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Wednesday, September 9, 2015

बाजार को सही पकड़े हैं...

गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस में एक प्रसंग में लिखा है – घन घमण्ड नभ गरजत घोरा/ प्रियाहीन डरपत मनमोरा । गोस्वामी जी इस पूरे प्रसंग में मौसम, बारिश और उफनती नदी के बहाने से नीतियों की बात करते हैं । राम और लक्ष्मण के इस संवाद में समाज और राजकाज के बारे में राम अपने विचार प्रकट करते हैं । दरअसल इस तरह की बातें करके राम अपने मन की बात अनुज लक्ष्मण से छिपाना चाहते हैं । लेकिन प्रियतमा का विछोग छुपाना मुश्किल है और मर्यादा पुरुषोत्तम होते हुए भी राम के मुख से उपरोक्त पंक्तियां निकल ही जाती हैं । वो बारिश के मौसम में सीता के वियोग का दर्द उनकी जुबां पर आ ही जाता है । हिंदी के वरिष्ठ लेखकों की हालत भी राम के जैसी ही है । वो भी मन ही मन बाजार की चाहत रखते हैं लेकिन नीतियों, सिद्धांतों और विचारधारा की वजह से उसकी बात करना उचित नहीं समझते हैं । उन्हें लगता है कि सार्वजनिक रूप से बाजार की वकालत करने से उनकी छवि पर विपरीत असर पड़ेगा, ठीक वैसे ही जैसे राम के मन में ये द्वंद चलता है कि अपनी प्रियतमा के विछोह के दर्द को अपने छोटे भाई के साथ कैसे साझा करें । हिंदी के साहित्यकारों के लिए अब तक बाजार एक अछूत की तरह था । बाजार का नाम लेना तक उन्हें गंवारा नहीं था और जब भी उनके लबों पर बाजार आता था तो उसके खिलाफ ही आवाज निकलती थी । यह विरोधाभास हिंदी में लंबे समय तक चलता रहा । विरोधाभास इस वजह से कि लेखक कोई भी रचना लिखता है तो उसकी आकांक्षा होती है कि वो छपे । जैसे ही वो प्रकाशक के पास जाता है वैसे ही वो बाजार में प्रवेश करता है । किताब छपने के बाद हर लेखक की आकांक्षा होती है कि वो हिंदी के विशाल पाठक वर्ग तक पहुंचे । अब ये जो चाहत है वो बाजार के बगैर पूरी नहीं हो सकती । किताब छपने और बिकने के तंत्र में बाजार आवश्यक है । हमारे हिंदी के लेखक इस बात को नहीं समझ पाए और विचारधारा की जकड़न में बेवजह बाजार का विरोध करने लगे । नतीजा यह हुआ कि बाजार भी हिंदी साहित्य के प्रति उदासीन होता चला गया । हाल के दिनों में अलका सरावगी ने फेसबुक के जरिए बाजार में अपनी पैठ बनाने की छोटी सी कोशिश की तो उनकी हिंदी के लोगों ने इतनी लानत मलामल कि दूसरे लेखकों को उस तरह की पहल करने से पहले सोचने को मजबूर होना पड़ेगा । हिंदी साहित्य जगत में अक्सर ये बात सुनी जाती है कि साहित्यक किताबें नहीं बिकतीं । प्रकाशक भी बिक्री नहीं होने की बात करते हुए साहित्यक कृतियों के प्रकाशन के प्रति उत्तरोतर उदासीन होने लगे हैं । कविता के प्रकाशक तो मिलने लगभग बंद हो गए हैं । बाजार और बाजार का विरोध विचारधारा के आधार पर करने को गलत ठहराना इस लेख का मकसद नहीं है । मकसद सिर्फ इतना जाहिर करना है कि इस ठस मानसिकता और विरोध ने साहित्य का कितना नुकसान किया ।

अब  स्थितियां थोड़ी बदलने लगी हैं । बाजार और उसके औजारों का उपयोग लेखक अपनी रचनाओं से लेकर उसकी बिक्री तक में करने लगे हैं । इसके सकारात्मक नतीजे भी मिलने लगे है । हिंदी के युवा लेखकों ने अपनी भाषा बदली, कहानी का विषय वस्तु बदला, परिवेश बदला और सबसे बड़ी बात कि रूढ़ होता जा रहा यथार्थ भी उनके रचनाओं में नए रूप में आने लगा । अब हम अगर इस वक्त के समकालीन साहित्यक परिदृश्य डालते हैं तो जो युवा या युवा होने की दहलीज पार कर चुके हैं उनकी रचनाओं में एक तरह का टटकापन नजर आता है । अगर हम उपन्यास लेखन पर बात करें तो जिस तरह से पंकज दूबे और सत्य व्यास ने अपने पहले ही उपन्यास से हिंदी के पाठकों को ना केवल चौकाया बल्कि उसकी बिक्री ने भी पहली कृति के लिहाज से सफलता के झंडे गाड़ दिए । पंकज दूबे के उपन्यास ‘लूजर कहीं का’ दो भाषाओं में लिखा गया- अंग्रेजी और हिंदी । अंग्रेजी में भी वो काफी सफल रहा । पंकज दूबे ने अपने इस उपन्यास को सफल बनाने के लिए बाजार से दोस्ती की । विषयवस्तु में नयापन था, प्रेम भी वैसा ही था जो कॉलेज के दिनों में होता है, बस कमी थी पाठकों तक पहुंचने की, जैसे ही इस कमी को दूर किया गया पाठकों के साथ साथ बाजर ने उसको हाथों हाथ लिया । इसी तरह से सत्य व्साय के उपन्यास ‘बनारस टॉकीज’ को भी पाठकों ने हाथों हाथ इस वजह से लिया कि उसने अपनी भाषा से, अपने कथानक से अपन किस्सागोई से पाठकों को अपनी ओर खींचा । भाषा को उसकी शुद्धता के जकड़न से मुक्त कर विश्वविद्लाय के छात्रों के बीच बोली जानेवाली भाषा को अपनाया । जैसे ‘बाबा’ शब्द विश्वविद्लायों में काफी चलता है, सत्य ने इस शब्द को अपने एक चरित्र के माध्यम से जीवंत कर दिया । इन दोनों उपन्यासों में लेखकों ने शीर्षक भी पाठकों के साथ साथ बाजार को ध्यान में रखते हुए चुना है । लूजर कहीं का और बनारस टॉकीज । शीर्षक के अलावा दोनों किताबों की कीमत भी कम सवा सौ रुपए के रेंज में है । दोनों लेखकों और उनके प्रकाशकों ने भी इन किताबों को बेचने के लिए सोशल मीडिया से लेकर ऑनलाइन बुक स्टोर्स पर जमकर प्रचार किया । नतीजा मिला । पंकज दूबे का नया उपन्यास ‘इश्कियापा’ भी छपकर आनेवाला है । उस किताब का कवर उसके प्रकाशक ने रिलीज कर दिया है और किताब को लेकर पाठकों के बीच उत्सकुकता का माहौल बनाने का काम भी जारी है । इसी तरह अभी वाणी प्रकाशन से प्रभात रंजन की किताब ‘कोठागोई’ प्रकाशित हुई है । इस किताब में हिंदी के लगभग वर्जित प्रदेश में लेखक घुसता है और वहां से कहानी को उठाता है । बिहार के मुजफ्फरपुर की बदनाम बस्ती चतुर्भुज स्थान में संगीत की एक समृद्ध परंपरा थी जो कि बदनामी में दबी हुई थी । प्रभात ने उसको उठाकर सामने रख दिया । इसके अलावा प्रभात रंजन और उसके प्रकाशक ने भी बाजार से रार नहीं ठानी और उसकी ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाया । किताब की बिक्री बढ़ाने के लिए ऑफर से लेकर उपलब्धता तक को इंश्योर किया गया । यासिर उस्मान नाम के एक युवा लेखक ने राजेश खन्ना पर हिंदी और अंगेजी दोनों भाषाओं में एक साथ लिखा – राजेश खन्ना, कुछ तो लोग कहेंगे । राजेश खन्ना भारतीय सिनेमा का एक ऐसा किरदार है जिसके बारे में अब भी किवदंतियां चलती हैं । यासिर की इस पहली किताब को भी पाठकों ने हाथों हाथ लिया । हिंदी के एक और प्रकाशक हिंदी युग्म ने भी बाजार को लेखक के साथ जोड़ने का उपक्रम शुरू किया है ।कम कीमत की पुस्तकें और ऑनलाइन बिक्री का कॉकटेल । इसका नतीजा भी मिल रहा है । अनु सिंह चौधरी से लेकर निखिल सचान तक की किताबों की जमकर बिक्री हो रही है । प्रकाशक का दावा है कि उनके लेखकों के किताबों की ऑनलाइन प्री बुकिंग भी होती है । यह बहुत अच्छी बात और साहित्य के लिए शुभ संकेत है। हिंदी युग्म ने बिल्कुल नए लेखकों को अपने साथ जोड़ा और उनको ऑनलाइन बिक्री के प्लेटफॉर्म पर पाठकों के सामने पेश कर दिया । उनका दावा है कि उनकी कई किताबें हजारों में बिकी हैं । अब एक दूसरा पक्ष । गीताश्री ने अपने नए कहानी संग्रह- स्वप्न साजिश और स्त्री में अपनी भाषा और नए कथ्य से पाठकों को चौकाया है । गीताश्री के पास चमत्कृत कर देनेवाली भाषा है और  विषय का नयापन भी । अगर इस किताब को प्रकाशक ऑनलाइन स्टोर्स पर उपलब्ध करवा सकें तो यह पाठकों के बीच जबरदस्त लोकप्रिय होने के पूरे आसार हैं ।  साहित्य में युवा लेखकों ने जिस तरह से बाजार की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाया है और खुद को विचारधारा आदि की जकड़ने से मुक्त कर पाठकों को ध्यान में रखकर लिखना शुरू किया है वह एक शुभ संकेत हैं । लेखक और प्रकाशक के साझा प्रयास से बाजर पर फतह संभव है । बाजारवाद के इस दौर में बुद्धिमानी यही है कि बाजार का अपने हक में इस्तेमाल करें, इससे साहित्य, साहित्यकार और पाठक तीनों का भला होगा, प्रकाशक का तो होगा ही । 

