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Tuesday, February 21, 2017

परंपरा के नाम पर बंधक लोकतंत्र !

देश की आजादी के सत्तर साल बाद एक राज्य के मुख्यमंत्री को महिलाओं के कानूनी अधिकार दिलवाने की कोशिश करने की वजह से पद छोड़ना पड़ता है । ऐसी ही चिंताजनक घटना हुई है नगालैंड में जहां के मुख्यमंत्री टी आर जिलियांग को प्रचंड बहुमत के बावजूद नगा संगठनों के विरोध की वजह से पद छोड़ना पड़ा । दरअसल जिलियांग चाहते थे कि नगालैंड के स्थानीय निकाय के चुनावों में महिलाओं को तौंतीस फीसदी आरक्षण दिया जाए और उन्होंने इसका ऐलान भी कर दिया । इसकी पृष्ठभूमि यह है कि पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने नगा महिलाओं के संगठन की अर्जी पर स्थानीय निकायों में महिलाओं को तैंतीस फीसदी आरक्षण को जायज ठहराया था । सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश के आलोक में जिलियांग ने एक फरवरी को होनेवाले स्थानीय निकाय के चुनाव में महिलाओं को तैंतीस फीसदी देने की घोषणा कर चुनाव करवाना चाहा था । इस फैसले के बाद से ही वहां हिंसक विरोध शुरू हो गया । नगा होहो और अन्य आदिवासी संगठनों ने सरकार के इस फैसले का विरोध शुरू कर दिया । महिलाओं को चुनाव में आरक्षण दिए जाने के विरोध में नगा संगठन के कार्यकर्ताओं ने ना केवल नगरपालिका के कार्यालय को फूंक दिया बल्कि मुख्यमंत्री के दफ्तर पर भी हमला कर दिया । विरोध की आग में जल रहे नगालैंड में पारंपरिक तौर पर पुरुष प्रधान नागा संगठनों ने मुख्यमंत्री जिलियांग का विरोध शुरू कर दिया और आखिरकार इन संगठनों के दबाव में जिलियांग को पद छोड़ना पड़ा । वह भी तब जब साठ सदस्यीय विधानसभा में जिलियांग की पार्टी नगालैंड पीपल्स पार्टी के छियालीस विधायक हैं और बाकी उनके समर्थक । परंपरा के नाम पर यह लोकतंत्र को बंधक बनाने जैसा है । आज हम इक्कीसवीं सदी में महिलाओं को बराबरी का अधिकार और कंधे से कंधा मिलाकर आगे बढ़ने के पथ पर अग्रसर हो रहे हैं तो इस तरह की दकियानूसी और परंपरावादी सोच समाज को कठघरे में खड़ा करता है और आधुनिक होने के हमारे दावों की पोल भी खोलता है ।
यह सही है कि आदिवासियों के जो संगठन नगालैंड में महिलाओं को चुनाव में आरक्षण की वकालत कर रहे हैं वो संविधान में वहां की जनता को मिले अधिकारों की अस्पष्टता आड़ ले रहे हैं । इन संगठनों का दावा है कि संविधान आदिवासियों को अपनी परंपरा और रीति रिवाजों के हिफाजत का अधिकार देता है । संविधान के अनुच्छेद तीन सौ इकहत्तर (ए) के मुताबिक- नगालैंड के धार्मिक और सामाजिक परंपराओं के मामलों में संसद का कोई कानून वहां लागू नहीं होता है ।वो अपनी परंपरा के हिसाब से काम करेंगे । इसके अलावा नगा आदिवासियों के लंबे समय से चले आ रहे रूढियों और प्रथाओं के अलावा संपत्ति के मामले भी इसी दायरे में आते हैं । संविधान के इसी अनुच्छेद को ढाल बनाकर नगालैंड में महिलाओं को उनका हक नहीं दिया जा रहा है । नगा आदिवासियों के संगठन में महिलाओं का प्रतिनिधित्व नहीं है और अगर देखा जाए तो उन्नीस सौ चौसठ के पहले विधानसभा चुनाव से लेकर अबतक वहां की विधानसभा में कोई महिला विधायक नहीं चुनी गई है । इससे पता चलता है कि नगालैंड में पितृसत्तात्मक समाज की जड़ें कितनी गहरी हैं । संविधान के उपरोक्त अनुच्छेद की अस्पष्टता और उचित व्याख्या नहीं होने की आड़ लेकर पुरुषवादी सामंती सोच को वैधता प्रदान किया जाता रहा है ।
दरअसल अगर हम देखें तो इस पूरे मसले पर संविधान में भी भ्रम की स्थिति है । एक तरफ तो संविधान अपने अनुच्छेद तीन सौ इकहत्तर (ए) में नगालैंड के अदिवासियों को अपनी परंपरा और रीति रिवाजों के हिफाजत का अधिकार देता है और दूसरी तरफ अनुच्छेद दो सौ तैंतालीस (डी) में महिलाओं के आरक्षण की बात करता है । इससे भी अधिक महत्वपूर्ण है कि यह संविधान में प्रदत्त समानता के अधिकारों की राह में बाधा बनकर खड़ा हो जाता है । यहां इस सिद्धांत को लागू करने की भी जरूरत है कि जब भी मौलिक अधिकारों के रास्ते में कोई पारंपरिक कानून अड़चन बनकर खड़ा होता है तो मौलिक अधिकारों को ही तरजीह दी जाती है । संविधान में मिले मौलिक अधिकार से किसी तरह का समझौता नहीं किया जा सकता है । अब वक्त  गया है कि संविधान में संशोधन करके इस बात को कानूनी जामा पहना दिया जाए । जकरूरत पड़े तो संविधान में संशोधन भी किया जाए । हमारी लोकतांत्रिक प्रकिया में कोई राज्य या कोई संगठन महिलाओं को दरकिनार कर लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूती नहीं दे सकता है । इस वक्त नगालैंड में अजीब द्वंद की स्थिति है जहां एक तरफ महिलाएं अपना हक मांग रही हैं वहीं दूसरी तरफ आदिवासियों की पंचायतें परंपरा और रूढ़ियों के नाम पर उनको संवैधानिक अधिकारों से वंचित करने का खुला खेल खेल रहे हैं । नगालैंड में सत्ता से चिपके रहने की चाहत में कोई भी विधायक जातीय संगठनों के इस फैसले के खिलाफ खड़ा होने की हिम्मत नहीं दिखा पाया । नेताओं की सियासी नपुंसकता ने वहां मसले को और उलझा दिया है ।

