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Saturday, November 26, 2022

प्रगतिशीलता के झंडाबरदार खामोश


हाल में तीन घटनाएं लगभग एक साथ घटी। दिल्ली के जामा मस्जिद में एक नोटिस लगा जिसपर लिखा था कि मस्जिद में लड़की या लड़कियों का अकेले दाखिला मना है। दूसरी घटना में अभिनेत्री ऋचा चड्ढा ने भारतीय सेना का मजाक उड़ाते हुए एक ट्वीट किया। हुआ ये कि लेफ्टिनेंट जनरल उपेन्द्र द्विवेदी ने एक बयान दिया कि भारतीय सेना गुलाम कश्मीर को वापस भारत में मिलाने के आदेश को पूरा करने के लिए तैयार है। इसपर ऋचा चड्ढा ने मजाक उड़ाते हुए टिप्पणी की थी। जामा मस्जिद वाली घटना में दिल्ली के उपराज्यपाल के हस्तक्षेप के बाद मस्जिद प्रबंधन ने अपना निर्णय वापस ले लिया। ट्विटर पर जब चौतरफा हमला होने लगा तो अभिनेत्री ऋचा चड्ढा को भी बात समझ में आई होगी। उसने भी अपनी टिप्पणी पर खेद प्रकट कर दिया। अपने नाना के सेना में होने की बात कहने लगी। तीसरी खबर दारुल उलूम देवबंद से आई। एक ताजा फतवे में कहा गया कि इस्लाम में जन्मदिन मनाना गुनाह है। फतवे में कहा गया कि जन्मदिन मनाना एक खुराफात है क्योंकि इस्लाम और शरीयत में इसका कोई जिक्र नहीं है। जन्मदिन मनाने की परंपरा ईसाइयों की है और मुसलमान उसकी नकल करते हैं। मुसलमानों को इससे बचना चाहिए और शरीयत के बताए रास्ते पर चलना चाहिए।  

जामा मस्जिद में नोटिस वापसी और ऋचा के खेद प्रकट करने के बाद मामले का पटाक्षेप हो गया प्रतीत होता है। लेकिन इन दो घटनाओं के बाद कई प्रश्न उत्पन्न हो गए हैं। जिसपर भारतीय समाज को गंभीरता से विचार करना चाहिए। जामा मस्जिद में अकेली लड़कियों के प्रवेश पर प्रतिबंध का जब इंटरनेट मीडिया पर विरोध आरंभ हुआ तो मस्जिद की ओर से सफाई आई। उस सफाई में मस्जिद के प्रवक्ता ने कहा कि लड़कियां अपने पुरुष मित्रों से मिलने के लिए मस्जिद में आती हैं, डांस करती हैं, वीडियो बनाती हैं, इस वजह से उनके प्रवेश पर प्रतिबंध लगाया गया। यहां यह याद दिलाना आवश्यक है कि एक वेबसीरीज में जब एक मंदिर के अंदर नायक-नायिका का चुंबन दृष्य फिल्माया गया था तो उसका विरोध हुआ था। केस मुकदमे भी गुए थे। तब कथुत उदारवादियों की तरफ से ये तर्क दिया गया था कि प्रेम तो पवित्र होता है और वो कहीं भी किया जा सकता है। उसको अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से भी जोड़ा गया था। तब इस तरह के तर्क देने वाले जामा मस्जिद वाले मसले पर कन्नी काट गए हैं। जबति यहां न तो कोई चुंबन दृश्य था और न ही रोमांटिक नृत्य का वीडियो बना था। 

हिंदुओं और मुसलमानों के बारे में दो अलग अलग मानदंडों पर विचार किया जाना चाहिए। नारी स्वतंत्रता की बात करनेवाली और खुद को उदारवादी प्रचारित करनेवाली क्रांतिकारी महिलाएं भी इन मसलों पर खामोश रहीं। कुछ वर्ष पहले महाराष्ट्र के शनि शिंगणापुर में महिलाओं के प्रवेश पर कितना हंगामा मचा था, ये अब भी पाठकों के स्मरण में होगा। उस वक्त जितनी महिलाएं पक्ष में खड़ी हुई थीं, इंटरनेट मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्म्स पर जिस तरह का गुस्सा या विरोध देखने को मिला था वो जामा मस्जिद के फैसले के समय कहीं भी नहीं दिखा। वो फिल्मी अभिनेत्रियां भी नहीं दिखाई दीं जो महिला अधिकारों के लिए हाथ में तख्तियां लेकर ट्विटर पर खड़ी हो जाया करती हैं। उनके पास जामा मस्जिद में लड़कियों के प्रवेश पर पाबंदी की खबरें नहीं पहुंच पाती हैं लेकिन शणि शिंगणापुर की आहट से भी परेशानी हो जाती है। इन तथाकथित उदारवादी, प्रगतिशील या महिला अधिकारों की झंडा-डंडा लेकर चलनेवाली महिलाओं की इस तरह की चुनी हुई चुप्पियां उनके सार्वजनिक स्टैंड को सवालों के घेरे में खड़ा कर देती है। इनके इस तरह के स्टैंड से समाज में एक अलग ही किस्म की सांप्रदायिक स्थितियां बनती हैं जिसका असर काफी लंबे समय के बाद देखने को मिलता है। यह स्थिति समाज के लिए घातक है। 

पिछले दिनों जब फिल्मों का बहिष्कार होने लगा था तो इसके विरोध में देशभर में एक चर्चा का वातावरण बनाने की कोशिश की गई थी। उसमें इस तरह की बातें भी की गई थीं कि बहिष्कार की अपील के कारण हमारा समाज हिंदू और मुसलमान के आधार पर बंट रहा है। ऐसा तब नहीं कहा गया था जब आमिर खान ने नरेन्द्र मोदी के विरोध में चलते फिरते इंटरव्यू दिया था। तब आमिर खान को साहसी अभिनेता के तौर पर रेखांकित किया गया था। जब आमिर की फिल्म के बहिष्कार की बात आई तो उसको हिंदू मुसलमान का रंग देकर भारतीय समाज को अपमानित करने की कोशिश की गई। ऋचा चड्ढा ने भारतीय सेना का अपमान किया है, उसका मजाक उड़ाया है। सवाल यही उठता है कि कोई अपने देश की सेना का मजाक कैसे उड़ा सकता है। कहां से दिमाग में इस तरह की सोच आती है। क्यों ये लोग बात-बात में सेना को अपनी क्षुद्र राजनीति का शिकार बना लेते हैं। कल को अगर ऋचा को कोई फिल्म मिलती है या वो किसी वेबसीरीज में नजर आती है और दर्शकों की ओर से उसके बहिष्कार की अपील की जाती है तो उसकी आलोचना का अधिकार किसी को नहीं होगा। बहिष्कार तो विरोध जताने का एक शांतिपूर्ण तरीका भी है। इंटरनेट मीडिया पर ऋचा चड्ढा की टिप्पणियां पढ़कर लगता है कि वो खुद को उदारवादी मानती हैं, सेक्यूलर भी। इंटरनेट मीडिया पर खूब सक्रिय भी हैं लेकिन जामा मस्जिद में लड़कियों के प्रवेश पर पाबंदी के मामले में वो भी चुप्पी को ही चुन लेती हैं। इस तरह का छद्म उदारवाद ज्यादा दिनों तक चल नहीं सकता। 

अब बात कर लेते हैं उस फतवे की जिसमें जन्मदिन के उत्सव को इस्लाम में गुनाह माना गया है। इसपर आगे बढ़ने के पहले फतवे के बारे में कुछ जानकारी। समय समय पर जारी होनेवाला फतवा संकलित होता रहा है। इसके बाद उसको संकलित कर प्रकाशित करवा दिया जाता है। जब किसी आम मुसलमान के मन में अपनी जिंदगी, शरीयत या स्वभाव के बारे में कोई शंका पैदा होती है या उसका किसी मसले पर विवाद हो जाता है तो वो मौलवी के पास जाता है। उनसे अपने शंका का समाधान चाहता है। मौलवी पूर्व में जारी किए गए फतवों के संकलन को देखकर शंका समाधान की कोशिश करते हैं। दारुल उलूम देवबंद के जारी फतवों के कई खंड अबतक प्रकाशित हो चुके हैं। इस तरह के देखा जाए तो फतवे कानून बन जाते हैं। जन्मदिन तो लेकर जो फतवा जारी किया गया है उसका भी दूरगामी असर होगा। इस फतवे पर भी किसी भी प्रगतिशील कामरेड ने मुंह नहीं खोला और चुपचाप इसको गुजर जाने दिया गया। 

साहित्य जगत में भी कई लेखक और लेखिकाएं महिला अधिकारों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को लेकर चीखती रहती हैं लेकिन उनमें से भी ज्यादातर लेखिकाएं चुप रहीं। कहीं कुछ नहीं लिखा। हिंदी साहित्य में भी खुद को प्रगतिशील कहनेवाले लेखक भी इन मसलों पर खामोश हैं। प्रगतिशील लेखक जितना मुखर हिंदू धर्म से जुड़ी घटनाओ पर होते हैं उतनी ही गहरी चुप्पी इस्लाम के मसले पर साध लेते हैं। अपने लेखन में भी और अपने बयानों और भाषणों में भी। ये कैसी प्रगतिशीलता है जो धर्म के आधार पर अपना रास्ता तय करती है। ये कैसी प्रगतिशीलता है जो देश के सैनिकों को अपमानित करनेवालों का विरोध करने की हिम्मत नहीं कर पाता है। दरअसल ये छद्म प्रगतिशीलता है जो अपने राजनीतिक आकाओं के कहने पर अपना स्टैंड लेती है। राजनीति करनेवाले अपने वोटबैंक की चिंता करते हैं, करनी भी चाहिए लेकिन जब लेखक या बुद्धिजीवी खुद को राजनीतिक औजार के तौर पर इस्तेमाल करने की छूट देते नजर आते हैं तो समाज में उनकी प्रतिष्ठा कम होती है। 


Saturday, November 19, 2022

हिंदू शासकों के पराक्रम की अनदेखी


भुवनेश्वर में आयोजित ओडिशा लिटरेरी फेस्टिवल के एक सत्र में इतिहास पर चर्चा थी। उसमें भाग ले रही इतिहासकार नंदिता कृष्णा ने इतिहास लेखन में असंतुलन का प्रश्न उठाया। इस प्रश्न पर कम या नहीं के बराबर चर्चा हुई है। नंदिथा के अनुसार भारत के इतिहासकारों ने दक्षिण भारत के हिंदू राजाओं के शौर्य, पराक्रम और सनातन संस्कृति से प्रेम के बारे में अपेक्षाकृत कम लिखा। इतिहास की पाठ्य पुस्तकों में मुगलों के शासन काल, ब्रिटिश औपनिवेशिकता और स्वाधीनता आंदोलन के बारे में विस्तार से लिखा गया लेकिन महान भारतीय राजाओं या सम्राटों के बारे में संक्षेप में। 1206 से लेकर 1526 तक चला सल्तनत काल सिर्फ दिल्ली, पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश तक सीमित था लेकिन उनको या फिर 1526 से लेकर 1739 तक के मुगल काल को इतिहास की पुस्तकों में प्रमुखता से स्थान दिया गया। उन्होंने इतिहासकार ईश्वरी प्रसाद से लेकर आर सी मजुमदार तक की पुस्तकों का उदाहरण दिया। उनका दावा था कि ईश्वरी प्रसाद की पुस्तक में वैदिक काल, उत्तर वैदिक काल, जैन, बुद्ध, मौर्य सम्राज्य, शक, हूण, कुषाण, गुप्त काल और राजपूत राजाओं के बारे में 115 पृष्ठों में विवरण है लेकिन दक्षिण भारत के राजाओं और शासकों के बारे में सिर्फ सात पृष्ठों में। इसी तरह से मध्यकालीन इस्लामिक काल, जिसमें गजनी, गोरी के भारत पर आक्रमण गुलाम राजवंश, खिलजी, तुगलक, सैयद, लोदी और मुगलों के बारे में विवरण है, को 190 पृष्ठ दिए गए हैं। जबकि उसी काल में दक्षिण भारत के बारे में कोई विवरण इस पुस्तक में नहीं है। 

सिर्फ ईश्वरी प्रसाद की पुस्तक ही नहीं बल्कि उन्होंने आर सी मजुमदार और रोमिला थापर की पुस्तकों का उदाहरण भी दिया। आर सी मजुमदार की पुस्तक में भी उत्तर भारत के इतिहास के बारे में 171 पृष्ठ हैं जबकि सातवाहन, राष्ट्रकूट, पल्लव और चालुक्यों के बारे में सिर्फ नौ पृष्ठ। मध्यकाल में मुस्लिम आक्रांताओं के भारत आक्रमण पर 146 पेज, मुगल अफगान आक्रमणकारियों पर 192 पेज और विजयनगर के बारे में 77 पेज और ओडिशा में उस काल में घट रही घटनाओं पर सिर्फ 3 पेज। इसी तरह से रोमिला थापर की पुस्तक में उत्तर भारत के इतिहास पर 195 पृष्ठ और दक्षिण भारत के इतिहास पर सिर्फ 17 पेज।  

नंदिता कृष्णा ने इतिहास की पुस्तकों के इस असंतुलन को रेखांकित किया था। प्रश्न ये उठता है कि इतिहास की पुस्तकों के लेखकों ने ऐसा क्यों किया। जितनी जगह बादशाहों या मुस्लिम आक्रांताओं को दी गई उतना वर्णन दक्षिण भारत के हिंदू राजाओं के शासनकाल का क्यों नहीं किया गया। इस संदर्भ में दक्षिण भारत के चोल साम्राज्य का जिक्र आवश्यक प्रतीत होता है। चोल साम्राज्य के शासक भारतवर्ष के पहले शासक थे जिन्होंने नौसेना का उपयोग करके अपने साम्राज्य को विस्तार दिया था। आज के श्रीलंका, मालदीव और इंडोनेशिया तक अपनी सत्ता कायम की थी। चोल सम्राट राजेन्द्र चोल प्रथम के पास कुशल नौसैनिकों और जहाजों का बहुत ही मजबूत बेड़ा था। उनके नौसैनिकों इतने कुशल थे कि वो हवा के रुख का भी अनुमान लगा लेते थे। इसी अनुमान पर आक्रमण की रणनीति बनती थी। इसी शक्ति के बल पर राजेन्द्र चोल प्रथम ने आज के सुमात्रा तक अपनी विजय पताका फहराई थी। राजेन्द्र चोल प्रथम के पिता राजराजा ने श्रीलंका पर आक्रमण करके उसको जीत कर अपने साम्राज्य में मिला लिया था। इतना ही नहीं उन्होंने आज के मालदीव को भी अपने साम्राज्य का हिस्सा बना लिया था। आज के इंडोनेशिया और उस समय के श्रीविजय के राजा का 14 बंदरगाहों पर आधिपत्य था। वो समुद्री रास्ते से होनेवाले कारोबार पर न केवल अपनी शर्तें थोपते थे बल्कि कारोबार को नियंत्रित भी करते थे। राजेन्द्र चोल को श्रीविजय के राजा संग्राम विजयतुंगबर्मन की ये नीतियां रास नहीं आ रही थी। लिहाजा उन्होंने एक साथ उनके चौदह बंदरगाहों पर हमला कर उनपर अपना आधिपत्य कायम कर लिया। उन्होंने राजा संग्राम को बंदी बना लिया था। कुछ इतिहास पुस्तकों में इस बात का उल्लेख मिलता है कि राजेन्द्र चोल प्रथम ने राजा संग्राम विजयतुंगबर्मन की पुत्री से विवाह भी किया था। संभव है कि राजेन्द्र चोल ने अपने साम्राज्य से होनेवाले व्यावसायिक हितों की रक्षा के लिए सुमात्रा पर हमला किया हो लेकिन इससे उनके शौर्य और पराक्रम को कम नहीं किया जा सकता है। नंदिथा कृष्णा ने भी इस बात को रेखांकित किया था कि चोल साम्राज्य के राजा भारत के पहले हिंदू शासक थे जिन्होंने समुद्री रास्ते से जाकर अपने साम्राज्य का विस्तार किया था और उसको श्रीलंका से लेकर सुमात्रा तक फैलाया था। 

तंजावुर के शिलालेख में भी राजेन्द्र चोल प्रथम के इस नौसैनिक अभियान का उल्लेख मिलता है। राजेन्द्र ने इस आक्रमण के लिए अपने जहाज के माध्यम से हाथियों को भी रणभूमि में भेजा था। हाथियों पर सवार सैनिक श्रीविजय के बंदरगाहों पर धावा बोला था और विजय में निर्णाय़क भूमिका निभाई थी।  इतिहास में उपलब्ध तथ्यों के आधार पर ये कहा जा सकता है कि चोल राजवंश ने बहुत लंबे समय तक शासन किया। पूरी दुनिया में इतने लंबे समय तक एक भूभाग पर एक ही राजवंश के शासन का उदाहरण कम मिलता है। कहा जाता है कि चोल राजवंश सबसे लंबे कालवधि तक राज करनेवाला वंश था। चोल राजवंश के बारे में अशोक के शिलालेखों में भी उल्लेख मिलता है और उनको मौर्य शासकों का मित्र बताया गया है। चोल राजवंश के हिंदू राजाओं के शौर्य और पराक्रम की चर्चा इतिहास की पुस्तकों में कम है। इतना ही नहीं उनके कला और संस्कृति प्रेम और इस क्षेत्र में उनके योगदान को भी रेखांकित करने का उपक्रम नहीं किया बल्कि वामपंथी इतिहासकारों ने तो इसको प्रयासपूर्वक ओझल किया। 