Tuesday, September 8, 2015

'हंस' के तेवर को क्या हुआ

पिछले हफ्ते 28 अगस्त को हिंदी की बहुपठित और प्रतिष्ठित पत्रिका हंस के संपादक और कथाकार राजेन्द्र यादव का जन्मदिन था । आज अगर यादव जी जीवित होते तो वो छियासी साल के होते । करीब दो साल पहले जब उनका निधन हुआ था तब ये सवाल उठा था कि उनके संपादन में निकलनेवाली पत्रिका हंस का क्या होगा । उनकी मृत्यु के बाद कथाकार और रंगकर्मी संजय सहाय को हंस के संपादन की कमान सौंपी गई । राजेन्द्र जी के निधन के बाद जो अंक निकला था उसमें यादव जी की पत्नी और वरिष्ठ कथाकार मन्नू भंडारी ने पाठकों को आश्वस्त किया था कि हंस लगातार निकलता रहेगा । उस संदेश में यह भी अंतर्निहित था कि यादव जी की परंपरा पर ही हंस आगे बढ़ेगा । हंस की आवर्तिता बरकरार है लेकिन यादव जी की कमी को साफ तौर पर खटक रही है । राजेन्द्र यादव के संपादन में जब हंस निकलता था तो उसकी अपनी एक अलग पहचान और अलग तेवर था । दरअसल राजेन्द्र जी में हर अंक में कुछ नया करने की ललक होती थी । इसके लिए वो महीने भर लगातार लेखकों और पाठकों से संवाद करते थे । बातीचत में वो हमेशा ये कहा करते थे कि एक संपादक को लगातार संवाद करते रहना चाहिए था । नतीजा सबके सामने था । मेरा मानना है कि वो जितने बेहतर कहानीकार थे उतने ही बेहतर संपादक भी थे, थोड़े बेहतर भी कह सकते हैं । उनके संपादन में हंस ने जिस वैचारिक ताप से हिंदी साहित्य को झकझोरा था वो ठंडा पड़ता नजर आ रहा है । हंस के संपादकीय के लिए हमारे जैसे पाठक पूरे महीने इंतजार करते थे । यादव जी एक स्टैंड लेते थे और फिर उसपर बहस ही नहीं करते थे बल्कि टिके भी रहते थे, तमाम विरोध और आक्रमणों के बावजूद ।
यादव जी के बाद हंस को निकलते लंबा वक्त हो गया । अबतक नए संपादक की छाप उसपर दिखने लगनी चाहिए थी । लेकिन हंस अब एक आम साहित्यक पत्रिका की भीड़ में शामिल हो गया है । जिसमें कुछ नियमित स्तंभ होते हैं, चंद कहानियां होती हैं और कुछ कविताएं । राजेन्द्र जी हमेशा कहा करते थे कि छोटे लेख लिखा करो । उनकी भाषा में – ज्यादा ज्ञान मत पेलो यार । पाठकों पर रहम करो । अब ये देखकर हैरानी होती है कि हंस में अकादमिक किस्म के, लंबे-लंबे बोरियत से भरपूर लेख प्रकाशित होते हैं । हंस को हंस बनाने के लिए यादव जी जितने सक्रिय या सजग रहते थे उसका अभाव दिखता है । यादव जी की एक खास बात और थी कि वो पूरे विश्व में साहित्य जगत में नया क्या हो रहा है इसको जानने के लिए उत्सुक ही नहीं रहते थे, हंस के पाठकों तक उसको पहुंचाने के लिए प्रयत्नशील भी रहते थे । लिहाजा उनसे विश्व साहित्य पर बात करके बहुत मजा आता था । कई बार वो ये भी कहते थे कि अमुक तरह की रचना तो पचास के दशक में फलां लेखक ने लिखी थी । यादव जी खुद ही नया से नया पढ़ते थे और उसमें से अगर उनको कुछ पाठकों के लिए जंचता था तो फौरन उसको छापते थे । हंस से जुड़े लोग इस बात की तस्दीक कर सकते हैं । हलांकि यादव जी को सौ फीसदी जानने और समझने का दावा कोई नहीं कर सकता है । उन्होंने खुद एक साक्षात्कार में मुझसे कहा था कि वो खुद अपने को नहीं समझ पाए तो और कोई क्या उनको समझ पाएगा । यादव जी के जाने के बाद हिंदी जहत में जो सन्नाटा पैदा हुआ है वो उनके निधन के लगभग दो साल बाद भी थोड़ा भी भरा नहीं जा सका है । हंस से जो अपेक्षा थी वो अबतक अपेक्षा ही है ।


Sunday, September 6, 2015

पुरस्कार वापसी या प्रचार पिपासा !

