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Sunday, April 12, 2015

देह अधिकार पर विमर्श का आधार

नारेबाजी को तो स्त्री की ईमानदार अभिव्यक्तियों के खिलाफ जानबूझकर स्थापित किया गया और उसे ही स्त्री लेखन का पैमाना बना दिया गया । जो देह विमर्श की पूरी राजनीति, पितृसत्तास्तमक रणनीति के साथ की गई थी, उसने बहुत सी लेखिकाओं को भ्रमित किया । बहुत से लोग, जो गंभीर काम कर सकते थे, इसी की भेंट चढ़ गए । अपनी देह पर निर्णय का अधिकार एक बड़ा मुद्दा है, इसे इतना हल्का नहीं बनाया जा सकता । देह पर निर्णय का अधिकार आसानी से नहीं मिलता ।बिना शिक्षा, बिना आर्थिक आत्मनिर्भरता के यह कितना संभव हो सकेगा !  निर्णय की स्थिति तक आने में आत्मसंघर्ष से भी गुजरना होता है । प्रेम में जिम्मेदारी भी होती है और मनुष्य अपने प्रियजनों को इतनी जल्दी नहीं छोड़ना चाहता है । जल्दी हारना भी नहीं चाहता । सबसे पहले मनुष्य अपनी परिस्थिति को ठीक करना चाहता है जब लगता है कि इसे ठीक नहीं किया जा सकता, तभी दूसरे रास्ते की तरफ बढ़ता है ये कहना है दिल्ली विश्वविद्यालय में शिक्षक और कथाकार अल्पना मिश्र का  । साहित्यक पत्रिका समीक्षा में प्रकाशित अपने साक्षात्कार में जब अल्पना ये बातें कहती हैं तो समकालीन साहित्य में जारी स्त्री विमर्श को वो इशारों इशारों में कठघरे में भी खड़ा करती हैं । अल्पना जब कहती हैं कि नारेबाजी को तो स्त्री की ईमानदार अभिव्यक्तियों के खिलाफ जानबूझकर स्थापित किया गया और उसे ही स्त्री लेखन का पैमाना बना दिया गया । जो देह विमर्श की पूरी राजनीति, पितृसत्तास्तमक रणनीति के साथ की गई थी, उसने बहुत सी लेखिकाओं को भ्रमित किया । यह साक्षात्कारकर्ता की सीमा थी कि वो लेखिका से इस विषय पर गहराई से बात नहीं कर पाई । अल्पना मिश्र ने जो बातें संकेत में कही हैं उसपर उनसे विस्तार से पूछा जाना चाहिए था । तभी सारी बातें और उनकी राय भी साफ हो पातीं ।

उनके साक्षात्कार में बेहद गंभीर बातें हैं और शब्दों का चयन भी बेहद समझदारी से किया गया है जिसपर स्त्री विमर्श के पैरोकारों को अपनी राय स्पष्ट करनी चाहिए । स्त्री विमर्श के नाम पर ए के सैंतालीस लेकर घूम रही लेखिकाओं को भी अल्पना के उठाए सवालों या उनके कथन पर अपनी राय देनी चाहिए, शांत दिमाग से बगैर गोलीबारी किए । स्त्री विमर्श के संदर्भ में अल्पना नारेबाजी.  देह विमर्श की पूरी राजनीति, पितृसत्तास्तमक रणनीति, लेखिकाओं के भ्रमित होने की बात उठाती हैं । ये एक एक शब्द विस्तार से चर्चा की मांग करता है । मेरी समझ में जब अल्पना स्त्री विमर्श में नारेबाजी की बात करती हैं तो वो बिल्कुल सही हैं लेकिन उसको स्थापित किसने किया इसपर साहित्य में बहस होनी चाहिए । विचार पर तो इसपर भी होना चाहिए कि क्या सचमुच पितृसत्तास्तमक रणनीति के तहत इस नारेबाजी को ही स्त्री की ईमानदार अभिव्यक्ति मान लिया गया । अल्पना ने बेहद संजीदगी के साथ अपनी बातें रखीं हैं । अपने उपन्यास के पात्रों के बहाने वो ये सवाल उठाती हैं । हिंदी में स्त्री की देह मुक्ति के आंदोलन के जनक राजेन्द्र यादव आज अगर जीवित होते तो उनकी इस मसले पर राय दिलचस्प होती । राजेन्द्र यादव स्कूल की लेखिकाओं से अपेक्षा की जाती है कि वो इस बहस को आगे बढ़ाएं । अल्पना जब कहती हैं कि स्त्री को अपनी देह के बारे में फैसला करने का अधिकार बहुत मुश्किल से मिलता है, तो वो एक और बड़ा सवाल खड़ा करती हैं । स्त्री विमर्श के नाम पर देह मुक्ति के लिए छटपटा रही लेखिकाओं को भी सामने आकर अल्पना के सवालों से या उनकी राय से मुठभेड़ की अपेक्षा है । दरअसल स्त्री विमर्श के नाम पर देहमुक्ति के खेल ने साहित्य में एक खास किस्म की अराजकता को भी बढ़ावा दिया है । देह मुक्ति शब्द की अवधारणा के पीछे तर्क यह था कि स्त्री अपने शरीर के बारे में खुद फैसला ले सके । समाज में यह स्थिति बने । इसको ही आधार बनाकर पश्चिम में विमर्श की शुरुआत की गई । लेकिन राजेन्द्र यादव ने स्त्री विमर्श में जिस देह मुक्ति को व्याख्यायित किया उसका आधार उच्छृंखलता ज्यादा था । देह मुक्ति और आजादी के नाम पर कुछ लेखिकाओं ने सारी मान्यताओं को छिन्न भिन्न कर दिया । मान्यताएं टूटवने ही चाहिए । परंपराओं को ढोने के कोई फायदा भी नहीं है । लेकिन भ्रम में जीकर तो सिर्फ नुकसान ही हो सकता है । अल्पना ने इसी भ्रम के नुकसान की बात की है । क्या स्त्री विमर्श और देह से आजादी का यह मतलब है कि घर परिवार शादी ब्याह नाते रिश्ते जैसे सारे सामाजिक संस्थाओं को तहस नहस कर दिया जाए । हमारे इस तर्क पर फिर से पितृसत्तात्मक वितार होने का आरोप लग सकता है लेकिन मैं तो सिर्फ सवाल उठा रहा हूं ष उन सवालों को जिन्हें एक लेखिका ने ही उठाया है । देह मुक्ति को अपनी शोहरत और सफलता की सीढ़ी बनानेवालों की पहचान की जानी चाहिए और उस युक्ति पर भी लेखक समुदाय को शिद्दत से विचार करना चाहिए । 

बुद्धिजीवियों की चुभती चुप्पी

मराठी एक ऐसा शब्द ऐसा है जिसको महाराष्ट्र में राजनीति करनेवाले सभी दल लगातार भुनाते रहे हैं और उसको भुनाना रहे हैं और आगे भुनाते रहेंगे । राजनीतिक दलों को लगता है कि मराठी अस्मिता के नाम पर वो जो भी कार्ड खेलेंगे वो तुरुप का इक्का ही होगा । दरअसल सियासी दल अपनी लोकप्रियता को बढ़ाने के लिए बहुधा इस तरह की चाल चलते हैं । कभी कभार अपनी नाकामियों को छुपाने के लिए भी इस तरह के हथकंडे अपनाए जाते हैं । महाराष्ट्र में मराठी और मराठा मानुष के नाम पर राजनीति की एक लंबी परंपरा रही है । स्वतंत्रता बाद की परिस्थितियों में शिवसेना ने इसको काफी भुनाया और राज ठाकरे की राजनीति की तो बुनियाद ही मराठी अस्मिता रही है । हलांकि पिछले चुनाव में महाराष्ट्र की जनता ने इस तरह की राजनीति करनेवालों को उनकी सही जगह दिखा दी । अब इसी मराठी भावना को भुनाने के लिए महाराष्ट्र सरकार ने मल्टीपलैक्स को शाम छह बजे से नौ बजे तक मराठी फिल्में दिखाने का फरमान जारी कर दिया था । यह एक ऐसा फरमान था जिसके खिलाफ बुद्धिजीवियों को मजबूती से उठ खड़ा होना चाहिए था । राजनेताओं से तो अपेक्षा की ही नहीं जा सकती हैं क्योंकि जहां संविधान और वोटबैंक को चुनना होता है तो उनकी प्राथमिकता वोट बैंक होती है । लेखकों की कोई मजबूरी नहीं होती है उनको तो सत्य के साथ खड़ा होना चाहिए । इस बार भी लगभग पूरा लेखक समाज चुप रहा । लेकिन अंग्रजी की लेखिका और पत्रकार शोभा डे ने इसके खिलाफ सोशल मीडिया पर मुहिम शुरू कर दी । उन्होंने ट्वीट कर महाराष्ट्र सरकार के इस फैसले के खिलाफ अपना विरोध दर्ज करवाया । उन्होंने महाराष्ट्र सरकार के इस फरमान पर तंज कसते हुए लिखा कि अब मल्टीप्लैक्स में पॉपकार्न की जगह दही मिसल और वडा पाव मिला करेंगे । इसके अलावा भी उन्होंने कई ट्वीट कर अपना विरोध जताया । शोभा डे के ट्वीट के बाद आगबबूला शिवसेना ने उनके खिलाफ बयानों की झड़ी लगा दी । लेकिन शोभा अपने स्टैंड पर कायम रहीं । इसके बाद तो शोभा डे के खिलाफ शिवसेना के विधायक ने महाराष्ट्र विधानसभा में विशेषाधिकार हनन का नोटिस तक डे डाला लेकिन शोभा टस से मस नहीं हुई । इस बीच शोभा के खिलाफ विरोध प्रदर्शन तेज होने लगे, पुतले फूंके जाने लगे, उसके घर की सुरक्षा बढ़ा दी गई, वडा पाव लेकर शिवसैनिक उनके घर तक जा पहुंचे लेकिन हमारा लेखक समुदाय खामोश रहा । जितनी चिंता की बात सरकार का सिनेमाघरों को मराठी फिल्मों के लिए वक्त तय करना है उससे ज्यादा चिता की बात लेखक और बुद्धिजीवी समुदाय का इसपर खामोश रहना है । यह एक ऐसा सवाल है जिसपर देशभर के लेखकों को विचार करना होगा । गंभीरता से चिंतन और मनन करना होगा । इस तरह की खामोशी एक तरह से सरकारों को बल प्रदान करती है । संविधान के नाम पर शपथ लेकर सत्ताधीश बने नेताओं के हौसले इस कदर बुलंद हो जाते हैं कि वो संविधान की परवाह करना छोड़ने की सोचने लगते हैं । लेकिन एक शोभा डे की पहल ने महाराष्ट्र सरकार को अपना फरमान बदलने के लिए मजबूर कर दिया । भारत में लेखकों और साहित्यकारों के सत्ता और उसके फैसलों के विरोध की एक लंबी परंपरा रही है लेकिन हाल के दिनों में उसका क्षरण रेखांकित किया जा सकता है । आजादी के बाद लेखक समुदाय हर मसले पर अपनी राय रखते थे और उसको प्रकट करते थे । पिछले लोकसभा चुनाव में भी मशहूर कन्नड़ लेखक अनंतमूर्ति ने नरेन्द्र मोदी का विरोध किया था । यह अलहदा बात है कि विरोध करने के लिए उन्होंने जिन शब्दों का चयन किया था वो विवादित था । उन्होंने मोदी के जीतने पर देश छोड़ने की बात कह दी थी जिसपर बाद में उन्होंने सफाई भी दी । राजनीति के आगे मशाल की तरह चलनेवाला साहित्य इन दिनों उसी राजनीति का शिकार हो गया है । सत्य  और चुनिंदा सत्य में जो फर्क होता है उसने साहित्य जगत का बड़ा नुकसान पहुंचाया ।
अगर हम हिंदी साहित्य की ही बात करें तो देखते हैं कि साठ और सत्तर के दशक के बाद से लेखन और विमर्श में तो प्रतिरोध की खूब बातें हुई । सत्ता के विरोध और प्रतिरोध के नाम पर जमकर सत्ता सुख भोगने के मामले भी सामने आए । प्रगतिशीलता, जनवाद आदि आदि जैसे जुमले गढ़कर देश की जनता को गुमराह करने का खेल खेला गया । साहित्य में प्रगतिशीलता की कोई आवश्यकता ही नहीं थी । साहित्य तो खुद प्रगतिशील होता है । दरअसल यह पूरा खेल अपने राजनीतिक आकाओं के इशारे पर खेला गया था । लेखक संघ बनाए गए । जो भी लेखक संघ बने वो किसी ना किसी राजनीतिक दल से जुड़े रहे । उनके बुद्दिजीवी प्रकोष्ट की तरह काम करते रहे । लेकिन जनता के सामने अपना दूसरा चेहरा पेश कर उनको भरमाते रहे । प्रगतिशील लेखक संघ भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का अंग रहा, उसी तरह जनवादी लेखक संघ सीपीएम का बौद्धिक प्रकोष्ट बना रहा । जैसे जैसे वामपंथी पार्टी में विभाजन होते रहे उनके लेखक प्रकोष्ट बनते रहे । जब सीपीएम में विभाजन हुआ तो एक और बौद्धिक प्रकोष्ठ बना उसका नाम पड़ा जन संस्कृति मंच । दरअसल हमारा मानना है कि लेखकों को इन वामदलों ने सिद्धांत, प्रतिरोध, गरीब, दबे, कुचले के नाम पर भ्रमित किया और फिर उनका फायदा उठाया । जब ये लेखक संगठन इन पार्टियों के बौद्धिक प्रकोष्ठ की तरह काम करने लगे तो जाहिर है कि उनके विरोध और प्रतिरोध भी अपने राजनीतिक आकाओं की मुंहदेखी होने लगी । इसका सर्वोत्तम उदाहरण है कि प्रगतिशील लेखक संघ ने इमरजेंसी का समर्थन किया । इस तरह के कई उदाहरण हैं लेकिन इन उदाहरणों का उल्लेख यहां आवश्यक नहीं है । अब तो प्रगतिशील लेखक संघ की हालत यह हो गई है कि वो लेखकों की सहमति के बगैर उन्हें पार्टी के पद बांट रही है । ताजा मामला पश्चिम बंगाल का है जहां कवि राज्यवर्धन को बगैर उनकी जानकारी और सूचना के राज्य इकाई का कार्यकारी अध्यक्ष बना दिया गया । राज्यवर्धन ने फेसबुक पर इस बारे  में लिखकर जानकारी साझा की है ।
पार्टियों के बौद्धिक प्रकोष्ठ बनने का नतीया यह हुआ कि लेखकों ने चुनिंदा सत्य बोलना शुरू कर दिया । चुनिंदा और सुविधानुसार बोला गया सत्य, झूठ से ज्यादा नुकसान पहुंचाता है । इन लेखक संगठनों से जुड़े रचनाकार तस्मीमा नसरीन के मुद्दे पर खामोशी अख्चियार कर लेते हैं लेकिन एम एफ हुसैन के मामले पर जोरदार विरोध शुरू हो जाता है । गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे का विरोध करनेवाले लोग सलमान रश्दी के मामले में खामोश हो जाते हैं । क्या यह एक प्रकार की लेखकीय सांप्रदायिकता नहीं है । कट्टरपंथी हिंदूवादी ताकतों के खिलाफ खड़े होनेवाले लेखक मुस्लिम कट्टरपंथ के खिलाफ बोलने में घबराने लगते हैं । जुबान खामोश हो जाती है । अच्छा इस तरह के लेखकों को लगता है कि अगर वो मुस्लिम कट्टरपंथ के खिलाफ बोलेंगे तो उनको सांप्रदायिक मान लिया जाएगा । सांप्रदायिकता और फासीवाद की आड़ लेनेवाले लेखक उसी का शिकार होते चले गए । इस तरह की प्रवृत्ति लंबे समय तक चलती रही जिसका परिणाम यह हुआ कि लेखकों से लोगों का भरोसा उठता चला गया । लेखक भी सत्ता के हिसाब से अपनी प्रथामिकताएं तय करने लगी । राजनीति के आगे चलनेवाली मशाल सत्ता की पिछलग्गू बन गईं । जब आप सत्ता के पिछलग्गू बनेंगे तो फिर उसके खिलाफ बोलने का साहस का ह्रास होता चला जाएगा । फिर इसकी परिणति शोभा डे जैसे मामले में देखने को मिलेगा । शोभा डे के समर्थन में साहित्य जगत का ना आना चौंकाता नहीं बल्कि उस धारणा को पुष्ट करता है ।
दरअलस अगर हम पूरी गंभीरता से हिंदी के लेखकीय परिदृश्य पर विचार करें तो निराशाजनक तस्वीर सामने आती है । मुक्तिबोध और उनकी कविता की  पंक्ति तोड़ने ही होंगे सारे गढ़ और मठ को नारे की तरह इस्तेामल करनेवाले लेखक गढ़ और मठ में शामिल होने की जुगत में लगे रहते हैं । कोई किसी अकादमी का सदस्य बनना चाहता है तो कोई किसी सरकारी कमेटी में फिट होने के जुगाड़ में लगा रहता है, किसी की ख्वाहिश किसी विश्वविद्लाय के कुलपति बनने की होती है तो कोई पुरस्कार के दंद फंद में जुटा रहता है । ऐसे परिदृश्य में यह अपेक्षा करना बेमानी है कि लेखक सरकारी फैसलों के खिलाफ बोलने की हिम्मत कर पाएंगे । सरकारी संरक्षण की लालसा लिए घूम रहे इस तरह के लेखकों की भीड़ बढ़ती जा रही है । इसकी ऐतिहासिकता में अगर जाएं तो इसके बीज इंदिरा गांधी के शासन काल में दिखाई देते हैं । जब इमरजेंसी पूर्व ही उन्होंने साहित्य और संस्कृति का मसला वामपंथियों को सौंप दिया । इंदिरा गांधी की ये सोची समझी रणनीति थी जिसके वामपंथी शिकार हुए और इसके एवज में वो इंदिरा गांधी का समर्थन करते रहे । अब वक्त आ गया है कि लेखक समुदाय को खासकर हिंदी के लेखकों को साहस के साथ सच बोलना चाहिए वो भी समग्रता में क्योंकि चुनिंदा सत्य ने लेखकों पर से समाज का भरोसा कम कर दिया है । चुनौती उसिी भरोसो को वापस लाने की है ।