इस बात पर विचार किया जाना चाहिए कि इतने बड़े तथ्य या इतनी बड़ी ऐतिहासिक घटना को इतिहासकारों ने अपने लेखन के केंद्र में क्यों नहीं रखा। दरअसल इसके पीछे अपने विचारधारा को पुष्ट करने की मंशा दिखाई देती है। वामपंथी और नेहरूवादी इतिहासकारों ने स्वाधीनता के बाद इतिहास लेखन की जो पद्धति अपनाई वो इतिहास लेखन कम वैचारिक प्रोपगैंडा अधिक था। चाहे वो प्राचीन भारत का इतिहास लिख रहे थे या मध्यकालीन भारत का या फिर आधुनिक भारत का उन्होंने एजेंडा और प्रोपगैंडा को महत्व दिया। स्कूली पाठ्यक्रम लिखने का जिम्मा इन्हीं वामपंथी इतिहासकारों को मिला। वामपंथी इतिहासकारों ने जनता की दृष्टि से इतिहास को देखने का प्रचार तो किया लेकिन जन इतिहास लेखन की पद्धति के पीछे पार्टी की विचारधारा थी। वामपंथी इतिहासकारों ने लेखन के समय एक और छल किया कि उन्होंने हिंदू धर्म सिद्धांतों की अनदेखी की। उसकी मौलिकता को रेखांकित करने की बजाए वो आक्रांताओं की संस्कृति और कला को महत्व देने लगे। यहां भी चोल राजवंश का उदाहरण देना उपयुक्त रहेगा। चोल राजवंश के समय कला और संस्कृति को खूब बढ़ावा मिला। स्थापत्य कला की दृष्टि से भी अनेक उत्कृष्ट मंदिरों का निर्माण हुआ। मंदिरों पर जिस तरह की कलाकारी की गई वो अप्रतिम है। कहा जाता है कि नटराज की जो मूर्ति प्रचलन में है उसको चोल राजवंश के ही किसी राजा ने बनवाया था। उसके पहले शिव की उस मुद्रा की मूर्ति के साक्ष्य नहीं मिलते हैं। वामपंथी इतिहासकारों ने जिस तरह से इतिहास लिखा उससे समाज के विभाजित होने का खतरा है। आर्य-अनार्य की अवधारणा ,जाति और वर्ग के आधार पर किसी कालखंड का मूल्यांकन करके वामपंथी इतिहासकारों ने विभाजन के बीज डाले। इतिहास लेखन में जो असंतुलन दिखाई देता है उसे दूर करने के लिए भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद को पहल करनी चाहिए। इस समय राष्ट्रीय शिक्षा नीति के क्रियान्वयन का कार्य चल रहा है। पाठ्य पुस्तक तैयार करते समय भी इस असंतुलन को दूर किया जाना चाहिए। 

Monday, November 14, 2022

राष्ट्र सर्वप्रथम पर अडिग फिल्मकार


आज हिंदी फिल्म के विषयों को लेकर निरंतर विवाद होते हैं। कई बार फिल्मों में राजनीति और राजनीतिक दलों के एजेंडा भी दिखाई पड़ते हैं। आज बहुत ही कम फिल्मकार राष्ट्र सर्वप्रथम के सोच के साथ फिल्म बनाते नजर आते हैं। बीसवीं शताब्दी के अंतिम वर्षों और इक्कीसवीं शताब्दी के आरंभिक वर्षों में कई ऐसी फिल्में आईं जिसने आतंकवाद और सांप्रदायिकता का विषय तो फिल्म के लिए चुना लेकिन मंशा विचारधारा विशेष का पोषण था। कई बार राजनीति भी। लेकिन हमारे देश में ऐसे कई फिल्मकार हुए जिन्होंने राष्ट्र की एकता और अखंडता को शक्ति देनेवाली फिल्में बनाईं। ऐसे ही एक फिल्मकार थे व्ही शांताराम। देश की स्वाधीनता के बाद वो दहेज पर फिल्म बनाने की तैयारी कर रहे थे। फिल्म की स्क्रिप्ट पर काम चल रहा था। उसी वक्त दक्षिण भारत में भाषा के आधार पर अलग आंध्र प्रदेश की मांग को लेकर आंदोलन चलने लगा। स्वाधीनता सेनानी श्रीरामलु आमरण अनशन पर थे। उनकी मौत हो गई। आंदोलन भड़क गया। इस आंदोलन ने शांताराम को व्यथित कर दिया। उन्होंने दहेज पर फिल्म बनाने की योजना रोक दी। तय किया कि वो अपना देश के नाम से एक फिल्म बनाएंगे। फिल्म हिंदी और तमिल दोनों भाषा में बनाई जाएगी। उनके मित्रों ने बहुत समझाया कि फिल्म दहेज की योजना को रोककर ‘अपना देश’ बनाने की योजना में लाभ नहीं होगा। उस समय शांताराम धनाभाव से गुजर रहे थे। पैसे के आगे उन्होंने देश को रखा। 

फिल्म अपना देश का पहला दृश्य स्वाधीनता के उत्सव का रखा गया। शांताराम ने इसमें एक डांस सीक्वेंस रखा। जिसमें भारत माता को बेड़ियों में जकड़ा दिखाया गया। भारत माता के आसपास नृत्यांगनाएं और उनके साथी परफार्म कर रहे थे। वो विभिन्न प्रदेशों की पोशाक पहने थे। नृत्य करते करते सबने मिलकर भारत माता को बेड़ियों से मुक्त कर दिया। अचानक एक व्यक्ति भारत के नक्शे से एक टुकड़ा उठा लेता है। सभी के बीच उसको लेकर झगड़ा शुरु हो जाता है। विभिन्न प्रदेशों के पोशाक पहने लोगों के बीच हो रहे इस झगड़े के दृश्यांकन से शांताराम ये संदेश दे रहे थे कि किस तरह भूमि के टुकड़े को लेकर भारत के लोग आपस में लड़ रहे हैं। झगड़े के बीच उन्होंने भारत माता को दुखी दिखाया था। भारत माता को दुखी देखकर सब फिर से एक होने लगते हैं। जमीन के जिस टुकड़े को लेकर विवाद हो रहा था उसको नक्शे पर सही जगह लगा दिया जाचा है। सब प्रसन्नतापूर्व डांस करने लगते हैं। सब एक हो जाते हैं। शांताराम इस नृत्य के माध्यम से ये संदेश देना चाहते थे कि जमीन के टुकड़े को लेकर आपस में लड़ाई झगड़ा अच्छी बात नहीं है। इससे न केवल भारत माता को दुख पहुंचता है बल्कि देश की एकता कमजोर होती है। शांताराम ने इस नृत्य सीक्वेंस में भारत के नक्शे को लेकर जिस तरह का दृश्यांकन किया गया था, उनके मन में ये आशंका पैदा हो गई थी कि फिल्म पर पाबंदी लग सकती है। मोरार जी देसाई की मदद से फिल्म सेंसर से पास हो गई। 

शांताराम की मुश्किल खत्म नहीं हुई थी। उस समय की प्रमुख पत्रिका फिल्मइंडिया के सपादक बाबूराव पटेल शांताराम की फिल्म के विरोध में थे। उन्होंने सभी राज्य सरकारों को पत्र लिखकर फिल्म पर पाबंदी लगाने की मांग की। उनके पत्र के बाद कई राज्य सरकारों ने रिलीज के पहले शांताराम से फिल्म की एक कापी मांगी। शांताराम थोड़े विचलित हुए। लेकिन उनको अपनी कला पर भरोसा था। दिल्ली में इस फिल्म के प्रदर्शन के पहले बाबूराव पटेल के दोस्तों ने इसके विरोध में पोस्टर लगाए थे। लेकिन तत्कालीन गृहमंत्री सरदार पटेल फिल्म के पक्ष में खड़े हो गए। उन्होंने इसके निर्बाध प्रदर्शन की व्यवस्था कर दी। इन सारे विवाद का फायदा हुआ और फिल्म ने कई जगहों पर सिल्वर जुबली मनाई। 1949 में हिंदी और तमिल में प्रदर्शित इस फिल्म ने देश की एकता और अखंडता को लेकर पूरे देश में एक संदेश दिया था लेकिन अफसोस कि इस देश में भाषा के नाम पर राज्यों का बंटवारा रोका न जा सका। 

Saturday, November 12, 2022

सांप्रदायिकता की शिकार अकादमियां


महारानी वेबसीरीज में एक संवाद है, जैसे ही मुझे लगता है कि मैंने बिहार को समझ लिया है, वैसे ही बिहार एक और झटका देता है। हो सकता है शब्दों में कुछ बदलाव हो लेकिन भाव यही है। इस संवाद में बिहार की जगह अगर वहां के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का नाम लिख दिया जाए तब भी इस संवाद के अर्थ में कोई बदलाव नहीं होता दिखेगा। कुछ दिनों पहले की बात है बिहार में उर्दू अनुवादकों को समारोहपूर्वक नियुक्ति पत्र बांटा जा रहा था। मुख्य सचिव ने अपने उद्बोधन में विभाग को कई सुझाव दिए। बारी आई मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बोलने की। उन्होंने मुख्य सचिव पर तंज कसते हुए कहा कि प्रवचन तो आपने बहुत अच्छा दिया। आप तो 2007 से मेरे साथ थे। 2008 से ही हम उर्दू अनुवादकों की बहाली (नियुक्ति) के लिए कह रहे हैं लेकिन अबतक नहीं हो पाया है। अभी भी पूरा बहाली नहीं हुआ है। जल्दी से सब पता करके काम पूरा करवाइए। पूरा सभागार पहले ठहाकों से और फिर तालियों से गूंज उठा। वेबसीरीज महारानी के पात्र मिश्रा जी की तर्ज पर बिहार के मुख्य सचिव अमीर सुब्हानी भी सोच रहे होंगे कि जैसे ही उनको लगता है कि वो नीतीश कुमार को समझने लगे हैं तो वो एक झटका देते हैं। प्यार से ही सही लेकिन नीतीश कुमार ने बिहार के मुख्य सचिव को सार्वजनिक तौर पर झटका तो दे ही दिया।

ठहाकों और तालियों के बीच एक महत्वपूर्ण बात दब सी गई वो ये कि ये समारोह उर्दू के अनुवादकों को नियुक्ति पत्र देने का था। जिसमें नीतीश कुमार ने कहा कि वो 2008 में जिसकी घोषणा की गई थी उसको चौदह साल बाद भी पूरी तरह से संपन्न नहीं किया जा सका। उर्दू को लेकर नीतीश कुमार की चिंता की प्रशंसा की जानी चाहिए। यह अपेक्षा की जाती है कि किसी प्रदेश का मुख्यमंत्री या उनके अधीन कार्य करनेवाले मंत्रालय या विभाग किसी भी भाषा के साथ भेदभाव नहीं करेंगे। संविधान भी यही कहता है। लेकिन क्या बिहार सरकार इस अपेक्षा को पूरा कर रही है। नीतीश कुमार ने जब तेजस्वी यादव के साथ मिलकर सरकार बनाई तो महागठबंधन की सरकार ने  बिहार की दो और स्थानीय भाषाओं के लिए अकादमियां खोलने की घोषणा की। मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में हुई बैठक में निर्णय लिया गया कि वैशाली के आसपास के जिले में बोली जानेवाली बज्जिका और सीमांचल में बोली जानेवाली सुरजापुरी को संरक्षित और समृद्ध करने के लिए दो नई अकादमियों का गठन किया जाएगा। ये घोषणा स्वागतयोग्य है। उर्दू अनुवादकों की नियुक्ति पत्र वितरण समारोह में मुख्यमंत्री स्वयं कह चुके हैं कि उर्दू को लेकर 2008 में जो घोषणाएं की गई थीं वो अबतक धरातल पर नहीं उतर पाई हैं। तो क्या माना जाए कि इन अकादमियों की घोषणाओं को भी पूरा होने में काफी समय लगेगा। ये कब तक हो पाएगा ये तो भविष्य के गर्भ में है।

नीतीश सरकार ने दो नई भाषा अकादमियों की घोषणा की लेकिन जो भाषा और सांस्कृतिक अकादमियां बिहार में पहले से चल रही हैं वो लगभग मृतप्राय हैं। बिहार में पहले से भोजपुरी अकादमी, मगही अकादमी, मैथिली अकादमी और संस्कृत अकादमी अस्तित्व में हैं। पटना के शास्त्री नगर इलाके के सरकारी कर्माचरियों के आवासीय फ्लैट्स में इन सभी अकादमियों का कार्यालय है। इन अकादमियों की हालत इतनी खराब है जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती है। इनकी आधारभूत जरूरतें पूरी हो सकें, इतनी व्यवस्था भी बिहार सरकार का शिक्षा विभाग नहीं कर पा रहा है। अकादमियों में इतने कम नियमित कर्मचारी हैं कि किसी नए काम के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता है। कुछ दिनों पूर्व मगही अकादमी के पूर्व अध्यक्ष और हिंदी के महत्वपूर्ण कवि रामगोपाल रुद्र से संबंधित सामग्री की तलाश में एक मित्र मगही अकादमी पहुंचे थे। कार्यालय में एक कर्मचारी अकेले बैठा था। कुछ सामग्री मिली लेकिन अकादमी कार्यालय बुरी  हालत में थी। इनकी हालत देखकर ही किसी के मन में ये प्रश्न भी नहीं उठेगा कि इनकी स्थापना किन उद्देश्यों के लिए की गई थी। ये अकादमियां स्थापना के समय निश्चित किए गए उद्देश्यों की पूर्ति में कितनी सफल रहीं। आंकलन तो उन संस्थानों का हो सकता है जो सक्रिय हों और साधन संपन्न हों। संसाधन की कमी वाले संस्थानों के कार्यों का आकलन लगभग असंभव है। अन्य भाषा अकादमियों की बदहाली के बीच दो नई भाषा अकादमियों की घोषणा का कोई अर्थ नहीं है। दूसरी तरफ उर्दू को लेकर पूरी बिहार सरकार सक्रिय नजर आ रही है। मुख्यमंत्री स्वयं प्रदेश के मुख्य सचिव को सार्वजनिक रूप से सभी बहालियां जल्द करने के लिए कह रहे हैं। क्या अन्य अकादमियां भाषाई सांप्रदायिकता का शिकार हो रही हैं।    

समग्रता में बिहार के कला और संस्कृति के परिदृश्य को देखा जाए तो उसको लेकर शासन के स्तर पर एक उदासीनता नजर आती है। भाषा अकादमियों के अलावा शिक्षा विभाग के अंतर्गत बिहार हिंदी ग्रंथ अकादमी और बिहार राष्ट्रभाषा परिषद का संचालन भी होता है। इन दोनों संस्थाओं का बेहद समृद्ध इतिहास रहा है। यहां से अनेक महत्वपूर्ण पुस्तकों का प्रकाशन हुआ था लेकिन अब उन पुस्तकों का पुनर्प्रकाशन नहीं हो पा रहा है। इन दोनों संस्थाओं का कार्यालय ऐसी जगह पर है जहां से शिक्षा विभाग के उच्चाधिकारी हर दिन गुजरते हैं लेकिन इनकी बदहाली पर किसी की नजर नहीं जाती है या देखकर अनदेखा किया जाता है। अगर ये दोनों संस्थाएं सिर्फ पूर्व प्रकाशित पुस्तकों का प्रकाशन कर दें तो उनकी बिक्री से ही आगे की योजनाओँ पर काम करने लायक धन मिलने की संभावना बन सकती है। संस्कृति विभाग के अंतर्गत बिहार संगीत नाटक अकादमी और बिहार ललित कला अकादमी का संचालन होता है। ये दोनों संस्थाओं में लंबे समय से न तो अध्यक्ष हैं और न ही उपाध्यक्ष। प्रविधान है कि दोनों संस्थाओं में एक अध्यक्ष और दो उपाध्यक्ष को बिहार सरकार नामित करेगी। सचिव का अतिरिक्त प्रभार भी विभाग के अधिकारियों के पास है। ऐसी स्थिति में इन संस्थाओं के क्रियाकलाप लगभग ठप हैं। बिहार में एक और अनूठी घटना हुई। पटना में एक हिंदी भवन बना, लोगों की उम्मीदें जगीं कि वहां हिंदी के प्रोन्नयन को लेकर कार्य हुआ करेंगे। लेकिन पहले वहां एक मैनेजमेंट संस्थान और अब जिलाधिकारी का कार्यालय चल रहा है।    

बिहार रचनात्मक रूप से बेहद उर्वर प्रदेश है। पहले भी और अब भी प्रदेश के कई लेखकों की राष्ट्रीय ख्याति रही है। रेणु से लेकर दिनकर तक, रामवृक्ष बेनीपुरी, शिवपूजन सहाय से लेकर उषाकिरण खान तक। वर्तमान में भी कई लेखक रचनात्मक रूप से खूब सक्रिय हैं। इन रचनाकारों और कलाकारों के साथ मिल कर ये भाषा संस्थान प्रदेश के गौरव को और विस्तार दे सकते थे लेकिन अफसोस कि शासन के स्तर पर इनपर ध्यान देनेवाला कोई नहीं है। जिस तरह से उर्दू को लेकर नीतीश सरकार उत्साहित दिखाई देती है और उसके विस्तार के लिए योजनाएं बन रही है, नियुक्तियां हो रही हैं उस अनुपात में सरकार का ध्यान न तो मैथिली, न मगही और न ही भोजपुरी अकादमियों की ओर जा रहा है। अगर इन चार भाषा अकादमियों को कुछ स्थायी कर्मचारी भी मिल जाते तो इनका दैनंदिन कार्य सुचारू रूप से चल पाता। 2015 में पुरस्कार वापसी का जो प्रपंच रचा गया था, उसके कर्ताधर्ता बिहार की ओर आशा भरी नजरों से देख रहे हैं। इस बात पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि फिर से विश्व कविता समारोह जैसे किसी आयोजन की रचना हो जाए और कोई अशोक वाजपेयी उसके आयोजन के लिए आगे न आ जाएं। करोड़ों का बजट आवंटन हो और कला संस्कृति के नाम पर मेला लगे।   

