश्या के अंतर को मिटा दिया। किसी ने भी यह जांचने –परखने की कोशिश नहीं की कि दोनों में क्या अंतर है । मीडिया में इसके उछलने के बाद विभूति नारायण राय पर चौतरफा हमला शुरू हो गया । हिंदी के लेखकों के अलावा कई महिला संगठनों ने महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति को लेखिकाओं के खिलाफ इस अमर्यादित टिप्पणी को लेकर कठघरे में खड़ा किया और उनके इस्तीफे और बर्खास्तगी की मांग होने लगी। मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल और राष्ट्रीय महिला आयोग तक भी ये मामाला पहुंच गया । लगभग मृतप्राय लेखक संगठनों में भी जान आ गई और उन्होंने भी विभूति नारायण राय के खिलाफ एक निंदा बयान जारी कर दिया । राय ने लेखिकाओं के खिलाफ बेहद अपमानजनक और अर्मायदित टिप्पणी की है । इस बात के लिए उनको लेखिकाओं से खेद प्रकट करना ही चाहिए ।
लेकिन इस इंटरव्यू और उसके बाद उसपर उठे विवाद ने एक बार फिर से हिंदी साहित्य में लेखिकाओं के आत्मकथाओं में अश्लील प्रसंगों की बहुतायत पर बहस का एक व्यापक आधार तैयार कर दिया है । पिछले दिनों कई लेखिकाओं की आत्मकथा प्रकाशित हुई जिसमें मैत्रेयी पुष्पा की – गुड़िया भीतर गुड़िया, प्रभा खेतान की अन्या से अनन्या , मन्नू भंडारी की एक कहानी यह भी के अलावा कृष्णा अग्निहोत्री की लगता नहीं है दिल मेरा और ....और और औरत प्रमुख हैं । मन्नू जी की आत्मकथा को छोड़कर इन आत्मकथाओं में सेक्स प्रसंगों का उल्लेख मिलता है । विभूति नारायण राय जैसे हिंदी के शुद्धतावादियों को इन सेक्स प्रसंगों पर एतराज है और उन्हें लगता है कि ये जबरदस्ती ठूंसे और गढ़े गए हैं ताकि किताबों को चर्चा और पाठक दोनों मिले । ये लोग अपने तर्कों के समर्थन में जॉर्ज बर्नाड शॉ के एक प्रसिद्ध लेख का सहारा लेते हैं जिस लेख में उन्होंने आत्मकथाओं को झूठ का पुलिंदा बताया है । “ऑटोबॉयोग्राफिज़ आर लाइज़” में बर्नाड शा ने कई तर्कों और प्रस्थापनाओं से ये साबित करने की कोशिश की है कि आत्मकथा झूठ से भरे होते हैं । कुछ हद तक बर्नाड शॉ सही हो सकते हैं लेकिन ये कहना कि आत्मकथा तो झूठ का ही पुलिंदा होते हैं, पूरी तरह गले नहीं उतरती । बर्नाड शॉ के अपने तर्क हो सकते हैं लेकिन विश्व साहित्य में कई ऐसे आत्मकथा हैं जिसमें कूट-कूट कर सच्चाई भरी होती है । हिंदी में भी कई ऐसे आत्मकथा हैं जो सचाई के करीब हैं और झूठ का सिर्फ झौंक लगाया गया है । हो सकता है कि इन एतराज में सचाई हो लेकिन लेखक क्या लिखेगा यह तो वही तय करेगा । शुद्धतावादियों और आलोचक तो ये तय नहीं करेंगे । कुछ आलोचकों का तर्क है कि महिला लेखिकाओं की आत्मकथाएं भी दलित लेखकों की आत्मकथाओं की तरह टाइप्ड होती जा रही हैं- जहां कि समाज के दबंग, लेखकों के परिवार की महिलाओं के साथ लगातार बदसलूकी करते हैं । इस तर्क में कुछ दम हो सकता है लेकिन दलित और महिलाओं की जो स्थिति भारतीय समाज में है उसमें यौन शोषण की स्थितियां भी तो सामान्य हैं । इन दोनों पक्षों के तर्कों पर साहित्य में एक लंबे और गंभीर विमर्श की गुंजाइश है ।
