पिछले लगभग एक दशक के प्रकाशनों पर नजर डालें तो हम पाते हैं कि कई वरिष्ठ पत्रकारों/संपादकों की मीडिया और उससे जुड़ें विषयों पर किताबें प्रकाशित हुई हैं । इन पुस्तकों में जो समानता दिखाई देती है वो यह है कि पत्रकारों, संपदकों ने पूर्व में लिखे लेखों को संयोजित कर एक थीम, आकर्षक शीर्षक और चर्चित समकालीन वरिष्ठ पत्रकार की गंभीर भूमिका के साथ पुस्तकाकार छपवाया है । मेरे जानते इसकी शुरुआत उदयन शर्मा के लेखों के संग्रह के प्रकाशित होने के साथ हुई थी । उसके बाद आलोक मेहता और मधुसूदन आनंद के प्रयासों राजेन्द्र माथुर के लेखों का संग्रह सपनों में बनता देश छपा था। ये दोनों प्रयास अपने वरिष्ठों के निधन के बाद उनके लेखन से अगली पीढ़ी को परिचित करवाने की एक ईमानदार कोशिश थी । लेकिन बाद में कई वरिष्ठ पत्रकारों के लेखों के संग्रह प्रकाशित होने शुरी हुए । दो हजार तीन में प्रभाष जोशी के लेखों का संग्रह हिंदू होने का धर्म छपा, जिसमें उन्होंने लगभग पचास पन्नों की लंबी भूमिका लिखी । लगभग उसी वक्त अरविंद मोहन की किताब मीडिया की खबर प्रकाशित हुई थी । दो हजार आठ में एक बार फिर से प्रभाष जोशी के अखबारी लेखों के चार संकलन एक साथ प्रकाशित हुए । सिर्फ प्रभाष जोशी या अरविंद मोहन ही इस सूची में नहीं है । कई वरिष्ठ लेखकों ने इस तरह की किताबें छपवाई हैं । जब ये किताबें छप कर बाजार में आ रही थी तो वो दौर मीडिया के विस्तार का दौर था और अखबारों और न्यूज चैनलों के विस्तार की वजह से पत्रकारिता पढ़ाने के संस्थान धड़ाधड़ खुल रहे थे, जिसमें पढ़नेवाले छात्रों की संख्या बहुत ज्यादा थी । यह महज एक संयोग था या फिर बाजार को ध्यान में रखकर ऐसा हो रहा था इसका निर्णय होना अभी शेष है । लेकिन जिस तरह से पूर्व प्रकाशित अखबारी लेखों का संकलन पत्रकारिता को ध्यान में रखकर किया गया या जा रहा है उससे यह तो साफ प्रतीत होता ही है कि यह बाजार को भुनाने की या फिर बाजार से अपना हिस्सा लेने की कोशिश है ।
अब इस कड़ी में प्रिंट और टीवी में काम कर चुके पत्रकार प्रभात शुंगलू की किताब - यहां मुखौटे बिकते हैं प्रकाशित हुई है । इस किताब का ब्लर्ब राजदीप सरदेसाई ने लिखा है । राजदीप के मुताबिक प्रभात अलग अलग विषयों पर लिखते हैं । चाहे वो धारा 377 हो या फिर एमएफ हुसैन लेकिन इन सबके बीच प्रभात के लेखन में एक बात समान है - वह है भारत के संविधान में मौजूद उदारवादी मूल्यों में उनकी अटल प्रतिबद्धता । राजदीप के अलावा प्रभात ने अपने पत्रकार बनने और टीवी में आने के बाद फिर से लिखना शुरू करने की दिलचस्प दास्तां लिखी है । प्रभात के लेखन में अंग्रेजी के शब्द बहुतायत में आते हैं और लेखक के मुताबिक वो आम बोलचाल की भाषा है । इसके लिए उनके अपने तर्क भी हैं और तथ्य भी । पर मेरा मानना है कि दूसरी भाषा के शब्दों से परहेज ना करें लेकिन अगर आप हिंदी में लिख रहे हैं और वहां दूसरी भाषा से बेहतर और आसान शब्द मौजूद हैं तो फिर आम बोलचाल के नाम पर दुराग्रह उचित नहीं है । लेकिन प्रबात के लेखों में यह चीज एक जिद की तरह आती है गोया वो कोई नया प्रयोग कर रहे हैं या कोई नई भाषा गढ़ रहे हैं ।
इस किताब में तीन अलग अलग खंड हैं- सियासत, शख्सियत और समाज । इन तीन खानों में प्रभात ने अपने लेखों का बांटा है । प्रभात की एक खासियत है कि वो गंभीर विषयों पर भी व्यंग्यात्मक शैली में अपनी कलम चलाते हैं । चाहे वो कौन बनेगा वीक प्रधानमंत्री हो या फिर यहां मुखौटे बिकते हैं या फिर पांडु ब्रदर्स एंड सन्स हो या फिर हुसैन,तुम माफी मत मांगना हर जगह एक तंज नजर आता है जिसे प्रभात की शैली के तौर पर रेखांकित किया जा सकता है । कौन बनेगा वीक प्रधानमंत्री में आडवाणी पर तंज कसते हुए प्रभात कहते हैं- एक पल के लिए अगर मान भी लें कि आप प्रधानमंत्री बन भी जाते हैं तो क्या आज शपथ लेकर कह पाएंगे कि सत्ता का कंट्रोल और रिमोट कंट्रोल दोनों आपके हाथ में होगा - राजनाथ, जेटली नरेन्द्र मोदी और वरुण गांधी के हाथ में नहीं । मोहन भागवत के हाथ में नहीं । प्रमोद मुथल्लिक के हाथ में नहीं । वहीं पांडु ब्रदर्स एंड सन्स में प्रभात गठजोड़ की राजनीति पर व्यंग्यात्मक शैली में लिखते हैं- अजित सिंह ने फिर बीजेपी का दामन थामा है । कैलकुलेशन किया 4 सीटें भी जीती दो मिनिस्टर बर्थ पक्की । एक अपनी और एक अनु की । गडकरी के बीजेपी अध्यक्ष का पद संभालने के बाद अपने लेख कुहासे में नेतृत्व में प्रभात लिखते हैं - पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद भी गडकरी का नागपुर प्रेम कुलांचे मारता नजर आया । आगे लिखते हैं कि गडकरी पांव छूने को चाटुकारिता मानते हैं लेकिन अद्यक्ष बनने के बाद राजनाथ, आडवाणी सुषमा के पांव छूकर आशीर्वाद लिया वो शीर्ष नेताओं के प्रति उनकी श्रद्धा थी । अब गड़करी हनुमान होते तो अपना सीना चीरकर दिखला देते ।
प्रभात शुंगलू की इस किताब में चूंकि अखबारी लेखों के संग्रह हैं इसलिए कई बातें संपूर्णता में नहीं आ पाई । कई लेख विस्तार की मांग करते हैं जैसे करगिल से जुड़े प्रभात के लेखों में एक अलग किताब की गुंजाइश नजर आती है । प्रभात शुंगलू करगिल युद्ध को कवर करनेवाले गिने चुने पत्रकारों में एक हैं, उन्हें उस दौर के अपने अनुभवों पर गंभीरता पूर्वक विस्तार से लिखना चाहिए ताकि एक स्थायी महत्व की किताब सामने आए, जल्दबाजी में करगिल पर अखबार के स्पेस के हिसाब से लिखकर और फिर उसे अपनी किताब में छपवाकर प्रबात ने अपरिपक्वता का परिचय दिया है । यहां मुखौटे बिकते हैं प्रभात शुंगलू की पहली किताब है और पहली बार किताब छपने के उत्साह में कई हल्की चीजें भी चली गई हैं, जिनका कोई स्थायी महत्व नहीं है, जैसे मुंबई की अस्मिता से खिलवाड़ जैसे लेखों का स्थायी महत्व नहीं हो सकता है । इस किताब का सिर्फ इतना महत्व है दो हजार नौ के शुरुआत से लेकर लगभग सवा साल की महत्वपूर्ण घटनाएं और इसपर लेखक का नजरिया आपको एक जगह मिल जाएगा । प्रभात की यह किताब इस बात का संकेत जरूर देती है कि अगर वो गंभीरता से विषय विशेष पर और उसके हर पहलू पर विस्तार से लिखें तो गंभीर किताब बन सकती है ।
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Monday, September 27, 2010
Thursday, September 23, 2010
संवैधानिक संस्था की साख पर बट्टा
एक बार फिर देश में एक संवैधानिक पद पर हुई नियुक्ति विवादों के घेरे में आ गई है । मुख्य सतर्कता आयुक्त के पद पर भारत सरकार के दूरसंचार सचिव की नियुक्ति लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज के विरोध को दरकिनार करते हुए कर दी गई । मुख्य सतर्कता आयुक्त का चुनाव प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय कमिटी करती है जिसमें प्रधानमंत्री के अलावा गृह मंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता होते हैं । अब तक परंपरा यह रही है कि आम सहमति के आधार पर ही मुख्य सतर्कता आयुक्त का चयन होता है लेकिन इस बार लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज की आपत्तियों को धता बताते हुए दूरसंचार सचिव पी जे थॉमस के नाम पर मुहर लगा दी गई । आम सहमति की परंपरा इसलिए बनाई गई थी ताकि इस संवैधानिक संस्था में शासक दल और विपक्षी दल दोनों का विश्वास बना रहे । उसकी जांच पर किसी तरह का सवाल ना उठे और विपक्षी दल भी सीवीसी की जांच पर पक्षपात का आरोप ना लगा सकें, इसलिए जब इस संस्था का गठन किया गया था तो यह तय किया गया था कि सीवीसी के चयन में नेता प्रतिपक्ष की राय को अहमियत दी जाएगी । लेकिन यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि प्रधानमंत्री की मौजूदगी वाली इस समिति ने मान्य परंपरा का ध्यान नहीं रखा ।
पी जे थॉमस के मुख्य सतर्कता आयुक्त बनने के बाद यह सवाल सुरसा की तरह मंह बाए खड़ा हो गया है टू जी स्पेक्ट्रम आवंटन के घोटाले की जांच वो वयक्ति कैसे कर सकता है जो इस पद पर आने के पहले खुद दूरसंचार सचिव रहा हो । यह भी तथ्य है कि टू जी स्पेक्ट्रम का आवंटन थॉमस के मंत्रालय में आने के पहले हो चुका था लेकिन साथ ही दूसरा तथ्य यह भी है कि बीते अगस्त में जब जब पी जे थॉमस दूरसंचार सचिव थे तो उस वक्त मंत्रालय ने एक नोट तैयार किया था जिसमें यह कहा गया था कि स्पेक्ट्रम आवंटन नीतिगत मामला है और इसमें जिसमें सीवीसी या सीएजी की जांच की कोई भूमिका बनती नहीं है । इस नोट के अलावा भी दूरसंचार मंत्रालय के सचिव होने के नाते थॉमस कई बार इस तरह के किसी घोटाले से इंकार करते हुए बेहद मजबूती से अपने मंत्रालय का बचाव भी करते रहे हैं । अब जब वही पी जे थॉमस देश के मुख्य सतर्कता आयुक्त बन गए हैं तो क्या यह मान लिया जाए कि टू जी स्पेक्ट्रम आवंटन घोटाले की जांच सीवीसी नहीं करेगी और आवंटन का सच हमेशा के लिए दफन हो जाएगा ।
दूसरी अहम बात जिसको लेकर पी जी थॉमस की नियुक्ति पर विवाद है वो है उनका दागदार दामन । उन्नीस सौ तिहत्तर बैच के भारतीय प्रशासनिक सेवा के अफसर थॉमस का करियर कई बार विवादों में रहा है । थॉमस जब केरल में खाद्य और आपूर्ति विभाग के सचिव हुआ करते थे तो उस वक्त ही मलेशिया से पॉम आयल के आयात को लेकर घपला हुआ था जिसने सुदूर दक्षिण के इस राज्य की राजनीति में भूचाल ला दिया था । उस घोटाले के छींटे थॉमस के दामन पर भी पड़े थे । तब जोर-शोर से यह मांग उठी थी कि खाद्य सचिव होने के नाते पी जे थॉमस की भूमिका की जांच की जाए लेकिन केंद्र सरकार के इजाजत नहीं मिलने से जांच नहीं हो पाई थी । पॉम ऑयल घोटाले का जिन्न एक बार तब फिर बाहर निकला था जब थॉमस को सूबे का मुख्य सचिव बनाने की बात चली थी । शुरुआत में राज्य सरकार ने थोड़ी हिचक जरूर दिखाई थी लेकिन बाद में उनको केरल का मुख्य सचिव बना दिया गया था । इस तरह के अफसर जिनपर कई तरह के आरोप लगे हों और जिनका करियर बेदाग नहीं रहा हो उनको मुख्य सतर्कता आयुक्त बनाने के लिए एक मान्य परंपरा को तोड़ने की क्या आवश्यकता थी । विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने नियुक्ति के पहले की बैठक में इन बातों को लेकर अपनी आपत्ति दर्ज करवा दी थी लेकिन ना तो प्रधानमंत्री ने और ना ही गृह मंत्री ने नेता विपक्ष की राय को तवज्जो दी । सीवीसी के पैनल में दो और अपेक्षाकृत बेहतर नाम थे जिनकी उम्मीदवारी को दरकिनार कर थॉमस के नाम को स्वीकृति दी गई । सवाल यह उठता है कि सरकार थॉमस को लेकर इतना आग्रही क्यों थी । क्या यहां भी मनमोहन सिंह के सामने गठबंधन सरकार की मजबूरी थी । क्या यहां भी दूरसंचार मंत्री ए राजा या फिर उनकी पार्टी के सुप्रीमो करुणानिधि की सिफारिश थी जिसे ठुकराना मनमोहन सिंह के लिए मुश्किल था क्योंकि करुणानिधि की पार्टी के सांसदों के बल पर यूपीए-2 की बुनियाद टिकी है ।
इन सबसे इतर जो एक बड़ा सवाल है वो यह कि इस संवैधानिक संस्था में अब विपक्षी दलों का कितना विश्वास रह जाएगा । जिसके मुखिया का दामन ही दागदार हो और प्रमुख विपक्षी दल उनपर आरोपों की झड़ी लगा रहे हों उनकी जांच पर वो कैसे भरोसा करेगी । होना तो यह चाहिए था कि सरकार एक ऐसे वयक्ति को इस पद पर नियुक्त करती जिनका करियर बेदाग होता और उसकी छवि ऐसी होती जिसपर सहज किसी को भी भरोसा हो सकता था । अगर देश के मुख्य सतर्कता आयुक्त की विश्वसनीयता पर जरा भी सवाल खड़ा होता है तो वो इस संवैधानिक संस्था को ना केवल कमजोर करता है बल्कि लोगों का भरोसा भी खत्म करता है । इस मामले में यही हुआ है जिससे मनमोहन सरकार की छवि को तो धक्का लगा ही है इस संवैधानिक संस्था की साख पर भी बट्टा लगा है ।
पी जे थॉमस के मुख्य सतर्कता आयुक्त बनने के बाद यह सवाल सुरसा की तरह मंह बाए खड़ा हो गया है टू जी स्पेक्ट्रम आवंटन के घोटाले की जांच वो वयक्ति कैसे कर सकता है जो इस पद पर आने के पहले खुद दूरसंचार सचिव रहा हो । यह भी तथ्य है कि टू जी स्पेक्ट्रम का आवंटन थॉमस के मंत्रालय में आने के पहले हो चुका था लेकिन साथ ही दूसरा तथ्य यह भी है कि बीते अगस्त में जब जब पी जे थॉमस दूरसंचार सचिव थे तो उस वक्त मंत्रालय ने एक नोट तैयार किया था जिसमें यह कहा गया था कि स्पेक्ट्रम आवंटन नीतिगत मामला है और इसमें जिसमें सीवीसी या सीएजी की जांच की कोई भूमिका बनती नहीं है । इस नोट के अलावा भी दूरसंचार मंत्रालय के सचिव होने के नाते थॉमस कई बार इस तरह के किसी घोटाले से इंकार करते हुए बेहद मजबूती से अपने मंत्रालय का बचाव भी करते रहे हैं । अब जब वही पी जे थॉमस देश के मुख्य सतर्कता आयुक्त बन गए हैं तो क्या यह मान लिया जाए कि टू जी स्पेक्ट्रम आवंटन घोटाले की जांच सीवीसी नहीं करेगी और आवंटन का सच हमेशा के लिए दफन हो जाएगा ।
दूसरी अहम बात जिसको लेकर पी जी थॉमस की नियुक्ति पर विवाद है वो है उनका दागदार दामन । उन्नीस सौ तिहत्तर बैच के भारतीय प्रशासनिक सेवा के अफसर थॉमस का करियर कई बार विवादों में रहा है । थॉमस जब केरल में खाद्य और आपूर्ति विभाग के सचिव हुआ करते थे तो उस वक्त ही मलेशिया से पॉम आयल के आयात को लेकर घपला हुआ था जिसने सुदूर दक्षिण के इस राज्य की राजनीति में भूचाल ला दिया था । उस घोटाले के छींटे थॉमस के दामन पर भी पड़े थे । तब जोर-शोर से यह मांग उठी थी कि खाद्य सचिव होने के नाते पी जे थॉमस की भूमिका की जांच की जाए लेकिन केंद्र सरकार के इजाजत नहीं मिलने से जांच नहीं हो पाई थी । पॉम ऑयल घोटाले का जिन्न एक बार तब फिर बाहर निकला था जब थॉमस को सूबे का मुख्य सचिव बनाने की बात चली थी । शुरुआत में राज्य सरकार ने थोड़ी हिचक जरूर दिखाई थी लेकिन बाद में उनको केरल का मुख्य सचिव बना दिया गया था । इस तरह के अफसर जिनपर कई तरह के आरोप लगे हों और जिनका करियर बेदाग नहीं रहा हो उनको मुख्य सतर्कता आयुक्त बनाने के लिए एक मान्य परंपरा को तोड़ने की क्या आवश्यकता थी । विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने नियुक्ति के पहले की बैठक में इन बातों को लेकर अपनी आपत्ति दर्ज करवा दी थी लेकिन ना तो प्रधानमंत्री ने और ना ही गृह मंत्री ने नेता विपक्ष की राय को तवज्जो दी । सीवीसी के पैनल में दो और अपेक्षाकृत बेहतर नाम थे जिनकी उम्मीदवारी को दरकिनार कर थॉमस के नाम को स्वीकृति दी गई । सवाल यह उठता है कि सरकार थॉमस को लेकर इतना आग्रही क्यों थी । क्या यहां भी मनमोहन सिंह के सामने गठबंधन सरकार की मजबूरी थी । क्या यहां भी दूरसंचार मंत्री ए राजा या फिर उनकी पार्टी के सुप्रीमो करुणानिधि की सिफारिश थी जिसे ठुकराना मनमोहन सिंह के लिए मुश्किल था क्योंकि करुणानिधि की पार्टी के सांसदों के बल पर यूपीए-2 की बुनियाद टिकी है ।
इन सबसे इतर जो एक बड़ा सवाल है वो यह कि इस संवैधानिक संस्था में अब विपक्षी दलों का कितना विश्वास रह जाएगा । जिसके मुखिया का दामन ही दागदार हो और प्रमुख विपक्षी दल उनपर आरोपों की झड़ी लगा रहे हों उनकी जांच पर वो कैसे भरोसा करेगी । होना तो यह चाहिए था कि सरकार एक ऐसे वयक्ति को इस पद पर नियुक्त करती जिनका करियर बेदाग होता और उसकी छवि ऐसी होती जिसपर सहज किसी को भी भरोसा हो सकता था । अगर देश के मुख्य सतर्कता आयुक्त की विश्वसनीयता पर जरा भी सवाल खड़ा होता है तो वो इस संवैधानिक संस्था को ना केवल कमजोर करता है बल्कि लोगों का भरोसा भी खत्म करता है । इस मामले में यही हुआ है जिससे मनमोहन सरकार की छवि को तो धक्का लगा ही है इस संवैधानिक संस्था की साख पर भी बट्टा लगा है ।
Monday, September 13, 2010
पाठकों से छल करते कहानीकार
चंद दिनों पहले की बात है मेरी पत्नी किताबों की दुकान से चित्रा मुदगल की किताब- गेंद और अन्य कहानियां खरीद लाई । इस संग्रह के उपर दो मासूम बच्चों की तस्वीर छपी है और नीचे लिखा है बच्चों पर केंद्रित कहानियों का अनूठा संकलन । मुझे भी लगा कि पेंग्विन से चित्रा जी कहानियों का नया संग्रह आया है । लेकिन जब मैंने उसे उलटा पुलटा तो लगा कि उसमें तो चित्रा जी की पुरानी कहानियां छपी हैं । उसके बाद जब मैंने अपनी वयक्तिगत लाइब्रेरी को खंगालना शुरू किया तो पता चला कि चित्रा मुदगल के पांच कहानी संकलन मेरे पास हैं । भूख जो ज्ञानगंगा, दिल्ली से प्रकाशित हुई है, दस प्रतिनिधि कहानियां जो किताबघर प्रकाशन से प्रकाशित हुई हैं, चर्चित कहानियां जो सामयिक प्रकाशन से प्रकाशित हुई हैं, इसके अलावा डायमंड बुक्स से प्रकाशित संग्रह भी मेरी नजर से गुजर चुका है । और अंत में सामयिक प्रकाशन ने ही चित्रा मुदगल की संपूर्ण कहानियों का संग्रह आदि-अनादि के नाम से तीन खंडों में छापा है । इन सारे संग्रहों में घूम फिर कर वही-वही कहानियां प्रकाशित हैं । हिंदी साहित्य में यह काम सिर्फ चित्रा मुदगल ने नहीं किया है । ज्यादातर कहानीकारों ने साहित्य में ये घपला किया है । हिंदी साहित्य को लंबे समय से नजदीक से देखनेवालों का कहना है कि हिंदी में ये खेल हिमांशु जोशी ने शुरू किया । जानकारों की मानें तो इस प्रवृत्ति के प्रणेता हिमांशु जोशी ही हैं । कहनेवाले तो यहां तक कहते हैं कि जोशी जी की उतनी कहानियां नहीं हैं जितने उनके संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं । कहीं से चर्चित कहानियां, कहीं से प्रतिनिधि कहानियां, कहीं से फलां तथा अन्य कहानियां, कहीं से प्रेम कहानियां, कहीं से बच्चों की कहानियां, कहीं से अमुक वयक्ति की पसंद की कहानियां । हद तो तब हो गई जब कहानीकार अपनी उम्र और सालगिरह के हिसाब से संग्रह छपवाने लगे । ऐसा नहीं है कि सिर्फ हिमांशु जोशी और चित्रा मुदगल ने ही यह काम किया है । हिंदी के कमोबेश सभी कहानीकारों ने इस तरह से पाठकों को छला है । वरिष्ठ कहानीकार गंगा प्रसाद विमल के भी कई संग्रह हैं जिनमें कहानियों का दुहराव है । चंद लोगों के नाम लेने का मकसद सिर्फ इतना है कि मेरी बातें हवाई ना लगे और वो तथ्यों पर आदारित हों ।
दरअसल इस पूरे खेल का मकसद सिर्फ और सिर्फ पैसा कमाना है। पैसा कमाने की इस दौड़ में हिंदी के कहानीकार यह भूल जा रहे हैं कि वो पाठकों के साथ कितना बड़ा छल कर रहे हैं । चमचमाते कवर और नए शीर्षक को देखकर कोई भी पाठक अपने महबूब लेखक- लेखिका की किताबें खरीदे लेता है । लेकिन जब वो घर आकर उसे पलटता है तो अपने को ठगा महसूस करने के अलावा उसके पास कोई चारा नहीं बचता है । पैसे की हानि के साथ साथ टूटता-दरकता है उसका विश्वास । वो विश्वास जो एक पाठक अपने प्रिय लेखक पर करता है । पाठकों के इसी विश्वास की बनियाद साहित्य की सबसे बड़ी ताकत है और जब उसमें ही दरार पड़ती है तो यह सीधे-सीधे साहित्य का नुकसान है जो फौरी तौर पर तो नजर नहीं आएगा लेकिन इसके दूरगामी परिणाम होंगे । जल्दी पैसे कमाने की होड़ में हिंदी का कहानीकार यह भूल जा रहा है कि अगर उसने यह प्रवृत्ति नहीं छोड़ी तो उसको पाठक मिलने बंद हो जाएंगे । अभी ही वो पाठकों की कमी का रोना रोते हैं लेकिन एक अगर एक बार पाठकों का भरोसा लेखकों से उठ गया तो क्या अंजाम होगा इसकी सिर्फ कल्पना की जा सकती है ।
यह घपला सिर्फ इस रूप में नहीं आया है । हिंदी में कई ऐसे कहानीकार हैं जिनकी लंबी कहानी किसी पत्रिका में छपी फिर उसी लंबी कहानी को उपन्यास के रूप में प्रकाशित करवा लिया गया । वर्तमान साहित्य के कहानी महाविशेषांक में हिंदी की बेहद समादृत और वरिष्ठ लेखिका कृष्णा सोबती की लंबी कहानी ऐ लड़की प्रकाशित हुई थी । जिसे बाद में स्वतंत्र रूप से उपन्यास के रूप में छापा-छपवाया गया । इसी तरह से दूधनाथ सिंह की लंबी कहानी नमो अंधकारम भी पहले तो कहानी के रूप में प्रकाशित-प्रचारित हुई लेकिन कालांतर में वो एक उपन्यास के रूप में छपा । यही काम हिंदी के जादुई यथार्थवादी कहानीकार भी कर चुके हैं जिन्होंने हंस में प्रकाशित अपनी लंबी कहानियों को डबल स्पेस में टाइप करवाकर उपन्यास बना दिया । एक ही रचना कहानी भी है और वही रचना उपन्यास भी एक ही समय पर यह कैसे संभव है लेकिन हिंदी में ऐसा धड़ल्ले से हुआ है । यह पाठकों के साथ छल नहीं तो क्या है । अपने फायदे के लिए पाठकों को ठगना कितना अनैतिक है इसका फैसला तो भविष्य में होगा ।
बाजारवाद और बाजार को पानी पी पी कर सोते जागते गरियानेवाले हिंदी के इन लेखकों से यह पूछा जाना चाहिए कि वो बाजार की ताकतों के हाथ क्यों खेल रहे हैं । क्या व्यक्तिगत फायदे के लिए बाजार की शक्तियों के आगे घुटने टेक देने में उन्हें कोई गुरेज नहीं है । सारे सिद्धांत और सारे वाद क्या सिर्फ कागजों में या उनके आग उगलते भाषणों में ही नजर आएंगे या फिर सारी क्रांति पड़ोसी के घर से शुरू होंगी । हिंदी में बार-बार नैतिकता की बात उठाने वाले लेखकों-आलोचकों की इस मसले पर चुप्पी हैरान करनेवाली है । पिछले लगभग दो तीन दशक से कहानीकारों का पाठकों के साथ यह धोखा जारी है लेकिन कहीं किसी कोने से कोई आवाज नहीं उठी । किसी लेखक ने इस प्रवृत्ति पर आपत्ति नहीं उठाई । प्रगतिशीलता और साहित्यक शुचिता की बात करनेवाले वामपंथी लेखकों को भी कहानीकारों का यह छल नजर नहीं आया बल्कि वो तो खुले तौर पर इस खेल में शामिल नजर आते हैं । मार्क्सवाद को अपने कंधे पर ढोनेवाले मार्क्सवादी लेखकों-आलोचकों को यह धोखा नजर नहीं आया या नजर आने के बावजूद आंखें मूंदे बैठे रहे । लेखक संगठनों तक ने इस धोखेबाजी पर कुछ ना बोलना ही उचित समझा । उनसे कोई उम्मीद भी नहीं की जा सकती है क्योंकि लेखक संगठन लगभग मृतप्राय हैं और जो बचे हैं वो भी क्षेत्रीय राजनीतिक दलों की तरह अपने नेताओं के जेबी संगठन मात्र बनकर रह गए हैं ।
कुछ कहानीकारों का यह तर्क है कि अलग-अलग प्रकाशकों से अलग-अलग नामों से कहानी संग्रह छपवाने का मूल मकसद वृहत्तर पाठक समुदाय तक पहुंचना है । अपने इस कृत्य के तर्क में कई कहानीकार यह भी कहते हैं कि एक प्रकाशन से संस्करण खत्म होने के बाद ही वो दूसरे प्रकाशक के यहां से अपनी कहानियां छपवाते हैं । लेकिन यह दोनों तर्क एक सफेद झूठ की तरह है । कई संकलन मेरे सामने रखे हैं जिनका प्रकाशन वर्ष या तो एक ही वर्ष में है या फिर अगले वर्ष । हिंदी प्रकाशन जगत को नजदीक से जानने वालों का मानना है कि अभी हिंदी में यह स्थिति नहीं आई है कि किसी कहानी संग्रह का एक संस्करण छह माह में या एक साल में खत्म हो जाए । इसके पीछे चाहे संग्रह के कम खरीदार हों या फिर प्रकाशकों का घपला । जहां तक वृहत्तर पाठक समुदाय तक पहुंचने की बात है तो यह अलग-अलग नाम से अलग-अलग प्रकाशन संस्थानों से छपवाने से कैसे संभव है ,यह फॉर्मूला भी अभी सामने आना शेष है ।
अब वक्त आ गया है कि हिंदी के तमाम वरिष्ठ लेखक इस बात पर गंभीरता से विचार करें और पाठकों के साथ दशकों से हो रहे इस छल पर मिल बैठकर बात करें और उसे रोकने के लिए तुरंत कोई कदम उठाएं वर्ना हिंदी के पाठक ही इस बात का फैसला कर देंगे । पाठक अगर फैसला करेंगे तो वो दिन हिंदी के कहानीकारों के लिए बहुत बुरा दिन होगा और फिर उस फैसले पर पुनर्विचार का कोई मौका भी नहीं होगा क्योंकि जिस तरह से लोकतंत्र में वोटर का फैसला अंतिम होता है उसी तरह से साहित्य में पाठक का फैसला अंतिम और मान्य होता है ।
दरअसल इस पूरे खेल का मकसद सिर्फ और सिर्फ पैसा कमाना है। पैसा कमाने की इस दौड़ में हिंदी के कहानीकार यह भूल जा रहे हैं कि वो पाठकों के साथ कितना बड़ा छल कर रहे हैं । चमचमाते कवर और नए शीर्षक को देखकर कोई भी पाठक अपने महबूब लेखक- लेखिका की किताबें खरीदे लेता है । लेकिन जब वो घर आकर उसे पलटता है तो अपने को ठगा महसूस करने के अलावा उसके पास कोई चारा नहीं बचता है । पैसे की हानि के साथ साथ टूटता-दरकता है उसका विश्वास । वो विश्वास जो एक पाठक अपने प्रिय लेखक पर करता है । पाठकों के इसी विश्वास की बनियाद साहित्य की सबसे बड़ी ताकत है और जब उसमें ही दरार पड़ती है तो यह सीधे-सीधे साहित्य का नुकसान है जो फौरी तौर पर तो नजर नहीं आएगा लेकिन इसके दूरगामी परिणाम होंगे । जल्दी पैसे कमाने की होड़ में हिंदी का कहानीकार यह भूल जा रहा है कि अगर उसने यह प्रवृत्ति नहीं छोड़ी तो उसको पाठक मिलने बंद हो जाएंगे । अभी ही वो पाठकों की कमी का रोना रोते हैं लेकिन एक अगर एक बार पाठकों का भरोसा लेखकों से उठ गया तो क्या अंजाम होगा इसकी सिर्फ कल्पना की जा सकती है ।