Saturday, November 5, 2022

हिंदी पर अदालत का महत्वपूर्ण निर्णय


कुछ दिनों पहले दिल्ली के पटियाला हाउस स्थित जिला एवं सत्र न्यायालय के प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश धर्मेश शर्मा ने हिंदी को लेकर एक महत्वपूर्ण निर्णय दिया। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि अगर किसी भी पक्ष से अदालत के सामने अनुरोध आता है कि साक्ष्य या किसी अन्य कार्यवाही को हिंदी में दर्ज किया जाए तो राष्ट्रीय राजधानी की अदालतें ऐसा करने के लिए कानूनी तौर पर बाध्य हैं। प्रधान जिला न्यायाधीश ने अपने में यह भी कहा कि, यह समझ में नहीं आता कि विद्वान मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट को किस लाजिस्टिक समस्या से परेशानी है। गवाहों के बयान कंप्यूटर पर दर्ज किए जा सकते हैं। जिसके लिए स्टेनोग्राफर के पास हिंदी फांट होता है। अगर स्टेनोग्राफर हिंदी टाइपिंग नहीं जानता है तो हिंदी टाइप करनेवाले स्टेनोग्राफर के लिए अनुरोध किया जा सकता है। उनकी व्यवस्था की जा सकती है। उन्होंने इससे भी एक कदम आगे जाकर अपने आदेश में कहा कि अगर हिंदी में टाइप करनेवाला स्टेनोग्राफर उपलब्ध नहीं हो सकता है तो मजिस्ट्रेट खुद या अदालत के कर्मचारियों की मदद से गवाहों के बयान हिंदी में दर्ज कर सकते हैं। उन्होंने अपने निर्णय में कानूनी प्रविधानों का उल्लेख भी किया। हिंदी में साक्ष्य दर्ज करने के लिए पक्षकार के अनुरोध को अस्वीकार करना आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 272 और दिल्ली उच्च न्यायालय के नियमों का उल्लंघन होगा। दिल्ली उच्च न्यायालय का नियम है कि देवनागरी लिपि में हिंदी दिल्ली उच्च न्यायालय के अधीनस्थ न्यायालयों की भाषा होगी। 

इस निर्णय की पृष्ठभूमि ये है कि दिल्ली के मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट की अदालत में एक केस में चल रहा था। जिसमें एक पक्ष ने मजिस्ट्रेट से अनुरोध किया था कि गवाहों से बहस के दौरान सवाल हिंदी में पूछे जाएं और उनके उत्तर भी हिंदी में ही दर्ज किए जाएं। मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट ने हिंदी में प्रश्न उत्तर और उसको हिंदी में ही दर्ज करने की याचिका को खारिज कर दिया था। खारिज करते हुए मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट ने कहा था कि अदालत में इससे संबंधित सुविधा नहीं है। इस कारण उनके अनुरोध को स्वीकार नहीं किया जा सकता है। अपनी याचिका के खारिज होने के बाद गुलशन पाहूजा नाम के व्यक्ति ने इस फैसले के विरुद्ध जिला और सत्र न्यायाधीश की अदालत में अपील की थी। जहां जिला और सत्र न्यायाधीश ने मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट के निर्णय को निरस्त कर दिया। इस निर्णय की जितनी चर्चा होनी चाहिए थी उतनी नहीं हो पाई। इसमें जिस तरह से कहा गया कि संसाधन की कमी या अनुपलब्धता की स्थिति में मजिस्ट्रेट को ये प्रयास करना होगा कि गवाहों के बयान या साक्ष्य हिंदी में दर्ज किए जा सकें। यह निर्णय मजिस्ट्रेट और जज की जिम्मेदारी को भी स्पष्ट रूप से व्याख्यित करने वाला है । आज जब हिंदी को लेकर अकारण राजनीति की जा रही है वैसे में इस तरह के अदालती निर्णय भारतीय भाषाओं में न्याय की दिशा में बढ़नेवाले कदम को शक्ति देनावाला है। दिल्ली उच्च न्यायालय की अधीनस्थ अदालतों में समय समय पर हिंदी के प्रयोग को लेकर विभिन्न प्रकार की पहल की जाती रही है। कुछ वर्षों पूर्व दिल्ली की तीस हजारी अदालत ने भी हिंदी को लेकर एक पहल की थी और इस तरह का प्रविधान किया गया था कि अदालत के विभिन्न विभागों के बीच लिखित संवाद हिंदी में हो। 

निचली अदालतों में अंग्रेजी के प्रयोग को देखकर कुछ वर्षों पूर्व की एक घटना याद आती है। गाजियाबाद की एक हाउसिंग सोसाइटी में नया-नया रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन बना था। वहां के नोटिस बोर्ड की पर बाहर से सोसाइटी के फ्लैट्स में काम करने आनेवाली घरेलू सहायिकाओं के लिए हर दिन अंग्रेजी में कोई न कोई सूचना लगी होती थी। उसकी पहली पंक्ति होती थी, आल मेड्स आर रिक्वेस्टेड टू...(सभी सहायिकाओं से अनुरोध है कि...)। उसके बाद जो भी दिशा निर्देश होते थे वो अंग्रेजी में लिखकर नोटिस बोर्ड पर चिपका दिए जाते थे। कोई भी सहायिका उसका पालन नहीं करती थी। रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन के पदाधिकारियों के पास शिकायत आती थी। वो घरेलू सहायिकाओं से बात करते थे तो फिर नियमों का पालन आरंभ हो जाता था। फिर कोई नया निर्देश और फिर अंग्रेजी में नोटिस और फिर उसका अनुपालन नहीं होता था। रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष बहुत परेशान थे कि इस समस्या का हल कैसे निकले। अचानक एक दिन एक बुजुर्ग महिला ने अध्यक्ष महोदय को परेशान देखकर उनकी परेशानी का कारण जानना चाहा। उन्होंने जब कारण बताया तो बुजुर्ग महिला ने उनसे पूछा कि जिनके लिए नोटिस लगाए जाते हैं क्या वो अंग्रेजी जानती हैं? अध्यक्ष को इस प्रश्न से ही अपनी समस्या का हल मिल गया। उसके बाद सभी नोटिस हिंदी में लगने लगीं। उन नोटिसों को सुरक्षा गार्ड भी पढ़ लेते थे। कुछ घरेलू सहायिकाएं भी पढ़ लेती थीं। आपस में उनकी चर्चा हो जाती थी और अनुपालन भी हो जाता था। हमारे देश की न्यायिक व्यवस्था के साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा है। जिनको न्याय चाहिए उनको अंग्रेजी नहीं आती और जिनको न्याय देना है वो अंग्रेजी में ही सारी कार्यवाही करते हैं।  

न्याय विभाग की वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार काफी पहले से ही मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान के उच्च न्यायालयों में हिंदी में कार्यवाही और निर्णयों की अनुमति है। जब तमिलनाडू सरकार ने तमिल में, गुजरात सरकार ने गुजराती में, छत्तीसगढ़ सरकार ने हिंदी में, बंगाल सरकार ने बंगाली में और कर्नाटक सरकार ने कन्नड में अपने से संबंधित हाईकोर्ट की कार्यवाही का अनुरोध किया तो उनको केंद्र सरकार की अनुमति नहीं मिल पाई। दरअसल 1965 की कैबिनेट कमेटी का एक निर्णय है कि अगर इस तरह का कोई अनुरोध केंद्र सरकार के पास आता है तो सरकार को उसपर उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायधीश की राय लेनी होगी। केंद्र सरकार ने इन राज्यों के प्रस्ताव के आलोक में, 1965 के कैबिनेट के फैसले के अनुसार, मुख्य न्यायाधीश से उनकी राय मांगी। 2012 में उस समय के मुख्य न्यायाधीश ने केंद्र सरकार को बताया कि पूरी अदालत ने राज्यों के प्रस्ताव पर विचार किया और इसको स्वीकार नहीं करने का निर्णय लिया। उसके बाद कई बार इन राज्यों के प्रतिनिधियों ने संसद में भी इस प्रश्न को उठाया लेकिन अबतक कोई निर्णय नहीं हो पाया और अंग्रेजी में ही कार्यवाही चल रही है। न्याय के आकांक्षी को उसकी भाषा में न्याय नहीं मिल पा रहा है। इसका प्रयास किया जाना चाहिए कि कम से कम देशभर की निचली अदालतों में स्थानीय भारतीय भाषाओं में न्यायिक प्रक्रिया चले। गवाहों के बयान, साक्ष्य आदि स्थानीय भारतीय भाषा में हो सकें। इससे न्यायिक प्रक्रिया सुदृढ़ होगी और इसमें नागरिकों की भागीदारी बढ़ेगी।  

राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भारतीय भाषाओं को प्राथमिकता की बात पर और गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता वाली राजभाषा समिति की राष्ट्रपति को सौंपी गई रिपोर्ट को लेकर देशभर में एक भ्रम का वातावरण बनाया जा रहा है। कहा जा रहा है कि केंद्र सरकार गैर हिंदी भाषी प्रदेशों पर हिंदी थोपना चाहती है। राजभाषा समिति की रिपोर्ट में किस तरह के सुझाव दिए गए हैं वो अभी तक सार्वजनिक नहीं हुए हैं। बावजूद इसके अंग्रेजी के पैराकार छाती कूटने में लगे हैं कि सरकार आईआईटी, आईआईएम और केंद्रीय विश्वविद्यालयों में हिंदी को शिक्षा का माध्यम बनाना चाहती है। अभी हाल ही में  बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन ने भी हिंदी थोपने के विरोध की घोषणा की। यह स्पष्ट नहीं है कि कहां हिंदी थोपी जा रही है। भाषा पर राजनीति करने और अंग्रेजी कायम रखने से बेहतर है कि भारतीय भाषाओं को प्राथमिकता मिले। भारतीय भाषाओं में शिक्षा मिले, भारतीय भाषाओं में न्याय मिले, भारतीय भाषा ही शासन प्रशासन की भाषा हो। 

Saturday, October 29, 2022

फिल्मों को सरदार ने दी थी जीवनी शक्ति


सरदार पटेल और फिल्म। सधारणतया इस ओर किसी का ध्यान नहीं जाता है। ऐसा कहने पर लोग चौंकते भी हैं। सरदार पटेल को स्वाधीनता के लिए संघर्ष करनेवाले अग्रिम पंक्ति के नेता, आधुनिक भारत के निर्माता,सख्त निर्णय लेनेवाले कुशल प्रशासक, राष्ट्रवाद के सजग प्रहरी आदि के तौर पर याद किया जाता है। लेकिन सरदार पटेल और फिल्म का बेहद गहरा नाता रहा है। स्वाधीनता आंदोलन के समय सरदार पटेल ने भारतीय फिल्मों के लिए एक ऐसा कार्य किया जिसने फिल्म जगत को लंबे समय तक प्रभावित ही नहीं किया बल्कि उसके विस्तार की जमीन भी तैयार कर दी। फिल्म को लेकर उनके योगदान की चर्चा करने से पूर्व यह जान लें कि उस समय फिल्मों को लेकर किस तरह का वातावरण था। स्वाधीनता संग्राम के दौरान तिलक भारतीय फिल्मों के प्रबल समर्थक थे। कई पुस्तकों में इस बात का उल्लेख मिलता है कि तिलक ने दादा साहब फाल्के की फिल्म राजा हरिश्चंद्र के समर्थन में लेख लिखा था। बाबू राव पेंटर का उनकी फिल्म ‘सैरंध्री’ के लिए सार्वजनिक अभिनंदन किया था। जवाहरलाल नेहरू भी फिल्मों के शौकीन थे। जब स्वाधीनता संग्राम में गांधी का प्रभाव बढ़ा तो अग्रिम पंक्ति के नेताओं के बीच फिल्मों को लेकर उदासीनता का भाव उत्पन्न हो गया। गांधी जी फिल्मों को पसंद नहीं करते थे। वो फिल्मों को समाज में बुराई फैलाने वाला माध्यम और नैतिकता विरोधी मानते थे। गांधी के इस सोच का असर कांग्रेस पर भी पड़ा था। उस दौर में हिंदी फिल्म जगत अपने पैरों पर खड़ा हो रहा था। कई फिल्मकार अपने पुरुषार्थ के बल पर भारतीय सिनेमा को मजबूती देने में लगे थे। 

स्वाधीनता आंदोलन अपने अंतिम चरण में पहुंच चुका था। इस बीच एक बेहद दिलचस्प घटना घटी। 1945 में फिल्मकार और अभिनेता किशोर साहू ने अपनी फिल्म वीर कुणाल पूरी कर ली थी। किशोर साहू चाहते थे कि इस फिल्म का जब प्रदर्शन हो तो उस अवसर पर कोई बड़ा नेता उपस्थित रहे। मुश्किल ये थी कि कांग्रेस के नेता फिल्मों को लेकर या फिल्मों से जुड़े समारोह को लेकर बिल्कुल उत्साहित नहीं रहा करते थे। उनके अंदर की इस झिझक के बारे में किशोर साहू को पता था, लेकिन उन्होंने ठाना कि कांग्रेस के नेताओं और फिल्मों के बीच जो एक खाई बनती जा रही है उसको रोका जाए। उन्होंने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि ‘मन करने लगा कि कांग्रेस और कला के बीच की खाई को पाटने की कोशिश करूं। फिल्मों के प्रति कांग्रेसी नेताओँ के मन की झिझक को निकाल दूं।यह काम शेर की गुफा में जाकर शेर को नत्थी करने के समान था। पर मैंने कमर कस ली। उन दिनों कांग्रेस में कई शेर थे। मगर बब्बरशेर एक ही था- सरदार वल्लभभाई पटेल। मैंने तवज्जो इन पर दी।‘  फिल्म उद्योग से चंदा आदि जमा करने के सिलसिले में किशोर साहू का परिचय पुरुषोत्तमदास टंडन से था। टंडन जी जब बांबे (अब मुंबई) आते थे तो वो किशोर साहू को मिलने के लिए कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी के आवास पर बुलाया करते थे। इस तरह से किशोर साहू का मुंशी और श्रीमती लीलावती मुंशी से परिचय था। 

किशोर साहू मुंशी जी के घर पहुंचे और लीलावती जी से पटेल से मिलवाने का अनुरोध किया। लीलावती जी ने किशोर साहू की सरदार पटेल से भेंट तय करवा दी। किशोर साहू नियत समय पर पटेल के मुंबई के घर पर पहुंच गए। पटेल की बेटी मणिबेन ने किशोर साहू को हिदायत दी कि पटेल साहब की तबीयत ठीक नहीं है इसलिए पांच मिनट में बात समाप्त कर वो निकल जाएं। जब किशोर साहू पटेल के कमरे में पहुंचे तो वो सोफे पर लेटे हुए थे। बातचीत आरंभ हुई। किशोर साहू ने कांग्रेस पार्टी पर फिल्मवालों की अवहेलना का आरोप जड़ा। साथ ही फिल्म जगत की समस्याएं भी बताईं। इस बीच पांच मिनट खत्म हो गए थे। मणिबेन ने कमरे में घुसकर किशोर साहू को बातचीत समाप्त करने का संकेत दिया। जब दो तीन बार मणिबेन कमरे में आई तो पटेल समझ गए। उन्होंने मणिबेन को कहा कि इस व्यक्ति को बैठने दिया जाए। तब किशोर साहू ने अन्य समस्याओं के साथ पटेल के सामने विदेशी स्टूडियो के भारत में कारोबार आरंभ करने की योजना के बारे में बताया । उनको ये भी बताया कि विदेशी कंपनियों के पास इतनी अधिक पूंजी है कि वो भारतीय फिल्मों की व्यवस्या को खत्म कर सकती है। करीब घंटे भर बाद पटेल ने पूछा कि आप क्या चाहते हैं?  किशोर साहू ने उनसे कहा कि आप 1 दिसंबर (1945) को बांबे के नावेल्टी सिनेमा में मेरी फिल्म वीर कुणाल के प्रीमियर पर आएं और वहां से फिल्म जगत को आश्वासन दें कि कांग्रेस उनके साथ है। सरदार पटेल ने किशोर साहू को वचन दिया कि वो अवश्य आएंगे। जब उन्हें पता चला कि एक दिसंबर को कलकत्ता (अब कोलकाता) में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक है। अब दुविधा में थे लेकिन फिल्म के प्रीमियर में जाने के अपने वादे पर अटल थे। उन्होंने इसका हल निकाला। अपने सहयोगी को चार्टर प्लेन की व्यवस्था करने को कहा। जिससे वो प्रीमियर के बाद कलकत्ता जा सकें। किशोर साहू ने अपनी फिल्म के प्रीमियर को खूब प्रचारित किया। लोगों में आश्चर्य का भाव था कि कांग्रेस के नेता कैसे फिल्म के प्रीमियर पर पहुंच रहे हैं। उत्सकुकता सरदार पटेल के वक्तव्य को लेकर भी थी कि वो क्या बोलेंगे। एक दिसंबर को सिनेमाघर के बाहर हजारों की भीड़ जमा थी। समय पर सरदार सिनेमा हाल पहुंचे। फिल्म आरंभ होने के पहले उनको मंच पर ले जाया गया। किशोर साहू ने फिल्म जगत की समस्या उनके सामने रखी। अब बोलने की बारी सरदार की थी। उन्होंने सबसे पहले फिल्म की सफलता की शुभकामनाएं दीं लेकिन उसके बाद जो कहा उसका दूरगामी असर पड़ा। सरदार ने लंबा भाषण दिया और पहली बार फिल्मों से जुड़े लोगों को आश्वस्त भी किया कि कांग्रेस फिल्म विरोधी नहीं है। अंत में उन्होंने चेतावनी के स्वर में कहा, जिस दिन विदेशी पूंजीपतियों ने हमारे देश आकर स्टूडियो खोलने की कोशिश की, तो याद रखें वो विदेशी, और याद रखे ये बरतानवी सरकार, उस दिन कांग्रेस अपनी पूरी ताकत के साथ इसका विरोध करेगी। जिस तरह नमक सत्याग्रह हुआ था, उसी तरह इन विदेशी पूंजीपतियों के स्टूडियो पर सत्याग्रह होगा और इस सत्याग्रह का नेतृत्व मैं खुद करूंगा।‘  किशोर साहू ने विस्तार से इस पूरे प्रसंग को अपनी आत्मकथा में लिखा है। भाषण के बाद सरदार पटेल ने मध्यांतर तक फिल्म देखी। उसके बाद कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में भाग लेने के लिए कलकत्ता चले गए। सरदार पटेल की इस चेतावनी के बाद विदेशी कंपनियों ने स्टूडियो खोलने की योजना रोक दी थी।