Wednesday, April 8, 2015

साहित्य में दर्शन के पैरोकार

हिंदी साहित्य के लिए यह साल कुछ अच्छे संकेत नहीं दे रहा है । कई दिग्गज साहित्यकार हमसे दूर जा रहे हैं । अभी पिछले दिनों वरिष्ठ कथा-आलोचक विजय मोहन सिंह के निधन के सदमे से साहित्य जगत उबरने की कोशिश ही कर रहा था कि अचानक से वरिष्ठ कवि कैलाश वाजपेयी के निधन ने सबको सन्न कर दिया । कैलाश वाजपेयी हिंदी के उन चंद कवियों में से थे जिनके लेखन में वैचारिकी से इतर बातें भी होती थी । उनकी कविताओं में हमारा समृद्ध साहित्य बार बार आता था । कैलाश वाजपेयी ने कभी भी किसी वाद के साथ कदमताल करना स्वीकार नहीं किया । इस वजह से उनको कई मुश्किलों का भी सामना करना पड़ा, लेकिन वो अंत तक डटे रहे । इसी वजह से कैलाश वाजपेयी हिंदी के अलावा दूसरी भाषाओं में समादृत रहे । कैलाश वाजपेयी का अनुभव संसार बहुत ही व्यापक था । वो फिल्मों से लेकर साहित् और कविता से लेकर अन्य विधाओं पर समान रूप से लेखन करते थे । पिछले दिनों एक हिंदी दैनिक में हर सप्ताह फिल्मों से जुड़े उनके संस्मरण छपा करते थे । उन संस्मरणों को पढ़ते हुए फिल्मों में रुचि रखने वाले पाठकों को आनंद मिलता था । हिंदी का इतना वरिष्ठ लेखक और फिल्मों पर लिखे ये बात थोड़ा चौंकाती है । हिंदी में फिल्मों पर लेखन को गंभीर लेखन से इतर माना जाता रहा है । कथित प्रगतिशिील लेखकों का मानना रहा है कि मनोरंजन के साधनों पर लिखना गुनाह है । हिंदी में कमोबेश इस विचारधारा के लेखकों का दबदबा रहा है लिहाजा फिल्मों पर गंभीर लेखन हो नहीं पाया । संस्मरणात्मक लेखन तो और भी कम । लेकिन कैलाश वाजपेयी ने ये जोखिम उठाया और लगातार फिल्मों पर लेखन किया ।

उत्तर प्रदेश के हमीरपुर जिले में उन्नीस सौ छत्तीस में जन्मे कैलाश वाजपेयी ने लखनऊ से स्नातकोत्तर किया । वो अपने छात्र जीवन से ही कविताई में जुट गए थे । कवि गोष्ठियों में उनकी कविताओं की नोटिस ली जाने लगी थी । उन्नीस सौ साठ में उन्होंने टाइम्स ग्रुप में नौकरी की और नुंबई चले गए । लेकिन मुंबई उनको रास नहीं आया और फिर वो दिल्ली विश्वविद्लाय के एक कॉलेज में अध्यापन करने वापस चले आए । यहां उन्होंने लंबे वक्त तक अध्यापन किया । बीच में तीन साल के लिए वो मैक्सिको चले गए जहां वो युनिवर्सिटी ऑफ मैक्सिको में विजिटिंग प्रोफेसर रहे । एक काव्य गोष्ठी में कैलाश वाजपेयी की कविता सुनने के बाद हरिवंश राय बच्चन उनके लेखन पर रीझ गए । बच्चन जी ने कैलाश वाजपेयी को प्रोत्साहन देना शुरू किया और कह सकते हैं कि कैलाश वाजपेयी की प्रतिभा को बच्चन ने ना केवल पहचाना बल्कि उसको तराशा भी । बाद में दोनों के बीच घनिष्ठ संबंध बन गए । इस संदर्भ में एक दिलचस्प प्रसंग याद आता है । कैलाश वाजपेयी जब एक सिख लड़की से प्रेम कर बैठे और उससे शादी करने का एलान कियातो उनके परिवार में बवाल मच गया । परिवारवालों ने उनकी शादी का बहिष्कार कर दिया तो बच्चन जी ने लड़के के परिवार की भूमिका निभाई थी । कैलाश वाजपेयी का पहला संग्रह संक्रात उन्नीस सौ चौंसठ में छपा था । उसके बाद तो कैलाश वाजपेयी की कई किताबें प्रकाशित हुई और उनका नाम साहित्य में प्रमुखता से स्वीकार्य हो गया । दो हजार नौ में उनको प्रतिष्ठित व्यास सम्मान मिला । यह उनकी कृति पृथ्वी का कृष्ण पक्ष नाम की किताब पर मिला । दो हजार नौ में उनको साहित्य अकादमी पुरस्कार हवा में हस्ताक्षऱ - पर मिला । साहित्य अकादमी पुरस्कार पर विवाद हुआ था लेकिन कमोबेश उनका जीवन विवादों से परे रहा । कैलाश वाजपेयी को हिंदी साहित्य में एक ऐसे लेखक के रूप में याद किया जाएगा जिन्होंने अपने लेखन में भारतीय संस्कृति और दर्शन का जमकर उपयोग किया । 

Monday, April 6, 2015

कट्टरपंथियों पर हल्ला बोलना होगा

कोलकाता में एक बार फिर से धर्म के नाम पर हिंसा का खेल खेला गया । एक मदरसे के हेडमास्टर पर उसके स्कूल में घुसकर जानलेवा हमला किया गया । चिंता की बात तो ये है कि पुलिस की मौजूदगी में मासूम अख्तर नाम के इस शख्स पर हमला होता रहा और बंगाल पुलिस खामोशी के साथ असहाय खड़ी रही । मासूम अख्तर का दोष सिर्फ इतना है कि उसने बर्धवान धमाके को लेकर एक लेख लिखा था जिसमें उन्होंने यह संकेत दिया था कि अगर किसी मदरसे से आतंकवाद की घटनाओं को अंजाम दिया जाता है या फिर मदरसे में आतंकवाद को पनाह दिया जाता है तो उसको भंग कर दिया जाना चाहिए । यह बात इस्लामी कट्टरपंथियों के गले नहीं उतरी और इस लेख के बाद मासूम अख्तर को धमकियां मिलने लगीं । फिर बहाना मिला ईशनिंदा का । अपने एक क्लास में मासूम अख्तर मे ऐतिहासिक संदर्भ में पैगंबर मोहम्मद की शिक्षा को लेकर टिप्पणी की । वह टिप्पणी इस संदर्भ में थी बगैर किसी औपचारिक शिक्षा के पैगंबर ने दुनिया में ज्ञान का प्रकाश फैलाया । लेकिन कट्टरपंथियों ने क्लास में दिए मासूम के वक्तव्य को इस तरह से पेश कर दिया कि उसने पैगंबर की शिक्षा पर सवाल खड़े किए । यह बात जंगल में आग की तरह फैली और फिर मासूम अख्तर के स्कूल में घुसकर कट्टरपंथियों ने उनपर लाठी और सरिए से वार किया । अस्पताल में इलाज करा कर घर लौटे मासूम अख्तर को अब भी जान से मारने की धमकियां मिल रही हैं । वो सरकार से गुहार लगा रहे हैं, उनको कार्रवाई का भरोसा मिल रहा है लेकिन स्तंभ लिखे जाने तक हमलावर आजाद घूम रहे हैं । मासूम अख्तर को इस बात का डर है कि उनका हश्र भी बांग्लादेश के उन ब्लागरों जैसा ना हो । पिछले दिनों बांग्लादेश में दो ब्लागरों को कट्टरपंथियों ने मौत के घाट उतार दिया । इसके पहले भी ईशनिंदा के आरोप में पाकिस्तान के सूबे के गवर्नर को भी गोली मार दी गई थी । सलमान रश्दी पर भी यही आरोप है, तस्मीमा पर भी । मासूम अख्तर को भी यही धमकी मिल रही है कि तुम सलमान रश्दी बनना चाहते हो तो सुधर जाओ वर्ना अंजाम भुगतने के लिए तैयार रहो । क्या यह अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला नहीं है । हमारा संविधान किसी भी नागरिक को अपनी बात कहने का हक देता है । इस हक की सीमा वहां तक है जहां कि किसी को नुकसान ना पहुंचे या उसकी प्रतिष्ठा पर आंच नहीं आए । अभी हाल के अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने आईटी एक्ट की धारा 66 ए को खत्म करते हुए भी कहा था कि संविधान में मिली अभिव्यक्ति की आजादी से कोई समझौता नहीं किया जा सकता है । सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि आईटी एक्ट की धारा 66 ए से अभिव्यक्ति की आजादी बाधित होती है लिहाजा उस धारा को रद्द कर दिया । एक तरफ जहां सुप्रीम कोर्ट अभियक्ति की आजादी की रक्षा के लिए भारत सरकार के कानून को रद्द कर दे रहा है वहीं दूसरी ओर एक शख्स अपने इस अधिकार की रक्षा के लिए दर बदर भटक रहा है । बंगाल की ममता सरकार की चुप्पी मासूम के लिए जानलेवा साबिकत हो सकती है ।  उसकी जान खतरे में है लेकिन कोई देखनेवाला नहीं, कोई सुनने वाला नहीं, कोई कानून सम्मत काम करने के लिए आगे आना वाला नहीं । हमारे मजबूत होते लोकतंत्र के लिए यह बहुत ही चिंता का विषय है ।
अब हम मासूम अख्तर के बहाने से अगर इस बात की पड़ताल करें कि क्यों ममता सरकार इस पर सख्ती से पेश नहीं आ रही है । क्यों बंगाल पुलिस त्वरित कार्रवाई कर मासूम के जान की गारंटी नहीं दे पा रही है  । क्यों हमलावरों को गिरफ्तार नहीं किया जा रहा है ? क्यों हमलावरों की खुलेआम पैरोकारी करने वाले इमाम की गिरफ्तारी नहीं हो रही है ? क्यों मासूम अख्तर को सुरक्षा नहीं दी जा रही है ? अगर हम इन सवालों से मुठभेड़ करते हैं तो नतीजे पर पहुंचते हैं कि इसके पीछे सियासी और वोट बैंक की राजनीति है । पश्चिम बंगाल की आबादी में से करीब छब्बीस फीसदी हिस्सा मुसलमानों का है। कई लोकसभा और विधानसभा सीटों पर मुस्लिम मतदाताओं को मत निर्णायक होता है । अब इसी चुनावी गणित की वजह से बंगाल का में राजनीतिक दल कट्टरपंथियों के खिलाफ मुंह खोलने की हिमाकत नहीं कर पाते हैं । पश्चिम बंगाल वामपंथियों का गढ़ रहा है । वामपंथी हमेशा से अपने आपको अभिव्यक्ति की आजादी के पैरोकार के तौर पर पेश करते रहे हैं । मकबूल फिदा हुसैन के चित्रों को लेकर जब विवाद उठा था तो इन वामपंथियों ने आसमान सर पर उठा लिया था । लेकिन यही वामपंथी नेता, विचारक, लेखक उस वक्त खामोश रहे जब पश्चिम बंगाल की सरकार ने बांग्लादेश की निर्वासित लेखिका तस्लीमा नसरीन को वहां से निकाल दिया । वही वामपंथी नेता इलस वक्त भी खामोश हैं जब मासूम अख्तर अपनिी जान बचाने के लिए भागा भागा फिर रहा है ।  उस वक्त आसमान सर पर उठा लेने वाली ममता बनर्जी जब सूबे की मुख्यमंत्री  बनी तो वो तस्लीमा के मसले पर खामोश रहीं । तस्मीमा को अब भी बंगाल में कदम रखवे की इजाजत नहीं है, उसकी किताबों को कोलकाता पुस्तक मेले में बेचे जाने पर अघोषित रोक है । अगर गलती से कोई प्रकाशक तस्मीमा की किताब बेचने लगता है तो वहां हंगामा होता है या हंगामे की कोशिश होती है । तस्लीमा को बंगाल से बाहर करने को लेकर एक मौलाना खुलेआम गरजते हैं कि हां उन्होंने बाहर किया तस्मीमा को लेकिन ना तो वामपंथी नेता और ना ही ममता बनर्जी उसका विरोध करती है, कार्रवाई की बात तो दूर  । वामपंथियों के इसी चुनिंदा विरोध की वजह से उनकी साख रसातल में चली गई । राजनीति में उनके घटते समर्थन का असर साहित्य पर भी दिखा और साहित्य में वामपंथियों की गिरोहबंदी कमजोर पड़ती नजर आने लगी । खैर यह एक अवांतर प्रसंग है जिसपर कई फिर विस्तर से चर्चा होगी ।
मासूम अख्तर के बहाने से एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है वह है देश में अभिव्यक्ति की आजादी का । क्या किसी भी शख्स को वाजिब सवाल उठाने पर जान से मार देने की धमकी मिलेगी या फिर उसे जान से मार दिया जाएगा । क्या भारत में भी कट्टरपंथियों के हौसले इतने बुलंद हो जाएंगे कि उनको कानून का खौफ नहीं रहेगा । क्या वोटबैंक की इस राजनीति को लोकतंत्र को कमजोर करने की इजाजत दी जा सकती है । इन सवालों के आलोक में देशभर में बहस होनी चाहिए । हमारा मानना है कि इस्लाम को मानने वाले सभी कट्टरपंथी नहीं हो सकते हैं । मासूम अख्तर जैसे विवादित मसलों पर मुसलिम इंटलैक्चुअल को सामने आना होगा और उनको सही तस्वीर पेश करनी होगी । अपनिी राय से देश को अवगत करवाना होगा । इस तरह के मसलों पर मुस्लिम बौद्धिक का खामोश रहना कट्टरपंथियों को मौन समर्थन देने जैसा है । इससे यह भी संदेश जाता है कि इस्लाम में कट्टरपंथ है जबकि ऐसा है नहीं । अव्वल तो सभी लोगों को इस तरह के कदमों का और इस तरह की राजनीति का विरोध करना होगा लेकिन अगर इसी धर्म को मानने वाले लोग अंदर से अपनी बात कहेंगे तो उसका दूसरा असर होगा । देश के सियासतदां को लगेगा कि मुसलमानों के बीच भी अलहदा सोच रखनेवाले लोग हैं । इससे उनको यह भी संदेश जाएगा कि वोट बंट सकते हैं । इस संकेत को बाद संभव है कि वो कोई कार्रवाई कर सकें या कम से कम इस दिशा में कोई कदम तो उठा सकें ।

