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Saturday, May 26, 2018

पुस्तक खरीद का लापरवाह तंत्र


किसी भी देश की संस्कृति में पुस्तकों का बड़ा योगदान माना जाता है। जर्मनी में जब नाजियों के ताकतवर होने और उत्थान का दौर था तब भी पुस्तकें महत्वपूर्ण थीं। पुस्तकों के इतिहास में 10 मई 1933 को पूरी दुनिया में काला दिन के तौर पर याद किया जाता है। नाजीवादी ये मानते थे कि साहित्य मनुष्य की भावनाओं को जगाता है और भावना लोगों को दुर्बल बनाती है। नाजियों के उस दौर में जर्मनी में विश्व साहित्य की उन महत्वपूर्ण कृतियों को जला दिया गया था, जिसके बारे में प्रचारित किया गया था कि वो जर्मनी के संस्कृति के खिलाफ है। इन रचनाओं को जलाने का काम बर्लिन विश्वविद्यालय के प्रांगण में किया गया था। जर्मन स्टूडेंट एसोसिएशन ने किताबें जलाने का काम देश के अन्य विश्वविद्यालयों में किया था जो कि करीब महीने भर तक चलता रहा था। चूंकि पुस्तकों का जलाने का काम बर्लिन विश्विविद्यालय से शुरु हुआ था इस वजह से इसको ‘बर्लिन बुक बर्निंग’ या ‘बर्लिन बुक ब्लास्ट’ के नाम से जाना जाता है। जर्मनी के लोगों के दिमाग पर पुस्तकों को जलाने की दुर्भाग्यपूर्ण घटना की छाप थी और नाजियों के पतन के बाद वहां इस घटना पर तीखी प्रतिक्रिया हुई थी। जिस दिन किताबें जलाई गईं थीं उसी दिन बर्लिन विश्वविद्यालय के उसी जगह को विश्व भर की किताबों से पाट दिया गया था। ये काम अब हर साल वहां किया जाता है । उसी स्थान पर लोग तख्तियों पर उन लेखकों के नाम लिखकर जमा होते हैं जिनकी किताबें 1933 में जला दी गई थी । बर्लिन में उस दिन को किताब उत्सव की तरह मनाया जाता है । हर जगह पर लोग किताब पढ़कर एक दूसरे को सुनाते हैं, रेस्तरां से लेकर फुटपाथ तक, चौराहों से लेकर पार्कों तक में । यह विरोध का एक अनूठा तरीका है। विरोध की वजह से जर्मनी में पुस्तक संस्कृति और मजबूत हुई। इस पूरी घटना को बताने का मकसद सिर्फ इतना बताना है कि जर्मनी में पुस्तकों को लेकर कितना प्यार, आदर और अपनापन है। वहां की सरकारें भी पुस्तकों की संस्कृति के विकास के लिए लगातार प्रयत्नशील रहती हैं। इसी तरह से अगर हम देखें तो पुस्तकों को लेकर यूरोप के कई देशों में और अमेरिका में भी एक खास किस्म का आकर्षण है। वैसे ये आकर्षण हमारे देश में भी था, किसी जमाने में हर शहर में एक अच्छा पुस्तकालय हुआ करता था, साथ ही गांवों में भी कम से कम एक कमरे का पुस्तकालय अवश्य होता था। कालांतर में ये पुस्तकालय बंद होते चले गए, शहरों के पुस्तकालयों की हालत भी खस्ता हो गई।
भारत में पुस्तक संस्कृति के विकास और पुस्तकालयों की व्यवस्था को मजबूत करने के लिए कई संस्थाएं हैं। ऐसी ही एक संस्था है राजा राम मोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन। यह संस्कृति मंत्रालय से संबद्ध एक स्वायत्तशासी संस्था है।  ये संस्था देशभर में सार्वजनिक पुस्तकालयों को सहयोग करने और उसको मजबूत करने के लिए केंद्र सरकार की नोडल एजेंसी है। इस संस्था का प्रमुख कार्य देशभर में पुस्तकालय संबंधित गतिविधियों को मजबूत करना तो है ही, साथ ही राष्ट्रीय पुस्तकालय नीति और नेशनल लाइब्रेरी सिस्टम बनाना भी है। इस संस्था के अध्यक्ष संस्कृति मंत्री या उसके द्वारा नामित व्यक्ति होते हैं। साथ ही इसको सुचारू रूप से चलाने के लिए बाइस सदस्यों की एक समिति होती है जिसका मनोनयन भारत सरकार करती है। इस समिति में प्रख्यात शिक्षाविद, लेखक, वरिष्ठ पुस्तकालयाध्यक्ष, प्रशासनिक अधिकारी आदि मनोनीत होते हैं। राजा राम मोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन का एक मुख्य उद्देश्य राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों के साथ पुस्तकालयों को मजबूत करने की दिशा में काम करना भी है। यह संस्था केंद्रीय स्तर पर भी पुस्तकों की खरीद करती है और राज्य सरकारों को भी पुस्तकों की खरीद के लिए धन मुहैया करवाती है। इसको मैचिंग ग्रांट भी कहते हैं जिसका मतलब होता है कि अगर राज्य सरकार 25 लाख पुस्तकों की खरीद के लिए देती है तो फाउंडेशन भी 25 लाख की राशि उस राज्य सरकार को देती है। फाउंडेशन का उद्देश्य बहुत अच्छा है लेकिन इस संस्था की बेवसाइट पर जो जानकारी है वो इसके पिछड़ते जाने का संकेत देने के लिए काफी है। संस्था की बेवसाइट के मुताबिक आखिरी प्रोजेक्ट 2011-12 में दिया गया था और टैगोर फेलोशिप 2010-2012 तक के लिए दिया गया था। उसके बाद इस दिशा में कोई काम नहीं हुआ, ऐसा प्रतीत होता है।
दरअसल ये संस्था मुख्यत: पुस्तकों की खरीद और राज्य सरकारों को अनुदान देने तक सिमट गई है। राजा राममोहन राय फाउंडेशन में पुस्तकों की जो खरीद होती है उसके कोई तय मानक नहीं है, मोटे तौर पर कुछ बिंदु हैं जिनको खरीद के वक्त ध्यान रखना होता है। अलग अलग विधाओं और भाषाओं के लिए खरीद का प्रतिशत तय किया गया है। सालभर प्रकाशक और लेखक अपनी पुस्तकों को इस संस्था में जमा करवा सकते हैं और फिर उनकी एक सूची तैयार होती है। इस सूची को तैयार करने के वक्त से ही गड़बड़ियां शुरू हो जाती है। लापरवाही का आलम ये कि अगर आपने डाक से पुस्तकें भेजीं तो बहुत संभव है कि वो सूची में शामिल नहीं होंगी। पुस्तकों की खरीद की कमेटी में इस वक्त संस्था के चेयरमैन समेत ग्यारह लोग हैं। मानक तय नहीं होने की वजह से पुस्तकों की खरीद में अराजक स्थिति होती है। जिन पुस्तकों की कीमत 400 रु से कम होती है उसकी अधिकतम 350 प्रतियां खरीदे जाने की बात सुनी जाती है लेकिन इन दिनों अराजकता का ये आलम है कि किसी भी पुस्तक की सत्रह, पच्चीस और चालीस पुस्तकों की खरीद के ऑर्डर जा रहे हैं। इसके पीछे क्या सोच है, क्या वजह है, इस बारे में देश की जनता को पता होना चाहिए। ये भी तय होना चाहिए कि किसी एक प्रकाशक से कितनी पुस्तक ली जाएगी। यह अकारण नहीं हो सकता है कि किसी खास दौर में किसी खास प्रकाशक की पुस्तकें ज्यादा खरीद ली जाती हैं। इसके अलावा यह भी देखने में आया है कि पुस्तक खरीद कमेटी की जब बैठक होती है तो कुछ सदस्य कई दिन कोलकाता मुख्यालय में रुकते हैं तो कुछ सदस्य दो एक दिन में ही वापस लौट जाते हैं। ऐसा क्यों होता है। क्या पुस्तक खरीद कमेटी का कोई कोरम आदि होता है या सब भगवान भरोसे चल रहा है। होना तो ये चाहिए कि पुस्तक क्रय समिति की हर बैठक के बाद खरीद के लिए चयनित पुस्तकों की सूची और कमेटी के उपस्थित सदस्यों की जानकारी भी बेवसाइट पर डाल देनी चाहिए। राजा राम मोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन का सालाना बजट करीब 50 करोड़ रुपए है जो कि करदाताओं की गाढ़ी कमाई का पैसा है। इसके साथ किसी भी तरह की गड़बड़ी करदाताओं के साथ तो छल होगा ही, पुस्तकों की संस्कृति के निर्माण की दिशा में बाधक भी।
इसके अलावा एक और चीज पर गौर करना आवश्यक है कि जो मैचिंग ग्रांट राज्य सरकारों को दी जाती है उस अनुदान की उपयोगिता और बेहतर पुस्तकों की खरीद में फाउंडेशन का कितना दखल होता है। नियमानुसार फाउंडेशन के चेयरमैन का एक प्रतिनिधि राज्य स्तरीय बैठक में होना चाहिए लेकिन कितने होते हैं। बहुधा नहीं होते हैं। अंग्रेजी की किताबों की स्तरीयता को लेकर कई बार पूर्व में भी सवाल उठे हैं। कट-पेस्ट के दौर में पुस्तकें बहुत आसानी से तैयार हो जाती है, पुस्तक खरीद समिति क पास उसकी स्तरीयता को जांचने का कोई मैकेनिज्म होता है क्या ? दरअसल सस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत चलनेवाली कई स्वायत्त संस्थाओं के काम-काज को लेकर काफी सवाल उठते रहे हैं। इनमें से ज्यादातर के साथ बजट की उपयोगिता को लेकर एक एमओयू भी है, उसपर संबंधित संस्थाओं की सहमति भी है, लेकिन हकीकत में तस्वीर कुछ अलग होती है। यह अकारण नहीं है कि पुस्तकों की खरीद पर भारी भरकम रकम खर्च हो रही है लेकिन पुस्तक संस्कृति का ह्रास हो रहा है। पुस्तक संस्कृति के विकास, उसके उन्नयन के लिए राष्ट्रीय पुस्तकालय नीति का होना आवश्यक है। राजा राममोहन राय फाउंडेशन के उद्देश्यों में ये शामिल भी है। इस नीति को बदलते वक्त के साथ अपडेट करना होगा, पाठकों की रुचि का ध्यान रखना होगा। पुस्तकों की गुणवत्ता और उसकी सरकारी खरीद के लिए बेहद सख्त नियम बनाने होंगे। राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन जैसी संस्थाओं की जबावदेही संस्कृति मंत्रालय पर है। क्या संस्कृति मंत्रालय से ये उम्मीद की जा सकती है कि वो देश में पुस्तकालयों की वर्तमान हालात पर ध्यान देगी? जितनी जल्दी, उतना बेहतर।