दूसरा बड़ा सवाल जो यह इंटरव्यू खड़ा करती है वो यह कि किसी भी पत्रिका के संपादक का क्या दायित्व होता है । अगर छिनाल शब्द कहने पर विभूति नारायण राय की चौतरफा आलोचना हो रही है तो उतनी ही तीव्रता से नया ज्ञानोदय के संपादक रवीन्द्र कालिया को भी विरोध होना चाहिए । किसी भी पत्रिका में क्या छपे और क्या नहीं छपे इसकी जिम्मेदारी तो पूरे तौर पर संपादक की होती है । विभूति ने लेखिकाओं के लिए जो आपत्तिजनक शब्द कहे उसे रवीन्द्र कालिया को संपादित कर देना चाहिए था । अगर उन्होंने जानबूझकर ऐसा नहीं किया तो उनकी मंशा इस साक्षात्कार को विवादित करने और नया ज्ञानोदय के उक्त अंक को चर्चित करने की थी । अगर संपादक की यह मंशा नहीं थी और असावधानीवश वो शब्द छूट गया तो विभूति के साथ-साथ उन्हें भी खेद प्रकट करना चाहिए ।
अंत में विनम्रतापूर्वक इतना कहना चाहूंगा कि हिंदी साहित्य में विमर्श के स्तर को इतना नहीं गिराइये जहां कोई लेखक अपनी साथी लेखिकाओं को छिनाल कहे और कोई लेखिका अपने साथ के लेखकों को लफंगा । गुस्से में या जानबूझकर दोनों ही स्थितियों में मर्यादा की लक्ष्मण रेखा को लांघना अनुचित है ।
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Wednesday, July 28, 2010

उग्र और आक्रामक विमर्श

1.लीडर बनना औरतों का काम नहीं है, उनका काम लीडर पैदा करना है । कुदरत ने अल्लाह ने उन्हें इसलिए बनाया है कि वो घर संभालें, अच्छी नस्ल के बच्चे पैदा करें – शिया धर्म गुरू कल्बे जव्वाद

2.महिलाओं को अकेले मंदिर, मठ या देवालय में नहीं जाना चाहिए । अगर वो मंदिर, मठ या देवालय जाती हैं तो उन्हें पिता, पुत्र या भाई के साथ ही जाना चाहिए । नहीं तो उनकी सुरक्षा को खतरा है ।- राम जन्मभूमि न्यास अध्यक्ष महंथ नृत्यगोपाल दास

3.महिलाओं को राजनीति में नहीं आना चाहिए क्योंकि इससे समाज पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है । राजनीति महिलाओं को क्रेजी बना देती है । समाज के बदलाव में महिलाओं की महती भूमिका है और उन्हें आनेवाली पीढ़ी का ध्यान रखना चाहिए । -गोवा के मुख्यमंत्री दिगंबर कामत
4. अगर संसद में महिलाओं को आरक्षण मिला और वो संसद में आईं तो वहां जमकर सीटियां बजेंगी- सामजवादी पार्टी अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव
ये चार बयान अलग-अलग धर्म और विचारधारा के लोगों के हैं जो किसी समुदाय, वर्ग या सूबे की रहनुमाई करते हैं । दरअसल ये सारे बयान घोर सामंती व्यवस्था की पुरुषवादी मानसिकता का बेहद कुरुप चेहरा है । उस व्यवस्था का जहां महिलाएं बच्चा पैदा करने की मशीन हैं, बच्चा पालना उनका परम धर्म है । परिवार की देखभाल और अपने पति की हर तरह की जरूरतों पर जान न्योछावर करने की घुट्टी उसे जन्म से पिलाई जाती है । उस आदिकालीन वयव्स्था में महिलाएं गुलाम हैं जिनका परम कर्तव्य है अपने स्वमी की सेवा