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Saturday, February 18, 2017

संपादक और प्रकाशक की साख पर सवाल

दो हजार सात में जब ओमप्रकाश सिंह के संपादन में आचार्य रामचंद्र शुक्ल ग्रंथावली का प्रकाशन हुआ था तो उसके विमोचन के मौके पर नामवर सिंह ने कहा था कि आचार्य शुक्ल के ग्रंथावली पर मैं भी काम करना चाहता था लेकिन ओमप्रकाश सिंह ने बहुत मेहनत के साथ इस ग्रंथावली का संपादन किया है । उन्होंने तब यह भी कहा था कि आचार्य शुक्ल पर यह ग्रंथावली पूर्ण है और इससे अधिक इस पर काम नहीं किया जा सकता है । लेकिन नौ साल में नामवर सिंह अपने कहे को भूल गए । नामवर सिंह के वय को देखते हुए इस विस्मरण पर आश्चर्य भी नहीं होता है। ओमप्रकाश सिंह के संपादन में आचार्य रामचंद्र शुक्ल ग्रंथावली के प्रकाशन संस्थान से प्रकाशन के बाद अब नामवर सिंह और आशीष त्रिपाठी के संपादन में राजकमल प्रकाशन ने रामचंद्र शुक्ल रचनावली का प्रकाशन किया है । ऐसा क्यों हुआ इसके बारे में तो नामवर सिंह ही बता सकते हैं लेकिन उनके सह संपादक आशीष त्रिपाठी ने रचनावली के पहले खंड में देहरी के नाम से एक छोटी सी टिप्पणी की है जिसमें एक जगह वो लिखते हैं -  रामचंद्र शुक्ल रचनावली की इच्छा प्रो नामवर सिंह के मन में पांच दशक से भी अधिक समय से बनी रही है । रामचंद्र शुक्ल की जन्मशती के अवसर पर वे ग्रंथावली का प्रकाशन करना चाहते थे । परंतु कतिपय कारणों से यह संभव ना हुआ । जब शुक्ल जी की रचनाएं कॉपीराइट से मुक्त हो गईं तो यह इच्छा फिर से तीव्र हो गई । पर किन्हीं कारणों से यह फिर संभव ना हुआ । अन्तत अब यह संभव हो पा रहा है । एक गहरी रचनात्मक इच्छा की तरह ही इसको देखा जाना चाहिए । इस टिप्पणी के अंत में आशीष त्रिपाठी लिखते हैं कि इस रचनावली के प्रकाशन से आचार्य शुक्ल पर समग्रता से बात करना संभव हो सकेगा, इस बहाने यदि पुन: उनके कार्यों पर चर्चा हो तो हमारा श्रम सार्थक होगा । इस रचनावली के प्रकाशन के बाद आचार्य शुक्ल पर बात तो हो रही है पर यह ना तो समग्रता में हो रही है और ना ही उनके कार्यों पर पुन: चर्चा कृतियों र पर हो रही है । आचार्य शुक्ल पर गलत कारणों से चर्चा हो रही है । चर्चा साहित्यक चोरी के आरोपों और किसी और की रचना को शुक्ल जी की रचना बताकर छापने पर हो रही है ।
दरअसल जैसे ही राजकमल प्रकाशन से रामचंद्र शुक्ल रचनावली छपकर आई तो हिंदी साहित्य को नजदीक से देखनेवालों को लगा कि पहले से मौजूद ग्रंथावली के बाद इसकी क्या जरूरत आन पड़ी । खैर रचनावली के संपादकों में से एक आशीष त्रिपाठी ने अपनी टिप्पणी में इसकी वजह का संकेत कर दिया है कि रामचंद्र शुक्ल की कृतियों के कॉपीराइट से मुक्त होने के बाद इस काम ने जोर पकड़ा । हर प्रकाशक को अपना कारोबार करने का हक है और उससे यह अपेक्षा करनी भी नहीं चाहिए कि वो साहित्य में नैतिकता के मूल्यों का झंडाबरदार बनेगा । राजकमल प्रकाशन भी कारोबारी है और उनको जहां भी कारोबार की संभावना दिखेगी वो उस संभावना को भुनाने का काम करेगा । वैसे अगर आशीष त्रिपाठी देहरी की टिप्पणी में शुक्ल रचनावली के कारणों का खुलासा कर देते तो बात और साफ हो जाती और उनके काम में भी पारदर्शिता रहती ।  