Saturday, May 19, 2018

सोशल मीडिया का अराजक तंत्र


कर्नाटक में राजनीतिक गहमागहमी के बीच कांग्रेस पार्टी ने रामधारी सिंह दिनकर की एक कविता की कुछ पंक्तियां ट्वीट की, ‘सदियों की ठंढी-बुझी राख सुगबुगा उठी/मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है/दो राह, समय के रथ का घर्घर नाद सुनो/सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।‘ इस ट्वीट के साथ कांग्रेस के ट्वीटर हैंडल से एक लेख का लिंक भी साझा किया गया। उस लेख में जनता की ताकत के बारे में बताया गया था। इस ट्वीट के सत्रह घंटे बाद तक इसको तेइस सौ के करीब लाइक, आठ सौ रिट्वीट और सात सौ के करीब जवाब दिए गए। कहानी अब शुरू होती है। इस कविता के ट्वीटर पर पोस्ट होने के बाद सोशल मीडिया पर सक्रिय लोगों ने कांग्रेस की लानत मलामत शुरू कर दी। कहा ये जाने लगा कि ये कविता दिनकर जी ने इंदिरा गांधी के विरोध में लिखी थी, जब इंदिरा गांधी ने देश में इमरजेंसी लगाई थी। लोग इतने पर ही नहीं रुके और कहने लगे कि ये कविता दिनकर ने जयप्रकाश नारायण के कहने पर लिखी थी और संपूर्ण क्रांति के दौर में बेहद लोकप्रिय हुई थी। यह भी आधा सच है। किसी ने भी इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि दिनकर जी का निधन 1974 में हो गया था और देश में इमरजेंसी 1975 में लगाई गई थी।कुछ लोगों ने सही बात कहने की भी कोशिश की लेकिन ज्यादातर लोग गलत ही लिखने लगे थे, जिसकी वजह से सही बात दब सी गई। दरअसल ये पंक्तियां दिनकर की कविता ‘जनतंत्र का जन्म’ की शुरुआती चार पंक्तियां हैं। दिनकर ने ये कविता पहले गणतंत्र दिवस के मौके पर लिखी गई थी जो उनके संग्रह ‘धूप और धुंआ’ नाम के संग्रह में संकलित है जो 1951 में प्रकाशित हुआ। बाद में जब जयप्रकाश नारायण ने संपूर्ण क्रांति का उद्घोष किया था तब उन्होंने पटना में दिनकर की इन पंक्तियों का गाया था। जयप्रकाश नारायण ने दिनकर की 1950 में लिखी कविता को संपूर्ण क्रांति का नारा बनाया था, जब वो अपने भाषणों में कहा करते थे कि सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।  
कर्नाटक की राजनीति से संबंधित एक और ट्वीट इतिहासकार और स्तंभकार रामचंद्र गुहा ने किया। उन्होंने लिखा, ‘भारत सरकार के अटॉर्नी जनरल कैसे एक राजनीतिक दल के राज्य इकाई का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं या उसकी तरफ से बोल रहे हैं।‘ कर्नाटक के सियासी घमासन के बीच इस ट्वीट का संदर्भ सुप्रीम कोर्ट से है जहां इस मामले पर कांग्रेस के विधायक की याचिका पर सुनवाई हुई थी। सर्वोच्च अदालत में इस केस की सुनवाई के दौरान अटॉर्नी जनरल मौजूद थे। रामचंद्र गुहा के इस ट्वीट को भी सोशल मीडिया पर करीब तीन हजार लोगों ने लाइक किया, हजार के करीब रिट्वीट हुआ और साढे तीन सौ लोगों ने उनको उत्तर दिया। इस ट्वीट के उत्तर में कई लोगों ने रामचंद्र गुहा को ये बताने की कोशिश की कि अटॉर्नी जनरल भारत सरकार का पक्ष रख रहे थे। सुप्रीम कोर्ट में जो याचिका (536/2018) दायर की गई थी उसमें भारत सरकार को भी प्रतिवादी बनाया गया था। जब किसी याचिका में भारत सरकार को प्रतिवादी बनाया जाता है, और वो मामला महत्वपूर्ण होता है तो उसमें भारत सरकार की तरफ से अटॉर्नी जनरल ही पेश होते हैं। यह बात रामचंद्र गुहा को पता नहीं हो, ऐसा प्रतीत नहीं होता है। बावजूद इसके उन्होंने ट्वीट कर ये सवाल उठाया और सोशल मीडिया के जरिए एक अलग तरह का माहौल बनाने की कोशिश की। उनको जब इस बारे में जब उत्तर देनेवालों ने सुप्रीम कोर्ट की याचिका के पहले पृष्ठ को वहां लगाया तब भी रामचंद्र गुहा ने अपनी इस गलती को नहीं सुधारा। स्तंभ लिखे जाने तक उनका ये ट्वीट मौजूद है। उनकी तरफ से कोई भूल सुधार नहीं किया गया है और ना ही खेद प्रकट किया गया है।
ये दो उदाहरण सोशल मीडिया की अराजकता को दर्शाने के लिए काफी है। इस तरह के कई उदाहरण सोशल मीडिया पर देखने को मिलते हैं जहां संदर्भ गलत होते हैं, उद्धरण गलत होते हैं, किसी की रचना को किसी और का बताकर पेश कर दिया जाता है। इसके बावजूद किसी की कोई जिम्मेदारी नहीं होती है। सोशल मीडिया ने बहुत लोगों को लेखक भी बना दिया, विशाल पाठक वर्ग या अपने समर्थकों से जुड़ने का एक मंच दिया, जनता से सीधा संवाद करने का अवसर दिया, यह इस माध्यम का एक सकार्तामक पक्ष हो सकता है, लेकिन साथ ही सोशल मीडिया ने जनता को बरगलाने का मौका भी दिया। अब रामचंद्र गुहा जैसे बड़े विद्वान माने जाने वाले लेखक अगर इस तरह के ट्वीट करते हैं और फिर उसपर खेद भी नहीं जताते हैं तो इसको क्या माना जाए? अखबार में कोई लेख छपता है तो उसकी जिम्मेदारी होती है, लेखक की साख होती है, उनसे सवाल जवाब हो सकते हैं लेकिन सोशल मीडिया पर क्या? लिखने की भी आजादी और जिम्मेदारी से भी आजादी। चंद लोगों में ही ये ईमानदारी है कि वो अपना गलत ट्वीट या पोस्ट डिलीट कर देते हैं, या खेद प्रकट करते हैं। दरअसल अगर हम देखें तो सोशल मीडिया पर लोग हड़बड़ी में बहुत रहते हैं, कहीं कुछ सुना, कहीं कुछ पढ़ा, कहीं कुछ जाना बस उसको लेकर सोशल मीडिया पर पोस्ट कर दिया। बगैर उसकी सत्यता जांचे, बगैर उसकी प्रामाणिकता की पड़ताल किए। दिलीप कुमार साहब से लेकर मन्ना डे के निधन को लेकर कई बार मशहूर हस्तियों तक ने ट्वीट कर दिए थे।
सोशल मीडिया पर सक्रिय बहुत सारे लोग अपनी बात रखते इस तरह से रखते हैं जैसे वो पत्थर की लकीर खींच रहे हों, जिसे मिटाना संभव नहीं है। गलत तथ्य के साथ जब ‘पत्थर की लकीर’ वाला आत्मविश्वास या वज्र धारणा मिल जाती है तो स्थिति खतरनाक हो जाती है। दिनकर की ही एक और कविता ‘समर शेष है’ की आखिरी दो पंक्ति सोशल मीडिया पर बार-बार उद्धृत की जाती है,’समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याघ्र/जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध।‘ इस पंक्ति को अलग अलग संदर्भ में उद्धृत किया जाता है। इसकी और पंक्तियां पढ़ने पर यह स्पष्ट होता है कि वो कविता गांधी की हत्या के बाद लिखी गई थी जिसमें कवि दुखी भी है और समाज मे व्याप्त विषम स्थितियों पर चोट करता है।
अब अगर हम गहराई से इस पर विचार करें तो सोशल मीडिया के तमाम सकारात्मक पक्ष के बावजूद ये एक राजनीतिक औजार भी बन गया है। किसी के भी पक्ष या विपक्ष में माहौल बनाने का औजार । राजनीतिक दलों के नेता और कार्यकर्ता इसका जमकर उपयोग कर रहे हैं। चूंकि इस प्लेटफॉर्म पर किसी तरह की पाबंदी नहीं है, कोई रोक-टोक नहीं है, इस वजह से अराजकता भी है। दिक्कत तब शुरू हो जाती है जब लेखक और स्तंभकार इस मंच पर गलत तथ्य पोस्ट करने लगते हैं। जब कोई मशहूर व्यक्ति, लेखक या कवि इस मंच पर तथ्यहीन बातें कहता है तो उसका असर बहुत देर तक रहता है और दूर तक जाता है। तकनीक के विस्तार और इंटरनेट के बढ़ते घनत्व की वजह से सोशल मीडिया की पहुंच लगातार बढ़ती जा रही है। सोशल मीडिया के इस बढ़ते प्रभाव को देखते हुए कनाडा के तत्कालीन प्रधानमंत्री पीयर ट्रूडो का वाशिंगटन प्रेस क्लब में 1969 में दिए भाषण की एक पंक्ति याद आ रही है। ट्रूडो ने कनाडा और अमेरिका के रिश्तों को लेकर अपने संबोधन में कहा था कि ‘आपके (अमेरिका के) पड़ोस में रहना उसी तरह से है जैसे हाथी के साथ सोना ( स्लीपिंग विद एन एलिफेंट )। इस बात का कोई अर्थ नहीं है कि हाथी से आपकी कितनी दोस्ती है और वो कितना शांत रहता है, उसकी हर हरकत या हिलने डुलने का भी आप पर असर पड़ना तय है।‘ ट्रूडो अमेरिका की आर्थिक ताकत को लेकर बोल रहे थे। एक अनुमान के मुताबिक उस वक्त अमेरिका की जीडीपी, कनाडा से दस गुना ज्यादा थी। उनके कहने का अर्थ ये था कि अमेरिका के किसी भी कदम से कनाडा प्रभावित होगा ही। उसी तरह से सोशल मीडिया भी ऐसा ही हाथी बन गया है जिसका असर हम सब पर पड़ना तय है। सोशल मीडिया रूपी से हाथी अभी और बड़े आकार का होगा और हमको और हमारे समाज को और प्रभावित करेगा। और अगर ये हाथी अराजक हो तो उसके खतरे का अंदाज सहज ही लगाया जा सकता है। जरूरत इस बात की है कि सोशल मीडिया के इस आसन्न खतरे को लेकर किसी तरह के नियमन पर विचार किया जाए। नियमन का स्वरूप क्या होगा ये देशव्यापी बहस के बाद तय हो।  