और स्वामी है पुरुष । इस पाषाणकालीन व्यवस्था में यकीन रखनेवाले पुरुषों को यह कतई मंजूर नहीं है कि महिलाएं भी पुरुषों के साथ कंधा से कंधा मिलाकर काम करें । महिलाओं को पुरुषों के बराबर हक और दर्जा मिले । महिलाएं देश की नीति नियंता बने । उपर बयान देने वाले चारो महापुरुष इसी सामंती और पुरुष प्रधान व्यवस्था के प्रतिनिधि पुरुष हैं । महिलाओं का विरोध है किसी सिद्धांत, धर्म, आस्था, विश्वास या वाद के परिधि से परे है । जब भी महिलाओं की बेहतरी की बात होती है तो सभी सिद्धांत, वाद, समुदाय, धर्म धरे रह जाते हैं । प्रबल हो जाता है कठोर पुरातनपंथी विचारधारा जो महिलाओं को सदियों से दबा कर रख रहा है और आगे भी चाहता है कि वो उसी तरह दासता और पिछड़ेपन की बेड़ियों में जकड़ी रहें ।

लेकिन अब स्थितियां बदलने लगी हैं और पितृसत्तात्मक समाज के वर्चस्व के विरोध में स्त्रियां उठ खड़ी होनी लगी हैं । राजेन्द्र यादव ने स्त्री विमर्श की जो आग सुलगाई थी अब वो लगभग दावानल बनता जा रहा है । स्त्री लेखिकाओं ने पुरुष की सत्ता को चुनौती देनी शुरू कर दी है । इन्हीं चुनौतियों के बीच पत्रकार गीताश्री की किताब– नागपाश में स्त्री- का प्रकाशन हुआ है । गीताश्री ने इस किताब का संपादन किया है जिसमें पत्रकारिता, थिएटर, साहित्य. कला से जुड़ी महिलाओं ने पुरुषों की मानसिकता और स्त्रियों को लेकर उनके विचारों को कसौटी पर कसा है । गीताश्री की छवि भी स्त्रियों के पक्ष में मजबूती से खड़े होने की रही है और पिछले कुछ वर्षों से उन्होंने अपने लेखन से स्त्री विमर्श को एक नया आयाम दिया है । गीताश्री का बेबाक और आक्रामक लेखन पुरुषों की स्त्री विरोधी मानसिकता को शिद्दत से चुनौती देता है । अपनी इस किताब की भूमिका में लेखिका ने लिखा- आज बाजार के दबाव और सूचना-संसार माध्यमों के फैलाव ने राजनीति, समाज और परिवार का चरित्र पूरी तरह से बदल डाला है, मगर पितृसत्ता का पूर्वाग्रह और स्त्री को देखने का उसका नजरिया नहीं बदला है, जो एक तरफ स्त्री की देह को ललचायी नजरों से घूरता है तो दूसरी तरफ उससे कठोर यौन-शुचिता की अपेक्षा भी रखता है । पितृसत्ता का चरित्र भी वही है । हां समाज में बड़े पैमाने पर सक्रिय और आत्मनिर्भर होती स्त्री की स्वतंत्र चेतना पर अंकुश लगाने के उसके हथकंडे जरूर बदले हैं । गीताश्री ने अपने इस कथन ते समर्थन में कई उदाहरण दिए हैं । कमोबेश यही स्थिति समाज में व्याप्त है । यह हमारे समाज की एक कड़वी हकीकत है कि पुरुष चाहे जितने स्त्रियों के साथ संबंध बनाए उसकी इज्जत पर बट्टा नहीं लगता है बल्कि वो फख्र से सीना चौड़ा कर इसे एक उपलब्धि की तरह से पेश करता है । लेकिन वहीं अगर स्त्री ने अपनी मर्जी से अपने पति के अलावा किसी और मर्द के साथ संबंध बना लिया तो इसके चरित्र, उसकी पारिवारिक पृष्ठभूमि, उसकी शिक्षा-दीक्षा सभी सवालों के घेरे में आ जाते हैं । वो कुलटा तक करार दे दी जाती हैं ।