यह घपला सिर्फ इस रूप में नहीं आया है । हिंदी में कई ऐसे कहानीकार हैं जिनकी लंबी कहानी किसी पत्रिका में छपी फिर उसी लंबी कहानी को उपन्यास के रूप में प्रकाशित करवा लिया गया । वर्तमान साहित्य के कहानी महाविशेषांक में हिंदी की बेहद समादृत और वरिष्ठ लेखिका कृष्णा सोबती की लंबी कहानी ऐ लड़की प्रकाशित हुई थी । जिसे बाद में स्वतंत्र रूप से उपन्यास के रूप में छापा-छपवाया गया । इसी तरह से दूधनाथ सिंह की लंबी कहानी नमो अंधकारम भी पहले तो कहानी के रूप में प्रकाशित-प्रचारित हुई लेकिन कालांतर में वो एक उपन्यास के रूप में छपा । यही काम हिंदी के जादुई यथार्थवादी कहानीकार भी कर चुके हैं जिन्होंने हंस में प्रकाशित अपनी लंबी कहानियों को डबल स्पेस में टाइप करवाकर उपन्यास बना दिया । एक ही रचना कहानी भी है और वही रचना उपन्यास भी एक ही समय पर यह कैसे संभव है लेकिन हिंदी में ऐसा धड़ल्ले से हुआ है । यह पाठकों के साथ छल नहीं तो क्या है । अपने फायदे के लिए पाठकों को ठगना कितना अनैतिक है इसका फैसला तो भविष्य में होगा ।
बाजारवाद और बाजार को पानी पी पी कर सोते जागते गरियानेवाले हिंदी के इन लेखकों से यह पूछा जाना चाहिए कि वो बाजार की ताकतों के हाथ क्यों खेल रहे हैं । क्या व्यक्तिगत फायदे के लिए बाजार की शक्तियों के आगे घुटने टेक देने में उन्हें कोई गुरेज नहीं है । सारे सिद्धांत और सारे वाद क्या सिर्फ कागजों में या उनके आग उगलते भाषणों में ही नजर आएंगे या फिर सारी क्रांति पड़ोसी के घर से शुरू होंगी । हिंदी में बार-बार नैतिकता की बात उठाने वाले लेखकों-आलोचकों की इस मसले पर चुप्पी हैरान करनेवाली है । पिछले लगभग दो तीन दशक से कहानीकारों का पाठकों के साथ यह धोखा जारी है लेकिन कहीं किसी कोने से कोई आवाज नहीं उठी । किसी लेखक ने इस प्रवृत्ति पर आपत्ति नहीं उठाई । प्रगतिशीलता और साहित्यक शुचिता की बात करनेवाले वामपंथी लेखकों को भी कहानीकारों का यह छल नजर नहीं आया बल्कि वो तो खुले तौर पर इस खेल में शामिल नजर आते हैं । मार्क्सवाद को अपने कंधे पर ढोनेवाले मार्क्सवादी लेखकों-आलोचकों को यह धोखा नजर नहीं आया या नजर आने के बावजूद आंखें मूंदे बैठे रहे । लेखक संगठनों तक ने इस धोखेबाजी पर कुछ ना बोलना ही उचित समझा । उनसे कोई उम्मीद भी नहीं की जा सकती है क्योंकि लेखक संगठन लगभग मृतप्राय हैं और जो बचे हैं वो भी क्षेत्रीय राजनीतिक दलों की तरह अपने नेताओं के जेबी संगठन मात्र बनकर रह गए हैं ।
कुछ कहानीकारों का यह तर्क है कि अलग-अलग प्रकाशकों से अलग-अलग नामों से कहानी संग्रह छपवाने का मूल मकसद वृहत्तर पाठक समुदाय तक पहुंचना है । अपने इस कृत्य के तर्क में कई कहानीकार यह भी कहते हैं कि एक प्रकाशन से संस्करण खत्म होने के बाद ही वो दूसरे प्रकाशक के यहां से अपनी कहानियां छपवाते हैं । लेकिन यह दोनों तर्क एक सफेद झूठ की तरह है । कई संकलन मेरे सामने रखे हैं जिनका प्रकाशन वर्ष या तो एक ही वर्ष में है या फिर अगले वर्ष । हिंदी प्रकाशन जगत को नजदीक से जानने वालों का मानना है कि अभी हिंदी में यह स्थिति नहीं आई है कि किसी कहानी संग्रह का एक संस्करण छह माह में या एक साल में खत्म हो जाए । इसके पीछे चाहे संग्रह के कम खरीदार हों या फिर प्रकाशकों का घपला । जहां तक वृहत्तर पाठक समुदाय तक पहुंचने की बात है तो यह अलग-अलग नाम से अलग-अलग प्रकाशन संस्थानों से छपवाने से कैसे संभव है ,यह फॉर्मूला भी अभी सामने आना शेष है ।
अब वक्त आ गया है कि हिंदी के तमाम वरिष्ठ लेखक इस बात पर गंभीरता से विचार करें और पाठकों के साथ दशकों से हो रहे इस छल पर मिल बैठकर बात करें और उसे रोकने के लिए तुरंत कोई कदम उठाएं वर्ना हिंदी के पाठक ही इस बात का फैसला कर देंगे । पाठक अगर फैसला करेंगे तो वो दिन हिंदी के कहानीकारों के लिए बहुत बुरा दिन होगा और फिर उस फैसले पर पुनर्विचार का कोई मौका भी नहीं होगा क्योंकि जिस तरह से लोकतंत्र में वोटर का फैसला अंतिम होता है उसी तरह से साहित्य में पाठक का फैसला अंतिम और मान्य होता है ।
Thursday, September 9, 2010
स्त्री, दलित, मुसलमान- बजाते रहो
दिल्ली के साहित्यिक प्रेमियों को हर साल 28 अगस्त का इंतजार रहता है । साहित्यिकारों को तो खासतौर पर । हर साल यह दिन दिल्ली में एक उत्सव की तरह मनाया जाता है । दिल्ली के सारे साहित्यकार एक जगह इकट्ठा होते हैं, जमकर खाते पीते हैं । महानगर की इस भागदौड़ और आपाधापी की जिंदगी में कई लोग तो ऐसे भी होते हैं जो साल भर बाद इस दिन ही मिलते हैं । उत्सव सरीखे जश्न का यह मौका होता है वरिष्ठ लेखक और हंस के संपादक राजेन्द्र यादव के जन्मदिन का । मैं नब्बे के दशक के शुरुआत में दिल्ली आया । शुरुआत के कुछ वर्ष छोड़ दें तो तब से लेकर तकरीबन हर साल यादव जी के जन्मदिन के जश्न का गवाह रहा हूं, एक बार तो बिन बुलाए भी पहुंच गया। कई लोगों से मैं पहली बार राजेन्द्र यादव के जन्मदिन के मौके पर ही मिला । हिंदी के वरिष्ठतम लेखकों में से एक श्रीलाल शुक्ल जी से मेरी पहली मुलाकात राजेन्द्र जी के जन्मदिन के मौके पर हुई थी । उस वर्ष राजेन्द्र जी का जन्मदिन कवि उपेन्द्र कुमार के पार्क स्ट्रीट के सरकारी बंगले पर ही मनाया गया था । श्रीलाल जी से मुलाकात और साहित्यकार के अलावा उनके सतरंगे वयक्तित्व से परचित होना मेरे लिए एक सुखद आश्चर्य की तरह था । यादव जी के जन्मदिन के मौके पर ही मैंने प्रभाष जोशी को उनका पांव छूते देखा । खैर ये अवांतर प्रसंग हैं जिसपर फिर कभी विस्तार से चर्चा होगी ।
इस बार अपने जन्मदिन से कुछ रोज पहले राजेन्द्र जी की तबियत इतनी बिगड़ गई थी कि उन्हें अस्पताल में भर्ती करवाना पड़ा था । पता चला था कि शरीर में सुगर की कमी हो गई । अस्पताल से भरपूर मिठास लेकर यादव जी घर लौटे थे । मेरी इस दौरान लगातार बात होती रही , मैं लगातार पूछता रहा कि इस बार जन्मदिन का जश्न कहां हो रहा है । लेकिन यादव जी टालते रहे । फिर एक दिन फोन किया और जश्न-ए-जन्मदिन के बारे में दरियाफ्त की तो पता चला कि वो तो अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान यानि एम्स में भर्ती हैं । जब और हालचाल जानने की कोशिश में बात आगे बढ़ी तो राजेन्द्र जी ने बताया कि वो कुछ टेस्ट के लिए भर्ती हुए हैं, चिंता की बात नहीं है । बातचीत करने के बाद लगा कि शायद इस बार यादव जी का जन्मदिन ना मनाया जाए । लेकिन सत्ताइस अगस्त की शाम को लेखक अजय नावरिया का एक संदेश प्राप्त हुआ- राजेन्द्र यादव जी अपनी जिंदगी के बयासीवें साल में प्रवेश कर रहे हैं , इस मौके पर प्रेस क्लब में होने वाले आयोजन में आप आमंत्रित हैं । संदेश के बाद अजय नावरिया ने फोन भी किया । पता चला कि आयोजकों ने यह तय किया है कि इस बार यादव जी का जन्मदिन बेहद करीबी लोगों के साथ मनाया जाए । अजय नावरिया को उनकी इस मुहिम में साथ मिला उत्साह और उर्जा से लबरेज पत्रकार गीताश्री का । नियत समय पर हमलोग दिल्ली के रायसीना रोड स्थित प्रेस क्लब में इकट्ठा हुए । तीस चालीस आमंत्रित लोगों के साथ राजेन्द्र जी ने केक काटा । सबने हैप्पी बर्थ डे टू यू गाया, तालियां बजीं । लेकिन सबसे दिलचस्प रहा राजेन्द्र जी के दोस्त डाक्टर सक्सेना का गिफ्ट । सक्सेना जी ने यादव जी को एक ढोल दिया, जिसके एक ओर चिपका था- दलित, दूसरी ओर मुसलमान और तीसरी ओर स्त्री । संदेश यह था कि राजेन्द्र जी साहित्य में दलित, मुसलमान और स्त्रियों की समस्याओं का ढोल पीटते हैं तो अब उनके गले में असल की ही ढोल डाल दी जाए । डॉक्टर सक्सेना इसके पहले भी राजेन्द्र जी को बेहद अजूबे गिफ्ट देते रहे हैं । इसके पहले उन्होंने एक ऐसा मुखौटा भेंट किया था जिसमें दस सिर लगे थे यानि एक लेखक का दस चेहरा । उसके पहले हुक्का भेंटकर सबकों चौंका चुके थे । जिस तरह से सबको यादव जी के जन्मदिन का इंतजार रहता है उसी तरह हर किसी की यह जानने में भी दिलचस्पी रहती है कि डॉक्टर सक्सेना इस बार क्या भेंट लेकर आनेवाले हैं ।
बेहद आत्मीयता से फिर खाने-पीने का दौर शुरू हुआ । गीताश्री एक बेहतरीन होस्ट की तरह सबके खाने-पीने का ध्यान रख रही थी । जैसे ही उन्हें ये जानकारी मिलती कि कोई बगैर खाए जाने की बात कर रहा है किसी को उसके पीछे लगा देती और तबतक निश्चिंत होकर नहीं बैठती थी जबतक कि वो खाना खा नहीं लेता । इस आयोजन में निर्मला जैन, भारत भारद्वाज, असगर वजाहत, पंकज विष्ठ. साधना अग्रवाल के अलावा वरिष्ठ पत्रकार शाजी जमां, आशुतोष, अजीत अंजुम, परवेज अहमद और श्रीनंद झा भी मौजूद थे । अशोक वाजपेयी थोड़ी देर से जरूर पहुंचे लेकिन अंत तक डटे रहे । यहां भी अशोक जी के साथ एक मजेदार वाकया हुआ । अशोक जी राजेन्द्र जी, मिर्मला जैन के साथ बैठे बातें कर रहे थे । अचानक डॉक्टर सक्सेना अशोक जी के पास पहुंचे और कहा- अशोक जी जनसत्ता का आपका कॉलम बहुत अच्छा रहता है । आपकी भाषा बेहद शानदार है । यहां तक तो अशोक जी के चहरे पर वही भाव थे जो अपनी प्रशंसा सुनकर किसी भी वयक्ति के चहरे पर हो सकती है । लेकिन इसके बाद डॉक्टर सक्सेना ने जो कहा उससे अशोक जी के चेहरे की चमक गायब हो गई । डॉक्टर सक्सेना ने उनकी भाषा की प्रशंसा करते करते यह कह डाला कि आपकी भाषा में वही रवानगी और ताजगी है जो किसी जमाने में शिवानी के लेखन में महसूस की जा सकती थी । यह अगर सक्सेना जी का व्यंग्य था तो बेहद शानदार था और अगर अनजाने में गंभीरता पूर्वक यब बात कही गई थी तो अशोक जी कभी कभार में इसकी खबर जरूर लेंगे ।
सभी लोग यादव जी से मजे ले रहे थे और उन्हें बयासी साल का होने पर बधाई दे रहे थे । राजेन्द्र जी भी इस बेहद आत्मीय आयोजन से प्रसन्न दिख रहे थे । अपने साथी लेखकों से चुटकी भी ले रहे थे । यादव जी की जो एक खूबी है वो यह है कि उनके साथ रहकर साहित्यिक, गैर साहित्यिक, बच्चा, बूढ़ा, जवान कोई भी बोर नहीं हो सकता। यादव जी जैसे बयासी साल के जवान का जन्मदिन और गीताश्री जैसी जिंदादिल होस्ट ने राजेन्द्र जी के जश्न-ए-सालगिरह को एक यादगार लम्हा बना दिया था । अंत में मैं इतना ही कह सकता हूं कि – तुम जियो हजारों साल, साल के दिन हों पचास हजार ।
इस बार अपने जन्मदिन से कुछ रोज पहले राजेन्द्र जी की तबियत इतनी बिगड़ गई थी कि उन्हें अस्पताल में भर्ती करवाना पड़ा था । पता चला था कि शरीर में सुगर की कमी हो गई । अस्पताल से भरपूर मिठास लेकर यादव जी घर लौटे थे । मेरी इस दौरान लगातार बात होती रही , मैं लगातार पूछता रहा कि इस बार जन्मदिन का जश्न कहां हो रहा है । लेकिन यादव जी टालते रहे । फिर एक दिन फोन किया और जश्न-ए-जन्मदिन के बारे में दरियाफ्त की तो पता चला कि वो तो अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान यानि एम्स में भर्ती हैं । जब और हालचाल जानने की कोशिश में बात आगे बढ़ी तो राजेन्द्र जी ने बताया कि वो कुछ टेस्ट के लिए भर्ती हुए हैं, चिंता की बात नहीं है । बातचीत करने के बाद लगा कि शायद इस बार यादव जी का जन्मदिन ना मनाया जाए । लेकिन सत्ताइस अगस्त की शाम को लेखक अजय नावरिया का एक संदेश प्राप्त हुआ- राजेन्द्र यादव जी अपनी जिंदगी के बयासीवें साल में प्रवेश कर रहे हैं , इस मौके पर प्रेस क्लब में होने वाले आयोजन में आप आमंत्रित हैं । संदेश के बाद अजय नावरिया ने फोन भी किया । पता चला कि आयोजकों ने यह तय किया है कि इस बार यादव जी का जन्मदिन बेहद करीबी लोगों के साथ मनाया जाए । अजय नावरिया को उनकी इस मुहिम में साथ मिला उत्साह और उर्जा से लबरेज पत्रकार गीताश्री का । नियत समय पर हमलोग दिल्ली के रायसीना रोड स्थित प्रेस क्लब में इकट्ठा हुए । तीस चालीस आमंत्रित लोगों के साथ राजेन्द्र जी ने केक काटा । सबने हैप्पी बर्थ डे टू यू गाया, तालियां बजीं । लेकिन सबसे दिलचस्प रहा राजेन्द्र जी के दोस्त डाक्टर सक्सेना का गिफ्ट । सक्सेना जी ने यादव जी को एक ढोल दिया, जिसके एक ओर चिपका था- दलित, दूसरी ओर मुसलमान और तीसरी ओर स्त्री । संदेश यह था कि राजेन्द्र जी साहित्य में दलित, मुसलमान और स्त्रियों की समस्याओं का ढोल पीटते हैं तो अब उनके गले में असल की ही ढोल डाल दी जाए । डॉक्टर सक्सेना इसके पहले भी राजेन्द्र जी को बेहद अजूबे गिफ्ट देते रहे हैं । इसके पहले उन्होंने एक ऐसा मुखौटा भेंट किया था जिसमें दस सिर लगे थे यानि एक लेखक का दस चेहरा । उसके पहले हुक्का भेंटकर सबकों चौंका चुके थे । जिस तरह से सबको यादव जी के जन्मदिन का इंतजार रहता है उसी तरह हर किसी की यह जानने में भी दिलचस्पी रहती है कि डॉक्टर सक्सेना इस बार क्या भेंट लेकर आनेवाले हैं ।
बेहद आत्मीयता से फिर खाने-पीने का दौर शुरू हुआ । गीताश्री एक बेहतरीन होस्ट की तरह सबके खाने-पीने का ध्यान रख रही थी । जैसे ही उन्हें ये जानकारी मिलती कि कोई बगैर खाए जाने की बात कर रहा है किसी को उसके पीछे लगा देती और तबतक निश्चिंत होकर नहीं बैठती थी जबतक कि वो खाना खा नहीं लेता । इस आयोजन में निर्मला जैन, भारत भारद्वाज, असगर वजाहत, पंकज विष्ठ. साधना अग्रवाल के अलावा वरिष्ठ पत्रकार शाजी जमां, आशुतोष, अजीत अंजुम, परवेज अहमद और श्रीनंद झा भी मौजूद थे । अशोक वाजपेयी थोड़ी देर से जरूर पहुंचे लेकिन अंत तक डटे रहे । यहां भी अशोक जी के साथ एक मजेदार वाकया हुआ । अशोक जी राजेन्द्र जी, मिर्मला जैन के साथ बैठे बातें कर रहे थे । अचानक डॉक्टर सक्सेना अशोक जी के पास पहुंचे और कहा- अशोक जी जनसत्ता का आपका कॉलम बहुत अच्छा रहता है । आपकी भाषा बेहद शानदार है । यहां तक तो अशोक जी के चहरे पर वही भाव थे जो अपनी प्रशंसा सुनकर किसी भी वयक्ति के चहरे पर हो सकती है । लेकिन इसके बाद डॉक्टर सक्सेना ने जो कहा उससे अशोक जी के चेहरे की चमक गायब हो गई । डॉक्टर सक्सेना ने उनकी भाषा की प्रशंसा करते करते यह कह डाला कि आपकी भाषा में वही रवानगी और ताजगी है जो किसी जमाने में शिवानी के लेखन में महसूस की जा सकती थी । यह अगर सक्सेना जी का व्यंग्य था तो बेहद शानदार था और अगर अनजाने में गंभीरता पूर्वक यब बात कही गई थी तो अशोक जी कभी कभार में इसकी खबर जरूर लेंगे ।
सभी लोग यादव जी से मजे ले रहे थे और उन्हें बयासी साल का होने पर बधाई दे रहे थे । राजेन्द्र जी भी इस बेहद आत्मीय आयोजन से प्रसन्न दिख रहे थे । अपने साथी लेखकों से चुटकी भी ले रहे थे । यादव जी की जो एक खूबी है वो यह है कि उनके साथ रहकर साहित्यिक, गैर साहित्यिक, बच्चा, बूढ़ा, जवान कोई भी बोर नहीं हो सकता। यादव जी जैसे बयासी साल के जवान का जन्मदिन और गीताश्री जैसी जिंदादिल होस्ट ने राजेन्द्र जी के जश्न-ए-सालगिरह को एक यादगार लम्हा बना दिया था । अंत में मैं इतना ही कह सकता हूं कि – तुम जियो हजारों साल, साल के दिन हों पचास हजार ।
Saturday, September 4, 2010
हिंदी साहित्य में लालूवाद
अभी इस बात को ज्यादा दिन नहीं बीते हैं जब झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कौड़ा पर अरबों रुपये के घोटाले के आरोप लगे । मधु कौड़ा से जुड़ी खबरें हर रोज मीडिया में सुर्खियां बनती रही । उसके कई सहयोगियों के नाम भी सामने आने लगे । मधु कौड़ा और उनके सहयोगियों के बारे में तफ्तीश शुरू हुई । इस बीच अचानक से बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और पूर्व रेल मंत्री लालू यादव ने एक प्रेस कांफ्रेंस आयोजित कर यह सफाई दी कि उनका मधु कौड़ा से कोई लेना देना नहीं है । लालू की इस सफाई से लोगों को हैरानी भी हुई । कई पत्रकारों ने प्रेस कांफ्रेंस में उनसे सवाल भी पूछा कि वो क्यों सफाई दे रहे हैं,जबकि उनका नाम कहीं से मधु कौड़ा के घोटाले में शामिल नहीं है । लालू यादव ने अपने ही अंदाज में बात को हवा में उड़ा दिया और कहा कि उन्हें अपने स्त्रोंतो से पता चला कि लोग उनपर शक कर रहे हैं सो उन्होंने मुनासिब समझा कि सफाई दी जाए । ठीक इसी तरह का वाकया अब हिंदी साहित्य में सामने आया है । विभूति-कालिया प्रकरण में जब विवाद ठंड़ा पड़ने लगा तो अचानक से पिछले हफ्ते हिंदी के वरिष्ठ कवि और ललित कला अकादमी के अध्यक्ष अशोक वाजपेयी ने जनसत्ता के अपने कॉलम कभी-कभार में लालू यादव के तर्ज पर इस विवाद को पर्दे के पीछे से हवा देने के आरोपों पर अपनी सफाई दी । अशोक वाजपेयी ने लिखा- इस बीच एक और अफवाह फैलाई गई । कुंवर नारायण और मैं इस प्रसंग में ज्ञानपीठ की अध्यक्ष इंदु जैन से मिले हैं । अव्वल तो इस प्रसंग को लेकर कुंवर जी से मेरी बात तक नहीं हुई । दूसरे इंदू जैन से कोई बीस बरस पहले नाश्ते पर एक सौजन्य भेंट हुई थी जब मुझे नवभारत टाइम्स के संपादक का पद ऑफर किया गया था । उसके बाद उनसे कभी नहीं मिला । तीसरे जो कुछ मैं इस विवाद में चाहता हूं उसे खुलकर बता चुका हूं – गुप कोई काम करना मेरी आदत में शामिल नहीं है । पर इस झूठ को सरासर फैलाने का काम शुरू किया गया । इस प्रकरण में अशोक जी ने के विक्रम सिंह से लेकर विजय मोहन सिंह और केदार नाथ सिंह का नाम भी लिया । लेकिन सवाल यह उठता है कि अशोक जी को सफाई देने की जरूरत क्यों पड़ी । ऐसी कौन सी अफवाह फैलाई जा रही थी कि अशोक जी जैसे गंभीर लेखक को अपने लोकप्रिय साप्ताहिक स्तंभ में सफाई देने की जरूरत पड़ी ।
दूसरी बात जो अशोक वाजपेयी ने अपने स्तंभ में उठाई वो नैतिकता और लेखकों के अपमान की । अशोक वाजपेयी के मुंह से नैतिकता की बात भी उसी तरह लगती है जैसे कि लालू यादव के मुंह से । साहित्य जगत उन्नीस सौ चौरासी के अशोक वाजपेयी के बयान को भूला नहीं है । भोपाल गैस त्रासदी के आसपास ही अशोक वाजपेयी ने एशिया पोएट्री का आयोजन किया था । तब वो मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के चहेते अफसर और भारत भवन के कर्ता-धर्ता थे । जब भोपाल गैस त्रासदी में हजारों लोगों की जान गई तो उसी शहर में कविता पर उक्त आयोजन पर सवाल खड़े होने लगे थे। तब अशोक वाजपेयी ने बयान दिया था कि मरनेवालों के साथ कोई मर नहीं जाता । अशोक वाजपेयी का वह बयान बेहद अमानवीय और मनुष्यता के खिलाफ था और एक लेखक और वयक्ति की संवेदनहीनता का सबसे बड़ा नमूना।
साहित्य में स्वतंत्रता और जनपक्षधरता की बात करनेवाले अशोक वाजपेयी मूलत: नौकरशाह हैं और भारत में अफसरशाही की कंडीशनिंग इस तरकह से होती है कि वहां ना तो संवेदना के लिए कोई जगह होती है और ना ही नैतिकता के लिए । आप खुद इस बात का अंदाजा लगाइये कि जिस शहर में तकरीबन पच्चीस हजार लोग काल के गाल में समा गए हों उसी शहर के अफसर अशोक वाजपेयी का उक्त बयान कितना संवेदनहीन है । उस एक बयान के लिए ही अशोक वाजपेयी को माफ नहीं किया जा सकता है । आज अशोक वाजपेयी नैतिकता की दुहाई देते हैं लेकिन तब उनकी नैतिकता कहां चली गई थी जब संस्कृति मंत्रालय में संयुक्त सचिव रहते हुए साहित्य अकादमी का पुरस्कार हथिया लिया था । गौरतलब है कि साहित्य अकादमी एक स्वायत्त संस्था है लेकिन वो संबद्ध तो संस्कृति मंत्रालय से ही है । नैतिकता का उपदेश देने के पहले अशोक जी को खुद के गिरेबां में झांक कर देख लेना चाहिए । यहां भी वो लालू यादव के पद चिन्हों पर ही चलते नजर आ रहे हैं । घोटालों के आरोप से घिरे लालू यादव भी गाहे बगाहे नैतिकता और राजनैतिक शुचिता की बात करते हैं ।
अशोक वाजपेयी ने लिखा है कि हिंदी लेखक समाज अपने सदस्यों के अपमान करनेवालों को सुख चैन से अपनी कुर्सी पर बैठने नहीं देगा । जो निर्लज्ज फिर भी उंची कुर्सी पर जमे हैं वे खुद जानते हैं कि उनका कद कितना नीचा हो गया है । आज अशोक वाजपेयी को हिंदी साहित्य समाज के अपमान की याद आ रही है लेकिन वो खुद हिंदी के लेखकों का कितनी बार अपमान कर चुके हैं , कितनी बार उसका मजाक उड़ा चुके हैं यह उनको याद दिलाने की जरूरत है । अशोक वाजपेयी जब साहित्य अकादमी के अध्यक्ष पद का चुनाव हारे थे तब हिंदी के लेखकों के खिलाफ विषवमन किया था । अपनी हार से तिलमिलाए अशोक वाजपेयी ने कहा था कि – जिन हिंदी के लेखकों को महीनों-महीने रखा, खिलाया पिलाया, हवाई जहाज से यात्राएं करवाई उन्होंने ही मुझे धोखा दिया । उनके निशाने पर हिंदी के एक वरिष्ठ आलोचक और एक कवि थे । आज वही अशोक वाजपेयी हिंदी के लेखकों के अपमान करनेवालों के निर्लज्ज कह रहे हैं । क्या यही भाषा एक वरिष्ठ लेखक को इस्तेमाल करनी चाहिए । क्या लिखते लिखते अशोक वाजपेययी मर्यादा भूल जाते हैं या फिर व्यक्तिगत खुन्नस लेखक पर हावी हो जा रहा है । जिनको वो निर्लज्ज कह रहे हैं उनका कद साहित्य में अशोक वाजपेयी से कई गुना बड़ा है, उम्र में तो उनसे बड़े हैं ही ।
अपने उसी स्तंभ में अशोक वाजपेयी साहित्य के परिसर को मूल्यों का परिसर बताते हुए विभूति नारायण राय और रविन्द्र कालिया पर वार करते हैं । अभी इस बात को ज्यादा दिन नहीं बीते हैं जब अशोक वाजपेयी महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति थे । तब उनपर एक बड़े परिसर में मूल्यों के दायित्व का निर्माण करने की महती जिम्मेदारी थी लेकिन उस वक्त भी वहां क्या-क्या गुल खिले थे वो किसी से छिपे नहीं हैं इस विषय पर कभी विस्तार से चर्चा होगी । अशोक जी हिंदी के मूर्धन्य रचनाकार हैं, किसी भी विवाद पर पूरा हिंदी जगत उनसे बगैर किसी पूर्वग्रह के हस्तक्षेप की उम्मीद करता है । लेकिन इस पूरे विवाद में अशोक जी पूर्वग्रहों से उपर नहीं उठ सके ।
दूसरी बात जो अशोक वाजपेयी ने अपने स्तंभ में उठाई वो नैतिकता और लेखकों के अपमान की । अशोक वाजपेयी के मुंह से नैतिकता की बात भी उसी तरह लगती है जैसे कि लालू यादव के मुंह से । साहित्य जगत उन्नीस सौ चौरासी के अशोक वाजपेयी के बयान को भूला नहीं है । भोपाल गैस त्रासदी के आसपास ही अशोक वाजपेयी ने एशिया पोएट्री का आयोजन किया था । तब वो मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के चहेते अफसर और भारत भवन के कर्ता-धर्ता थे । जब भोपाल गैस त्रासदी में हजारों लोगों की जान गई तो उसी शहर में कविता पर उक्त आयोजन पर सवाल खड़े होने लगे थे। तब अशोक वाजपेयी ने बयान दिया था कि मरनेवालों के साथ कोई मर नहीं जाता । अशोक वाजपेयी का वह बयान बेहद अमानवीय और मनुष्यता के खिलाफ था और एक लेखक और वयक्ति की संवेदनहीनता का सबसे बड़ा नमूना।
साहित्य में स्वतंत्रता और जनपक्षधरता की बात करनेवाले अशोक वाजपेयी मूलत: नौकरशाह हैं और भारत में अफसरशाही की कंडीशनिंग इस तरकह से होती है कि वहां ना तो संवेदना के लिए कोई जगह होती है और ना ही नैतिकता के लिए । आप खुद इस बात का अंदाजा लगाइये कि जिस शहर में तकरीबन पच्चीस हजार लोग काल के गाल में समा गए हों उसी शहर के अफसर अशोक वाजपेयी का उक्त बयान कितना संवेदनहीन है । उस एक बयान के लिए ही अशोक वाजपेयी को माफ नहीं किया जा सकता है । आज अशोक वाजपेयी नैतिकता की दुहाई देते हैं लेकिन तब उनकी नैतिकता कहां चली गई थी जब संस्कृति मंत्रालय में संयुक्त सचिव रहते हुए साहित्य अकादमी का पुरस्कार हथिया लिया था । गौरतलब है कि साहित्य अकादमी एक स्वायत्त संस्था है लेकिन वो संबद्ध तो संस्कृति मंत्रालय से ही है । नैतिकता का उपदेश देने के पहले अशोक जी को खुद के गिरेबां में झांक कर देख लेना चाहिए । यहां भी वो लालू यादव के पद चिन्हों पर ही चलते नजर आ रहे हैं । घोटालों के आरोप से घिरे लालू यादव भी गाहे बगाहे नैतिकता और राजनैतिक शुचिता की बात करते हैं ।