सरदार पटेल का वीर कुणाल के प्रीमियर पर दिया गया वक्तव्य फिल्मी के लिए एक बड़ी राहत लेकर आया था। उस दौर में जब गांधी फिल्मों का विरोध कर रहे थे, सरदार पटेल ने फिल्मों का ना केवल समर्थन किया बल्कि उसको आगे बढ़ाने के लिए हर संभव मदद का भरोसा भी दिया। गांधी के मत के खिलाफ जाकर कदम उठाने का साहस पटेल ने दिखाया था। अगर सरदार पटेल भारतीय फिल्मों के समर्थन में खड़े नहीं होते तो आज भारतीय फिल्म जगत किस स्थिति में होती, कहना कठिन है। स्वाधीनता के पहले ही हमारे देश में विदेशी स्टूडियो खुल गए होते और स्वदेशी फिल्मों पर विदेशी पूंजी का ग्रहण लग चुका होता। स्वाधीनता के सालों बाद जब भारतीय फिल्म उद्गोय परिपक्व हुआ, विश्व सिनेमा की बराबरी पर खड़ा होने लगा, तब जाकर यहां विदेशी स्टूडियो को खोलने की अनुमति दी गई। भारतीय फिल्म जगत की वैश्विक सफलता के पीछे सरदार पटेल का सोच भी था। 

Saturday, October 22, 2022

विकास और विचार से लौटेगा वैभव

 श्रीनगर के डल झील का किनारा, किनारे स्थित शेर-ए-कश्मीर क्नवेंशन सेंटर का विशाल परिसर, परिसर के लान में एक तरफ सजा मंच और सामने बैठे देश के विभिन्न हिस्सों से आए लेखक, साहित्यकार, फिल्मकार और कलाकार। ये सब मिलकर एक ऐसे वातावरण की निर्मिति कर रहे थे जो आज से तीन साल पहले सोचा भी नहीं जा सकता था। कुमांऊ लिटरेचर फेस्टिवल ने दो दिनों तक कश्मीर संस्करण का आयोजन करके एक ऐतिहासिक पहल की है। श्रीनगर में लिटरेचर फेस्टिवल का आयोजन और श्रीनगर और शोपियां में सिनेमा हाल का खुलना कश्मीर के सांस्कृतिक वैभव की पुनर्वापसी की ओर उठाया कदम कहा जा सकता है। पिछले कई दशकों से श्रीनगर में गोली-बारूद की गंध और निर्दोष नागरिकों की हत्या से आतंक का वातावरण बना था। इस वातावरण ने कश्मीर की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को नेपथ्य में धकेल दिया था। कभी इसकी बात नहीं होती थी कि कश्मीर का शारदा पीठ, पूरी दुनिया में ज्ञान का ऐसा केंद्र था जिसके समांतर किसी और केंद्र का इतिहास में उल्लेख नहीं मिलता है।
साहित्योत्सव के दौरान प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष बिबेक देबराय ने शारदा पीठ का न केवल उल्लेख किया बल्कि जोर देकर कहा कि शारदा पीठ दुनिया का पहला विश्वविद्यालय भी था। बिबेक देवराय की इस बात पर चर्चा होनी चाहिए और विद्वानों को इसपर अपना अपना मत रखना चाहिए। कश्मीर के शारदा पीठ की अपने समय में बड़ी प्रतिष्ठा थी। कई पुस्तकों में इस बात का उल्लेख मिलता है कि पूरे देश के विद्वान जब किसी ग्रंथ की रचना करते थे तो वो उसकी स्तरीयता की परख के लिए शारदा पीठ आते थे। वहां के विद्वान उस ग्रंथ पर चर्चा करते थे और अगर उसमें मौलिक स्थापना होती थी तो उसको अपने तरीके से प्रमाणित करते थे। दुर्भाग्य से शारदा पीठ इस वक्त गुलाम कश्मीर का हिस्सा है।  

शारदा पीठ सिर्फ ज्ञान का केंद्र ही नहीं था बल्कि इस पीठ के नाम से एक लिपि भी उस दौर में प्रचलन में थी, जिसको शारदा लिपि के नाम से जानते हैं। ये माना जाता है कि शारदा लिपि का आरंभ दसवीं शताब्दी में हुआ था। कश्मीरी विद्वानों ने शारदा लिपि में विपुल लेखन किया था। शारदा लिपि में बहुत अधिक लिखा गया था और वहां के विद्वान लेखक अपनी रचनाओं को लेकर देश के अलग अलग हिस्सों में विमर्श के लिए गए भी थे। इसके अलावा देशभर के अलग अलग हिस्सों के विद्वान भी शारदा पीठ जाकर शारदा लिपि सीखकर अपने अपने क्षेत्रों में लौटते थे। फिर वो अपनी रचनाएं शारदा लिपि में लिखते थे। देशभर में कई ऐसे विश्वविद्यालय हैं जहां आज भी शारदा लिपि में लिखे गए ग्रंथ सहेजकर रखे हुए हैं। कश्मीर में सिर्फ शारदा लिपि ही नहीं बल्कि संस्कृत भाषा और उसमें रचना करनेवाले विद्वानों की लंबी सूची है। नीलमत पुराण में विस्तार इसकी चर्चा है कि कैसे कश्मीर में वहां की जनता उत्सवों के माध्यम से अपनी पंरपराओं को और अपनी ज्ञान परंपरा को जीवंत बनाए रखती थी। काव्यप्रकाश के रचयिता मम्मट भी कश्मीर की धरती के ही सपूत थे। काव्यप्रकाश एक ऐसा ग्रंथ है जो अब भी साहित्य के अध्येताओं के सामने चुनौती बनकर खड़ा है। अबतक इस पुस्तक की असंख्य टीकाएं लिखी जा चुकी हैं लेकिन अब भी कई विद्वान इसमें वर्णित उल्लास और कारिकाओं की व्याख्या करने में लगे रहते हैं। बिबेक देवराय ने एक ऐसे मुद्दे की ओर ध्यान आकर्षित किया जिसके बारे में लगातार चर्चा होती है। संस्कृत के आलोचकों का कहना है कि इस भाषा में व्यंग्य साहित्य की कमी है। संस्कृत की इस कथित कमी को आलोचक इस भाषा के रचनात्मक लेखन की कमजोरी के तौर पर रेखांकित करते हैं। बिबेक ने इस संबंध में कश्मीर के ही एक लेखक क्षेमेन्द्र का नाम लिया और कहा कि उनकी रचनाओं में पर्याप्त मात्रा में व्यंग्य उपस्थित है। 

कश्मीर के इतिहास और उसकी परंपराओं पर पुस्तक लिखनेवाले निर्मलेंदु कुमार ने लिखा है कि भारत के प्रांतो में एकमात्र कश्मीर ही है जिसका मध्यकाल का पूरा प्रामाणिक इतिहास वहीं के विद्वानों द्वारा लिखा हुआ मिलता है। भारतवर्ष के अन्य प्रदेशवासियों की अपेक्षा कश्मीरियों में विशेष इतिहास-प्रेम रहा, जिससे उन्होंने अपने देश का शृंखलाबद्ध इतिहास लिख रखा है। कल्हण ने राजतरंगिणी की रचना की और उसके बाद जोनराज ने राजतरंगिणी का दूसरा खंड लिखा। आगे भी दो खंड लिखे गए। इस तरह से हम देखते हैं कि कश्मीर का साहित्यिक और सांस्कृतिक वैभव अपने जमाने में शिखर पर था। भारत के स्वतंत्रता के कुछ समय पहले से और उसके कुछ दिनों के बाद से कश्मीर में जिस तरह की राजनीति की गई उसने भी यहां की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत की विकास यात्रा को अवरुद्ध कर दिया। स्वाधीन भारत में कश्मीर एक ऐसा मुद्दा बना रहा जिसपर हमेशा से राजनीति होती रही। राजनीति भी ऐसी जिसको न तो प्रदेश की विकास की फिक्र थी और न ही विचारों के निर्बाध प्रवाह की। विकास और विचार दोनों बाधित हुए। विकास और विचार को बाधित करने के बाद वहां आतंक को केंद्र में लाने का कुत्सित प्रयास हुआ। आतंकवाद ने लंबे कालखंड तक न केवल कश्मीर की जनता को परेशान किया बल्कि उसको देश दुनिया से काटकर रखा। एक समय तो ऐसा भी आ गया था जब लगने लगा था कि कश्मीर हाथ से निकलने वाला है। वहां के हालात बेकाबू थे। कश्मीरी हिंदुओं की हत्या और उनके पलायन ने स्थिति को और बिगाड़ दिया। जो धरती कभी शैव मत के दर्शन को शक्ति प्रदान करनेवाली रही, वो धरती जहां के लोग शिव और विष्णु के उपासक थे उसी धरती से हिंदू धर्म को माननेवालों को या तो मार डाला गया या उनको उस धरती को छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया गया। इस तरह से कश्मीर की जनता को धर्म के आधार पर विभाजित करने का जो खेल स्वाधीनता के बाद से आरंभ हुआ था वो कश्मीरी हिंदुओं के पलायन के साथ अपने चरम पर पहुंचा। 

अनुच्छेद 370 खत्म होने के बाद से कश्मीर में जिस तरह से विकास के साथ साथ विचार का प्रवाह भी आरंभ हुआ है उसने एक उम्मीद जगाई है। कश्मीर में आयोजित कुमांऊ लिटरेचर फेस्टिवल के दौरान स्थानीय कश्मीरी छात्रों की भागीदारी या स्थानीय लेखकों की उपस्थिति और सत्रों में हिस्सेदारी संतोषजनक रही। छात्रों में इस बात को जानने की उत्सुकता थी कि अन्य भाषाओं में क्या लिखा जा रहा है। अन्य प्रदेशों में किन बिंदुओं पर विमर्श होते हैं और उन विमर्शों से क्या निकलकर आता है। उनके अंदर सिनेमा की बारीकियों और उनसे जुड़े किस्सों को सुनने की भी ललक दिखाई पड़ रही थी। जब राज कपूर के सहायक निर्देशक रहे और बाद में ‘बेताब’ और ‘लव स्टोरी’ जैसी फिल्में बनाने वाले राहुल रवैल के सत्र में कश्मीरी युवकों की प्रश्नाकुलता देखते ही बनती थी। वो ये जानना चाहते थे कि जिस फिल्म के नाम पर कश्मीर में बेताब वैली है उसके निर्माता के उस वक्त के अनुभव क्या थे। जब राहुल रवैल ने बताया कि ‘बाबी’ फिल्म का कुछ हिस्सा डल झील के किनारे शूट हुआ था तो युवकों की जिज्ञासा और बढ़ गई। राहुल रवैल साहब ने भी विस्तार से अपनी बात रखकर उपस्थित श्रोताओं की जिज्ञासा शांत करने की कोशिश की। कश्मीर में इस तरह के आयोजनों से न केवल वहां के युवाओं के मन में उठ रहे प्रश्नों का शमन होगा बल्कि उनकी रचनात्मकता को विस्तार मिलेगा। भारत सरकार और कश्मीर प्रशासन दोनों को ये सोचना चाहिए कि विकास के साथ विचार का भी अगर प्रवाह होगा तो वो लोगों के मन मस्तिष्क को खोलेगा जो किसी समस्या के हल के लिए आवश्यक अवयव है। 

Saturday, October 15, 2022

कला को सांप्रदायिक बनाने की कोशिश


महाराष्ट्र के एक नेता हैं, नाम है शरद पवार। पहले कांग्रेस में थे। कांग्रेस के अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ा था। पराजित हुए थे। सोनिया गांधी के विदेशी मूल का मुद्दा उठाकर कांग्रेस से अलग हो गए थे। अपनी पार्टी बनाई। फिर कांग्रेस के साथ हो लिए। महाराष्ट्र में दोनों पार्टियों ने मिलकर शासन किया। शिवसेना का विरोध करते रहे लेकिन शिवसेना के साथ भी सत्ता में साझेदारी की। शरद पवार की चर्चा का कारण है उनका हाल में दिया गया एक बयान। अपने इस बयान में शरद पवार ने कहा कि अगर हम कला, कविता और लेखन के बारे में बात करें तो अल्पसंख्यकों में इन क्षेत्रों में योगदान देने की अपार क्षमता है। उन्होंने ये कहने के बाद प्रश्न उठाया कि बालीवुड में सबसे अधिक योगदान किसका है। फिर उसका उत्तर दिया कि मुस्लिम अल्पसंख्यकों ने सबसे अधिक योगदान किया, हम इसकी अनदेखी नहीं कर सकते। शरद पवार का ये बयान बेहद गंभीर और समाज को बांटनेवाला है। अबतक इस देश में कला और साहित्य को धर्म के आधार पर बांटने का प्रयास नहीं हुआ है लेकिन शरद पवार के इस बयान में ये दिखता है। 

शरद पवार दावा कर रहे हैं कि बालीवुड मे सबसे अधिक योगदान मुस्लिम अल्पसंख्यकों का है। देश का इतना बड़ा नेता जब इस तरह का बयान देते हैं तो उसके परिणाम की कल्पना की जा सकती है। इसलिए शरद पवार को ये बताना आवश्यक है कि बालीवुड में मुस्लिमों के सबसे अधिक योगदान का उनका जो दावा है वो न केवल प्रतिभा बल्कि आंकड़ों के हिसाब से भी हवाई है। ऐसा कहकर वो महाराष्ट्र के उन फिल्मकारों का भी अपमान कर रहे हैं जिन्होंने अपना जीवन होम करके फिल्म विधा को भारत में स्थापित और समृद्ध किया। शरद पवार शायद ये भूल गए कि दादा साहब फाल्के भी महाराष्ट्र के ही थे। उन्होंने जब फिल्म बनाया तो अपनी पत्नी के गहने गिरवी रखे और फिल्म बनाने के दौरान उनकी आंखों पर बहुत बुरा असर पड़ा था। दादा साहेब फाल्के के बाद महाराष्ट्र के ही बाबूराव पेंटर ने सैरंध्री नामक फिल्म बनाई जिसको उस समय खूब सराहना मिली थी। भीम और कीचक की भूमिका में बाबूराव ने दो पेशेवर पहलवान, सरदार बाला साहब यादव और झुंझार राव पवार को लिया था। बाबू राव पेंटर को भारतीय फिल्मों की पहली मौलिक प्रतिभा के तौर पर फिल्म इतिहासकार देखते हैं। इस तथ्य को भी रेखांकित किया जाता रहा है कि बाबूराव पेंटर के साथ रहकर ही शांताराम, विनायक राव, भालजी पेंढरकर और विष्णुपंत गोविंद दामले ने फिल्म कला की बारीकियां सीखी थीं। शरद पवार की टिप्पणी कि बालीवुड में मुस्लिमों का सबसे अधिक योगदान है को अगर इन महानुभावों के योगदान के सामने रखकर देखेंगे तो शरद पवार की अज्ञानता साफ तौर पर नजर आती है। भारतीय फिल्मों के परिदृष्य पर नजर डालते हैं को वहां भी देवकी बोस, नितिन बोस प्रथमेश बरुआ, फणी मजूमदार, रायचंद्र बोराल, दुर्गा खोटे, देविका रानी, हिमांशु राय जैसे अनगिनत नाम हमारी स्मृतियों में आते हैं। हिमांशु राय ने भारतीय फिल्मों को वैश्विक स्वरूप प्रदान किया। अब अगर उस दौर से आगे बढ़ते हैं और स्वाधीनता के बाद के दौर के हिंदी फिल्मों को देखते हैं तो भी मुस्लिमों का सबसे अधिक योगदान नजर नहीं आता है। हिमांशु राय की फिल्म कर्मा लंदन और बर्मिंघम के सिनेमाघरों में 1933 में प्रदर्शित की गई थी। इस फिल्म का निर्माण भारत, ब्रिटेन और जर्मनी के निर्माताओं ने संयुक्त रूप से किया था। इसमें हिमांशु राय और देविका रानी थी। इस फिल्म के बारे में लंदन के समाचारपत्रों में कई प्रशंसात्मक लेख छपे थे। लेकिन शरद पवार अपनी टिप्पणी करते समय इन सबके योगदान को क्यों नहीं देख पाते हैं।

स्वाधीनता के बाद के दौर को भी देखें तो फिल्मों में मुसलमानों का योदगान सबसे अधिक नहीं दिखाई देता है। अशोक कुमार, राज कपूर, देवानंद, गुरु दत्त जैसे लोगों को शरद पवार बहुत आसानी से भूल जाते हैं। गुरु दत्त ने भारतीय सिनेमा को जो ऊंचाई प्रदान की उसको फिल्म के बारे में जानने वाला कोई भी व्यक्ति नहीं भुला सकता है। प्यासा, कागज के फूल, साहब बीबी और गुलाम जैसी फिल्में बनानेवाले गुरु दत्त के बारे में कहा जाता है कि वो रूपहले पर्द पर पात्रों के माध्यम से कविता करते थे। बालीवुड में योगदान कि जब बात आती है तो क्या लता मंगेशकर को भुलाया जा सकता है या उनके किसी भी गायक की तुलना की जा सकती है। मराठा शरद पवार को लता मंगेशकर भी याद नहीं आई और उन्होंने एक बचकाना बयान दे दिया। याद तो शरद पवार को अमिताभ बच्चन भी नहीं आए जिनको सदी का महानायक कहा जाता है। जो पिछले पचास से अधिक वर्षों से फिल्मी दुनिया में न केवल सक्रिय हैं बल्कि फिल्म. टीवी और ओटीटी(ओवर द टाप) पर भी उनकी लोकप्रियता बरकरार है। जितेन्द्र से लेकर धर्मेन्द्र तक और अनिल कपूर से लेकर कार्तिक आर्यन तक की याद भी शरद पवार को नहीं आई। अभिनेत्रियों की भी लंबी सूची है जिसके बारे में बोलने के पहले शरद पवार ने विचार नहीं किया। 