लेकिन अब हालात तेजी से बदलने लगे हैं, स्त्रियां भी अपने मन की करने लगी हैं । इसी किताब के अपने एक लेख में उपन्यासकार मैत्रेयी पुष्पा ने कहा है – औरत करती वही है जो उसका दिल करता है, दिखावा चाहे वो जो करे । समाज के लिए स्त्री के प्रेम संबंध अनैतिक हो सकते हैं मगर स्त्री के लिए नैतिकता की पराकाष्ठा है । मैत्रेयी पुष्पा ने माना है कि आवारा लड़कियां ही प्यार कर सकती हैं । अपने लेख में मैत्रेयी पुष्पा ने इस बात का खुलासा नहीं कि वो किस प्यार की बात करती हैं- दैहिक या लौकिक । क्योंकि उन्होंने लिखा है कि मेरे पांच सात प्रेमी रहे तो उम्र के अलग-अलग पड़ाव पर मुझे मिले । लेकिन लेख में नायब साहब और एदल्लला के साथ तो प्यार जैसी कोई चीज थी, देह तो बीच में कभी आई ही नहीं । इस किताब में बुजुर्ग लेखिका रमणिका गुप्ता का भी एक बेहद लंबा और उबाऊ लेख है । रमणिका गुप्ता ने बेवजह अपने लेख को लंबा किया है । किताब की संपादक को इस पर ध्यान देने की जरूरत थी । अपने लंबे और उबाऊ लेख के अंत में रमणिका गुप्ता ने भारतीय समाज में स्त्रियों की बदतर हालत के लिए धर्म और सामाजिक परंपरा को जिम्मेदार ठहराया है । अपने इस तर्क के समर्थन में गुप्ता ने दो उदाहरण भी दिए हैं । पहला उड़ीसा और दूसरा मध्यप्रदेश का है जहां अठारह बीस साल की लड़कियों का विवाह बालकों से कर दिया जाता है । परंपरा की आड़ में तर्क यह दिया जाता है कि खेतों में और घर का काम करने के लिए जवान लड़की चाहिए । लेकिन इस तरह के विवाह में योग्यता ससुर की परखी जाती है । पति के जवान होने तक बहू ससुर के साथ देह संबंध बनाने के लिए अभिशप्त होती है । मनुस्मृति में भी कहा गया है – पति की पूजा विश्वसनीय पत्नी द्वारा भगवान की तरह होनी चाहिए, यदि वह अपनी ‘सेवाएं’ देने में किसी तरह की भी कोई कोताही बरते तो उसे राजा से कहकर कुत्तों के सामने फिंकवा देना चाहिए । अपने इसी लेख में रमणिका गुप्ता ने यह भी कहा है कि दलित स्त्रियां सवर्ण स्त्रियों की तुलना में ज्यादा स्वतंत्र होती है । इस बात तो साबित करने के लिए भी रमणिका के अपने तर्क हैं ।

जैसा कि उपर बताया गया है कि इस किताब में साहित्य के अलावा अन्य क्षेत्र की महिलाओं के भी लेख हैं । आमतौर पर सारे लेख वयक्तिगत अनुभवों के आधार पर लिख गए हैं । मशहूर गायिका विजय भारती का भी एक दिलचस्प लेख इस किताब में संग्रहीत है । विजय भारती ने अपने लेख में यह साबित करने की कोशिश की है कि समाज और परिवार में किस तरह से बचपन से ही लड़कियों को यौन शुचिता की घुट्टी पिलाई जाती है । जब बचपन में लड़कियां खेलने जाती हैं तो उनको यह कहा जाता है कि देखना लड़कों के साथ मत खेलना माने लड़कों के साथ खेलने से उसकी शुचिता नष्ट हो जाएगी । बचपन की बात क्यों जवान लड़कियां भी दजब घर से बाहर निकलती हैं तो परिवार के लोग उसके साथ छह सात साल के उसके भाई को लगा देते हैं, जो उसकी रक्षा करेगा । यह एक ऐसी हकीकत है जिससे आपको हर रोज दो चार होना पड़ता है । विजय भारती ने अपनी एरक कविता के जरिए अपनी बात रखी है – हैं कई गरमागरम उसके फसाने शहर में/घात के मेले लगे हैं इस बहारे शहर में/रुख हवाओं के, उसे लूटा किए हर कदम पे/बने अपने ही लुटेरे, कितने जाने शहर में/दुश्मनी उसकी किसी से कुछ न थी, कुछ नहीं है/आग लेकर क्यों खड़े हैं लोग अपने शहर में/