जिस तरह से मुस्लिम बैद्धिकों से अपेक्षा की जाती है कि वो कट्टरपंथियों के खिलाफ बोलें, उठ खड़े हों , उसी तरह से सभी बौद्धिकों को समान रूप से इस तरह की घटनाओं के विरोध में लिखना चाहिए याजिस भी तरीके से हो सके विरोध जताना चाहिए । यह खतरा उठाना होगा । दरअसल हमारे देश के बौद्धिक जगत में वामपंथी विचारधारा के दबदबे ने इस तरह का माहौल बना दिया है कि अगर मुसलमानों के कट्टरपंथ के बारे में लिखोगे तो संघी करार दिया जाएगा । आपकी धर्मनिरपेक्षता पर सवाल खड़े होने लगेंगे । इसी माहौल की वजह से लेखक विचारक इस मसले पर बोलने से कतराते हैं । हिंदी के मशहूर लेखक राजेन्द्र यादव तो हमेशा कहते थे कि मुसलमानों के मसले पर हम क्यों बोलें वो खुद अपने मसलों पर बोलें । दरअसल हमें इस सोच को बदलने की आवश्यकता है । सच को सच कहना ही होगा । वर्ना मासूम अख्तर जैसे शख्स दर बदर भटकते हुए किसी दिन मार दिए जाएंगे और कट्टरपंथियों के हौसले बुलंद होंगे और सियासतदां उनकी कब्र पर वोट की लहलहाती फसल देख कर खुश होते रहेंगे ।       

Sunday, April 5, 2015

स्त्री विमर्श का अछूता प्रदेश

त्रिया चरित्रम पुरसस्य भाग्यम । दैवो ना जानि कुतो मुनष्यम । रजनी गुप्त के नए उपन्यास कठघरे को पढ़ते हुए संस्कृत का ये श्लोक शिद्दत से याद आया । इस उपन्यास की नायिका रत्ना का जो चरित्र रजनी गुप्त ने गढ़ा है वो बेहद जटिल है । उसकी आकांक्षाएं, उसके सपने, उसके इरादे और उसको पूरा करने के लिए उसके फैसले सब बेहद जटिल चरित्र को उबारते हैं । अपने सपनों को पूरा करने के लिए सब कुछ जानते हुए लगातार अपने मन की करती चलती है । स्त्री चेतना का यह एक ऐसा प्रदेश है जिसपर स्त्री विमर्श के नाम पर झंडा डंडा लेकर निकलनेवाली लेखिकाएं जरा कम ही प्रवेश करती हैं । वो नारी स्वातंत्र्य के नाम पर साहित्यक नारेबाजी और लेखों का जुलूस निकालती हैं लेकिन लेकिन स्त्री मन की सचाइयों को उन शोर शराबे में छुपा जाती हैं । रजनी गुप्त ने अपने उपन्यास में बहुत बेबाकी से स्त्री के उस चरित्र को उघाड़ कर रख दिया है । उपन्यास की नायिका रत्ना एक गरीब परिवार से है । सब कुछ जानते बूझते उसने मानसिक रूप से चैलेंज्ड युवक से विवाह करना स्वीकार कर लिया । अब उस स्वीकार के फैसले के पीछे की तात्कालिक वजह अपनी होनेवाली सास की गाड़ी में घूमना, उनका फर्राटेदार अंग्रजी बोलना आदि है लेकिन मूल वजह यह है कि वो अपनी पढ़ाई पूरी कर अच्छी नौकरी करना चाहती है । पढ़ाई और नौकरी का ये सपना उसको अपने परिवार में रहते हुए पूरा होता नहीं दिखता है, लिहाजा यह जानते हुए कि लडका मंदबुद्धि है रत्ना उससे विवाह की हामी भर देती है । जबकि उसकी होनेवाली सास उसको विवाह के प्रस्ताव के बाद भी कहती है- रत्ना खूब अच्छे से सोच समझकर जब भीमन करे अपने मन से फैसला लेना किसी के दबाव में कतई मत आना । किसी की जोर जबरदस्ती से कोई निर्णय कभी भूलकर भी मत लेना वरना जीवन भर पछताती रहेगी । देख, तू मेरे घर की बहू बने, न बने, कोई बात नहींमगर मेरी बेटी तो बन ही सकती है । इसके आगे भी जोर देकर कहती है हमेशा अपने दिल की आवाज सुनना । घर वालों की, बाहर वालों की या किसी के दबाव में कभी मत आना । इतनी साफगोई के बाद भी रत्ना उनके लड़के से शादी करने पर राजी हो जाती है।  बीच में लेखिका ने एक ज्योतिषनुमा मास्साब के चरित्र के बहाने से रत्ना की चाहत को बल देने की कोशिश की है । अंतत:  रत्ना सोचती है कि अपने फटेहाल घर में रहने से तो बेहतर विकल्प यही है कि उनकी सुविधाओं के बीच रहते हुए वह अपना करियर बनाए । वैसे भी उस पति नामक जीव से ज्यादा लेना-देना तो रहेगा नहीं । समय पर खाना पीना दे दो, बस और क्या ? हम तो अपना कैरियर बनाएंगें और अपनी मर्जी से अपना जीवन जिएंगे । यही सब सोचते सोचते उसने उस मंदबुद्धि परंतु अमीर लड़के से शादी करने की हामी भर दी थी । हलांकि शादी के बाद वो अपनी स्थितियों को लेकर सशंकित भी रहती थी । वो सोचती है बिना आगा-पीछा सोचे जब उसने खुद अपने लिए ऐसा जीवन चुना है तोफिर किससे गिला शिकवा कर पाएगी वह और क्यों ?  अपनी सास को लेकर वह पहले ही दिन से सशंकित भी रहती है । पर यह बात समझ से परे है कि जिस लड़की ने अपने करियर के लिए मानसिकरूप से चैलेंज्ड लड़के से शादी करना स्वीकार कर लिया हो वो सालभर के अंदर ही मां बन गईं । क्या सुख सुविधाओं तले उसके करियर का सपना दब गया या कुछ और । इस तरह के कई सवाल ये उपन्यास उठाती है ।
बेटे ईशान के पैदा होने के  बाद रत्ना के जीवन में कई तरह के बदलाव आने शुरू हो जाते हैं । उसे अपनी सास के उस इरादे का पता चल जाता है कि वो अपना वंश चलाने के लिए उसको अपने घर की बहू बनाकर लाई थी । ईशान के पैदा होने के बाद उसकी दादी अपने पोते को लेकर पजेसिव हो जाती है और ये बहुधा सास-बहू के बीच विवाद की वजह भी बनती है । परिवार में विवाद बढ़ता है तो उसकी परिणति रत्ना के लिए घर में बुटीक खोलने में होती है । रत्ना की मेहनत से बुटीक का कामकाज चल पड़ता है और ग्राहकों की बढ़ती संख्या के मद्देनजर वहां कर्माचारियों की जरूरत होती है । यहां एक बार फिर से कहानी में जबरदस्त नाटकीय मोड़ आता है । रत्ना जब अपने मां-बांप के घर में रहती थी तो उसका पुराना प्रेमी रामकिशन बूटिक में नौकरी के लिए नमूदार होता है । उसके पुराने प्रेमी होने का संकेत मुफलिसी के दौर में तोहफे में घड़ी देने के प्रसंग से मिलता है । फिर साथ काम करने के दौरान प्रेम का अंकुर फिर से फूटने लगता है । अपने नौकर के साथ प्रेम को लेकर रत्ना का अपने सास ससुर से झगड़ा शुरू हो जाता है । इन विवादों के बीच रत्ना के विवाहेत्तर संबंध को जायज ठहराने के लिए अचानक से वो अपने पति की अप्राकृतिक यौनाकांक्षा के बारे में सोचकर सिहरने लगती है । इन तमाम विवादों के बीच रत्ना के मंदबुद्धि पति की अनुपस्थिति भी लगातार महसूस की जाती है । जब रत्ना विवाहेत्तर संबंध में आगे बढ़ती है और प्रेम देह में प्रवेश करता है तो पति की अप्राकृतिक यौन रुचि के संकेत के वक्त उसका उल्लेख मात्र होता है । यह स्त्री विमर्श का एक ऐसा चेहरा है जिसपर आनेवाले दिनों में जमकर विमर्श की गुंजाइश नजर आती है । वो अपने पुराने प्रेमी के साथ खुल्लमखुल्ला प्यार करती है, लांग ड्राइव पर जाती है, घंटों फोन पर बतियाती है, देह संबंध बनाती है । इससे आजिज आकर उसके सास ससुर अखबार में इश्तेहार देकर रत्ना से अपने को अलग कर लेते हैं । एक दिन अचानक रत्ना की सास की हत्या हो जाती है । उसका प्रेमी आपसी बातचीत में बुढिया को रास्ते से हटाने की बात कई बार कह चुका था । हत्या के बाद मौका ए वारदात पर उसका तौलिया मिलता है । उसको वहां से भागते उसका मासूम बेटा ईशान देख लेता है । लेकिन वो अपने बेटे को चुप रहने की नसीहत देती है । अपने प्रेमी को बचाने के लिए पति के मां की हत्या की बात को दबा देना ।
रत्ना नाम की इस स्त्री की कहानी के बहाने रजनी गुप्त भारत के जेलों में रह रही महिलाओं की बुरी स्थितियों पर भी साथ साथ बात करते चलती हैं । उपन्यास का शीर्षक भी है कितने कठघरे । उपन्यास को पढ़ने के बाद शीर्षक इस मायने में सार्थक लगता है कि वो स्त्रियों के समाजिक कठघरे की बात करता है । जेल और जेल में बंद महिलाओं की दुर्दशा को भी उन्होंने रत्ना की कहानी से ही जोड़ा है । वांछा नाम की एक लड़की रत्ना को आजादी दिलाना चाहती है जो संयोग से उसके बेटे ईशान की मंगेतर है । वांछा जेल में उससे मिलती है और फिर कहानी धीरे धीरे खुलती जाती है । और जब कहानी खुलती है तो जेल जीवन की मार्मिक दास्तां भी सामने आती है । हिंदी उपन्यासों से हमेशा से ये शिकायत रहती है कि लेखक डिटेलिंग में नहीं जाते हैं लेकिन रजनी गुप्त ने अपने इस उपन्यास में उस धारणा को निगेट किया है । रजनी ने बहुत सूक्ष्मता के साथ और आंकड़ों के आधार पर जेल जीवन की भयावह तस्वीर पेश की है । ऊपर से देखने पर यह उपन्यास जेल जीवन का आख्यान लगता है लेकिन दरअसल यह उपन्यास जेल जीवन के बहाने स्त्री विमर्श का एक ऐसा छोर पकड़ता है जिसका सिरा अब तक इस विमर्श के पैरोकारों से छूटता रहा है । हो सकता है आने वाले दिनों में रजनी गुप्त के इस उपन्यास के बहाने स्त्री विमर्श के इस अबतक छूटे प्रदेश पर चर्चा हो ।