Saturday, May 12, 2018

विभाजन, युद्ध और प्यार की फिल्में


हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के बंटवारे के बाद से दोनों देशों के बीच का रिश्ता ऐसा है जो एक दूसरे मुल्क की रचनात्मकता को भी गहरे तक प्रभावित करता रहा है। साहित्य, कला, संगीत, फिल्म में इस रिश्ते और उसके साथ साथ घटित होनेवाली घटनाओं पर बहुतायत में लिखा और रचा गया है। दोनों देशों की आवाम से लेकर वहां के हुक्मरानों के बीच एक ऐसा रिश्ता है जिसमें नफरत और प्यार दोनों दिखाई देता है। विभाजन पर भीष्म साहनी ने ‘तमस’ जैसा उपन्यास लिखा तो इंतजार हुसैन ने भी दोनों देशों के रिश्तों पर कई बेहतरीन कहानियां लिखीं।कई पाकिस्तानी शायरों को भारत में ज्यादा पाठक मिले तो लता मंगेशकर और मुहम्मद रफी के दीवाने पाकिस्तान में भी हैं। यह सूची बहुत लंबी है। लेकिन हाल के दिनों में पाकिस्तान ने जिस तरह से भारत की सरजमीं पर नफरत और आतंक को अंजाम देना शुरू किया तो उसके बाद से ये रिश्ता प्यार का कम नफरत का ज्यादा हो गया। लगभग हर दिन भारतीय सीमा पर पाकिस्तान की तरफ से गोलीबारी, भारतीय फौज पर हमले, कश्मीर में आतंकवादियों के मार्फत अपने नापाक मंसूबों को अंजाम देने की कोशिशों ने पाकिस्तान को एक ऐसे पड़ोसी में तब्दील कर दिया जिससे एक दूरी जरूरी हो गई। पाकिस्तानी कलाकारों का आतंक की घटनाओं पर चुप रहना भारतीयों को उद्वेलित करता रहता है। इसका खामियाजा भी उन कलाकारों को भुगतना पड़ा।
पाकिस्तान के साथ बदलते रिश्तों का प्रकटीकरण हिंदी फिल्मों में भी देखने को मिलता है, कभी प्रत्यक्ष तो कभी परोक्ष रूप से । इस पार और उस पार के प्यार की कई दास्तां रूपहले पर्द पर आई। दोनों देशों के बीच लड़े गए युद्ध को लेकर भी कई फिल्में बनीं, चाहे वो 1965 का युद्ध हो या फिर 1971 का युद्ध या फिर करगिल युद्ध हो। इसके अलावा दोनों देशों के विभाजन की आड़ में सांप्रदियकता और महिलाओं पर होनेवाले अत्याचार पर भी कई फिल्में बनीं। दोनों देशों के तनावपूर्ण रिश्तों और युद्ध के माहौल में जासूसों की अहम भूमिका है। रॉ और इंटेलिजेंस ब्यूरो जैसी संस्थाओं के जाबांजों को केंद्र में रखकर भी लगातार फिल्में बनीं और बन भी रही हैं। इन फिल्मों में से कई फिल्में तो उपन्यासों पर भी बनीं। अभी अभी रिलीज हुई फिल्म ‘राजी’ भी सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट कमांडर हरिंदर एस सिक्का के उपन्यास ‘कॉलिंग सहमत’ पर बनी है। इस फिल्म में एक कश्मीरी लड़की की शादी पाकिस्तान फौज के आला अफसर के बेटे से होती है जो खुद पाकिस्तानी फौज में अफसर होता है। कश्मीरी लड़की का नाम सहमत है और इसकी भूमिका निभाई है आलिया भट्ट ने। सहमत पाकिस्तान फौज के उस आला अफसर के घर में बहू बनकर रहती है, परिवार का दिल जीतती है लेकिन वो दरअसल होती है रॉ की एजेंट जो अपने वतन के लिए अपनी जान खतरे में डालकर, अपना सबकुछ दांव पर लगाकर ये काम करने को राजी होती है। दिल्ली युनिवर्सिटी की एक मासूम सी लड़की वतन पर कुर्बान होने की अपनी पारिवारिक विरासत को आगे बढ़ाती है। कहा जा रहा है कि ये एक सच्ची कहानी है। आलिया ने अपने शानदार अभिनय से इस किरदार को एक ऊंचाई दी है। फिल्म के आखिरी हिस्से में ‘रॉ’ के ऑपरेशन में उसका पति मारा जाता है, तब वो दोनों देशों के बीच जाकी हिंसा और उसको रास्ते में आनेवाले लोगों को मार डालने की एजेंसियों की ट्रेनिंग को अंजाम देने के काम से ऊब चुकी होती है। अपने मिशन में कामयाब होकर जब सहमत वापस अपने मुल्क लौटती है तो उसे पता चलता है कि वो गर्भवती है। अस्पताल के बेड पर बैठी सहमत कहती है कि वो अपना गर्भ नहीं गिराएगी क्योंकि वो और कत्ल नहीं करना चाहती है। यह वाक्य बहुत कुछ कह जाता है। कहानी बहुत अच्छी है जिसका ट्रीटमेंट भी सधा हुआ है, गुलजार के गीत है, उनका बेटी मेघना का निर्देशन है। पूरी फिल्म के दौरान एक रोमांच बना रहता है कि आगे क्या? किसी भी कहानी की सफलता यही होती है कि पाठक या दर्शक को हमेशा ये लगता रहे कि आगे क्या होगा। नामवर सिंह ने इस आगे क्या जानने की पाठकों की उत्सकुता को कहानी की विशेषता बताया था। उनका मानना है कि कहानी ही पाठकों को आगे देखने या चलने के लिए प्रेरित करती है जबकि कविता तो पीछे लेकर जाती है । अगर अच्छी कविता होती है तो उसके पाठ के बाद श्रोता कवि से एक बार फिर से उन पंक्तियों को दुहराने को कहते हैं। नामवर सिंह के इस कथन के आलोक में अगर देखें तो फिल्म ‘राजी’ दर्शकों को जबरदस्त सस्पेंस से गुजारती है। हर वक्त दर्शकों के मन में ये चलता रहता है कि अब सहमत के साथ क्या होगा, उसको लेकर एक डर बना रहता है।यह उत्सकुकता अंत तक बनी रहती है।   
हिंदी फिल्मों में भारत-पाकिस्तान के विभाजन और उसमें हिंदू मुस्लिम, पारसी, सिख परिवारों के द्वंद पर भी कई फिल्में आईं। भारत पाकिस्तान विभाजन को केंद्र में रखते हुए और उसके वजहों को दर्शाती पहली फिल्म मानी जाती है ‘धर्मपुत्र’ ।ये फिल्म यश चोपड़ा ने बनाई थी और 1961 में रिलीज हुई थी। ये फिल्म आचार्य चतुरसेन शास्त्री की इसी नाम की कृति पर आधारित थी। ये फिल्म कट्टरता, सांप्रदायिकता आदि आदि को शिद्दत से रेखांकित करती है।ये पारिवारिक फिल्मी कहानी है जिसमें दो परिवारों का द्वंद सामने आता है। इसके बाद एक फिल्म इस्मत चुगताई की कहानी पर आई ‘गरम हवा’। ये फिल्म काफी चर्चित रही थी और उसको काफी प्रशंसा और पुरस्कार दोनों मिले थे। इसको एस एस सथ्यू ने निर्देशित किया था। इस फिल्म को कला फिल्मों की शुरुआत के तौर पर भी माना जाता है। फिल्म भले ही आगरा के इर्द गिर्द है लेकिन इसका व्यापक फलक भारत-पाकिस्तान रिश्ता और बंटवारे के बाद का द्वंद है। साहित्यक कृतियों पर बनने वाली इस तरह की फिल्मों की एक लंबी सूची है । भीष्म साहनी के बेहद चर्चित उपन्यास ‘तमस’ पर इसी नाम से अस्सी के दशक में टेली-फिल्म का निर्माण हुआ था। इस फिल्म में भारत विभाजन के बाद हिंदू और सिख परिवारों की यंत्रणाएं चित्रित हुई थीं। खुशवंत सिंह के उपन्यास ‘ट्रेन टू पाकिस्तान’ पर इसी नाम से फिल्म बनी थी। इसमें भी विभाजन की त्रासदी है।  
विभाजन के बाद भारत पाकिस्तान में हुए युद्ध पर भी कई फिल्में बनीं। फिल्म ‘राजी’ जिस तरह से 1971 के भारत पाकिस्तान युद्ध की पृष्ठभूमि पर है इसी तरह सत्तर के दशक के शुरुआती वर्ष में चेतन आनंद ने ‘हिन्दुस्तान की कसम’ के नाम से एक फिल्म बनाई थी। इस फिल्म में 1971 के युद्ध के दौरान भारतीय वायुसेना के शौर्य को दिखाया गया था। इस फिल्म में वायुसेना के वेस्टर्न सेक्टर के अभियान ‘ऑपरेशन कैक्टस लिली’ को केंद्र में रखा गया था। इसी नाम से एक और फिल्म बनी थी जिसमें अजय देवगन और अमिताभ बच्चन थे। आमतौर पर माना जाता है कि भारत पाकिस्तान युद्ध या दोनों देशों के रिश्तों पर बनी हिंदी फिल्में अच्छा कारोबार करती हैं लेकिन इन दोनों फिल्मों ने औसत कारोबार किया था। दूसरी बार बनी ‘हिन्दुस्तान की कसम’ को तो बंपर ओपनिंग मिली थी लेकिन वो अपनी सफलता को कायम नहीं रख पाई थी।
विभाजन की विभीषिका और भारत पाक युद्ध के अलावा दोनों देशों के प्रेमी-प्रमिकाओं को केंद्र में रखकर भी दर्जनों फिल्में बनीं। सनी देवल की ‘गदर एक प्रेम कथा’ जाट सिख लड़के और एक मुस्लिम लड़की के प्रेम पर आधारित एक्शन फिल्म थी। इस फिल्म को भी लोगों ने काफी पसंद किया था। इसी तरह से यश चोपड़ा की फिल्म ‘वीर जारा’ भी लोगों को खूब पसंद आई। इसमें एक एयरफोर्स अफसर वीर को पाकिस्तानी लड़की जारा से प्रेम हो जाता है। तमाम मुश्किलों और बाधाओं के बाद भी दोनों मिल जाते हैं। नफरत पर प्रेम की जीत का संदेश। सलमान खान ने भी कई फिल्में की। ‘बजरंगी भाई जान’ में एक पाकिस्तानी लड़की जो भटक कर हिन्दुस्तान आ जाती है उसको उसके घर तक पहुंचाने के लिए पवन कुमार चतुर्वेदी, जिसकी भूमिका सलमान ने निभाई है, जान की बाजी लगा देता है। अंत में फिर नफरत पर प्यार की जीत। कबीर खान की इस फिल्म को जमकर दर्शक मिले। कबीर खान ने ही ‘एक था टाइगर’ बनाई जिसमें एक भारतीय एजेंट महिला पाकिस्तानी एजेंट से प्यार हो जाता है। इसका सीक्वल भी बना, ‘टाइगर जिंदा है’। इसमें तो उत्साही निर्देशक ने रॉ और पाकिस्तान का बदनाम खुफिया एजेंसी आईएसआई को साथ ऑपरेशन करते भी दिखा दिया, जो कल्पना की हास्यास्पद परिणति है। नफरत पर प्यार की जीत दिखाने के चक्कर में इस तरह की हास्यास्पद स्थितियों के चित्रांकन से बचना चाहिए अन्यथा दर्शकों का विवेक फिल्म को नकार भी सकता है।

