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Wednesday, January 4, 2017

दंगल का सुल्तान कौन ?

तमाम अटकलों को विराम लगाते हुए चुनाव आयोग ने पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव का ऐलान कर दिया है । जिन पांच राज्यों में चुनाव का एलान किया गया है उनमें सबसे अहम है उत्तर प्रदेश जहां चार सौ तीन विधानसभा सीटों के लिए चुनाव ले जाने हैं । इसके अलावा जो राज्य हैं वो हैं पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर । राजनीतिक तौर पर अगर हम देखें तो उत्तर प्रदेश और पंजाब बेहद अहम हैं । उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी में मचे घमासान ने इस चुनाव को और रोचक बना दिया है । चंद दिनों पहले जिस तरह से अखिलेश यादव ने अपने पिता मुलायम सिंह यादव को अपदस्थ कर समाजवादी पार्टी पर अपना अधिकार जमा लिया उसके बाद चुनावी खेल और रोचक हो गया है । अखिलेश यादव और मुलायम सिंह यादव दोनों ने चुनाव आयोग के दर पर दस्तक दी है और खुद को असली समाजवादी पार्टी बताते हुए साइकिल चुनाव चिन्ह देने की मांग की है । इस तरह के मसलों में चुनाव आयोग के पूर्व के फैसलों को देखते हुए यह तय माना जा रहा है कि अगर पिता-पुत्र के बीच सुलह नहीं हुई तो इस विधानसभा चुनाव में साइकिल चिन्ह किसी को नहीं मिलेगा । चुनाव आयोग समाजवादी पार्टी के दोनों खेमों को अलग अलग अस्थायी नाम और चुनाव चिन्ह आवंटित कर सकता है । अखिलेश और मुलायम के झगड़े को लेकर दो तरह के कयास लगाए जा रहे हैं, पहला तो ये कि इस झगड़े का असली फायदा भारतीय जनता पार्टी को होगा और वो लंबे वक्त बाद उत्तर प्रदेश की सत्ता पर काबिज हो पाएगी । राजनीतिक विश्लेषकों का जो दूसरा आंकलन है वो ये कि अखिलेश ने अपने पिता से बगावत कर जनता को ये संदेश दिया है कि वो विकास के एजेंडे पर डटे रहेंगे । शिवपाल यादव को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाकर ये संदेश भी दिया है कि बाहुबलियों के पैरोकारों को अखिलेश बर्दाश्त नहीं कर सकते हैं । शिवपाल ने ही बाहुबलि मुख्तार अंसारी की पार्टी कौमी एकता दल के समाजवादी पार्टी में विलय को बड़ा मुद्दा बना दिया था । संभव है कि अखिलेश को अपनी विकासवादी छवि का फायदा हो । उधर बहुजन समाजवादी पार्टी भी सूबे में सत्ता वापसी के लिए तमाम सियासी दांव चल रही है । नोटबंदी के दौरान पार्टी के खाते में सौ करोड़ से ज्यादा की खबर की जांच को भी मायावती भुनाना चाहती हैं । इसी तरह से वो ये एलान भी कर रही हैं कि इस बार बसपा दलित, मुस्लिम और ब्राह्मण गठजोड़ करके आगे बढ़ना चाहती है । मायावती ने डंके की चोट पर ये एलान किया कि इस बार बसपा ने सत्तानवे मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया है । उनका ये एलान उस दिन सामने आया जिसके एक दिन पहले सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने ये फैसला सुनाया था कि धर्म और जाति के नाम पर वोट मांगना गलत है । वोट के मौसम में किसे सुप्रीम कोर्ट की फिक्र है । दरअसल मायावती को लग रहा है कि इस बार उत्तर प्रदेश के मुसलमान उनको वोट देंगे क्योंकि समाजवादी पार्टी के कमजोर होने से मुसलमान उनकी ओर आएंगें । उत्तर प्रदेश में मुस्लिम वोटरों की संख्या करीब बीस फीसदी है और ये सौ से अधिक विधानसभा क्षेत्रों में निर्णायक होते हैं । लोकसभा चुनाव में एक भी सीट नहीं जीत पाने की कसक भी बसपा के नेत्व में है । इधर अगर देखें तो वहां करीब इक्कीस फीसदी दलित हैं जिनमें करीब बारह फीसदी जाटव और नौ फीसदी हैं । इसके अलावा दस फीसदी ब्राह्मण हैं । मायावती इसी गणित के आधार पर काम कर रही हैं कि अगर मुस्लिम, दलित और ब्राह्मण उनके साथ आ गए तो उनको मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने से कोई रोक नहीं सकता है । उधर बीजेपी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विकासवादी चेहरे को लेकर चुनाव मैदान में हैं । बीजेपी एक साथ समाजवादी पार्टी और बसपा को रोकने में लगी है । वो विकास को मुद्दा बना रही है । लखनऊ में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की विशाल रैली के बाद बीजेपी के हौसले बुलंद हैं । पार्टी अध्यक्ष अमित शाह भी लगातार उत्तर प्रदेश में दौरे कर रणनीति बना रहे हैं । ढाई साल पहले अमित शाह, जब यूपी के प्रभारी थे तो पार्टी को तिहत्तर सीटें मिली थीं ।
पंजाब में दस साल से शासन कर रही अकाली दल और बीजेपी गठबंधन को इस बार कांग्रेस और आम आदमी पार्टी से जबरदस्त चुनौती मिल रही है । पंजाब की एक सौ सत्रह सीटों पर चुनाव होने हैं और कैप्टन अमरिंदर सिंह की अगुवाई में कांग्रेस तो उम्मीद है कि वो दस साल बाद सत्ता में वापसी करेगी लेकिन पार्टी के  सामने सबसे बड़ी चुनौती गुटबंदी है । प्रताप सिंह बाजवा और रजिंदर कौर भट्टल के अलावा मनीष तिवारी और अंबिका सोनी के गुटों में बंटी पार्टी अगर चुनाव के पहले एकजुट नहीं हो पाई तो उसके सत्ता में आने के सपनों पर ग्रहण लग सकता है । आम आदमी पार्टी के नेता अरविंदद केजरीवाल पंजाब में बेहद सक्रिय हैं और वहां उन्होंने ड्रग्स को बड़ा मुद्दा बना दिया है । उनका आरोप है कि ड्रग्स के मसले पर कांग्रेस और अकालियों में मिलीभगत है । ड्रग्स के मुद्दे पर उनको जनसमक्थन मिलता भी दिख रहा है लेकिन पार्टी मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं कर पाई है । कयास इस बात के लगाए जा रहे हैं कि अरविंद केजरीवाल खुद पंजाब के सीएम बनना चाहते हैं । पंजाब की सियासत में जट सिखों का दबदबा रहा है क्योंकि उंची जाति के इकतालीस फीसदी वोटरों में से करीब इक्कीस फीसदी वोटर सिख जट समुदाय से आते हैं । इसी के करीब यानि बाइस फीसदी वोट अन्य पिछड़ी जातियों का है । अनुसूचित जातियों के वोटरों पर भी सभी पार्टियों की नजर रहती है क्योंकि सब मिलाकर इनकी संख्या बत्तीस फीसदी पहुंचती है । पंजाब की राजनीति में डेरों का भी असर होता है, लिहाजा हर दल के लोग डेरों में मत्था टेकते रहे हैं ।