कन्नड़ के लेखक प्रोफेसर एम एम कालबुर्गी की हत्या के विरोध में साहित्यक और सांस्कृतिक जगत उद्वेलित है । सोशल मीडिया से लेकर सड़क तक इस हत्या के विरोध में प्रदर्शन आदि भी हो रहे हैं । हत्यारों को पकड़ने और उसको सजा देने की मांग लगातार जोड़ पकड़ रही है । कर्नाटक में 30 अगस्त को प्रोफेसर एमएम कालबुर्गी की हत्या के बाद धीरे-धीरे विरोध के स्वर तेज होते जा रहे हैं । विरोध का स्वर इस बात को लेकर भी तीखा है कि प्रोफसर कालबुर्गी वामपंथी विचारक लेखक थे और उनकी हत्या का आरोप हिंदूवादी संगठन पर लग रहा है । इस बहाने से वामपंथ के अनुयायियों को हिंदुत्ववादियों पर हमला करने का अवसर मिल गया है । गांधी के इस देश में किसी की भी हत्या का इससे भी तीव्र विरोध होना चाहिए । हत्या के विरोध में सिर्फ किसी खास विचारधारा के लोगों के प्रदर्शन की बजाए पूरे समाज को उठ खड़ा होना चाहिेए । सभ्य समाज में हिंसा के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए । प्रोफसर कालबुर्गी छिहत्तर साल के बुजुर्ग लेखक थे और कर्नाटक के धारवाड़ में सेवानिवृत्ति के बाद अपनी जिंदगी गुजार रहे थे । उन्हें पहले भी कुछ स्वयंभू हिंदू संगठनों से धमकियां मिली थीं क्योंकि वो अपने विचारों से रैशनलिस्ट माने जाते रहे हैं । धर्म आदि पर उनके विचार बहुधा धार्मिकता और अंधविश्वास आदि पर चोट करती थी । दो हजार चौदह में भी प्रोफेसर कालबुर्गी ने मूर्ति पूजा के विरोध में एक बेहद आपत्तिजनक बयान दिया था । तब उन्होंने कहा था कि बचपन में वो भगवान की मूर्तियों पर पेशाब करके ये देखा करते थे कि वहां से कैसी प्रतिक्रिया मिलती है । यह विचार एक ऐसा छोर है जो कि मूर्तिपूजकों की भावनाओं को आहत कर सकता है । भवनाएं आहत होने पर कानून में उसके लिए प्रावधान है, इसका यह मतलब नहीं है कि किसी का कत्ल कर दिया जाए । विचारों की लड़ाई में खूव खराबे या हिंसा को कोई स्थान नहीं होना चाहिए । चंद सिरफिरे लोग ही इस तरह की हरकतें करते हैं । इसके पहले भी लिंगायत समाज के अराध्य बासव और उनकी पत्नी और बेटी के बारे में विवादित लेखन कर कालबुर्गी विवादों में घिरे थे । बाद में उन्होंने लिंगायत समुदाय के तगड़े विरोध के बाद खेद आदि भी जताया था । यह विरोध का लोकतांत्रिक तरीका था और इसका हक हमारा संविधान हमें देता है । अभिव्यक्ति की आजादी की गारंटी संविधान उस वक्त तक ही देता है जबतक कि उस आजादी से किसी अन्य शख्स के अधिकारों का हनन ना हो । दरअसल होता यह है कि कई बार हम अभिव्यक्ति की आजादी के हक को माते हुए अभिव्यक्ति की अराजकता तक जा पहुंचते हैं । विचारों की लड़ाई में बहुधा हम इस महीन सी लाइन के पार भी चले जाते हैं, उसका विरोध भी होता है, मंथन भी होता है, तर्क वितर्क होते हैं । हमें यह मालूम है कि मंथन से विष भी निकलता है लेकिन विचारों के मंथन से जो विष निकलता है वो जानलेवा नहीं होता है । होना भी नहीं चाहिए । जिस दिन विचार मंथन से निकलनेवाला विष जानलेवा हो जाएगा उस दिन ना तो हमारे समाज में विचार के लिए जगह बच पाएगी और ना ही अभिव्यक्ति की आजादी का माहौल रहेगा । हमें इतिहास को नहीं भूलना चाहिए कि किस तरह से सोवियत रूस और चीन में विचारों को लेकर हत्या का खेल खेला गया । किस तरह से विरोधी विचारधारा वाले लेखकों और पत्रकारों को यातनाएं दी गईं, किस तरह से राजसत्ता के द्वारा उनकी या तो हत्या कर दी गई या फिर उनको देश छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा था। चीन में तो अब भी यह आजादी हासिल नहीं है ।   
प्रोफेसर कालबुर्गी की हत्या के बाद एक बार फिर से फेसबुकिए वामपंथी चिंतकों ने फासीवाद के आसन्न खतरे पर शोर मचाना शुरू कर दिया । दरअसल हमारे देश में वामपंथ के अनुयायी होने का दंभ भरनेवाले जो लोग चिंतक, विचारक आदि बने घूम रहे हैं उनको लगता है कि इस तरह की बातों से ही उनकी दुकानदारी कायम रह सकती है । पहले भी वो ऐसा कर अपनी प्रासंगिकता बचाए रखने में कामयाब रहे हैं । इस तरह के फेसबुकिए वामपंथियों को अब हिंदी के जादुई यथार्थवादी कहानीकार उदय प्रकाश में एक नया नायक नजर आने लगा है । दरअसल उदय प्रकाश ने प्रोफेसर कालबुर्गी की हत्या के विरोध में साहित्य अकादमी पुरस्कार राशि समेत लौटाने का एलान कर दिया है । फेसबुक पर उदय प्रकाश ने लिखा- ‘पिछले समय से हमारे देश में लेखकों, कलाकारों, चिंतकों और बौद्धिकों के प्रति जिस तरह का हिंसक, अपमानजनक, अवमानना पूर्ण व्यवहार लगातार हो रहा है, जिसकी ताज़ा कड़ी प्रख्यात लेखक और विचारक तथा साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित कन्नड़ साहित्यकार श्री कलबुर्गी की मतांध हिंदुत्ववादी अपराधियों द्वारा की गई कायराना और दहशतनाक हत्या है, उसने मेरे जैसे अकेले लेखक को भीतर से हिला दिया है।  अब यह चुप रहने का और मुँह सिल कर सुरक्षित कहीं छुप जाने का पल नहीं है। वर्ना ये ख़तरे बढ़ते जायेंगे। मैं साहित्यकार कुलबर्गी जी की हत्या के विरोध में ‘मोहन दास’ नामक कृति पर 2010-11 में प्रदान किये गये साहित्य अकादमी पुरस्कार को विनम्रता लेकिन सुचिंतित दृढ़ता के साथ लौटाता हूँ। अभी गॉंव में हूँ। 7-8 सितंबर तक दिल्ली पहुँचते ही इस संदर्भ में औपचारिक पत्र और राशि भेज दूँगा। मैं उस निर्णायक मंडल के सदस्य, जिनके कारण ‘मोहन दास’ को यह पुरस्कार मिला, अशोक वाजपेयी और चित्रा मुद्गल के प्रति आभार व्यक्त करते हुए, यह पुरस्कार वापस करता हूँ। आप सभी दोस्तों से अपेक्षा है कि आप मेरे इस निर्णय में मेरे साथ बने ।‘
अब जरा विचार कीजिए । उदय प्रकाश जिनकी लंबी कहानी मोहनदास को उपन्यास मानकर अकादमी ने पुरस्कृत कर उपकृत किया, लिहाजा उन्होंने उस वक्त के निर्णायकों का आभार जताया है । दूसरी बात यह है कि कि उन्होंने जिस बिनाह पर साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने का एलान किया है वो दरअसल विरोध नहीं बल्कि प्रचार की बुनियाद पर खड़ा है । उनके शब्दों को देखते हैं – श्री कालबुर्गी की मतांध हिंदुत्ववादी अपराधियों द्वारा की गई कायराना और दहशतनाक हत्या है, उसने मेरे जैसे अकेले लेखक को भीतर से हिला दिया है। उदय प्रकाश जी इतिहास या अतीत को बेहद सुविधाजनक तरीके से भुला रहे हैं । जब ये मतांध हिंदुवादी शब्द बोलेते हैं तो पूरे हिंदी साहित्य में उनकी वो तस्वीर कौंध जाती है जब वो गोरखपुर के सांसद महंथ आदित्यनाथ के हाथों सम्मानित हो रहे होते हैं । महंथ आदित्यनाथ के हाथों मिले सम्मान को अपने साहित्यक मस्तक पर कलगी की तरह लगाकर घूम रहे उदय प्रकाश जब साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने की बात करते हैं तो बात हजम नहीं होती । कम से कम विरोध की वजह तो हल्की हो ही जाती है । बेहतर होता कि उदय जी महंथ आदित्यनाथ के हाथों मिले पुरस्कार को मतांध हिंदीवादी ताकतों के विरोधस्वरूप लौटाते फिर आगे कोई कदम उठाते । साहित्य अकादमी लगभग सरकारी संस्थान है जो करदाताओं के पैसे से चलता है । पुरस्कार आदि भी उसी राशि से प्रदान किए जाते हैं । उदय प्रकाश का सहित्य अकादमी का पुरस्कार लौटाने का फैसला नीतिगत दोष का भी शिकार है । परंपरा यह रही है कि सरकारी नीतियों आदि के विरोध में सरकारी पुरस्कार लौटाए जाते रहे हैं ।

उदय प्रकाश के इस कदम पर तमाम छोटे-बड़े और मंझोले वामपंथी विचारक लहालोट होकर उनको लाल सलाम कर रहे हैं । उनके साहस की दाद दे रहे हैं । दरअसल वामपंथियों के साथ ये बड़ी दिक्कत है कि वो इतिहास को सुविधानुसार विस्मृत कर देते हैं या फिर उसकी शवसाधना में जुट जाते हैं । दोनों ही स्थिति खतरनाक है । उदय प्रकाश के मामले में भी वामपंथी विचारकों ने अपनी सुविधा के लिए उस तस्वीर को विस्मृत कर दिया या फिर सायास उसको धुंधला करने की कोशिस कर रहे हैं जहां उदय प्रकाश महंथ आदित्यनाथ से पुरस्कृत हो रहे हैं । विचारो की इस लड़ाई में तथ्यों और इतिहास को भुलाने या सुविधानुसार इस्तेमाल करने का यह वामपंथी खेल बेहद खतरनाक है जो लोकतंत्र में जनता को बरगलाती है । जनता को बरगलाने का यह खेल अंतत: लोकतंत्र को कमजोर करता है जो कि वामपंथियों के बड़े डिजाइन का हिस्सा है । लोकतंत्र में उनकी आस्था कभी रही नहीं है । मार्क्स के अनुयायियों ने उनके सिद्धातों को इस तरह से आगे बढ़ाया कि लोगों की आस्था उसमें उत्तरोत्तर कम होती चली गई । वामपंथ जनता की बात तो करता है परंतु जनता को तमाम अधिकारों से वंचित रखने का कुत्सित खेल भी खेलता है । रूस और चीन इसके ज्वलंत उदाहरण हैं । इन दो उदाहरणों के अलावा कुछ कहने की आवश्यकता बचती नहीं है । कालबुर्गी के हत्या के विरोध में खड़े लोगों की मंशा को भी परखने की जरूरत है । हत्या पर राजनीति ना हो , हत्यारों को गिरफ्तार किया जाए और उसको कड़ी से कड़ी सजाय हो, मंशा ये होनी चाहिए ।   