Saturday, May 5, 2018

इस्लाम के नाम पर विरोध का पाखंड


अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में जिन्ना की तस्वीर पर मचे बवाल के बीच एक और बेहद अहम खबर दब सी गई। उसपर चर्चा कम हो पाई। वैसे भी राजनीति के शोरगुल में कला संस्कृति हमेशा से दबती रही है, लेकिन राजनीति का शोरगुल अस्थायी होता है जबकि संस्कृति, कला और साहित्य में उठने वाले विवाद भले ही नेपथ्य में रहें पर कई पीढ़ियों पर इसका असर होता है। नेहरू जी के समय उठे राजनीतिक विवादों और आरोप-प्रत्यारोप किसको याद हैं लेकिन दिनकर की कृति ‘उर्वशी’ का विवाद अभी भी लोगों के जेहन में ताजा है। पांडेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ की कृति ‘चॉकलेट’ पर उठा विवाद और उसमें महात्मा गांधी के हस्तक्षेप को ना केवल याद किया जाता है बल्कि उसकी साहित्यिक मसलों में मिसाल भी दी जाती हैं।इस पृष्ठभूमि की चर्चा इस वजह से आवश्यक है कि पिछले दिनों सूफी और इस्लाम के नाम पर एक महिला को धमकाया गया, उसके कपड़ों को लेकर टिप्पणियां की गईं। 30 अप्रैल 2018 को गायिका सोना महापात्रा ने मुंबई पुलिस को एक के बाद एक कई ट्वीट किए। अपने पहले ट्वीट में सोना ने लिखा कि ‘मुझे मदारिया सूफी फाऊंडेशन से एक धमकी भरा नोटिस मिला है जिसमें उन्होंने मुझे मेरे म्यूजिक वीडियो ‘तोरी सूरत’ को हर प्लेटफॉर्म से हटा लेने को कहा है। उनका दावा है कि ये वीडियो अश्लील है और सांप्रदायिक तनाव को बढ़ा देगा।‘ इसके बाद उन्होंने मुंबई पुलिस से ये जानना चाहा कि वो किससे संपर्क कर सकती है। इसके चंद मिनटों के बाद उन्होंने एक और ट्वीट किया ‘सूफी मदारिया फाउंडेशन मुझे आदतन अपराधी मानता है और उनके मुताबिक पांच साल पुराना मेरा वीडियो जिसमें मैने सूफियाना कलाम ‘पिया से नैना’ गाया था, में इस्लाम का अपमान किया गया है क्योंकि मैंने उस वीडियो में जो कपड़े पहने हुए हैं उससे मेरा शरीर दिखता है।‘ एक और ट्वीट में फिर लिखा जिसमें उन्होंने साफ किया कि स्लीवलेस ड्रेस और शरीर दिखाती नृत्यांगनाओं पर फाउंडेशन को आपत्ति है। इस मसले को लेकर उन्होंने थाने जाने की जानकारी भी अपने ट्वीट के जरिए दी थी।
सोना को मिले इस धमकी भरे पत्र पर सोशल मीडिया में थोडा स्पंदन हुआ, एक-दो न्यूज चैनलों पर चर्चा भी हुई। जहां सोना ने खुद से मोर्चा संभाला। फाउंडेशन के अध्यक्ष का कहना था कि सोना इस वीडियो के माध्यम से पश्चिम की अपसंस्कृति को बढ़ावा दे रही हैं और उनका गाना और वीडियो में स्लीवलेस कपड़े पहनकर नृत्य करना सूफी परंपरा के खिलाफ है। सोना के मुताबिक सूफी फाउंडेशन के अध्यक्ष तो इसको इस्लाम के अपमान से भी जोड़ रहे थे। उनको कौन समझाए कि सूफी परंपरा मुहब्बत की परंपरा है, नफरत का वहां कोई स्थान नहीं है। फाउंडेशन को अगर लगता है कि इस म्यूजिक अल्बम में अमीर खुसरो और इस्लाम का अपमान हुआ है तो उनको अदालत की शरण में जाना चाहिए था। वो धमकी भरे मेल्स क्यों भेज रहे हैं। टीवी चैनलों पर अपनी आहत भावनाओं का प्रदर्शन क्यों कर रहे थे। उनको इस बात का पता था कि सोना महापात्रा का ये म्यूजिक वीडियो सेंसर बोर्ड से प्रमाणित है लेकिन वो इसको मानने को तैयार नहीं थे।
न्यूज चैनलों पर कई बार ये देखने को मिलता है कि जो शख्स दाढ़ी रखता है और टोपी भी पहनता है वो टीवी चैनलों पर इस्लामिक विद्वान के रूप में प्रस्तुत होता है। टीवी स्क्रीम पर बनी खिड़कियों में बहुधा ऐसे लोग चीखते नजर आते हैं। सोना के मामले में भी इस तरह के लोगों ने धर्म की आड़ में अपनी रोटी सेंकनी शुरू कर दी। इस्लाम को फिर से परिभाषित किया गया लेकिन स्त्री का किसी को ध्यान नहीं। वहीं ये तय किया जाने लगा कि स्त्री कैसे रहे, क्या पहने, क्या गाए आदि आदि। अन्य वक्ताओं ने विरोध भी किया पर मुख्य मुद्दा सियासत के बियावान में खो सा गया। सियासत का तो काम है कि वो किसी भी मुद्दे को अपना औजार बना ले, लेकिन बौद्धिक जगत के किसी भी वर्ग से इस तरह की अपेक्षा नहीं की जाती है। सोना के मामले पर बौद्धिक और कला जगत में कोई खास विरोध देखने को नहीं मिला। एक स्त्री को इस वजह से धमकी दी गई कि उसके कपड़े ठीक नहीं हैं, नृत्य अश्लील है, लेकिन स्त्री विमर्श की झंडाबरदार भी लगभग खामोश ही रहीं। कुछ लोगों ने ट्वीट पर विरोध जताया । मशहूर लेखक और शायर जावेद अख्तर ने सोना के समर्थन में ट्विटर पर लिखा- ‘मैं इस तरह के प्रतिगामी और प्रतिक्रियावादी संगठनों के इस तरह के बर्ताव का पुरजोर विरोध करता हूं, जो सोना महापात्रा के अमीर खुसरो के गीत पर बनाए गए वीडियो पर धमकी देते हैं। इन मुल्लाओं को ये मालूम होना चाहिए कि अमीर खुसरो सभी भारतीयों के हैं, सिर्फ उनकी जागीर नहीं हैं।‘ अन्य इस्लामिक बुद्धिजीवियों को भी जावेद साहब की तरह आगे आकर इस तरह के मसलों का विरोध करना चाहिए और इस्लाम के मुताबिक स्थिति साफ करनी चाहिए।
जावेद अख्तर ने विरोध किया लेकिन अन्य प्रगतिशील विद्वानों का क्या? उनको सोना महापात्रा का अपमान और उनको मिल रही धमकी क्यों नजर नहीं आ रही है। नजर तो उनको अभिनेत्री जायरा वसीम को मिल रही धमकियां भी नहीं आई थीं, जब वो बच्ची दंगल फिल्म की सफलता के बाद अपने गृह राज्य कश्मीर गई थी। उसे इतनी धमकियां मिली थीं कि फेसबुक पोस्ट तक जिलीट करनी पड़ी थी। जिन्ना और अलीगढ़ हिंसा पर न्यायिक जांच की मांग करनेवाले जनवादी लेखक संघ को सोना महापात्रा को मिल रही धमकी और उसका अपमान नजर नहीं आता। उन बयानवीर लेखकों को भी सोना के कपड़ों पर इस्लाम के बहाने सवाल उठानेवाले लोग नजर नहीं आते जो बयान देने के लिए लालायित रहते हैं। क्यों इस्लाम का नाम लेते ही हमारे कथित प्रगतिशील, जनवादी आदि आदि कहलाने वालों के हलक सूखने लगते हैं। सोना एक कलाकार होने के अलावा एक स्त्री भी है, वो क्या पहने, कैसे रहे, क्या गाए ये उसकी स्वतंत्रता है, भारत का संविधान उसको इसकी इजाजत देता है। अगर कोई संविधान के दायरे से बाहर निकलकर उसको धमकी देता है तो भी हमारे प्रगतिशीलता के धव्जवाहक खामोश रहते हैं क्योंकि मामला उनके राजनीतिक अकाओं के मुताबिक नहीं है। सवाल तो उन स्त्रीवादी, नारीवादियों पर भी है जो सोना महापात्रा के समर्थन में खड़ी नहीं हो पा रही हैं। इस मसले पर उनकी कलम भी सूख सी गई, कीबोर्ड जाम हो गया, उनके अंदर का एक्टिविस्ट निरपेक्ष हो गया। यह चुनी हुई चुप्पी या चुनी हुई खामोशी है जो जनवाद और प्रगतिशीलता के सामने सबसे बड़ी चुनौती है।
यह पहला मौका नहीं है जब किसी कट्टरपंथी की धमकी पर हमारा कथित तौर पर तरक्कीपसंद खेमा खामोश है। दरअसल अगर हम देखें तो जनवाद, प्रगतिवाद या फिर इससे अलग होकर जन संस्कृति के नाम पर साहित्य के मार्फत सियासत करनेवाले लेखक, संस्कृतिकर्मी, कलाकार दो मसलों पर बिल्कुल खामोश हो जाते हैं। एक तो जब इस्लामिक कट्टरपंथी संस्कृति आदि के नाम पर कुछ करते या बोलते हैं और दूसरे रूस या चीन में कुछ घटित होता है। कुछ महीनों पहले बांग्लादेश में कट्टरपंथियों ने टैगोर की रचनाओं को वहां की पाठ्य पुस्तक से हटवाने की मुहिम चलाई थी, लेकिन हमारा प्रगतिशील तबका तब खामोश रहा था। इसी तरह चीन के एक विश्वविद्यालय ने छात्रों के लिए एक फरमान जारी किया था जिसके मुताबिक कैंपस में लड़का- लड़की एक दूसरे के हाथ में हाथ डालकर नहीं चल सकते थे । लड़का-लड़की एक दूसरे के कंधे पर हाथ भी नहीं रख सकते हैं। इस फैसले में हमारे कथित प्रगतिशील जमात में से किसी को निजता का हनन नजर नहीं आया था।
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में जिन्ना की तस्वीर के लिए जिनका दिल धड़कता है, जो किसी छोटी सी घटना पर देश के गृहमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक को कठघरे में खड़ा कर देते हैं, उनसे जवाब की अपेक्षा रखते हैं उनकी सोना जैसे मसलों पर खामोशी का मतलब समझ नहीं आता । अगर आप बौद्धिक रूप से ईमानदार हैं, अगर आप किसी विचारधारा की बेड़ियों में जकड़े हुए नहीं हैं तो साहित्यक और सामाजिक मुद्दों पर आपकी कलम वस्तुनिष्ठ होकर चलनी चाहिए । कलम में वो धार होनी चाहिए, वो तेज होनी चाहिए जो कि एक न्यायप्रिय शासक के पास हुआ करती थी । जो बगैर धारा, विचारधारा, संगठन, स्वार्थ, जाति समुदाय आदि को देखे न्याय करता था । कलम को अगर हम किसी खास विचारधारा का गुलाम बनाएंगे या फिर कलम की धार किसी खास समुदाय के समर्थन में उठा करेगी तो समय के साथ उस कलम पर से पाठकों का विश्वास  उठता चला जाएगा । लेखकों की नैतिक आभा का क्षरण होना किसी भी समाज के लिए शुभ संकेत नहीं होता है।

Saturday, April 28, 2018

अपने अपने 'देवदास'