इनके अलावा फायरब्रांड और अपनी लेखनी को एके 47 की तरह इस्तेमाल करनेवाली मनीषा ने अपनी खास शैली में अपनी बात कही है । मनीषा लिखती हैं कि भारत में चालीस साल के उपर के लगभग नौ करोड़ आदमी स्वीकृत रूप से नपुंसक हैं, जाहिरा तौर पर उनकी सेक्स जाती रही हो । पर सामाजिक पारिवारिक दबावों में इनकी पत्नियां चूं तक नहीं कर पाती । ...और अगर स्त्री बच्चा नहीं जन सकती तो भी उसकी शारीरिक संरचना पुरुष को भरपूर यौनानंद देने के काबिल तो रहती ही है । मनीषा की जो शैली है वो बेहद तीखी और खरी-खरी कहने की है – लड़की बिन ब्याह के अगर किसी लड़के का लिंग छू ले तो ये भ्रष्ट हो जाएगी पर आप अपनी कोहनियां उसके स्तनों में खोंसते फिरें तो यह धार्मिकता मानी जाएगी । इसके अलावा जयंती, निर्मला भुराड़िया, असीमा भट्ट के भी पुरुष सत्ता के खिलाफ आग उगलते लेख इस किताब में हैं ।

कुल मिलाकर अगर हम स्त्री विमर्श के प्रथम पुरुष राजेन्द्र यादव को समर्पित इस किताब पर समग्रता से विचार करें तो यह लगता है कि राजेन्द्र यादव की पीढ़ी ने जिस विमर्श की शुरुआत की थी वो अब विरोध से आगे बढ़कर विद्रोह की स्थिति में जा पहुंचा है । इस लिहाज से गीताश्री की यह किताब अहम है कि युवा लेखिकाओं के विचार बेहद उग्र और आक्रामक हैं । जो बात स्त्री विमर्श का झंडा बुलंद करनेवाली लेखिकाएं खुलकर नहीं कह पा रही थी वो बात अब युवा लेखिकाओं के लेख में सामने आने लगी है । इन युवा लेखिकाओं के तेवरों से यह लगता है कि स्त्री विमर्श ने एक नया मुकाम और नई शब्दावली भी तैयार कर ली है । लेकिन लाख टके का सवाल यही है कि क्या सदियों पुरानी परंपराओं और मानसिकता को बदलना इतना आसान है जबाव है नहीं लेकिन इस वजह से प्रयास तो छोड़े नहीं सकते, और उसी का नतीजा है – नागपाश में स्त्री

Sunday, July 25, 2010

बेवफाई का सुपर धमाका

हिंदी साहित्य में रवीन्द्र कालिया की ख्याति उपन्यासकार, कहानीकार और संस्मरण लेखक के अलावा एक ऐसे बेहतरीन संपादक के रूप में भी है जो लगभग मृतप्राय पत्रिकाओं में भी जान फूंक देते हैं । रवीन्द्र कालिया हिंदी के उन गिने चुने संपादकों नें से एक हैं जिनको पाठकों की नब्ज और बाजार का खेल दोनों पता है । धर्मयुग में जब रवीन्द्र कालिया थे तो पत्रिका के तेवर और कलेवर में उनका भी योगदान था लेकिन जैसा कि आमतौर पर होता है कि हर बड़ी-छोटी जीत का सेहरा टीम के कप्तान के सर बंधता है । बाद के दिनों में जब कालिया जी की धर्मवीर भारती से खटपट हुई तो वो लौटकर इलाहाबाद चले आए । यह वही दौर था जब कालिया जी ने काला रजिस्टर लिखा था । इलाहाबाद लौटकर रवीन्द्र कालिया ने जब गंगा-जमुना