अब जरा आंकड़ों पर गौर कर लेते हैं। 1967 से राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार दिए जाने लगे इसके पहले इसको स्टेट अवार्ड फार फिल्म्स कहते थे। 1969 से भारतीय फिल्मों में विशिष्ट योगदान के लिए दादा साहब फाल्के सम्मान का आरंभ हुआ। 1969 में पहला दादा साहब फाल्के अवार्ड अभिनेत्री देविका रानी को दिया गया। तब से लेकर अबतक 52 कलाकारों को दादा साहब फाल्के अवार्ड दिया जा चुका है इनमें से तीन, संगीतकार नौशाद, अभिनेता दिलीप कुमार और गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी ही मुस्लिम समुदाय से आते हैं। कला का यह बंटवारा उचित नहीं है लेकिन चूंकि शरद पवार ने यह बात उठाई है तो उनको यह बताना आवश्यक है कि सबसे अधिक योगदान का अर्थ क्या होता है। कम से 52 में से तीन तो नहीं ही होता है। कुछ लोग ये कह सकते हैं कि मदर इंडिया और मुगल ए आजम बनाकर महबूब खान और के आसिफ ने भारतीय सिनेमा का समृद्ध किया। यहां भी एक दिलचस्प तथ्य है। 1957 में मदर इंडिया सिनेमाघरों में प्रदर्शित हुई थी। उस वर्ष के स्टेट अवार्ड फार फिल्म्स की सूची पर नजर डालते हैं तो उस वर्ष के सर्वश्रेष्ठ फिल्म का अवार्ड फिल्म दो आंखें बारह हाथ के लिए व्ही शांताराम को मिला था जबकि महबूब खान की मदर इंडिया को सिर्फ प्रशंसा पत्र प्रदान किया गया था। अब जरा राष्ट्रीय फिल्म अवार्ड की सूची पर भी नजर डाल लेते हैं। अबतक राष्ट्रीय फिल्म में 54 बार सर्वश्रेष्ठ फिल्म अभिनेता को पुरस्कृत किया गया है। कई बार संयुक्त रूप से भी दिया गया है। इन 54 में से सिर्फ तीन मुस्लिम अभिनेताओं नसीरुद्दीन शाह, सैफ अली खान और इरफान खान को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार मिला है। बाकी 51 अभिनेता किस समुदाय से आते हैं  कहने की आवश्यकता नहीं है। इसी तरह से अबतक सिर्फ चार मुस्लिम अभिनेत्रियों नर्गिस, रेहाना, वहीदा रहमान और शबाना आजमी को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार दिया गया है। 

शरद पवार तीन बार महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री रहे और उनके मुख्यमंत्रित्व काल में सिर्फ एक मुस्लिम कलाकार दिलीप कुमार को दादा साहब फाल्के पुरस्कार दिया गया। तब शरद पवार ने तो कोई प्रश्न नहीं खड़ा किया। वो 2004 से 2014 तक केंद्र में मंत्री रहे। इस दौरान किसी भी मुस्लिम का दादा साहब फाल्के अवार्ड नहीं मिला। तब भी उन्होंने इस बात पर सार्वजनिक चिंता नहीं की। शरद पवार जैसे नेता जब कला और कलाकार के बारे में बोलते हैं तो उनको बहुत सोचविचार कर बोलना चाहिए। कला को हिंदू मुसलमान में बांटने का प्रयास नहीं करना चाहिए। 


Saturday, October 8, 2022

आदिपुरुष में कलात्मक अराजकता


पिछले दिनों रामनगरी अयोध्या में निर्देशक ओम राउत की फिल्म आदिपुरुष का एक उत्सुकता जगानेवाला अंश सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित किया गया। इस अंश में फिल्म के प्रमुख पात्रों को दिखाया गया है।ये फिल्म रामायण महाकाव्य पर आधारित होने का दावा किया जा रहा है। इसमें राम, सीता, रावण, हनुमान आदि के किरदार और उनकी वेशभूषा की झलक मिलती है। संवाद और दृष्यों की भी। इस फिल्म में प्रभु श्रीराम, हनुमान और रावण की वेशभूषा को लेकर विवाद हो गया है। जिस तरह से प्रभु श्रीराम का गेटअप तैयार किया गया है उससे ये स्पष्ट है कि फिल्मकार ने लोक में व्याप्त उनकी छवि से अलग जाकर उनको चित्रित किया है। भारतीय जनमानस पर श्रीराम की जो छवि अंकित है वो बेहद सौम्य, स्नेहिल और उदार है। तुलसीदास जी ने विनय पत्रिका में उनकी इस छवि पर पद लिखे। ‘‘नवकंज-लोचन कंज-मुख, कर-कंज, पद कंजारुणं/ कंदर्प अगणित अमित छवि, नवनिल नीरद सुंदरं, पटपीत मानहु तड़ित रुचि शुचि नौमि जनक सुतावरं।‘ अर्थात उनके नयन खिले कमल की तरह हैं। मुख, हाथ और पैर भी लाल रंग के कमल की तरह हैं। उनकी सुंदरता की अद्भुत छटा अनेकों कामदेवों से अधिक है। उनके तन का रंग नए नीले जलपूर्ण बादल की तरह सुंदर है। पीतांबर से आवृत्त मेघ के समान तन, विद्युत के समान प्रकाशमान है। सिर्फ विनय पत्रिका में ही नहीं तुलसीदास जी ने श्रीरामचरितमानस से लेकर अपनी अन्य रचनाओं में भी श्रीराम को इसी रूप में प्रस्तुत किया है। वाल्मीकि ने भी।  इन्हीं के आधार पर राजा रवि वर्मा ने श्रीराम की तस्वीर बनाई जो विश्व में प्रचलित है। इसके अलावा गीता प्रेस, गोरखपुर से प्रकाशित कल्याण पत्रिका में भी श्रीराम और राम दरबार की तस्वीरें प्रकाशित हुआ करती थीं। कवर की दूसरी तरफ प्रकाशित इन चित्रों को बी के मित्रा, जगन्नाथ प्रसाद और भगवान नाम के तीन चित्रकार बनाया करते थे। इन चित्रों को लोग इतना पसंद करते थे कि उस पृष्ठ को काटकर फ्रेम करवा कर सहेज लेते थे। रामानंद सागर ने जब रामायण टीवी धारावाहिक का निर्माण किया था तो पंडित नरेन्द्र शर्मा की सलाह पर उन्होंने अपने पात्रों की वेशभूषा तय करने के पहले इन चित्रों का गहन अध्ययन किया था। इस वजह से रामायण धारावाहिक में टीवी पर ये पात्र आए तो ये लोक में व्याप्त छवि से मेल खाते हुए थे। ऐसा प्रतीत होता है कि फिल्म आदिपुरुष के निर्देशक ने इस बात का ध्यान नहीं रखा। तकनीक के बल पर श्रीराम को सुपरमैन बना दिया। सौम्यता को आक्रामकता से विस्थापित करने का प्रयास हुआ।  

अयोध्या में जो टीजर जारी किया गया है उसमें रामसेतु पर लंका की ओर बढ़ते श्रीराम को दिखाया गया है। नेपथ्य से आवाज आती है, ‘आ रहा हूं मैं, आ रहा हूं मैं, न्याय के दो पैरों से अन्याय के दस सर कुचलने।‘रामकथा में तो इस तरह की आक्रामकता है ही नहीं। श्रीराम तो लंका की धरती पर पहुंचकर अपने सहयोगियों से पूछते हैं कि अब क्या करना चाहिए। इतने लोकतांत्रिक हैं श्रीराम। तुलसीदास लिखते हैं कि जब ये तय हो जाता है कि अंगद को दूत के रूप में रावण के दरबार में जाना है तो श्रीराम कहते हैं कि इस तरह से संवाद करना कि मेरा भी कल्याण हो और रावण का भी। वाल्मीकि ने लिखा है कि जब श्रीराम लंका की धरती पर पड़ाव डालते हैं तो रावण अपने जासूसों को उनके शिविर में भेजता है। श्रीराम के साथी रावण के उन जासूसों को पकड़ कर मारते पीटते हैं। जब श्रीराम को पता चलता है तो वो उनको वापस रावण के पास भेज देते हैं। ये जासूस भी रावण के पास पहुंचकर प्रभु श्रीराम की दयालुता का वर्णन करते हैं। राम के चरित्र के साथ आक्रामकता जोड़कर अकारण उनको सुपरमैन बनाने की कोशिश की गई है जबकि राम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं। वो कोई अफगानिस्तान से आनेवाले आक्रांता नहीं कि चीखते चिल्लाते युद्ध के लिए बढ़े जा रहे हैं। कहानी और संवाद लिखते समय राम के इस उद्दात चरित्र का ध्यान रखा जाना चाहिए। ऐसा प्रतीत होता है कि लेखक और निर्देशक ने दृश्यों को अति नाटकीय बनाने के चक्कर में श्रीराम की चारित्रिक विशेषताओं और गुणों का ध्यान नहीं रखा। ऐसा या तो अज्ञानता के कारण हुआ या विदेशी फिल्मों में तकनीक से पात्रों को आक्रामक और बलशाली दिखाने की नकल के कारण। 

दूसरा पात्र है रावण। जिसकी भूमिका में हैं अभिनेता सैफ अली खान। फिल्म आदिपुरुष के अंश में रावण को देखकर कुछ लोग ये कह रहे हैं कि ये रावण कम खिलजी ज्यादा लग रहा है। खितुलसीदास, वाल्लमीकिजी लगे या कोई और लेकिन रावण की लोक में प्रचलित छवि से बिल्कुल अलग है। रावण के गुणों के बारे में वाल्मीकि और तुलसीदास दोनों ने विस्तार से लिखा है। लंकेश इतना बड़ा और पराक्रमी राजा था कि उसने तीनों लोक को जीता था। वो बहुत बड़ा शिव भक्त था, तपस्वी था लेकिन अहंकारी था। फिल्म आदिपुरुष में जो रावण बनाया गया है वो अहंकारी तो बिल्कुल नहीं दिखता है, हां उसके चेहरे पर, उसकी संवाद अदायगी या हावभाव में कमीनापन अवश्य दिखता है। रावण अहंकारी अवश्य था लेकिन उसके कमीनेपन का चित्रण न तो वाल्मीकि ने किया है और न ही तुलसीदास ने। आदिपुरुष फिल्म के निर्देशक ने किस तरह से रावण के चरित्र को गढ़ा है, उनका सोच क्या था ये तो वही बता सकते हैं। लोक में व्याप्त लंकेश की छवि को इस तरह से भ्रष्ट करना और फिर उसका हास्यास्पद तरीके से बचाव करके फिल्म से जुड़े लोग अपनी अक्षमता को ढंकने का प्रयास कर रहे हैं। प्रभु श्रीराम और रामकथा के पात्रों को लेकर वाल्मीकि का जो सोच था या जो तुलसी की अवधारणा थी उसका शतांश भी इस फिल्म में नहीं दिखाई दे रहा है। फिल्म में हनुमान की वेशभूषा  को भी आधुनिक बनाने के चक्कर में निर्माता- निर्देशक ने क्या गड़बड़ियां की हैं ये फिल्म प्रदर्शित होने के बाद पता चलेगी। फिलहाल तो जो कुछ दृश्य है जिसको लेकर अनुमान लगाया जा सकता है कि वहां भी गड़बड़ी हुई है।     

कलात्मक अभिव्यक्ति के नाम पर पौराणिक आख्यानों के चरित्रों को इस तरह से प्रदर्शित कर अपमानित करने की छूट नहीं दी जा सकती है। लोक में व्याप्त छवि से छेड़छाड़ करके फिल्में सफल नहीं हो सकती हैं। कुछ दिनों पूर्व प्रदर्शित फिल्म सम्राट पृथ्वीराज में भी लोक में प्रचलित छवि से अलग दिखाया गया। परिणाम सबके सामने है। अगर उस फिल्म में चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने लोक में व्याप्त कथाओं के आधार पर पृथ्वीराज का चरित्र गढ़ा होता तो सफल हो सकते थे। चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने तो पृथ्वीराज रासो पर खुद को केंद्रित रखा लेकिन आदिपुरुष के लेखक और निर्देशक न तो वाल्मीकि के करीब जा सके और न ही तुलसी के। संभव है कि उन्होंने अंग्रेजी की कोई फिल्म देखी होगी और उनको लगा होगा कि तकनीक का प्रक्षेपण करके हिंदी में भी इस तरह की फिल्म बनाई जाए। इन दिनों हिंदू पौराणिक आख्यानों पर आधारित फिल्में दर्शकों को पसंद आ रही है। निर्माताओं ने सोचा होगा कि रामकथा को तकनीक के सहारे कहा जाए तो सफलता के सारे कीर्तिमान ध्वस्त किए जा सकते हैं। इस फिल्म से जुड़े लोग ये भूल गए कि राम का जो उद्दात चरित्र भारतीय जनमानस पर अंकित है उसके विपरीत जाने से अपेक्षित परिणाम नहीं मिलेगा। अगर गंभीरता से फिल्मकार काम करना चाहते थे तो उनको गीताप्रेस गोरखपुर स्थित लीला चित्र मंदिर जाकर वहां लगी तस्वीरों को देखना चाहिए था, इससे उनकी फिल्म के पात्रों को प्रामाणिकता मिलती और लोक को संतोष और उनको सफलता।    


Saturday, October 1, 2022

वैश्विक आयोजन की सार्थकता पर सवाल


विश्व हिंदी सम्मेलन को लेकर हिंदी जगत में चर्चा होती रहती है। 2018 में जब मारीशस में विश्व हिंदी सम्मेलन का आयोजन हुआ था तो उस वक्त ही ये तय हो गया था कि अगला यानि 12वां विश्व हिंदी सम्मेलन फिजी में आयोजित होगा। चार वर्ष बीत जाने के बाद भी अबतक तिथि की आधिकारिक घोषणा नहीं हो पाई है। जोहानिसबर्ग, दक्षिण अफ्रीका में आयोजित विश्व हिंदी सम्मेलन में एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित हुआ था कि दो विश्व हिंदी सम्मेलनों के आयोजन के बीच यथासंभव अधिकतम तीन वर्ष का अंतराल हो । इसके पहले ये व्यस्था थी कि विश्व हिंदी सम्मेलनों के आयोजन के बीच कोई भी अंतराल निश्चित नहीं था । सरकारों की इच्छा और अफसरों की मर्जी पर विश्व हिंदी सम्मेलन का आयोजन होता रहा है। आधिकिक घोषणा नहीं होने के कारण इस वर्ष के मध्य में चर्चा ने जोर पकड़ा था कि फिजी में होनेवाला विश्व हिंदी सम्मेलन इस वर्ष हिंदी दिवस यानि 14 सितंबर को आयोजित किया जा रहा है। 14 सितंबर की तिथि आई और निकल गई लेकिन इस आयोजन के बारे में अटकलें ही लगती रहीं। 

विश्व हिंदी सम्मेलन का आयोजन विदेश मंत्रालय करता है। हिंदी दिवस के चार दिनों बाद विदेश मंत्रालय का एक पोस्टर ट्वीट किया गया जिसमें बारहवें विश्व हिंदी सम्मेलन के लोगो डिजाइन प्रतियोगिता के आयोजन की घोषणा की गई थी। इसके बाद फिजी में आयोजित होनेवाली तिथियों को लेकर एक बार फिर से हिंदी समाज में अटकलें लगाई जाने लगीं। अब इस बात की संभावना जताई जा रही है कि फिजी में आयोजित होनेवाला विश्व हिंदी सम्मेलन फरवरी के मध्य में होगा। दरअसल भारत सरकार के विदेश मंत्रालय की तरफ से किसी घोषणा के नहीं होने से इस तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं। फरवरी के पहले एक बार इस बात की भी चर्चा हुई थी कि इस वर्ष दिसंबर में इस सम्मेलन का आयोजन हो सकता है। फिजी में इस वर्ष के अंत तक आम चुनाव होने हैं। फिजी की राजनीति को जाननेवालों का मत है कि अगर इस वर्ष वहां हिंदी सम्मेलन का आयोजन किया जाता है तो इसको आमचुनाव में भारतवंशी राजनेताओं के पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश के तौर पर देखा जा सकता है। संभव है कि इन बातों के मद्देनजर ही भारत सरकार ने हिंदी सम्मेलन को अगले वर्ष फरवरी में करवाने की योजना बनाई हो। 

प्रश्न आयोजन की तिथियों को लेकर नहीं हैं। तिथियां तो सबकुछ देख समझकर तय कर दी जाएंगी। प्रश्न ये है कि फिजी में विश्व हिंदी सम्मेलन क्यों आयोजित हो रहा है। तर्क ये दिया जाता है कि फिजी में हिंदी भाषा भाषियों की संख्या अधिक है। फिजी की आधिकारिक भाषाओं में से एक हिंदी है। इसलिए फिजी में हिंदी सम्मेलन के आयोजन को लेकर उत्साह होगा, स्थानीय लोग भी हमारी भाषा से जुड़ाव महसूस करेंगे। लेकिन अगर गंभीरता से विचार करें तो ये तर्क उचित नहीं प्रतीत होते हैं। विश्व हिंदी सम्मेलन का प्राथमिक उद्देश्य पूरी दुनिया में हिंदी का प्रचार प्रसार और इस भाषा के प्रति अहिंदी भाषियों के मन में आकर्षण पैदा करना है। मारीशस, फिजी, सूरीनाम में विश्व हिंदी सम्मेलन का आयोजन करके हम किस तरह से इस सम्मेलन के उद्देश्यों को पूरा करने का उपक्रम कर रहे हैं, इसपर भारत सरकार विशेषकर विदेश मंत्रालय में इस आयोजन से जुड़े लोगों को विचार करना चाहिए।