हिंदी फिल्मों के इतिहास और हिंदी साहित्य पर नजर डालें तो बहुत दिलचस्प चीजें सामने आती हैं। कुछ लेखकों का फिल्मों का अनुभव बहुत बुरा है। हिंदी के कथा सम्राट प्रेमचंद तो फिल्मों को लेकर बहुत दुखी रहते थे। रामवृक्ष बेनीपुरी जी ने अपने एक संस्मरण में प्रेमचंद के दर्द को सार्वजनिक किया है- ‘1934 की बात है । बंबई में कांग्रेस का अधिवेशन हो रहा था । इन पंक्तियों का लेखक कांग्रेस के अधिवेशन में शामिल होने आया ।  बंबई में हर जगह पोस्टर चिपके हुए थे कि प्रेमचंद जी का ‘मजदूर’ अमुक तारीख से रजतपट पर आ रहा है । ललक हुई, अवश्य देखूं कि अचानक प्रेमचंद जी से भेंट हुई । मैंने ‘मजदूर’ की चर्चा कर दी । बोले ‘यदि तुम मेरी इज्जत करते हो तो ये फिल्म कभी नहीं देखना ।’ यह कहते हुए उनकी आंखें नम हो गईं । और, तब से इस कूचे में आने वाले जिन हिंदी लेखकों से भेंट हुई सबने प्रेमचंद जी के अनुभवों को ही दोहराया है ।‘हिंदी फिल्मों का साहित्य से बड़ा गहरा और पुराना नाता रहा है। कई लेखक साहित्य के रास्ते फिल्मी दुनिया पहुंचे थे। प्रेमचंद से लेकर विजयदान देथा की कृतियों पर फिल्में बनीं। कइयों को शानदार सफलता और प्रसिद्धि मिली तो ज्यादातर बहुत निराश होकर लौटे ।प्रेमचंद, अमृत लाल नागर, उपेन्द्र नाथ अश्क, पांडेय बेचन शर्मा उग्र, गोपाल सिंह नेपाली,सुमित्रानंदन पंत जैसे साहित्यकार भी फिल्मों से जुड़ने को आगे बढ़े थे, लेकिन जल्द ही उनका मोहभंग हुआ और वो वापस साहित्य की दुनिया में लौट आए ।
लेकिन इससे इतर या इसका एक दूसरा पक्ष भी है । कुछ ऐसी कहानियां या उपन्यास हैं जिसपर फिल्मकार दशकों बाद आजतक तक फिदा हैं। कहानी की मूल आत्मा को बरकरार रखते हुए उसकी स्थितियों और घटनाओं में परिवर्तन कर नयापन लाने की कोशिश करते हैं। शरतचंद्र चट्टोपाध्याय की कृति ‘देवदास’ फिल्मों के इसी कोष्ठक में है। ये उपन्यास लगभग हर पीढ़ी के भारतीय फिल्मकारों को अपनी ओर खींचता रहा है। यह अकारण नहीं है कि देवदास पर आधारित अबतक छह फिल्में तो सिर्फ हिंदी में बन चुकी हैं। अन्य भारतीय भाषाओं में भी दर्जनों फिल्में इस उपन्यास पर बनी हैं। हिंदी में ‘देवदास’ पर सबसे पहले फिल्म बनाई प्रमथेस बरुआ ने जिसमें के एल सहगल प्रोटेगनिस्ट की भूमिका में थे। बरुआ ने हिंदी और बांग्ला में इस फिल्म का निर्माण किया था। हलांकि इस बात की चर्चा भी मिलती है कि नरेश मिश्रा ने 1928 में ‘देवदास’ के नाम से एक मूक फिल्म बनाई थी। बरुआ के बाद विमल रॉय ने भी देवदास पर फिल्म बनाई जिसमें दिलीप कुमार ने यादगार भूमिका निभाई। यहां यह जानना दिलचस्प होगा कि विमल रॉय प्रमथेस बरुआ की फिल्म देवदास के कैमरापर्सन थे। बीस साल बाद जब उन्होंने दिलीप कुमार को लेकर फिल्म बनाई वो दर्शकों को खूब पसंद आई। देवदास में दिलीप कुमार के साथ सुचित्रा सेन और वैजयंती माला थीं। यहां भी एक दिलचस्प कहानी है जो इस फिल्म से जुड़ी है। इस फिल्म में अभिनय के लिए वैयजंयती माला को बेस्ट सपोर्टिंग एक्ट्रेस का फिल्मफेयर अवॉर्ड देने की घोषणा हुई थी जिसे उन्होंने ठुकरा दिया था। 
इसके बाद संजय लीला भंसाली ने शाहरुख खान, माधुरी दीक्षित और एश्वर्या राय को लेकर देवदास बनाई। जिसमें पारो की भूमिका में एश्वर्या राय और चंद्रमुखी की भूमिका माधुरी दीक्षित ने निभाई। संजय लीला भंसाली ने भी कहानी में बदलाव किया था। इसके पहले सत्तर के दशक में गुलजार ने धर्मेन्द्र, हेमा मालिनी और शर्मिला टैगोर को लेकर ‘देवदास’ बनाने की कोशिश की थी लेकिन वो फिल्म बन नहीं पाई। अगर वो फिल्म बनती तो प्रथमेश बरुआ की परंपरा जो विमल रॉय के माध्यम से दर्शकों के सामने आई थी वो आगे बढ़ती। विमल रॉय, प्रथमेश बरुआ के कैमरामैन थे उसी तरह से गुलजार भी विमल रॉय के असिस्टेंट थे। इसके बाद से देवदास पर आधारित ‘देव डी’ बनी जिसमें फिल्मकार अनुराग कश्यप ने स्थितियां बहुत बदल दीं और कहानी को नए संदर्भ दिए लेकिन मूल आत्मा वही रही। अंग्रेजी के एक समीक्षक ने ‘देव डी’ को बारे में लिखा था कि ये उपन्यास देवदास का लूज एडप्टेशन है।
‘देवदास’ उपन्यास पर ताजा फिल्म है ‘दासदेव’। इस फिल्म को सुधीर मिश्रा ने निर्देशित किया है और संजीव कुमार ने प्रोड्यूस किया है। यह फिल्म आधारित तो है शरतचंद्र के उपन्यास पर इसको राजनीति की संवेदनहीन भूमि पर नए संदर्भों और स्थितियों के आधार पर पेश किया है। कहानी उत्तर प्रदेश के एक गांव से शुरू होती है और वहीं पर खत्म हो जाती है। दरअसल अगर हम शरतचंद्र के 1917 में लिखे उपन्यास ‘देवदास’ में इसका नायक अपने प्यार के लिए खुद को बर्बाद करता है। राजनीति की खूनी जमीन पर ‘दासदेव’ में सुधीर मिश्रा ने देव चौहान के किरदार के माध्यम से इस थीम को मजबूती देने की कोशिश की है। राजनीति की बंजर जमीन पर प्यार की कोमल भावनाओं को रिचा चड्डा और अदिति राव हैदरी ने अपनी जानदार भूमिकाओं से जीवंत कर दिया है। दरअसल अगर हम सूक्ष्मता से देखें तो सुधीर मिश्रा ने अपनी इस फिल्म ‘दासदेव’ में शरतचंद्र के उपन्यास ‘देवदास’ और शेक्सपियर की कृति ‘हैमलेट’ को मिला दिया है और ‘देवदास’ की कहानी को भी थोड़ा सा उलट दिया है। शरतचंद्र में जहां नायक खुद को बर्बाद करता है वहीं दासदेव का नायक खुद को बर्बाद करने के बाद नाम बदलकर अपने प्यार पारो को पाने में कामयाब हो जाता है। अदिति राव हैदरी ने चांदनी की भूमिका में राजनीति के उस पक्ष को उजागर कर दिया है जहां सत्ता के शीर्ष पर बैठे शख्स का विद्रूप चेहरा सामने आता है। इस फिल्म में जबरदस्त हिंसा है, फिल्म बहुत तेजी से चलती है लेकिन प्रेम की गहराई तब भी कहीं कम नहीं होती, प्रेम का आवेग कहीं बाधित नहीं होता। इस फिल्म में प्रेम की इंटेंसिटी है लेकिन कई बार राजनीतिक षडयंत्रों के बीच वो नेपथ्य में जाती दिखती है, फिर वापस केंद्र में आ जाती है।
इस तरह से अगर हम देखते हैं तो देवदास की मूल कहानी को अपनाते हुए भी कई फिल्मकार उसमें बदलाव करते चलते हैं। नायक द्वारा अपने प्यार को पाने के लिए खुद को बर्बाद करने की थीम पर भी कई फिल्में बनीं। साहित्यकारों को बहुधा शिकायत रहती है कि उनकी रचना के साथ छेड़छाड़ की गई। प्रेमचंद का भी यही दर्द था। लेकिन हमें इस संदर्भ में गुरुवर रवीन्द्र नाथ टैगोर के कथन को याद करना चाहिए। उन्होंने 1929 में शिशिर कुमार भादुड़ी के भाई मुरारी को लिखे एक पत्र में सिनेमा और साहित्य पर अपने विचार प्रकट किए थे। टैगोर ने लिखा था- ‘कला का स्वरूप अभिव्यक्ति के मीडियम के अनुरूप बदलता चलता है। मेरा मानना है कि फिल्म के रूप में जिस नई कला का विकास हो रहा है वो अभी तक रूपायित नहीं हो पाई है। हर कला अपनी अभिव्यक्ति की स्वाधीन शैली अपने रचना जगत में तलाश लेती है। सिनेमा के लिए सृजनशीलता ही काफी नहीं है उसके लिए पूंजी भी आवश्यक है और सिनेमा में बिंबों के प्रभाव के माध्यम से अभिव्यक्ति को पूर्णता प्राप्त होती है।‘ टैगोर ने आज से करीब नब्बे वर्ष पहले जो लिखा था वो आज भी मौजूं है। कला अपने अभिव्यक्ति की स्वाधीन शैली तलाशती ही है। ध्यान सिर्फ इतना रखना चाहिए कि पूंजी को आवश्यक तो माना जाए लेकिन सिर्फ उसको ही आवश्यक मानने से सृजनशीलता से लेकर बिंबों तक पर असर पड़ने लगेगा। ‘दासदेव’ में यह तो नहीं दिखाई देता है क्योंकि सुधीर मिश्रा ने बेहद खूबसूरती के साथ कहानी को शरतचंद्र के यहां से उठाते हुए उसको एक नई कल्पनाशीलता में पिरोया है। अब इस बात पर बहस तो हो सकती है कि फिल्मकार किसी कृति में छेड़छाड़ की कितनी छूट ले सकता है। इसपर साहित्य जगत मे लंबी बहसें पहले भी हुई हैं और अब भी की साहित्यक कृति पर फिल्म का निर्माण होता है तो इस मुद्दे पर चर्चा शुरू हो जाती है। जब सत्यजित राय प्रेमचंद की कृति ‘शतरंज के खिलाड़ी’ पर फिल्म बना रहे थे तब भी यह बहस हुई थी और कहा गया था कि सत्यजित राय ने मूल कथानक के साथ छेड़छाड़ की । जब हिंदी के मशहूर कथाकार विजयदान देथा की कहानी पर ‘पहेली’ फिल्म बनी थी तब भी उसमें काफी बदलाव किया गया था। वाद विवाद भी हुए थे। अब जब दासदेव में शतरचंद्र और शेक्सपियर को मिला दिया गया है, सुधीर मिश्रा ने फिल्म की शुरुआत में इसका पर्याप्त संकेत भी किया है,तो साहित्य जगत में इसको लेकर क्या प्रतिक्रिया होती है यह देखना दिलचस्प होगा।