निकाला तो उसने भी साहित्य जगत में धूम मचा दी थी । हिंदी के पाठकों को उन्नीस सौ इक्यानबे में निकले वर्तमान साहित्य के दो कहानी महाविशेषांक अब भी याद होंगे । वर्तमान साहित्य के दो भारी भरकम अंक अप्रैल और मई उन्नीस सौ इक्यानवे में प्रकाशित हुए थे । उस दौर में मैं कॉलेज का छात्र था और मुझे याद है कि जमालपुर के व्हीलर के स्टॉल चलानेवाले पांडे जी ने हमें वर्तमान साहित्य के वो अंक चुपके से इस तरह सौंपे थे जैसे कोई बेहद कीमती चीज छुपाकर देता हो । उस वक्त मुझे अजीब लगा था । कई दिनों बाद जब मैंने पांडे जी से पूछा तो उन्होंने बताया था कि उक्त अंक की दस ही प्रतियां आई थी और साहित्यानुरागी पांडे जी के मुताबिक उसके ज्यादा खरीदार हो सकते थे । सो उन्होंने अपने चुनिंदा ग्राहकों को छुपाकर वर्तमान साहित्य का कहानी महाविशेषांक दिया था । यह हिंदी में पहली बार हुआ था जब किसी भी विशेषांक को महाविशेषांक बताया गया हो । जैसा कि मैं उपर कह चुका हूं कि कालिया जी को पाठकों की रुचि के साथ-साथ बाजार की भी समझ है । वर्तमान साहित्य से पहले इस तरह का आयोजन उन्नीस सौ अट्ठावन –साठ में कहानी पत्रिका ने किया था, जिसके संपादक श्रीपत राय थे । कहानी के उन अंकों में अमरकांत की डिप्टी कलेक्टरी , कमलेश्वर की राजा निरवंसिया, मार्केंडेय की हंसा जाई अकेला जैसी बेहद प्रसिद्ध रचनाएं छपी थी ।
यही बात वर्तमान साहित्य के कहानी विशेषांक के साथ भी हुई । कालिया जी ने उन दो अंकों में लगभग संपूर्ण हिंदी साहित्य का समेट कर रख दिया था । कृष्णा सोबती की लंबी कहानी ए लड़की वर्तमान साहित्य के उस महाविशेषांक में ही छपी थी । बाद में स्पीड पोस्ट में उसपर तीन गंभीर टिप्पणियां छपने से कहानी को खासी चर्चा मिली । बाद में यह उपन्यास के रूप में स्वतंत्र रूप से प्रकाशित हुई । साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त मशहूर लेखिका अलका सरावगी की पहली कहानी – आपकी हंसी भी वर्तमान साहित्य के महाविशेषांक में ही प्रकाशित हुई थी । उस अंक में उपेन्द्र नाथ अश्क का एक बेहद धमाकेदार लेख- महिला कथा लेखन की अर्धशती भी प्रकाशित हुई थी । किसी भी संपादक की दृष्टि पत्रिका को एक उंचाई देती है । और कालिया ने इसे एक बार नहीं कई बार साबित किया ।
जब रवीन्द्र कालिया वागर्थ के संपादक होकर कोलकाता गए तो भारतीय भाषा परिषद की उस दम तोड़ती पत्रिका को भी ना केवल खड़ा कर दिया बल्कि हिंदी साहित्य की मुख्यधारा में लाकर उसे एक अहम पत्रिका बना दिया । वागर्थ का संपादन छोड़कर जब वो नया ज्ञानोदय आए तो इस पत्रिका का हाल भी बेहाल था और साहित्य के नाम पर बेहद ठंढी और विचारोत्तेजक सामग्री के आभाव में ज्ञानोदय एक सेठाश्रयी पत्रिका बनकर रह गई थी जो इस लिए निकल पा रही थी क्योंकि उसका प्रकाशन टाइम्स जैसे बड़े ग्रुप से हो रहा था । लेकिन कालिया ने संपादक का दायित्व संभालते ही ज्ञानोदय को हिंदी साहित्य की अनिवार्य पत्रिका बना दिया । रवीन्द्र