अबतक 11 विश्व हिंदी सम्मेलन का आयोजन हो चुका है। पहला विश्व हिंदी सम्मेलन 1975 में नागपुर में आयोजित हुआ था। तब से लेकर अबतक तीन बार मारीशस में, नागपुर के अलावा भोपाल और दिल्ली में, एक सूरीनाम में, एक त्रिनिदाद और टोबैगो में आयोजित हो चुका है। इसके अलावा लंदन , न्यूयार्क और जोहानिसबर्ग में आयोजन हुआ है। ग्यारह में से आठ तो हिंदी से परिचित और हिंदी मूल के लोगों को बीच ही विश्व हिंदी सम्मेलन का आयोजन हुआ। यह विचारणीय है कि क्या विश्व हिंदी सम्मेलन के प्राथमिक उद्देश्य तक पहुंचने के लिए गंभीरता से प्रयास हो रहे हैं। हिंदी को वैश्विक स्तर पर लेकर जाने के लिए क्या ये उचित नहीं होता कि इसका आयोजन चीन, जापान, फ्रांस, जर्मनी आस्ट्रेलिया, इटली जैसे देशों में होता। इसका एक लाभ ये होता कि इन देशों की भाषाओं के साथ हिंदी का संवाद बढता और एक दूसरे की भाषा को जानने का अवसर भी प्राप्त होता। अनुवाद के अवसर भी उपलब्ध हो सकते थे जिससे हिंदी की कृतियों को वैश्विक मंच पर एक पहचान मिलती। विश्व हिंदी सम्मेलन भारतीय सभ्यता और संस्कृति को अन्य देशों को बताने का एक मंच भी बन पाता। अगर समग्रता में इसकी योजना बनाकर कार्य किया जाए तो ये सम्मेलन भाषाई कूटनीति का एक माध्यम बन सकता है। विदेश मंत्रालय में तमाम विद्वान कूटनीतिज्ञ बैठे हैं और अगर वो गंभीरता से इस आयोजन को लेकर कोई नीति बनाएं तो निश्चित रूप से उसमें सफलता मिल सकती है। आवश्यकता सिर्फ अपनी भाषा हिंदी को मजबूत करने के लिए इच्छाशक्ति की है। 

1975 में जब पहली बार नागपुर में विश्व हिंदी सम्मेलन का आयोजन हुआ था तब से ही ये सम्मेलन हिंदी के नाम पर ठेकेदारी करनेवालों की नजर में आ गया। उस वक्त की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इस बात को समझा था और उन्होंने राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा को इस आयोजन में महत्वपूर्ण भूमिका दी थी। उस समय इस निर्णय को लेकर दिल्ली हिंदी प्रादेशिक साहित्य सम्मेलन से जुड़े गोपाल प्रसाद व्यास और काशी नागरी प्रचारिणी सभा के सुधाकर पांडे नाराज हो गए थे। उनको लगा था कि इस तरह के आयोजन में उनकी भूमिका होनी चाहिए थी। बाद में सुधाकर पांडे, रत्नाकर पांडे और श्रीकांत वर्मा की तिकड़ी ने अपनी स्थिति मजबूत की और मारीशस में हुए दूसरे विश्व हिंदी सम्मेलन में केंद्रीय भूमिका में आ गए। उस वक्त के साहित्यकार एक बेहद मजेदार किस्सा सुनाते हैं। मारीशस जाने के लिए पत्रकार और दुनियाभर में रामायण सम्मेलनों के आयोजन से जुड़े लल्लन प्रसाद व्यास दिल्ली एयरपोर्ट पर पहुंचे। जब वो इमीग्रेशन की पंक्ति में खड़े थे तो उनके पास एक अधिकारी आया। उनको बताया गया कि उनके पासपोर्ट की जांच होनी है ताकि विदेश में उनको किसी प्रकार की कोई दिक्कत न हो। कहते हैं कि उनको पासपोर्ट तब वापस दिया गया जब मारीशस जानेवाले विमान का गेट बंद हो गया। कहा तो यहां तक जाता है कि कवि श्रीकांत वर्मा ने ही ये करवाया था। इस तरह की बातों का कोई प्रमाण नहीं होता। इसका भी नहीं है। जब विमान मारीशस के पोर्टलुई हवाई अड्डे पहुंचा तो उस समय के वहां के प्रधानमंत्री शिवसागर रामगुलाम स्वयं हिंदी सम्मेलन के प्रतिभागियों की अगवानी के लिए उपस्थित थे। उन्होंने प्रतिनिधिमंडल के सदस्य कर्ण सिंह से पूछा था कि लल्लन नहीं दिखाई दे रहे हैं। उनके पास कोई उत्तर नहीं था। लल्लन प्रसाद व्यास हिंदी सम्मेलन की तैयारियों के सिलसिले में तीन बार मारीशस जा चुके थे इसलिए शिवसागर जी उनके बारे में जानना चाहते थे। लल्लन को इस वजह से रोका गया क्योंकि वो पहले विश्व हिंदी सम्मेलन में आयोजक मधुकर राव चौधरी के साथ सक्रिय थे। उनको सबक सिखाना था। जबतक विश्व हिंदी सम्मेलन साहित्यकारों की राजनीति से मुक्त होकर भाषाई कूटनीति का माध्यम नहीं बनेगा तबतक इस आयोजन की सार्थकता पर प्रश्न चिन्ह लगते रहेंगे। इस वक्त देश के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने पूरी दुनिया में भारत का सर गर्व से ऊंचा किया है। उम्मीद की जानी चाहिए कि वो विश्व हिंदी सम्मेलन को लेकर भी कोई ऐसी ही युक्ति सोचेंगे जिससे हमारी राजभाषा के बारे में विदेश में एक उत्सुकता का वातावरण बने।   


Saturday, September 24, 2022

आंकड़ों और दावों के तिलिस्म में ‘ब्रह्मास्त्र’


पिछले पखवाड़े एक फिल्म आई जिसका नाम है ब्रह्मास्त्र पार्ट वन शिवा। फिल्म त्रयी की ये पहली फिल्म है। इसके निर्माता करण जौहर और अन्य हैं। इसका निर्देशन अयान मुखर्जी ने किया है। रणबीर कपूर और आलिया भट्ट मुख्य भूमिका में हैं। ब्रह्मास्त्र को हिंदी की सबसे महंगी फिल्मों में से एक कहकर प्रचारित किया गया था। फिल्म के निर्माताओं की ओर से बताया गया था कि इस फिल्म को बनाने में 410 करोड़ रुपए खर्च हुए। फिल्म के प्रदर्शित होने के पहले से ये चर्चा आरंभ हो गई थी कि ये फिल्म चलेगी या नहीं। इसके पहले प्रदर्शित आमिर खान की फिल्म लाल सिंह चड्ढा और अक्षय कुमार अभिनीत रक्षाबंधन को दर्शकों का प्यार नहीं मिल पाया था। ये दोनों फिल्में अपनी लागत भी नहीं निकाल पाईं। फिल्म ब्रह्मास्त्र की सफलता को लेकर भी फिल्मों से जुड़े लोग आशंकित थे। इस फिल्म के बायकाट का ट्रेंड भी इंटरनेट मीडिया पर चल रहा था। फिल्म सिनेमाघरों में प्रदर्शित हो गई। इसके निर्माताओं और निर्देशक की तरफ से ये दावा किया गया कि पहले ही दिन इस फिल्म ने पूरी दुनिया में 75 करोड़ रुपए का कारोबार किया। इसको हिंदी फिल्मों की सबसे बड़ी ओपनिंग में से एक बताया गया। इंटरनेट मीडिया पर इस फिल्म के बायकाट की बातें निर्माताओं के दावे में दबने सी लगी। लेकिन कुछ लोग इस फिल्म के पहले दिन के कुल कारोबार की रकम को लेकर प्रश्न भी उठा रहे थे। आमतौर पर किसी भी हिंदी फिल्म की ओपनिंग देशभर के सिनेमाघरों में प्रदर्शन का कुल कारोबार माना जाता रहा है। करण जौहर और उनकी टीम ने पहले दिन कुल वैश्विक कारोबार का ब्यौरा देकर माहौल बनाने का प्रयास किया। निर्देशक अयान मुखर्जी भी कुल वैश्विक कारोबार को ही प्रचारित कर रहे हैं। बावजूद इसके फिल्म 15 दिनों में अपनी लागत 410 करोड़ रुपए का कारोबार नहीं कर पाई है। 

एक और बात जिसपर ध्यान दिया जाना चाहिए। फिल्म ब्रह्मास्त्र के बारे में बताया गया कि वो देशभर में 8000 पर्दे पर प्रदर्शित की गई। फिल्म उद्योग से जुड़े लोगों का अनुमान है कि एक स्क्रीन पर किसी फिल्म को प्रदर्शित करने का औसत खर्च करीब 30 हजार रुपए आता है। अगर ब्रह्मास्त्र को 8000 स्क्रीन पर प्रदर्शित किया गया तो फिल्म के प्रदर्शन का कुल खर्च 24 करोड़ रुपए होता है। इसके अलावा फिल्म के प्रचार प्रसार पर हुए खर्च को दस करोड़ रुपए भी माना जाए तो ब्रह्मास्त्र पर निर्माण से लेकर रिलीज तक कुल खर्च 444 करोड़ रुपए होता है। दस दिनों के कुल वैश्विक कारोबार को देखा जाए तो 10 दिनों में ब्रह्मास्त्र ने 360 करोड़ का कारोबार किया है। फिल्म उद्योग से जुड़े ट्रेड विश्लेषकों की मानें तो इस फिल्म का चौदह दिनों में देश में सकल कारोबार करीब 266 करोड़ रुपए का है। विदेश में इस फिल्म का सकल कारोबार करीब 93 करोड़ रुपए का है। इस लिहाज से इस फिल्म का सकल वैश्विक कारोबार लागत तक नहीं पहुंच पाई है। लाभ की बात तो दूर । चूंकि करण जौहर को फिल्म उद्योग जगत के अग्रणी निर्माताओं में से एक माना जाता है इसलिए उनकी कारोबार दिखाने के इस तरीके का प्रभाव इंडस्ट्री पर पड़ेगा। इसको विपणन का एक तरीका माना जा सकता है। इस तरीके का प्रभाव सकारात्मक होगा या नकारात्मक इसका आकलन आनेवाले समय में ही हो पाएगा। 

ब्रह्मास्त्र के प्रचार के इस तरीके को देख कुछ वर्षों पूर्व नई दिल्ली के विश्व पुस्तक मेले की एक घटना की याद आ गई। एक पुस्तक प्रकाशित होकर आनेवाली थी। मेले में इस बात का खूब प्रचार किया जा रहा था कि अमुक पुस्तक अमुक दिन अमुक समय पर प्रकाशित होकर बिक्री के लिए मेले में उपलब्ध होनेवाली है। अमुक दिन भी आ गया। तय समय पर जब पाठक पुस्तक खरीदने पहुंचे तो बताया गया कि पुस्तक का पहला संस्करण बिक गया है। मेले में इस बात की खूब चर्चा रही। प्रकाशक ने भी ये प्रचारित किया कि पुस्तक का पहला संस्करण चंद घंटों में बिक गया। अगले दिन ढेर सारे पुस्तक प्रेमी उस पुस्तक को खरीदने के लिए प्रकाशक के स्टाल पर पहुंचे। वहां वो पुस्तक उपलब्ध थी लेकिन उसके कवर पर छपा था, दूसरा संस्करण। पुस्तक की जमकर बिकी हुई। खरीदनेवाले ये बात करते हुए जा रहे थे कि कुछ तो बात होगी इस पुस्तक में कि कुछ ही समय में पहला संस्करण खत्म हो गया। बाद में पता चला कि ये मार्केटिंग का तरीका था। पुस्तक के पहले संस्करण का प्रकाशन ही दूसरे संस्करण की मुहर के साथ हुआ था। ये बात दूसरे प्रकाशक को पता चली तो वो और आगे चला गया। उसने एक युवा लेखक की पुस्तक प्रकाशित की तो पुस्तक के अंदर लिखवा दिया प्रथम संस्करण जनवरी और द्वितीय संस्करण जनवरी। मतलब एक महीने में दो संस्करण। ये भी प्रचार का एक तरीका था। दूसरे प्रकाशक की पुस्तक अपेक्षित संख्या में नहीं बिकी क्योंकि तबतक पाठकों के बीच ये बात फैल गई थी कि संस्करणों का खेल पुस्तक की बिक्री बढ़ाने और किताब के पक्ष में माहौल बनाने का एक तरीका है। इस तरह से प्रकाशन जगत की साख संदिग्ध हो गई। ब्रह्मास्त्र को लेकर जिस तरह से वैश्विक कारोबार को प्रचारित कर एक माहौल बनाने की कोशिश की गई उससे ये आशंका है कि इससे हिंदी फिल्म जगत की साख कम हो सकती है। माहौल बनाने से नुकसान कम हो सकता है लेकिन फिल्म जब चलती है तो उसका पता चल जाता है। जैसे द कश्मीर फाइल्स की लागत 25-30 करोड़ बताई जाती है लेकिन इसने करीब 300 करोड़ का कारोबार किया। इसको हिट कहा जाता है।     

दरअसल फिल्मों के कारोबार को समझने के लिए हमें सिनेमाघरों से बाहर निकलना होगा। पहले तो किसी फिल्म के हिट या फ्लाप होने का पैमाना सिनेमाघरों से होनेवाले कारोबार या वहां से अर्जित होनेवाले लाभ पर आधारित होता था। बदलते समय और मनोरंजन के अन्य माध्यमों के आने के बाद परिदृश्य बदल गया है। अब माना जाता है कि सिनेमाघरों से 50 प्रतिशत और ओवर द टाप प्लेटफार्म(ओटीटी) और अन्य माध्यमों पर उसको दिखाने के समझौते से पचास फीसदी कारोबार होता है। अब फिल्मकार अपनी फिल्मों को सिनेमाघर में रिलीज होने के पहले ही ओटीटी पर बेच देता है। उससे पैसे मिलते हैं। टेलिवजन पर दिखाने का अधिकार, अन्य भारतीय भाषाओं में रिमेक का अधिकार, म्यूजिक का अधिकार आदि से भी निर्माता अपनी लागत निकाल लेना चाहते हैं। कुछ फिल्मकार तो अपनी फिल्में सीधे ओटीटी प्लेटफार्म पर ही रिलीज करने लगे हैं। अक्षय कुमार की कटपुतली और मधुर भंडारकर की बबली बाउंसर तो ओटीटी पर ही रिलीज हुई। ब्रह्मास्त्र के बारे में भी फिल्म उद्योग जगत में चर्चा है कि इसको ओटीटी पर 150 करोड़ में बेचा गया है। अगर इस राशि को सही मानकर उसके सकल कारोबार में जोड़ भी दिया जाए तो ब्रह्मास्त्र अपनी लागत से कुछ अधिक राशि का कारोबार करेगा। 

जानकारों का ये भी मानना है कि अगर किसी फिल्म पर 450 करोड़ खर्च किया जाता है और पांच सवा पांच सौ करोड़ का कारोबार होता है तो उसको हिट नहीं माना जा सकता है। अगर फिल्म के बनने में अधिक समय लग गया तो उसमें निवेश की गई राशि पर लगनेवाले ब्याज को भी जोड़ा जाता है। ब्रह्मास्त्र को रिलीज करनेवाली सिनेमाघरों की शृंखला चलानेवाली एक कंपनी के शेयर में गिरावट देखी गई। बाजार हमेशा सेंटिमेंट्स पर चलता है और अगर उसको ब्रह्मास्त्र के रिलीज में उपरोक्त कंपनी को लाभ मिलता दिखता तो शेयर चढता। फिल्मों के हिट या फ्लाप की तिलस्मी दुनिया की चर्चा होती रहेगी लेकिन इतना तय है कि फिल्म की विषयवस्तु और उसका ट्रीटमेंट ही उसको हिट बनाती है, विपणन का कोई औजार नहीं।  

Saturday, September 17, 2022

शब्दकोश संस्कृति पर संगठित प्रयास


उपराष्ट्रपति के पद से वेंकैयानायडू का विदाई समारोह चल रहा था। सभी गणमान्य अतिथियों की उपस्थिति में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी वेंकैया जी के राजनीतिक गुणों की चर्चा कर रहे थे। राजनीतिक गुणों के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उनके भाषा प्रेम की प्रशंसा की। वहां प्रधानमंत्री ने एक सूचना साझा की कि भारत सरकार ने भाषिणी के नाम से एक वेबसाइट बनाई है। प्रधानमंत्री मोदी ने बतया कि इस वेबसाइट पर भारतीय भाषाओं की समृद्धि को प्रदर्शित किया गया है। यहां एक भारतीय भाषा से दूसरी भारतीय भाषा में अनुवाद करने की व्यवस्था है। प्रधानमंत्री इतने पर ही नहीं रुके। उन्होंने मंच पर बैठे लोकसभा के अध्यक्ष ओम बिरला और राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश से एक अनुरोध किया। उन्होंने कहा कि संसद के दोनों सदनों में जब कोई सदस्य मातृभाषा में भाषण करें या सदस्य किसी चर्चा में हस्तक्षेप करते हैं तो कई सदस्य के भाषण से या किसी चर्चा पर उनके हस्तक्षेप से बहुत बढिया शब्द निकलते हैं। भारतीय भाषाओं के वो शब्द दूसरी भाषा के सदस्यों के लिए बहुत रुचिकर भी होता है और सार्थक भी लगता है। प्रधानमंत्री ने मंच से ही ओम बिरला और हरिवंश से अनुरोध किया कि हमारे दोनों सदनों में ऐसे सार्थक, रुचिकर और भाषा वैविध्य को लेकर आनेवाले भारतीय भाषा के शब्दों का संग्रह करने की व्यवस्था की जाए। उसके बाद प्रतिवर्ष ऐसे शब्दों का एक संग्रह प्रकाशित करने की परंपरा का आरंभ किया जाए। प्रधानमंत्री मोदी ने वेंकैया जी के मातृभाषा प्रेम के हवाले से एक बेहद गंभीर बात तो की ही, भारतीय भाषाओं के शब्दकोश बनाने की पहल करने का सुझाव भी दे दिया। 