Monday, April 23, 2018

‘कोठेवालियां’ और सिनेमा का समाजशास्त्र ·


हिंदी साहित्य में फिल्म पर लेखन को सालों तक गंभीरता से नहीं लिया जाता रहा। हिंदी में साहित्यकारों के एक वर्ग का मानना है कि फिल्में और उससे जुड़ी बातें साहित्य के लिए बहुत हल्की हैं। हिंदी में फिल्मों पर गंभीर लेखन लगभग नहीं हो रहा है। फिल्म समीक्षाओं और छिटपुट लेखन को संकलित कर किताबें बनाने की प्रवृत्ति बढ़ी है, कुछ अपवादों को छोड़कर। जबकि अंग्रेजी में ऐसी स्थिति नहीं है वहां सालों से फिल्म और उससे जुड़ी बातों पर गंभीरता से लिखा जाता रहा है। अंग्रेजी ही क्यों कई अन्य भारतीय भाषाओं में भी फिल्मों पर गंभीर अध्ययन हुआ है चाहे वो मलयालम हो, बांग्ला हो या तमिल हो। कई बार तो अंग्रेजी और अन्य भारतीय भाषाओं में प्रकाशित पुस्तकों को देखकर लगता है कि काश हिंदी में भी इस तरह का अध्ययन होता और विद्वान लेखक किसी विषय विशेष पर श्रमपूर्वक पुस्तक लिखते। पिछले दिनों वेंडि डोनिगर की अंगूठी पर केंद्रित किताब ‘द रिंग्स ऑफ ट्रूथ’ पढ़ते वक्त भी यही बात दिमाग में उठी थी। अभी जब युनिवर्सिटी ऑफ मोंटाना की प्रोफेसर रूथ वनिता की किताब ‘डासिंग विथ द नेशन, कोर्टिजन्स इन बांबे सिनेमा’ पढ़ी तो एक बार फिर से ये बात दिमाग में कौंधी। रूथ वनिता ने हिंदी फिल्मों में गणिकाओं,नर्तकियों, वेश्याओं, नगरवधुओं, तवायफों और कोठेवालियों जैसे शब्दों तक को परखा है। उनका मानना है कि अन्य विशेषताओं के अलावा कोर्टिजन्स के चरित्रों का चित्रण बांबे सिनेमा को हॉलीवुड से अलग करता है। बहुत सारे शब्दकोशों में कोर्टिजन्स का मतलब वेश्या दिया गया है लेकिन वनिता ने अपनी इस किताब में कोर्टिजन्स का दायरा बढ़ाकर उसको अपने अध्ययन का आधार बनाया है। वनिता ने बांबे फिल्म की उन सभी महिला चरित्रों को अपनी इस किताब में शामिल किया है जो अपनी आजीविका नाच-गाकर चलाती हैं, इतिहास में अलग अलग समय पर पुरुषों का मन भी लगाती रही है चाहे बतिया कर या चाहे मनोरंजन कर। अपनी इस किताब में विनीता ने सिनेमा के अलावा सेक्सुअलिटी की ऐतिहासिकता को प्राचीन भारतीय ग्रंथों के उदाहरणों से भी स्पष्ट किया है। मसलन जब वो वेश्या के बारे में बात करती हैं तो ‘निरुत्तर तंत्र’ में वर्णित उद्धरणों को पाठकों के सामने रखती हैं। इससे वो सेक्सुअली इंडिपेंडेंट महिला और यौनकर्मी के भेद को स्पष्ट करती हैं। वो तवायफ शब्द के अर्थ बदल जाने को भी रेखांकित करती हैं कि किस तरह तवायफ का अर्थ पहले सिर्फ नाचने गानेवाली होता था जो कालांतर में देह व्यापार से जुड़ गया।
इस पुस्तक में लेखिका ने उन स्थितियों की चर्चा भी की है कि किस तरह से और क्यों बांबे सिनेमा ने कोर्टिजन्स को सेक्स वर्कर चित्रित करना शुरू कर दिया। वो असल जिंदगी की तवायफ को बांबे सिनेमा में तवायफ की भूमिका को मजबूत करनेवाली मानती हैं। उऩका मानना है कि तवायफें प्रशिक्षित नृत्यांगना और गायिका होती थी और उन्होंने ही बांबे फिल्मों में शुरुआती दिनों में एक्टर से लेकर सिंगर, कोरियोग्राफर, म्यूजि डारेक्टर आदि की भूमिका का निर्वाह किया। वो इस बात को भी रेखांकित करती हैं कि बांबे सिनेमा के डीएनए में तवायफ संस्कृति बहुत गहरे तक धंसी हुई थी। फिल्मों में वेश्या के रोल को जिस तरह से हिरोइंस चुनौतीपूर्ण मानती रही हैं उसी तरह से निर्माता और निर्देशक भी वेश्या के इर्द गिर्द फिल्म बनाने को चैलेंज की तरह लेते रहे हैं । भारतीय समाज में वेश्या का चरित्र हमेशा से लोगों को लुभाता रहा है, उनके रहन-सहन से लेकर बात व्यवहार से लेकर उनके जीवन की परतों को देखने समझने की आकांक्षा जनमानस में होती है । हिरोइंस भी इस तरह के रोल को लीक से हटकर मानती रही हैं और उनको भी लगता है कि वेश्या का सफल रोल निभाना उनके करियर का एक अगम पड़ाव हो सकता है,

रूथ वनिता ने इस संबंध में अपनी किताब में नरगिस की मां जद्दनबाई का उदाहरण देती हैं । जद्दनबाई इलाहाबाद की कोर्टिजन दलिपबाई की बेटी थी। जद्दनबाई बांबे सिनेमा में पायनियर की तरह देखी जाती हैं। इसके अलावा वो फातिमा बेगम का नाम लेती हैं और उनको बांबे सिनेमा की पहली महिला निर्देशक करार देती हैं। उन्होंने 1926 में ‘बुलबुल ए परिस्तान’ नाम की मूक फिल्म बनाई थी। ये भी एक तवायफ के परिवार से थीं। इस तरह के कई अन्य उदाहरण दिए गए हैं। ढाई सौ पन्नों की अपनी इस किताब को रूथ वनिता ने छह अध्याय में बांटा है जिसमें परिवार, ईरास, कार्य, पुरुष सहयोगी, राष्ट्र और धर्म में बांटकर इस विषय की व्याख्या की है। कालखंडों के आधार पर कोर्टिजन्स के बदलते स्वभाव और चरित्र को रेखांकित किया गया है। बदलाव को रेखांकित करते वक्त लेखिका ने उस दौर के फिल्मों के गानों और दृश्यों का बेहतरीन इस्तेमाल किया है। जैसे तवायफ की जाति आदि के बारे में बात करते हुए वो स्वार्थी (1986) फिल्म के गाने की पंक्ति कोट् करती हैं ‘तवायफ नाम है मेरा, निराली जाति मेरी।‘ इसी तरह जब गरीब परिवार की लड़कियों के कोठे पर आने और उसकी जाति की बात होती है तो मंगल पांडे में हीरा का संवाद पेश करती हैं ‘बिकाऊ लोगों की जाति नहीं होती।‘ अपने तर्क के समर्थन में लेखिका फिल्म खिलौना(1970), बेनजीर(1964), तेरी पायल मेरे गीत(1993) और गाइड(1965) जैसी फिल्मों से उदाहरण देती चलती हैं। इसके अलावा वो दरगाह और मंदिरों के जरिए भी इस पेशे से जुड़ी महिलाओं के बारे में बातें करती हैं।
जैसा कि ऊपर भी संकेत किया गया है कि फिल्मकारों से लेकर कलाकारों तक की इच्छा होती है कि वो कोठे के जीवन को लेकर एक फिल्म जरूर बनाए । हिंदी फिल्मों की परंपरा को देखें तो यहां कोठों को लेकर सैकडों फिल्में बनी हैं । सबसे मजेदार तथ्य तो यह है कि कोठेवाली बनने में नई से लेकर पुरानी अभिनेत्रियों को कभी गुरेज नहीं रहा । कोठेवाली की भूमिका को अभिनेत्रियां चुनौतीपूर्ण मानती रही हैं । रेखा ने भी इस रोल में यादगार भूमिकाएं निभाई हैं। फिल्म ‘बेगम जान’ में विद्या बालन ने तो करीना कपूर ने ‘चमेली’ में वेश्या की भूमिका निभाई । इस फिल्म के आठ साल बाद करीना एक बार फिर से वेश्या की भूमिका में दिखी फिल्म ‘तलाश’ में जिसमें उसके साथ आमिर खान और रानी मुखर्जी भी थे । रीमा बुगती की इस फिल्म में भी करीना ने जोरदार अभिनय किया । करीना के अलावा रानी मुखर्जी ने भी साल दो हजार सात में दो फिल्मों में वेश्या की भूमिका निभाई थी – ‘सांवरिया’ और ‘लागा चुनरी में दाग’। ‘सांवरिया’ में उसको रणबीर से इश्क होता है लेकिन कहानी को कुछ और ही मंजूर था और रणबीर, सोनम के इश्क में डूबने लगता है और रानी को भुला देता है । लेकिन रानी की फिल्म ‘लागा चुनरी में दाग’ एक बेहतरीन और यादगार भूमिका वाली फिल्म है इसी तरह से दो हजार एक में आई फिल्म‘चांदनी बार’ में तब्बू की भूमिका ने उस साल उसकी झोली पुरस्कारों से भर दी थी ।
इक्कसवीं सदी की शुरुआत में कई फिल्में बनीं जिसमें उस दौर की टॉप की हिरोइंस ने वेश्या का रोल निभाया । जैसे दो हजार एक में ही बनी फिल्म ‘चोरी चोरी चुपके चुपके’ में प्रीति जिंटा वेश्या थी जिसे सलमान खान सैरोगेसी के लिए तैयार करते हैं क्योंकि कारोबरी सलमान और उसकी पत्नी रानी मुखर्जी को बच्चा नही हो रहा था । दो हजार नौ में आई फिल्म ‘देव डी’ में कल्कि ने भी हाई प्रोफाइल काल गर्ल की भूमिका निभाई थी जो दिन में कॉलेज की छात्रा होती थी और रात में वेश्यावृत्ति करती थी । इस फिल्म में आधुनिक समाज में एक लड़की के वेश्यावृत्ति के धंधे में किस मजबूरी में उतरना पड़ता है इसको फिलमकार ने बेहद सधे अंदाज में पेश किया है कंगना रनावत ने भी दो हजार तेरह में बनी फिल्म ‘रज्जो’ में मुंबई के रेड लाइट एरिया में रहनेवाली वेश्या का रोल किया था । दो हजार पांच में आई फिल्म ‘नो एंट्री’ में बिपाशा बसु ने भी एक सेक्स वर्कर का रोल किया था । फिल्म ‘मार्केट’ में मनीषा कोइराला तो ‘जूली’ में नेहा धूपिया ने भी वेश्या का रोल किया है ।
अपनी इस किताब की शुरुआत में ही लेखिका ने इस अध्ययन की जो रूपरेखा प्रस्तुत की है उससे ही अंदाज लग जाता है कि ये काम बहुत अहम है। इस पूरे अध्ययन का निष्कर्ष लेखिका यह निकालती हैं कि कोर्टिजन का जो चरित्र भारत में रहा है उसके आधार पर ही आधुनिक भारत में जेंडर और सेक्सुअलिटी की अवधारणा का विकास हुआ है। वनिता का मानना है कि बांबे फिल्मों में जिस तरह से कोर्टिजन्स को दिखाया गया है वो भारतीय फिल्म का विश्व सिनेमा को एक अद्भुत देन है। रूथ वनिता की यह पुस्तक बहुत महत्वपूर्ण है और इसको पढकर जेंडर और सेक्सुअलिटी को समझ थोड़ी और साफ होती है।