अशोक वाजपेयी ने लिखा है कि हिंदी लेखक समाज अपने सदस्यों के अपमान करनेवालों को सुख चैन से अपनी कुर्सी पर बैठने नहीं देगा । जो निर्लज्ज फिर भी उंची कुर्सी पर जमे हैं वे खुद जानते हैं कि उनका कद कितना नीचा हो गया है । आज अशोक वाजपेयी को हिंदी साहित्य समाज के अपमान की याद आ रही है लेकिन वो खुद हिंदी के लेखकों का कितनी बार अपमान कर चुके हैं , कितनी बार उसका मजाक उड़ा चुके हैं यह उनको याद दिलाने की जरूरत है । अशोक वाजपेयी जब साहित्य अकादमी के अध्यक्ष पद का चुनाव हारे थे तब हिंदी के लेखकों के खिलाफ विषवमन किया था । अपनी हार से तिलमिलाए अशोक वाजपेयी ने कहा था कि – जिन हिंदी के लेखकों को महीनों-महीने रखा, खिलाया पिलाया, हवाई जहाज से यात्राएं करवाई उन्होंने ही मुझे धोखा दिया । उनके निशाने पर हिंदी के एक वरिष्ठ आलोचक और एक कवि थे । आज वही अशोक वाजपेयी हिंदी के लेखकों के अपमान करनेवालों के निर्लज्ज कह रहे हैं । क्या यही भाषा एक वरिष्ठ लेखक को इस्तेमाल करनी चाहिए । क्या लिखते लिखते अशोक वाजपेययी मर्यादा भूल जाते हैं या फिर व्यक्तिगत खुन्नस लेखक पर हावी हो जा रहा है । जिनको वो निर्लज्ज कह रहे हैं उनका कद साहित्य में अशोक वाजपेयी से कई गुना बड़ा है, उम्र में तो उनसे बड़े हैं ही ।
अपने उसी स्तंभ में अशोक वाजपेयी साहित्य के परिसर को मूल्यों का परिसर बताते हुए विभूति नारायण राय और रविन्द्र कालिया पर वार करते हैं । अभी इस बात को ज्यादा दिन नहीं बीते हैं जब अशोक वाजपेयी महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति थे । तब उनपर एक बड़े परिसर में मूल्यों के दायित्व का निर्माण करने की महती जिम्मेदारी थी लेकिन उस वक्त भी वहां क्या-क्या गुल खिले थे वो किसी से छिपे नहीं हैं इस विषय पर कभी विस्तार से चर्चा होगी । अशोक जी हिंदी के मूर्धन्य रचनाकार हैं, किसी भी विवाद पर पूरा हिंदी जगत उनसे बगैर किसी पूर्वग्रह के हस्तक्षेप की उम्मीद करता है । लेकिन इस पूरे विवाद में अशोक जी पूर्वग्रहों से उपर नहीं उठ सके ।
Wednesday, August 18, 2010
कारण कवन नाथ मोहे मारा
नया ज्ञानोदय के अगस्त 2010 अंक मे छ्पे मेरे इंटरव्यू पर हुई प्रतिक्रियाओ से एक बात स्पष्ट हो गयी कि मैने अपनी लापरवाही से एक गम्भीर विमर्श का हेतु बन सकने का मौका गंवा दिया । मैने कुछ ऐसे शब्दो का प्रयोग किया जिनसे बचा जा सकता था। मुझे जैसे ही यह अहसास हुआ कि मेरी भाषा से हिन्दी की बहुत सी लेखिकाओं को कष्ट हुआ है मैने अपनी गलती का अहसास किया और बिना शर्त माफी मांग ली ।मैं शर्मिन्दा हूँ कि मेरी असावधानी से बहुत से ऐसे लोग आहत हुए जो मेरे वर्षों पुराने मित्र रहे है,इनमे बडी सख्यां में लेखिकायें भी हैं पर मेरे मन मे उनके लिये सम्मान भी बढा है कि मित्रता की परवाह किये बगैर उन्होने मेरी मजम्मत की। हालाकि कुछ लोग जो इस मामले को अन्य कारणों से जिन्दा रखना चाह्ते हैं, इन्टरव्यू में उठाये गये मुद्दों पर बहस न कर के अभी भी उन शब्दों के वाक्जाल मे उलझे हुए हैं जिनपर मै खुद खेद प्रकट कर माफी मांग चुका हूँ । मै मानता हूं कि इन लोगों की उपेक्षा कर अब मै मुद्दों पर बहस की अपेक्षा कर सकता हूं ।
यह कहना है महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय का । दरअसल जिस बात पर विभूति अपने साथी लेखकों और हिंदी समाज से माफी मांग रहे हैं वो पूरा विवाद विभूति के ही एक साक्षात्कार से उठा । नया ज्ञानोदय के सुपर बेवफाई विशेषांक में विभूति नारायण राय का एक लंबा इंटरव्यू प्रकाशित हुआ है जिसमें एक सवाल के जबाव में विभूति कहते हैं - पिछले वर्षों में हमारे यहां जो स्त्री विमर्श हुआ है वह मुख्यरूप से शरीर केंद्रित है । यह भी कह सकते हैं कि वह विमर्श बेवफाई के विराट उत्सव की तरह है । लेखिकाओं में होड़ लगी है यह साबित करने के लिए कि उनसे बड़ी छिनाल कोई नहीं है । मुझे लगता है कि इधर प्रकाशित एक बहु प्रमोटेड और ओवर रेटेड लेखिका की आत्मकथा का शीर्षक कितनी बिस्तरों पर कितनी बार हो सकता है । इस इंटरव्यू के प्रकाशित होने के बाद हिंदी के लेखकों के बीच इस पर विमर्श शुरू हो गया था । लेकिन बड़े पैमाने पर इसका विरोध तो तब शुरू हुआ जब अचानक से एक दिन दिल्ली से प्रकाशित एक अंग्रेजी दैनिक ने इस खबर को प्रमुखता से प्रकाशित कर विवाद खड़ा कर दिया । अंग्रेजी अखबार के संवाददाता ने छिनाल शब्द का अंग्रेजी अनुवाद प्रोस्टीट्यूट कर दिया । जिससे अर्थ का अनर्थ हो गया । छिनाल उन स्त्रियों को कहा जाता है जो कुलटा होती हैं या फिर स्त्रियोचित मर्यादा को भंग कर अपनी मर्जी से कई पुरुषों से संबंध बनाती है । लेकिन वो किसी भी हाल में वेश्या नहीं होती । महिला लेखिकाओं के लिए कहा गया यह शब्द बिल्कुल आपत्तिजनक है लेकिन वेश्या जितना अपमानजनक नहीं है । यह गाली है और किसी भी लेखक को अपनी बिरादरी की महिलाओं के लिए इस शब्द के प्रयोग की इजाजत नहीं दी जा सकती है ।
जैसा कि उपर संकेत दिया जा चुका है कि यह इंटरव्यू लगभग हफ्तेभर से छपकर विवादित नहीं हो पा रहा था क्योंकि हिंदी सत्ता की भाषा नहीं है, सत्ता की भाषा तो अंग्रेजी है । अंग्रेजी अखबार के गैर जिम्मेदाराना अनुवाद ने आग में घी का काम किया और विरोध की चिंगारी को भड़का दिया । लेखिलाओं का जितना अपमान विभूति नारायण राय किया उससे ज्यादा बड़ा अपमान तो अंग्रेजी के वो अखबार कर रहे हैं जो लगातार लेखिकाओं को वेश्या बता रहे हैं । मीडिया में इसके उछलने के बाद विभूति नारायण राय पर चौतरफा हमला शुरू हो गया । हिंदी के लेखकों के अलावा कई महिला संगठनों ने महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति को लेखिकाओं के खिलाफ इस अमर्यादित टिप्पणी को लेकर कठघरे में खड़ा किया और उनके इस्तीफे और बर्खास्तगी की मांग होने लगी।
मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल और राष्ट्रीय महिला आयोग तक भी ये मामाला पहुंच गया । लगभग मृतप्राय लेखक संगठनों में भी जान आ गई और उन्होंने भी विभूति नारायण राय के खिलाफ एक निंदा बयान जारी कर दिया । चौतरफा घिरे विभूति नारायण राय को मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने तलब किया और उनके यहां से निकलकर राय ने बिना शर्त लिखित माफी मांग ली । फिर अखबार में लेख लिखकर भी माफी मांगी। विभूति के विरोध के अलावा लेखकों ने नया ज्ञानोदय और उसके संपादक के खिलाफ भी मोर्चा खोला । ज्ञानोदय छापने वाली संस्था भारतीय ज्ञानपीठ के दफ्तर पर प्रदर्शन भी किया । विरोध बढ़ता देखकर नया ज्ञानोदय के संपादक
रवीन्द्र कालिया ने इसे संपादकीय भूल मानते हुए खेद प्रकट किया और नया ज्ञानोदय का उक्त अंक बाजार से वापस मंगाकर विवादास्पद शब्द को हटाकर पत्रिका को फिर से छापने का वादा किया । लेकिन बावजूद इसके लेखकों का एक वर्ग इन दोनों का फांसी पर लटकाने को आमदा है । इनकी मांग है कि विभूति नारायण राय और कालिया को उनके पद से बर्खास्त किया जाए । इसके लिए बकायादा एक मोर्चे का गठन भी किया गया है । लेकिन माफी मांग लेने के बाद विरोध जारी रखने का औचित्य समझ में नहीं आता ।
विरोध पर डटे रहने के कुछ साहित्येत्तर कारण हो सकते हैं- या तो विभूति से व्यक्तिगत खुन्नस, कालिया से नाराजगी या फिर सत्ता प्रतिष्ठान के खिलाफ गुस्से का दिखावा । किसी भी साहित्यिक मुद्दे पर लेखकों की इतनी सक्रियता चौंकानेवाली है । कुछ दिनों पहले हिंदी के ही एक अन्य लेखक भगवान दास मोरवाल के उपन्यास रेत के खिलाफ जब ‘गिहार’ समाज के प्रतिनिधित्व का दावा करनेवाले एक संगठन- भारतीय आदिवासी गिहार विकास समिति ने उत्तर प्रदेश के छिबरामऊ की अदालत में उपन्यासकार के खिलाफ मुकदमा दर्ज करवाया तो कहीं से कोई विरोध की आवाज तो दूर मोरवाल के समर्थन में किसी लेखक ने बयान तक नहीं दिया । लेखक संगठन तक कुंभकर्णी नींद सोते रहे । आज भी मोरवाल अकेले उस लड़ाई को लड़ रहे हैं । जमानत लेने से लेकर तमाम अदालती झंझटों से अकेले निबट रहे हैं । तसलीमा नसरीन को जब पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकार ने कोलकाता से निकाला तो बयानबाजी की रस्म अदायगी की गई । कहीं भी धरना प्रदर्शन तो दूर की बात कोई हस्ताक्षर अभियान तक नहीं चला । हिंदी के एक स्वनामधन्य आलोचक, जो दिल्ली विश्वविद्यालय में शिक्षक थे, को जब एक दलित छात्रा के यौन शोषण के आरोप में जब विश्वविद्यालय ने उन्हें हटा दिया तब भी उनका
विरोध किसी लेखक या लेखक संगठन ने नहीं किया । दरअसल हिंदी साहित्य में विभूति नारायण राय और रवीन्द्र कालिया के खेद प्रकट करने के बाद जो विरोध हो रहा है उसके पीछे कहीं ना कहीं कुछ दूसरे कारण हैं जो कम से कम साहित्यिक तो नहीं है । अब विशाल हिंदी समाज को यह तय करना है कि ये विरोध कितना जायज और किस उद्देश्य के लिए किया जा रहा है ।
यह कहना है महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय का । दरअसल जिस बात पर विभूति अपने साथी लेखकों और हिंदी समाज से माफी मांग रहे हैं वो पूरा विवाद विभूति के ही एक साक्षात्कार से उठा । नया ज्ञानोदय के सुपर बेवफाई विशेषांक में विभूति नारायण राय का एक लंबा इंटरव्यू प्रकाशित हुआ है जिसमें एक सवाल के जबाव में विभूति कहते हैं - पिछले वर्षों में हमारे यहां जो स्त्री विमर्श हुआ है वह मुख्यरूप से शरीर केंद्रित है । यह भी कह सकते हैं कि वह विमर्श बेवफाई के विराट उत्सव की तरह है । लेखिकाओं में होड़ लगी है यह साबित करने के लिए कि उनसे बड़ी छिनाल कोई नहीं है । मुझे लगता है कि इधर प्रकाशित एक बहु प्रमोटेड और ओवर रेटेड लेखिका की आत्मकथा का शीर्षक कितनी बिस्तरों पर कितनी बार हो सकता है । इस इंटरव्यू के प्रकाशित होने के बाद हिंदी के लेखकों के बीच इस पर विमर्श शुरू हो गया था । लेकिन बड़े पैमाने पर इसका विरोध तो तब शुरू हुआ जब अचानक से एक दिन दिल्ली से प्रकाशित एक अंग्रेजी दैनिक ने इस खबर को प्रमुखता से प्रकाशित कर विवाद खड़ा कर दिया । अंग्रेजी अखबार के संवाददाता ने छिनाल शब्द का अंग्रेजी अनुवाद प्रोस्टीट्यूट कर दिया । जिससे अर्थ का अनर्थ हो गया । छिनाल उन स्त्रियों को कहा जाता है जो कुलटा होती हैं या फिर स्त्रियोचित मर्यादा को भंग कर अपनी मर्जी से कई पुरुषों से संबंध बनाती है । लेकिन वो किसी भी हाल में वेश्या नहीं होती । महिला लेखिकाओं के लिए कहा गया यह शब्द बिल्कुल आपत्तिजनक है लेकिन वेश्या जितना अपमानजनक नहीं है । यह गाली है और किसी भी लेखक को अपनी बिरादरी की महिलाओं के लिए इस शब्द के प्रयोग की इजाजत नहीं दी जा सकती है ।
जैसा कि उपर संकेत दिया जा चुका है कि यह इंटरव्यू लगभग हफ्तेभर से छपकर विवादित नहीं हो पा रहा था क्योंकि हिंदी सत्ता की भाषा नहीं है, सत्ता की भाषा तो अंग्रेजी है । अंग्रेजी अखबार के गैर जिम्मेदाराना अनुवाद ने आग में घी का काम किया और विरोध की चिंगारी को भड़का दिया । लेखिलाओं का जितना अपमान विभूति नारायण राय किया उससे ज्यादा बड़ा अपमान तो अंग्रेजी के वो अखबार कर रहे हैं जो लगातार लेखिकाओं को वेश्या बता रहे हैं । मीडिया में इसके उछलने के बाद विभूति नारायण राय पर चौतरफा हमला शुरू हो गया । हिंदी के लेखकों के अलावा कई महिला संगठनों ने महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति को लेखिकाओं के खिलाफ इस अमर्यादित टिप्पणी को लेकर कठघरे में खड़ा किया और उनके इस्तीफे और बर्खास्तगी की मांग होने लगी।
मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल और राष्ट्रीय महिला आयोग तक भी ये मामाला पहुंच गया । लगभग मृतप्राय लेखक संगठनों में भी जान आ गई और उन्होंने भी विभूति नारायण राय के खिलाफ एक निंदा बयान जारी कर दिया । चौतरफा घिरे विभूति नारायण राय को मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने तलब किया और उनके यहां से निकलकर राय ने बिना शर्त लिखित माफी मांग ली । फिर अखबार में लेख लिखकर भी माफी मांगी। विभूति के विरोध के अलावा लेखकों ने नया ज्ञानोदय और उसके संपादक के खिलाफ भी मोर्चा खोला । ज्ञानोदय छापने वाली संस्था भारतीय ज्ञानपीठ के दफ्तर पर प्रदर्शन भी किया । विरोध बढ़ता देखकर नया ज्ञानोदय के संपादक
रवीन्द्र कालिया ने इसे संपादकीय भूल मानते हुए खेद प्रकट किया और नया ज्ञानोदय का उक्त अंक बाजार से वापस मंगाकर विवादास्पद शब्द को हटाकर पत्रिका को फिर से छापने का वादा किया । लेकिन बावजूद इसके लेखकों का एक वर्ग इन दोनों का फांसी पर लटकाने को आमदा है । इनकी मांग है कि विभूति नारायण राय और कालिया को उनके पद से बर्खास्त किया जाए । इसके लिए बकायादा एक मोर्चे का गठन भी किया गया है । लेकिन माफी मांग लेने के बाद विरोध जारी रखने का औचित्य समझ में नहीं आता ।
विरोध पर डटे रहने के कुछ साहित्येत्तर कारण हो सकते हैं- या तो विभूति से व्यक्तिगत खुन्नस, कालिया से नाराजगी या फिर सत्ता प्रतिष्ठान के खिलाफ गुस्से का दिखावा । किसी भी साहित्यिक मुद्दे पर लेखकों की इतनी सक्रियता चौंकानेवाली है । कुछ दिनों पहले हिंदी के ही एक अन्य लेखक भगवान दास मोरवाल के उपन्यास रेत के खिलाफ जब ‘गिहार’ समाज के प्रतिनिधित्व का दावा करनेवाले एक संगठन- भारतीय आदिवासी गिहार विकास समिति ने उत्तर प्रदेश के छिबरामऊ की अदालत में उपन्यासकार के खिलाफ मुकदमा दर्ज करवाया तो कहीं से कोई विरोध की आवाज तो दूर मोरवाल के समर्थन में किसी लेखक ने बयान तक नहीं दिया । लेखक संगठन तक कुंभकर्णी नींद सोते रहे । आज भी मोरवाल अकेले उस लड़ाई को लड़ रहे हैं । जमानत लेने से लेकर तमाम अदालती झंझटों से अकेले निबट रहे हैं । तसलीमा नसरीन को जब पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकार ने कोलकाता से निकाला तो बयानबाजी की रस्म अदायगी की गई । कहीं भी धरना प्रदर्शन तो दूर की बात कोई हस्ताक्षर अभियान तक नहीं चला । हिंदी के एक स्वनामधन्य आलोचक, जो दिल्ली विश्वविद्यालय में शिक्षक थे, को जब एक दलित छात्रा के यौन शोषण के आरोप में जब विश्वविद्यालय ने उन्हें हटा दिया तब भी उनका
विरोध किसी लेखक या लेखक संगठन ने नहीं किया । दरअसल हिंदी साहित्य में विभूति नारायण राय और रवीन्द्र कालिया के खेद प्रकट करने के बाद जो विरोध हो रहा है उसके पीछे कहीं ना कहीं कुछ दूसरे कारण हैं जो कम से कम साहित्यिक तो नहीं है । अब विशाल हिंदी समाज को यह तय करना है कि ये विरोध कितना जायज और किस उद्देश्य के लिए किया जा रहा है ।
Tuesday, August 10, 2010
पच्चीस का ‘हंस’
आज से पच्चीस साल पहले जब अगस्त 1986 में राजेन्द्र यादव ने हंस पत्रिका का पुर्नप्रकाशन शुरू किया था तब किसी को भी उम्मीद नहीं रही होगी कि यह पत्रिका निरंतरता बरकरार रखते हुए ढाई दशक तक निर्बाध रूप से निकलती रहेगी, शायद संपादक को भी नहीं । उस वक्त हिदी में एक स्थिति बनाई या प्रचारित की जा रही थी कि यहां साहित्यिक पत्रिकाएं चल नहीं सकती । सारिका बंद हो गई, धर्मयुग बंद हो गया जिससे यह साबित होता है कि हिंदी में गंभीर साहित्यक पत्रिका चल ही नहीं सकती । लेकिन तमाम आशंकाओं को धता बताते हुए हंस ने अगस्त में अपने पच्चीस साल पूरे करते हुए यह सिद्ध कर दिया कि हिंदी में गंभीर साहित्य के पाठक हैं और पिछले पच्चीस सालों में इसे शिद्दत से साबित भी कर दिया । मेरे जानते हिंदी में व्यक्तिगत प्रयास से निकलने वाली हंस इकलौती कथा पत्रिका है जो लगातार पच्चीस सालों से प्रकाशित हो रही है और इसका पूरा श्रेय जाता है इसके संपादक और वरिष्ठ लेखक राजेन्द्र यादव को । जब इस पत्रिका का प्रकाशन शुरू हुआ था तब इस बात को लेकर खासी सुगबुगाहट हुई थी कि यह प्रेमचंद की पत्रिका हंस है या दिल्ली के हंसराज कॉलेज की पत्रिका हंस । लेकिन कालांतर में इस पत्रिका ने साबित कर दिया कि वह सचमुच में प्रेमचंद वाला हंस ही है । राजेन्द्र यादव स्वंय प्रतिष्ठित साहित्यकार हैं और नई कहानी आंदोलन के अवांगार्द । बहुत पहले यादव जी ने एक आलोचनात्मक पुस्तक लिखी थी- प्रेमचंद की विरासत बाद में कहानीकार होते हुए भी उन्होंने प्रेमचंद की विरासत को ही अपनाया और हंस का पुनर्प्रकाशन किया । पिछले पच्चीस सालों में हंस ने हिंदी साहित्य को ना केवल एक नई दिशा दी बल्कि उसने दलित और स्त्री विमर्श के साथ-साथ तत्कालीन प्रासंगिक मुद्दों को उठाकर हिंदी साहित्यिक पत्रकारिता का एक नया इतिहास भी लिखा और साहित्यिक पत्रकारिता के कुछ नए मानक भी स्थापित किए तरह की खुली बहस से दूसरी पत्रिका के संपादकों के हाथ पांव फूल जाते थे उसे राजेन्द्र यादव ने हंस में जोरदार तरीके से उठाया । खुद अपने संपादकीय में बिना किसी डर-भय और लाग लपेट के यादव जी ने अपनी बातें कहकर बहस में सार्थक हस्तक्षेप किया । अपने प्रकाशन के शुरुआती दिनों से ही हंस ने साहित्यिक माहौल को गर्मागर्म बनाए रखा और जो मुर्दनीछाप शास्त्रीय किस्म का माहौल था उसे सक्रिय करते हुए जुझारू तेवर भी प्रदान किए । हो सकता है कि राजेन्द्र यादव के स्टैंड से आप सहमत ना हों लेकिन पच्चीस बरसों की लंबी अवधि में यादव जी ने अनेक विचारोत्तेजक मुद्दे पर बहस चलाई और साहित्यकि माहौल को सजीव बनाए रखा । यादव जी के एजेंडे में सिर्फ साहित्यिक मुद्दे ही नहीं रहे । अनेक सामाजिक मु्द्दों को भी हंस ने अपनी परिधि में लेकर सार्थक बहसें चलाई । आज अगर दलित विमर्श या दलित चेतना, स्त्री विमर्श या स्त्री चेतना हमारे समय की महत्वपूर्ण प्रवृतियों के रूप में व्यापक रूप से मान्यता पा चुके हैं तो इसका काफी श्रेय हंस और इसके संपादक राजेन्द्र यादव को जाता है ।
इसके अलावा हंस ने पच्चीस सालों में तकरीबन चार पीढियों को साहित्य में दीक्षित करने का काम भी किया । मुझे मेरा साहित्यिक संस्कार जरूर परिवार से मिला लेकिन मुझे यह स्वीकार करने में तनिक भी हिचक नहीं है कि हंस ने उसे परिष्कृत किया । हंस को पढ़ते हुए ही कई मसलों को देखने समझने की नई दृष्टि भी मिली ।
इसके अलावा जो एक बड़ा काम यादव जी ने हंस के माध्यम से किया को यह कि कहानीकारों की एक लंबी फौज खड़ी कर दी । यह कहते हुए मुझे कोई संकोच या किसी तरह का कोई हिचक नहीं है कि पिछले ढाई दशक की हिंदी की महत्वपूर्ण कहानियां हंस में ही छपी । एक बार बातचीत में यादव जी ने इस बात को स्वीकार करते हुए कहा था – अगर झूठी शालीनता ना बरतूं तो कह सकता हूं कि हिंदी में अस्सी प्रतिशत श्रेष्ठ कहानियां हंस में ही प्रकाशित हुई हैं और ऐसे एक दर्जन से ज्यादा कवि हैं जिनकी पहली कविताएं हंस में ही छपी और आज उनमें से कई हिंदी के महत्वपूर्ण रचनाकार हैं। यादव जी की इस बात में कोई अतिशयोक्ति नहीं है , हंस ने अपने प्रकाशन के शुरुआती वर्षों में ही उदय प्रकाश की तिरिछ, शिवमूर्ति कू तिरिया चरित्तर, ललित कार्तिकेय का तलछट का कोरस, रमाकांत का कार्लो हब्शी का संदूक, चंद्रकिशोर जायसवाल की हंगवा घाट में पानी रे और आनंद हर्षुल की उस बूढे आदमी के कमरे में छापकर हिंदी कथा साहित्य का एक नया जीवनदान दिया । बाद में भी हंस में ही छपी उदय प्रकाश की चर्चित कहानियां – और अंत में प्रार्थना, पीली छतरी वाली लड़की, अरुण प्रकाश की जल प्रांतर, अखिलेश की चिट्ठी, स्वयं प्रकाश की अविनाश मोटू उर्फ..., सृंजय की कॉमरेड का कोट आदि कहानियों ने भी कथा साहित्य को झकझोर दिया था ।
यह लेख तो हंस के पच्चीस साल पूरे होने पर उसेक मूल्यांकन के तौर पर लिख रहा हूं लेकिन इसी महीने राजेन्द्र यादव बयासी साल के हो रहे हैं । उम्र के इस पड़ाव पर भी वो जिस मुस्तैदी और लगन के साथ हंस का संपादन करते हैं और पत्रिका को नियत समय पर निकालते हैं वो किसी के लिए भी रश्क की बात हो सकती है । अगर आप उनके संपर्क में हैं तो वो लगातार आपको कुछ नया करने के लिए उकसाते रहेंगे और तबतक नहीं मानेंगे जबतक कि वो आपसे कुछ करवा ना लें । एक संपादक के तौर पर राजेन्द्र यादव बेहद ही लोकतांत्रिक हैं । हंस में पाठकों के जो पत्र छपते हैं वो इस बात की ताकीद करते हैं कि राजेन्द्र यादव अपनी आलोचना को भी बेहद प्रमुखता से प्रकाशित करते हैं । आप उनके लेखन और विचार से अपनी असहमति लिखकर या मौखिक भी दर्ज करा सकते हैं । उनसे बातचीत करते वक्त आपको इस बात का बिल्कुल भी एहसास नहीं होगा कि आप हिंदी के इतने बड़े लेखक या संपादक से बात कर रहे हैं । उनका वयक्तित्व आतंकित नहीं करता बल्कि रचनाशीलता के लिए उकसाता है । उनके लेखन में ही नहीं बल्कि उनके स्वभाव में भी एक खिलंदड़ापन और छेड़छाड़ की प्रवृत्ति है । यादव जी अपने बातचीत में ही नहीं अपने लेखन में भी समकालीन बने रहना चाहते हैं । हाल के दिनों में उनके संपादकीय में गजब की पठनीयता आ गई है । यादव जी पर संपादकीय में अंग्रेजी के शब्दों के इस्तेमाल पर आलोतना भी झेलनी पड़ती रही है । अशोक वाजपेयी कहते हैं- अपने संपादकीयों में जिस तरह हर तीसरे वाक्य में बेवजह अंग्रेजी के वाक्य ठूंसते हैं, जबकि उनके लिए हिंदी में काफी दिनों से प्रचलित पर्याय सुलभ हैंट यह अंतत उन्हें बौद्धिक रूप से एक भाषा विपन्न लेखक बल्कि संपादक सिद्ध करता है । अशोक वाजपेयी और नामवर सिंह से यादव जी की नोंक झोंक चलती रहती है । लेकिन इन लोगों की इस नोंक झोंक से साहित्यिक परिदृश्य सजीव बना रहता है । हमारी कामना है कि यादव जी दीर्घायु हों और हंस का संपादन पचास साल तक करते रहें ।
इसके अलावा हंस ने पच्चीस सालों में तकरीबन चार पीढियों को साहित्य में दीक्षित करने का काम भी किया । मुझे मेरा साहित्यिक संस्कार जरूर परिवार से मिला लेकिन मुझे यह स्वीकार करने में तनिक भी हिचक नहीं है कि हंस ने उसे परिष्कृत किया । हंस को पढ़ते हुए ही कई मसलों को देखने समझने की नई दृष्टि भी मिली ।
इसके अलावा जो एक बड़ा काम यादव जी ने हंस के माध्यम से किया को यह कि कहानीकारों की एक लंबी फौज खड़ी कर दी । यह कहते हुए मुझे कोई संकोच या किसी तरह का कोई हिचक नहीं है कि पिछले ढाई दशक की हिंदी की महत्वपूर्ण कहानियां हंस में ही छपी । एक बार बातचीत में यादव जी ने इस बात को स्वीकार करते हुए कहा था – अगर झूठी शालीनता ना बरतूं तो कह सकता हूं कि हिंदी में अस्सी प्रतिशत श्रेष्ठ कहानियां हंस में ही प्रकाशित हुई हैं और ऐसे एक दर्जन से ज्यादा कवि हैं जिनकी पहली कविताएं हंस में ही छपी और आज उनमें से कई हिंदी के महत्वपूर्ण रचनाकार हैं। यादव जी की इस बात में कोई अतिशयोक्ति नहीं है , हंस ने अपने प्रकाशन के शुरुआती वर्षों में ही उदय प्रकाश की तिरिछ, शिवमूर्ति कू तिरिया चरित्तर, ललित कार्तिकेय का तलछट का कोरस, रमाकांत का कार्लो हब्शी का संदूक, चंद्रकिशोर जायसवाल की हंगवा घाट में पानी रे और आनंद हर्षुल की उस बूढे आदमी के कमरे में छापकर हिंदी कथा साहित्य का एक नया जीवनदान दिया । बाद में भी हंस में ही छपी उदय प्रकाश की चर्चित कहानियां – और अंत में प्रार्थना, पीली छतरी वाली लड़की, अरुण प्रकाश की जल प्रांतर, अखिलेश की चिट्ठी, स्वयं प्रकाश की अविनाश मोटू उर्फ..., सृंजय की कॉमरेड का कोट आदि कहानियों ने भी कथा साहित्य को झकझोर दिया था ।