Thursday, April 2, 2015

अहम नहीं अहमियत की लड़ाई

दिल्ली में आम आदमी पार्टी में मचे सिसायी घमासान और प्रशांत भूषण, योगेन्द्र यादव, प्रोफेसर आनंद कुमार और अजीत झा को राष्ट्रीय कार्यपरिषद से बाहर करने के बाद अचानक से राजनीतिक टिप्पणियों और टिप्पणीकारों की बाढ आ गई है । आरोपों प्रत्यारोपों के बीच कई राजनीतिक विश्लेषक इस बात की डफली बजा रहे हैं कि आंदोलन ने एक बार फिर से जनता को ठग लिया । अलग तरह की राजनीति का दावा करनेवाले केजरीवाल भी वैसे ही निकले । आमआदमी पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र नहीं है और जो केजरी कहे वही सही जैसे जुमले भी सुनने को मिले । कई राजनीतिक विश्लेषकों को तो यह कहते हुए भी सुना गया कि केजरीवाल ने जिस तरह से जनता का भरोसा तोड़ा है उसने एक बार फिर से भारत में जनांदोलन के उभार की संभावनाओं को खत्म कर दिया है । उनके तर्क हैं कि उन्नीस सौ सतहत्तर में जेपी आंदोलन के बाद बनी सरकार ने जनता का भरोसा तोड़ा । अपने तर्क के समर्थन में वो जनता सरकार के पतन को गिनाते हैं और कहते हैं कि मुरारजी देसाई की सरकार ढाई साल से ज्यादा नहीं चल पाई । उस वक्त भी जनता पार्टी के नेताओं की महात्वाकांक्षाएं इतनी बढ़ गई थीं कि पार्टी और सरकार उसका बोझ नहीं संभाल पाई । इसके अलावा यह भी याद दिलाया जा रहा है कि उन्नीस सौ नवासी में भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन कर जनता को एकजुट कर सरकार बनानेवाले विश्वनाथ प्रताप सिंह भी सरकार नहीं चला पाए और उनके भी नेताओं की महात्वाकांक्षाओं के टकराव के चलते जनता दल के साथ सरकार भी डूब गई । इन दोनों ऐतिहासिक राजनीतिक घटनाओं के आलोक में अब आम आदमी पार्टी के घटनाक्रम की तुलना की जा रही है । इन्हीं तर्कों के आधार पर अरविंद केजरीवाल की नैतिकता पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं । कल तक जो पॉलिटिकल पंडित योगेन्द्र यादव और प्रशांत भूषण के खिलाफ बोलते नहीं थक रहे थे आज वही उनसे हमदर्दी दिखाने में लगे हैं । कुछ कुछ वैसे ही जैसे करीब डेढ दो साल पहले जब बीजेपी में नरेन्द्र मोदी का उदय हो रहा था तो कुछ राजनीतिक पंडितों को आडवाणी अच्छे लगने लगे थे । जबकि वही लोग नब्बे के दशक में आडवाणी को सांप्रदायिक या हार्डलाइनर आदि आदि कहते नहीं थकते थे । दरअसल हमारे राजनीतिक विश्लेषकों को इतिहास बोध थोड़ा कम है वो अपनी राय तात्कालिकता के आधार पर बनाते हैं और फिर उसको अपने लेखों में पिरोकर पेश कर देते हैं । टेलीविजन पर बैठनेवाले विशेषज्ञों को तो कुछ भी कहकर बच निकल जाने की छूट होती है । राजनीति विश्लेषकों को याद दिलाना जरूरी है कि उपरोक्त दोनों उदाहरण आम आदमी पार्टी के घटनाक्रम से मेल नहीं खाते हैं । जनता पार्टी और जनता दल की सरकारें दोनों बेमेल संभावनाओं का संगम था, जबकि आम आदमी पार्टी एक विचार की पार्टी है । जेपी की शख्सियत ने भले ही सबको एक छतरी के नीचे ला खड़ा किया था लेकिन नेताओं के विचारधारा की दीवार टूट नहीं पाई थी । विचारधारा की उसी दीवार, मुरारजी देसाई की जिद और जेपी को लेकर उनके मन में नफरत, जनता पार्टी के प्रयोग को विफल कर रही थी। दरअसल जेपी से मुरारजी की चिढ़ पुरानी थी । 27 अगस्त उन्नीस सौ अठहत्तर में रविवार पत्रिका में संतोष भारतीय ने इसपर विस्तार से लिखा है और बताया है कि कैसे गुजरात छात्र आंदोलन के दौरान जब जेपी की लोकप्रियता और स्विीकार्यता बढ़ी को मुरारजी ने उसको गिराने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी थी । एक बार तो मुरार जी के बयान से खिन्न होकर जेपी ने गुजरात जाने से मना कर दिया था तब नारायणभाई देसाई ने जेपी को समझाबुझाकर वहां ले गए थे । इस संदर्भ में यह बताना आवश्यक है कि प्रसिद्ध अर्थशास्त्री शुमाकर जब उस वक्त के प्रधानमंत्री मुरारजी देसाई से बात कर रहे थे और बातचीत के क्रम में जब उन्होंने जेपी की तारीफ की तो मुरारजी देसाई भड़क गए और उनकी बात को काटते हुए कहा था कि ही हैज डन नथिंग ( उन्होंने कुछ नहीं किया ) । इन प्रसंगों से साफ है कि मुरारजी देसाई के मन जेपी को लेकर कितनी घृणा थी । जेपी को अंधेरे में रखकर मुरार जी भाई को देश का प्रधानमंत्री बनाया गया था, यह एक ऐतिसाहिसक तथ्य है । बावजूद इसके जेपी, मुरारजी के खिलाफ लगभग दो साल तक खामोश रहे थे । यह मुरारजी देसाई की काबिलियत (?)थी कि जिस इंदिरा गांधी को जनता ने सतहत्तर में सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा दिया था उसी इंदिरा को ढाई साल बाद गाजे बाजे के साथ प्रधानमंत्री की गद्दी पर बिठा दिया । उदाहरण अगर देना ही हो तो मुरार जी देसाई की चिढ़ की समानता को देखने की कोशिश करनी चाहिेए । दूसरा उदाहरण विश्वनाथ प्रताप सिंह के वक्त का दिया जा रहा है कि उन्नीस सो नवासी में जनता ने विश्वनाथ प्रताप सिंह में जो भरोसा दिखाया था वह भी टूटा । सिंह की सरकार भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई ।  यहां उदाहरण तो ठीक दिया जा रहा है लेकिन संदर्भ गलत है । विश्वनाथ प्रताप सिंह के दौर को भी अगर याद करें तो उस वक्त भी विपक्ष में ऐसे नेताओं की भरमार थी जिनके पास वैकल्पिक राजनीति का नक्शा हर वक्त मौजूद रहता था । विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार के वक्त भी सिद्धांतवादी नेता का चोला ओढ़नेवाले उनकी खिंचाई किया करते थे । उस वक्त भी यह साबित हुआ था कि राजनीति सैद्धांतिकी से नहीं सादगी और ईमानदारी से चलती है । विश्वनाथ प्रताप सिंह कूी सरकार अपने अंतर्द्वदों से गिरी थी लेकिन केजीवाल सरकार के कोई अंतर्दवंद्व नहीं है । किसी और दल के समर्थन की वैसाखी पर वो नहीं टिकी हुई है ।  जिस तरह से विश्वनाथ प्रताप सिंह के पास सादगी और ईमानदारी का नैतिक बल था उसी तरह की ईमानदारी और सादगी को देखते हुए दिल्ली की जनता ने अरविंद केजरीवाल को सरकार चलाने के लिए प्रचंड बहुमत दिया । आजादी के बाद के लोकतांत्रिक इतिहास की सबसे बड़ी जीत मिली है केजरीवाल को । यहां यह समझने की जरूरत है दिल्ली की जनता ने आम आदमी पार्टी को वोट नहीं दिया, दिल्ली की जनता ने योगेन्द्र यादव, प्रशांत भूषण, शांति भूषण के चेहरे पर वोट नहीं दिया। दिल्ली की जनता ने भरोसा दिखाया अरविंद केजरीवाल पर और उनके दिखाए सपनों पर । अब पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र की बात करके, पारदर्शिता की बात करके दरअसल कुछ लोग पार्टी में अपनी अहमियत साबित करने में जुटे हैं । इसको अहम की नहीं अहमियत की लड़ाई कहा जा सकता है । योगेन्द्र यादव तो मंथन के बाद निकले विष के बाद भी अमृत की आशा कर रहे हैं । प्रशांत भूषण और योगेन्द्र यादव की जोड़ी के बयानों से अरविंद केजरीवाल की छवि पर कोई फर्क पड़ेगा इसमें संदेह है । दिल्ली की जनता को इससे कतई मतलब नहीं है कि पार्टी का राष्ट्रीय संयोजक कौन है या कौन होगा । उसके लिए केजरीवाल की अहमियत है और उसकी नजर केजरीवाल के वादों और उनके कामों पर रहेगी । जिस तरह से केजरीवाल ने बिजली और पानी पर आनन फानन में अपने वादे को पूरा किया उसको चलाए रखने की चुनौती है । जनता की अपेक्षा है कि दिल्ली भ्रष्टाचार मुक्त हो और यहां महिलाएं बेखौफ होकर बाहर निकल सकें । चुनावों में केजरीवाल ने पूरी दिल्ली में सीसीटीवी लगाने और बसों में मार्शल तैनात करने का वादा किया था उस वादे को पूरा करने का वक्त है । जून में जब सरकार अपना पूर्ण बजट पेश करेगी तो चुनाव के दौरान किए गए वादों पर उनके इरादों का पता चलेगा ।
करीब तीन साल पुरानी पार्टी पर यह आरोप लग रहा है कि वहां आंतरिक लोकतंत्र नहीं है और विरोध के स्वर को दबा दिया जाता है । दरअसल आंतरिक लोकतंत्र बहुत ही सब्जेक्टिव है । क्या अराजकता को आंतरिक लोकतंत्र माना जा सकता है । वोटिंग से फैसला लेने से बेहतर आंतरिक लोकतंत्र का उदाहरण और क्या हो सकता है । शनिवार को पार्टी के नेशनल काउंसिल से जब प्रशांत भूषण, योगेन्द्र यादव, आनंद कुमार और अजीकत झा को निकालने का फैसला लिया गया तब भी वोटिंग की बात सामने आई । यह अलहदा है कि योगेन्द्र यादव ने बाहर निकलकर लोकतंत्र की हत्या का जुमला उछाला । पार्टी के दोनों खेमों से जिस तरह की बात सामने आई वह अच्छा संदेश नहीं दे रही है लेकिन जिस तरह से अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी के नेताओं के तरह तरह के स्टिंग लाकर भ्रम फैलाने की कोशिश हुई वह भी अच्छा संकेत नहीं है । यह राजनीति का निम्नतम स्तर है।  आम आदमी पार्टी से चारों को निकालने के बाद अब केजरीवाल सरकार के सामने दिल्ली को बेहतर बनाने की जबरदस्त चुनौती है । उनके सामने शिक्षा को दुरुस्त करने से लेकर राशन की दुकानों और वृद्धा और विधवा पेंशन में घपले को रोकने का भी काम है । दिल्ली में इस तरह के घपलों का जबरदस्त रैकेट सालों से चल रहा है लेकिन उसपर लगाम नहीं लगाया जा सका है । दिल्ली के स्कूलों में जिस तरह से एडमिशन के वक्त मारामारी होती है उसके मद्देजर सरकारी स्कूलों की संख्या और वहां पढाई की गुणवत्ता बढ़ाना केजरीवाल सरकार के सामने इतनी बड़ी चुनौती है जिसपर फौरन ध्यान देने की जरूरत है । दरअसल अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली की जनता की अपेक्षाएं इतनी ज्यादा बढ़ा दी हैं कि वो किसी भी सरकार के लिए परेशानी का सबब हो सकती है । उसको पूरा करने के लिए, गरीबों और मेहनतकशों में जिस तरह की नई आशा का संचार हुआ है उसको पूरा करने के लिए अगले कम से कम दो साल सारे संसाधन गरीबों के हितों में लगाने होंगे । केजरीवाल ने राजनीति की जिस काली कोठरी में कदम रखा है उससे बेदाग बचकर निकल जाना भी बड़ी चुनौती है । राजनीति में विचारधारा के संघर्ष का स्वागत किया जाना चाहिए लेकिन अंत सिर्फ एक वाकए से करना चाहूंगा जो खुद बहुत कुछ कह जाती है । शनिवार को ही टैक्सी से घर लौट रहा था । ड्राइवर से पूछा कि दिल्ली में सरकार कैसी चल रही है और प्रशांत और योगेन्द्र के मसले पर मचे घमासान का क्या असर होगा तो उसने कहा कि सर ये बड़ी बड़ी बातें आपलोग जानो हमें तो सिर्फ ये चाहिए कि पुलिसवाला उगाही ना करे और अपनी कमाई से जब हम दाल रोटी सब्जी खरीदने जाएं तो वो खरीद सकें । यही अपेक्षा केजरीवाल की चुनौती है । 


Wednesday, April 1, 2015

‘बंच ऑफ थॉट्स’ एक

पिछले साल अक्तूबर में लखनऊ में हुई राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के कार्यकारी मंडल की बैठक से संदेश निकला था कि संघ की कल्पना को साकार करने का उचित समय आ गया है, अब जरूरत इस बात की है कि संगठन का कार्य तेजी से और विवादास्पद मुद्दों पर सावधानी से चला जाए ताकि केंद्र की मोदी सरकार को किसी तरह की कोई असुविधा ना हो । कुछ इसी तरह की बात पिछले महीने संघ की नागपुर में हुई प्रतिनिधि सभा की बैठक से भी निकल कर आई । वहां भी कहा गया कि किसानों के मुद्दे पर संघ, भारतीय किसान मंजदूर संगठन की चिंताओं से वाकिफ है, उसपर सरकार से बातचीत होगी । संघ का मानना है कि मोदी सरकार अभी नई है लिहाजा उसको काम करने का कुछ वक्त दिया जाना चाहिए । इन दो बैठकों से जो सूत्र समान्य रूप से निकल कर आते हैं वो ये हैं कि संघ और बीजेपी में कई मुद्दों पर मतभेद हैं लेकिन संघ सावधानी से इन मुद्दों को पीछे रखकर अपने विस्तार पर जोर देने की कोशिशों में लगा है । दरअसल अगर हम देखें तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी की बुनियादी अवधारणाएं एक हैं । दोनों ही हिंदुत्व से लेकर राष्ट्रवाद तक एक ही विचारधारा के पोषक हैं । फर्क है तो बस उसके अप्रोच में । अगर हम इकोनॉमी की बात करें तो संघ स्वदेशी मॉडल को अपनाना चाहता है, बीजेपी भी कुछ इसी तरह की बात करती रही है । 1992 के नेशनल एक्जीक्यूटिव में बीजेपी ने एक प्रस्ताव पास किया था जिसमें साफ तौर पर कहा गया था कि उन्हें उदारवादी नीतियां मंजूर हैं लेकिन आत्मनिर्भरता के साथ । संघ बगैर किसी अगर मगर के स्वदेशी की वकालत करता है । इस मसले पर दोनों के बीच का झगड़ा इतना बढ़ा था कि 1998 में भारतीय किसान मजदूर संघ और स्वदेशी जागरण मंच ने वाजपेयी सरकार पर जन विरोधी और स्वदेशी विरोधी होने का आरोप तक लगाया  था । दो हजार एक में तो विवाद इतना बढ़ गया कि बीएमएस के नेता दत्तोपंत ठेगड़ी ने उस वक्त के वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा को क्रिमिनल तक करार दे दिया था । इन झगड़ों से सबक लेते हुए इस बार संघ ने सावधानी से आगे बढ़ने का फैसला लिया है ताकि झगड़ा सावर्जनिक रूप से उजागर ना हो पाए । मोदी सरकार खुले आम खुली अर्थव्यवस्था की पैरोकारी कर रही है लेकिन स्वदेशी की वकालत करनेवाला संघ खामोश हैं । इंश्योरेंस सेक्टर में 49 फीसदी विदेशी निवेश से लेकर नए भूमि अध्ग्रहण बिल में किसानों की अनदेखी के मुद्दे पर भी संघ को ज्यादा दिक्कत नहीं हो रही है । इसके मूल में अपने संगठन की विस्तार है और उसकी नजर 2020 में अपने सौ साल पूरे होने तक कमोबेश अपना एजेंडा लागू करने का लक्ष्य है । 
अब अगर धर्मांतरण और घर वापसी जैसे मुद्दों को देखें तो संघ इस मुद्दे पर रैडिकल अप्रोच रखता है लेकिन बीजेपी उसके अप्रोच को एंडोर्स नहीं करती है । बीजेपी को पता है कि भारत का वृहत्तर हिंदू समाज इस तरह की आक्रामकता को पसंद नहीं करती है । संघ अपनी सैद्धांतिकी को लेकर आगे बढ़ना चाहता है और बीजेपी व्यावहारिकता के साथ । सरकार सैद्धांतिकी से नहीं चलती है और संगठन को चलाने के लिए सैद्धांतिकी जरूरी है । लिहाजा यहीं से मतभेद शुरू होता है या फिर दिखाई देने लगता है। घर वापसी और बापू के हत्यारे गोडसे की मूर्ति जैसे मुद्दे पर पीएम मोदी अपनी नाराजगी जताते हैं लेकिन संघ और उसके अनुषांगिक संगठन इस एजेंडे से हिलने को तैयार नहीं हैं । संघ को लगता है कि इन मुद्दों से हटते ही उसके कोर समर्थक उससे छिटकने लगेंगे लिहाजा उसको बनाए रखने के लिए उग्र हिंदुत्व की बयानबाजियां होती रहती हैं । अब अगर भारत में बांग्लादेशी मुसलमानों के मुद्दे को लेकर ही संघ और बीजेपी के स्टैंड को देखें तो यह साफ होता है कि इलस मुद्दे पर दोनों के अप्रोच अलग है । संघ जहां बांग्लादेशी मुसलमानों को देश से निकाल बाहर करने की मांग बेहद आक्रामक तरीके से करता है, वहीं बीजेपी संभलकर आगे बढ़ना चाहती है, बढ़ती भी है । सरकार में आने के बाद उसे पता है कि करीब तीन-चार करोड़ बांग्लादेशी मुसलमानों को एकदम से वापस नहीं भेजा जा सकता है ।