Saturday, August 29, 2015

विवादों के बवंडर में ‘युवा’ लेखक

इन दिनों हिंदी साहित्य जगत में ‘युवा लेखन और लेखक‘ को लेकर घमासान मचा हुआ है । दरअसल पूरा प्रसंग ये है कि दिल्ली की हिंदी अकादमी ने युवा कहानी और युवा कविता पर दो दिनों का आयोजन किया । हिंदी की वरिष्ठ और चर्चित लेखिका मैत्रेयी पुष्पा के हिंदी अकादमी का उपाध्यक्ष बनने के बाद अकादमी का ये पहला बड़ा आयोजन था । कविता पर जो आयोजन हुआ था उसका नाम -कविता के नए रूपाकार, युवा कवियों के साथ एक शाम । कहानी पर हुए आयोजन को नाम दिया गया था – हमारे समय की हिंदी कहानियां, स्वरूप और संभावनाएं । सरकारी कार्यक्रम के लिहाज से देखें तो आयोजन बेहतर था । पूरे आयोजन पर मैत्रेयी पुष्पा की छाप दिख रही थी, उनकी पसंद और नापसंद दोनों की । कविता पर हुए आयोजन पर जिन कवियों को बुलाया गया था उसको लेकर सोशल मीडिया पर खूब हो हल्ला मचा । कवियों की उम्र को लेकर भी छींटाकशी की गई । विरोधस्वरूप दिल्ली के दर्जनभर से ज्यादा युवा कवियों ने एक अलग आयोजन किया और अपनी कविताएं पढ़ीं । यह सब तो साहित्य में हमेशा से चलता रहा है । सरकारी आयोजनों में जो उसके कर्ताधर्ता होते हैं उनकी ही चलती है लेकिन इस बार हिंदी अकादमी का चयन अपेक्षाकृत कम विवादित रहा । हिंदी अकादमी की उपाध्यक्ष मैत्रेयी पुष्पा ने सोशल मीडिया पर अपने अनेकानेक पोस्ट में इस बात को रखा कि अकादमी का यह पहला आयोजन है और उसको उसी कसौटी पर कसा जाना चाहिए । लेकिन युवा को लेकर सोशल मीडिया पर विरोध जारी रहा ।युवा शब्द पर हुए इस विवाद की भी वजह है जिसका जिक्र इस लेख में आगे आएगा । फेसबुक आदि पर मचे हो-हल्ला के बीच आयोजन के दौरान हिंदी अकादमी की उपाध्यक्ष मैत्रेयी पुष्पा ने मंच से एलान किया कि अगले आयोजन से युवा शब्द हटा दिया जाएगा । इसको हिंदी के युवा लेखक और कवि अपनी जीत के तौर पेश कर रहे हैं । उन युवा लेखकों को ये सोचना होगा कि साहित्य में जीत या हार नहीं होती है। बहुत दिनों बाद हिंदी अकादमी को एक सक्रिय उपाध्यक्ष मिला है । हमें उम्मीद करनी चाहिए कि वो वस्तुनिष्ठ होकर साहित्य के लिए काम करेंगी । उनको थोड़ा मौका भी दिया जाना चाहिए । हलांकि उनको जो टीम मिली है उससे बहुत ज्यादा उम्मीद बेमानी है, चंद लोगों को छोड़कर उनमें से ज्यादातर के साहित्यक अवदान को हिंदी साहित्य के सामने आना शेष है । हैरानी की बात है कि कहानी पर हुए आयोजन की अध्यक्षता वरिष्ठ आलोचक मैनेजर पांडे को सौंपने को लेकर हुई । कहानी पर हुए आयोजन का अध्यक्ष पांडे जी को किस आधार पर बनाया गया । कम से कम मेरे जैसा पाठक अब तक मैनेजर पांडे के कहानी पर किए गए काम से अनभिज्ञ है । कार्यक्रम में मैनेजर पांडेय ने मेकी आशंका को सही साबित किया । उन्होंने इस आयोजन में ना तो कहानी के स्वरूप और ना ही संभावना पर गंभीरता से कोई अवधारणा प्रस्तुत की । एक अनाम सी पक्षिका के विशेषांक लेकर पहुंचे और उसके ही आधार पर कहानी के वर्तमान पर भाषण दे दिया । मैनेजर पांडे को बुलाने की वजह समझ से परे है । मैत्रेयी पुष्पा को मैं करीब डेढ़ दशक से ज्यादा वक्त से जानता हूं, वो जो ठान लेती हैं उसपर चलती हैं । तमाम विरोध और झंझावातों के बावजूद । इस वजह से ही शायद उन्होंने मैनेजर पांडे को नहीं बदला होगा । अगर चयन में थोड़ी बहुत खामी रह जाए या फिर अपने अपने लोगों को बुलाया जाए तो किसी नतीजे पर पहुंचने के पहले सोशल मीडिया पर सक्रिय लेखकों को धैर्य रखना चाहिए । सावधान तो उपाध्यक्ष को भी रहना चाहिए, उन्हें अब काफी लोग तारीफ करनेवाले मिलेंगे । आनेवाले दिनों में उनपर संचयन, पत्रिकाओं के विशेषांक आदि भी निकलेगे । अगर इस तरह के लोगों को बढ़ावा मिलता है तो जाहिर तौर पर वो घिरेंगी लेकिन हमें ये मानकर नहीं चलना चाहिए कि ऐसा ही होगा । खैर ये एक अवांतर प्रंसग है, जिसपर भविष्य में चर्चा होगी ।
बात हो रही थी हिंदी में युवा लेखकों पर । साहित्य में युवा कहने की कोई सीमा नहीं है । पचास पार या पचास को छूते लेखक को हिंदी साहित्य समाज में युवा माना जाता है । साहित्य अकादमी जो युवा सम्मान देती है उसके मुताबिक लेखक की उम्र पैंतीस साल से अधिक नहीं होनी चाहिए । लेकिन इस वक्त हिंदी में एक साथ इतनी पीढ़ी सक्रिय है कि सब गड्डमड् हो गया है । जिसके जो मन हो रहा है वो लिख रहा है । इस तरह के अराजक माहौल में चालीस पचास साल पार के लेखक लेखिका भी युवा हुए जा रहे हैं । इस संदर्भ में एक बेहद दिलचस्प प्रसंग याद आता है । सन दो हजार की बात होगी । हंस पत्रिका के दफ्तर में उसके संपादक राजेन्द्र यादव से मिलने गया था । हंस का ताजा अंक आया था जो यादव जी ने मेरी तरफ बढ़ाया । मैंने पन्ने पलटने के बाद उनसे पूछा कि बुढा़ती लेखिकाओं की आप जवानी के दिनों की तस्वीर क्यों छापते हैं । उन्होंने हल्के फुल्के अंदाज में गंभीर बात कह दी । उन्होंने कहा कि हिंदी के कई पाठक लेखिकाओं की तस्वीर देखकर हंस खरीद लेते हैं । अब जब युवा लेखक की उम्र को लेकर जब एक बार फिर से विवाद हो रहा है तो राजेन्द्र यादव की बात जेहन में कौंधी । कहीं ऐसा तो नहीं कि युवा कहकर युवाओं से जुड़ने की जुगत में उदारता के साथ लेखक खुद को या आयोजक लेखक को या आलोचक लेखक को युवा घोषित कर देता है । हलांकि यह बहुत दूर की कौड़ी है लेकिन कौड़ी है अच्छी ।
कुछ दिनों पहले मैत्रेयी पुष्पा जी ने भी स्त्री विमर्श को लेकर एक लंबा लेख लिखा था । उस लेख में मैत्रेयी जी ने लिखा था – ‘इक्कीसवीं सदी में जबसे ‘युवा लेखन’ का फतवा चला है, लेखन की दुनिया में खासी तेजी आई है। लेखिकाओं की भरी-पूरी जमात हमें आश्वस्त करती है। किताबें और किताबें। लोकार्पण और लोकार्पण। इनाम, खिताब, पुरस्कार जैसा बहुत कुछ। प्रकाशक, संपादक भी अपने-अपने स्टाल लेकर हाजिर। अपने-अपने जलसों की आवृत्तियां। कैसा उत्सवमय समां है। कौन कहता है कि यह दरिंदगी और दहशत भरा समय और समाज है? साहित्य जगत तो यहां आनंदलोक के साथ है। नाच-गाने और डीजे। शानदार पार्टियां और आपसी रिश्तों के जश्न। ऐसा लगता है जैसे कितनी ही कालजयी रचनाएं आई हैं। मगर इस समय की कलमकार के अपने रूप क्या हैं? युवा के सिवा कुछ भी नहीं, यह युवा लेखिका का फतवा किस दोस्त या दुश्मन ने चलाया कि इस समय की रचनाकार अपनी उम्र का असली सन तक अपने बायोडाटा में दर्ज नहीं करतीं, क्योंकि उम्र जगजाहिर करना युवा लेखन के दायरे से खारिज होना है। वे लेखन के हल्केपन की परवाह नहीं करतीं, जवानी को संजोए रखने की चिंता में हैं। इसी तर्ज पर कि रचना में कमी-बेसी से डर नहीं लगता साब, वयस्क कहे जाने से डर लगता है। परवाह नहीं उम्र पैंतालीस से पचास पर पहुंच जाए, युवा कहलाने का अनिर्वचनीय सुख मिलता रहे । लगता है मैत्रेयी जी जब हिंदी अकादमी के आयोजनों के लिए लेखकों का चयन कर रही थीं तो उन्होंने अपनी ही कही इस बात को भुला दिया । युवा के नाम पर चालीस पार की लेखिकाओं और लेखकों को युवा घोषित करते हुए कार्यक्रम में जगह दे दी । क्या वो अपना कहा ही भूल गईं कि जो लेखिका अपने बायोडाटा में अपनी उम्र दर्ज नहीं करती क्योंकि उम्र जाहिर करना युवा लेखन के दायरे से खारिज होना है । क्या वो भी आमंत्रित लेखक लेखिकाओं को वयस्क कहने से डर गईं । दरअसल सरकारी आयोजनों में एक कमेटी प्रतिभागियों का चुनाव करती हैं । संभव है उपाध्यक्ष ने चुनाव करते समय कमेटी के सदस्यों को छूट दी होगी । उस छूट का ही नतीजा है कि कुछ ऐसे लेखकों का चयन हो गया जिनपर और जिनके लेखन पर विवाद उठ खड़ा हो गया । यह भी संभव है कि युवाओं को जोड़ने का अनिर्वचनीय सुख हिंदी अकादमी भी लेना चाहती हो । हिंदी में युवा कहलाने का जो फैशन है उसपर गाहे बगाहे विवाद होता रहा है । मेरा मानना है कि साहित्यक विवाद होने चाहिए । इससे साहित्य की सेहत अच्छी बनी रहती है लेकिन जब विवाद के बीच व्यक्तिगत हमले होने लगते हैं, किसी के चरित्र से लेकर व्यक्तित्व पर सवाल खड़े होने लगते हैं तब साहित्य बीमार पड़ने लगता है । साहित्य में विवादों की एक लंबी परंपरा रही है लेकिन जिस तरह से उसको सोशल मीडिया ने मंच और हवा दोनों दी वो चिंता की बात है । लेखन पर सवाल खड़े होने चाहिए तर्कों और तथ्यों के साथ, फिर चाहे वो कितना भी बड़ा लेखक क्यों ना हो । युवाओं के लेखन को खास तौर पर कसौटी पर कसना चाहिए । 


 