नामवर सिंह और आशीष त्रिपाठी के संपादन में रामचंद्र शुक्ल रचनावली जब छपकर आई तो लोगों ने उसको देखना प्रारंभ किया और दोनों को सामने रखकर उसपर चर्चा शुरू हो गई। इस चर्चा से एक बात निकलकर आ रही है कि ओमप्रकाश सिंह के संपादन में प्रकाशित रामचंद्र शुक्ल ग्रंथावली से कई अंश जस के तस उठाकर रामचंद्र शुक्ल रचनावली में रख दिए गए हैं । नामवर सिंह और आशीष त्रिपाठी के संपपादन में प्रकाशित रामचंद्र शुक्ल रचनावली में अंग्रेजी से अनुदित जो भी लेख छापे गए हैं वो ओमप्रकाश सिंह के संपादन में प्रकाशित रामचंद्र शुक्ल ग्रंथावली से उठाए गए हैं । इन लेखों को उठाते वक्त असवाधनीवश लेखों पर दी गई टिप्पणियों को भी शामिल कर लिया गया है । आरोप है कि यह कार्य साहित्यक चोरी की श्रेणी में आता है जहां बगैर आभार प्रकट किए किसी अन्य पुस्तक से उसका अंश उठा लिया जाता है । इस साहित्यक चोरी के आरोप से नामवर सिंह और आशीष त्रिपाठी को बच नहीं सकते । बच तो रामचंद्र शुक्ल रचनावली के प्रकाशक राजकमल प्रकाशन के मालिक अशोक महेश्वरी भी नहीं सकते । जब राजकमल प्रकाशन के मालिक अशोक महेश्वरी से बात की गई तो उन्होंने जो सफाई दी वो आशीष त्रिपाठी की देहरी में लिखी टिप्पणी जैसी ही है । अशोक महेश्वरी के मुताबिक – अभी विश्व पुस्तक मेला और पटना पुस्तक मेला की व्यस्तता और दिल्ली से बाहर रहने की वजह से मुझे इस प्रकरण की ठीक से जानकारी नहीं है।  रचनावली की मूल योजना के बनने और उसके छपने के बीच एक लंबा अंतराल रहा है। नामवर जी की देखरेख में सामग्री संचयन और संयोजन का काम आशीष त्रिपाठी जी कर रहे थे। समय लम्बा खींचता चला गया और नामवर जी का स्वास्थ्य गिरने लगा। नामवर जी की इस रचनावली को लेकर अधीरता बढ़ती गई। जैसे ही पूरी पांडुलिपि हमें मिली, नामवर जी के जन्मदिन को ध्यान में रख कर उसका प्रकाशन फौरी तौर पर हमने किया। अनूदित सामग्री के बारे में जो आरोप लग रहे हैं, इस बारे में हम रचनावली के संपादकों से बात कर वस्तुस्थिति को समझने की कोशिश कर रहे हैं। उसके बाद ही कोई भी निर्णय लेंगे। हाँ, किसी के साथ अन्याय न हो, इस बात का पूरा ध्यान हमारी तरफ से रखा जाएगा।‘  सवाल यही उठता है कि इस तरह की असावधानी राजकमल जैसे प्रतिष्ठित प्रकाशन गृह से कैसे हो सकती है । इतना वक्त बीत जाने के बाद भी अबतक वस्तुस्थित को समझने की कोशिश करना भी संदेह पैदा करता है । हिंदी साहित्य जगत में राजकमल प्रकाशन की प्रतिष्ठा के मद्देनजर प्रकाशक को फौरन इस साहित्यक चोरी की तफ्तीश करनी चाहिए और समग्रता में अपना पक्ष प्रस्तुत करना चाहिए । अगर ऐसा हो पाता है तो इस प्रकाशन गृह की साख बढ़ेगी नहीं तो साहित्यक चोरी के आरोप से उनकी साख पर बट्टा लगना तय है । साख का छीजना सबसे खतरनाक होता है कारोबार में भी और साहित्य में भी । यहां एकसवाल मन में यह भी उठता है कि अगर साहित्यक चोरी का मामला बनता है तो ग्रंथावली के प्रकाशक प्रकाशन ओमप्रकाश सिंह ने कोई कानूनी कार्यवाही क्यों नहीं की । 