यह लेख तो हंस के पच्चीस साल पूरे होने पर उसेक मूल्यांकन के तौर पर लिख रहा हूं लेकिन इसी महीने राजेन्द्र यादव बयासी साल के हो रहे हैं । उम्र के इस पड़ाव पर भी वो जिस मुस्तैदी और लगन के साथ हंस का संपादन करते हैं और पत्रिका को नियत समय पर निकालते हैं वो किसी के लिए भी रश्क की बात हो सकती है । अगर आप उनके संपर्क में हैं तो वो लगातार आपको कुछ नया करने के लिए उकसाते रहेंगे और तबतक नहीं मानेंगे जबतक कि वो आपसे कुछ करवा ना लें । एक संपादक के तौर पर राजेन्द्र यादव बेहद ही लोकतांत्रिक हैं । हंस में पाठकों के जो पत्र छपते हैं वो इस बात की ताकीद करते हैं कि राजेन्द्र यादव अपनी आलोचना को भी बेहद प्रमुखता से प्रकाशित करते हैं । आप उनके लेखन और विचार से अपनी असहमति लिखकर या मौखिक भी दर्ज करा सकते हैं । उनसे बातचीत करते वक्त आपको इस बात का बिल्कुल भी एहसास नहीं होगा कि आप हिंदी के इतने बड़े लेखक या संपादक से बात कर रहे हैं । उनका वयक्तित्व आतंकित नहीं करता बल्कि रचनाशीलता के लिए उकसाता है । उनके लेखन में ही नहीं बल्कि उनके स्वभाव में भी एक खिलंदड़ापन और छेड़छाड़ की प्रवृत्ति है । यादव जी अपने बातचीत में ही नहीं अपने लेखन में भी समकालीन बने रहना चाहते हैं । हाल के दिनों में उनके संपादकीय में गजब की पठनीयता आ गई है । यादव जी पर संपादकीय में अंग्रेजी के शब्दों के इस्तेमाल पर आलोतना भी झेलनी पड़ती रही है । अशोक वाजपेयी कहते हैं- अपने संपादकीयों में जिस तरह हर तीसरे वाक्य में बेवजह अंग्रेजी के वाक्य ठूंसते हैं, जबकि उनके लिए हिंदी में काफी दिनों से प्रचलित पर्याय सुलभ हैंट यह अंतत उन्हें बौद्धिक रूप से एक भाषा विपन्न लेखक बल्कि संपादक सिद्ध करता है । अशोक वाजपेयी और नामवर सिंह से यादव जी की नोंक झोंक चलती रहती है । लेकिन इन लोगों की इस नोंक झोंक से साहित्यिक परिदृश्य सजीव बना रहता है । हमारी कामना है कि यादव जी दीर्घायु हों और हंस का संपादन पचास साल तक करते रहें ।
Friday, August 6, 2010
काश पूछो कि मुद्दआ क्या है / विभूति नारायण राय
नया ज्ञानोदय के अगस्त 2010 अंक मे छ्पे मेरे इंटरव्यू पर हुई प्रतिक्रियाओ से एक बात स्पष्ट हो गयी कि मैने अपनी लापरवाही से एक गम्भीर विमर्श का हेतु बन सकने का मौका गवां दिया ।मैने कुछ ऐसे शब्दो का प्रयोग किया जिनसे बचा जा सकता था ।मुझे जैसे ही यह अहसास हुआ कि मेरी भाषा से हिन्दी की बहुत सी लेखिकाओं को कष्ट हुआ है मैने अपनी गल्ती का अहसास किया और बिना शर्त माफी मांग ली ।मैं शर्मिन्दा हूँ कि मेरी असावधानी से बहुत से ऐसे लोग आहत हुए जो मेरे वर्षों पुराने मित्र रहे है,इनमे बडी सख्यां में लेखिकायें भी हैं पर मेरे मन मे उनके लिये सम्मान भी बढा है कि मित्रता की परवाह किये बगैर उन्होने मेरी मजम्मत की । हालाकि कुछ लोग जो इस मामले को अन्य कारणों से जिन्दा रखना चाह्ते हैं, इन्टरव्यू में उठाये गये मुद्दों पर बहस न कर के अभी भी उन शब्दों के वाक्जाल मे उलझे हुए हैं जिनपर मै खुद खेद प्रकट कर माफी मांग चुका हूँ । मै मानता हूं कि इन लोगों की उपेक्षा कर अब मै मुद्दों पर बहस की अपेक्षा कर सकता हूं ।इंटरव्यू पर शुरुआती प्रतिक्रिया उन लोगों की तरफ से आयी जिन्होने उसे पढा ही नही था ।अब जब कि अधिकतर लोगों नें इंटरव्यू पढ लिया है मुझे लगता है उसमें उठाये गये प्रश्नों पर बातचीत होनी चाहिये । संक्षेप में कहूँ तो मेरे मन में मुख्य शकां यह है कि महिला लेखन मे देहकेन्द्रित लेखन को कितना स्थान मिलना चाहिए । एक मित्र ने आपत्ति की कि यह प्रश्न पुरुषों के लेखन पर भी उठना चाहिये । सही है पर विमर्श सिर्फ वंचित या हाशिये पर पहुचे हुए तबकों के लेखन से निर्मित होता है । मसलन दलित लेखन जैसा विमर्श निर्मित करता है वैसा विमर्श ब्राह्मण लेखन नही कर सकता । दलित लेखन जहाँ मानव मुक्ति की कामना करता है या उसका मुख्य संघर्ष दबे कुचलों को उनका खोया सम्मान वापस लौटाने के लिये होगा वहीं यदि ब्राह्मण लेखन जैसा कोई लेखन किया जाय तो स्वाभाविक है कि उसकी चिंता का केन्द्र मनुष्य विरोधी वर्ण व्यवस्था को वैध ठहराने के लिये तर्क तलाशना होगा और मुझे नही लगता कि ऐसे लेखन से कोई उल्लेखनीय विमर्श निर्मित होगा । इसी प्रकार महिला लेखन के केन्द्र मे स्त्री मुक्ति के प्रश्न महत्वपूर्ण होंगे । स्त्री मुक्ति में अपनी देह पर स्त्री का अधिकार एक महत्वपूर्ण तर्क है पर और भी गम है जमानें में मोहब्बत के सिवा । मेरा मानना है कि स्त्री देह पर अंतिम अधिकार उसका है पर साथ मे मै यह भी मानता हूँ कि भारत के सदंर्भ में स्त्री मुक्ति से जुडे और भी महत्वपूर्ण मुद्दे हैं । आज भी परिवारों में निर्णय लेने का अधिकार सिर्फ पुरुषों को है , स्त्रियाँ केवल उन्हें लागू करती हैं । तमाम बहस मुबाहिसों के बावजूद घरेलू श्रम के लिये उसका पारिश्रमिक तय नही हो पा रहा है । पंचायती राज्य की संस्थाओं में आरक्षण के बल पर चुनी गयी महिलाओं मे से बहुत सी अभी भी घरों में कैद हैं और उनके प्रधान पति कागजों पर उनकी मुहरें लगाते हैं । बहुत से ऐसे मुद्दे है जिनपर बहस होनी चाहिये । अंत मे , इन सबसे महत्वपूर्ण यह प्रश्न कि क्या स्त्री मुक्ति आइसोलेशन मे हो सकती है ? क्या आदिवासियों , अल्पस्ंख्यकों या दलितों के प्रश्नों से जोडे बिना इस मुद्दे पर कोई बडी बहस खडी की जा सकती है । अगर एक बार यह सहमति बन सके तो गुजरात जैसी स्थिति से बचा जा सकता है जिसमे महिलाओं ने भी अल्पसख्यकों के सहांर मे हिस्सा लिया था ।मुझे 1990 का इलाहाबाद याद आ रहा है जहां मैं नियुक्त था और जो मडंल कमीशन की सिफारिशें लागू करने के खिलाफ चल रहे आन्दोलन का केन्द्र था । मैने आन्दोलनकारियों के साथ सख्ती की तो बहुत सारे दूसरे तबकों के अतिरिक्त विश्वविद्यालय की सवर्ण लड्कियों ने मेरे खिलाफ मोर्चा निकाला और अपनी पूरी कोशिशों के बावजूद मैं उन्हें यह नही समझा पाया कि उन्हें पिछ्डों के साथ खडा होना चाहिये । यदि उनके अन्दर यह समझ होती कि वे तो पिछडों में भी पिछ्डी हैं तो सम्भवत: उन्हे मेरी बात ज्यादा आसानी से समझ मे आ जाती। एक बार फिर अपने शब्दों के लिये माफी मांगते हुये मै अनुरोध करूंगा कि इन मुद्दों पर भी बातचीत की जाय।
Thursday, August 5, 2010
विवादित इंटरव्यू के बाद निभूति नारायण राय की सफाई
विभूति नारायण राय के इंटरव्यू पर पूरे हिंदी साहित्य में घमासान मचा है । कुलपति विभूति नारायण राय के माफी मांगने के बावजूद उनकी बर्खास्तगी की मांग हो रही है । हमें लगता है कि अगर किसी को उसकी गलती का एहसास हो जाए और वो उसपर सार्वजनिक रूप से लिखित और मौखिक माफी मांग ले तो उसे माफ कर दिया जाना चाहिए । इस पूरे मसले पर विभूति नारायण राय ने हाहाकार के लिए एक लेख लिखने का वादा किया है । जो जल्द ही प्रकाशित होगा । विवादित इंटरव्यू के बाद विभूति नारायण राय का ये पहला लेख जल्द ही हाहकार पर प्रकाशित होगा
Tuesday, August 3, 2010
'छिनाल' और 'लफंगे' से शर्मसार हिंदी साहित्य
पिछले वर्षों में हमारे यहां जो स्त्री विमर्श हुआ है वह मुख्यरूप से शरीर केंद्रित है । यह भी कह सकते हैं कि वह विमर्श बेवफाई के विराट उत्सव की तरह है । लेखिकाओं में होड़ लगी है यह साबित करने के लिए कि उनसे बड़ी छिनाल कोई नहीं है । मुझे लगता है कि इधर प्रकाशित एक बहु प्रमोटेड और ओवर रेटेड लेखिका की आत्मकथा का शीर्षक कितनी बिस्तरों पर कितनी बार हो सकता है । इस तरह के उदाहरण बहुत सी लेखिकाओं में मिल जाएंगे - यह कहना है महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के कुलपति विभूति नारायण राय का । विभूति का यह विवादास्पद साक्षात्कार भारतीय ज्ञानपीठ की मासिक पत्रिका नया ज्ञानोदय में प्रकाशित हुआ है । तकरीबन हफ्तेभर पहले जब पत्रिका का अंक बाजार में आया तो हिंदी के लेखकों के बीच इस साक्षात्कार को लेकर कानाफूसी शुरू हो गई थी लेकिन खुला विरोध नहीं हो रहा था । अचानक से एक दिन दिल्ली से प्रकाशित एक अंग्रेजी दैनिक ने इस खबर को प्रमुखता से प्रकाशित कर विवाद खड़ा कर दिया । अंग्रेजी अखबार के नादान संवाददाता ने छिनाल शब्द का अंग्रेजी अनुवाद प्रोस्टीट्यूट कर दिया । जिससे अर्थ का अनर्थ हो गया । दरअसल छिनाल शब्द भोजपुरी के छिनार शब्द का परिष्कृत रूप है । यह एक आंचलिक शब्द है जिसका प्रयोग बिहार और उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में किया जाता है । छिनाल उन स्त्रियों को कहा जाता है जो कुलटा होती हैं या फिर स्त्रियोचित मर्यादा को भंग कर अपनी मर्जी से कई पुरुषों से संबंध बनाती है । लेकिन वो किसी भी हाल में वेश्या नहीं होती । बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के भोजपुरी इलाकों में शादी ब्याह के मौके पर गाए जानेवाले लोकगीतों में महिला और पुरुष दोनों को छिनाल या छिनार कहा जाता है । शादी ब्याह के मौके पर जब महिलाएं मंगलगीत गाती हैं तो उसमें दूल्हे की मां और मौसी और फूआ को गाली दी जाती है तो उनमें छिनार शब्द का प्रयोग किया जाता है । तो यह शब्द बिल्कुल आपत्तिजनक है लेकिन वेश्या जितना अपमानजनक नहीं है । यह गाली है और किसी भी लेखक को अपनी बिरादरी की महिलाओं के लिए इस शब्द के प्रयोग की इजाजत नहीं दी जा सकती है ।
जैसा कि उपर संकेत दिया जा चुका है कि यह इंटरव्यू लगभग हफ्तेभर से छपकर विवादित नहीं हो पा रहा था क्योंकि हिंदी सत्ता की भाषा नहीं है, सत्ता की भाषा तो अंग्रेजी है । और अंग्रेजी अखबार के गैर जिम्मेदाराना अनुवाद ने आग में घी का काम किया और विरोध की चिंगारी को भड़ा दिया । लेखिलाओं का जितना अपमान विभूति नारायण राय ने किया उससे ज्यादा बड़ा अपमान तो अंग्रेजी के वो अखबार कर रहे हैं जो लगातार लेखिकाओं को वेश्या बता रहे हैं । न्यूज चैनलों को भी इस मसालेदार खबर में संभावना दिखी और एक दूसरे से आगे निकलने की होड़ में उन्होंने छिनाल और वेश्या के अंतर को मिटा दिया। किसी ने भी यह जांचने –परखने की कोशिश नहीं की कि दोनों में क्या अंतर है । मीडिया में इसके उछलने के बाद विभूति नारायण राय पर चौतरफा हमला शुरू हो गया । हिंदी के लेखकों के अलावा कई महिला संगठनों ने महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति को लेखिकाओं के खिलाफ इस अमर्यादित टिप्पणी को लेकर कठघरे में खड़ा किया और उनके इस्तीफे और बर्खास्तगी की मांग होने लगी। मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल और राष्ट्रीय महिला आयोग तक भी ये मामाला पहुंच गया । लगभग मृतप्राय लेखक संगठनों में भी जान आ गई और उन्होंने भी विभूति नारायण राय के खिलाफ एक निंदा बयान जारी कर दिया । राय ने लेखिकाओं के खिलाफ बेहद अपमानजनक और अर्मायदित टिप्पणी की है । इस बात के लिए उनको लेखिकाओं से खेद प्रकट करना ही चाहिए ।
लेकिन इस इंटरव्यू और उसके बाद उसपर उठे विवाद ने एक बार फिर से हिंदी साहित्य में लेखिकाओं के आत्मकथाओं में अश्लील प्रसंगों की बहुतायत पर बहस का एक व्यापक आधार तैयार कर दिया है । पिछले दिनों कई लेखिकाओं की आत्मकथा प्रकाशित हुई जिसमें मैत्रेयी पुष्पा की – गुड़िया भीतर गुड़िया, प्रभा खेतान की अन्या से अनन्या , मन्नू भंडारी की एक कहानी यह भी के अलावा कृष्णा अग्निहोत्री की लगता नहीं है दिल मेरा और ....और और औरत प्रमुख हैं । मन्नू जी की आत्मकथा को छोड़कर इन आत्मकथाओं में सेक्स प्रसंगों का उल्लेख मिलता है । विभूति नारायण राय जैसे हिंदी के शुद्धतावादियों को इन सेक्स प्रसंगों पर एतराज है और उन्हें लगता है कि ये जबरदस्ती ठूंसे और गढ़े गए हैं ताकि किताबों को चर्चा और पाठक दोनों मिले । ये लोग अपने तर्कों के समर्थन में जॉर्ज बर्नाड शॉ के एक प्रसिद्ध लेख का सहारा लेते हैं जिस लेख में उन्होंने आत्मकथाओं को झूठ का पुलिंदा बताया है । “ऑटोबॉयोग्राफिज़ आर लाइज़” में बर्नाड शा ने कई तर्कों और प्रस्थापनाओं से ये साबित करने की कोशिश की है कि आत्मकथा झूठ से भरे होते हैं । कुछ हद तक बर्नाड शॉ सही हो सकते हैं लेकिन ये कहना कि आत्मकथा तो झूठ का ही पुलिंदा होते हैं, पूरी तरह गले नहीं उतरती । बर्नाड शॉ के अपने तर्क हो सकते हैं लेकिन विश्व साहित्य में कई ऐसे आत्मकथा हैं जिसमें कूट-कूट कर सच्चाई भरी होती है । हिंदी में भी कई ऐसे आत्मकथा हैं जो सचाई के करीब हैं और झूठ का सिर्फ झौंक लगाया गया है । हो सकता है कि इन एतराज में सचाई हो लेकिन लेखक क्या लिखेगा यह तो वही तय करेगा । शुद्धतावादियों और आलोचक तो ये तय नहीं करेंगे । कुछ आलोचकों का तर्क है कि महिला लेखिकाओं की आत्मकथाएं भी दलित लेखकों की आत्मकथाओं की तरह टाइप्ड होती जा रही हैं- जहां कि समाज के दबंग, लेखकों के परिवार की महिलाओं के साथ लगातार बदसलूकी करते हैं । इस तर्क में कुछ दम हो सकता है लेकिन दलित और महिलाओं की जो स्थिति भारतीय समाज में है उसमें यौन शोषण की स्थितियां भी तो सामान्य हैं । इन दोनों पक्षों के तर्कों पर साहित्य में एक लंबे और गंभीर विमर्श की गुंजाइश है ।
दूसरा बड़ा सवाल जो यह इंटरव्यू खड़ा करती है वो यह कि किसी भी पत्रिका के संपादक का क्या दायित्व होता है । अगर छिनाल शब्द कहने पर विभूति नारायण राय की चौतरफा आलोचना हो रही है तो उतनी ही तीव्रता से नया ज्ञानोदय के संपादक रवीन्द्र कालिया को भी विरोध होना चाहिए । किसी भी पत्रिका में क्या छपे और क्या नहीं छपे इसकी जिम्मेदारी तो पूरे तौर पर संपादक की होती है । विभूति ने लेखिकाओं के लिए जो आपत्तिजनक शब्द कहे उसे रवीन्द्र कालिया को संपादित कर देना चाहिए था । अगर उन्होंने जानबूझकर ऐसा नहीं किया तो उनकी मंशा इस साक्षात्कार को विवादित करने और नया ज्ञानोदय के उक्त अंक को चर्चित करने की थी । अगर संपादक की यह मंशा नहीं थी और असावधानीवश वो शब्द छूट गया तो विभूति के साथ-साथ उन्हें भी खेद प्रकट करना चाहिए ।
अंत में विनम्रतापूर्वक इतना कहना चाहूंगा कि हिंदी साहित्य में विमर्श के स्तर को इतना नहीं गिराइये जहां कोई लेखक अपनी साथी लेखिकाओं को छिनाल कहे और कोई लेखिका अपने साथ के लेखकों को लफंगा । गुस्से में या जानबूझकर दोनों ही स्थितियों में मर्यादा की लक्ष्मण रेखा को लांघना अनुचित है ।
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जैसा कि उपर संकेत दिया जा चुका है कि यह इंटरव्यू लगभग हफ्तेभर से छपकर विवादित नहीं हो पा रहा था क्योंकि हिंदी सत्ता की भाषा नहीं है, सत्ता की भाषा तो अंग्रेजी है । और अंग्रेजी अखबार के गैर जिम्मेदाराना अनुवाद ने आग में घी का काम किया और विरोध की चिंगारी को भड़ा दिया । लेखिलाओं का जितना अपमान विभूति नारायण राय ने किया उससे ज्यादा बड़ा अपमान तो अंग्रेजी के वो अखबार कर रहे हैं जो लगातार लेखिकाओं को वेश्या बता रहे हैं । न्यूज चैनलों को भी इस मसालेदार खबर में संभावना दिखी और एक दूसरे से आगे निकलने की होड़ में उन्होंने छिनाल और वेश्या के अंतर को मिटा दिया। किसी ने भी यह जांचने –परखने की कोशिश नहीं की कि दोनों में क्या अंतर है । मीडिया में इसके उछलने के बाद विभूति नारायण राय पर चौतरफा हमला शुरू हो गया । हिंदी के लेखकों के अलावा कई महिला संगठनों ने महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति को लेखिकाओं के खिलाफ इस अमर्यादित टिप्पणी को लेकर कठघरे में खड़ा किया और उनके इस्तीफे और बर्खास्तगी की मांग होने लगी। मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल और राष्ट्रीय महिला आयोग तक भी ये मामाला पहुंच गया । लगभग मृतप्राय लेखक संगठनों में भी जान आ गई और उन्होंने भी विभूति नारायण राय के खिलाफ एक निंदा बयान जारी कर दिया । राय ने लेखिकाओं के खिलाफ बेहद अपमानजनक और अर्मायदित टिप्पणी की है । इस बात के लिए उनको लेखिकाओं से खेद प्रकट करना ही चाहिए ।
लेकिन इस इंटरव्यू और उसके बाद उसपर उठे विवाद ने एक बार फिर से हिंदी साहित्य में लेखिकाओं के आत्मकथाओं में अश्लील प्रसंगों की बहुतायत पर बहस का एक व्यापक आधार तैयार कर दिया है । पिछले दिनों कई लेखिकाओं की आत्मकथा प्रकाशित हुई जिसमें मैत्रेयी पुष्पा की – गुड़िया भीतर गुड़िया, प्रभा खेतान की अन्या से अनन्या , मन्नू भंडारी की एक कहानी यह भी के अलावा कृष्णा अग्निहोत्री की लगता नहीं है दिल मेरा और ....और और औरत प्रमुख हैं । मन्नू जी की आत्मकथा को छोड़कर इन आत्मकथाओं में सेक्स प्रसंगों का उल्लेख मिलता है । विभूति नारायण राय जैसे हिंदी के शुद्धतावादियों को इन सेक्स प्रसंगों पर एतराज है और उन्हें लगता है कि ये जबरदस्ती ठूंसे और गढ़े गए हैं ताकि किताबों को चर्चा और पाठक दोनों मिले । ये लोग अपने तर्कों के समर्थन में जॉर्ज बर्नाड शॉ के एक प्रसिद्ध लेख का सहारा लेते हैं जिस लेख में उन्होंने आत्मकथाओं को झूठ का पुलिंदा बताया है । “ऑटोबॉयोग्राफिज़ आर लाइज़” में बर्नाड शा ने कई तर्कों और प्रस्थापनाओं से ये साबित करने की कोशिश की है कि आत्मकथा झूठ से भरे होते हैं । कुछ हद तक बर्नाड शॉ सही हो सकते हैं लेकिन ये कहना कि आत्मकथा तो झूठ का ही पुलिंदा होते हैं, पूरी तरह गले नहीं उतरती । बर्नाड शॉ के अपने तर्क हो सकते हैं लेकिन विश्व साहित्य में कई ऐसे आत्मकथा हैं जिसमें कूट-कूट कर सच्चाई भरी होती है । हिंदी में भी कई ऐसे आत्मकथा हैं जो सचाई के करीब हैं और झूठ का सिर्फ झौंक लगाया गया है । हो सकता है कि इन एतराज में सचाई हो लेकिन लेखक क्या लिखेगा यह तो वही तय करेगा । शुद्धतावादियों और आलोचक तो ये तय नहीं करेंगे । कुछ आलोचकों का तर्क है कि महिला लेखिकाओं की आत्मकथाएं भी दलित लेखकों की आत्मकथाओं की तरह टाइप्ड होती जा रही हैं- जहां कि समाज के दबंग, लेखकों के परिवार की महिलाओं के साथ लगातार बदसलूकी करते हैं । इस तर्क में कुछ दम हो सकता है लेकिन दलित और महिलाओं की जो स्थिति भारतीय समाज में है उसमें यौन शोषण की स्थितियां भी तो सामान्य हैं । इन दोनों पक्षों के तर्कों पर साहित्य में एक लंबे और गंभीर विमर्श की गुंजाइश है ।
दूसरा बड़ा सवाल जो यह इंटरव्यू खड़ा करती है वो यह कि किसी भी पत्रिका के संपादक का क्या दायित्व होता है । अगर छिनाल शब्द कहने पर विभूति नारायण राय की चौतरफा आलोचना हो रही है तो उतनी ही तीव्रता से नया ज्ञानोदय के संपादक रवीन्द्र कालिया को भी विरोध होना चाहिए । किसी भी पत्रिका में क्या छपे और क्या नहीं छपे इसकी जिम्मेदारी तो पूरे तौर पर संपादक की होती है । विभूति ने लेखिकाओं के लिए जो आपत्तिजनक शब्द कहे उसे रवीन्द्र कालिया को संपादित कर देना चाहिए था । अगर उन्होंने जानबूझकर ऐसा नहीं किया तो उनकी मंशा इस साक्षात्कार को विवादित करने और नया ज्ञानोदय के उक्त अंक को चर्चित करने की थी । अगर संपादक की यह मंशा नहीं थी और असावधानीवश वो शब्द छूट गया तो विभूति के साथ-साथ उन्हें भी खेद प्रकट करना चाहिए ।
अंत में विनम्रतापूर्वक इतना कहना चाहूंगा कि हिंदी साहित्य में विमर्श के स्तर को इतना नहीं गिराइये जहां कोई लेखक अपनी साथी लेखिकाओं को छिनाल कहे और कोई लेखिका अपने साथ के लेखकों को लफंगा । गुस्से में या जानबूझकर दोनों ही स्थितियों में मर्यादा की लक्ष्मण रेखा को लांघना अनुचित है ।
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Wednesday, July 28, 2010
उग्र और आक्रामक विमर्श
1.लीडर बनना औरतों का काम नहीं है, उनका काम लीडर पैदा करना है । कुदरत ने अल्लाह ने उन्हें इसलिए बनाया है कि वो घर संभालें, अच्छी नस्ल के बच्चे पैदा करें – शिया धर्म गुरू कल्बे जव्वाद2.महिलाओं को अकेले मंदिर, मठ या देवालय में नहीं जाना चाहिए । अगर वो मंदिर, मठ या देवालय जाती हैं तो उन्हें पिता, पुत्र या भाई के साथ ही जाना चाहिए । नहीं तो उनकी सुरक्षा को खतरा है ।- राम जन्मभूमि न्यास अध्यक्ष महंथ नृत्यगोपाल दास
3.महिलाओं को राजनीति में नहीं आना चाहिए क्योंकि इससे समाज पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है । राजनीति महिलाओं को क्रेजी बना देती है । समाज के बदलाव में महिलाओं की महती भूमिका है और उन्हें आनेवाली पीढ़ी का ध्यान रखना चाहिए । -गोवा के मुख्यमंत्री दिगंबर कामत
4. अगर संसद में महिलाओं को आरक्षण मिला और वो संसद में आईं तो वहां जमकर सीटियां बजेंगी- सामजवादी पार्टी अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव
ये चार बयान अलग-अलग धर्म और विचारधारा के लोगों के हैं जो किसी समुदाय, वर्ग या सूबे की रहनुमाई करते हैं । दरअसल ये सारे बयान घोर सामंती व्यवस्था की पुरुषवादी मानसिकता का बेहद कुरुप चेहरा है । उस व्यवस्था का जहां महिलाएं बच्चा पैदा करने की मशीन हैं, बच्चा पालना उनका परम धर्म है । परिवार की देखभाल और अपने पति की हर तरह की जरूरतों पर जान न्योछावर करने की घुट्टी उसे जन्म से पिलाई जाती है । उस आदिकालीन वयव्स्था में महिलाएं गुलाम हैं जिनका परम कर्तव्य है अपने स्वमी की सेवा और स्वामी है पुरुष । इस पाषाणकालीन व्यवस्था में यकीन रखनेवाले पुरुषों को यह कतई मंजूर नहीं है कि महिलाएं भी पुरुषों के साथ कंधा से कंधा मिलाकर काम करें । महिलाओं को पुरुषों के बराबर हक और दर्जा मिले । महिलाएं देश की नीति नियंता बने । उपर बयान देने वाले चारो महापुरुष इसी सामंती और पुरुष प्रधान व्यवस्था के प्रतिनिधि पुरुष हैं । महिलाओं का विरोध है किसी सिद्धांत, धर्म, आस्था, विश्वास या वाद के परिधि से परे है । जब भी महिलाओं की बेहतरी की बात होती है तो सभी सिद्धांत, वाद, समुदाय, धर्म धरे रह जाते हैं । प्रबल हो जाता है कठोर पुरातनपंथी विचारधारा जो महिलाओं को सदियों से दबा कर रख रहा है और आगे भी चाहता है कि वो उसी तरह दासता और पिछड़ेपन की बेड़ियों में जकड़ी रहें ।
लेकिन अब स्थितियां बदलने लगी हैं और पितृसत्तात्मक समाज के वर्चस्व के विरोध में स्त्रियां उठ खड़ी होनी लगी हैं । राजेन्द्र यादव ने स्त्री विमर्श की जो आग सुलगाई थी अब वो लगभग दावानल बनता जा रहा है । स्त्री लेखिकाओं ने पुरुष की सत्ता को चुनौती देनी शुरू कर दी है । इन्हीं चुनौतियों के बीच पत्रकार गीताश्री की किताब– नागपाश में स्त्री- का प्रकाशन हुआ है । गीताश्री ने इस किताब का संपादन किया है जिसमें पत्रकारिता, थिएटर, साहित्य. कला से जुड़ी महिलाओं ने पुरुषों की मानसिकता और स्त्रियों को लेकर उनके विचारों को कसौटी पर कसा है । गीताश्री की छवि भी स्त्रियों के पक्ष में मजबूती से खड़े होने की रही है और पिछले कुछ वर्षों से उन्होंने अपने लेखन से स्त्री विमर्श को एक नया आयाम दिया है । गीताश्री का बेबाक और आक्रामक लेखन पुरुषों की स्त्री विरोधी मानसिकता को शिद्दत से चुनौती देता है । अपनी इस किताब की भूमिका में लेखिका ने लिखा- आज बाजार के दबाव और सूचना-संसार माध्यमों के फैलाव ने राजनीति, समाज और परिवार का चरित्र पूरी तरह से बदल डाला है, मगर पितृसत्ता का पूर्वाग्रह और स्त्री को देखने का उसका नजरिया नहीं बदला है, जो एक तरफ स्त्री की देह को ललचायी नजरों से घूरता है तो दूसरी तरफ उससे कठोर यौन-शुचिता की अपेक्षा भी रखता है । पितृसत्ता का चरित्र भी वही है । हां समाज में बड़े पैमाने पर सक्रिय और आत्मनिर्भर होती स्त्री की स्वतंत्र चेतना पर अंकुश लगाने के उसके हथकंडे जरूर बदले हैं । गीताश्री ने अपने इस कथन ते समर्थन में कई उदाहरण दिए हैं । कमोबेश यही स्थिति समाज में व्याप्त है । यह हमारे समाज की एक कड़वी हकीकत है कि पुरुष चाहे जितने स्त्रियों के साथ संबंध बनाए उसकी इज्जत पर बट्टा नहीं लगता है बल्कि वो फख्र से सीना चौड़ा कर इसे एक उपलब्धि की तरह से पेश करता है । लेकिन वहीं अगर स्त्री ने अपनी मर्जी से अपने पति के अलावा किसी और मर्द के साथ संबंध बना लिया तो इसके चरित्र, उसकी पारिवारिक पृष्ठभूमि, उसकी शिक्षा-दीक्षा सभी सवालों के घेरे में आ जाते हैं । वो कुलटा तक करार दे दी जाती हैं ।