Thursday, August 27, 2015

साहित्यक स्पांरशिप के विरोधी

आज अगर समकालीन हिंदी साहित्य के परिदृश्य में एक अजीब तरह का ठंडापन और वैचारिक सन्नाटा जैसा नजर आता है तो हंस पत्रिका के संपादक और कथाकार राजेन्द्र यादव की कमी शिद्दत से महसूस की जाती है । यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि राजेन्द्र यादव हिंदी के संभवत आखिरी सार्वजनिक बुद्धिजीवी थी । साहित्य के अलावा सामाजिक और राजनैतिक विषयों पर उनकी स्पष्ट राय होती थी जो वो प्रकट भी करते थे । इस बात की परवाह किए बगैर कि उसका अंजाम क्या होगा । अपनी टिप्पणियों की वजह से उनको कई रातें पुलिस सुरक्षा में गुजारनी पड़ी थी । दूसरी बात जिसकी कमी आज महसूस होती है वो है एक सक्रिय साहित्यक संपादक की । राजेन्द्र जी के वक्त हंस पत्रिका में एक धार और उसका तेवर साफ तौर पर दिखता है जो उनके निधन के बाद निस्तेज हो गया है । इसकी भी वजह थी । राजेन्द्र यादव लगातार लेखकों के संपर्क में रहते थे, नए और पुराने । ना सिर्फ संपर्क में रहते थे बल्कि उनको उकसाते भी रहते थे । उकसाते थे लेखन के लिए, उकसाते थे साहित्य सवालों से मुठभेड़ करने के लिए । बहुधा इसके लिए उनके विरोधी और प्रसंसक दोनों उनको विवादाचार्य कहा करते थे । इन विशेषणों से उनको कोई फर्क नहीं पड़ता था । कहना ना होगा कि यह उनके लगातार संवाद का नतीजा था कि हंस पत्रिका को वो इतने लंबे समय तक निकालने और पाठकों का पहला पयार बनाने में सफल रहे । राजेन्द्र जी के अलावा ये गुण रवीन्द्र कालिया में भी है । वो भी लेखकों से लगातार संवाद बनाए रखते थे और उसका नतीजा उनके संपादन में निकले ज्ञानोदय के अंकों में दिखता भी था । खासकर साहित्य के संपादकों के लिए यह जरूरी है कि वो अपने लेखकों के संपर्क में रहें और किस लेखक से क्या लिखवाना है इस बारे में उनका विजन साफ रहे । राजेन्द्र यादव के निधन के बाद इसका अभाव साफ तौर पर लक्षित किया जा सकता है ।
राजेन्द्र यादव एक और बात कहा करते थे – साहित्य स्पांटेनियटि ( स्वत:स्फूर्त ) का गेम है स्पांसरशिप का नहीं । राजेन्द्र जी के हंस संपादक रहते वहां भी स्पांटेनियटि और स्पांसरशिप का गेम दिखता था, लेकिन उसका अनुपात दाल में नमक की तरह होता था । इन दिनों तो स्पांटेनियटि पर पूरी तरह से स्पांसरशिप साहित्य जगत पर हावी हो गई है, नमक में दाल की तरह । लेखकों पर मोटे मोटे अंक प्रकाशित हो रहे हैं जो लगभग अभिनंदन ग्रंथ की तरह हैं, भक्तिभाव से सराबोर । आप हमें पुरस्कार दो हम आपको सम्मानित करेंगे । आप सेमिनार में हमें बुलाओ, हम गोष्ठियों में आपको आमंत्रित करेंगे, आदि आदि । सभी जानते हैं कि ये खेल तल रहा है लेकिन कोई भी लेखक इनसब पर कुछ लिखता नहीं है ।  राजेन्द्र यादव होते तो कम से कम अपने संपादकीय में इसका विरोध अवश्य करते । इन दिनों वरिष्ठ साहित्यकारों ने जिस तरह से साहित्यक और सामाजिक मु्दों पर खामोशी अख्तियार कर ली है वो पूरे साहित्य जगत के लिए ना तो अच्छा संकेत दे रही है और ना ही इससे अच्छा संकेत निकल रहा है । यादव जी के संपादकत्व के दौर की पत्रिका हंस को याद करते हुए इस वक्त के हंस को देखते हुए दुख होता है । यादव जी हमेशा आलोचनानुमा बोझिल लेखों के खिलाफ थे । वो अपने खिलंदड़े अंदाज में कहा करते थे कि यार ! बहुत ज्ञान पेल दिया है, इतना बरदाश्त नहीं हो रहा है । यादव जी की एक और खासियत यह थी कि वो खुद तो नए से नए किताबों के बारे में जानने को उत्सुक रहते ही थे, हिंदी के पाठकों तक उस जानकारी को पहुंचाने के लिए सजग और प्रयत्नशील रहा करते थे । किसी नई किताब की चर्चा करने पर एकदम बच्चे की चरह जिद पर उतारू हो जाते थे कि आज ही भेजो, आज ही मंगवाता हूं आदि आदि । आज अगर यादव जी जीवित होते तो छियासी साल के होते । उनकी स्मृति को नमन ।

फिर निकला आरक्षण का जिन्न

यह महज संयोग था या फिर सोची समझी रणनीति यह कहना मुश्किल है । ओबीसी आरक्षण के लिए बनी मंडल कमेटी के बीपी मंडल के जन्मदिवस पर गुजरात में पटेलों ने आरक्षण की मांग को लेकर अहमदाबाद में एक बड़ी रैली की । पटेल गुजरात का संपन्न और दबंग सुमदाय माना जाता है । उनकी मांग है कि उनको ओबीसी में शामिल कर आरक्षण दिया जाए या फिर आरक्षण को पूरी तरह से खत्म कर दिया जाए । इस आंदोलन ने एक बार फिर से उन्नीस सौ नवासी की याद ताजा कर दी है । ये वो दौर था जब देवीलाल की रैली को डिफ्यूज करने के लिए वीपी सिंह ने आनन फानन में मंडल कमीशन की सिफारिशें लागू करने का एलान कर दिया था । ओबीसी को सरकारी नौकरियों से लेकर प्रमोशन और छात्रों को स्कूल कालेजों में आरक्षण दे दिया गया था । उस वक्त भी उत्तर भारत के कई राज्यों में आरक्षण की आग ने कई सरकारो के चेहरे को तो बदल ही दिया पूरे देश की राजनीति का भूगोल भी बदल दिया । दरअसल हमारे संविधान में पिछडो़ं और दबे कुचलों को मुख्यधारा में लाने के लिए आरक्षण की व्यवस्था है लेकिन एक तय समय सीमा तक । बजाए पिछड़ों को आरक्षण देकर मुख्यधारा में लाने के आरक्षण की आड़ में नेता मुख्यधारा में आने लगे । संविधान सभा की बहस में महावीर त्यागी, डॉ पीएस देशमुख आदि ने इसका विरोध किया था, लेकिन तब इस बात पर सहमति बनी कि दस साल के लिए पिछड़ों को आरक्षण की व्यवस्था हो । उस वक्त सरदार पटेल ने भी आरक्षण का विरोध करते हुए कहा था कि सहूलियत देकर अनुसूचित जाति और जनजाति को समाज की मुख्यधरा में लाना मुश्किल है, इसके लिए देश में जागृति लानी होगी । उन्होंने गुलामी का उदाहरण देते हुए अने तर्क रखे थि गुलाम-प्रथा से छुटकारा किसी तरह के आरक्षण से नहीं मिला था बल्कि सामाज में जागृति लाकर उस अमानवीय प्रथा को खत्म किया गया था । सरदार पेल का मानना था कि लोकतंत्र के मजबूत होते जाने से ही जाति का नासूर खत्म हो जाएगा । कई सदस्यों ने विरोध के बावजूद आरक्षण के पक्ष में संविधान सभा में सहमति बनी थी । संविधान बनानेवालों ने उस वक्त ये नहीं सोचा था कि आरक्षण आजाद भारत में दलितों और पिछड़ों को बराबरी का हक दिलाने की बजाए राजनीति का एक ऐसा औजार बन जाएगा जिससे पार पाना मुश्किल होगा । संविधानसभा से उस वक्त ये गलती हो गई कि वो पिछड़ा मानने का आधार जाति को मान लिया, आर्थिक आधार पर विचार नहीं किया गया ।
गुजरात में जिस तरह से बाइस साल के एक लड़के हार्दिक पटेल ने आरक्षण को लेकर इतना बड़ा आंदोलन खड़ा कर दिया है उससे यह तो साफ है कि आरक्षण के विरोध में सालों से कुछ पक रहा था । दिनकर ने संस्कृति के चार अध्याय में कहा भी है कि – विद्रोह, क्रांति या बगावत कोई ऐसी चीज नहीं है जिसका विस्फोट अचानक होता है, घाव भी फूटने के पहले बहुत समय तक पकता रहता है । पटेलों के आंदोलन से एक और बात निकल कर आ रही है कि गुजरात जैसे विकसित राज्य में भी आरक्षण को लेकर एक समुदाय में क्षोभ है । दिल्ली युनिवर्सिटी में आम छात्रों का नामांकन अगर नब्बे फीसदी अंक पर होता है तो आरक्षण पाने वालों का साठ से सत्तर फीसदी तक में हो जाता है । अमूमन ऐसा होता है कि दोनों छात्रों के सामाजिक और पारिवारिक स्तर में कोई बहुत ज्यादा अंतर नहीं होता है ।गुजरात की जनसंख्या में करीब बाइस फीसदी हिस्सेदारी पटेलों की है और उनका दावा है कि पूरे देश में पाटीदारों की संख्या करीब 27 करोड़ है । दरअसल आरक्षण को लेकर एक बड़े समुदाय के मन में कहीं ना कहीं कसक है । सिर्फ चंद महीनों में हार्दिक पटेल ने गुजरात में इतना बड़ा जनांदोलन खड़ा कर दिया इससे इस बात के संकेत तो मिलते ही हैं कि विरोध की आग लंबे समय से सुलग रही थी । यह सही है कि भीड़ के आधार पर सरकार ना तो कानून बनाती है और ना ही कानून में संशोधन करती है लेकिन अगर इतना बड़ा जमसमर्थन मिलता है तो सरकार को सोचने के लिए एक जमीन तो मुहैया करवाता ही है ।  हमें इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि उन्नीस सौ चौहत्तर में गुजरात के छात्र आंदोलन ने देश की राजनीति बदल दी थी । जनवरी 1974 में चिमन भाई पटेल सरकार के खिलाफ छात्रों के आंदोलन और फिर जेपी के उस आंदोलन के समर्थन में गुजरात जाने के बाद चिमन भाई पटेल को इस्तीफा देना पड़ा था । वह आंदोलन भ्रष्टाचार के खिलाफ था । गुजरात आंदोलन से ही प्रेरित होकर फिर बिहार में भी छात्रों ने आंदोलन की शुरुआत की थी । जिसके बाद इंदिरा गांधी ने देशपर इमरजेंसी थोप दी थी । उस आंदोलन की तुलना हार्दिक पटेल के आंदोलन से करना इस वक्त बहुत जल्दबाजी होगी, लेकिन जिस तरह से हार्दिक ने नीतीश कुमार का नाम लिया है उससे इस बात के संकेत तो मिलते हैं कि ये आंदोलन आगे बढ़ेगा । हार्दिक पटेल ने साफ कर दिया है कि वो राजनीति नहीं करेंगे लेकिन आरक्षण नहीं मिलने की सूरत में 2017 में सूबे में कमल को खिलने से रोकने का एलान हुआ । हमारे देश के राजनीतिक विश्लेषक जल्दबाजी में तुलना करने लग जाते हैं । कई विद्वान हार्दिक को गुजरात का अरविंद केजरीवाल बता रहे हैं । दोनों में बुनियादी फर्क है अरविंद सार्वजनिक तौर पर बहुत विनम्र नजर आते हैं जबकि हार्दिक के अहमदाबाद के भाषण में दंभ नजर आता था । राजनीतिक विश्लेषकों को थोड़ा धैर्य रखना चाहिए । ये वही लोग हैं जो अन्ना को छोटे गांधी कहा करते थे । तुलना में जल्दबाजी और तात्कालिकता बहुधा अतार्किक होकर हास्यास्पद हो जाती है ।  
 