इसी तरह से अगर अनुच्छेद 370 और कॉमन सिविल कोड के मुद्दे पर भी बीजेपी ने लचीला रुख अपनाया तो संघ परोक्ष रूप से उसके साथ है । कश्मीर में मुफ्ती के साथ सरकार बनाने को लेकर संघ के कट्टर समर्थकों में घोर निराशा है । वो कोई भी तर्क सुनने को तैयार नहीं है । इस खतरे को उठाते हुए भी संघ कहता है कि कश्मीर में एक प्रयोग किया गया है और उसके नतीजों का इंतजार करना चाहिए। हां इतना अवश्य है कि संघ इन मुद्दों पर अब इससे आगे बढ़ने का खतरा नहीं उठा सकता है, क्योंकि आम स्वयंसेवकों को लगने लगा है कि बीजेपी ने कश्मीर पर श्यामा प्रसाद मुखर्जी की शहादत पर समझौता कर लिया है । बीजेपी और संघ में थोडी बहुत मतभेद आदि दिखाई देते रहेंगे लेकिन दोनों के बंच ऑफ थॉट्स एक हैं । एक और अहम मुद्दा है शिक्षा का । इस मसले पर भी थोड़ी बहुत खींचतान दिखाई देती है लेकिन कमोबेश एजेंडा संघ का ही चलता है जबतक कि व्यावहारिकता आड़े ना आए । स्कूलों में जर्मन की जगह संस्कृत । आईसीएचआर से लेकर अन्य सरकारी संगठनों में संघ के कार्यकर्ताओं की नियुक्तियां आदि ऐसे मुद्दे हैं जिसपर सरकार उदार है लेकिन इस उदारता के बदले वो सरकारी नीतियों पर अपनी चलाने की छूट चाहते हैं । जो उन्हें हासिल भी है । वाजपेयी के दौर में जिस तरह से संघ और पार्टी आमने सामने आ गई थी उसके आसार इस बार कम हैं क्योंकि संघ को लगता है कि नरेन्द्र मोदी की कट्टर, निर्णायक हिंदुत्ववादी छवि उसके लिए लाभदायक है और थोड़े बहुत समझौते के साथ इसको बरकरार रखा जाना चाहिए । 

Sunday, March 29, 2015

अलविदा विजय मोहन सिंह

हिंदी कथा साहित्य की आलोचना को लेकर पिछले लगभग एक दशक या उससे ज्यादा वक्त से समकालीन आलोचना में बहुत शिद्दत से या कह सकते हैं कि योजनाबद्ध तरीके से काम नहीं हुआ है । कथालोचना को लेकर लेखकों ने कई बार सवाल भी उठाए हैं, आलोचना पद्धति को कठघरे में खड़ा भी किया गया है । यह सही भी है कि क्योंकि समकालीन परिदृश्य में गंभीरता के साथ कहानी और उपन्यास पर काम करनेवाले आलोचक कम ही दिखाई देते हैं । पुस्तक समीक्षा को हिंदी आलोचवना माल लेने या मनवा लेने की एक जिद दिखाई देती है । हिंदी कथा साहित्य पर नामवर सिंह, देवीशंकर अवस्थी, सुरेन्द्र चौधरी, मलयज के अलावा विजय मोहन सिंह ने गंभीरता से विचार किया । मलयज अपेक्षाकृत कम चर्चित रहे जिसके साहित्येत्तर कारण थे । कथा आलोचना के एक प्रमुख हस्ताक्षर और कहानीकार,उपन्यासकार , संपादक विजयमोहन सिंह का गुजरात में निधन हो गया । उनके निधन से आलोचना की दुनिया में सन्नाटा और बढ़ गया । विजय मोहन सिंह ने साहित्य की दुनिया में कहानी के मार्फत प्रवेश किया था और उनकी कई कहानियां खासी चर्चित रही थी । साढोत्तरी कहानी के दौर में उन्होंने जो कहानियां लिखी उसने उस वक्त की कहानी को एक नई दिशा देने में अपना सार्थक योगदान किया था, हलांकि एरक कहानीकार के तौर पर विजय  मोहन सिंह का मूल्यांकन नहीं हो पाया है । संभवत अब किसी की नजर उनपर जाए औप कहानीकार विजय मोहन सिंह का मूल्यांकन हो सके । बाद में विजय मोहन सिंह ने एक उपन्यास कोई वीरानी से वीरानी है भी लिखी लेकिन इस उपन्यास से भी उनको कोई ख्याति नहीं मिली । विजय मोहन सिंह के कई कहानी संग्रह भी प्रकाशित हुए जिनमें शेरपुर पंद्रह मील सबसे ज्यादा चर्चित रहा । विजय मोहन सिंह ने बाद में अज्ञेय पर गंभीरता से विचार किया जिसकी परिणति अज्ञेय कथाकार और विचारक नाम की किताब में हुई । इसके अलावा विजय मोहन सिंह ने हिंदी उपन्यासों में प्रेम की परिकल्पना और आज की कहानी नाम की दो महत्वपूर्ण किताबें लिखीं ।

बिहार के शाहाबाद में एक जनवरी उन्नीस सौ छत्तीस को जमींदार परिवार में पैदा होनेवाले विजय मोहन सिंह ने बनारस से शिक्षा ग्रहण किया । साहित्य में ये चर्चा होती रही है कि विजय मोहन सिंह का परिवार इतना समृद्ध था कि जब वो पढ़ने के लिए बनारस आए तो उनके लिए वहां एक घर खरीदा गया जहां रहकर बाबू साहब ने पढ़ाई की। कई बार विजय मोहन सिंह के व्यक्तित्व में उनकी या पारिवारिक पृष्ठभूमि  की सामंती प्रवृत्ति दृष्टिगोटर भी होती थी । विजय मोहन सिंह कहीं लंबे समय तक टिककर नहीं रहे और अपने जीवन काल में उन्होंने कई जगह नौकरियां की । बिहार के आरा से लेकर हिमाचल प्रदेश और दिल्ली के कॉलेजों में अध्यापन किया । उन्होंने बिहार से निकलनेवाली ऐतिहासिक पत्रिका नई धारा का भी कई सालों तक संपादन किया । विजय मोहन सिंह ने दिल्ली की हिंदी अकादमी के सचिव का पद भी संभाला । हिंदी साहित्य के जानकारों का कहना है कि हिंदी अकादमी में विजय मोहन सिंह का कार्यकाल बेहतर रहा था । उन्होंने इस संस्था को सरकारी ढर्रे से मुक्त कर उसको साहित्य की मुख्यधारा में लाने की कोशिश की थी । उनके समय में हिंदी अकादमी की पत्रिका इंद्रपस्थ भारती भी चर्चित हो गई थी। उन्होंने अकादमी से कई महत्वपूर्ण लेखकों को जोड़ा और कई संग्रह प्रकाशित करवाए । अब हिंदी की स्थिति की कल्पना करिए कि अकादमी के सचिव से जो अपेक्षा की जाती है उस काम को कर देने भर से वो स्वर्णकाल हो जाता है । तो अगर सचमुच में पहल आदि लेकर महत्वपूर्ण काम किए जाते तो वो कौन सा काल होता । खैर ये एक अवांतर प्रसंग है इसपर फिर कभी विस्तार से चर्चा होगी । फिलहाल इतना तो कहा ही जा सकता है कि विजय मोहन सिंह के जाने से हिंदी आलोचना का कोना और सूना हो गया है ।  

राजभाषा पुरस्कारों की बंदरबांट

हिंदी में पुरस्कारो की हालत बेहद विवादित रही है । खासकर सरकारी साहित्यक पुरस्कारों की हालत तो और भी बदतर है । पिछले दिनों बिहार सरकार के राजभाषा पुरस्कारों के एलान पर भारी विवाद हुआ है । निर्णायक मंडल की एक सदस्य ने आरोप लगाया है कि एक अफसर ने सूची बनाई और उस पर दस्तखत करने का दवाब डाला गया । निर्णायक मंडल के अध्यक्ष प्रोफेसर नामवर सिंह का एक बयान अखबारों में छपा है जिसमें उन्होंने कहा है कि उन्होंने तो पुरस्कारों की सूची भी नहीं देखी है । इन विवादों के बीच राजभाषा विभाग के निदेशक का भी एक बयान आया है जो काफी आपत्तिजनक और हिंदी साहित्य को अपमानित करनेवाला है । बिहार राजभाषा विभाग के निदेशक रामविलास पासवान ने कहा है कि हम सभी चयनित लोगों को पत्र भेजेंगे, जिनको लेना होगा वो लेंगे और जो नहीं लेंगे तो हम क्या करें । पुरस्कार नहीं लेंगे तो पैसा बचेगा ही और वो पैसा जनहित के काम आएगा । अब इस तरह के गैरजिम्मेदाराना बयान से राजभाषा के निदेशक की साहित्य को लेकर समझ को तो समझा ही जा सकता है सरकार की संवेदहीनता भी उजागर होती है । अगर जनहित के काम में ही पैसा लगाना था तो पुरस्कारों का एलान क्यों किया गया । सबसे बड़ी बात है कि राम निरंजन परिमलेंदु को बिहार सरकार के राजभाषा विभाग का सबसे बड़ा पुरस्कार यानि डॉ राजेन्द्र प्रसाद शिखर सम्मान का एलान हुआ और समाजवादी चिंतक डॉ सच्चिदानंद सिन्हा को सबसे छोटा सम्मान यानि फादर कामिल बुल्के पुरस्कार देने की घोषणा की गई । रामनिरंजन परिमलेंदु के साहित्य के योगनाम के बारे में वृहत्तर हिंदी समाज को जानना अभी शेष है जबकि सच्चिदानंद सिन्हा को देश ही नहीं विदेश में भी लोग उनके विचारों की वजह से जानते हैं ।  पुरस्कार के लिए चयनित प्रो सच्चिदानंद सिन्हा ने अपने नाम का एलान होने पर आश्चर्य जताते हुए इसको लेने से मना कर दिया । उनका कहना है कि वो साहित्यकार हैं ही नहीं लिहाजा वो ये पुरस्कार नहीं लेंगे । उधर आलोचक कर्मेन्दु शिशिर ने भी पुरस्कार लेने से मना कर बिहार सरकार की सूची को संदिग्ध कर दिया है । पिछले कुछ सालों से बिहार सरकार ने साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में कई बेहतर काम किए थे । कविता समारोह से लकर कई अन्य महत्वपूर्ण पहल । हलांकि ये संस्कृति विभाग की पहल थी । अब जिस तरह से राजभाषा विभाग ने पुरस्कारों का चयन किया, उसका एलान किया और उसके बाद सवाल उठने पर निदेशक ने जिस तरह का बयान दिया है उससे साफ है कि सरकार की प्राथमिकता में साहित्य नहीं है वो तो बस इसको रूटीन सरकारी काम की तरफ निबटाना चाहती है । बिहार सरकार के राजभाषा विभाग के इन पुरस्कारों और उस पर उठे विवाद को देखेंगे तो मामला छोटा लग सकता है लेकिन अगर वृहत्तर परिप्रेक्ष्य में इसका विश्लेषण करें तो यह बड़े सवाल खड़ी करती है । बिहार का राजभाषा विभाग वहां के मुख्यमंत्री के अधीन आता है । साहित्य और संस्कृति को लेकर नीतीश कुमार की छवि एक संजीदा राजनेता की रही है । उनके कार्यकाल में या उनके मातहत विभाग में इस तरह का वाकया होना हैरान करनेवाला है । कहीं ऐसा तो नहीं कि जिस तरह से उन्होंने सरकार चलाने की मजबूरियों के लिए लालू यादव से हाथ मिला लिया उसी तरह से वो साहित्य और संस्कृति को भी चलाना चाह रहे हैं । अगर ऐसा होता है तो यह नीतीश कुमार की छवि पर बुरा असर डालेगा ही सूबे की समृद्ध साहित्यक विरासत को चोट भी पहुंचाएगा । दरअसल सत्तर के दशक के बाद से ही सरकारी पुरस्कारों की हालत बद से बदतर होती जा रही है । थोक के भाव से बांटे जानेवाले इन पुरस्कारों का चयन अफसरों की मर्जी से होता है उन अफसरों की मर्जी से जिनका साहित्य से कोई लेना देना नहीं है । कम से कम बिहार राजभाषा के निदेशक रामविलास पासवान के बयान से तो यही झलकता है ।
कुछ महीने पहले उत्तर प्रदेश सरकार ने साहित्य और संस्कृति के लिए थोक के भाव से पुरस्कार बांटे । इतने लोगों को पुरस्कृत कर दिया गया कि लगा कि जो भी रचेगा वो पुरस्कृत होने से नहीं बचेगा । बिहार में पचास हजार से लेकर तीन लाख तक की रवड़ी बंटने का एलान हुआ है तो यू पी में पांच लाख से लेकर चालीस पचास हजार के पुरस्कार बंटे । सरकारी पुरस्कारों की जुगाड़ सूची में कुछ लेखकों का नाम बार बार आता है । पुरस्कार लेने का ये कौशल हिंदी की कुछ लेखिकाओं ने भी विकसित किया है । एक अनुमान के मुताबिक इस वक्त हिंदी में सरकारी पुरस्कारों के अलावा छोटे बड़े मिलाकर कुल तीन से चार सौ पुरस्कार तो दिए ही जा रहे होंगे । हर राज्य सरकारों का पुरस्कार फिर वहां की अलग अलग अकादमियों का पुरस्कार और उसके बाद साहित्यक संगठनों का पुरस्कार और फिर सबसे अंत में व्यक्तिगत पुरस्कार । इन सबको मिलाकर अगर देखें तो हिंदी के लेखकों पर पुरस्कारों की बरसात हो रही है । इन पुरस्कारों के लिए यह जरूरी नहीं है कि वो कृतियों पर ही दिए जाएं । कृति है तो ठीक नहीं है तो भी ठीक । आपके साहित्यक अवदान पर आपको पुरस्कृत कर दिया जाएगा । हिंदी के वरिष्ठ लेखक ह्रषिकेश सुलभ ने एक बार बाकचीत में साहित्यक पुरस्कारों के संदर्भ में कुछ बातें कहीं थीं । उनका कहना था कि पुरस्कार देने वाले की मंशा लेखन को सम्मानित करने का है तो बहुत अच्छा है लेकिन अगर मंशा पुरस्कार के बहाने खुद यानि आयोजकों का स्वीकृत होना है तो ये सम्मान के साथ छल है । उन्होंने ये बात कहकर ये इशारा किया था कि हिंदी में ये प्रवृत्ति भी इन दिनों जोरों पर है । बड़े लेखकों को सम्मानित कर कुछ संगठन अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने की फिराक में लगे होते हैं । यह स्थिति साहित्य के लिए बेहद चिंताजनक है । उससे भी अधिक चिंताजनक है वरिष्ठ साहित्यकारों का इसपर खामोश रहना । वरिष्ठ लेखकों की खामोशी से इस तरह के आयोजकों का हौसला बढ़ता है ।  
हिंदी में पुरस्कारों को लेकर बहुधा विवाद होते रहे हैं । हिंदी में पुरस्कार पिपासु लेखकों की एक पूरी पौध है । तभी तो हिंदी साहित्य में पुरस्कार देने का खेल लगातार फल फूल रहा है । पुरस्कारों के इस खेल से निजी संस्थान भी अछूता नहीं रहा है । अभी हाल ही में राजकमल प्रकाशन ने दो पुरस्कार दिए । अगर उनके ही पहले के पुरस्कारों पर नजर डालेंगे तो इस बार का चयन संदिग्ध हो जाता है । चूंकि ये निजी संस्थान का पुरस्कार है लिहाजा वो इसके कर्ताधर्ताओं पर निर्भर करता है वो किसे पुरस्कृत करें । लेकिन इन वजहों से ही हिंदी में पुरस्कारो की साख नहीं बन पाती है, जबकि पुरस्कार की धनराशि अच्छी खासी होती है । हिंदी में पांच से दस हजार रुपए तक के कई पुरस्कार हैं जो लेखक लेखिकाओं को अपनी ओर लुभाते हैं । पुरस्कारों के पीछे कई तरह के खेल खेले जाते हैं जिनसे हिंदी साहित्य परिचित है लेकिन वो खेल खुलकर सामने नहीं आ पाते हैं । कभी कभार तो ये देखकर बहुत कोफ्त होती है कि हिंदी के लेखक हजार दो हजार के पुरस्कार के लिए तमाम तरह के दंद फंद करते हैं । हिंदी में पुरस्कारों के कारोबारी इस दंद फंद का अपने तरीके से फायदा उठाते हैं । कहना ना होगा कि इन्हीं वजहों से पुरस्कारों की महत्ता और प्रतिष्ठा लगातार कम होती जा रही है । हिंदी के कुछ नए लेखकों में पुरस्कृत होने की होड़ भी दिखाई देती है जो साहित्य के अच्छे भविष्य के लिए शुभ संकेत नहीं है ।
हिंदी में सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार साहित्य अकादमी सम्मान को माना जाता था लेकिन पिछले एक दशक से जिस तरह से साहित्य अकादमी पुरस्कारों की बंदरबांट हुई है उससे अकादमी पुरस्कारों की साख पर बट्टा लगा था । पिछले एक दो सालों से इस पुरस्कार की साख को वापस लाने की कोशिश हो रही है । वर्ना जबतक साहित्य अकादमी पर विचारधारा के लोगों का कब्जा था तबतक वहां जमकर रेवड़ियां बांटी गईें । उसके बाद जब गोपीचंद नारंग अकादमी के अध्यक्ष बने तब भी हिंदी के पुरस्कारों की सौदेबाजी की बातें सामने आई थी । वहां तब भी आधार सूची वगैरह बनाने का ड्रामा होता रहा लेकिन पूरे साहित्य जगत को मालूम होता था कि अमुक वर्ष में किसको पुरस्कार मिलना चाहिए । तकरीन दो साल पहले लमही सम्मान को लेकर भी शर्मनाक विवाद उठा था । विवाद इतना बढ़ा था कि पुरस्कृत लेखिका ने सम्मान लेने से मना कर दिया था । हिंदी में पुरस्कारों की बहुतायत पर मशहूर कवयित्री कात्यायनी की कविता की एक कविता का स्मरण हो रहा है - दो कवि थे/बचे हुए अंत तक/वे भी पुरस्कृत हो गए/इस वर्ष/इस तरह जितने कवि थे/सभी पुरस्कृत हुए/और कविता ने खो दिया /सबका विश्वास । चुनौती इसी विश्वास को बचाने की है ।