Saturday, April 14, 2018

विश्व हिंदी सम्मेलन की आहट से उठे सवाल


ग्यारहवें विश्व हिंदी सम्मेलन के मॉरीशस आयोजन को लेकर चर्चाएं शुरू हो गई हैं। इसका आयोजन संभवत इस वर्ष अगस्त में किया जाएगा। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की अगुवाई में इस आयोजन को अंजाम दिया जाएगा। सुषमा जी का हिंदी प्रेम जगजाहिर है। हिंदी के वरिष्ठ लेखक नरेन्द्र कोहली ने कई बार सुषमा जी के हिंदी प्रेम को रेखांकित किया है। उनके मुताबिक वो विदेश मंत्री के साथ कई बैठकों में शामिल रहे हैं और हिंदी से संबंधित किसी विषय पर अगर उनके सामने अंग्रेजी में प्रस्ताव या कार्ययोजना आदि आ जाता है तो वो बुरी तरह से नाराज हो जाती हैं। डॉ कोहली के मुताबिक सुषमा जी हिंदी को लेकर इतनी प्रतिबद्ध प्रतीत होती हैं कि अगर बैठक हिंदी या भाषा से संबंधित है तो वो उस बैठक में तबतक आगे नहीं बढ़ाती हैं जबतक कि उनके सामने सारे दस्तावेज हिंदी में नहीं रखे जाएं। सुषमा जी ने हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनाने को लोकर भी रुचि दिखाई थी। भोपाल में आयोजित विश्व हिंदी सम्मेलन में गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने भी कहा था कि सरकार कोशिश करेगी। इस दिशा में कोई ठोस प्रगति हो पाई है या नहीं ये तो अभी ज्ञात नहीं हो पाया है लेकिन गाहे बगाहे बयानों से हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनाने को लेकर पक्ष विपक्ष में चर्चा हो जाती है। अब जबकि विश्व हिंदी सम्मेलन की आहट सुनाई दे रही है तो एक बार फिर से हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनाने को लेकर बातें होंगी। होगा क्या इसका अंदाज लगाना कठिन है क्योंकि विश्व हिंदी सम्मेलन के आयोजनों में कई बार इस आशय का प्रस्ताव गाजे बाजे के साथ पास होता रहा है। मैं जोहानिसबर्ग में आयोजित विश्व हिंदी सम्मेलन में शामिल हुआ था। वहां कई अहम प्रस्ताव पारित हुए थे। सबसे अहम और पहला प्रस्ताव तो हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनाने को लेकर ही हुआ था। विगत में आयोजित विश्व हिंदी सम्मेलनों में पारित प्रस्ताव को रेखांकित करते हुए हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा के रूप में मान्यता प्रदान किए जाने के लिए समयबद्ध कार्रवाई सुनिश्चित करने पर बल दिया गया था। पहले भी आयोजित दो विश्व हिंदी सम्मेलनों में इस तरह का प्रस्ताव पारित किया जा चुका है । लेकिन उसका अबतक कोई नतीजा सामने नहीं आया था । जो दूसरा अहम प्रस्ताव पारित हुआ था वो यह था कि दो हिंदी सम्मेलनों के आयोजन केबीच यथासंभव अधिकतम तीन वर्ष का अंतराल हो । अबतक यह व्यस्था थी कि विश्व हिंदी सम्मेलनों के आयोजन के बीच कोई भी अंतराल नियत नहीं था । सरकारों की इच्छा और अफसरों की मर्जी पर विश्व हिंदी सम्मेलन का आयोजनहोता रहा है । अब अगर भारत सरकार ने ये इच्छा शक्ति दिखाई है कि वो अधिकतम तीन वर्षों केअंतराल पर विश्व हिंदी सम्मेलन का आयोजन करेगी तो ये संतोष की बात है । अगर यह मुमकिनहो पाता है तो इससे हिंदी का काफी भला होगा । चाहे वो सम्मेलन भारत में आयोजित हों या फिरविदेश में । हिंदी को लेकर वैश्विक स्तर पर एक चिंता और उससे निबटने के उपायों पर विमर्श कीनियमित शुरुआत तो होगी । हिंदी को लेकर सरकारों की नीतियां भी साफ तौर पर सामने आ पाएंगी। 
इस वर्ष जब मॉरीशस में विश्व हिंदी सम्मेलन का आयोजन हो रहा है तो ऐसे में मन में एक सवाल और उठता है। वह है मॉरीशस में स्थापिक विश्व हिंदी सचिवालय के कामकाज के बारे में। 1975 में जब नागपुर में विश्व हिंदी सम्मेलन का आयोजन हुआ था तब मॉरीशस के तत्कालीन प्रधानमंत्री व प्रतिनिधि मंडल के अध्यक्ष सर शिवसागर रामगुलाम ने एक विश्व हिंदी केंद्र की स्थापना का विचार पेश किया था। विश्व हिंदी सचिवालय की बेवसाइट पर मौजूद जानकारी के मुताबिक इस विचार ने दृढ़ संकल्प का रूप धारण किया मॉरीशस में आयोजित द्वितीय विश्व हिंदी सम्मेलन में और लगातार कई विश्व हिंदी सम्मेलनों में मंथन के बाद मॉरीशस में विश्व हिंदी सचिवालय की स्थापना का विचार साकार हुआ।  12 नवंबर, 2002 को मॉरीशस सरकार द्वारा विश्व हिंदी सचिवालय की स्थापना व प्रबंधन से संबंधित अधिनियम पारित किया गया। हिंदी का अंतरराष्ट्रीय भाषा के रूप में प्रचार तथा हिंदी को संयुक्त राष्ट्रसंघ की आधिकारिक भाषा बनाने के लिए मंच तैयार करने के उद्देश्य से सचिवालय की स्थापना हुई।  21 नवंबर, 2003 को नई दिल्ली में मॉरीशस सरकार तथा भारत सरकार के बीच विश्व हिंदी सचिवालय के गठन व कार्य पद्धतियों से संबंधित एक समझौते पर हस्ताक्षर किए गए। 11 फरवरी, 2008 को विश्व हिंदी सचिवालय ने आधिकारिक रूप से कार्यारंभ किया। यहां तक तो ठीक है लेकिन अब सवाल उठता है कि इतने लंबे समय तक मंथन के बाद 2008 में जब औपचारिक रूप से इस संस्था ने काम शुरू किया तो दस साल का हासिल क्या है। इस दस साल के हासिल के बारे में बात करते हैं तो हमें बहुत कुछ दिखाई देता नहीं है। इस संस्था को लेकर बहुत उत्साह भारत सरकार में कभी नहीं रहा। इसके शासी निका. की बैठकें तक नियमित नहीं होती हैं। यह जिस उद्देश्य से स्थापित किया गया था उसतक पहुंतने के लिए इस संस्था ने क्या कदम उठाए हैं ये जानने का अधिकार भारत की जनता को है क्योंकि उनकी गाढ़ी कमाई का पैसा इस संस्था में लगता है।
इस संस्था की बेवसाइट पर उपलब्ध जानकारी बहुत निराशाजनक है। अगर आप गतिविधियां और आयोजन खंड में जाकर झांकते हैं तो वहां जो पहली गतिविधि दिखाई देती है वह है मॉरीशल में विश्व हिंदी दिवस, दूसरा है कार्यारंभ दिवस, अंतराष्ट्रीय क्षेत्रीय सम्मेलन, आईसीटी कार्यशालाएं और सचिवालय के प्रकाशन। अगर सचिवालय के प्रकाशन खंड को देखते हैं तो तीन पत्रइका का नाम दिखाई देता है वह है विश्व हिंदी पत्रिका, विश्व हिंदी समाचार और अंतरक्षेत्रीय सम्मेलन स्मारिका है। दरअसल हिंदी के नाम पर ज्यादातर संस्थाएं ऐसी हैं जहां इऩ भाषाओं को लेकर बहुत खास होता दिखता नहीं है। भाषा के लिए ठोस काम की बजाए ऐसी संस्थाओं में आयोजन ज्यादा होते हैं। लगभग सभी सरकारी संस्थाओं में बैठे आकाओं को ये लगता है कि आयोजन करवाने से संस्था सक्रिय नजर आती है। आती भी है क्योंकि इसमें जो लोग शामिल होते हैं वो उस आयोजन के बारे में बातें करते हैं। सोशल मीडिया पर अपनी भागीदारी को प्रचारित करते हैं तो प्रकरांतर से उस संस्था का प्रचार होता है और जनता के बीच उसके सक्रिय होने का संदेश जाता है। जबकि ऐसी संस्थाओ से ये उम्मीद की जाती है कि वो भाषा को लेकर कोई ठोस काम करेंगे। अंग्रेजी में हर साल शब्दकोश का प्रकाशन होता है, उसको अपडेट किया जाता है, उसमें शब्द जोड़े जाते हैं लेकिन हिंदी में ऐसा नहीं हो पाता है। शब्दों को जोड़े जाने का काम तो छोड़ ही दें, हर साल शब्दकोश के प्रकाशऩ की भी व्यवस्था नहीं है। सालों से कोई नया शब्दकोश नहीं निकला है। जबकि इन संस्थाओं से अपेक्षा की जाती है कि वो कम से कम शब्दकोश तो प्रकाशित करें। इन संस्थाओं का करोड़ों का बजट होता है जिसमें से एक बड़ा हिस्सा आयोजनों पर खर्च होता है। प्रकाशन उनकी प्राथमिकता में नहीं है। किशोरीदास वाजपेयी ने हिंदी शब्दानुशासवन जैसी किताब लिखी थी जो अब लगभग अनुपलब्ध है। उसके पुनर्प्रकाशऩ के लिए काम होना चाहिए। ये तो सिर्फ एक उदाहरण है, ऐसे सैकड़ों महत्वपूर्ण ग्रंथ हैं जो अब लगभग अनुपलब्ध हैं।
संस्कृति मंत्रालय के कितने उपक्रम हैं जिसके अंतर्गत इस तरह के काम हो सकते हैं, लेकिन सवाल यही कि उसको लेकर एक पहल तो करनी होगी। नौकरशाहों से हम ये अपेक्षा नहीं कर सकते, पर मंत्री से, जनता के नुमाइंदे से ये अपेक्षा तो की ही जा सकती है कि वो आयोजनधर्मिता पर ठोस काम को तरजीह देने की दिशा दिखाएं। केंद्र सरकार को भी राज्य सरकारों के साथ मिलकर इस दिशा में ठोस कदम उठाने की जरूरत है। अबतक भाषा और संस्कृति सरकारों की प्राथमिकता में नहीं रही है, इसका भी बहुत नुकसान हुआ है। अब वक्त आ गया है कि अगर हमको अपने देश को मजबूत करना है तो शिक्षा, संस्कृति, भाषा को मजबूत करने पर जोर देना होगा। क्योंकि ये तीन विषय राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने में अपनी अहम भूमिका निभा सकते हैं।  इसके अलावा हिंदी समाज को भी जाग्रत होकर सरकार पर दबाव बनाना होगा कि वो इन विषयों को अपनी प्राथमिकता में शामिल करें। विश्व हिंदी सम्मेलन जैसे आयोजनों और विश्व हिंदी सचिवालय जैसी संस्थाओं की सार्थकता तभी होगी जब कि कुछ ठोस हो सकेगा वर्ना ये सिर्फ घूमने फिरने का उपक्रम भर बनकर रह जाएगा। 