लेकिन अब हालात तेजी से बदलने लगे हैं, स्त्रियां भी अपने मन की करने लगी हैं । इसी किताब के अपने एक लेख में उपन्यासकार मैत्रेयी पुष्पा ने कहा है – औरत करती वही है जो उसका दिल करता है, दिखावा चाहे वो जो करे । समाज के लिए स्त्री के प्रेम संबंध अनैतिक हो सकते हैं मगर स्त्री के लिए नैतिकता की पराकाष्ठा है । मैत्रेयी पुष्पा ने माना है कि आवारा लड़कियां ही प्यार कर सकती हैं । अपने लेख में मैत्रेयी पुष्पा ने इस बात का खुलासा नहीं कि वो किस प्यार की बात करती हैं- दैहिक या लौकिक । क्योंकि उन्होंने लिखा है कि मेरे पांच सात प्रेमी रहे तो उम्र के अलग-अलग पड़ाव पर मुझे मिले । लेकिन लेख में नायब साहब और एदल्लला के साथ तो प्यार जैसी कोई चीज थी, देह तो बीच में कभी आई ही नहीं । इस किताब में बुजुर्ग लेखिका रमणिका गुप्ता का भी एक बेहद लंबा और उबाऊ लेख है । रमणिका गुप्ता ने बेवजह अपने लेख को लंबा किया है । किताब की संपादक को इस पर ध्यान देने की जरूरत थी । अपने लंबे और उबाऊ लेख के अंत में रमणिका गुप्ता ने भारतीय समाज में स्त्रियों की बदतर हालत के लिए धर्म और सामाजिक परंपरा को जिम्मेदार ठहराया है । अपने इस तर्क के समर्थन में गुप्ता ने दो उदाहरण भी दिए हैं । पहला उड़ीसा और दूसरा मध्यप्रदेश का है जहां अठारह बीस साल की लड़कियों का विवाह बालकों से कर दिया जाता है । परंपरा की आड़ में तर्क यह दिया जाता है कि खेतों में और घर का काम करने के लिए जवान लड़की चाहिए । लेकिन इस तरह के विवाह में योग्यता ससुर की परखी जाती है । पति के जवान होने तक बहू ससुर के साथ देह संबंध बनाने के लिए अभिशप्त होती है । मनुस्मृति में भी कहा गया है – पति की पूजा विश्वसनीय पत्नी द्वारा भगवान की तरह होनी चाहिए, यदि वह अपनी ‘सेवाएं’ देने में किसी तरह की भी कोई कोताही बरते तो उसे राजा से कहकर कुत्तों के सामने फिंकवा देना चाहिए । अपने इसी लेख में रमणिका गुप्ता ने यह भी कहा है कि दलित स्त्रियां सवर्ण स्त्रियों की तुलना में ज्यादा स्वतंत्र होती है । इस बात तो साबित करने के लिए भी रमणिका के अपने तर्क हैं ।
जैसा कि उपर बताया गया है कि इस किताब में साहित्य के अलावा अन्य क्षेत्र की महिलाओं के भी लेख हैं । आमतौर पर सारे लेख वयक्तिगत अनुभवों के आधार पर लिख गए हैं । मशहूर गायिका विजय भारती का भी एक दिलचस्प लेख इस किताब में संग्रहीत है । विजय भारती ने अपने लेख में यह साबित करने की कोशिश की है कि समाज और परिवार में किस तरह से बचपन से ही लड़कियों को यौन शुचिता की घुट्टी पिलाई जाती है । जब बचपन में लड़कियां खेलने जाती हैं तो उनको यह कहा जाता है कि देखना लड़कों के साथ मत खेलना माने लड़कों के साथ खेलने से उसकी शुचिता नष्ट हो जाएगी । बचपन की बात क्यों जवान लड़कियां भी दजब घर से बाहर निकलती हैं तो परिवार के लोग उसके साथ छह सात साल के उसके भाई को लगा देते हैं, जो उसकी रक्षा करेगा । यह एक ऐसी हकीकत है जिससे आपको हर रोज दो चार होना पड़ता है । विजय भारती ने अपनी एरक कविता के जरिए अपनी बात रखी है – हैं कई गरमागरम उसके फसाने शहर में/घात के मेले लगे हैं इस बहारे शहर में/रुख हवाओं के, उसे लूटा किए हर कदम पे/बने अपने ही लुटेरे, कितने जाने शहर में/दुश्मनी उसकी किसी से कुछ न थी, कुछ नहीं है/आग लेकर क्यों खड़े हैं लोग अपने शहर में/
इनके अलावा फायरब्रांड और अपनी लेखनी को एके 47 की तरह इस्तेमाल करनेवाली मनीषा ने अपनी खास शैली में अपनी बात कही है । मनीषा लिखती हैं कि भारत में चालीस साल के उपर के लगभग नौ करोड़ आदमी स्वीकृत रूप से नपुंसक हैं, जाहिरा तौर पर उनकी सेक्स जाती रही हो । पर सामाजिक पारिवारिक दबावों में इनकी पत्नियां चूं तक नहीं कर पाती । ...और अगर स्त्री बच्चा नहीं जन सकती तो भी उसकी शारीरिक संरचना पुरुष को भरपूर यौनानंद देने के काबिल तो रहती ही है । मनीषा की जो शैली है वो बेहद तीखी और खरी-खरी कहने की है – लड़की बिन ब्याह के अगर किसी लड़के का लिंग छू ले तो ये भ्रष्ट हो जाएगी पर आप अपनी कोहनियां उसके स्तनों में खोंसते फिरें तो यह धार्मिकता मानी जाएगी । इसके अलावा जयंती, निर्मला भुराड़िया, असीमा भट्ट के भी पुरुष सत्ता के खिलाफ आग उगलते लेख इस किताब में हैं ।
कुल मिलाकर अगर हम स्त्री विमर्श के प्रथम पुरुष राजेन्द्र यादव को समर्पित इस किताब पर समग्रता से विचार करें तो यह लगता है कि राजेन्द्र यादव की पीढ़ी ने जिस विमर्श की शुरुआत की थी वो अब विरोध से आगे बढ़कर विद्रोह की स्थिति में जा पहुंचा है । इस लिहाज से गीताश्री की यह किताब अहम है कि युवा लेखिकाओं के विचार बेहद उग्र और आक्रामक हैं । जो बात स्त्री विमर्श का झंडा बुलंद करनेवाली लेखिकाएं खुलकर नहीं कह पा रही थी वो बात अब युवा लेखिकाओं के लेख में सामने आने लगी है । इन युवा लेखिकाओं के तेवरों से यह लगता है कि स्त्री विमर्श ने एक नया मुकाम और नई शब्दावली भी तैयार कर ली है । लेकिन लाख टके का सवाल यही है कि क्या सदियों पुरानी परंपराओं और मानसिकता को बदलना इतना आसान है जबाव है नहीं लेकिन इस वजह से प्रयास तो छोड़े नहीं सकते, और उसी का नतीजा है – नागपाश में स्त्री
Sunday, July 25, 2010
बेवफाई का सुपर धमाका
हिंदी साहित्य में रवीन्द्र कालिया की ख्याति उपन्यासकार, कहानीकार और संस्मरण लेखक के अलावा एक ऐसे बेहतरीन संपादक के रूप में भी है जो लगभग मृतप्राय पत्रिकाओं में भी जान फूंक देते हैं । रवीन्द्र कालिया हिंदी के उन गिने चुने संपादकों नें से एक हैं जिनको पाठकों की नब्ज और बाजार का खेल दोनों पता है । धर्मयुग में जब रवीन्द्र कालिया थे तो पत्रिका के तेवर और कलेवर में उनका भी योगदान था लेकिन जैसा कि आमतौर पर होता है कि हर बड़ी-छोटी जीत का सेहरा टीम के कप्तान के सर बंधता है । बाद के दिनों में जब कालिया जी की धर्मवीर भारती से खटपट हुई तो वो लौटकर इलाहाबाद चले आए । यह वही दौर था जब कालिया जी ने काला रजिस्टर लिखा था । इलाहाबाद लौटकर रवीन्द्र कालिया ने जब गंगा-जमुना निकाला तो उसने भी साहित्य जगत में धूम मचा दी थी । हिंदी के पाठकों को उन्नीस सौ इक्यानबे में निकले वर्तमान साहित्य के दो कहानी महाविशेषांक अब भी याद होंगे । वर्तमान साहित्य के दो भारी भरकम अंक अप्रैल और मई उन्नीस सौ इक्यानवे में प्रकाशित हुए थे । उस दौर में मैं कॉलेज का छात्र था और मुझे याद है कि जमालपुर के व्हीलर के स्टॉल चलानेवाले पांडे जी ने हमें वर्तमान साहित्य के वो अंक चुपके से इस तरह सौंपे थे जैसे कोई बेहद कीमती चीज छुपाकर देता हो । उस वक्त मुझे अजीब लगा था । कई दिनों बाद जब मैंने पांडे जी से पूछा तो उन्होंने बताया था कि उक्त अंक की दस ही प्रतियां आई थी और साहित्यानुरागी पांडे जी के मुताबिक उसके ज्यादा खरीदार हो सकते थे । सो उन्होंने अपने चुनिंदा ग्राहकों को छुपाकर वर्तमान साहित्य का कहानी महाविशेषांक दिया था । यह हिंदी में पहली बार हुआ था जब किसी भी विशेषांक को महाविशेषांक बताया गया हो । जैसा कि मैं उपर कह चुका हूं कि कालिया जी को पाठकों की रुचि के साथ-साथ बाजार की भी समझ है । वर्तमान साहित्य से पहले इस तरह का आयोजन उन्नीस सौ अट्ठावन –साठ में कहानी पत्रिका ने किया था, जिसके संपादक श्रीपत राय थे । कहानी के उन अंकों में अमरकांत की डिप्टी कलेक्टरी , कमलेश्वर की राजा निरवंसिया, मार्केंडेय की हंसा जाई अकेला जैसी बेहद प्रसिद्ध रचनाएं छपी थी ।
यही बात वर्तमान साहित्य के कहानी विशेषांक के साथ भी हुई । कालिया जी ने उन दो अंकों में लगभग संपूर्ण हिंदी साहित्य का समेट कर रख दिया था । कृष्णा सोबती की लंबी कहानी ए लड़की वर्तमान साहित्य के उस महाविशेषांक में ही छपी थी । बाद में स्पीड पोस्ट में उसपर तीन गंभीर टिप्पणियां छपने से कहानी को खासी चर्चा मिली । बाद में यह उपन्यास के रूप में स्वतंत्र रूप से प्रकाशित हुई । साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त मशहूर लेखिका अलका सरावगी की पहली कहानी – आपकी हंसी भी वर्तमान साहित्य के महाविशेषांक में ही प्रकाशित हुई थी । उस अंक में उपेन्द्र नाथ अश्क का एक बेहद धमाकेदार लेख- महिला कथा लेखन की अर्धशती भी प्रकाशित हुई थी । किसी भी संपादक की दृष्टि पत्रिका को एक उंचाई देती है । और कालिया ने इसे एक बार नहीं कई बार साबित किया ।
जब रवीन्द्र कालिया वागर्थ के संपादक होकर कोलकाता गए तो भारतीय भाषा परिषद की उस दम तोड़ती पत्रिका को भी ना केवल खड़ा कर दिया बल्कि हिंदी साहित्य की मुख्यधारा में लाकर उसे एक अहम पत्रिका बना दिया । वागर्थ का संपादन छोड़कर जब वो नया ज्ञानोदय आए तो इस पत्रिका का हाल भी बेहाल था और साहित्य के नाम पर बेहद ठंढी और विचारोत्तेजक सामग्री के आभाव में ज्ञानोदय एक सेठाश्रयी पत्रिका बनकर रह गई थी जो इस लिए निकल पा रही थी क्योंकि उसका प्रकाशन टाइम्स जैसे बड़े ग्रुप से हो रहा था । लेकिन कालिया ने संपादक का दायित्व संभालते ही ज्ञानोदय को हिंदी साहित्य की अनिवार्य पत्रिका बना दिया । रवीन्द्र कालिया के ज्ञानोदय के संपादक बनने के पहले हंस और उसके संपादक राजेन्द्र यादव समकालीन हिंदी साहित्य का एजेंडा सेट किया करते थे । लेकिन जब मई दो हजार सात में कालिया के संपादन में युवा पीढी विशेषांक निकला तो पहली बार ऐसा लगा कि हंस के अलावा कोई और पत्रिका है जो साहित्य का एजेंडा सेट कर सकती है । संपादक ने दावा किया कि दो हजार सात में छपे युवा पीढी विशेषांक की मांग इतनी ज्यादा हुई थी कि उसे पुनर्मुद्रित करना पडा़ था । नया ज्ञानोदय के उक्त अंक को लेकर उस वक्त अच्छा खासा बवाल भी मचा था लेकिन आखिरकार रचना ही बची रहती है सो उस अंक का एक स्थायी महत्व बना रहा । धीरे धीरे पहले नवलेखन अंकों से कहानीकारों की एक नई फौज खड़ी कर दी । उसके बाद चार लगातार अंकों में प्रेम विशेषांक निकालकर बिक्री के भी सारे रिकॉर्ड तोड़ डाले । संपादक के दावे के मुताबिक प्रेम विशेषांकों की कड़ी के पहले अंक को पाठकों की मांग पर कई बार प्रकाशित करना पड़ रहा है । आज जब हिंदी के साहित्यिक पत्रिकाओं के संपादक पाठकों की कमी और बिक्री ना होने का रोना रो रहे हैं ऐसे में कालिया का ये दावा एक सुखद आश्चर्य की तरह है ।
अब कालिया जी ने नया ज्ञानोदय का बेवफाई सुपर विशेषांक-1 निकाला है । कहानी महाविशेषांक वो पहले ही निकाल चुके हैं । पाठकों को हर बार कोई नई चीज देनी होती है लिहाजा अब सुपर विशेषांक । संपादकीय की पहली ही लाइन है- अगर वफा का अस्तित्व ना होता तो बेवफाई नहीं होती । कई शायरों के मार्फत भी कालिया जी ने बेवफाई को परिभाषित किया है । तकरीबन सवा दौ सौ पन्नों के इस महाविशेषांक में वह हर रचना मौजूद है जो पाठकों को ना केवल बांधे रखेगी बल्कि उसकी साहित्यिक वफा को और मजबूत करेगी । इस विशेषांक में प्रेमचंद, मंटो, इस्मत चुगताई से लेकर ओ हेनरी, मोपासां, हेमिंग्वे तक मौजूद हैं । बेवफाई पर गुलजार ने जब ज्ञानोदय संपादक को अपनी नज्में भेजी तो लिखा- जनाब रविन्द्र कालिया साहब । बे-वफायी पर कुछ नज्में । मेरे यहां कुछ इल्जाम-देही और गिले शिकवे नहीं हैं । मेरा ख्याल है वो बे-वफायी भी नहीं । बस अलग हो गए । बे-वफायी कैसी । नज्में ज्यादा है ताकि आप कुछ रद्द कर सकें । बे-वफायी को बस अलग हो गए मानने वाले गुलजार की नज्म देखिए – और तुम ऐसे गई जैसे /शहर की बिजली चली जाए अचानक जैसे/और मुझको/बंद कमरे में बहुत देर तलक कुछ भी दिखायी नहीं दिया/आंखें तारीकी से मानूस हुई तो.../फिर से दरवाजे का खाका सा नजर आया/ । सिर्फ गुलजार ही नहीं बेवफायी पर बशीर बद्र की नज्में भी बेहतरीन हैं । इसके अलावा विदेशी उपन्यासों में, मीडिया में, फिल्मों में और इंटरनेट की बेवफाइयों पर भी अहम लेख हैं । कुल मिलाकर यह अंक पठीनय तो है ही संग्रहणीय भी है । बेवफाई सुपर विशेषांक -2 का भी ऐलान है जिसमें नोवोकोब का प्रसिद्ध उपन्यास लोलिता भी प्रकाश्य है । आखिरकार लोलिता भी तो अंत में बेवफाई पर ही खत्म होती है । कालिया जी का यह प्रयोग काबिल-ए-तारीफ है ।
यही बात वर्तमान साहित्य के कहानी विशेषांक के साथ भी हुई । कालिया जी ने उन दो अंकों में लगभग संपूर्ण हिंदी साहित्य का समेट कर रख दिया था । कृष्णा सोबती की लंबी कहानी ए लड़की वर्तमान साहित्य के उस महाविशेषांक में ही छपी थी । बाद में स्पीड पोस्ट में उसपर तीन गंभीर टिप्पणियां छपने से कहानी को खासी चर्चा मिली । बाद में यह उपन्यास के रूप में स्वतंत्र रूप से प्रकाशित हुई । साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त मशहूर लेखिका अलका सरावगी की पहली कहानी – आपकी हंसी भी वर्तमान साहित्य के महाविशेषांक में ही प्रकाशित हुई थी । उस अंक में उपेन्द्र नाथ अश्क का एक बेहद धमाकेदार लेख- महिला कथा लेखन की अर्धशती भी प्रकाशित हुई थी । किसी भी संपादक की दृष्टि पत्रिका को एक उंचाई देती है । और कालिया ने इसे एक बार नहीं कई बार साबित किया ।
जब रवीन्द्र कालिया वागर्थ के संपादक होकर कोलकाता गए तो भारतीय भाषा परिषद की उस दम तोड़ती पत्रिका को भी ना केवल खड़ा कर दिया बल्कि हिंदी साहित्य की मुख्यधारा में लाकर उसे एक अहम पत्रिका बना दिया । वागर्थ का संपादन छोड़कर जब वो नया ज्ञानोदय आए तो इस पत्रिका का हाल भी बेहाल था और साहित्य के नाम पर बेहद ठंढी और विचारोत्तेजक सामग्री के आभाव में ज्ञानोदय एक सेठाश्रयी पत्रिका बनकर रह गई थी जो इस लिए निकल पा रही थी क्योंकि उसका प्रकाशन टाइम्स जैसे बड़े ग्रुप से हो रहा था । लेकिन कालिया ने संपादक का दायित्व संभालते ही ज्ञानोदय को हिंदी साहित्य की अनिवार्य पत्रिका बना दिया । रवीन्द्र कालिया के ज्ञानोदय के संपादक बनने के पहले हंस और उसके संपादक राजेन्द्र यादव समकालीन हिंदी साहित्य का एजेंडा सेट किया करते थे । लेकिन जब मई दो हजार सात में कालिया के संपादन में युवा पीढी विशेषांक निकला तो पहली बार ऐसा लगा कि हंस के अलावा कोई और पत्रिका है जो साहित्य का एजेंडा सेट कर सकती है । संपादक ने दावा किया कि दो हजार सात में छपे युवा पीढी विशेषांक की मांग इतनी ज्यादा हुई थी कि उसे पुनर्मुद्रित करना पडा़ था । नया ज्ञानोदय के उक्त अंक को लेकर उस वक्त अच्छा खासा बवाल भी मचा था लेकिन आखिरकार रचना ही बची रहती है सो उस अंक का एक स्थायी महत्व बना रहा । धीरे धीरे पहले नवलेखन अंकों से कहानीकारों की एक नई फौज खड़ी कर दी । उसके बाद चार लगातार अंकों में प्रेम विशेषांक निकालकर बिक्री के भी सारे रिकॉर्ड तोड़ डाले । संपादक के दावे के मुताबिक प्रेम विशेषांकों की कड़ी के पहले अंक को पाठकों की मांग पर कई बार प्रकाशित करना पड़ रहा है । आज जब हिंदी के साहित्यिक पत्रिकाओं के संपादक पाठकों की कमी और बिक्री ना होने का रोना रो रहे हैं ऐसे में कालिया का ये दावा एक सुखद आश्चर्य की तरह है ।
अब कालिया जी ने नया ज्ञानोदय का बेवफाई सुपर विशेषांक-1 निकाला है । कहानी महाविशेषांक वो पहले ही निकाल चुके हैं । पाठकों को हर बार कोई नई चीज देनी होती है लिहाजा अब सुपर विशेषांक । संपादकीय की पहली ही लाइन है- अगर वफा का अस्तित्व ना होता तो बेवफाई नहीं होती । कई शायरों के मार्फत भी कालिया जी ने बेवफाई को परिभाषित किया है । तकरीबन सवा दौ सौ पन्नों के इस महाविशेषांक में वह हर रचना मौजूद है जो पाठकों को ना केवल बांधे रखेगी बल्कि उसकी साहित्यिक वफा को और मजबूत करेगी । इस विशेषांक में प्रेमचंद, मंटो, इस्मत चुगताई से लेकर ओ हेनरी, मोपासां, हेमिंग्वे तक मौजूद हैं । बेवफाई पर गुलजार ने जब ज्ञानोदय संपादक को अपनी नज्में भेजी तो लिखा- जनाब रविन्द्र कालिया साहब । बे-वफायी पर कुछ नज्में । मेरे यहां कुछ इल्जाम-देही और गिले शिकवे नहीं हैं । मेरा ख्याल है वो बे-वफायी भी नहीं । बस अलग हो गए । बे-वफायी कैसी । नज्में ज्यादा है ताकि आप कुछ रद्द कर सकें । बे-वफायी को बस अलग हो गए मानने वाले गुलजार की नज्म देखिए – और तुम ऐसे गई जैसे /शहर की बिजली चली जाए अचानक जैसे/और मुझको/बंद कमरे में बहुत देर तलक कुछ भी दिखायी नहीं दिया/आंखें तारीकी से मानूस हुई तो.../फिर से दरवाजे का खाका सा नजर आया/ । सिर्फ गुलजार ही नहीं बेवफायी पर बशीर बद्र की नज्में भी बेहतरीन हैं । इसके अलावा विदेशी उपन्यासों में, मीडिया में, फिल्मों में और इंटरनेट की बेवफाइयों पर भी अहम लेख हैं । कुल मिलाकर यह अंक पठीनय तो है ही संग्रहणीय भी है । बेवफाई सुपर विशेषांक -2 का भी ऐलान है जिसमें नोवोकोब का प्रसिद्ध उपन्यास लोलिता भी प्रकाश्य है । आखिरकार लोलिता भी तो अंत में बेवफाई पर ही खत्म होती है । कालिया जी का यह प्रयोग काबिल-ए-तारीफ है ।
Friday, July 16, 2010
समकालीन साहित्य में सार्थक हस्तक्षेप
हिंदी में साहित्यिक पत्रिकाओं का लंबा और समृद्ध इतिहास रहा है । दरअसल हिंदी में लघु पत्रिका आंदोलन की शुरुआत छठे दशक में व्यावसायिक पत्रिका के जवाब के रूप में की गई । इस आंदोलन का श्रेय हम हिंदी के वरिष्ठ कवि विष्णुचंद्र शर्मा को दे सकते हैं । उन्होंने 1957 में बनारस से कवि का संपादन प्रकाशन शुरू किया था । कालांतर में और भी कई लघु पत्रिकाएं वयक्तिगत प्रयासों और प्रकाशन संस्थानों से निकली जिसने हिंदी साहित्य की तामम विधाओं को ना केवल समृद्ध किया बल्कि उसका विकास भी किया । 1967 में नामवर सिंह के संपादन में आलोचना, सत्तर के दशक में विश्वनाथ तिवारी के संपादन में दस्तावेज, ज्ञानरंजन के संपादन में पहल । बाद में देश निर्मोही के संपादन में पल-प्रतिपल के शुरुआती अंको ने उम्मीद जगाई थी लेकिन बाद के उसके अंक कमजोर निकले । अब भी रुक-रुक कर उसका प्रकाशन हो रहा है । लेकिन 1986 में राजेन्द्र यादव के संपादन में निकली पत्रिका हंस ने पूरे परिदृश्य को बदल दिया । इसी महीने हंस के प्रकाशन के पच्चीस साल पूरे हो रहे हैं । व्यक्तिगत प्रयासों से इतने लंबे समय तक नियमित रूप से मेरे जानते हिंदी साहित्य की कोई पत्रिका नहीं निकली । अखिलेश के संपादन मे तद्भव के अंक ने भी पाठकों और आलोचकों का ध्यान अपनी ओर खींचा ।
लेकिन मुझे लगता है कि साठ के दशक में शुरु हुआ लघु पत्रिका आंदोलन अपनी राह से भटक गया है । उसने ना केवल अपना चरित्र बल्कि स्वरूप भी खो दिया है । लघु पत्रिका आंदोलन और उसकी विरासत से अनजान अबोध लोग संपादक बने जा रहे हैं । लेकिन उन्हें ना तो लघु पत्रिकाओं के दायित्व की परवाह है और ना ही इसके चरित्र की । दरअसल संपादन एक बेहद कठिन कर्म है । इसमें व्यक्तिगत संबंधों को तरजीह दिए बगैर काम करना पड़ता है लेकिन आज तो साहित्यिक पत्रिकाओं में तुम मेरी मैं तेरी वाली स्थिति व्याप्त है । पत्रिकाएं सौदेबाजी का अखाड़ा बनती जा रही है । आज किसी भी लघु पत्रिका के संपादक में इतना साहस है कि वो किसी भी स्थापित साहित्यकार की रचना को लौटा सके । बड़े नाम को छापने के चक्कर में हो यह रहा कि किसी का रिसर्च पेपर, किसी का भाषण, किसी का वक्तव्य छप रहा है । इससे संपादकों की दृष्टि की दयनीयता और दरिद्रता का पता चलता है । आज अगर हम कुछ लघु पत्रिका संपादकों को छोड़ दें तो अधिकांश में रचनाओं के चयन की दृष्टि का घोर अभाव दिखाई देता है ।तकरीबन हर संपादक संयोजन कर रहा है लेकिन इस सत्य को स्वीकार करने का साहस कितने लोगों के पास है । अगर संपादक की दृष्टि सुलझी हुई हो तो पत्रिका का एक स्वरूप बनता है लेकिन अगर आप सिर्फ संयोजन कर रहे हों तो उसकी एक स्पष्ट रूपरेखा आपके दिमाग हो वर्ना पूरी पत्रिका बिखर जाती है ।
लघु पत्रिकाओं का एक अहम दायित्व स्थानीय पत्रिकाओं को मौका देकर उसे साहित्य के परिदृश्य पर उभारने का भी होता है । पर आज के तमाम साहित्यिक पत्रिकाओं के संपादक नए लेखकों की रचनाओं को तरजीह नहीं देते हैं । उन्हें तो बड़े नाम चाहिए ताकि पाठक उसके प्रभाव में आकर पत्रिका खरीद सके । अच्छा होता अगर लघु पत्रिका के संपादक बडे़ नामों को छापने का मोह छोड़कर स्थानीय और नई प्रतिभाओं को उभारते । लेकिन साहस की कमी और बाजार की नासमझी उन्हें ऐसा करने से रोक देती है । हिंदी के वामपंथी लेखक हमेशा से बाजार और उसके प्रभाव का शोर मचाते रहते हैं । लेकिन उन्हें ना तो बाजार की समझ है और ना ही बाजार की ताकत का एहसास । उन्हें तो हिंदी की ताकत का भी एहसास नहीं है । अगर हिंदी का बाजार बन रहा है तो तकलीफ किस बात की । क्या लेखकों को यह अच्छा नहीं लगेगा कि उनकी कृतियां हजारों में बिके । आज हिंदी में कोई भी किताब पांच सौ से ज्यादा नहीं छपती है और उसको भी बिकने में सालभर लग जाते हैं । पांच सौ किताबों के बिकने की बात प्रकाशक मानकर अगर दूसरा संस्करण छाप देता है तो लेखकों के पांव जमीन पर पड़ते ही नहीं है । हिंदी में बाजारवाद का शोर मचानेवालों से मेरा अनुरोध है कि पहले वो बाजार को समझें, उसपर विचार करें और उसके बाद अपने विचार वयक्त करें । ऐसा नहीं है कि साहित्यकि पत्रिकाएं खूब बिक रही हैं । इनका भी वही हाल है । अगर हंस, ज्ञनोदय, कथादेश और तद्भव को छोड़ दिया जाए तो शायद ही कोई लघु पत्रिका होगी जो हजार प्रति छपती होगी । खैर यह एक अवांतर प्रसंग है जिसपर फिर कभी विस्तार से चर्चा होगी ।
अभी-अभी हिंदी में एक नई पत्रिका लेखक-पत्रकार अशोक मिश्र के संपादन में आई है- रचना क्रम । पहले अंक में इस बात के संकेत हैं कि पत्रिका छमाही निकला करेगी । यह अंक ओम भारती के अतिथि संपादन में निकली है । तकरीबन डेढ सौ पन्नों की इस पत्रिका में तमाम तरह की रचनाएँ हैं । नामवर के भाषण से लेकर चंद्रकांत देवताले की कविताएं, अरुंधति राय का लंबा साक्षात्कार, रवीन्द्र कालिया और तेजिंदर के उपन्यास अंश के अलावा कई वैचारिक लेख भी हैं । लगता है कि इस अंक की योजना काफी पहले बन गई थी इस वजह से रवीन्द्र कालिया के उपन्यास अंश के इंट्रो में शीघ्र प्रकाश्य छप गया है । जबकि कालिया जी का उपन्यास 17 रानाडे रोड काफी पहले प्रकाशित होकर धूम मचा रहा है । महेश कटारे की कहानी इस अंक की बेहतरीन कहानियों में से एक है । जबकि मुशरर्फ आलम जौकी की कहानी इस अंक की सबसे कमजोर कहानी है । मुशर्रफ के साथ जो एक बड़ी दिक्कत है वो यह है कि कहानियों के विषय का चुनाव तो ठीक-ठाक करते हैं लेकिन जब कहानी लिखते हैं तो वो उनसे संभलता नहीं है और पूरा का पूरा बिखर जाता है । यही वजह है कि दर्जनों कहानियां लिखने के बाद मुशर्ऱफ आलम जौकी की पहचान एक कहानीकार के रूप में बन नहीं पा रही है । रचना क्रम में पत्रकार उमेश चतुर्वेदी की कहानी श्रद्धांजलि छपी है और पत्रिका की ओर से यह दावा किया गया है कि उमेश की यह पहली कहानी है । उमेश चतुर्वेदी की यह पहली कहानी नहीं है इसके पहले भी उनकी तीन-चार कहानियां प्रकाशित होकर पुरस्कृत हो चुकी हैं । संपादक को इनमें सावधानी बरतनी चाहिए नहीं तो आनेवाली पीढ़ी और शोधार्थियों के बीच भ्रम फैलेगा । कुल मिलाकर अशोक मिश्र की इस पत्रिका से एक उम्मीद जगती है और इसने समकालीन हिंदी परिदृ्शय में एक सार्थक हस्तक्षेप तो किया ही है । लेकिन संपादक से मेरा एक आग्रह है कि वो नए लोगों को तरजीह दें और स्थापित और बड़े साहित्यकारों की कूड़ा रचनाएं छापने से परहेज करें । विश्वास मानिए पत्रिका को एक बड़ा बाजार मिलेगा और साहित्य को कई प्रतिभाएं ।
लेकिन मुझे लगता है कि साठ के दशक में शुरु हुआ लघु पत्रिका आंदोलन अपनी राह से भटक गया है । उसने ना केवल अपना चरित्र बल्कि स्वरूप भी खो दिया है । लघु पत्रिका आंदोलन और उसकी विरासत से अनजान अबोध लोग संपादक बने जा रहे हैं । लेकिन उन्हें ना तो लघु पत्रिकाओं के दायित्व की परवाह है और ना ही इसके चरित्र की । दरअसल संपादन एक बेहद कठिन कर्म है । इसमें व्यक्तिगत संबंधों को तरजीह दिए बगैर काम करना पड़ता है लेकिन आज तो साहित्यिक पत्रिकाओं में तुम मेरी मैं तेरी वाली स्थिति व्याप्त है । पत्रिकाएं सौदेबाजी का अखाड़ा बनती जा रही है । आज किसी भी लघु पत्रिका के संपादक में इतना साहस है कि वो किसी भी स्थापित साहित्यकार की रचना को लौटा सके । बड़े नाम को छापने के चक्कर में हो यह रहा कि किसी का रिसर्च पेपर, किसी का भाषण, किसी का वक्तव्य छप रहा है । इससे संपादकों की दृष्टि की दयनीयता और दरिद्रता का पता चलता है । आज अगर हम कुछ लघु पत्रिका संपादकों को छोड़ दें तो अधिकांश में रचनाओं के चयन की दृष्टि का घोर अभाव दिखाई देता है ।तकरीबन हर संपादक संयोजन कर रहा है लेकिन इस सत्य को स्वीकार करने का साहस कितने लोगों के पास है । अगर संपादक की दृष्टि सुलझी हुई हो तो पत्रिका का एक स्वरूप बनता है लेकिन अगर आप सिर्फ संयोजन कर रहे हों तो उसकी एक स्पष्ट रूपरेखा आपके दिमाग हो वर्ना पूरी पत्रिका बिखर जाती है ।