Monday, August 24, 2015

भाषाई अकादमी का दुरुपयोग ?

बिहार में विधानसभा चुनाव का शंखनाद हो चुका है, औपचारिक एलान बाकी है लेकिन सियासी शतरंज की बिसात बिछ चुकी है । सभी राजनीतिक दल अपने अपने मोहरे चल रहे हैं । शह और मात का खेल जारी है । प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बिहार दौरों ने चुनावी फिंजा को संगीन बना दिया है । इस बार का विधानसभा चुनाव नीतीश कुमार और बारतीय जनता पार्टी दोनों के लिए बेहद अहम है, लालू के लिए तो अस्तित्व को बचाने की लड़ाई ही है । लेकिन इन सबसे इतर भी एक वजह है जिसके कारण ये चुनाव चर्चित हो रहा है । विधानसभा की इस सियासी बाजी में इस बार साहित्यक और सांस्कृतिक संस्थाओं को भी मोहरा बनाया जा रहा है । जिन संस्थाओं पर भाषा और संस्कृति के विकास की जिम्मेदारी है वो अपने मंच का इस्तेमाल राजनीति चमकाने के लिए करने की इजाजत दे रहे हैं । ताजा मामला है दिल्ली का । दिल्ली की मैथिली भोजपुरी अकादमी ने दिल्ली में एक आयोजन किया । इस कार्यक्रम का उद्देश्य भाषा से जुड़े साहित्यकारों कलाकारों और अहम शख्सियतों का सम्मान करना था ।  इस कार्यक्रम में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को भी बुलाया गया था । यहां तक तो सब कुछ ठीक था । कोई भी अकादमी किसी भी राजनेता को साहित्यकारों को सम्मानित करने के लिए या सम्मान समारोह का गवाह बनने के लिए बुला सकती है । लेकिन क्या किसी भी राजनीतिक दल के नेता या किसी भी राज्य के मुख्यमंत्री को इस मंच का इस्तेमाल अपनी राजनीति चमकाने के लिए करने की इजाजत दी जा सकती है । दिल्ली की मैथिली भोजपुरी अकादमी के उद्देश्यों में राजनीतिक कार्यक्रमों के बारे में कुछ लिखा लिखा नहीं है । ये राजनीतिक कार्यक्रम था भी नहीं । ये कार्यक्रम तो उस सरोगेट विज्ञापन की तरह था जो हमारे यहां टेलीविजन पर चलते या अखबारों में छपते हैं । शराब के विज्ञापन पर रोक है तो फिर शराब के नाम से ही पानी की बोतल बना लो और फिर उसके विज्ञापन से जनता को बताओ कि अमुक नाम से शराब भी है । इसी तरह से दिल्ली की मैथिली भोजपुरी अकादमी ने भी एक सरोगेट साहित्यक कार्यक्रम आयोजित किया था । इस कार्यक्रम में मंच पर जेडीयू और आम आदमी पार्टी के नेता और मंत्री बैठे थे । हाथ में हाथ डालकर उपर उठाकर नेताओं ने फोटो भी खिंचवाए और साथ होने का संदेश भी जनता को दिया । दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार दोनों ने  मैथिली भोजपुरी अकादमी के मंच से पूरी तरह से राजनैतिक भाषण दिया । नीतीश और केजरीवाल दोनों ने मैथिली भोजपुरी अकादमी के मंच से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर जोरदार हमला बोला । बिहार विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए नीतीश कुमार ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बयानों को खारिज किया बल्कि अपने तर्कों को सामने रखने के लिए लंबा वक्त भी लिया । नीतीश कुमार को मालूम था कि कार्यक्रम दिल्ली में है और केजरीवाल की मंच पर मौजूदगी सुर्खियां बनेंगी लिहाजा उन्होंने उस अवसर का बेहतरीन इस्तेमाल किया । दिल्ली के मुख्यमंत्री और मैथिली भोजपुरी अकादमी के अध्यक्ष अरविंद केजरीवाल ने भी इस मंच से भारतीय जनता पार्टी, नरेन्द्र मोदी, दिल्ली के उपराज्यपाल नजीब जंग आदि की आलोचना की । साहित्यक सम्मान नेपथ्य में चला गया । सारी चर्चा मोदी बनाम नीतीश-केजरीवाल पर आकर टिक गई । नीतीश और केजरीवाल की दोस्ती पर भी चर्चा शुरू हो गई । इस कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए दिल्ली की अन्य भाषाई अकादमियों के कर्मचारियों को भी काम पर लगाया गया था । जाहिर है कि दिल्ली सरकार इस कार्यक्रम को बेहतर करना चाहती थी । कार्यक्रम में राजनेताओं को भी न्योता दिया गया था । उन राजनेताओं को भी जिनका मैछिली भोजपुरी से कोई लेना देना नहीं था । आयोजकों की मंशा साफ थी । इस कार्यक्रम को राजनीतिक रखना और दिल्ली और बिहार के मुख्यमंत्रियों को अपननी बात रखने का मंच देना । उसमें मैथिली पंजाबी अकादमी सफल रही ।  
दिल्ली में जब शीला दीक्षित की सरकार ने मैथिली भोजपुरी अकादमी का गठन किया था तब उसका लक्ष्य था – मैथिली और भोजपुरी भाषओं व साहित्य-संस्कृति का उन्नयन व पल्लवन । इसके अलावा इस अकादेमी की कार्य और उद्देश्यों की एक बड़ी लंबी फेहरिश्त बेवसाइट पर मौजूद है लेकिन उसमें ये कहीं नहीं लिखा गया है कि इसके मंच से राजनीति होगी । नई बनी कमेटी ने इन दोनों भाषाओं के उन्नयन और पल्लवन के लिए क्या काम ये तो अभी ज्ञात नहीं हो सका है क्योंकि सरकार की बेवसाइट इपडेट नहीं है । हां इतना अवश्य हुआ कि केजरीवाल- नीतीश को एक साथ मंच पर लाकर अकादमी ने अपने अध्यक्ष का काम कर दिया । मैथिली भोजपुरी अकादमी के मंच के इस दुरुपयोग पर मुझे हरिशंकर परसाईं का एक लेख – हम बिहार से चुनाव लड़ रहे हैं - का स्मरण हो आया है। अपने उस लेख में परसाईं जी ने कई चुटीले वाक्य लिखे हैं जो आज भी वर्षों बाद मौजूं हैं – ‘मेरे नाम, काम,, धाम सब बदल गए हैं । मैं राजनीति में शिफ्ट हो गया हूं । उसी लेख में हरिशंकर परसाईं ने आगे लिखा है – पार्टी का नाम जनमंगल कांग्रेस होगा । नाम में जन या जनता, या लोक रखने का आधुनिक राजनीति में फैशन चल पड़ा है । इसलिए हमने भी जन शब्द रख लिया । जनता से प्रार्थना है कि वो इसे गंभीरता से ना लें, इसे वर्तमान राजनीति का एक मजाक समझें । ...जनता कच्चा माल है । इससे पक्का माल विधायक मंत्री आदि बनते हैं । पक्का माल बनाने के लिए कच्चे माल को मिटाना ही पड़ता है । हम जनता को विश्वास दिलाते हैं उसे मिटाकर हम ऊंची क्वालिटी की सरकार बनाएंगे । हमारा न्यूनतम कार्यक्रम सरकार में रहना है । ‘  तो क्या ये मान लिया जा कि दिल्ली की मैथिलि भोजपुरी अकादमी राजनीति में ‘शिफ्ट’ हो गई है  । क्या वो पक्का माल बनाने के काम में लग गई है । क्या वो साहित्य संस्कृति के विकास के कामों को मिटाकर ऊंची क्वालिटी की सरकार बनाने में लग गई है । क्या उनका न्यूनतम कार्यक्रम सरकार बनवाना हो गया है । अगर इन सारे प्रश्नों का उत्तर सकारात्मक है तो ये बेहद चिंता की बात है ।  कम से कम मैथिली और भोजपुरी भाषा-भाषियों के लिए । पहले भी इन अकादमियों का राजनीति के लिए इस्तेमाल होता रहा है लकिन इस तरह से खुले आम, अकादमी के मंच से राजनीतिक भाषण पहली बार हुआ है । दरअसल दिल्ली में नई सरकार के गठन के बाद इन भाषाई अकादमियों में उपाध्यक्षों की नियुक्तियां हुईं । सरकार ने अपने मनमाफिक लेखकों और पत्रकारों को इन पदों पर बैठाया । यह सरकार का विशेषाधिकार है कि वो अपने मनमुताबिक लोगों का चयन करे लेकिन इन पद पर बैठे लोगों से अपेक्षा की जाती है कि वो भाषा और साहित्य के विकास के लिए कोई ठोस रूपरेखा बनाएंम और उसको क्रियान्वित करें ।