Sunday, March 22, 2015

आलोचना पर सवाल

शुक्रिया तुम्हारा । निर्मला जी ( निर्मला जैन) या मर्दतंत्र के कुछ समर्थक अपने विद्वतापूर्ण भाषण से मेरे उपन्यास चाक की बिक्री और पाठकों में ऐसे ही इजाफा कर देते हैं जैसे किरन बेदी का एक इंटरव्यू आप की कई सीटों पर जीत मुकर्रर कर देता था । संदर्भ साहित्य गोष्ठियां । ये लिखा है हिंदी की वरिष्ठ लेखिका और उपन्यासकार मैत्रेयी पुष्पा ने अपने फेसबुक वॉल पर । अब इस फेसबुक पोस्ट में जिस तरह से तुलना की गई है वह बेहद दिलचस्प है । एक उपन्यासकार यानी मैत्रेयी पुष्पा ने एक आलोचक को एक राजनीतिक शख्सियत के बरक्श खड़ा कर दिया । अपने उपन्यास को दिल्ली की आम आदमी पार्टी की सफलता से जोड़ते हुए उन्होंने आलोचक निर्मला जैन को किरन बेदी से जोड़ दिया । आलोचक निर्मला जैन पर तंज कसते हुए मैत्रेयी ने साफ कर दिया कि उनकी आलोचनाओं से उनके उपन्यास की बिक्री और पाठक दोनों में इजाफा होता है । उपर से देखने पर यह बात छोटी और सामान्य लगती है लेकिन अगर हम गहराई से समकालीन साहित्यक परिदृश्य पर नजर डालें तो मैत्रेयी ने अपने तंज के माध्यम से बड़े सवाल खड़े किए हैं । अब अगर उनके शब्दों पर गौर करें निर्मला जी या मर्दतंत्र के कुछ समर्थक । मैत्रेयी ने अपने शब्दों से हिंदी आलोचना को कठघरे में खड़ा किया है । उन्होंने अपने उपन्यास के आलोचना के बहाने से वरिष्ठ आलोचकों की वाचिक परंपरा पर भी सवाल खड़ा किया है । दो तीन साल पहले ही निर्मला जैन ने आलोचना के वर्तमान परिदृश्य पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि किसी कृति पर सच कहने में डर लगता है क्योंकि लेखक बुरा मान जाते हैं । ये बात स्मृति के आधार पर लिखी जा रही है लिहाजा शब्दों का हेरफेर हो सकता है लेकिन भाव बिल्कुल वही हैं । अब देखिए निर्मला जी ने जाने अनजाने वर्तमान आलोचना की स्थिति को अपने इस वक्तव्य से सामने रख दिया । सवाल तब भी उठे थे और सवाल अब भी उठे हैं कि हिंदी आलोचना क्या इतनी डरपोक हो गई है कि वो लेखकों के नाराज हो जाने के डर से कृतियों पर टिप्पणी करना छोड़ देगी । क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात नहीं कही जाएगी । दरअसल अगर हम समकालीन साहित्य के पिछले बीस तीस साल के परिदृश्य पर नजर डालते हैं तो कथा आलोचना के नाम पर लगभग सन्नाटा दिखाई देता है । आलोचना के नाम पर समीक्षात्मक लेख लिखे जा रहे हैं जिनमें कृतियों पर परिचयात्मक लेख होते हैं । तिस पर से आलोचकों का तुर्रा ये कि वही हिंदी साहित्य की दशा और दिशा तय करते हैं । आलोचकों की इस प्रवृत्ति को कई लेखकों ने भी बढ़ावा दिया जब वो फैरी सफलता और चर्चा के लिए आलोचकों के आगे हाथ बांधे खड़े होने लगे । आलोचकों में जैसे जैसे यह प्रवृत्ति बढ़ी तो होने यह लगा कि हिंदी में उखाड़-पछाड़ का खेल शुरू हो गया । सबने अपने अपने गढ और मठ बना लिए और आलोचक मठाधीश की भूमिका में आ गए । सेंसेक्स की तरह कृतियों को उठाने और गिराने का खेल शुरू हो गया । साहित्य बाजार में तब्दील हो गया । नामवर जी ने हिंदी में आलोचना की जिस वाचिक परंपरा को आगे बढ़ाया उसको कई लोगों ने लपक लिया । बजाए गंभीर अध्ययन, मनन और चिंतन के इस परंपरा को आगे बढ़ाने से हिंदी आलोचना की छवि को ठेस लगी है । नामवर जी का तो अध्ययन इतना गहरा है कि वो जब कुछ कहते हैं तो उसमें एक संदर्भ भी होता है और मूल्यांकन की दृष्टि भी होती है । नामवर सिंह जिस तरह से लगातार नई पीढ़ी के लेखन से खुद को अपडेट करते हैं वह उनकी ताकत है । लिहाजा जब वो बोलते हैं तो पूरा हिंदी साहित्य सुनता है । नामवर जी ने कहीं कहा भी है- मुझ पर अक्सर यह आरोप लगाया जाता है कि आलोचना में मैं रणनीति अपनाता हूं । यह भी कहा जाता है कि यदि मैं किसी लेखक का नाम ले लूं या उसके बारे में कुछ कह हूं तो वह मुख्यधारा में स्थापित हो जाता है । जिसे छोड़ देता हूं वह यूं ही पड़ा रहता है । दरअसल राजनीति में तो हाशिए पर चले जाने से नुकसान होता है पर साहित्य में हाशिया बहुत महत्वपूर्ण होता है । हमने देखा है कि हिंदी ही नहीं, उर्दू और प्राय: सभी भाषाओं में जो लेखक हाशिए पर रहे थे, आज महत्वपूर्ण लेखक हैं । त्रिलोचन, नागार्जुन, शमशेर बहादुर सिंह की बात छोड़ भी दें तो निराला और गालिब के साथ यही हुआ । प्रसिद्ध अंग्रेजी कवि मिल्टन ने तो लिखा भी है दे ऑल्सो सर्व हू स्टैंड एंड वेट । नामवर सिंह के उनके बाद की पीढ़ी के आलोचक इस हैसियत को हासिल नहीं कर पाए,खासकर कथा आलोचना में तो बिल्कुल ही नहीं ।  हाशिए को महत्वपूर्म बताना कोई हंसी ठट्ठा नहीं है यह तो अनुभव और अध्ययन से ही संभव है  ।

अब अगर हम मैत्रेयी पुष्पा के कथन पर गौर करें तो वो आलोचना में उन लोगों पर भी निशाना साधती हैं जो मर्दतंत्र के समर्थक हैं । फेसबुक पोस्ट पर मैत्रेयी पुष्पा से कई लोगों ने यह जानने की भी कोशिश की ये मर्दतंत्र समर्थक कौन हैं । जवाब नहीं मिला। अपनी रचनाओं की नायिकाओं के माध्यम से स्त्री विमर्श के नए आयाम गढ़नेवाली मैत्रेयी पुष्पा जब आलोचना में मर्दतंत्र की बात करती हैं तो वो बड़े सवाल खड़ी करती हैं । हिंदी आलोचना में मर्दतंत्र के उन समर्थकों की पहचान होनी चाहिए । इस पहचान की तलाश में अगर आगे बढ़ते हैं तो मर्दतंत्र की जड़ें देशभर के हिंदी विश्वविद्लायों के हिंदी विभागों के आचार्यों के कमरों में मिलती हैं । इन कमरों में बैठे आचार्य विद्वान आलोचक है । विद्वान आलोचक( स्कॉलर क्रिटिक) शब्द पहली बार ऑक्सफोर्ड युनिवर्सिटी से निकलनेवाले जर्नल- एसेज ऑन क्रिटिसिज्म, में सामने आया था और एफ डब्ल्यू वीटसन ने इसका प्रयोग किया था । हमारे देश के विश्वविद्यालयों के हिंदी विभागों में बैठे आलोचक सच में स्कॉलर क्रिटिक यानी विद्वान आलोचक हैं, उनसे पाठालोचन की अपेक्षा ठीक है, वो किताबों का संपादन कर सकते हैं लेकिन उनसे सर्जनात्मक आलोचना की अपेक्षा नहीं की जा सकती है । हिंदी विभागों के ये स्कॉलर क्रिटिक अपनी महत्ता साबित करने और अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए बहुधा बयानों का सहारा लेते रहते हैं । हिंदी विभागों के इन आलोचकों का समकालीन साहित्य के भी वास्ता रह गया हो, ऐसा प्रतीत नहीं होता । उनके लिए डॉ रामविलास शर्मा आदर्श हैं जो कहा करते थे कि वो दूसरों का लिखा नहीं पढ़ते हैं । पढ़े बगैर अपने पूर्व के अध्ययन के आधार पर ज्ञान देकर आज के आलोचक अपने आपको ही एक्सपोज करते हैं । अब वक्त आ गया है कि हिंदी आलोचना खासकर कथा आलोचना के बारे में उसके औजारों और सिद्धांतों के बारे में गंभीरता से विचार हो । मार्क्सवादी आलोचना के औजार भोथरे हो चुके हैं । दुनिया की अलग अलग भाषाओं में आलोचना की सैद्धांतिकी पर गंभीर बातें होती रही हैं, नए नए औजार विकसित किए जा रहे हैं जिसके अच्छे परिणाम भी आ रहे हैं । पश्चिम में फेमिनिस्ट क्रिटिसिज्म ने शेक्सपीयर को नए सिरे से एक नई दृष्टि के साथ उद्घाटित किया । वहां से होते हुए जब ये स्त्री विमर्श के रूप में हिंदी साहित्य में पहुंचा तो राजेन्द्र यादव ने उसको एक अलग ही दिशा में मोड़ दिया । स्त्री विमर्श के आदार पर किसी रचना का समग्रता से मूल्यांकन नहीं सका क्योंकि हमने स्त्री विमर्श के नाम पर कुछ और ही शुरू किया । ये कुछ ऐसा था जिसमें विमर्श नाम का रह गया । आज की आलोचना के सामने सबसे बड़ा संकट अपने साख को बचाए रखने की है । आलोचकों को एक ऐसी दृष्ठि विकसित करनी होगी जिससे वो रचनाकारों की तरह से कृतियों के पार जाकर उसको देख सकें । आलोचकों के सामने ये संकट होता है कि वो रचनाकारों की तरह रचना के पार जाकर देख नहीं पाते हैं वो तो पाठके आधार पर अपनी दृष्टि गढ़ते हैं और फिर उसी गढ़ी हुई दृष्टि के आधार पर रचनाओं का मूल्यांकन करते हैं । इसका नतीजा यह होता है कि बहुधा आलोचक कृतियों को खोलने से चूक जाते हैं और जबतक इस चूक को सुधारा जाता है या उसकी कोशिश होती है तबतक बहुत देर हो चुकी होती है । अब भी वक्त है कि आलोचना अपनीएक नई शैली नई दृष्टि विकसित करे और व्यक्तिगत आग्रहों और दुराग्रहों से उपर उठकर रचना को रचना के स्तर पर देखें और उसका मूल्यांकन करें ।इससे कम से कम आलोचना की साख तो बची रहेगी ।और अगर साख बची रहेगी तो फिर एरक विधा के रूप में और मजबूत और समकालीन होने में देर नहीं लगेगी ।  