लघु पत्रिकाओं का एक अहम दायित्व स्थानीय पत्रिकाओं को मौका देकर उसे साहित्य के परिदृश्य पर उभारने का भी होता है । पर आज के तमाम साहित्यिक पत्रिकाओं के संपादक नए लेखकों की रचनाओं को तरजीह नहीं देते हैं । उन्हें तो बड़े नाम चाहिए ताकि पाठक उसके प्रभाव में आकर पत्रिका खरीद सके । अच्छा होता अगर लघु पत्रिका के संपादक बडे़ नामों को छापने का मोह छोड़कर स्थानीय और नई प्रतिभाओं को उभारते । लेकिन साहस की कमी और बाजार की नासमझी उन्हें ऐसा करने से रोक देती है । हिंदी के वामपंथी लेखक हमेशा से बाजार और उसके प्रभाव का शोर मचाते रहते हैं । लेकिन उन्हें ना तो बाजार की समझ है और ना ही बाजार की ताकत का एहसास । उन्हें तो हिंदी की ताकत का भी एहसास नहीं है । अगर हिंदी का बाजार बन रहा है तो तकलीफ किस बात की । क्या लेखकों को यह अच्छा नहीं लगेगा कि उनकी कृतियां हजारों में बिके । आज हिंदी में कोई भी किताब पांच सौ से ज्यादा नहीं छपती है और उसको भी बिकने में सालभर लग जाते हैं । पांच सौ किताबों के बिकने की बात प्रकाशक मानकर अगर दूसरा संस्करण छाप देता है तो लेखकों के पांव जमीन पर पड़ते ही नहीं है । हिंदी में बाजारवाद का शोर मचानेवालों से मेरा अनुरोध है कि पहले वो बाजार को समझें, उसपर विचार करें और उसके बाद अपने विचार वयक्त करें । ऐसा नहीं है कि साहित्यकि पत्रिकाएं खूब बिक रही हैं । इनका भी वही हाल है । अगर हंस, ज्ञनोदय, कथादेश और तद्भव को छोड़ दिया जाए तो शायद ही कोई लघु पत्रिका होगी जो हजार प्रति छपती होगी । खैर यह एक अवांतर प्रसंग है जिसपर फिर कभी विस्तार से चर्चा होगी ।
अभी-अभी हिंदी में एक नई पत्रिका लेखक-पत्रकार अशोक मिश्र के संपादन में आई है- रचना क्रम । पहले अंक में इस बात के संकेत हैं कि पत्रिका छमाही निकला करेगी । यह अंक ओम भारती के अतिथि संपादन में निकली है । तकरीबन डेढ सौ पन्नों की इस पत्रिका में तमाम तरह की रचनाएँ हैं । नामवर के भाषण से लेकर चंद्रकांत देवताले की कविताएं, अरुंधति राय का लंबा साक्षात्कार, रवीन्द्र कालिया और तेजिंदर के उपन्यास अंश के अलावा कई वैचारिक लेख भी हैं । लगता है कि इस अंक की योजना काफी पहले बन गई थी इस वजह से रवीन्द्र कालिया के उपन्यास अंश के इंट्रो में शीघ्र प्रकाश्य छप गया है । जबकि कालिया जी का उपन्यास 17 रानाडे रोड काफी पहले प्रकाशित होकर धूम मचा रहा है । महेश कटारे की कहानी इस अंक की बेहतरीन कहानियों में से एक है । जबकि मुशरर्फ आलम जौकी की कहानी इस अंक की सबसे कमजोर कहानी है । मुशर्रफ के साथ जो एक बड़ी दिक्कत है वो यह है कि कहानियों के विषय का चुनाव तो ठीक-ठाक करते हैं लेकिन जब कहानी लिखते हैं तो वो उनसे संभलता नहीं है और पूरा का पूरा बिखर जाता है । यही वजह है कि दर्जनों कहानियां लिखने के बाद मुशर्ऱफ आलम जौकी की पहचान एक कहानीकार के रूप में बन नहीं पा रही है । रचना क्रम में पत्रकार उमेश चतुर्वेदी की कहानी श्रद्धांजलि छपी है और पत्रिका की ओर से यह दावा किया गया है कि उमेश की यह पहली कहानी है । उमेश चतुर्वेदी की यह पहली कहानी नहीं है इसके पहले भी उनकी तीन-चार कहानियां प्रकाशित होकर पुरस्कृत हो चुकी हैं । संपादक को इनमें सावधानी बरतनी चाहिए नहीं तो आनेवाली पीढ़ी और शोधार्थियों के बीच भ्रम फैलेगा । कुल मिलाकर अशोक मिश्र की इस पत्रिका से एक उम्मीद जगती है और इसने समकालीन हिंदी परिदृ्शय में एक सार्थक हस्तक्षेप तो किया ही है । लेकिन संपादक से मेरा एक आग्रह है कि वो नए लोगों को तरजीह दें और स्थापित और बड़े साहित्यकारों की कूड़ा रचनाएं छापने से परहेज करें । विश्वास मानिए पत्रिका को एक बड़ा बाजार मिलेगा और साहित्य को कई प्रतिभाएं ।
Wednesday, June 30, 2010
बिखरा ‘तहलका’ का पठन पाठन
तरुण तेजपाल देश के ख्यातिप्राप्त पत्रकार हैं । तहलका के बैनर से स्टिंग ऑपरेशन कर काफी शोहरत कमा चुके हैं । अब दिल्ली से हिंदी और अंग्रेजी में तहलका पत्रिका निकालते हैं । अंग्रेजी तहलका ने तो कई वर्षों में अपनी एक अलग पहचान बनाई लेकिन हिंदी तहलका पत्रिकाओं की भीड़ के बीच अपना स्थान और पहचान बनाने के लिए संघर्ष कर रही है । कुछ अलग करने की चाहत में तहलका ने हिंदी साहित्य का रुख किया और जून में पठन पाठन के नाम पर साहित्य विशेषांक निकाला । आमतौर पर जैसा इस तरह की पत्रिकाओं के साथ होता है तहलका का साहित्य विशेषांक भी उसका शिकार हो गया है । साहित्य विशेषांक के नाम पर निकली इस पत्रिका का कोई साहित्यिक स्वरूप ही नहीं बन पाया है । सबकुछ समेट लेने की चाहत और नामचीन लोगों को बेवजह स्थान देने से में पत्रिका का पूरा स्वरूप बिखर गया । अपने संपादकीय में पत्रिका के वरिष्ठ संपादक संजय दुबे ने लिखा है- समाचार पत्रिका के साहित्य विशेषांक के अपने कुछ फायदे भी हैं । इस अंक में ना केवल दस्तावेज और अन्यान्य जैसी बहुपयोगी श्रेणियां मौजूद हैं बल्कि इसे लोकतांत्रिक और सर्वसमावेशी बनाने की ओर भी विशेष ध्यान रखा गया है । इसमें अनुभवी दिग्गजों को समुचित सम्मान देते हुए साहित्यिक संभावनाओं के नए संकेतों का भी उतनी ही गर्मजोशी से स्वागत किया है । वरिष्ठ संपादक का यह दावा है तो ठीक लेकिन इस अंक में कविता और कवियों को लेकर एक उपेक्षाभाव साफ तौर पर दिखता है । एक तरफ जहां कहानीकारों और लेखकों को प्रमुखता के साथ छापा गया है वहीं कवियों और कविताओं को रनिंग मैटर की तरह एक के बाद एक छाप कर रस्म अदायगी की गई है । ना तो किसी का कोई परिचय दिया गया है और ना ही किसी के फोटो छापे गए हैं । या तो पत्रिका के कर्ता-धर्ता यह समझते हैं कि उन्होंने जितने कवियों को छापा है वो इतने प्रसिद्ध हैं और वो किसी परिचय के मोहताज नहीं है । नाम ही काफी है की अगर सोच है तो नाम तो सही छपना चाहिए था । वरिष्ठ कवि विमल कुमार बेचारे विपल कुमार हो गए, शुक्र है विफल कुमार नहीं हुए । कई अच्छी कविताएं छपी हैं लेकिन खराब डिस्पले की वजह से वो उबर नहीं पाई । चर्चित कवि संजय कुंदन की छोटी कविता- ठीक है- आज की नई पीढ़ी की मानसिकता और उसकी सोच को प्रतिबिंबित करती है । गीत चतुर्वेदी की लंबी कविता - जाना सुनो मेरा जाना – भी इस अंक की उपलब्धि है । गीत की कविता में एक गहराई होती है जिसे पढ़कर महसूस किया जा सकता है ।
आज हिंदी साहित्य में नई पीढ़ी के कहानीकारों की रवीन्द्र कालिया ने एक फौज खड़ी कर दी है । जैसा कि आमतौर पर होता है कि अगर आप फौज बनाते हैं तो उसमें कई जांबाज के साथ साथ कुछ सुस्त भी भर्ती हो जाते हैं, कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो जंग से बचकर शॉर्चकट से निकल भागने के चक्कर में लगे रहते हैं । हिंदी कहानी की इस नई पीढ़ी में भी तीनों तरह के लोग हैं । कई नए कहानीकार बेहतरीन लिख रहे हैं और उन्होंने हिंदी को एक नई भाषा दी है । क्या कहानी लेखन में नयी पीढ़ी को लेकर मच रहा शोर रचनात्मकता है इसको केंद्र में रखकर इस अंक में- समकालीन कहानी कितना जोर कितना शोर- एक लेख छपा है । इसके लेखक दिनेश कुमार ने वरिष्ठ कहानीकारों की राय के आधार पर लेख लिखा है । काशीनाथ सिंह कहते हैं कि – ये युवा लेखक विज्ञापन की ऐसी विधियां जान गए हैं, जिनसे पुराने लेखक अपरिचित थे । वे लोग लेखन पर कम ध्यान देकर विज्ञापन की आधुनिक सुविधाओं का लाभ अधिक उठा रहे हैं । काशीनाथ जी की इस बात में दम है लेकिन ये पूरी पीढ़ी पर लागू नहीं होता । दिल्ली में कई ऐसे लेखक हैं जो संपादकों के दरबार में हाजिरी लगाकर साहित्य में अपने आपको स्थापित करने में लगे हैं । उनमें से कई कहानीकारों की कहानियां इस अंक में छपी भी हैं । ज्ञानरंजन भी नई पीढ़ी को बाजार की मांग के अनुरूप लिखनेवाला करार दे रहे हैं । युवा कहानी में एक नई भाषा और कंटेंट सामने आ रहा है जिसे ये लोग बाजार की देन मांगते हैं । मेरा इन वरिष्ठ लेखकों से यही सवाल है कि हिंदी साहित्या का बाजार कितना बड़ा है । कितने लेखकों को हिंदी साहित्य के बजार से फायदा पहुंच रहा है । आज तो हिंदी में यह हालत है कि वरिष्ठ से वरिष्ठ लेखकों की कृतियां एक हजार से ज्यादा नहीं बिक पाती हैं । उधर अंग्रेजी में अद्वैत काला जैसी नई और युवा लेखिका का उपन्यास पचास हजार प्रतियों से ज्यादा बिकता है । किस भ्रम और किस मानसिकता में जी रहे हैं हमारे बुजुर्ग साहित्यकार । इस अंक में वंदना राग की कहानी देवा- देवा अच्छी है । दूसरी तरफ उमाशंकर चौधरी की कहानी बेवजह खिंची हुई लगती है, नतीजा यह हुआ कि ना केवल कहानी बिखर गई बल्कि उबाऊ भी हो गई ।
संजय दुबे ने अपने लेख में अपने सहयोगी गैरव सोलंकी को विलक्षण लेखन प्रतिभा बताया गया है लेकिन इस अंक में छपी कहानी और कविता में विलक्षणता दिखाई तो नहीं देती ।
अपने संपादकीयमुमा लेख में संजय दुबे ने एक और दावा किया है – शायद हिंदी के किसी भी साहित्य विशेषांक के लिए यह पहला प्रयास होगा कि इस अंक में हमने विभिन्न प्रकाशकों, साहित्यकारों और समालोचकों आदि से अनुरोध करके,उनसे बात करके तमाम तरह की सर्वेक्षणनुमा जानकारियां भी संकलित की हैं । संजय दुबे ने शायद शब्द लिखकर अपने बचने का रास्ता छोड़ दिया है । उन्हें याद दिलाना चाहूंगा कि हिंदी में इस तरह के आयोजन कई बार हो चुके हैं चाहे वो अवध नारायण मुदगल के संपादन में निकला छाया मयूर का अंक हो. या फिर धीरेन्द्र अस्थाना के संपादन में निकला जागरण उदय का अंक हो । कई बार इस तरह के सर्वेक्षण प्रकाशित हो चुके हैं और इसमें नया कुछ नहीं है । तहलका में नया है तो सिर्फ उनमें छपी अशुद्धियां – बेस्य सेलर में कथा सतीसर को गांताजलिश्री का उपन्यास बता दिया गया है जबकि ये चंद्रकांता की कृति है । अन्यान्य पर भी संपादक को गर्व है लेकिन इसमें विभूति नारायण राय ने कहा है कि गोविंद शुक्ल को मिले साहित्य अकादमी पुरस्कार । गोविंद मिश्र को गोविंद शुक्ल लिखकर लेखक का अपमान किया गया है । उदय प्रकाश का बड़बोलापन भी यहां है, वो कहते हैं कि 99.9 फीसदी लेखन ऐसा ही है । हिंदी जगत में सबसे चमकदार चेहरे सबसे अयोग्य हैं । मुझे लगता है कि उदय ने जो दशमलव एक फीसदी छोड़ा है वो अपने लिए छोड़ा है क्योंकि हिंदी में वही सबसे उत्तम लिख रहे हैं । इसके अलावा भारत भारद्वाज के लेख में भी प्रतीक का प्रकाशन 1943 बताया गया है जबकि उसका प्रकाशन 1945 में शुरू हुआ था ।
संपादकीयनुमा लेख में निस्वार्थ सहयोग के लिए उपन्यासकार भगवानदास मोरवाल का आबार प्रकट किया गया है । हमें यह नहीं मालूम कि मोरवाल की भूमिका इस अंक में कितनी दूर तक थी लेकिन अंक की परिकल्पना चाहे जो भी हो अंक बेहद औसत निकला है । इसने ना तो हिंदी साहित्य की किसी विधा में कोई हलचल पैदा की है और ना ही इस अंक का कोई स्थायी महत्व है । तहलका के सामने इंडिया टुडे के साहित्य विशेषांक का उदाहरण तो था ही उसे पार करने की एक चुनौती भी थी लेकिन चुनौती स्वीकार करना तो दूर की बात यह अंक इंडिया टुडे के साहित्य विशेषांक के आस-पास भी नहीं पहुंच पाया है । मुझे यह भी नहीं मालूम कि तरुण तेजपाल की इस अंक में कितनी भूमिका है लेकिन इतना तो तय है कि संपादक के रूप में उसका नाम छपने की वजह से उनकी ही दृष्टि पर सवाल खडे़ होंगे ।
आज हिंदी साहित्य में नई पीढ़ी के कहानीकारों की रवीन्द्र कालिया ने एक फौज खड़ी कर दी है । जैसा कि आमतौर पर होता है कि अगर आप फौज बनाते हैं तो उसमें कई जांबाज के साथ साथ कुछ सुस्त भी भर्ती हो जाते हैं, कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो जंग से बचकर शॉर्चकट से निकल भागने के चक्कर में लगे रहते हैं । हिंदी कहानी की इस नई पीढ़ी में भी तीनों तरह के लोग हैं । कई नए कहानीकार बेहतरीन लिख रहे हैं और उन्होंने हिंदी को एक नई भाषा दी है । क्या कहानी लेखन में नयी पीढ़ी को लेकर मच रहा शोर रचनात्मकता है इसको केंद्र में रखकर इस अंक में- समकालीन कहानी कितना जोर कितना शोर- एक लेख छपा है । इसके लेखक दिनेश कुमार ने वरिष्ठ कहानीकारों की राय के आधार पर लेख लिखा है । काशीनाथ सिंह कहते हैं कि – ये युवा लेखक विज्ञापन की ऐसी विधियां जान गए हैं, जिनसे पुराने लेखक अपरिचित थे । वे लोग लेखन पर कम ध्यान देकर विज्ञापन की आधुनिक सुविधाओं का लाभ अधिक उठा रहे हैं । काशीनाथ जी की इस बात में दम है लेकिन ये पूरी पीढ़ी पर लागू नहीं होता । दिल्ली में कई ऐसे लेखक हैं जो संपादकों के दरबार में हाजिरी लगाकर साहित्य में अपने आपको स्थापित करने में लगे हैं । उनमें से कई कहानीकारों की कहानियां इस अंक में छपी भी हैं । ज्ञानरंजन भी नई पीढ़ी को बाजार की मांग के अनुरूप लिखनेवाला करार दे रहे हैं । युवा कहानी में एक नई भाषा और कंटेंट सामने आ रहा है जिसे ये लोग बाजार की देन मांगते हैं । मेरा इन वरिष्ठ लेखकों से यही सवाल है कि हिंदी साहित्या का बाजार कितना बड़ा है । कितने लेखकों को हिंदी साहित्य के बजार से फायदा पहुंच रहा है । आज तो हिंदी में यह हालत है कि वरिष्ठ से वरिष्ठ लेखकों की कृतियां एक हजार से ज्यादा नहीं बिक पाती हैं । उधर अंग्रेजी में अद्वैत काला जैसी नई और युवा लेखिका का उपन्यास पचास हजार प्रतियों से ज्यादा बिकता है । किस भ्रम और किस मानसिकता में जी रहे हैं हमारे बुजुर्ग साहित्यकार । इस अंक में वंदना राग की कहानी देवा- देवा अच्छी है । दूसरी तरफ उमाशंकर चौधरी की कहानी बेवजह खिंची हुई लगती है, नतीजा यह हुआ कि ना केवल कहानी बिखर गई बल्कि उबाऊ भी हो गई ।
संजय दुबे ने अपने लेख में अपने सहयोगी गैरव सोलंकी को विलक्षण लेखन प्रतिभा बताया गया है लेकिन इस अंक में छपी कहानी और कविता में विलक्षणता दिखाई तो नहीं देती ।
अपने संपादकीयमुमा लेख में संजय दुबे ने एक और दावा किया है – शायद हिंदी के किसी भी साहित्य विशेषांक के लिए यह पहला प्रयास होगा कि इस अंक में हमने विभिन्न प्रकाशकों, साहित्यकारों और समालोचकों आदि से अनुरोध करके,उनसे बात करके तमाम तरह की सर्वेक्षणनुमा जानकारियां भी संकलित की हैं । संजय दुबे ने शायद शब्द लिखकर अपने बचने का रास्ता छोड़ दिया है । उन्हें याद दिलाना चाहूंगा कि हिंदी में इस तरह के आयोजन कई बार हो चुके हैं चाहे वो अवध नारायण मुदगल के संपादन में निकला छाया मयूर का अंक हो. या फिर धीरेन्द्र अस्थाना के संपादन में निकला जागरण उदय का अंक हो । कई बार इस तरह के सर्वेक्षण प्रकाशित हो चुके हैं और इसमें नया कुछ नहीं है । तहलका में नया है तो सिर्फ उनमें छपी अशुद्धियां – बेस्य सेलर में कथा सतीसर को गांताजलिश्री का उपन्यास बता दिया गया है जबकि ये चंद्रकांता की कृति है । अन्यान्य पर भी संपादक को गर्व है लेकिन इसमें विभूति नारायण राय ने कहा है कि गोविंद शुक्ल को मिले साहित्य अकादमी पुरस्कार । गोविंद मिश्र को गोविंद शुक्ल लिखकर लेखक का अपमान किया गया है । उदय प्रकाश का बड़बोलापन भी यहां है, वो कहते हैं कि 99.9 फीसदी लेखन ऐसा ही है । हिंदी जगत में सबसे चमकदार चेहरे सबसे अयोग्य हैं । मुझे लगता है कि उदय ने जो दशमलव एक फीसदी छोड़ा है वो अपने लिए छोड़ा है क्योंकि हिंदी में वही सबसे उत्तम लिख रहे हैं । इसके अलावा भारत भारद्वाज के लेख में भी प्रतीक का प्रकाशन 1943 बताया गया है जबकि उसका प्रकाशन 1945 में शुरू हुआ था ।
संपादकीयनुमा लेख में निस्वार्थ सहयोग के लिए उपन्यासकार भगवानदास मोरवाल का आबार प्रकट किया गया है । हमें यह नहीं मालूम कि मोरवाल की भूमिका इस अंक में कितनी दूर तक थी लेकिन अंक की परिकल्पना चाहे जो भी हो अंक बेहद औसत निकला है । इसने ना तो हिंदी साहित्य की किसी विधा में कोई हलचल पैदा की है और ना ही इस अंक का कोई स्थायी महत्व है । तहलका के सामने इंडिया टुडे के साहित्य विशेषांक का उदाहरण तो था ही उसे पार करने की एक चुनौती भी थी लेकिन चुनौती स्वीकार करना तो दूर की बात यह अंक इंडिया टुडे के साहित्य विशेषांक के आस-पास भी नहीं पहुंच पाया है । मुझे यह भी नहीं मालूम कि तरुण तेजपाल की इस अंक में कितनी भूमिका है लेकिन इतना तो तय है कि संपादक के रूप में उसका नाम छपने की वजह से उनकी ही दृष्टि पर सवाल खडे़ होंगे ।
Tuesday, June 29, 2010
हिरासत में कैसे हो हिफाजत
हाल में पंजाब से खबर आई कि पुलिस ने एक प्रेमी युगल को पार्क से पकड़ कर थाने ले आई । अगले दिन सुबह लड़की पूछताछ के बाद नारी निकेतन भेज दिया गया और लड़के की मौत हो गई । उसके पहले उत्तर प्रदेश के औरैया में थाने में एक खुदकुशी की खबर से लोगों का गुस्सा इतना भड़ा कि पूरे शहर में आगजनी और विरोध प्रदर्शन हुए । लोगों के बढ़ते गुस्से की वजह से हरकत में आई राज्य सरकार ने पूरे थाने के सारे पुलिसकर्मियों को सस्पेंड कर दिया और थानेदार के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज कर लिया गया । एक इसी तरह की खबर दिल्ली से आई जहां चोरी के मामूली इल्जाम में एक नाबालिग को पकड़ कर थाने लाया गया और जब उसकी मां जब उसे छुडाने थाने आई तो पुलिसवालों ने लड़के को नंगाकर कर अपनी मां से शारीरिक संबंध बनाने का तालिबानी हुक्म सुनाया । ऐसा नहीं करने पर लड़के की जबरदस्त पिटाई की गई । यह तो देश की राजधानी दिल्ली की पुलिस है जो आपके लिए सदैव का दावा करती है । जिस दिल्ली पुलिस को देश की श्रेष्ठ पुलिस फोर्स में से एक माना जाता है । ऐसी कई खबरें देशभर के अन्य हिस्सों से बहुधा आती रहती हैं । लेकिन आमतौर पर पुलिवालों को ऐसे मामलों में सजा होने की खबरे नहीं आती ।
कुछ दिनों पूर्व एशिएन सेंटर फॉर ह्यूमन राइट्स की एक रिपोर्ट - टॉर्चर इन इंडिया 2010 प्रकाशित हुई। इस रिपोर्ट में यह बात सामने आई कि भारत में पुलिस हिरासत में होनेवाली मौत की संख्या में लगातार इजाफ हो रहा है । उस रिपोर्ट के मुताबिक दो हजार चार से लेकर दो हजार आठ तक में हिरासत में मौत का प्रतिशत लगभग पचपन फीसदी बढ गया । एशिएन सेंटर फॉर ह्यूमन राइट्स की यह रिपोर्ट चौंकाने वाली है । एक ओर जब हम आधुनिक होने की राह पर चल रहे हैं वैसे में हमारे देश की पुलिस के इस तरह के कारनामे लोकतंत्र पर बदनुमा दाग की तरह हैं ।
सरकार को भी पुलिसिया जुल्म का एहसास है इसलिए सरकार ने संसद के पिछले सत्र में प्रीवेंशन ऑफ टॉर्चर बिल पेश किया था जो अब राज्यसभा की मंजूरी का इंतजार कर रहा है । हलांकि इस बिल की कई धाराओं को लेकर कानून के जानकारों के बीच मतभेद है । कुछ लोगों का मानना है कि यह कानून सिर्फ अंतराष्ट्रीय दबाव में बनाया जा रहा है क्योंकि भारत ने यूनाइटेड नेशंस कन्वेंशन अगेंस्ट टॉर्चर पर हस्ताक्षर किए हैं । लेकिन यहां सवाल इस बात का नहीं है कि भारत में यह कानून किसके दबाव में बनाया जा रहा है । उससे बड़ा सवाल यह है कि कानून बनाकर क्या इस तरह के पुलिसिया जुल्म को रोका जा सकता है । क्या कानून के रखवालों को कानून का भय है । अगर भय होता तो वो इस तरह की हरकतों से बाज आते । गांधी जी ने बहुत पहले इस बात को महसूस किया था और लिखा था – इन इंडिया वी नीड अ पुलिस टू पुलिस द पुलिस । मतलब कि भारत में हमें एक ऐसे पलिस बल की आवश्यकता है जो पुलिस फोर्स पर नजर रख सके । गांधी जी ने आज से लगभग पचास साल पहले यह टिप्पणी की थी लेकिन गांधी के देश में गांधी की आवाज अनसुनी कर दी गई ।
दरअसल पुलिसिया जुल्म की यह समस्या सामाजिक ज्यादा है । हमारे यहां पुलिसवालों को यह मानसिकता हो गई है कि गाली-गलौच और लाठी डंडे की भाषा में ही बात करने से अपराध कम होंगे । यहां हमारे सामने सबसे बड़ी समस्या इस बात की है कि पुलिस की इस मानसिकता को कैसे बदला जाए । दूसरी जो समस्या है वो है सिस्टम की जो पुलिसिया जुल्म के बढने के लिए उतना ही जिम्मेदार है । देश में बढ़ते अपराध से निबटने के लिए हमारे पास पर्याप्त संख्या में पुलिस बल नहीं है । नतीजा यह होता है कि कांसटेबल से लेकर इंसपेक्टर तक पर केस को जल्द से जल्द निबटाने का भयानक दबाव होता है । इस दबाब से निबटने के लिए उनके पास कोई ट्रेनिंग नहीं होती । समुचित ट्रेनिंग के आभाव में होता यह है कि केस को जल्दी निबटाने के चक्कर में वो कई बार आरोपियों को ही निबटा देते हैं । एक बार भर्ती होने के बाद सिपाहियों और उसके उपर के हवलदार या फिर सब इंसपेक्टर किसी को भी पर्याप्त प्रशिक्षण नहीं दिया जाता । रिफ्रेशर कोर्स नहीं होते । आरोपियों से सच उगलवाने के नए वैज्ञानिक तकनीक के बारे में उन्हें बताया नहीं जाता । उन्हें तो लगता है कि सच उगलवाने का एकमात्र उपाय थर्ड डिग्री है । आज देश में जरूरत इस बात की है कि कानून व्यवस्था को लागू करने की जिम्मेदारी जिनके कंधों पर हैं उनको विशेष रूप से ट्रेनिंग दी जाए और समय समय पर उनकी काउंसिलिंग भी की जाए, ताकि दिल्ली, पंजाब और औरैया जैसी घटनाएं ना हों । और किसी बेटे को इस बात के लिए मजबूर ना किया जाए कि वो अपनी मां के साथ शारिरिक संबंध बनाए ।
कुछ दिनों पूर्व एशिएन सेंटर फॉर ह्यूमन राइट्स की एक रिपोर्ट - टॉर्चर इन इंडिया 2010 प्रकाशित हुई। इस रिपोर्ट में यह बात सामने आई कि भारत में पुलिस हिरासत में होनेवाली मौत की संख्या में लगातार इजाफ हो रहा है । उस रिपोर्ट के मुताबिक दो हजार चार से लेकर दो हजार आठ तक में हिरासत में मौत का प्रतिशत लगभग पचपन फीसदी बढ गया । एशिएन सेंटर फॉर ह्यूमन राइट्स की यह रिपोर्ट चौंकाने वाली है । एक ओर जब हम आधुनिक होने की राह पर चल रहे हैं वैसे में हमारे देश की पुलिस के इस तरह के कारनामे लोकतंत्र पर बदनुमा दाग की तरह हैं ।
सरकार को भी पुलिसिया जुल्म का एहसास है इसलिए सरकार ने संसद के पिछले सत्र में प्रीवेंशन ऑफ टॉर्चर बिल पेश किया था जो अब राज्यसभा की मंजूरी का इंतजार कर रहा है । हलांकि इस बिल की कई धाराओं को लेकर कानून के जानकारों के बीच मतभेद है । कुछ लोगों का मानना है कि यह कानून सिर्फ अंतराष्ट्रीय दबाव में बनाया जा रहा है क्योंकि भारत ने यूनाइटेड नेशंस कन्वेंशन अगेंस्ट टॉर्चर पर हस्ताक्षर किए हैं । लेकिन यहां सवाल इस बात का नहीं है कि भारत में यह कानून किसके दबाव में बनाया जा रहा है । उससे बड़ा सवाल यह है कि कानून बनाकर क्या इस तरह के पुलिसिया जुल्म को रोका जा सकता है । क्या कानून के रखवालों को कानून का भय है । अगर भय होता तो वो इस तरह की हरकतों से बाज आते । गांधी जी ने बहुत पहले इस बात को महसूस किया था और लिखा था – इन इंडिया वी नीड अ पुलिस टू पुलिस द पुलिस । मतलब कि भारत में हमें एक ऐसे पलिस बल की आवश्यकता है जो पुलिस फोर्स पर नजर रख सके । गांधी जी ने आज से लगभग पचास साल पहले यह टिप्पणी की थी लेकिन गांधी के देश में गांधी की आवाज अनसुनी कर दी गई ।