उत्तराखंड में कांग्रेस के सामने अपने किले को बचाने की चुनौती है लेकिन हरीश रावत सरकार और संगठन क बीच जारी तनातनी के बीच उनकी राह मुश्किल लग रही है । उत्तराखंड में सत्तर सीटें हैं और कांग्रेस बहुत कम बहुमत से सरकार में है । माना जा रहा है कि यहां बीजेपी आगे चल रही है लेकिन इसके सामने भी कांग्रेस से पार्टी में शामिल हुए विजय बहुगुणा के लोगों को एडजस्ट करने की चुनौती है । गोवा की चालीस सीटों को लेकर होनेवाले चुनाव में मामला बेहद फंसा हुआ नजर आ रहा है । मनोहर पार्रिकर के गोवा से केंद्र की राजनीति में आने और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से लंबे समय तक जुडे सुभाष वेलिंगकर के अलग होने का असर चुनाव पर पड़ेगा । आम आदमी पार्टी ने वहां ताल ठोंक कर चुनाव तो त्रिकोणीय बना दिया है । आम आदमी पार्टी ने बेहद साफ छवि के ईपीएस अफसर एल्विस गोम्स को अपना उम्मीदवार बनाया है । यहां भी कांग्रेस आंतरिक कलह से जूझ रही है और ऐसा प्रतीत होता है कि वो तीसरे स्थान के लिए चुनाव मैदान में हैं । मणिपुर में नगा विद्रोहियों के उपद्रव के साठ विधानसभा सीटों पर चुनाव करवाना चुनौती भरा काम है । यहां मुख्यमंत्री ईबोबी सिंह के सामने सत्ता बचाने की चुनौती है लेकिन पूर्वात्तर के ज्यादातर राज्य केंद्र में जिस दल की सरकार होती है उसके साथ ही जाती रही है । इस ट्रेंड के मद्देनजर बीजेपी उत्साहित है । पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजे जब आंगे तो ये साफ हो जाएगा कि जनता का मूड क्या है । इससे इस बात के संकेत भी मिलेंगे कि नोटबंदी से लेकर सर्जिकल स्ट्राइक जैसी मोदी सरकार की नीतियों को जनता का कितना समर्थन है । 

1 comment:

सुशील कुमार जोशी said...

इंतजार है दंगल का और सुल्तान का भी । सुन्दर आकलन।