समाज का दरकता विश्वास

नगालैंड में बालात्कार के आरोप में एक शख्स को जेल से निकालकर भीड़ ने बेरहमी से कत्ल कर दिया। इस खबर के सामने आने के बाद पूरा देश सन्न रह गया था । इसके बाद अब आगरा में भी एक लड़के को छेड़खानी के आरोप में पीट पीट कर मार डाला गया । दोनों मामलों में एक समानता भी देखने को मिली कि भीड़ जब हत्या पर उतारू थी तो कुछ लोग पूरी वारदात का वीडियो बनाने में जुटे थे । कत्ल के बाद इस वीडियो को व्हाट्सएप और अन्य सोशल मीडिया पर शेयर किया गया । अब ये दोनों प्रवत्ति खतरनाक है । हमारे संविधान में भीड़ के इंसाफ की कोई जगह नहीं है किसी को भी किसी की जान लेने का हक नहीं है । गुनाह चाहे जितना भी बड़ा हो फैसला अदालतें करती हैं । अदालत में आरोप और अभियोग तय होने के बाद एक निश्चित प्रक्रिया के तहत इंसाफ किया जाता है । लेकिन जिस तरह से भीड़ ने कानून को अपने हाथ में लिया यह समाज में बढ़ते असहिष्णुता का परिणाम है या फिर लोगों का कानून से भरोसा उठते जाने का । और ये दोनों ही स्थितियां हमारे लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं हैं । भीड़ के इंसाफ की गंभीर समाजशास्त्रीय व्याख्या की आवश्यकता है । जिस तरह से दिल्ली के निर्भया बलात्कार कांड में फास्ट ट्रैक कोर्ट आदि से गुजर कर पूरा केस सुप्रीम कोर्ट में लटका है उससे कानूनी प्रक्रिया में लोगों का विश्वास कम होता जा रहा है । निर्भया के गुनहगारों को को फांसी की सजा में देरी से लोग हताश हैं । जनता को लगता है कि उतने बड़े देशव्यापी आंदोलन और सरकार और पुलिस की तमाम कोशिशों को बावजूद बलात्कारियों को सजा नहीं मिल पाई । जिस वारदात के बाद देश का कानून बदल गया हो जिसके बाद बलात्कार की परिभाषा में आमूल चूल बदलवा किया गया हो उसके बाद भी इंसाफ में देरी देश की जनता का मुंह चिढा रहा है । यह ठीक है कि कानून अपनी रफ्तार से इंसाफ करता है लेकिन देरी से मिला न्याय, न्यायिक व्यवस्था को कठघरे में तो खड़ा करता ही है । मामला सिर्फ निर्भया केस का नहीं है ऐसी कई निर्भया देश की अलग अलग अदालतों में इंसाफ की आस में कराह रही हैं । न्याय के बारे में कहा भी गया है कि न्याय होने से ज्यादा जरूरी है न्याय होते दिखना । न्यायिक प्रक्रिया में हो रही देरी से भारत का असहिष्णु समाज बेसब्र होने लगा है । नतीजे में भीड़ का ये इंसाफ देखने को मिल रहा है । हम इन दोनों घटनाओं को साधारण घटना समझ कर नजरअंदाज नहीं कर सकते । इसके बेहद खतरनाक और दूरगामी परिणाम हो सकते हैं जो हमारी मजबूत होती लोकतंत्र की जड़ें कमजोर कर सकती है । वक्त रहते समाज को, सरकार को इसपर ध्यान देना होगा । कानून बनाना ठीक है, कानून का पालन भी अपनी जगह है लेकिन कानून के राज में जनता का भरोसा सबसे बुनियादी और बड़ा है । 
दूसरी एक जो खतरनाक प्रवृत्ति इन दोनों घटनाओं में देखने को मिली है वो है वीडियो और फोटो का व्हाट्सएप, फेसबुक और ट्विटर पर वायरल होना । गांधी का देश जिसने अहिंसा से ब्रिटिश शासकों को हिला दिया था उसी समाज में हिंसा का उत्सव हो यह समझ से परे हैं । इस तरह के वीभत्स वीडियो और फोटो को साझा करके हम हासिल क्या करना चाहते हैं इस मानसिकता को समझने की भी जरूरत है । ज्यादा दिन नहीं बीते हैं जब व्हाट्सएप पर रेप की वारदात का एक वीडियो वायरल हुआ था। मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था लेकिन कोर्ट के आदेश के बावजूद अबतक कार्रवाई नहीं हो पाई है । सोशल मीडिया का फैलाव ठीक है उससे किसी को कोई भी एतराज नहीं है लेकिन जिस तरह से इन माध्यमों के बाइप्रोडक्ट के रूप में अराजकता सामने आ रही है वह चिंता जनक है । दरअसल इस तरह के मामलों में अदालतें, पुलिस , सरकार से ज्यादा दायित्व समाज का है जहां इस तरह के कृत्यों को हतोत्साहित किया जाना चाहिए । किसी हत्या या बलात्कार के वीडियो का शेयर होना हमारे समाज के बुनियादी उसूलों से हटने के संकेत दे रहा है । भारत में कभी भी हिंसा को महिमामंडित नहीं किया गया और ना ही इसको लोगों ने मजे के लिए इस्तेमाल किया । इन संकेतों को समझकर फौरन आवश्यक कदम उठाने होंगे ताकि हमारा देश, हमारा समाज बचा रह सके । और बची रह सके उसकी आत्मा भी । जब देश आजाद हुआ था तो हमारे महान नेताओं ने ऐसे भारत की कल्पना नहीं की थी । संविधान सभा की बहसों को अगर पढ़े तो साफ है कि उन महान नेताओं ने एक ऐसे देश का सपना देखा था जिसमें हर शख्स एक दूसरे का आदर करे । समाज सहिष्णु बने । देश में कानून का राज हो और कानून में लोगों की आस्था बढ़े । हमें यह नहीं भूलना चाहिए अगर भीड़ ने इंसाफ करना शुरू कर दिया और इस प्रवृत्ति को फौरन नहीं रोका गया तो भारत को पाकिस्तान बनने से नहीं रोका जा सकेगा । यह देश की जनता को तय करना है कि वो कैसे समाज में रहना चाहती है ।

गद्य की गद्दी पर कविता

हिंदी समाज से या यों कहें कि हिंदी प्रदेशों से कॉफी हाउस संस्कृति के लगभग खत्म हो जाने से साहित्य विमर्शों के लिए जगह बची नहीं थी । राजेन्द्र यादव के निधन से तो हिंदी साहित्य की जीवंतता भी लगभग खत्म हो गई । फिलहाल कोई ऐसा साहित्यकार नहीं दिखता है जो अपने लेखन से या फिर अपने वक्तव्यों से आसमान की तरफ कोई पत्थर तबीयत से उछाल सके । लिहाजा साहित्य में वैचारिक उष्मा होने के बाद उसकी आंच महसूस नहीं की जा रही है। इसी स्तंभ में पहले भी इस बात की चर्चा की जा चुकी है कि हिंदी साहित्य ने तकनीक के साथ दोस्ती कर ली है ।फेसबुक पर तो साहित्यक बहसें होती ही हैं लेकिन वहां कमेंट करने की अराजकता ने लेखकों को व्हाट्सएप कीओर मोड़ दिया । इन दिनों व्हाट्सएप पर मेरे जानते कई साहित्यक ग्रुप चल रहे हैं जहां जमकर विषय विशेष पर बहसें होती हैं । ऐसे ही एक साहित्यक ग्रुप रचनाकार में कविता को लेकर गर्मागर्म बहस हुई । कविता की कम होती लोकप्रियता या खराब कविता की बहुतायत में अच्छी कविताओं के ढंक जाने जाने के मेरे तर्क पर वहां मौजूद कवियों ने जोरदार प्रतिवाद किया । इस विमर्श के बीच एक और बात उभर कर आई कि नई पीढ़ी के कवियों पर पुरानी पीढ़ी के कवियों का प्रभाव दिखाई देता है । कविता पर प्रभाव की बात तो मानी जा सकती है, होनी भी चाहिए लेकिन जब कविता खुद को दुहराने लगती है तो फिर वो निस्तेज भी होने लगती है । पूर्ववर्ती कवियों के प्रभाव से ही तो कविता की एक परंपरा का निर्माण होता है । जैसे रघुवीर सहाय की कविताओं में राजनीति के स्वर दिखाई देते हैं तो दशकों बाद वही स्वर संजय कुंदन की कविताओं में भी सुनाई पड़ते हैं । स्वर का होना उस परंपरा को आगे बढ़ाने जैसा है लेकिन उन्हीं बिंबों और उन्हीं शब्दों से कविता गढ़ना पुरानी पीढ़ी के कवि का प्रभाव तो कतई नहीं माना जा सकता है । इस तरह के प्रभाव के लिए अभी हिंदी साहित्य को शब्द तलाशना होगा ।  नयी कविता वाद मुक्त होकर साहित्य में आई, प्रगतिवाद तो मार्क्सवाद की पीठ पर सवार होकर अपनी यात्रा पर निकली और प्रयोगवादी कविताएं वैज्ञानिक चेतना के आधार पर सामने आने का दावा करती रहीं । पहले कविता समग्रता में नयेपन के साथ सामने आती रही लेकिन अब जिस प्रकार से कविता बदल रही है वो पहले के जैसा नहीं है । ऐसा प्रतीत हो रहा है कि नयेपन की जो अवधारणा या प्रस्तावना महावीर प्रसाद द्विवेदी ने की थी उसके अंजाम तक पहुंचने का वक्त आ गया है ।

अब वक्त आ गया है कि हिंदी के कवियों को स्थिर होकर सोचना चाहिए कि वो क्या और कैसा लिख रहे हैं । मेरा यह दुराग्रह नहीं है कि कविता किसी वाद या चेतना के प्रभाव में ही लिखी जाए, ना ही यह कि परंपरा का निषेध हो । मेरा सिर्फ मानना यह है कि फैशन या मैनेरिज्म का जो रोग हिंदी कविता को लगा है उसका इलाज होना चाहिए । ये इलाज कोई आलोचक नहीं करेगा ये इलाज कवियों को ही करना होगा अंत में शायर आलोक श्रीवास्तव कीकुछ पंक्तियां-मुझ जैसे कविता प्रेमी को वो नई कविता पढ़वाएं जिसका पथ निराला, नागार्जुन और शलभ श्रीराम सिंह जैसे दिग्गज बना, दिखा गए थे और जो सर्वेश्वर, रघुवीर सहाय और कुंवर नारायण या केदारनाथ सिंह के यहां दिखती, मिलती है । विचार की आड़ में, विमर्श के पर्दे में, सरोकार के खेल में गद्य की भाषा में नई कविता के नाम पर बाबा और निराला की आत्मा ना दुखाइए । नई कविता के नाम पर शॉर्टकट ना अपनाइए और बड़े कवियों की छायाओं से प्रेरित कविताएं बिल्कुल ना सुनाइए । पहले नई कविता का व्याकरण सीख कर आइए । 

Tuesday, March 17, 2015

शानदार आगाज, बेहतर विमर्श

पिछले कुछ वर्षों के साहित्यक परिदृश्य पर अगर हम नजर डालते हैं तो ये पाते हैं कि पूरे देश में लिटरेचर फेस्टिवल की संख्या में इजाफा हुआ है । ऐसा नहीं है कि ये लिटरेचर फेस्टिवल सिर्फ अंग्रेजी या हिंदी में ही हो रहे हैं । ये भारत की अन्य भाषाओं में भी आयोजित होने लगे हैं । लिटरेचर फेस्टिवल की लोकप्रियता इतनी बढ़ी है कि अब ये महानगरों से निकलकर शहरों में पहुंचने लगा है । कई बड़े अखबार समूहों ने भी अपने नाम के साथ लिटरेचर फेस्टिवल शुरू कर दिए हैं । साहित्यक हलचलों पर नजर रखनेवालों का मानना है कि लिटरेचर फेस्टिवल की लोकप्रियता की वजह जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल की सफलता है । देश के जिस भी कोने में लिटरेचर फेस्टिवल आयोजित होता है लगभग सभी के लिए आदर्श जयपुर लिट फेस्ट ही होता है । उसी की तर्ज पर आयोजन होते हैं यानि समांतर सत्र चलते हैं । जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल की सफलता के पीछे कम से कम तीन शख्सियतों का बड़ा हाथ है । अंग्रेजी की मशहूर लेखिका नमिता गोखले, मशहूर इतिहास लेखक विलियम डेलरिंपल और इस आयोजन को सफल बनाने में महती भूमिका निभाने वाले संजोय रॉय । जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल भी जब शुरू हुआ तो दिग्गी पैलेस होटल के फ्रंट लॉन में श्रोताओं की संख्या बहुत कम थी । कालांतर में आयोजकों की मेहनत, नया कांस्पेट, मशहूर शख्सियतों का उसमें शिरकत करना और फिर कई साल यहां होने वाले विवाद ने जयपुर लिट फेस्ट को विश्व प्रसिद्ध बना दिया । अब तो यह माना जाता है कि भारत में लिटरेचर का नया साल जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के आयोजन के साथ शुरू होता है । अट्ठाइस फरवरी और एक मार्च को मुंबई के मशहूर जे जे कॉलेज ऑफ फाइन आर्ट्स में लिट ओ फेस्ट के नाम से दो दिनों का साहित्यक जलसा हुआ । कई सत्र समांतर रूप से चले । कई पुस्तकों का विमोचन हुआ । गुलजार, जावेद सिद्दिकी से लेकर आशुतोष की किताब वहां रिलीज की गई । मुंबई में आयोजित इस लिट ओ फेस्ट में सत्रों का कैनवस बहुत बड़ा था । कार्यक्रम का शुभारंभ राजनीति से हुआ और फिर सिनेमा, साहित्य, प्रगतिशील आंदोलन, आत्मकथा और जीवनी लेखन में समस्याएं, हिंदी की मौजूदा स्थिति से लेकर मीडिया मंडी के बदलते नियम तक को दो दिनों में समेटा गया । गुलजार तो अब इस तरह के साहित्यक आयोजनों में स्थायी मेहमान के तौर पर मौजूद रहते हैं । यहां भी थे ।  उनकी उपस्थिति लिटरेचर फेस्टिवल के आयोजकों को संबल देता है । उनकी लोकप्रियता की वजह से श्रोता भी जुट जाते हैं ।
मीडिया मंडी के बदलते नियम को लेकर सत्र में बेहद गर्मागर्म बहस हुई । इस बात पर सहमति थी कि सोशल मीडिया के आने की वजह से न्यूजरूम का एजेंडा बदल रहा है । लेकिन इस बात को लेकर बेहद गहरे मतभेद थे कि सोशल मीडिया के आने से मुख्यधारा की मीडिया का अंत हो जाएगा । दरअसल सोशल मीडिया के आगमन के बाद से ही मुख्य धारा की मीडिया का मर्सिया लिखा जाने लगा है । विशेषज्ञ इस दोष के बहुधा शिकार होते रहे हैं । जब देश में कंप्यूटर आया तो इस बात को लेकर खूब हो हल्ला मचा कि अब लोग बेरोजगार हो जाएंगे । लेकिन कंप्यूटर के आने के बाद इस देश में किस तरह की क्रांति हुई वो सबके सामने है । किस तरह से कंप्यूटर ने देश के नौजवानों के लिए नौकरियां बढाई इसके लिए तफसील में जाने की जरूरत नहीं है और ना ही वो इस लेख का विषय है । इसी तरह से देश में जब निजी न्यूज चैनलों का फैलाव शुरू हुआ तो फिर कुछ विशेषज्ञ छाती कूटने लगे कि अब तो अखबारों का बंद हो जाना तय है । उस वक्त यह तर्क दिया गया था कि दिनभर जो खबरें चलती रहेंगी उसको लोग अगले दिन क्यों कर पढ़ना चाहेंगे । रात को दर्शक अगर वही खबर देख लेगा तो सुबह अखबार का इंतजार क्यों करेगा । लेकिन तमाम आशंकाओं के विपरीत हुआ यह कि न्यूज चैनलों के फैलाव के साथ साथ अखबारों की प्रसार संख्या और पाठक संख्या दोनों बढ़े । साल दर साल आने वाले इंडियन रीडरशिप सर्वे और नेशनल रीडरशिप सर्वे के आंकड़े इस बात की चीख चीख कर गवाही देते हैं । तो हर नए बदलाव के साथ पुरानी व्यवस्था के अंत की घोषणा करना बेहद आसान होता है क्योंकि वो भावुकता और अपने विचारों की पूर्वग्रहों से जकड़ा होता है । इस बात का भी एलान किया गया कि आनेवाले दिनों में भारत के बड़े प्रकाशन संस्थान बंद हो जाएंगे क्योंकि जनता अब इंटरनेट पर किताबें पढ़ेगी । यहां बेहद विनम्रता पूर्वक यह बताना जरूरी है कि फ्रांस और जर्मनी के अलावा यूरोप और अमेरिका में किताबों की बिक्री पर ईबुक्स के बढ़ते चलन का असर लगभग नगण्य है ।
सोशल मीडिया के बढ़तेचले जाने से एक अच्छी बात यह अवश्य हुई है कि वहां जो ट्रेंड करने लगता है उसको मुख्यधारा की मीडिया में जगह मिलने लगी है । बेवसाइट्स पर सबसे ज्यादा, न्यूज चैनलों में उससे कम और अखबारों में सबसे कम । सोशल मीडिया की वजह से एक और बात हुई है जिसको रेखांकित करना आवश्यक है वह ये कि अब पाठकों की फौरन प्रतिक्रिया मिल जाती है या ये भी फौरन पता चल जाता है कि किस टॉपिक को पाठक सबसे ज्यादा पसंद कर रहे हैं । इस सहूलियत का लाभ मीडिया संस्थान उठाने लगे हैं ।  दरअसल अगर हम देखें तो भारत में इस वक्त तकरीबन नब्बे करोड़ मोबाइल उपभोक्ता है । एक अनुमान के मुताबिक इन उपभोक्ताओं में से करीब तीस करोड़ के मोबाइल में इंटरनेट मौजूद है । वो टू जी या थ्री जी कोई भी हो सकता है । इसका मतलब यह हुआ कि ये तीस करोड़ लोग इंटरनेट पर एक साथ मौजूद हैं । इतनी बड़ी संख्या किसी भी विशेषज्ञ को आशावान बना सकती है लेकिन किसी के लिए आशा करना अलहदा बात है लेकिन उस आशा और अपेक्षा के बोझ तले दबकर किसी अन्य की मृत्यु की घोषणा कर देना पूरे परिदृश्य को नहीं समझ पाने का नतीजा है ।