अब अगर हम दिल्ली के अलावा पूरे देश की भाषाई अकादमियों पर विचार करें तो लगभग सारी अकादमियां सरकारी कार्यक्रमों को ही बढ़ावा देती हैं । इन अकादमियों पर होनेवाला खर्च करदाताओं के खून पसीने की कमाई से अर्जित किए गए पैसों की बर्बादी है । इनका उद्देश्य देखने में बहुत अच्छा लगता है , आदर्शवाद की तमाम बातें भी होती हैं लेकिन जब कार्यक्रमों को करने का वक्त आता है तो फिर राजनीतिक आकाओं की ओर देखा जाने लगता है । कभी मंत्री तो कभी मुख्यमंत्री की इच्छा पर कार्यक्रम तय किए जाते हैं, बहुधा इस बात का ख्याल रखा जाता है कि जिस पार्टी की सरकार हो उस पार्टी के विरोधियों को ना बुलाया जाए । इस चक्कर में कई बार कार्यक्रमों में भारी भरकम खर्च होने के बावजूद उससे भाषा और साहित्य को कुछ हासिल नहीं होता है । इन अकादमियों का गठन भाषा और साहित्य को बढ़ाना देने के लिए किया गया था लेकिन काला्ंतर में हुआ यह कि भाषा और साहित्य की बजाए ये अपने अपने सूबे के मुख्यमंत्रियों की छवि के विकास के लिए काम करने लगीं । नतीजा क्या हुआ कि ये अकादमियां राज्य सरकार के सूचना विभाग का एक्सटेंशन बन गईं और इसके सचिव वगैरह उस विभाग के अफसरों की तरह काम करने लगे । इन अकादमियों को चलाने के लिए कभी कभार अच्छे लेखकों का भी चयन हो जाता है लेकिन उन अच्छे लेखकों के सामने सरकारी बाबुओं से निपटने की बड़ी चुनौती होती है । सुविधाएं भी कम होती हैं । उपाध्यक्षों के लिए मात्र चार हजार रुपए महीने के मानदेय का प्रावधान है जो कि मेरी समझ से इस पद पर बैठनेवाले का अपमान है । या तो इसको अवैतनिक कर देना चाहिए या फिर सम्मानजनक राशि का प्रावधान किया जाना चाहिए । वर्ना वही होगा कि अकादमी के कार्यक्रमों को राजनीतक मंच बनाकर उसके कर्ताधर्ता अपना रसूख बढ़ाने में लग जाएंगे, और यह एक खतरनाक परंपरा की शुरुआत है जो न इन अकादमियों को खत्म कर दे सकती हैं । 

Sunday, August 23, 2015

स्तरीयता बनाए रखने की चुनौती

हिंदी के यशस्वी कथाकार और लंब समय तक हंस पत्रिका के संपादक रहे राजेन्द्र यादव बहुधा कहा करते थे कि हमारे देश के विश्वविद्यालयों के हिंदी विभाग प्रतिभाओं की कब्रगाह है । हमारी उनसे इस बात को लेकर काफी बहस हुआ करती थी लेकिन वो अपनी इस राय से कभी भी डिगे नहीं । हम भले ही कभी कभार डगमगाते रहे । अभी महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय की पत्रिका पुस्तक वार्ता के करीब दर्जन भर अंक मिले । एक साथ इतने अंक मिलने की भी एक अलग कहानी है जिसपर कभी बाद में बात करूंगा । पुस्तक वार्ता का सबसे ताजा अंक 56 है जो जनवरी- फरवरी 2015 का अंक है । पुस्तक वार्ता की शुरुआत महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय विश्वविद्यालय के पहले कुलपति अशोक वाजपेयी के कार्यकाल में हुई थी । इसके संस्थापक संपादक राकेश श्रीमाल थे । उनके संपादन में बहुत अच्छी निकलती रही । उनके बाद समीक्षक भारत भारद्वाज के संपादन में पत्रिका ने अपनी उस पहचान को और मजबूती दी । यह संयोग है कि मैंने इस पत्रिका में शुरुआत से ही स्तंभ लिखा और लगभग पंद्रह सालों तक उसमें लिखता रहा । मेरे स्तंभ का स्वरूप बदलता रहा लेकिन पत्रिका का स्वरूप बरकरार रहा । एक बार फिर इस पत्रिका के संपादक राकेश श्रीमाल बने जिनके संपादन में पत्रिका के दो संयुक्तांक निकले । उसके बाद इस पत्रिका के संपादन की जिम्मेदारी पत्रकार विमल झा को सौंपी गई । विमल झा के अंदर का पत्रकार इस पत्रिका पर हावी होता दिखा । विमल झा के संपादन में निकले पहले अंक के बाद उसके ले आउट से लेकर कवर पेज तक में आमूल तूल परिवर्तन हुआ । कंटेंट तक में भी । गर संपादक का यह होता है कि वो अपनी मर्जी के हिसाब से पत्र-पत्रिकाओं के कंटेंट से लेकर हर चीज में बदलवा करे क्यों पाठकों और आलोचकों की कसौटी पर उसको ही कसा जाता है ।  विमल झा ने पत्रिका के कवर को चमकीला बना दिया लेकिन स्तर बरकरार नहीं रख सके, ना ही इसकी आवर्तिता । विश्वविद्यालय के धन से प्रकाशित होनेवाली पत्रिका अगर समय पर नहीं निकले तो आश्चर्य होता है ।

पुस्तक वार्ता की जब परिकल्पना हुई थी तो यह तय किया गया था कि इसको हिंदी साहित्य के पाठकों के लिए जरूरी द्वैमासिक बनाया जाए जिसमें नए प्रकाशनों की जानकारी हो । लेकिन पंद्रह साल बाद लगता है पत्रिका अपने मूल उद्देश्य से भटक गई है । अंक पचपन के संपादकीय में मीडिया के हालात पर चिंता जताई गई है । मेरे मन में बार बार सवाल उठ रहा है कि साहित्यक पत्रिका के संपदीक में मीडिया की चर्चा क्यों । चलइे अगर एक मिनट तक इसको मान भी लें तो क्या पूरे अंक में उस चिंता को विस्तार दिया गया है । इसी तरह से अंक 56 के संपादकीय में सोशल मीडियापर फोकस है । अंत में संपादक कहता है कि पौने तीन लाइन में निराला के जन्मदिन की सूचना देता है और कहता है कि इस वजह से अंक का प्रारंभ निराला के स्मरण से किया जा रहा है । पत्रिका में जो एक सूत्र दिखना चाहिए जिसमें उसके लेख पिरोए हों उसका अभाव साफ खटकता है । अब तो पुस्तक वार्ता में कई कई साल पुरानी किताबों की समीक्षा प्रकाशित होती है । पुस्तक वार्ता में लेखकों के नामों के साथ विशेषण भी उदारता से छपने लगे हैं । लगभग सभी लेखक वरिष्ठ नहीं तो आलोचक तो हैं ही । पुस्तक वार्ता भी अन्य विश्वविद्यालयों के हिंदी विभागों की पत्रिका की तरह बनती जा रही है । पुस्तक वार्ता के संपादक के सामने बड़ी चुनौती इसकी विरासत है । विरासत से मुठभेड़ करते हुए पुस्तक वार्ता अपनी पहचान को बरकारर रख पाती है या फिर अन्य पत्रिकाओं की भीड़ में गुम हो जाती है । पांच अंकों को देखते के बाद भीड़ में गुम हो जाने का खतरा ज्यादा है । 

Tuesday, August 18, 2015

गजेन्द्र तो बहाना है...