कालिया के ज्ञानोदय के संपादक बनने के पहले हंस और उसके संपादक राजेन्द्र यादव समकालीन हिंदी साहित्य का एजेंडा सेट किया करते थे । लेकिन जब मई दो हजार सात में कालिया के संपादन में युवा पीढी विशेषांक निकला तो पहली बार ऐसा लगा कि हंस के अलावा कोई और पत्रिका है जो साहित्य का एजेंडा सेट कर सकती है । संपादक ने दावा किया कि दो हजार सात में छपे युवा पीढी विशेषांक की मांग इतनी ज्यादा हुई थी कि उसे पुनर्मुद्रित करना पडा़ था । नया ज्ञानोदय के उक्त अंक को लेकर उस वक्त अच्छा खासा बवाल भी मचा था लेकिन आखिरकार रचना ही बची रहती है सो उस अंक का एक स्थायी महत्व बना रहा । धीरे धीरे पहले नवलेखन अंकों से कहानीकारों की एक नई फौज खड़ी कर दी । उसके बाद चार लगातार अंकों में प्रेम विशेषांक निकालकर बिक्री के भी सारे रिकॉर्ड तोड़ डाले । संपादक के दावे के मुताबिक प्रेम विशेषांकों की कड़ी के पहले अंक को पाठकों की मांग पर कई बार प्रकाशित करना पड़ रहा है । आज जब हिंदी के साहित्यिक पत्रिकाओं के संपादक पाठकों की कमी और बिक्री ना होने का रोना रो रहे हैं ऐसे में कालिया का ये दावा एक सुखद आश्चर्य की तरह है ।
अब कालिया जी ने नया ज्ञानोदय का बेवफाई सुपर विशेषांक-1 निकाला है । कहानी महाविशेषांक वो पहले ही निकाल चुके हैं । पाठकों को हर बार कोई नई चीज देनी होती है लिहाजा अब सुपर विशेषांक । संपादकीय की पहली ही लाइन है- अगर वफा का अस्तित्व ना होता तो बेवफाई नहीं होती । कई शायरों के मार्फत भी कालिया जी ने बेवफाई को परिभाषित किया है । तकरीबन सवा दौ सौ पन्नों के इस महाविशेषांक में वह हर रचना मौजूद है जो पाठकों को ना केवल बांधे रखेगी बल्कि उसकी साहित्यिक वफा को और मजबूत करेगी । इस विशेषांक में प्रेमचंद, मंटो, इस्मत चुगताई से लेकर ओ हेनरी, मोपासां, हेमिंग्वे तक मौजूद हैं । बेवफाई पर गुलजार ने जब ज्ञानोदय संपादक को अपनी नज्में भेजी तो लिखा- जनाब रविन्द्र कालिया साहब । बे-वफायी पर कुछ नज्में । मेरे यहां कुछ इल्जाम-देही और गिले शिकवे नहीं हैं । मेरा ख्याल है वो बे-वफायी भी नहीं । बस अलग हो गए । बे-वफायी कैसी । नज्में ज्यादा है ताकि आप कुछ रद्द कर सकें । बे-वफायी को बस अलग हो गए मानने वाले गुलजार की नज्म देखिए – और तुम ऐसे गई जैसे /शहर की बिजली चली जाए अचानक जैसे/और मुझको/बंद कमरे में बहुत देर तलक कुछ भी दिखायी नहीं दिया/आंखें तारीकी से मानूस हुई तो.../फिर से दरवाजे का खाका सा नजर आया/ । सिर्फ गुलजार ही नहीं बेवफायी पर बशीर बद्र की नज्में भी बेहतरीन हैं । इसके अलावा विदेशी उपन्यासों में, मीडिया में, फिल्मों में और इंटरनेट की बेवफाइयों पर भी अहम लेख हैं । कुल मिलाकर यह अंक पठीनय तो है ही संग्रहणीय भी है । बेवफाई सुपर विशेषांक -2 का भी ऐलान है जिसमें नोवोकोब का प्रसिद्ध उपन्यास लोलिता भी प्रकाश्य है । आखिरकार लोलिता भी तो अंत में बेवफाई पर ही खत्म होती है । कालिया जी का यह प्रयोग काबिल-ए-तारीफ है ।