दरअसल पुलिसिया जुल्म की यह समस्या सामाजिक ज्यादा है । हमारे यहां पुलिसवालों को यह मानसिकता हो गई है कि गाली-गलौच और लाठी डंडे की भाषा में ही बात करने से अपराध कम होंगे । यहां हमारे सामने सबसे बड़ी समस्या इस बात की है कि पुलिस की इस मानसिकता को कैसे बदला जाए । दूसरी जो समस्या है वो है सिस्टम की जो पुलिसिया जुल्म के बढने के लिए उतना ही जिम्मेदार है । देश में बढ़ते अपराध से निबटने के लिए हमारे पास पर्याप्त संख्या में पुलिस बल नहीं है । नतीजा यह होता है कि कांसटेबल से लेकर इंसपेक्टर तक पर केस को जल्द से जल्द निबटाने का भयानक दबाव होता है । इस दबाब से निबटने के लिए उनके पास कोई ट्रेनिंग नहीं होती । समुचित ट्रेनिंग के आभाव में होता यह है कि केस को जल्दी निबटाने के चक्कर में वो कई बार आरोपियों को ही निबटा देते हैं । एक बार भर्ती होने के बाद सिपाहियों और उसके उपर के हवलदार या फिर सब इंसपेक्टर किसी को भी पर्याप्त प्रशिक्षण नहीं दिया जाता । रिफ्रेशर कोर्स नहीं होते । आरोपियों से सच उगलवाने के नए वैज्ञानिक तकनीक के बारे में उन्हें बताया नहीं जाता । उन्हें तो लगता है कि सच उगलवाने का एकमात्र उपाय थर्ड डिग्री है । आज देश में जरूरत इस बात की है कि कानून व्यवस्था को लागू करने की जिम्मेदारी जिनके कंधों पर हैं उनको विशेष रूप से ट्रेनिंग दी जाए और समय समय पर उनकी काउंसिलिंग भी की जाए, ताकि दिल्ली, पंजाब और औरैया जैसी घटनाएं ना हों । और किसी बेटे को इस बात के लिए मजबूर ना किया जाए कि वो अपनी मां के साथ शारिरिक संबंध बनाए ।
Tuesday, June 22, 2010
हरे जख्म पर मुआवजे का मरहम
भोपाल गैस कांड पर केंद्र सरकार अपनी खाल बचाने में जुटी है । चार दिनों तक लगातार मंत्रियों के समूह की बैठक हुई । इस बैठक में भोपाल के गैस पीड़ितों के जख्मों पर मुआवजे का मरहम लगाने की कोशिश की गई । छब्बीस साल तक कुंभकर्णी नींद सो रही केंद्र सरकार को अब भोपाल गैस पीड़ितों की सुध लेने की सूझी । इस बात पर सहमति बनी कि सुप्रीम कोर्ट में क्यूरेटिव पिटीशन यानि सुधार याचिका दाखिल की जाएगी और वॉरेन एंडरसन के प्रत्यर्पण के लिए नए सिरे से प्रक्रिया शुरू की जाएगी । यह फैसला भी देश की आवाम को बरगलाने की एक कोशिश है । एंडरसन पर सिर्फ लापरवाही के आरोप हैं और अमेरिका की अदालत ने इस मामले में इंटेंट साबित नहीं हो पाने की वजह से प्रत्यर्पण की अर्जी खारिज कर दी है। अब भारत सरकार को इसके लिए एक लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी होगी। प्रत्यार्पण के लिए अपने अनुरोध पत्र को बदलना होगा । एंडरसन नब्बे की उम्र पार कर चुका है और अमेरिकी कानून में प्रत्यर्पण के लिए आरोपी की उम्र को भी ध्यान में रखा जाता है । कुल मिलाकर यह एक ऐसी कोशिश है जिसका कोई नतीजा नहीं निकलना लगभग तय है । तकरीबन चालीस हजार लोगों की मौत के बाद अचानक सरकार के सक्रिय दिखने की वजह कुछ और है । अदालत के फैसले के बाद केंद्र सरकार चौतरफ दबाव में थी । कांग्रेस अपने दामन पर लगे दाग को धोने और आरोपों के दलदल से निकलने के लिए बेचैन है । अदालती फैसले के बाद एंडरसन के भारत से भागने को लेकर जिस तरह से मीडिया ने सरकार को घेरा और उस वक्त के प्रधानमंत्री राजीव गांधी पर आरोप लगे उससे कांग्रेस सकते में आ गई । पार्टी नेताओं ने बचाव में अलग-अलग तर्क देने शुरू किए जिसका नतीजा यह हुआ कि पार्टी में पहले भ्रम की स्थिति बनी । पार्टी के महासचिव और दस जनपथ के करीबी महासचिव दिग्विजय सिंह ने एंडरसन के भारत से भगाने को लेकर राजीव गांधी को घेरे में ले लिया । पार्टी के एक और नेता सत्यव्रत चतुर्वेदी ने अलग राग अलापते हुए अर्जुन सिंह पर सवाल खड़े कर दिए । मामला बिगड़ता देख पार्टी डैमेज कंट्रोल में जुटी और नेताओं को भोपाल मसले पर मुंह बंद करने का फरमान जारी कर दिया गया । अब पार्टी के बड़बोले प्रवक्ता मनीष तिवारी यह तर्क दे रहे हैं कि अगर वॉरेन एंडरसन को नहीं भगाया जाता तो देश की जनता उसे मार डालती । मनीष के तर्क बेहद लचर और तथ्यहीन हैं । अगर भोपाल की जनता में गैस लीक कांड को लेकर गुस्सा था और इस बात की आशंका थी वो हिंसक हो सकती थी तो तो एंडरसन को वहां से निकाल कर देश के किसी भी हिस्से में रखा जा सकता था । देश में इतने खुफिया ठिकाने हैं जिसमें से कहीं भी एंडरसन को रखा जा सकता था लेकिन उसे तो शाही ठाठ-बाट के साथ भारत से विदा किया गया । भारत से भागने के पहले उसने देश के राष्ट्रपति के साथ बैठकर चाय पी । एयरपोर्ट पर हंसते हुए कहा कि अब मैं आजाद हूं । उस वक्त एंडरसन के बॉडी लैंगवेज से यह साफ तौर पर झलकता है कि वो अपने भारत से निकल जाने को लेकर बहुत आश्वस्त था और जाहिर सी बात है कि यह आश्वासन देश के सर्वोच्च नेतृत्व से ही मिला होगा । और इस आश्वासन के पीछे का राज खुलता है तो यह बोफोर्स से बड़ा कांड साबित हो सकता है ।
भोपाल के मसले पर पर साफ तौर पर कानून को एंडरसन और यूनियन कार्बाइड के पक्ष में तोड़ा मरोड़ा गया । देश का कानून मंत्री इस बात को सरेआम स्वीकार कर चुका है कि कोर्ट ने इस मामले को हल्का कर दिया लेकिन खुद वकील होने के बावजूद हमारे कानून मंत्री यह भूल गए कि उस वक्त क्योरेटिव पीटीशन या सुधार याचिका ना डालकर केंद्र सरकार ने बड़ी गलती की थी । दरअसल इस पूरे मामले में शुरू से ही कांग्रेस के नेतृत्ववाली केंद्र और राज्य सरकार दोनों शक के घेरे में है । भोपाल गैस कांड के बाद जब मुआवजे और हजारों लोगों की मौत के लिए जिम्मेदारियां तय करने संबंधित मुकदमे अलग-अलग अदालतों में दर्ज होने लगे तो फौरन से केंद्र सरकार हरकत में आई । उसने एक कानून बनाकर भोपाल गैस पीडितों की लडाई लड़ने का सारा अधिकार अपने हाथ में ले लिया । अचानक केंद्र सरकार को यह बात याद आ गई कि वो देश के गरीबों के हितों का रक्षक है और उसे इस केस में कस्टोडियन बनना चाहिए । जब केंद्र के इस नए कानून को देश की सर्वोच्च अदालत में चुनौती दी गई तो सरकार ने संप्रभु सरकार के पेरेंस पाट्रिए के सिद्धांत की आड़ में अपना बचाव किया । मतलब यह कि एक संप्रभु राष्ट्र को अपनी जनता के अभिभावकत्व का हक है और उसका यह दायित्व भी है कि जनता के साथ किसी भी तरह से अन्याय नहीं हो । लिहाजा वो जो भी फैसला लेगी वो सही होगा । यह उसी तरह है जैसे कि कोई माता-पिता अपने बच्चों के बारे में फैसला लेते हैं । इस कानून की आड़ में सरकार ने भोपाल के गैस पीड़ितों के साथ बड़ा छल किया । सरकार ने यूनियन कार्बाइड के साथ एक समझौता किया जिसमें तकरीबन आठ सौ करोड़ मुआवजा की बात तय की गई । भोपाल के गुनहगार एंडरसन को भारत से भगा दिया गया । आम आदमी के हितों की रक्षा का ढोल पीटकर सारा अधिकार अपने हाथ में लेने के बाद भी केंद्र सरकार चालीस हजार लोगों की मौत के मुजरिमों को सिर्फ दो साल की सजा दिलवा पाने में कामयाब हो पाई । सजा भी उन धाराओं में हुई जिसमें कि हाथ के हाथ जमानत भी मिल जाती है । यह देश के साथ केंद्र सरकार का बड़ा धोखा है । एक सोची समझी रणनीति के तहत कानून बनाकर भोपाल गैस पीड़ितों के हक की लड़ाई लड़ने का अधिकार केंद्र सरकार ने अपने हाथ में लिया । ताकि मनमाफिक फैसले हो सकें । क्या भोपाल गैस कांड में पीड़ितों की हक की लड़ाई का अधिकार अपने हाथ में लेने वाली कांग्रेस पार्टी को चंद दिनों पहले दिल्ली में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सिखों के नरसंहार मामले में इस कानून को बनाने की जरूरत महसूस नहीं हुई । क्या गुजरात दंगें में हजारों की ह्त्या के बाद केंद्र सरकार को एक संप्रभु राष्ट्र की जिम्मेदारियों का एहसास नहीं हुआ । इससे एक बात तो साफ है कि केंद्र सरकार अमेरिकी कंपनी यूनियन कार्बाइड और उसके कर्ता-धर्ता को साफ तौर बचाना चाहती थी । जीओएम की कचरा साफ करने के फैसले को लेकर लिया गया निर्णय साफ तौर पर यूनियन कार्बाइड को खरीदनेवाली कंपनी डाउ केमिकल को जवाबदेही से बचाने की एक चाल है ।
लेकिन इससे भी बड़ा एक खतरा देश पर मंडरा रहा है । अमेरिका से परमाणु समझौता होने के बाद से देश में न्यूक्लियर रिएक्टर लगाने की तैयारी जोर शोर से हो रही है । विदेशों से रिएक्टर की खरीददारी की बात भी चल रही है । लेकिन अमेरिका समेत कई देशों की कंपनियों ने किसी हादसे की सूरत में किसी भी तरह के मुआवजा की शर्तों का पालन ना करने की बात कही है । अगर सरकार विदेशी कंपनियों की शर्तों को मान लेती है और किसी भी तरह के हादसे की स्थिति में हर्जाने की बात के बगैर उनको रिएक्टर लगाने की इजाजत दे देती है तो देश एक बड़े खतरे के मुहाने पर बैठा रहेगा । सरकार को यह सुनिश्चित करना पडे़गा कि उसके देश की आम जनता ना केवल सुरक्षित रहे बल्कि उसे यह भरोसा भी रहे कि सरकार उसकी सुरक्षा को लेकर सतर्क है । अगर ऐसा नहीं होता है तो देश की गरीब जनता का सरकार और कानून दोनों पर से विश्वास उठ जाएगा जो देश के लिए गंभीर मसला होगा और लोकतंत्र के लिए खतरा ।
भोपाल के मसले पर पर साफ तौर पर कानून को एंडरसन और यूनियन कार्बाइड के पक्ष में तोड़ा मरोड़ा गया । देश का कानून मंत्री इस बात को सरेआम स्वीकार कर चुका है कि कोर्ट ने इस मामले को हल्का कर दिया लेकिन खुद वकील होने के बावजूद हमारे कानून मंत्री यह भूल गए कि उस वक्त क्योरेटिव पीटीशन या सुधार याचिका ना डालकर केंद्र सरकार ने बड़ी गलती की थी । दरअसल इस पूरे मामले में शुरू से ही कांग्रेस के नेतृत्ववाली केंद्र और राज्य सरकार दोनों शक के घेरे में है । भोपाल गैस कांड के बाद जब मुआवजे और हजारों लोगों की मौत के लिए जिम्मेदारियां तय करने संबंधित मुकदमे अलग-अलग अदालतों में दर्ज होने लगे तो फौरन से केंद्र सरकार हरकत में आई । उसने एक कानून बनाकर भोपाल गैस पीडितों की लडाई लड़ने का सारा अधिकार अपने हाथ में ले लिया । अचानक केंद्र सरकार को यह बात याद आ गई कि वो देश के गरीबों के हितों का रक्षक है और उसे इस केस में कस्टोडियन बनना चाहिए । जब केंद्र के इस नए कानून को देश की सर्वोच्च अदालत में चुनौती दी गई तो सरकार ने संप्रभु सरकार के पेरेंस पाट्रिए के सिद्धांत की आड़ में अपना बचाव किया । मतलब यह कि एक संप्रभु राष्ट्र को अपनी जनता के अभिभावकत्व का हक है और उसका यह दायित्व भी है कि जनता के साथ किसी भी तरह से अन्याय नहीं हो । लिहाजा वो जो भी फैसला लेगी वो सही होगा । यह उसी तरह है जैसे कि कोई माता-पिता अपने बच्चों के बारे में फैसला लेते हैं । इस कानून की आड़ में सरकार ने भोपाल के गैस पीड़ितों के साथ बड़ा छल किया । सरकार ने यूनियन कार्बाइड के साथ एक समझौता किया जिसमें तकरीबन आठ सौ करोड़ मुआवजा की बात तय की गई । भोपाल के गुनहगार एंडरसन को भारत से भगा दिया गया । आम आदमी के हितों की रक्षा का ढोल पीटकर सारा अधिकार अपने हाथ में लेने के बाद भी केंद्र सरकार चालीस हजार लोगों की मौत के मुजरिमों को सिर्फ दो साल की सजा दिलवा पाने में कामयाब हो पाई । सजा भी उन धाराओं में हुई जिसमें कि हाथ के हाथ जमानत भी मिल जाती है । यह देश के साथ केंद्र सरकार का बड़ा धोखा है । एक सोची समझी रणनीति के तहत कानून बनाकर भोपाल गैस पीड़ितों के हक की लड़ाई लड़ने का अधिकार केंद्र सरकार ने अपने हाथ में लिया । ताकि मनमाफिक फैसले हो सकें । क्या भोपाल गैस कांड में पीड़ितों की हक की लड़ाई का अधिकार अपने हाथ में लेने वाली कांग्रेस पार्टी को चंद दिनों पहले दिल्ली में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सिखों के नरसंहार मामले में इस कानून को बनाने की जरूरत महसूस नहीं हुई । क्या गुजरात दंगें में हजारों की ह्त्या के बाद केंद्र सरकार को एक संप्रभु राष्ट्र की जिम्मेदारियों का एहसास नहीं हुआ । इससे एक बात तो साफ है कि केंद्र सरकार अमेरिकी कंपनी यूनियन कार्बाइड और उसके कर्ता-धर्ता को साफ तौर बचाना चाहती थी । जीओएम की कचरा साफ करने के फैसले को लेकर लिया गया निर्णय साफ तौर पर यूनियन कार्बाइड को खरीदनेवाली कंपनी डाउ केमिकल को जवाबदेही से बचाने की एक चाल है ।
लेकिन इससे भी बड़ा एक खतरा देश पर मंडरा रहा है । अमेरिका से परमाणु समझौता होने के बाद से देश में न्यूक्लियर रिएक्टर लगाने की तैयारी जोर शोर से हो रही है । विदेशों से रिएक्टर की खरीददारी की बात भी चल रही है । लेकिन अमेरिका समेत कई देशों की कंपनियों ने किसी हादसे की सूरत में किसी भी तरह के मुआवजा की शर्तों का पालन ना करने की बात कही है । अगर सरकार विदेशी कंपनियों की शर्तों को मान लेती है और किसी भी तरह के हादसे की स्थिति में हर्जाने की बात के बगैर उनको रिएक्टर लगाने की इजाजत दे देती है तो देश एक बड़े खतरे के मुहाने पर बैठा रहेगा । सरकार को यह सुनिश्चित करना पडे़गा कि उसके देश की आम जनता ना केवल सुरक्षित रहे बल्कि उसे यह भरोसा भी रहे कि सरकार उसकी सुरक्षा को लेकर सतर्क है । अगर ऐसा नहीं होता है तो देश की गरीब जनता का सरकार और कानून दोनों पर से विश्वास उठ जाएगा जो देश के लिए गंभीर मसला होगा और लोकतंत्र के लिए खतरा ।
Thursday, June 17, 2010
धोखे का सरकारी दस्तावेज
मनमोहन सिंह सरकार ने अपनी दूसरी पारी में एक साल पूरे होने पर समारोहपूर्वक अपने कामकाज का लेखा-जोखा पेश किया । इस लेखा-जोखा को संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार की जनता के लिए रिपोर्ट के तौर पर पेश किया गया । इस रिपोर्ट कार्ड में मनमोहन सरकार ने मुख्यतया तेरह क्षेत्रों में अपनी उपलब्धियों का बखान किया । रिपोर्ट कार्ड की प्रस्तावना में प्रधानमंत्री ने बढ़ती महंगाई पर काबू पाने में अपनी सरकार की नाकामी सीधे तौर पर तो नहीं मानी लेकिन शब्दों की बाजीगरी को अगर डिकोड करें को यह साफ तौर पर सामने आती है । यह रिपोर्ट कहती है कि वैश्विक आर्थिक मंदी का सामना हमारी अर्थव्यवस्था ने बेहतर ढंग से किया । आर्थिक संकट से निबटने और सरकार की मानें तो उबरने में उसकी वृहद आर्थिक प्रबंधन की सरकार की कार्यनीति की सफलता साफ झलकती है । पता नहीं मनमोहन सिंह किस कार्यनीति और किस वृहद आर्थिक प्रबंधन की बात कर रहे हैं । सरकार अरना राजकोषीय घाटा पूरा करने के लिए थ्री जी मोबाइल सेवा से जुटाए गए लगभग एक लाख करोड़ का सहारा ले रही है । बेहतर आर्थिक प्रबंघन के नाम पर सरकार ने अभी चुपके से एक फरमान जारी कर दिया । सरकार ने इस बात को अनिवार्य कर दिया है कि शेयर बाजार में लिस्टेड सभी कंपनियों को अपने पच्चीस प्रतिशत शेयर जनता के लिए जारी करने होंगे । इसके पीछे की मंशा यह है कि सरकारी कंपनियों के शेयर भी बेचे जा सकें ताकि बढ़ते राजकोषीय घाटे को पाटा जा सके । अपनी संपत्ति बेचकर घाटा कम करना कैसा वित्तीय प्रबंधन है,आप अनुमान लगा सकते हैं ।
उधर पूरा देश महंगाई से त्रस्त है । जिस आम आदमी की बेहतरी के नाम पर कांग्रेस ने पिछले चुनाव में वोट मांगे थे वो त्राहिमाम कर रही है । जरूरी सामनों के अलावा हर चीज के दामों में जोरदार बढो़तरी हुई है । बीते सप्ताह में फूड इंफ्लेशन पौनै सत्रह फीसदी पहुंच गई है । सरकार विकास दर के बेहतर होने के नाम पर आंकड़ों की बाजीगरी में जुटी है । जनता को सुनहरे सपने दिखाए जा रहे हैं । लेकिन दरअसल जनता को विकास का सपना दिखाकर उसके साथ छल किया जा रहा है । सरकार के पास महंगाई पर लगाम लगाने के लिए ना तो कोई ठोस योजना है और ना ही इसपर काबू पाने के लिए दृढ इच्छा । हर बार केंद्र सरकार महंगाई के लिए राज्य सरकारों के सर ठीकरा फोड़कर अपनी जिम्मेदारियों से बचने की कोशिश करती है ।
अपनी इस रिपोर्ट कार्ड में मनमोहन सिंह हर तरह की विपदा का इस्तेमाल अपनी नाकामियों को ढकने में करते दिख रहे हैं । महंगाई के लिए सरकार ने दो हजार नौ के में देश में आए सूखे को भी ढाल बनाने की कोशिश की है । यहां भी सरकार ने सूखे से निपटने के सरकार के कदमों को लेकर अपनी पीठ थपथापाई है । मनमोहन सिंह शायद यह भूल गए कि सूखे के बावजूद देश में अनाज के गोदाम भरे रहे । फूड कॉर्पोरेशन के गोदामों में अनाज खुले में सड़ते रहे और जनता के बीच पहुंच ही नहीं पाए । कीमतें आसमान छूती रही लेकिन सरकार है कि बेहतर प्रबंधन का ढोल पीट रही है । चीनी की कीमतों पर ही बात करें तो पहले देश से चीनी निर्यात में छूट दी गई फिर जब कीमतें बेकाबू होने लगी तो चीनी आयात किया गया । चीनी के आयात-निर्यात का खेल अलग से जांच का विषय है, जिसमें अगर ईमानदारी से तफ्तीश की जाए तो एक बड़ा घोटाला सामने आएगा । इस रिपोर्ट कार्ड में सरकार ने बढ़ती महंगाई पर नजर रखने की बात कही है लेकिन सरकार पेट्रोल-डीजल की कीमतों को अंतराष्ट्रीय मूल्य की आड़ में बढाने के लिए भी एड़ी-चोटी का जोर लगाए हुए है । सरकार के वित्त और पेट्रोलियम मंत्री लगातार इस बात की वकालत कर रहे हैं कि पारिख कमेटी की रिपोर्ट जल्द से जल्द मानकर पेट्रोल-डीजल और रसोई गैस के दाम बढाए जाएं । बेहतर आर्थिक प्रबंधन का दावा करनेवाली सरकार को क्या यह नहीं मालूम है कि पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ने से हर क्षेत्र में इसका असर पड़ेगा ।
बच्चो को नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार दिए जाने और प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च शिक्षा में सुधार को लेकर सरकार अपने उठाए कदमों से गदगद है । शिक्षा का अधिकार कानून बना देने से ही सबको शिक्षा मिलनी शुरू हो जाएगी यह जरूरी नहीं है । यह कानून बना देना आसान है, यह भी मान लिया जा सकता है कि आपकी मंशा भी साफ है लेकिन इस बात पर विचार किया गया कि इस कानून को देशभर में लागू कैसे किया जाएगा, इसके लिए वांछित संसाधन कहां से जुटाए जाएंगें । बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश जैसे राज्य इस बात की आशंका जता चुके हैं कि धनाभाव की वजह से इस कानून को लागू करने में मुश्किल होगी । उच्च शिक्षा में सुधार के नाम पर विदेशी विश्वविद्यालयों के लिए देश में आने का रास्ता खोल दिया गया । लेकिन शिक्षा के नाम पर व्यवसाय करनेवाले विदेशी विश्वविद्यालय ही यहां अपना कारोबार चलाएंगी । अभी तक इस बात के कोई संकेत नहीं है कि कैंब्रिज या ऑक्सफोर्ड जैसी प्रतिष्टित युनिवर्सिटी यहां अपना कैंपस खोलेंगी । देश में मेडिकल शिक्षा की क्या गत हुई है ये मेडिकल काउंसिल के मुखिया केतन देसाई की गिरफ्तारी के बाद साफ हो गया । अपनी इस रिपोर्ट कार्ड में सरकार ने स्कूली छात्रों को मिड डे मील देने का दंभ भी भरा है । लेकिन इस योजना की जमीनी हकीकत आए दिन सामने आती रहती है ।
ग्रामीण विकास के नाम पर भी सरकार ने बेहद बेशर्मी से अपनी उपलब्धियां गिनाई हैं । आज देश के ग्रामीण इलाकों में क्या हालत है ये किसी रिपोर्ट कार्ड से सामने नहीं आ सकता । इसके लिए उन इलाकों में जाने की जरूरत है । ग्रामीण विकास में ऐतिहासिक काम करने का दावा करनेवाली मनमोहन सरकार को विदर्भ के किसानों की खुदकुशी नजर नहीं आती । अगर मनमोहन सरकार के पिछले छह साल के कार्यकाल में सिर्फ विदर्भ में किसानों की आत्महत्या के आंकड़ों को जोडा़ जाए तो यह एक सभ्य सरकार के मुंह पर तमाचा होगा । खाद पर सब्सिडी हटाने की भी साजिश रची जा रही है । कृषि प्रधान देश और अर्थवयवस्था में किसानों को सहूलियत देने के बजाए सरकार बडे़ उद्योगपतियों को सहूलियतें दे रही है । उनको टैक्स हॉलीडे के नाम पर अरबो रुपये की छूट दी गई लेकिन किसानों से ऋण वसूली के लिए बैंक के बाबू उसकी जान के पीछे पड़ जाते हैं । दो बड़ी विमान कंपनियों ने तेल के सात सौ करोड़ रुपए सरकार को नहीं चुकाए हैं लेकिन अबतक उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हो पा रही है । ये कुछ ऐसे मसले हैं जो समेकित विकास का दावा करनेवाली इस सरकारी रिपोर्ट कार्ड की चमक को फीका कर देते हैं ।
इस रिपोर्ट कार्ड में सुरक्षा के भी बड़े दावे किए गए हैं । सरकार ने कहा है कि वामपंथी उग्रवादियों से निपटने के लिए सुरक्षा विकास और जन धारणा जैसे क्षेत्रों में समेकित दृष्टिकोण अपनाया गया है । लेकिन सरकार और कांग्रेस पार्टी में वामपंथी उग्रवादियों से निपटने में जिसतरह का मतभेद दिखाई देता है उससे भ्रम की स्थिति बनती है । गृहमंत्री नक्सलियों के खिलाफ कड़े कदम उठाने की वकालत करते हैं तो कांग्रेस का महासचिव और पार्टी की अध्यक्ष सोनिया गांधी अपने लेखों में कार्रवाई के साथ नरमी के भी संकेत देती है । नतीजा यह है कि पिछले दो महीने में वामपंथी उग्रवादियों ने तकरीबन तीन बड़े हमले कर तीन सौ से ज्यादा लोगों को मौत के घाट उतार दिया । नक्सलियों से निपटने के लिए सरकार के पास कोई ठोस कार्ययोजना नहीं है ।
अपनी उपलब्धियों को गिनाते-गिनाते सरकार ने एक बेहद दिलचस्प उपलब्धि को अपनी इस रिपोर्ट कार्ड में सम्मिलित कर लिया । सरकार ने गिनाया है कि – प्रवासी भारतीय दिवस के अवसर पर आयोजित समारोह में पंद्रह सौ प्रवासी भारतीयों ने शिरकत की । सरकार ने इसमें से चौदह को प्रवासी भारतीय सम्मान पुरस्कार दिए । सत्तर पृष्ठ की उपलब्धि पुस्तिका में इस तरह के उपलब्धियों की भरमार है । दरअसल यह पूरी पुस्तिका जनता के साथ छल है और उसे भरमाने की एक सोची समझी चाल भी ।
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उधर पूरा देश महंगाई से त्रस्त है । जिस आम आदमी की बेहतरी के नाम पर कांग्रेस ने पिछले चुनाव में वोट मांगे थे वो त्राहिमाम कर रही है । जरूरी सामनों के अलावा हर चीज के दामों में जोरदार बढो़तरी हुई है । बीते सप्ताह में फूड इंफ्लेशन पौनै सत्रह फीसदी पहुंच गई है । सरकार विकास दर के बेहतर होने के नाम पर आंकड़ों की बाजीगरी में जुटी है । जनता को सुनहरे सपने दिखाए जा रहे हैं । लेकिन दरअसल जनता को विकास का सपना दिखाकर उसके साथ छल किया जा रहा है । सरकार के पास महंगाई पर लगाम लगाने के लिए ना तो कोई ठोस योजना है और ना ही इसपर काबू पाने के लिए दृढ इच्छा । हर बार केंद्र सरकार महंगाई के लिए राज्य सरकारों के सर ठीकरा फोड़कर अपनी जिम्मेदारियों से बचने की कोशिश करती है ।
अपनी इस रिपोर्ट कार्ड में मनमोहन सिंह हर तरह की विपदा का इस्तेमाल अपनी नाकामियों को ढकने में करते दिख रहे हैं । महंगाई के लिए सरकार ने दो हजार नौ के में देश में आए सूखे को भी ढाल बनाने की कोशिश की है । यहां भी सरकार ने सूखे से निपटने के सरकार के कदमों को लेकर अपनी पीठ थपथापाई है । मनमोहन सिंह शायद यह भूल गए कि सूखे के बावजूद देश में अनाज के गोदाम भरे रहे । फूड कॉर्पोरेशन के गोदामों में अनाज खुले में सड़ते रहे और जनता के बीच पहुंच ही नहीं पाए । कीमतें आसमान छूती रही लेकिन सरकार है कि बेहतर प्रबंधन का ढोल पीट रही है । चीनी की कीमतों पर ही बात करें तो पहले देश से चीनी निर्यात में छूट दी गई फिर जब कीमतें बेकाबू होने लगी तो चीनी आयात किया गया । चीनी के आयात-निर्यात का खेल अलग से जांच का विषय है, जिसमें अगर ईमानदारी से तफ्तीश की जाए तो एक बड़ा घोटाला सामने आएगा । इस रिपोर्ट कार्ड में सरकार ने बढ़ती महंगाई पर नजर रखने की बात कही है लेकिन सरकार पेट्रोल-डीजल की कीमतों को अंतराष्ट्रीय मूल्य की आड़ में बढाने के लिए भी एड़ी-चोटी का जोर लगाए हुए है । सरकार के वित्त और पेट्रोलियम मंत्री लगातार इस बात की वकालत कर रहे हैं कि पारिख कमेटी की रिपोर्ट जल्द से जल्द मानकर पेट्रोल-डीजल और रसोई गैस के दाम बढाए जाएं । बेहतर आर्थिक प्रबंधन का दावा करनेवाली सरकार को क्या यह नहीं मालूम है कि पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ने से हर क्षेत्र में इसका असर पड़ेगा ।
बच्चो को नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार दिए जाने और प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च शिक्षा में सुधार को लेकर सरकार अपने उठाए कदमों से गदगद है । शिक्षा का अधिकार कानून बना देने से ही सबको शिक्षा मिलनी शुरू हो जाएगी यह जरूरी नहीं है । यह कानून बना देना आसान है, यह भी मान लिया जा सकता है कि आपकी मंशा भी साफ है लेकिन इस बात पर विचार किया गया कि इस कानून को देशभर में लागू कैसे किया जाएगा, इसके लिए वांछित संसाधन कहां से जुटाए जाएंगें । बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश जैसे राज्य इस बात की आशंका जता चुके हैं कि धनाभाव की वजह से इस कानून को लागू करने में मुश्किल होगी । उच्च शिक्षा में सुधार के नाम पर विदेशी विश्वविद्यालयों के लिए देश में आने का रास्ता खोल दिया गया । लेकिन शिक्षा के नाम पर व्यवसाय करनेवाले विदेशी विश्वविद्यालय ही यहां अपना कारोबार चलाएंगी । अभी तक इस बात के कोई संकेत नहीं है कि कैंब्रिज या ऑक्सफोर्ड जैसी प्रतिष्टित युनिवर्सिटी यहां अपना कैंपस खोलेंगी । देश में मेडिकल शिक्षा की क्या गत हुई है ये मेडिकल काउंसिल के मुखिया केतन देसाई की गिरफ्तारी के बाद साफ हो गया । अपनी इस रिपोर्ट कार्ड में सरकार ने स्कूली छात्रों को मिड डे मील देने का दंभ भी भरा है । लेकिन इस योजना की जमीनी हकीकत आए दिन सामने आती रहती है ।