गैर हिंदी प्रदेश मुंबई में आयोजित लिट ओ फेस्ट में हिंदी को लेकर कई सत्र थे । यह बात खौस तौर पर रेखांकित की जानी चाहिए कि चाहे वो हिंदी कविता पाठ का सत्र हो या फिर हिंदी कितनी लोकप्रिय नामक सत्र हो, सबमें श्रोताओं की खासी उपस्थिति रही । सत्र के पहले दिन की शुरुआत राजनीतिक विषयों से हुई तो दूसरे दिन कविता रसिकों के लिए गगन गिल से लेकर सुंदर ठाकुर और स्मिता पारिख से लेकर अशोक चक्रधर तक अपनी कविताओं के साथ मंच पर जमे थे । कवियों में भी रेंज काफी बड़ा था । रविवार की सुबह सभागार लगभग भरा हुआ था । हिंदी कविता को लेकर गैर हिंदी प्रदेश में श्रोताओं की उपस्थिति आश्वस्ति कारक रही क्योंकि हिंदी में तो यह माना जाने लगा है कि कविता के पाठक नहीं हैं । प्रकाशकों ने कविता पुस्तकें छापने से कन्नी काटनी शुरू कर दी है । हिंदी की लोकप्रियता के सत्र में अरुण माहेश्वरी ने हिंदी और भारतीय भाषाओं को लेकर कई जरूरी सवाल उठाए । इस सत्र का विषय था कि क्या प्रकाशक हिंदी के लेखकों को समान अवसर देते हैं । यह सवाल वहां अवश्य उठा लेकिन इसको लिट ओ फेस्ट से बाहर ले जाकर बड़े फलक पर देखने की आवश्यकता है । इस विषय के आलोक में अगर हम विदेशी प्रकाशकों को देखें तो साफ झलकता है कि हिंदी के लेखक वहां दोयम दर्जे के माने जाते हैं । उनकी प्राथमिकता अंग्रेजी होती है। अंग्रेजी में भी वो वैसे लेखकों को तरजीह देते हैं जिनके नाम या पद से किताबें बिक जाएं । अंग्रेजी की पुस्तकों के बरक्श अगर हम भारत में काम कर रहे विदेशी प्रकाशकों या मूल रूप से अंग्रेजी के प्रकाशकों की बात करें तो यह साफ दिखाई देता है कि वो ना सिर्फ हिंदी बल्कि अन्य भारतीय भाषाओं को भी तरजीह नहीं देते हैं । लिट ओ फेस्ट में एक और मह्वपूर्ण सत्र रहा जिसने साहित्य जगत को झकझोरा और जिसने फिर से बड़े सवाल खड़े कर दिए । प्रगतिशील लेखक आंदोलन को लेकर जावेद सिद्दिकि, रक्षंदा जलील और सलीम आरिफ अवश्य प्रगतिशील लेखक आंदोलन पर उठ रहे सवालों से टकराते रहे । जावेद सिद्दिकि ने तो यहां तक कह दिया कि अदब जमाने का मोहताज नहीं होता लेकिन इस सत्र में इस बात को लेकर वक्ता कन्नी काटते रहे कि क्या वजह रही कि प्रगतिशील लेखकों का आंदोलन की सांसे फूल रही हैं । क्या वजहें रही है प्रगतिशील आंदोलन लगातार बिखरते चला गया । गुलजार ने बांबे के जमाने में डबल डेकर बस में लेखकों की बैठकी के किस्से सुनाए लेकिन प्रगतिशील आंदोलन पर कोई भी गंभीर बात नहीं की । इस तरह के लिटरेचर फेस्टिवल में श्रोताओं की यह अपेक्षा रहती है कि विषय विशेष पर बड़े लेखकों की राय जानें । संस्मरणों को सुनना अच्छा लगता है लेकिन वैचारिकी के स्तर पर उससे ज्यादा कुछ हासिल नहीं होता है । 

Sunday, March 15, 2015

मंटो के साथ अन्याय

सआदत हसन मंटो जिनका नाम साहित्य की दुनिया में बेहद गंभीरता और एक ऐसे कालजयी लेखक के तौर पर लिया जाता है जिसने साहित्य की प्रचलित मर्यादाओं को ना केवल छिन्न भिन्न किया बल्कि उसको एक नया रास्ता भी दिखाया । मंटो के बारे में दस्तावेज के संपादक बलराम मेनरा और शरद दत्त लिखते हैं मंटो एक आदमी था । वह एक विजय, एक संज्ञान, एक तलाश, एक शक्ति, हवा के झोंके की तरह चिंतन की एक शाश्वत लहर भी था । इस लहर के सफर का सिलसिला अटूट है...मंटो जानता था कि आदमी सबसे बड़ा सच है, और सच अटूट होता है । इसलिए मंटो ने आदमी को खानों में बांटने का कोई जतन नहीं किया । वह जानता था कि आदमी अपने आप में एक ऐसी सृष्टि है, एक माइक्रोकॉज्म है, जिसमें समय के तमाम आयाम अपना केंद्रबिंदु पाते हैं ।  यह बिल्कुल सही बात है कि मंटो की इसी साफगोई और अंधेरी दुनिया के प्रसंगों को अपनी रचनाओं में लाने की वजह से उन्हें उर्दू का सबसे बदनाम साहित्यकार तक कह दिया गया लेकिन समय बदलने के साथ साथ मंटो की रचनाएं क्रांकितारी रटनाओं के रूप में स्थापित होती चली गईं और मंटो अपने समय से आगे देखने वाला रचनाकार बन गया । मंटो को मुजरिमों की तरह साहित्यक कठघरे में भी खड़े करने की कोशिश की गई । उनको किया भी गया लेकिन कालांतर में सारे जतन इतिहास के पन्नों में दफन हो गए । मंटो की रचनाओं के इन दिनों विश्व की कई भाषाओं में अनुवाद हो रहे हैं, उनके नए पाठक बन रहे हैं लेकिन पंजाबी विश्वविद्यालय पटियाला ने एमए पंजाबी के कोर्स से मंटो के लेखन को हटा दिया है । मंटो की रचनाओं को हटाने के पीछे ये तर्क दिया जा रहा है कि छात्रों को विश्व की अन्य भाषाओं की रचनाओं से परिचय करवाने की कोशिश है । पंजाबी विभाग का यह तर्क गले नहीं उतरता है क्योंकि  मंटो के लेखन को इस कोर्स में चंद साल पहले ही शामिल किया गया था । छात्रों को पहले अपने देश में लिखे गए साहित्य की जानकारी होनी चाहिए फिर विदेशी साहित्य से परिचय करवाना चाहिए क्योंकि तभी वो तुलनात्मक अध्ययन कर सकेगा ।

मंटो की रचनाओं को सिलेबस से उसी राज्य की विश्वविद्याल ने हटाया जहां उनका जन्म हुआ था । उसी राज्य में ये काम हुआ जिसने विभाजन की पीड़ा सबसे ज्यादा झेली । मंटो इसी विभाजन की पीडा के कुशल चितेरे हैं लेकिन विश्वविद्यालय के प्रोफेसरों को कौन समझा सकता है । विश्वविद्लायलय स्वायत्त हैं और प्रोफेसर स्वतंत्र । तभी तो राजेन्द्र यादव विश्वविद्यालयों के साहित्यक विभागों को हिंदी की प्रतिभाओं की कब्रगाह कहा करते थे । दरअसव सिलेबस विश्वविद्लायों की एक बड़ी समस्या है जिसपर ध्यान देने की जरूरत है । अब यह सोचिए कि मंटो की रचनाओं को हटाकर एक अनाम जापानी कहानीकार की रचनाओं को लगा देना यह कहां तक जायज है । जायज तब होता जब इसके पीछे कोई तार्किक वजह होती । विश्वविद्लाय में बैठे कर्ताधर्ता साहित्य के मठाधीश हैं और भाषा विभाग उनके मठ । इन मठों में वही होता है जो मठाधीश चाहते हैं । मठाधीशों को छात्रों की चिंता नहीं होती है वो अपनी स्वायत्तता का बेजा फायदा उठाते हुए तमाम तरह के हड़बोड़ मचाते रहते हैं ताकि उनकी प्रासंगिकता बनी रहे । प्रासंगिकता बचाए या बनाए रखने के इस हथकंडे में ही मंटो जैसे महान लेखक की रचना को दरकिनार कर दिया जाता है । कम से कम पंजाबी विश्वविद्लाय से ये अपेक्षा नहीं की जा सकती थी । अब भी अगर वक्त बचा हो तो इसपर पुनर्विचार हो ।   

Sunday, March 8, 2015

मीडिया मंडी के बदलते नियम ?

मुबई में आयोजित लिट ओ फेस्ट के एक सत्र- मीडिया मंडी के बदलते नियम- सोशल मीडिया के बढ़ते कदम के आलोक में था । इस सत्र में इस बात लेकर जबरदस्त मतभेद थे कि सोशल मीडिया के आने से मुख्यधारा की मीडिया का अंत हो जाएगा । एक विद्वान लेखक ने तो उत्साह में यह तक कह डाला कि आने वाले दिनों में सोशल मीडिया और इंटरनेट का उपयोग इतना बढ़ जाएगा कि अखबारों पर बंद होने का संकट आएगा और राजकमल और वाणी प्रकाशन जैसे संस्थान बंद हो जाएंगें । लेकिन अमूमन ये होता है कि जोश में कही गई बातें आंशिकक रूप में ही सही होती हैं । वही यहां भी हुआ । सोशल मीडिया के चंद पैरोकारों ने इसके आगमन के बाद से ही मुख्य धारा की मीडिया का मर्सिया पढ़ना शुरू कर दिया है । पाठकों को याद होगा कि जब नब्बे के दशक में हमारे देश में टीवी चैनलों का आना शुरू हुआ तो कई तरह की आशंकाएं जताई जाने लगी । कालांतर में जब इक्कीसवीमं सदी की शुरुआत में निजी न्यूज चैनलों का विस्तार होने लगा तो फिर कुछ विशेषज्ञों ने फैसला सुना दियाकि अखबार उद्योग गंभीर संकट में है और उसका बंद हो जाना तय है । उस वक्त यह तर्क दिया गया था कि दिनभर जो खबरें चलती रहेंगी उसको लोग अगले दिन क्यों कर पढ़ना चाहेंगे । तमाम आशंकाओं के विपरीत अखबारों की प्रसार संख्या और पाठक संख्या दोनों बढ़े । यहां यह बताना आवश्यक है कि फ्रांस और जर्मनी के अलावा यूरोप और अमेरिका में किताबों की बिक्री पर ईबुक्स के बढ़ते चलन का कोई खास असर पड़ा नहीं है । दूसरे इस सत्र में सोशल मीडियाकी अराजकता के बारे में चर्चा कम हुई । सोशल मीडिया पर जो आजादी है वो लगभग अराजक है । अभी हाल ही में तीसरी बार ट्विटर पर दिलीप कुमार साहब की मौत की खबर आम हो गई थी । बाद में पता चला कि खबर गलत थी । इसी तरह से मन्ना डे की मौत की खबर भी चल पड़ी थी । दरअसल सोशल मीडिया पर अकांउटिबिलिटी का कोई सिस्टम अभी तक बन नहीं पाया है । यहां की अराजकता को समझना और उसको संभलना मुख्य धारा की मीडिया के लिए चुनौती है ।

गैर हिंदी प्रदेश में आयोजित लिट ओ फेस्ट में गगन गिल, सुंदर ठाकुर, स्मिता पारिख और अशोक चक्रधर को सुनने के लिए सुबह का सत्र खचाखच भरा था । हिंदी कविता को लेकर गैर हिंदी प्रदेश में श्रोताओं की उपस्थिति आश्वस्ति कारक रही क्योंकि हिंदी में तो यह माना जाने लगा है कि कविता के पाठक नहीं हैं । प्रकाशकों ने कविता पुस्तकें छापने से मना करना शुरू कर दिया है । हिंदी की लोकप्रियता के सत्र में अरुण माहेश्वरी ने हिंदी और भारतीय भाषाओं को लेकर कई जरूरी सवाल उठाए । इस सत्र का विषय था कि क्या प्रकाशक हिंदी के लेखकों को समान अवसर देते हैं । यह सवाल वहां अवश्य उठा लेकिन इसको लिट ओ फेस्ट से बाहर ले जाकर बड़े फलक पर देखने की आवश्यकता है । अगर हम विदेशी प्रकाशकों को देखें तो साफ हैकि उनकी प्राथमिकता अंग्रेजी और उस भाषा के लेखक हैं । अंग्रेजी में भी वो वैसे लेखकों को तरजीह देते हैं जिनके नाम या पद से किताबें बिक जाएं । अंग्रेजी की पुस्तकों के बरक्श अगर हम भारत में काम कर रहे विदेशी प्रकाशकों या मूल रूप से अंग्रेजी के प्रकाशकों की बात करें तो यह साफ दिखाई देता है कि वो ना सिर्फ हिंदी बल्कि अन्य भारतीय भाषाओं को भी तरजीह नहीं देते हैं । इस तरह के सवालों से मुठभेड़ करता मुंबई का लिट ओ फेस्ट खत्म हो गया लेकिन दो दिनों तक मुंबई की साहित्यक फिजां को विचारों के स्तर पर उत्तेजित कर गया ।