पिछले दिनों हिंदी दिवस के अवसर पर सूरत में आयोजित हिंदी दिवस समारोह में गृह मंत्री अमित शाह ने शब्द सिंधु के नाम से एक खोजपरक डिजीटल शब्दकोश के पहले संस्करण का शुभारंभ किया। ये शब्दकोश हिंदी से हिंदी का है। इसमें शब्दों के अर्थ और आवश्यकतानुसार वाक्य प्रयोग भी दिए गए हैं। इसमें अभी इक्यावन हजार शब्द डाले गए हैं। भविष्य में इस शब्दकोश में शब्दों की संख्या बढ़ाई जाएगी। इसमें विज्ञान. तकनीक, न्यायिक प्रक्रिया और प्रोद्योगिकी से जुड़े शब्दों को शामिल किया गया है। ये शब्दकोश गृह मंत्रालय के राजभाषा विभाग, शिक्षा मंत्रालय के केंद्रीय हिंदी निदेशालय और विदेश मंत्रालय की वेबसाइट पर उपलब्ध होने की बात कही गई । इस शब्दकोश में भारतीय भाषाओं के शब्दों को भी शामिल करने का लक्ष्य रखा गया है। शब्दकोश में भारतीय भाषाओं के शब्दों को शामिल करने में एक असुविधा हो रही है। हिंदी के कई शब्द ऐसे हैं जिनका भारतीय भाषाओं और बोलियों में अलग अर्थ होता है। उदाहरण के तौर पर अगर शिक्षा शब्द को लिया जाए तो हिंदी में इसका अर्थ होता सिखाना। कुछ भारतीय भाषा और बोलियों में सिखाने का प्रयोग दंड के तौर पर भी होता है। इस शब्दकोश को बनाने वालों के सामने ये बड़ी चुनौती है कि किस प्रकार से भारतीय भाषाओं और हिंदी के शब्दों में साम्य स्थापित किया जाए ताकि अर्थ का अनर्थ न हो। बताया गया कि भाषा विशेषज्ञ इस पर कार्य कर रहे हैं। इस शब्दकोश का एक लाभ ये है कि सरकारी कार्यालयों में जिस प्रकार की हिंदी का प्रयोग होता है उसको सरल बनाया जा सकेगा। दूसरी भाषाओं से हिंदी में अनुवाद करने में भी ये शब्दकोश सहायक सिद्ध होगा। इस शब्दकोश को अद्यतन करने के लिए विशेषज्ञों और तकनीकविदों की एक समिति निरंतर कार्य कर रही है। इसका संकेत इस बात से भी मिलता है कि अभी इसका पहला संस्करण जारी किया है और भविष्य में इसके अनेक संस्करण प्रकाशित होते रहेंगे। 

सूरत के सम्मेलन में ही राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश ने भी भारतीय भाषाओं के शब्दों को लेकर अपनी प्राथमिकता बताई। उनके मुताबिक भारतीय भाषाओं के सात सौ से अधिक शब्दों का चयन किया गया है जो रुचिकर और सार्थक शब्द हैं। इन शब्दों का उपयोग सभी भाषाओं में हो सकता है। इन प्रयासों से ये लगता है कि भारतीय भाषाओं और हिंदी को समृद्ध करने के लिए सरकारी स्तर पर गंभीरता से प्रयास हो रहे हैं। स्वाधीनता के अमृतकाल में इस तरह की बातों के सामने आने से मातृभाषा या भारतीय भाषाओं के लिए सरकार के स्तर संगठित प्रयास भाषा-प्रेमियों के साथ साथ बौद्धिक जगत के लिए भी संतोष के संकेत हैं। हिंदी में शब्दकोश की परंपरा को पुनर्जीवित करके भाषा को समृद्ध किया जा सकता है। अब भी हिंदी के शब्दकोश की बात होती है तो दशकों पूर्व प्रकाशित ज्ञानमंडल शब्दकोश या फादर कामिल बुल्के के शब्दकोश या फिर हरदेव बाहरी के शब्दकोश तक बात आकर रुक जाती है। अपने देश में शब्दकोश संस्कृति सशक्त नहीं हो पाई है। शब्दों के अर्थ और उसकी उत्पत्ति को लेकर हम सजग नहीं रहते हैं। हिंदी या भारतीय भाषाओं में जो भाषाई समृद्धि है उसको जानने समझने के लिए शब्दकोश संस्कृति को पुनर्जीवित करना होगा। इससे न केवल अकादमिक जगत में बल्कि पूरे भारतीय समाज में सांस्कृतिक चेतना का विकास होगा। शब्दकोश को अद्यतन करने और उसमें अन्य भाषाओं के शब्दों को शामिल करके न केवल भाषा को समृद्ध किया जा सकता है बल्कि इसका दायरा भी बढ़ाया जा सकता है। एक तरह से देखें तो ये औपनिवेशिक भाषाओं के चंगुल से मुक्ति का अभियान भी है।

इस संबंध में फ्रांस का उदाहरण दिया जा सकता है। सूरत में एक चर्चा के दौरान पता चला कि फ्रांस के लोग अपनी भाषा और मातृभाषा को लेकर कितने सजग हैं। एक मित्र ने बताया कि फ्रांस में अगर आप रास्ता भटक जाएं तो कभी भी किसी फ्रेंच से अंग्रर्जी में रास्ता न पूछें। वो बिना बताए आगे बढ़ जाएगा। आप भले ही हिंदी या भोजपुरी या तमिल में बात करें वो ठहरकर आपके हावभाव से आपके प्रश्नों को समझने का प्रयास करेंगे और आपकी सहायता भी करेंगे। जैसे ही आपने अंग्रेजी में कुछ कहा कि वो आपसे बात किए बिना आगे बढ़ जाएंगे। लेकिन स्वाधीनता के पचहत्तर वर्ष बीतने के बाद भी हमारे देश में विदेशी भाषा की अहमियत बनी हुई है। अगर इसके कारणों की पड़ताल करेंगे तो इसके पीछे स्वाधीनता के बाद के शीर्ष भारतीय नेतृत्व की कमजोरी और उनका विदेशी भाषा प्रेम ही दिखाई पड़ता है। भाषा के नाम पर इस देश ने बहुत राजनीति देखी, भाषा को लेकर हिंसा भी हुई है, भाषाई आधार पर राज्यों का विभाजन भी हुआ है। दो भाषाओं के बीच कटुता भी देखी गई है। पूर्व में साहित्य अकादमी के चुनाव के दौरान इस तरह की कटुता खुलकर सामने आती रही है। हिंदी का विरोध भी देखा गया। हिंदी विरोध के पीछे राजनीति रही है जिसने शिक्षा और अकादमिक जगत में भाषाई विष फैलाने का काम किया है। अब इस विष को खत्म करने का कार्य आरंभ हुआ है। हिंदी नहीं बल्कि सभी भारतीय भाषाओं को साथ लेकर चलने की नीति पर कार्य हो रहा है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भी भारतीय भाषाओं को प्राथमिकता देने की बात की गई है। इस दिशा में समग्रता में कार्य भी हो रहा है। 

यह अनायस नहीं है कि प्रधानमंत्री एक सभा में भारतीय भाषाओं के शब्दकोश बनाने की बात करते हैं। इसके लिए संसद के दोनों सदनों के जिम्मेदार अधिकारियों से अनुरोध करते हैं और दूसरी तरफ गृह मंत्री हिंदी शब्दकोश को अद्यतन करने का उपक्रम आरंभ करते हैं। उसके क्रियान्वयन की जानकारी राष्ट्र को देते हैं। यह सरकार का भाषा के प्रति अपने दायित्व का निर्वहन भी है और अपनी संस्कृति पर अभिमान भी। अपनि संस्कृति पर अभिमान के इस अभियान में हर भारतीय नागरिक को जुड़ना चाहिए और आनेवाली पीढ़ी को शब्दकोश से संपर्क बनाने और बढ़ाने का प्रयास करना चाहिए। 


Sunday, September 11, 2022

विरह और प्रेम का राग पहाड़ी


फिल्मी गीतों में रागों का प्रयोग लंबे अरसे से हो रहा है लेकिन जब संगीतकार लोक से जुड़े दृश्यों को दिखाते हैं तो उनकी पहली पसंद राग पहाड़ी होती है। जैसा कि इस राग के नाम से ही स्पष्ट है कि इसकी उत्पत्ति पहाड़ी इलाकों में हुई होगी। माना जाता है कि हिमालय की तराई वाले इलाकों में ये राग प्रचलन में रहा है। संगीत के जानकारों का कहना है कि राग पहाड़ी को सबसे पहले कश्मीर के लोकगीतकारों ने आरंभ गाना किया। संगीत की परंपरा में इसको बजाने का समय देर शाम या रात्रि के आरंभिक समय को माना गया है। इस राग का संबंध बिलावल थाट से है और इसमें राग पीलू की सुगंध भी महसूस की जा सकती है। इस राग की एक विशेषता ये भी है कि इसको आरोह और अवरोह में परिभाषित नहीं किया जा सकता है। इस राग की एक विशेषता ये है कि इसको सुनते हुए कई बार प्रेम की अग्नि और विरह की पीड़ा के साथ साथ प्रेमी की प्रतीक्षा करती नायिका के मनोभावों को इस राग में अभिव्यक्ति मिलती है। इस राग को सुनते हुए कई बार ये भ्रम होता है कि ये एक धुन है। अगर इसको बजाने या गानेवाला कलाकार अगर सिद्ध होता है तो इसके राग के आरोह और अवरोह को बरतने में इसके सरगम के मानकों का इतनी निपुणता से विन्यास करता है कि वो इसको राग की ऊंचाई प्रदान कर देता है। इसी कारण ये राग सधता है और लोक संगीत को एक खास प्रकार की कर्णप्रियता से सजाता है। 

फिल्मों में जब भी लोक से जुड़े प्रसंग आते हैं तो राग पहाड़ी संगीतकारों और गायकों की पसंद बन जाता है। राज कपूर ने राग पहाड़ी का अपनी कई फिल्मों में उपयोग किया है। फिल्म ‘राम तेरी गंगा मैली’ में नायिका मंदाकिनी जब पर्दे पर ‘हुस्न पहाड़ों का ओ साहिबा, क्या कहना कि बारों महीने, यहां मौसम जाड़े का’ गाती है तो राग पहाड़ी अपने उत्स पर होती है। इस गाने का संगीत दिया है रवीन्द्र जैन ने और इसको लता मंगेशकर ने अपनी आवाज से अमर कर दिया। आर डी बर्मन को भी राग पहाड़ी बेहद पसंद था और वो अपनी कई फिल्मों के गानों में राग पहाड़ी का उपयोग किया करते थे। 1966 में एक फिल्म आई थी ‘तीसरी मंजिल’ जिसमें एक गाना था ‘ओ मेरे सोना रे, सोना रे, सोना...।‘ इसको लिखा था मजरूह सुल्तानपुरी ने। इस गीत में आर डी बर्मन ने बेहद खूबसूरती के साथ राग पहाड़ी का उपयोग किया था। आर डी बर्मन ने  इस गीत का संगीत तैयार करते समय राग पहाड़ी और जैज के छोटे टुकड़ों को गीत में पिरो दिया था। आशा और रफी की आवाज में ये गीत पचास साल से अधिक समय से श्रोताओं की पसंद बना हुआ है। 

Saturday, September 10, 2022

भाषाई सांप्रदायिकता से हिंदी की हानि


दो दिन बाद हिंदी दिवस है। हिंदी भाषा के बारे में जमकर चर्चा होगी। हिंदी को बाजार और रोजगार से जोड़ने की कई तरह की बातें होगी। स्वाधीनता के बाद से लेकर अबतक हिंदी की व्याप्ति बढ़ने पर हिंदी समाज प्रसन्न भी होगा। हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने को लेकर अधिक प्रयास करने पर बल देते लोग भी मिलेंगे। हिंदी को  संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा बनाने के लिए केंद्र सरकार से अपील भी होगी। हर वर्ष हिंदी दिवस और हिंदी पखवाड़े में इस तरह के वाक्य सुनाई पड़ते हैं। हिंदी के विकास और उसकी समृद्धि को लेकर कार्य भी हो रहे हैं। शब्दकोश से लेकर भारतीय भाषाओं के कोश तैयार किए जा रहे हैं। हिंदी को तकनीक से जोड़ने के लिए सांस्थानिक और व्यक्तिगत स्तर पर प्रयास किया जा रहा है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भले ही हिंदी शब्द का उल्लेख नहीं है लेकिन मातृभाषा और भारतीय भाषा को प्राथमिकता की बातें हैं। इंजीनियरिंग और अन्य तकनीकी शिक्षा के लिए हिंदी में पुस्तकें तैयार की जा रही हैं। पर स्वाधीनता के अमृत महोत्सव के बाद अब अमृतकाल में हमें उन ऐतिहासिक कारणों को भी देखना चाहिए जिसकी वजह से हिंदी को पराधीन हिंदुस्तान में संघर्ष करना पड़ा और जिसका असर स्वाधीनता के बाद भी हिंदी पर दिखाई दे रहा है। 

पिछले दिनों उपरोक्त कारणों की पड़ताल कर रहा था तो गोरखपुर में आयोजित हिंदी साहित्य सम्मेलन के 19वें अधिवेशन में 2 मार्च 1930 को गणेश शंकर विद्यार्थी का अध्यक्षीय भाषण देखने को मिला। अपने भाषण में गणेश शंकर विद्यार्थी ने विस्तार से उन कारणों और परिस्थितियों की चर्चा की है जिसकी वजह से हिंदी को पराधीन भारत में परिधि पर डालने और उसको वहीं बनाए रखने का षडयंत्र किया गया। गणेश शंकर विद्यार्थी ने अपने लंबे वक्तव्य के आरंभ में ही इस ओर ध्यान दिलाया था। उन्होंने तब कहा था कि ‘आज से उन्नीस वर्ष पहले जब इस सम्मेलन का जन्म नहीं हुआ था और उसके जन्म के पश्चात भी कई वर्षों तक अपनी मातृभाषा का स्वतंत्र अस्तित्व सिद्ध करने के लिए पग पग पर न केवल संस्कृत, प्राकृत, शौरसैनी, मागधी, सौराष्ट्री आदि की छानबीन करते हुए शब्द-विज्ञान और भाषा-विज्ञान के आधार पर यह सिद्ध करने की आवश्यकता पड़ा करती थी कि हिंदी भाषा संस्कृत या प्राकृत की बड़ी कन्या है, किंतु बहुधा बात यहां तक पहुंच जाया करती थी और यह भी सिद्ध करना पड़ता था कि नानक और कबीर, सूर और तुलसी की भाषा का बादशाह शाहजहां के समय जन्म लेनेवाली उर्दू बोली के पहले, कोई अलग गद्य रूप भी था। जिस भाषा में पद्य की रचना इतने ऊंचे दर्जे तक पहुंच चुकी हो, उसके संबंध में इस बात की सफाई देनी पड़े कि उसका उस समय गद्य रूप भी था, इससे बढ़कर कोई हास्यास्पद बात हो नहीं सकती।‘  गणेश शंकर विद्यार्थी के मुताबिक उस समय ये संभव हो सकता है कि गद्य लिखने की परिपाटी न हो और बड़े बड़े ग्रंथ पद्य में लिखे जाते रहे हों। उन्होंने इस संबंध में ईरान, ग्रीस, रोम और चीन का उदाहरण देकर अपनी बातें स्पष्ट की थीं। हिंदी को लेकर इस तरह की बातें कहनेवालों पर उपहास की शैली में प्रहार भी किया था। अब अगर हम गणेश शंकर विद्यार्थी के उपरोक्त कथन को देखें तो वो हिंदी को भाषा कहते हैं और उर्दू को बोली। इससे भी साफ होता है कि उस समय हिंदी और उर्दू की क्या स्थिति रही होगी। 