पुणे के फिल्म एंड टेलीविजन संस्थान के चेयरमैन के तौर पर महाभारत सीरियल में युधिष्ठिर के तौर पर काम कर अपनी पहचान बना चुके गजेन्द्र चौहान की नियुक्ति पर विवाद जारी है । संस्थान में काम-काज और पढ़ाई लिखाई ठप है । गजेन्द्र के विरोधी ये तर्क दे रहे हैं कि चौहान में इस प्रतिष्ठित संस्थान की रहनुमाई करने के लिए अपेक्षित कद और काम नहीं है । यह बात सही है कि गजेन्द्र ने टीवी सीरियल्स के अलावा सी ग्रेड फिल्मों में काम किया है । उनकी उच्च बौद्धिकता को लेकर भी संदेह है । गजेन्द्र चौहान को फिल्म एंड टेलीविजन संस्थान का चेयरमैन बनाने के पीछे सरकार की मंशा के बारे में आगे विस्तार से बात होगी। गजेन्द्र के विरोधियों का एक तर्क है कि जिस संस्थान के चेयरमैन पद को श्याम बेनेगल, अदूर गोपाल कृष्णन, महेश भट्ट, यू आर अनंतमूर्ति जैसे मूर्धन्य लोगों ने सुशोभित किया है उस पद पर गजेन्द्र कैसे बैठ सकते हैं । ये सही है कि गजेन्द्र चौहान के पास उन लोगों जितना अनुभव और उनके जैसा आभामंडल नहीं है । लेकिन यहां पर यह भी सवाल उठता है कि श्याम बेनेगल, अदूर गोपाल कृष्णनस महेश भट्ट और यू आर अनंतमूर्ति जैसे दिग्गजों ने फिल्म संस्थान के लिए क्या किया । इतने बड़े दिग्गजों के सालों तक इस संस्था के चेयरमैन रहते हुए भी इसका विकास आईआईटी या आईआईएम ती तर्ज पर क्यों नहीं हो सका । उन्नीस सौ साठ में स्थापित हुए इस फिल्म संस्थान के पचपन साल हो गए लेकिन क्या हम कह सकते हैं कि ये कोलंबिया यूनिवर्सिटी के फिल्म स्कूल के आसपास भी पहुंच पाया । क्या विश्व सिनेमा जगत में इस संस्थान ने अपना स्थान बना पाया । विश्व सिने जगत की बात ही छोड़िए क्या हम दावे के साथ कह सकते हैं कि इस संस्थान ने दक्षिण एशियाई देशें में अपना स्थान बनाया । क्या सिंगापुर के संस्थान की भी हम बराबरी कर पाए हैं ।  पिछले पचपन साल में क्या हम पचपन छात्रों का नाम गिना सकते हैं जिन्होंने इस संस्थान से पढ़ाई की और सिनेमा को अपनी विधा में प्रभावित किया । क्या हम निर्देशन, सिनेमेटोग्राफी, साउंड, म्यूजिक, वीडियो एडिटिंग आदि विधा से चार-चार लोगों को नाम ले सकते हैं जिन्होंने अपनी प्रतिभा के बल पर लोगों को चौंकाया । साउंड में तो ले देकर रसूलपुकुट्टी को याद कर सकते हैं । अगर इन सवालों का उत्तर सकारात्मक होता तो हम कह सकते थे कि श्याम बेनेगल, अदूर गोपालकृष्णन, महेश भट्ट और यू आर अनंतमूर्ति की प्रतिभा का लाभ इस संस्थान को मिला । लेकिन अफसोस कि इन सवालों का जवाब नकारात्मक है लिहाजा इन बौद्धिकों से ये सवाल तो किए जाने चाहिए कि आपने इस संस्था के लिए क्या किया । दरअसल हकीकत यह है कि इन बड़े नामों के पास इस संस्था के लिए वक्त ही नहीं था । श्याम बेनेगल के दौर में फिल्म इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर और चेयरमैन की मुलाकात साल में एक बार हो जाए तो संस्थान में चर्चा का विषय होती थी । एक डायरेक्टर के तौर पर श्याम बेनेगल की प्रतिभा और प्रतिष्ठा पर कोई उंगली नहीं उठा सकता है, इसी तरह से अदूर गोपालकृष्णन के भी निर्देशक, स्क्रिप्ट राइटर और प्रोड्यूसर के तौर पर कोई सवाल नहीं उठ सकता । महेश भट्ट और यू आर अनंतमूर्ति पर भी नहीं। दरअसल अगर हम इन तमाम बड़े लोगों के कार्यकाल का अगर आंकलन करें तो इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि इनमें से ज्यादातर के पास संस्थान के लिए वक्त ही नहीं था । बड़े नाम होने की वजह से इनकी नियुक्ति होती थी और कभी कभार किसी सभा- संगोष्ठी में इनके दर्शन हो जाया करते थे । भला हो गजेन्द्र चौहान की नियुक्ति पर उठे विवाद का कि इस संस्थान के क्रियाकलाप पर बहस शुरू हो गई । उनके काम काज का हिसाब पूछा जाने लगा । इस संस्थान को इन बड़े लोगों से फायदा हुआ हो या नहींइनके नाम से साथ ये चस्पां अवश्य हो गया कि ये इस संस्थान के पूर्व अध्यक्ष रह चुके हैं । यह जानकार हैरानी होती है कि इस संस्थान में कई छात्र दो हजार आठ से छात्रावासों में रह रहे हैं । यह नए छात्रों के साथ बेईमानी तो है ही उनके अधिकारों पर डाका भी है । यह संस्थान भारत सरकार के अनुदान पर चलती है यानि कि इसमें हमारा आपका सभी करदाताओं का पैसा लगता है । हमारी गाढ़ी कमाई का इतना अपव्यय इतने सालों से हो रहा था और ये तमाम बड़े नाम यहां गद्दीनशीं थे, खामोश थे । यह जानकर तो और हैरानी होती है कि करोड़ों के बजट के बावजूद इस संस्थान के उपकरणों का आधुनिकीकरण नहीं किया गया । यह तो वैसी ही बात हुई कि दिल्ली विश्वविद्यालय के पत्रकारिता के पाठ्यक्रम में कुछ सालों पहले तक लैटर प्रेस और उसकी तकनीक पढ़ाई जाती है। हमारे देश के विश्वविद्यालयों के कई विभाग प्रतिभा के कब्रगाह बने हुए हैं । उसी तरह से एफटीआईआई में भी पुरानी तकनीक और पुराने तरीके से स्क्रिप्ट राइटिंग सिखाई जा रही है । कुछ ऐसे प्रतिभाशाली लोग स्क्रिप्ट राइटिंग सिखा रहे हैं जिनकी स्क्रिप्ट की वजह से एक मशहूर निर्देशक को झटका लग चुका है ।

दरअसल गजेन्द्र चौहान की नियुक्ति पर सरकार और वामपंथी विचारधारा के लोगों की टकराव की वजह एकदम से अलहदा है । इसके राजनीतिक कारण हैं । आजाद भारत के इतिहास में पहली बार, मैं जो देकर कह रहा हूं, पहली बार गैर कांग्रेसी सरकार पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आई है । इस सरकार का नेतृत्व नरेन्द्र मोदी कर रहे हैं जिनके विचार अटल बिहारी वाजपेयी से मेल खा सकते हैं लेकिन मिजाज नहीं । अटल बिहारी वाजपेयी इस मामले में थोड़े साफ्ट थे लेकिन नरेन्द्र मोदी विचारधारा को लेकर सजग ही नहीं हैं बल्कि उसको स्थापित करने के लिए मजबूती के साथ प्रयत्नशील भी हैं । इस बार सरकार ने तय किया है कि सभी संस्थानों पर अपने लोग बिठाए जाएं । अब इन्हीं अपने लोगों को बिठाने की प्रक्रिया में गजेन्द्र चौहान जैसे लोगों की नियुक्तियां हो रही हैं । अभी आनेवाले दिनों में इस तरह की और नियुक्तियां होंगी । विश्वविद्यालय के कुलपतियों से लेकर भाषा, कला और संस्कृति संगठनों तक में । यह सच है कि बैद्धिक जगत में वामपंथी विचारधारा की तुलना में दक्षिणपंथी विचारधारा में विद्वानों की संख्या कम है । लेकिन जो हैं उसके आधार पर ही सबकुछ अपने माफिक करने की कोशिश हो रही है और आगे भी होती रही है । हम देखें तो दक्षिणपंथी विद्वानों की संख्या इस वजह से कम नजर आती है कि आजादी के पैंसठ साल बाद तक उनको अवसर से वंचित किया जाता रहा । जो भी राष्ट्रवादी बातें करता , या राष्ट्रवादी विषयों पर शोध करता या जो भी वामपंथ से अलग हटकर भारत और भारतीयता की बात करता उसको आगे बढ़ने से रोक दिया जाता रहा है । ना तो विश्वविद्यालयों में उनकी नियुक्ति हो पाती थी और ना ही किसी शोध संस्थान में उनको शोध करने दिया जाता था । ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं जहां वामपंथ से इतर सोच रखनेवाले छात्रों और शोधार्थियों को बेवजह तंग किया गया हो और उनको समान अवसर से वंचित रखा गया हो । इस तरह की बौद्धिक अस्पृश्यता ने वामपंथ से इतर विचार रखनेवालों को हतोत्साहित किया । गजेन्द्र के मसले पर जारी संघर्ष का वृहत्तर अर्थ है । वामपंथी विचारधारा वाले लोगों को यह लगने लगा है कि ये सरकार आनेवाले दिनों में उनके सांस्कृतिक साम्राज्य को खत्म कर देगी लिहाजा वो भी आक्रामक हो गई है । गजेन्द्र तो एक बहाना मात्र है जिसकी आड़ में वामपंथी अपने खत्म होते साम्राज्य को बचाने की जुगत में हैं । दूसरी वजह यह है कि उनको यह भी लगने लगा है कि अगर उनकी विचारधारा के लोग सत्तानशीं नहीं रहे तो उनके कारनामे खुलेंगे । जैसे भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद में सत्ता परिवर्तन के बाद यह बात सामने आने लगी है कि किस तरह से करदाताओं के पैसों की लूट चल रही थी और एक एक प्रोजेक्ट चार दशक से अधिक वक्त से तैंतालीस साल से एक ही व्यक्ति कर रहा था । इस तरह के खुलासों से बचने केलिए गजेन्द्र जैसी नियुक्तिों पर विवाद खडे होते रहेंगे । नियुक्तियों की आड़ में खेले जा रहे इस खेल में छात्रों को मोहरा बनाया जा रहा है, लेकिन हाल के अनुभवों को देखते हुए यह साफ तौर पर कहा जा सकता है कि सरकार इस मसले पर अपना कदम पीछे खींचनेवाली नहीं है । यह राजनीतिक लड़ाई है और उसी के औजारों से लड़ी भी जा रही है । राजनीति के इस खेल में यथास्थितिवाद को चुनौती देने से विरोध का बवंडर को उठेगा । यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार उस बवंडर को किस तरह से शांत कर अपनी विचारधारा को स्थापित करती है ।