दरअसल अगर हम महिलाओं के अधिकारों को लेकर अगर वृहत्तर तस्वीर पर नजर डालें तो अब भी कई बाधाएं नजर आती हैं । नगालैंड में तो संविधान की अस्पष्टता विरोध करनेवालों को एक आधार दे रही है लेकिन अन्य प्रदेशों में भी जातीय पंचायतें महिलाओं के मसले को लेकर कितने अनुदार होते हैं ये समय समय पर देखने को मिलता है । समान गोत्र में प्रेम विवाह का विरोध से लेकर ऑनर किलिंग तक में पुरुष सत्ता अपने क्रूरतम रूप में सामने आती है । महिलाओं को बराबरी का हक देने दिलाने की खूब बातें हमारे रहनुमा करते हैं । चुनावों के वक्त नारी शक्ति की बातें फिजां में जोर शोर से गूंजती हैं लेकिन जब कानूनी रूप से उनको हक देने की बात आती है तो पुरुषसत्ता अपना असली रूप दिखाती है । संसद और राज्यों के विधानसभाओं में महिलाओं के आरक्षण का मुद्दा दो दशक से अधिक समय से अटका हुआ है । उन्नीस सौ छियानवे में देवगौड़ा के प्रधानमंत्रित्व काल में इस महिला आरक्षण बिल को लोकसभा में पेश किया गया था । दो साल बाद फिर से अटल बिहारी वाजपेयी के शासनकाल में इसको लोकसभा में बिल को पेश किया गया लेकिन हंगामे के अलावा कुछ हो नहीं पाया । संसदीय कमेटियों से होते हुए इस बिल को कई बार संसद में पेश किया गया लेकिन राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में पास नहीं हो पा रहा है । पिछले साल सितंबर में इस बिल को संसद में पेश हुए बीस साल हो गए । ये पास क्यों नहीं हो पा रहा है इसके पीछे की सोच पर विचार करने की जरूरत है । हमारे पुरुष प्रधान समाज के नेता इस तरह का बयान देते हैं कि अगर संसद में महिलाओं को आरक्षण देने का कानून बन जाता है तो सदन में सीटियां गूंजेगीं । महिला आरक्षण के विरोध को पूरे देश ने देखा था कि संसद किस तरह से एक सांसद की करतूत से शर्मसार हो गया था । अगर हम सचमुच महिला अधिकारों को लेकर संजीदा हैं तो समग्रता में संविधान के तमाम विरोधाभासों को दूर करना होगा ताकि परंपरा के नाम पर लोकतंत्र बंधक ना बने। 

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