Saturday, April 7, 2018

फिल्मों के सामाजिक सरोकार


जॉर्ज बर्नाड शॉ ने 1930 में सिनेमा को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण बात कही थी। उनके मुताबिक ‘सिनेमा लोगों के दिलोदिमाग को गढ़ेगा और उनके आचरण को प्रभावित करेगा।‘ युवा वर्ग पर उसके दुष्प्रभाव की अवधारणा का उन्होंने निषेध किया था। वो मानते थे कि ‘यह फिल्म पर भी निर्भर करता और युवा मस्तिष्क पर भी। हर कला में अच्छी और बुरी दोनों तरह की शक्ति होती है, जब आप किसी को लिखना सिखाते हैं तो आप उसे फर्जी चेक बनाना भी सिखाते हैं और अच्छी कविता लिखना भी।‘जॉर्ज बर्नाड शॉ के इस कथन का अचानक स्मरण तब हो उठा था जब पिछले दिनों किसी फिल्म देखने के पहले रानी मुखर्जी अभिनीत फिल्म ‘हिचकी’ का ट्रेलर आया था। उस ट्रेलर को देखकर साथ बैठे एक दंपति की बातचीत बेहद दिलचस्प थी। ट्रेलर के बाद पत्नी ने सहज भाव से पति से पूछा कि ये हिचकी कैसी है जो इतने जोरों से आती है। पति ने भी उसी सहजता से उत्तर दिया कि अरे यार फिल्म है कुछ भी हो सकता है। बातचीत बेहद सामान्य थी लेकिन जब ‘हिचकी’ फिल्म देखी तो लगा कि ये एक ऐसी बीमारी पर केंद्रित फिल्म है जिसके बारे में आमजन को ज्यादा पता नहीं है। ये बीमारी है ‘टूरेट सिंड्रोम’ जिसके बारे में हमारे देश में बहुत ही कम लोगों को पता है । ये एक न्यूरोसाइकेट्रिक समस्या है जो किसी को भी बचपन से ही हो सकती है। कोई भी बच्चा इस न्यूरोसाइकेट्रिक समस्या की चपेट में क्यों आता है इसकी सही वजह का पता नहीं चल पाया है। दरअसल इससे ग्रस्त बच्चों में कंधे के उपर के हिस्से में अचानक मूवमेंट होती है, कोई आंख मिचकाता है, कोई कंधों को हिलाता है और कोई बार-बार नाक सिकोंड़ता है आदि आदि। चूंकि इसके बार मे ज्यादा लोगों को पता नहीं है लिहाजा बच्चों में इस तरह के व्यवहार को लेकर माता-पिता असवाधानी कर जाते हैं। उनको लगता है कि उनके बच्चे बदमाशी में ऐसा कर रहे होते हैं। फिल्म ‘हिचकी’ के माध्यम से इस समस्या के बारे में समाज को बताया गया है। यह फिल्म ब्राड कोहेन की आत्मकथा ‘फ्रंट ऑफ द क्लास, हाउ टूरेट सिड्रोम मेड मी द टीचर आई नेवर हैड’ पर आधारित है। विशेषज्ञों के मुताबिक ‘टिक’ या ‘टूरेट सिंड्रोम’ के शिकार बहुत कम बच्चे होते हैं। एक अनुमान के मुताबिक पंद्रह सत्रह हजार बच्चों में से एक बच्चे इसके शिकार होते हैं। इस पूरी बात को बताने का मकसद ना तो इस समस्या के बारे में बात करना है और ना ही इस सिड्रोम से ग्रस्त बच्चों का लक्ष्ण बताना उद्देश्य है। उद्देश्य है सिर्फ फिल्म की उस भूमिका को रेखांकित करना जिसमें वो समाज को शिक्षित भी करता है और किसी खास विषय को लेकर जनता को जागरूक भी करता है। ‘हिचकी’ फिल्म के माध्यम से इसके निर्माताओं ने अपनी उस भूमिका का निर्वाह भी किया है।
इसी तरह से अगर हम देखें तो 2007 में आमिर खान अभिनीत फिल्म आई थी ‘तारे जमीं पर’। ये पूरी फिल्म आठ साल के बच्चे ईशान के इर्द गिर्द घूमती है। ईशान ‘डिस्लेक्सिया’ का शिकार है। इस फिल्म में ईशान पढाई में जब अच्छा नहीं कर पाता है तो उसको उसके माता पिता बोर्डिंग स्कूल में भेज देते हैं जहां वो परेशान होकर खुदकुशी तक करने की सोचता है क्योंकि उसके आसपास का परिवेश बच्चे की समस्या को नहीं समझ पाता है। उसको जिस संवेदनशील व्यवहार की जरूरत होती है वो उसको ना तो अपने परिवार से मिलता है ना ही समाज से और ना ही स्कूल के परिवेश से। जानकारी के अभाव में इस तरह के बच्चों के साथ उनके माता पिता मारपीट करते हैं जो उसके लिए घातक होता है। परिवार के लोगों को लगता है कि बच्चा जानबूझकर पढाई नहीं करना चाहता है लिहाजा पिटाई कर उसपर पढ़ने के लिए दबाव बनाया जाता है।
‘डिसलेक्सिया’ के अलावा बहुत सारे बच्चे ‘ऑटिज्म’ के भी शिकार होते हैं जिन्हें हमारा समाज जागरूकता के अभाव में पागल तक समझने लगता है। जबकि ऐसा होता नहीं है। इस तरह के बच्चों को संवेदना की दरकार होती है और उनके व्यवहार को नियंत्रित कर और उनकी समस्या को समझकर अगर उनके साथ उचित व्यवहार किया जाए तो बहुत हद तक वो ठीक होने लगते हैं। पूरी दुनिया में ऐसे कई उदाहरण है जब डिसलेक्सिया या ऑटिज्म के शिकार बच्चे अपनी जिंदगी में बहुत अच्छा करते हैं। अलबर्ट आइंस्टीन, बिल गेट्स, स्टीव जॉब्स से लेकर मोजार्ट तक इसके उदाहरण हैं। आमिर खान की इस फिल्म ‘तारे जमीं पर’ के रिलीज होने के बाद हमारे देश में जनता के बीच एक खास तरह की जागरूकता देखने को मिली। डिसलेक्सिया से लेकर ऑटिज्म तक पर बात होने लगी। ऑटिज्म के अलग अलग स्पेक्ट्रम को लेकर लोगों में जागरूकता फैली। बहुत सारे लोगों का, अभिभावकों का, स्कूलों का इस तरह के बच्चों के साथ व्यवहार बदल गया। हमारा समाज ‘अटेंशन डिफसिट हाइपर एक्टिविटी डिसऑर्डर’ की समस्या से जूझ रहे बच्चों के प्रति संवेदनशील होने लगा। उसके पहले से भी इसको लेकर कुछ लोगों में जागृति थी लेकिन इस फिल्म के बाद इसकी व्याप्ति कई गुणा बढ़ गई।
2010 में शाहरुख खान की फिल्म आई ‘माई नेम इज खान’। इसमें शाहरुख खान ऑटिज्म के स्पेक्ट्रम पर आनेवाले ‘एस्पर्जर सिड्रोंम’ का शिकार होते हैं। इस फिल्म में परोक्ष रूप से ये संदेश दिया गया था कि ‘एस्पर्जर सिड्रोंम’ का शिकार व्यक्ति किसी खास काम में बेहद निपुण हो सकता है। इस फिल्म में शाहरुख खान ने रिजवान खान का चरित्र निभाया है जो किसी भी चीज की मरम्मत कर देने की कला में निपुण होता है। बाद में ये फिल्म अमेरिका चली जाती है और वहां की समस्याओं पर फोकस करती है लेकिन कथानक में उन सारी समस्याओं के साथ साथ ‘एस्पर्जर सिंड्रोम’ भी साथ चलता रहता है। इस फिल्म ने भी इस समस्या के बारे में जनता को बताया। जागरूकता बढ़ाई। फिल्म एक बेहद सशक्त माध्यम है और मनोरंजन के अलावा समाज के प्रति उसका एक उत्तरदायित्व लोगों के बीच किसी समस्या और उसके समाधान के बारे में जागरूकता फैलाना भी है। ‘तारे जमीं पर’ के रिलीज के दो साल बाद 2009 में आर बाल्कि ने अमिताभ बच्चन के साथ ‘पा’ फिल्म बनाई। इस फिल्म में नायक प्रोजोरिया जैसी दुर्लभ बीमारी से ग्रस्त है। प्रोजोरिया एक ऐसा जेनेटिक डिसऑर्डर है जिसमें उससे ग्रस्त बच्चा बहुत कम उम्र में बुजुर्ग दिखने लगता है। इसी तरह से ‘ब्लैक’ फिल्म में अल्जाइमर को केंद्र में रखा गया है। इस तरह की फिल्में जनता को पसंद भी आती हैं। इस तरह की दुर्लभ बीमारियों को केंद्र में रखकर जितनी भी फिल्में बनी लगभग सभी व्यावसायिक दृष्टि से सफल भी रहीं क्योंकि ये लोगों के दिलों को छूती हैं। इन फिल्मों की माउथ पब्लिसिटी इतनी जबरदस्त होती है कि वो दर्शकों को सिनेमा हॉल तक खींच लाती है।
सत्तर के पहले बनने वाली फिल्मों में बीमारियों का चित्रण लोगों की भवनाओं को ध्यान में रखकर किया जाता था। पहले तो हीरो या फिर उसकी मां या परिवार का कोई अहम सदस्य टीबी का शिकार होता था और बाद में उसको कैंसर जैसी घातक बीमारी होने लगी थी। हिंदी फिल्मों के फिल्मकारों ने टी वी जैसी बीमारी का इस्तेमाल ज्यादातर किसी परिवार के गरीबी के चित्रण के तौर पर किया। इसी तरह से कैंसर जैसी असाध्य बीमारी को भी फिल्मकारों ने इस्तेमाल किया । जैसे हर्षिकेश मुखर्जी ने आनंद या मिली में इस बीमारी को अपनी कहानी में इस तरह से पिरोया कि सिनेमा हॉल में दर्शक सुबकते नजर आए थे। दर्द का रिश्ता में कैंसर की बीमारी से उपजी संवेदना को केंद्र में रखा गया लेकिन उसके बाद के फिल्मकार संवेदना से आगे जाकर समस्याओं को केंद्र में रखकर जनता को संदेश देने लगे।
मूक फिल्मों से शुरू होकर आज तक की हिंदी फिल्मों के बिंब लगातार बदल रहे हैं। रंग और ध्वनि के बदलते प्रयोगों के बीच फिल्मों के विषयों को लेकर भी लगातार नए प्रयोग हो रहे हैं। अब वो दौर खत्म हो गया कि फिल्मों को व्यावसायिक और अव्यावसायिक की श्रेणी में बांटकर विचार किया जाए। हिंदी फिल्मों कला और व्यावसायिक फिल्मों में बंटवारे का दौर भी देखा। उस दौर में कुछ बेहद अच्छी फिल्में बनीं लेकिन वो कारोबार की दृष्टि से अच्छा नहीं कर पाईं। उसका नतीजा यह हुआ कि अच्छी फिल्म बनानेवालों के पास संसाधनों की कमी रही और वो धारा सूख गई। अब जबकि यथार्थपरक फिल्मों के नाम पर कोई अलग खांचा नहीं बचा तो हिंचकी, तारे जमीं पर, माई नेम इज खान, ब्लैक जैसी फिल्में उस कमी को भी पूरा कर रही हैं और अच्छी कमाई कर इस तरह की फिल्में बनाने वालों के हाथ भी मजबूत कर रही हैं।