गणेश शंकर विद्यार्थी के चिंतन के मूल में एक और बात थी जो उनके वक्तव्य में परिलक्षित होती है। उनके मुताबिक राजनीतिक पराधीनता पराधीन देश की भाषा पर अत्यंत विषम प्रहार करती है। राजनीतिक पराधीनता का भाषा पर किस प्रकार असर पड़ता है उसको भी विद्यार्थी जी स्पष्ट किया। उन्होंने तब कहा था कि ‘राजनीतिक पराधीनता ने भारतवर्ष में भी उसी प्रकार, जिस प्रकार उसने अन्य देशों में किया, भाषा विकास की राह में रोड़े अटकाने में कोई कमी नहीं की।...इस देश के मुसलमान शासकों के कारण भारतीय भाषाओं का सहज सवाभाविक विकास नहीं हो सका। सबसे अधिक हानि हिंदी की हुई। उनकी सत्ता देश के उत्तर, पश्चिम और मध्यवर्ती भाग में थी। यही प्रदेश शाही सत्ता के कारण अरबी अक्षरों और फारसी साहित्य से इतने प्रभावित हुए कि उनका रंग रूप ही बदल गया। एक भाषा दूसरी भाषा के संसर्ग में आकर शब्दों और वाक्यों का सदा दान-प्रतिदान किया करती है। यह हानिकारक या अपमानजनक बात नहीं है किन्तु जब ये दान-प्रतिदान प्रभुता या पराधीनता के भाव से होता है, एक भाषा को दूसरी भाषा के शब्दों  और वाक्यों को इसलिए लेना पड़ता है कि दूसरी भाषा के लोग बलवान हैं, उनकी प्रभुता है, उनको प्रसन्न करना है, उनके सामने झुकना है, तो इससे लेनेवाले की उन्नति नहीं होती, वो अपनी गांठ का बहुत कुछ खो देते हैं और पर-भाषा की सत्ता को स्वीकार करके अपनी परवशता और हीनता को पुष्ट करते हैं और अपने सर्वसाधारण जन से दूर जा पड़ते हैं। इस देश में विजेताओं के साथ फारसी के प्रवेश से ये बातें हुईं।‘  अब यहां से सूत्र पकड़ने की आवश्यकता थी जिसमें बाद के विद्वानों से चूक हुई या उनमें से कुछ अपनी विचारधारा की वजह से इन कारणों को जानबूझकर छोड़ दिया। परिणाम ये हुआ कि हिंदी भाषियों को यह सिद्ध करने की आवश्यकता पड़ी कि फारसी के आगमन और उर्दू के जन्म के पहले भी हिंदी गद्य का स्वतंत्र अस्तित्व था।

इस प्रकार का वातावरण लंबे कालखंड तक चला और फिर मगुलों के बाद इस देश पर अंग्रेजों का शासन कायम हुआ। उस समय अदालतों की भाषा फारसी थी। अंग्रेजों ने फारसी के स्थान पर उर्दू को स्थापित कर दिया। जबकि उर्दू का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं था। गणेश शंकर विद्यार्थी के मुताबिक उस समय मुसलमान जिस हिंदी को बोलते और लिखते थे और जिसमें वे फारसी के कुछ शब्दों का प्रयोग करते थे वही उर्दू थी। अंग्रेजों ने उत्तर भारत में उर्दू को ऐसा स्थान देकर जो उसे पहले से प्राप्त न था, हिंदी और उर्दू के विवाद का सूत्रपात किया। इस प्रकार बहुसंख्यक हिंदी भाषा-भाषी लोगों की सुविधा और विकास में बाधा उत्पन्न कर दी। अब अगर इन बिंदुओं पर विचार करें तो हिंदी के लंबे संघर्ष को समझा जा सकता है। स्वाधीनता संग्राम के दौरान हिंदी का उपयोग एक बार फिर से बढ़ा और उसको हिंदुस्तान के लोगों को जोड़ने वाली भाषा के तौर पर देखा जाने लगा। उस समय के कई नेताओं ने हिंदी को राष्ट्रभाषा की संज्ञा देते हुए ये अपेक्षा की थी कि स्वाधीनता के बाद हिंदी देश की राष्ट्रभाषा बनेगी। ये सबको स्वीकार भी था। अगर हम स्वाधीनता संग्राम के दौरान होनेवाले विरोध अभियानों का नाम देखें तो हिंदी की स्थिति स्पष्ट होती है। असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन, जैसा सुंदर हिंदी शब्द हो, नमक सत्याग्रह या पूर्ण स्वराज या भारत छोड़ो आंदोलन। ये हिंदी शब्दों की स्वीकार्यता और संप्रेषणीयता थी जिसने पूरे हिन्दुस्तान को एक कर दिया। जब गांधी दक्षिण अफ्रका से भारत वापस लौटे थे तब वो भी हिंदी के पक्षधर थे। वो हिंदी को राष्ट्रभाषा के तौर पर देखते थे लेकिन कालांतर में वो हिन्दुस्तानी के पक्षधर होते चले गए। वो हिन्दुस्तानी जिसको लेकर स्वाधीनता के बाद संविधान सभा में बहस हुई, पहले आमचुनाव के बाद संसद में बहस हुई लेकिन आज वो अपनी पहचान और प्रासंगिकता दोनों खो चुका है। मुगलों के समय हिंदी आक्रांताओ की भाषाई सांप्रदायिकता का शिकार बनी, उसके बाद अंग्रेजों ने हिंदी को उर्दू से दबाने की कोशिश की। अंग्रेजी को प्राथमिकता देकर भारतीय भाषाओं का तिरस्कार किया। कुल मिलाकर अमृतकाल में हमें इन बातों पर विचार करते हुए हिंदी और भारतीय भाषाओं को मजबूत करने का प्रण लेना चाहिए। 

कब हटेंगे परतंत्रता के चिन्ह ?


स्वाधीनता दिवस पर लाल किले से प्रधानमंत्री ने देश की जनता से अमृत काल में पांच प्रण का आह्वान किया था। उसमें से एक प्रण था गुलामी के अंश की समाप्ति। इंडिया गेट से राष्ट्रपति भवन को जोड़ने वाली सड़क का नाम कर्तव्य पथ किया गया। इसके लान में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की प्रतिमा उसी जगह लगाई जहां जार्ज पंचम की प्रतिमा थी तो इसको प्रधानमंत्री के गुलामी के अंश की समाप्ति के आह्वान से जोडा गया। लेकिन कर्तव्य पथ के चार से पांच किलोमीटर के दायरे में गुलामी के कई निशान अब भी हैं। इंडिया गेट से निकलनेवाली सड़कें आक्रांताओं के नाम पर हैं। अकबर रोड से लेकर हुमांयू और शाहजहां रोड तक। औरंगजेब रोड का नाम तो बदला लेकिन औरंगजेब लेन अब भी है। यहां से थोड़ी दूर बंगाली मार्केट के पास बाबर रोड और बाबर लेन मुगल आक्रांताओं की याद दिलाता रहता है। हुमांयू को कई इतिहासकार उदार बादशाह के रूप में देखते हैं। लेकिन उसने भारतीय संस्कृति को सबसे अधिक नुकसान पहुंचाया। भारतीय कलाओं को नेपथ्य में धकेलकर फारसी कलाओं को प्राथमिकता दी। फारस से वास्तुविद और चित्रकार आदि हिन्दुस्तान बुलाए। कहा जा सकता है कि भारत में सांस्कृतिक स्लतनत की स्थापना हुमांयू ने की। मुगल सल्तनत को मजबूती प्रदान करने के लिए जासूसी का पूरा तंत्र विकसित करनेवाले मिर्जा नजफ खां के नाम पर भी एक सड़क है जो लोदी कालोनी के बाहर से निकलती है। जिस तुगलक राजवंश ने देश की जनता पर भायनक अत्याचार किया, अकाल के समय जनता को लूटा उसके नाम पर तुगलक रोड, तुगलक लेन और तुगलक क्रेसेंट अपनी मौजूदगी से उनके अत्याचारों की याद दिलाता है।

ऐसा नहीं है कि सिर्फ मुगलों और उनके कर्मचारियों के नाम पर नई दिल्ली इलाके में सड़कें हैं। उन अंग्रेजों के नाम पर भी सड़कें हैं जिन्होंने हमारे देश को गुलाम बनाने और गुलाम बनाए रखने में भूमिका निभाई। हिन्दुस्तान के विभाजन की जमीन तैयार करनेवाले और देश में सांप्रदायिकता का बीज बोने वाले चेम्सफोर्ड के नाम पर भी सड़क है। एक और अंग्रेज अफसर था जिसका नाम था विलियम मैल्कम हेली था। 1912 में दिल्ली का कमिश्नर नियुक्त हुआ था। उसको जनता के बीच ब्रिटिश राज की स्वीकार्यता बढ़ाने का काम सौंपा गया था। उसने चतुराई से ये कार्य किया। उसके नाम पर हेली रोड है। गुलामी के ऐसे कई चिन्ह देश की राजधानी में अब भी बने हुए हैं। कर्तव्य पथ के अस्तित्व में आने के बाद क्या ये उम्मीद की जानी चाहिए कि अमृत काल में परतंत्रता के इन प्रतीकों को हटाया जाएगा।   

Saturday, September 3, 2022

राजनीति के ‘रंगबाज’ और ‘महारानी’

मंडल कमीशन की सिफारिशें लागू होने के बाद बिहार में सामाजिक बदलाव की बयार बही थी। लगभग उसी समय बिहार में कई ऐसे बाहुबली भी उभरे जो बाद में राजनीति के रास्ते विधानसभा और संसद के सदस्य बने। इनमें पप्पू यादव से लेकर आनंद मोहन तक और शहाबुद्दीन से लेकर सूरजभान सिंह तक का नाम शामिल है। बाद के दिनों में भी ये क्रम चलता रहा और स्थानीय स्तर के अपराधी भी विधानसभा पहुंचने लगे। इन आपराधिक प्रवृत्ति वाले नेताओं का लगभग सभी राजनीतिक दल ने अपने हित में उपयोग किया। किसी ने आपराधिक पृष्ठभूमि वाले इन नेताओं उपयोग सरकार बनाने के लिए समर्थन जुटाने में किया तो किसी ने सरकार बचाने के लिए। 1990 के बाद के दशकों में बिहार की राजनीति का अपराधीकरण तेज हुआ। उसी समय राजनीति के अपराधीकरण पर देशव्यापी चर्चा हुई थी। चुनाव में बूथ लूटने और कब्जा करने की घटनाएं भी खूब हुई, चुनावी हिंसा भी। ये वही दौर था जब बिहार में जाति और विचारधारा के नाम पर सामूहिक नरसंहार हुए। नक्सलियों ने विचारधारा और समानता हासिल करने की आड़ में नरसंहार किए तो जाति आधारित निजी सेनाओं के बीच भी खूनी खेल खेला गया। जातियों के नए नेता पैदा होते चले गए। जातियों के बीच चौड़ी होती खाई को नेताओं ने अपने वोटबैंक के तौर पर उपयोग करना आरंभ कर दिया। पाटने की कोशिश किसी ने नहीं की। लालू प्रसाद यादव जैसे गरीब परिवार से आनेवाले व्यक्ति बिहार के मुख्यमंत्री बने तो सामाजिक न्याय का नारा जोरशोर से लगा। उनपर जब घोटाले का आरोप लगा तो उन्होंने अपने राजनीतिक सहयोगियों को नजरअंदाज करते हुए अपनी पत्नी राबड़ी देवी को बिहार का मुख्यमंत्री बना दिया। कहना न होगा कि उस समय बिहार में राजनीति और अपराध की दुनिया में बहुत कुछ घट रहा था जो किसी फिल्मी पटकथा से कम रोचक और दिलचस्प नहीं था। बिहार में उन्हीं दिनों की राजनीतिक घटनाओं और बाहुबलियों को केंद्र में रखकर कई बेवसीरीज बने भी और अब भी बन रहे हैं।

हाल में दो वेबसीरीज आई है जिसके केंद्र में बिहार की राजनीति, बिहार के बाहुबली और बिहार की राजनीतिक और आपराधिक घटनाएं हैं। जी 5 पर बाहुबलियों को केंद्र में रखकर एक सीरीज आती है जिसका नाम है ‘रंगबाज’। इस वेब सीरीज के पहले सीजन में उत्तर प्रदेश के खतरनाक अपराधी श्रीप्रकाश शुक्ल के कारनाओं पर आधारित पूर्वांचल की राजनीति को दिखाया गया था। इसमें हरिशंकर तिवारी और वीरेन्द्र शाही के बीच चलनेवाले खूनी खेल को फिक्शनलाइज किया गया था। रंगबाज का पहला सीजन 22 दिसंबर 2018 को रिलीज हुआ था। इस शृंखला में 20 दिसंबर 2019 को राजस्थान के गैंगस्टर आनंदपाल सिंह के अपराध पर सीरीज आई। इस कहानी में राजस्थान की राजनीति के उन आयामों को भी दर्शकों के सामने पेश किया गया है जिसके बारे में देश दुनिया को जानकारी कम थी। ‘रंगबाज फिर से’ नाम से के बाद इस वर्ष 29 जुलाई को ‘रंगबाज, डर की राजनीति’ के नाम से बिहार के सिवान के बाहुबली नेता शहाबुद्दीन के बनने और उनके मिटने की कहानी को दर्शकों के सामने पेश किया गया है। रंगबाज के इस सीजन में बिहार में सामाजिक न्याय के दौर की राजनीति के दांव पेंच और अपने राजनीतिक लक्ष्य को हासिल करने के लिए हिंसा का सहारा लेने के बारे में विस्तार से बताया गया है। शहाबुद्दीन के किरदार के साथ विनीत कुमार सिंह ने न्याय किया है। वेब सीरीज के इस सीजन की स्क्रिप्ट बहुत कसी हुई है। इसमें शहाबुद्दीन की प्रेमकथा वाले प्रसंग को भी उभारा गया है। शहाबुद्दीन के चरित्र के क्रूरतम पक्ष पर अपेक्षाकृत कम फोकस किया गया है। चंदा बाबू, जिनके बेटों की हत्या हुई थी, के दर्द और संघर्ष को उभारने में निर्देशक लगभग नाकाम रहे हैं। कहा जा सकता है कि ये सीजन शहाबुद्दीन पर केंद्रित है इस वजह से चंदा बाबू पर ज्यादा फोकस नहीं किया गया है। अगर चंदा बाबू के दर्द और संघर्ष को उभारा गया होता तो शहाबुद्दीन के कारनामों को अधिक प्रामाणिकता के साथ पेश किया जा सकता था। दरअसल इस तरह से सीरीज के लेखक सुनी सुनाई बातों, पुस्तकों और इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्री के आधार पर कहानी कंस्ट्रक्ट करते हैं। उनको उस दौर के समाचरपत्रों को भी देखना चाहिए और कहानी लिखने के पहले प्राथमिक स्त्रोतों तक पहुंचना चाहिए था।

बिहार के मुख्यमंत्री रहते हुए लालू प्रसाद यादव जब घोटाले के भंवर में फंसे तो उन्होंने अपनी पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बना दिया था। उस घटना पर केंद्रित वेब सीरीज महारानी का दूसरा सीजन भी आया है। दूसरे सीजन में निर्देशक और लेखक ने इसकी कहानी को बहुत अधिक काल्पनिक बनाकर फिल्मी बनाने की कोशिश की है। इसमें पति पत्नी के बीच के संघर्ष में ‘वो’ की एंट्री कहानी को ‘पति पत्नी और वो’ की ओर ले जाती है। केंद्रीय पात्र भीमा भारती का अपनी पार्टी की कार्यकर्ता कीर्ति सिंह के साथ प्रेम चलता है। फिल्मी अंदाज में तीज वाले दिन जब भीमा भारती अपनी प्रेमिका कीर्ति सिंह के साथ अकेले कमरे में होते हैं तो रानी भारती की एंट्री कराई जाती है। ये बेहद पुराना फार्मूला रहा है। इस सीरीज में भी जब ये प्रसंग आता है तो दर्शक चौंकता नहीं है क्योंकि उसको पता है कि आगे क्या होनेवाला है। प्रेम प्रसंग के अलावा इसमें राजनीति की तमाम साजिशें हैं, तिकड़में हैं, डरा धमकाकर नेताओं को अपने पाले में लाने की कोशिश भी है। पूरी कहानी अविभाजित बिहार में चलती है जहां शिबू सोरेन का किरदार भी महत्वपूर्ण पात्र के रूप में सामने आता है। झारखंड राज्य को लेकर सियासी सौदेबाजी भी है। इसके अलावा कई किरदार बिहार की समकालीन राजनीति के नेताओं से मेल खाते हैं। बहुत वर्षों पहले पटना में एक विधायक ने एक लड़की के साथ रेप किया था। वो आपराधिक वारदात देश भर में चर्चित हुआ था। उस घटना को भी महारानी सीजन 2 में दिखाकर इसको बिहार की कहानी बताने और बनाने की कोशिश निर्माताओं ने की है। और तो और इसमें चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर के चरित्र से मेल खाता एक महिला पात्र गढ़ा गया है जो हमेशा लैपटाप पर आंकड़ों का खेल करती है। अपने नेता की छवि निर्माण में लगी रहती है।

रानी भारती के रोल में हुमा कुरैशी ने बेहतरीन अभिनय किया है लेकिन उनको अपने उच्चारण पर काम करने की जरूरत है। जब वो बिहार की कम पढ़ी लिखी मुख्यमंत्री के रूप में बोलती हैं तो ये उनके बोली से परिलक्षित नहीं होता है। कई स्थितियों में उनका इस तरह का उच्चारण खटकता है। बावजूद इन कमियों के महारानी का सीजन 2 पहले सीजन से बेहतर है। अब निर्माताओं ने तीसरे सीजन का भी संकेत दे दिया है। भीमा भारती की हत्या हो जाती है। दूसरे सीजन के अंत में जिस तरह से वेबसीरीज को मर्डर मिस्ट्री बनाने की कोशिश हुई है उसको देखकर लगता है कि इस सीरीज को लिखनेवालों के सामने राजनीति की जमीन को पकड़े रहने की चुनौती होगी। अन्यथा राजनीति से आरंभ होकर ये वेबसीरीज प्रेम त्रिकोण के रास्ते अपराध कथा में बदल जाएगी। ये अच्छी बात है कि बिहार की राजनीति और यहां की आपराधिक पृष्ठभूमि वाले नेताओं पर मनोरंजन की दुनिया का ध्यान गया है। बिहार में इस तरह के पात्रों और घटनाओं की कमी नहीं है। अभी न बने लेकिन भविष्य में इस बात की संभवाना तो है ही कि जब महारानी का चौथा या पांचवा सीजन आएगा तो उसमें नीतीश कुमार के राजनीतिक दांव-पेंच और अलग अलग पार्टियों के साथ सरकार बनाने की घटनाओं पर भी रोचक कहानी कंस्ट्रक्ट होगी। तब इसको देखना और दिलचस्प होगा।