यह माना जा सकता है कि नामवर सिंह अब उतने सक्रिय नहीं हैं कि वो पुस्तक का प्रूफ आदि देख सकें लेकिन उनके साथी संपादक ने भी कई असावधानियों को जाने दिया है । रचनावली में एक जगह नामवर जी की भूमिकानुमा लेख में छपा है इस पर फिर कभी । नामवर सिंह ने लिखना काफी पहले छोड़ दिया है उनको भाषणों का संकलन आशीष त्रिपाठी लंबे समय से कर रहे हैं । अब अगर उनके भाषण को किसी खंड की भूमिका के तौर पर प्रस्तुत किया जा रहा है तो उसमें सावधानी बरतनी चाहिए थी । नामवर जी से पूछकर उसको संपादित किया जा सकता था । वैसे भी अशोक महेश्वरी के मुताबिक नामवर सिंह की देखरेख में इस रचनावली का काम-काज चल रहा था तो उनको भी इस बारे में ध्यान रखना था । आचार्य रामचंद्र शुक्ल रचनावली के आठवें खंड में गोपाल सखा नाम का एक नाटक छपा है जिसके अंत में लिखा है – रामलाल सिंह के सौजन्य से । जबकि गोपाल सखा नाटक को शुक्ल जी का नाटक बताने पर पहले भी विवाद हो चुका है, जब यह नाटक साक्षात्कार पत्रिका में छपा था । इस पूरे विवाद के बाद यह निकलकर आया था कि गोपाल सखा नाटक शुक्ल जी का लिखा हुआ नहीं है । अब उसको एक बार फिर से आचार्य रामचंद्र शुक्ल रचनावली का हिस्सा बनाकर नामवर सिंह और आशीष त्रिपाठी ने वैधता प्रदान करने की कोशिश की है । दोनों संपादक विद्वान हैं और मानकर चलना चाहिए कि उनको गोपाल सखा नाटक पर उठे विवाद और उसके निबटारे की जानकारी होगी । अगर संपादकों के पास इस नाटक के आचार्य रामचंद्र शुक्ल का नाटक होने के बारे में कोई ठोस जानकारी हो तो उनको बताना चाहिए वर्ना हिंदी जगत से माफी मांगनी चाहिए । हिंदी साहित्य के इतिहास से छेड़छाड़ की इजाजत किसी को नहीं दी जा सकती है चाहे वो नामवर सिंह ही क्यों ना हों । अगर तथ्य सामने नहीं आते हैं तो प्रकाशक को फौरन इस नाटक को रचनावली से हटा देना चाहिए । दरअसल हिंदी में रचनावलियों को लेकर बहुत असावधानी से काम होता रहा है । ज्यादातर रचनावलियों और ग्रंथावलियों में असावधानी से ही काम हुआ है । जिससे आनेवाली पीढ़ियां गलत तथ्यों तके आधार पर काम कपने के लिए अभिश्पत हैं । अब अगर नामवर जी के संपादन और राजकमल के प्रकाशन में इस तरह की त्रुटियां रहती हैं तो हिंदी साहित्य के इतिहास का क्या होगा उसका भगवान ही मालिक है ।  



1 comment:

sujeet kumar singh said...

उस दौर में रामचंद्र शुक्ल बीए,रामचंद्र शुक्ल "सरस",रामचंद्र शुक्ल एमए नाम से कई लेखक विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लिख रहे थे। 'बालसखा'नाटक इन्हीं लेखकों में से किसी एक की हो सकती है। "अछूत की आह" शीर्षक कविता रामचंद्र शुक्ल 'सरस' की है पर तमाम आलोचक इस कविता को आचार्य शुक्ल की बताते हैं। "सरस" रामशंकर शुक्ल 'रसाल' के भाई थे।