ग्रामीण विकास के नाम पर भी सरकार ने बेहद बेशर्मी से अपनी उपलब्धियां गिनाई हैं । आज देश के ग्रामीण इलाकों में क्या हालत है ये किसी रिपोर्ट कार्ड से सामने नहीं आ सकता । इसके लिए उन इलाकों में जाने की जरूरत है । ग्रामीण विकास में ऐतिहासिक काम करने का दावा करनेवाली मनमोहन सरकार को विदर्भ के किसानों की खुदकुशी नजर नहीं आती । अगर मनमोहन सरकार के पिछले छह साल के कार्यकाल में सिर्फ विदर्भ में किसानों की आत्महत्या के आंकड़ों को जोडा़ जाए तो यह एक सभ्य सरकार के मुंह पर तमाचा होगा । खाद पर सब्सिडी हटाने की भी साजिश रची जा रही है । कृषि प्रधान देश और अर्थवयवस्था में किसानों को सहूलियत देने के बजाए सरकार बडे़ उद्योगपतियों को सहूलियतें दे रही है । उनको टैक्स हॉलीडे के नाम पर अरबो रुपये की छूट दी गई लेकिन किसानों से ऋण वसूली के लिए बैंक के बाबू उसकी जान के पीछे पड़ जाते हैं । दो बड़ी विमान कंपनियों ने तेल के सात सौ करोड़ रुपए सरकार को नहीं चुकाए हैं लेकिन अबतक उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हो पा रही है । ये कुछ ऐसे मसले हैं जो समेकित विकास का दावा करनेवाली इस सरकारी रिपोर्ट कार्ड की चमक को फीका कर देते हैं ।
इस रिपोर्ट कार्ड में सुरक्षा के भी बड़े दावे किए गए हैं । सरकार ने कहा है कि वामपंथी उग्रवादियों से निपटने के लिए सुरक्षा विकास और जन धारणा जैसे क्षेत्रों में समेकित दृष्टिकोण अपनाया गया है । लेकिन सरकार और कांग्रेस पार्टी में वामपंथी उग्रवादियों से निपटने में जिसतरह का मतभेद दिखाई देता है उससे भ्रम की स्थिति बनती है । गृहमंत्री नक्सलियों के खिलाफ कड़े कदम उठाने की वकालत करते हैं तो कांग्रेस का महासचिव और पार्टी की अध्यक्ष सोनिया गांधी अपने लेखों में कार्रवाई के साथ नरमी के भी संकेत देती है । नतीजा यह है कि पिछले दो महीने में वामपंथी उग्रवादियों ने तकरीबन तीन बड़े हमले कर तीन सौ से ज्यादा लोगों को मौत के घाट उतार दिया । नक्सलियों से निपटने के लिए सरकार के पास कोई ठोस कार्ययोजना नहीं है ।
अपनी उपलब्धियों को गिनाते-गिनाते सरकार ने एक बेहद दिलचस्प उपलब्धि को अपनी इस रिपोर्ट कार्ड में सम्मिलित कर लिया । सरकार ने गिनाया है कि – प्रवासी भारतीय दिवस के अवसर पर आयोजित समारोह में पंद्रह सौ प्रवासी भारतीयों ने शिरकत की । सरकार ने इसमें से चौदह को प्रवासी भारतीय सम्मान पुरस्कार दिए । सत्तर पृष्ठ की उपलब्धि पुस्तिका में इस तरह के उपलब्धियों की भरमार है । दरअसल यह पूरी पुस्तिका जनता के साथ छल है और उसे भरमाने की एक सोची समझी चाल भी ।
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Sunday, June 13, 2010
गुलजार ने चेतन भगत को धोया
अभी ज्यादा दिन नहीं हीते हैं जब थ्री इडियट्स फिल्म में क्रेडिट को लेकर लेखक चेतन भगत ने खासा बवाल खड़ा कर दिया था । चेतन भगत के दो हजार चार में लिखे उपन्यास फाइव प्वाइंट समवन- व्हाट नॉट टू डू एट आई आई टी – पर विधु विनोद चोप़ड़ा ने फिल्म बनाई जो सुपर हिट रही थी । लेखकीय जगत में प्रतिष्ठा पाने के लिए संघर्ष कर रहे चेतन भगत को उस विवाद से हिंदी जगत में एक पहचान मिल गई थी । चेतन के अंग्रेजी में लिखी किताबें हिंदी में अनूदित होकर हजारों की संख्या में बिकी । इससे चेतन को आर्थिक लाभ अवश्य हुआ होगा लेकिन ना तो उनके हिंदी ज्ञान में कोई इजाफा हुआ और ना ही हिंदी समाज के मन मिजाज को समझने में कोई मदद मिली । लेकिन जैसा कि आमतौर पर होता है कि सफलता मिलते ही लोग खुद को ज्ञानी समझने लगते हैं, चेतन भी उसी सक्सेस सिंड्रोम के शिकार हो गए । ट्विटर और ब्लॉग की दुनिया में छोटी बड़ी टिप्पणी कर लोकप्रियता हासिल करनेवाले चेतन भगत एक समारोह में फंस गए ।
किस्सा बेहद दिलचस्प है । मुंबई में एक समारोह के दौरान चेतन भगत और गुलजार साथ बैठे थे । चेतन को सभी अतिथियों का स्वागत तो करना ही था, समारोह का संचालन भी करना था । चेतन ने अपने अंदाज में ठसक के साथ कार्यक्रम की शुरुआत की । अतिथियों का परिचय करवाते हुए बारी गुलजार साहब की आई । यहीं पर चेतन भगत से चूक हो गई । ऑस्कर पुरस्कार विजेता और हिंदी के बेहद प्रतिष्ठित लेखक-गीतकार गुलजार का परिचय करवाते हुए चेतन भगत ने कहा- मुझे कजरारे-कजरारे गीत बेहद पसंद है । गुलजार साहब ने इस गीतो को लिखा है । यह बेहतरीन कविता का एक नमूना है । जिस तरह से चेतन यह बात कही वो गुलजार साहब को चुभ गई । गुलजार को नजदीक से जानने वाले इस बात को बेहद अच्छी तरह से जानते हैं कि उनकी वाणी विरोधियों के खिलाफ तेजाब उगलती है । शायद चेतन को यह पता नहीं रहा होगा और उसने गीतकार गुलजार पर टिप्पणी कर डाली जो गुलजार को अखर गई । चेतन बोल ही रहे थे कि उन्होंने इशारा कर माइक अपने पास मंगवाया और बोलने की इच्छा जाहिर की । किसी भी कार्यक्रम में जब गुलजार साहब बोलना चाहें तो किसी की मजाल नहीं कि उन्हें रोक सके । गुलजार ने माइक हाथ में लिया और खचाखच भरे हॉल में बोलना शुरु किया- चेतन मुझे यह बात बेहद अच्छी लगी और मैं खुश हूं कि आप जैसे महान लेखक को कजरारे –कजरारे गीत अच्छा लगा । लेकिन मुझे लगता है कि आप जिस कविता की यहां बात कर रहे हैं उसे समझ भी पाए हैं । अगर आपको फिर भी लगता है कि आपने उस कविता को समझा है तो मैं आपके लिए उसकी दो लाइन गाकर सुनाता हूं आप भरे हॉल में उसका अर्थ बता दीजिए । गुलजार साहब यहीं पर नहीं रुके और उन्होंने कजरारे-कजरारे गीत से दो लाइन गाकर सुना दी – तेरी बातों में किवाम की खुशबू है, तेरा आना भी गर्मियों की लू है । इसके बाद सीधे चेतन की तरफ मुखातिब होकर पूछा कि इसका अर्थ बताइये । अब चेतन को काटो तो खून नहीं । गुलजार जैसा सीनियर लेखक भरी सभा में कविता की दो लाइन का अर्थ पूछ रहा है । गुलजार के वार से सन्न रह गए चेतन बगलें झांकने लगे । चेतन को चुप देखकर भी गुलजार नहीं रुके । उन्होंने भरी सभा में चेतन को झिड़कना शुरू कर दिया । गुलजार ने कहा – जिस चीज के बारे में पता नहीं हो उसके बारे में कुछ भी बोलना उचित नहीं है । जिसके बारे में जानते हो उसी के बारे में बोलो । हाथ में माइक लिए पोडियम पर खडे़ चेतन की स्थिति का अंदाज आप लगा सकते हैं । गुलजार ने चेतन की ठसक और हेकड़ी चंद पलों में हवा कर दी ।
मैं विश्वास के साथ तो यह नहीं कह सकता कि चेतन को उन दो पंक्तियों का अर्थ पता नहीं था लेकिन चेतन भगत जिस पीढ़ी को और जिस तरह की अंग्रेजीदां जनरेशन का प्रतिनिधित्व करते हैं उनके लिए ‘किवाम की खुशबू’ और ‘गर्मियों की लू’ का अर्थ ना जानना कोई हैरत की बात नहीं है । किसी तरह से मामला निबटा और समारोह खत्म हुआ । इस वाकए से एक बात तो साफ हो गई कि हिंदी को जाने बगैर भी हिंदी के बाजर को भुनाने की लगातार कोशिश हो रही है । चेतन के अलावा हिंदी फिल्मों की सफलतम नायिका कटरीना कैफ इतने दिनों बाद भी हिंदी बोल नहीं पाती है । इतना वक्त बिताने के बाद हिंदी समझ जरूर लेती है । अब इसे बिडंबना ही कहा जाएगा कि कटरीना हिंदी फिल्मों की सफलतम हिरोइन है । हिंदी के बूते कमाने-खाने वाले लोग हिंदी बोलना तक नहीं जानते ।
चेतन के उपन्यास खासे लोकप्रिय हैं और अंग्रेजी के अलावा हिंदी में हजारो की संख्या में बिके हैं । लेकिन व्यावसायिक सफलता को गुणवत्ता की गारंटी नहीं माना जा सकता है । मेरठ से निकलने वाले प्लप फिक्शन भी हिंदी में खासे लोकप्रिय हुए हैं और हो भी रहे हैं लेकिन उनके लेखकों को कोई स्थायी पहचान हिंदी में नहीं बन पाई । रानू और मनोज को अब कितने लोग याद करते हैं । वेद प्रकाश शर्मा और कर्नल रंजीत भी कुछ ही दिनों की बात हैं । होता यह है कि पल्प फिक्शन राइटर पैसा तो बहुत कमा लेता है, पाठकों के बीच लोकप्रियता भी हासिल कर लेता है लेकिन लेखकीय प्रतिष्ठा उसे हासिल नहीं हो पाती है ।
गुलजार चेतन विवाद से एक बात तो साफ हो गई है कि भारत में अंग्रेजीदां युवक युवतियों की एक ऐसी फौज तैयार हो गई है जिसे ना तो हिंदी की समझ है और ना ही अंगेजी को समझते हैं । पटर-पटर अंग्रेजी बोलनेवाले लोगों को भी अंग्रेजी की परंपरा और उसके व्याकरण का ज्ञान नहीं होता है । लेकिन उन्हें इसका रिमोर्स भी नहीं होता । अगर आप किसी चीच को नहीं जानते हैं तो आपको उसका अफसोस होना चहिए लेकिन आज की युवा पीढ़ी – हू केयर्स के सिद्धांतो पर चलती है जहां अपनी अज्ञानता पर उन्हें फख्र होता है । प्रेमचंद, निराला, मुक्तिबोध को नहीं जानने को वो अपनी शान समझते हैं । अज्ञेय, राजेन्द्र यादव, कमलेश्वर, रवीन्द्र कालिया का नाम नहीं सुनने को उन्हें जरा भी मलाल नहीं । एक और दिलचस्प प्रसंग बताता हूं – न्यूज चैनल की एक बड़ी एंकर हैं । किसी जमाने में साहित्य कला की बीट कवर करती थी । दिल्ली के प्रगति मैदान में पुस्तक मेला चल रहा था, मोहतरमा उसे कवर कर रही थी ।संपादक ने फोन कर कहा कि ‘गीतांजलि’ लेते आना । मेले से लौटने के बाद बेहद बेतकुल्लफी से वो अपने संपादक के पास गई और कहा कि गीतांजली को मेले में बहुत ढूंढा लेकिन वो कहीं दिखाई नहीं दी । मैंने उसके लिए मैसेज छोड़ दिया है कि वो तुरंत आपको फोन करे । बेचारे संपादक महोदय... लाने को कहा था रविन्द्रनाथ टैगोर की किताब ‘गीतांजलि’ लेकिन उनकी खोजी रिपोर्टर ने ढूंढ लिया किसी लड़की गीतांजलि को । संपादक मुंह ताकते रहे और वो रिपोर्टर वहां से इस तरह चली गई जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो ।
किस्सा बेहद दिलचस्प है । मुंबई में एक समारोह के दौरान चेतन भगत और गुलजार साथ बैठे थे । चेतन को सभी अतिथियों का स्वागत तो करना ही था, समारोह का संचालन भी करना था । चेतन ने अपने अंदाज में ठसक के साथ कार्यक्रम की शुरुआत की । अतिथियों का परिचय करवाते हुए बारी गुलजार साहब की आई । यहीं पर चेतन भगत से चूक हो गई । ऑस्कर पुरस्कार विजेता और हिंदी के बेहद प्रतिष्ठित लेखक-गीतकार गुलजार का परिचय करवाते हुए चेतन भगत ने कहा- मुझे कजरारे-कजरारे गीत बेहद पसंद है । गुलजार साहब ने इस गीतो को लिखा है । यह बेहतरीन कविता का एक नमूना है । जिस तरह से चेतन यह बात कही वो गुलजार साहब को चुभ गई । गुलजार को नजदीक से जानने वाले इस बात को बेहद अच्छी तरह से जानते हैं कि उनकी वाणी विरोधियों के खिलाफ तेजाब उगलती है । शायद चेतन को यह पता नहीं रहा होगा और उसने गीतकार गुलजार पर टिप्पणी कर डाली जो गुलजार को अखर गई । चेतन बोल ही रहे थे कि उन्होंने इशारा कर माइक अपने पास मंगवाया और बोलने की इच्छा जाहिर की । किसी भी कार्यक्रम में जब गुलजार साहब बोलना चाहें तो किसी की मजाल नहीं कि उन्हें रोक सके । गुलजार ने माइक हाथ में लिया और खचाखच भरे हॉल में बोलना शुरु किया- चेतन मुझे यह बात बेहद अच्छी लगी और मैं खुश हूं कि आप जैसे महान लेखक को कजरारे –कजरारे गीत अच्छा लगा । लेकिन मुझे लगता है कि आप जिस कविता की यहां बात कर रहे हैं उसे समझ भी पाए हैं । अगर आपको फिर भी लगता है कि आपने उस कविता को समझा है तो मैं आपके लिए उसकी दो लाइन गाकर सुनाता हूं आप भरे हॉल में उसका अर्थ बता दीजिए । गुलजार साहब यहीं पर नहीं रुके और उन्होंने कजरारे-कजरारे गीत से दो लाइन गाकर सुना दी – तेरी बातों में किवाम की खुशबू है, तेरा आना भी गर्मियों की लू है । इसके बाद सीधे चेतन की तरफ मुखातिब होकर पूछा कि इसका अर्थ बताइये । अब चेतन को काटो तो खून नहीं । गुलजार जैसा सीनियर लेखक भरी सभा में कविता की दो लाइन का अर्थ पूछ रहा है । गुलजार के वार से सन्न रह गए चेतन बगलें झांकने लगे । चेतन को चुप देखकर भी गुलजार नहीं रुके । उन्होंने भरी सभा में चेतन को झिड़कना शुरू कर दिया । गुलजार ने कहा – जिस चीज के बारे में पता नहीं हो उसके बारे में कुछ भी बोलना उचित नहीं है । जिसके बारे में जानते हो उसी के बारे में बोलो । हाथ में माइक लिए पोडियम पर खडे़ चेतन की स्थिति का अंदाज आप लगा सकते हैं । गुलजार ने चेतन की ठसक और हेकड़ी चंद पलों में हवा कर दी ।
मैं विश्वास के साथ तो यह नहीं कह सकता कि चेतन को उन दो पंक्तियों का अर्थ पता नहीं था लेकिन चेतन भगत जिस पीढ़ी को और जिस तरह की अंग्रेजीदां जनरेशन का प्रतिनिधित्व करते हैं उनके लिए ‘किवाम की खुशबू’ और ‘गर्मियों की लू’ का अर्थ ना जानना कोई हैरत की बात नहीं है । किसी तरह से मामला निबटा और समारोह खत्म हुआ । इस वाकए से एक बात तो साफ हो गई कि हिंदी को जाने बगैर भी हिंदी के बाजर को भुनाने की लगातार कोशिश हो रही है । चेतन के अलावा हिंदी फिल्मों की सफलतम नायिका कटरीना कैफ इतने दिनों बाद भी हिंदी बोल नहीं पाती है । इतना वक्त बिताने के बाद हिंदी समझ जरूर लेती है । अब इसे बिडंबना ही कहा जाएगा कि कटरीना हिंदी फिल्मों की सफलतम हिरोइन है । हिंदी के बूते कमाने-खाने वाले लोग हिंदी बोलना तक नहीं जानते ।
चेतन के उपन्यास खासे लोकप्रिय हैं और अंग्रेजी के अलावा हिंदी में हजारो की संख्या में बिके हैं । लेकिन व्यावसायिक सफलता को गुणवत्ता की गारंटी नहीं माना जा सकता है । मेरठ से निकलने वाले प्लप फिक्शन भी हिंदी में खासे लोकप्रिय हुए हैं और हो भी रहे हैं लेकिन उनके लेखकों को कोई स्थायी पहचान हिंदी में नहीं बन पाई । रानू और मनोज को अब कितने लोग याद करते हैं । वेद प्रकाश शर्मा और कर्नल रंजीत भी कुछ ही दिनों की बात हैं । होता यह है कि पल्प फिक्शन राइटर पैसा तो बहुत कमा लेता है, पाठकों के बीच लोकप्रियता भी हासिल कर लेता है लेकिन लेखकीय प्रतिष्ठा उसे हासिल नहीं हो पाती है ।
गुलजार चेतन विवाद से एक बात तो साफ हो गई है कि भारत में अंग्रेजीदां युवक युवतियों की एक ऐसी फौज तैयार हो गई है जिसे ना तो हिंदी की समझ है और ना ही अंगेजी को समझते हैं । पटर-पटर अंग्रेजी बोलनेवाले लोगों को भी अंग्रेजी की परंपरा और उसके व्याकरण का ज्ञान नहीं होता है । लेकिन उन्हें इसका रिमोर्स भी नहीं होता । अगर आप किसी चीच को नहीं जानते हैं तो आपको उसका अफसोस होना चहिए लेकिन आज की युवा पीढ़ी – हू केयर्स के सिद्धांतो पर चलती है जहां अपनी अज्ञानता पर उन्हें फख्र होता है । प्रेमचंद, निराला, मुक्तिबोध को नहीं जानने को वो अपनी शान समझते हैं । अज्ञेय, राजेन्द्र यादव, कमलेश्वर, रवीन्द्र कालिया का नाम नहीं सुनने को उन्हें जरा भी मलाल नहीं । एक और दिलचस्प प्रसंग बताता हूं – न्यूज चैनल की एक बड़ी एंकर हैं । किसी जमाने में साहित्य कला की बीट कवर करती थी । दिल्ली के प्रगति मैदान में पुस्तक मेला चल रहा था, मोहतरमा उसे कवर कर रही थी ।संपादक ने फोन कर कहा कि ‘गीतांजलि’ लेते आना । मेले से लौटने के बाद बेहद बेतकुल्लफी से वो अपने संपादक के पास गई और कहा कि गीतांजली को मेले में बहुत ढूंढा लेकिन वो कहीं दिखाई नहीं दी । मैंने उसके लिए मैसेज छोड़ दिया है कि वो तुरंत आपको फोन करे । बेचारे संपादक महोदय... लाने को कहा था रविन्द्रनाथ टैगोर की किताब ‘गीतांजलि’ लेकिन उनकी खोजी रिपोर्टर ने ढूंढ लिया किसी लड़की गीतांजलि को । संपादक मुंह ताकते रहे और वो रिपोर्टर वहां से इस तरह चली गई जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो ।
Monday, June 7, 2010
बीमार विपक्ष, कमजोर लोकतंत्र
कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार की दूसरी पारी के सालभर पूरा होने पर हर तरफ सरकार के कामकाज को कसौटी पर कसा गया । किसी ने फेल किया तो किसी ने पास तो किसी ने औसत नंबर दिए । प्रधानमंत्री ने भी मीडिया से बात कर अपनी और सरकार की पीठ थपथपाई । लेकिन इन तमाम कोलाहल के बीच हम यह भूल गए कि लोकतंत्र की मजबूती के लिए मजबूत और जिम्मेदार विपक्ष का होना भी जरूरी है । जब यूपीए सरकार के दूसरे कार्यकाल के पहले साल की समीक्षा हो रही है तो यह भी आवश्यक है कि मुख्य विपक्षी दल के सालभर के कामकाज को भी परखा जाए। दो हजार नौ में हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस से मुंह की खाने के बाद बीजेपी में लगभग विद्रोह जैसी स्थिति हो गई थी । दो हजार चार में लोकसभा चुनाव में बीजेपी की इतनी बुरी गत नहीं बनी थी । कांग्रेस की एक सौ पैंतालीस सीटों की तुलना में उसे कुछ ही कम सीटें मिली थी । लेकिन दो हजार नौ में पार्टी का जनादेश और कम हो गया । नतीजा यह हुआ कि पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व पर ही सवाल खड़े होने लगे । अरुण शौरी और यशवंत सिन्हा सरीखे नेताओं ने अपने बयानों से केंद्रीय नेतृत्व को कठघरे में खड़ा कर दिया । अरुण शौरी ने पार्टी के आला नेतृत्व को हम्फ्टी-डम्फ्टी तक बता डाला । इन बयानबाजी का असर यह हुआ कि पार्टी दिशाहीन हो गई । पार्टी विद ए डिफरेंस का नारा बुलंद करनेवाली पार्टी में अनुशासनहीनता चरम पर जा पहुंची ।
जब वक्त हार की नैतिक जिम्मेदारी लेकर पार्टी में एक संदेश देने का था तो पार्टी के शीर्षस्थ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने नेता विपक्ष की कुर्सी पर बने रहने का इरादा जता दिया था । नेता विपक्ष को मिलनेवाली सुविधाएं छोड़ने को वो राजी नहीं थे । लेकिन देर से ही सही संघ के दबाव में आडवाणी ने नेता विपक्ष की कुर्सी छोड़ दी । बीजेपी ने सुषमा स्वराज को लोकसभा में और अरुण जेटली को राज्यसभा में नेता चुना तो लगा कि पार्टी में नए नेतृत्व से स्थितियां बदलेगी और अपेक्षाकृत युवा नेता नई जान फूंक पाएंगें । लेकिन बूढे होते आडवाणी का गद्दी मोह नहीं छूटा और संसदीय दल पर अपना नियंत्रण बनाए रखने के लिए वो उसके चेयरमैन पद पर आसीन हो गए ।
बीजेपी में चल रहा ड्रामा यहीं खत्म नहीं हुआ । राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ की दखल के बाद महाराष्ट्र की राजनीति करनेवाले नितिन गडकरी को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिया गया। देशभर में पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच नितिन गडकरी की काबिलियत को लेकर एक संदेह का वातावरण बना । इसकी वजह से पार्टी से जुडे़ कार्यकर्ताओं में किसी तरह का उत्साह पैदा नहीं हो सका । लंबे जद्दोजहद के बाद नितिन गडकरी ने दो महीने पहले तेरह उपाध्यक्ष और पंद्रह महासचिव समेत पार्टी पदाधिकारियों की एक बड़ी फौज का ऐलान किया । टीम के ऐलान के साथ ही पार्टी प्रवक्ता बनाए गए शाहनवाज हुसैन और राजीव प्रताप रुडी खफा हो गए । शाहनवाज ने तो कुछ दिनों तक पार्टी की बैठकों का बहिष्कार कर नेतृत्व को चुनौती भी दी । शाहनवाज हुसैन का तर्क था कि जब रविशंकर प्रसाद केंद्र में राज्य मंत्री थे तो वो कैबिनेट मंत्री थे, लिहाजा पार्टी में रविशंकर प्रसाद का जूनियर बनाकर अध्यक्ष ने उन्हें अपमानित किया है । दो महीने से ज्यादा का वक्त बीत गया पार्टी पदाधिकारियों का एलान हुए लेकिन गडकरी अब तक उनके बीच काम का बंटवारा नहीं कर पाए हैं । हां इस बीच यह जरूर हुआ कि गडकरी ने लालू और मुलायम सिंह यादव को सोनिया का तलवा चाटने वाला कुत्ता बताकर खासी आलोचना झेली । जिस पार्टी का अध्यक्ष अटल बिहारी वाजपेयी जैसे सलीकेदार वक्ता रहा वहां गडकरी के इस छिछले बयान ने बीजेपी की छवि पर दाग लगा दिया जिसकी निकट भविष्य में भारपाई मुश्किल है ।
अगर हम पार्टी अध्यक्ष के तौर पर गडकरी के राजनैतिक पैसलों पर नजर डालें तो वहां भी वो बुरी तरह से अपरिपक्व नजर आए । झारखंड में शिबू सोरेन और उसके बेटे हमंत सोरेन की चाल में फंसकर पार्टी की खासी भद पिटी । सरकार से समर्थन वापसी का ऐलान फिर साथ मिलकर सरकार बनाने का फैसला और फिर समर्थन वापसी के फैसले से पार्टी की किरकिरी हुई । राजनीति में शुचिता और पवित्रता की बात करनेवाली पार्टी झारखंड में बुरी तरह से एक्सपोज हो गई ।
लोकतंत्र में विपक्षी दल की एक महती जिम्मेदारी यह भी होती है वह सरकार की गलत नीतियों को उजागर करे, साथ ही सरकार के जन विरोधी कदमों का पुरजोर विरोध करते हुए आंदोलन करे । लेकिन अगर हम पिछले सालभर के बीजेपी के क्रियाकलापों पर नजर डालें तो अपनी अंतर्कलह से जूझ रही पार्टी कोई भी बड़ा आंदोलन खड़ा नहीं कर पाई । महंगाई और गन्ने के मूल्य पर संसद में विपक्षी दलों के बीच अभूतपूर्व एकता दिखाई दी थी । उन्नीस सौ नवासी में वीपी सिंह की सरकार गठन के बाद पहली बार बीजेपी, वामपंथी दल और लालू-मुलायम एक साथ नजर आए थे । लेकिन विपक्षी दलों की यह एकता ज्यादा समय तक चल नहीं पाई । कांग्रेस के राजनीतिक दांव के आगे विपक्षी एकता तार-तार हो गई । इससे भी बीजेपी के सरकार को घेरने के सपने पर ग्रहण लग गया । प्रमुख विपक्षी दल होने के नाते इस बिखराव को ना रोक पाने का ठीकरा भी बीजेपी ही सर ही फूटा ।
संसद में बिखरी विपक्षी एकता को कांग्रेस ने बजट पर कटौती प्रस्ताव के दौरान जमकर भुनाया और एक बार फिर से साबित कर दिया कि गठबंधन की सरकार को कोई खतरा नहीं है । देश में महंगाई चरम पर है, जनता त्राहिमाम कर रही है, गैस के बाद अब पेट्रोल डीजल के दाम बढाने की सरकार तैयारी कर रही है । किसानों को सब्सिडी की रियायत खत्म करने की भी कवायद चल रही है । आम आदमी के नाम पर सत्ता में वापस लौटी कांग्रेस को आम आदमी की ही फिक्र नहीं है लेकिन बीजेपी को भी कहां फिक्र है । दिल्ली में पार्टी ने महंगाई पर एक प्रतीकात्मक रैली अवश्य की लेकिन महंगाई के मुद्दे पर देशव्यापी आंदोलन झेड़ने में बुरी तरह नाकाम रही । इसकी वजह है कि संगठन और काडर जिस बीजेपी की मजबूती हुआ करती थी आज वही संगठन और कार्यकर्ता द्वंद में हैं । राज्य इकाइयों के अध्यक्ष या तो चुने नहीं जा सके हैं या फिर जहां चुने गए हैं वहां वो पदाधिकारी बनाने और रूठे नेताओं को मनाने में लगे हैं । जनता और उसकी समस्या के लिए उनके पास वक्त ही नहीं है । दिल्ली की रैली में गर्मी से गश खाकर गिर पड़ने वाले बीजेपी अध्यक्ष विदेश में छुट्टियां मना रहे हैं । हालात तो यह है कि राज्यसभा के चुनाव होने हैं लेकिन अभी तक पार्टी की केंद्रीय चुनाव समिति का गठन नहीं हो पाया है । सबकुछ एडहॉक तरीके से चल रहा है । लोकतंत्र के लिए प्रमुख विपक्षी दल का इस तरह से बिखरा हुआ और दिशाहीन होना अच्छा नहीं है । जरूरत इस बात की है कि पार्टी हार के सदमे से उबरे, अंतर्कलह को दरकिनार करे और जनता के बीच जाकर फिर से अपनो खोए हुए जनाधार को वापस पाने की कोशिश करे, तभी पार्टी मजबूत होगी और देश में लोकतंत्र भी मजबूत होगा ।
जब वक्त हार की नैतिक जिम्मेदारी लेकर पार्टी में एक संदेश देने का था तो पार्टी के शीर्षस्थ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने नेता विपक्ष की कुर्सी पर बने रहने का इरादा जता दिया था । नेता विपक्ष को मिलनेवाली सुविधाएं छोड़ने को वो राजी नहीं थे । लेकिन देर से ही सही संघ के दबाव में आडवाणी ने नेता विपक्ष की कुर्सी छोड़ दी । बीजेपी ने सुषमा स्वराज को लोकसभा में और अरुण जेटली को राज्यसभा में नेता चुना तो लगा कि पार्टी में नए नेतृत्व से स्थितियां बदलेगी और अपेक्षाकृत युवा नेता नई जान फूंक पाएंगें । लेकिन बूढे होते आडवाणी का गद्दी मोह नहीं छूटा और संसदीय दल पर अपना नियंत्रण बनाए रखने के लिए वो उसके चेयरमैन पद पर आसीन हो गए ।
बीजेपी में चल रहा ड्रामा यहीं खत्म नहीं हुआ । राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ की दखल के बाद महाराष्ट्र की राजनीति करनेवाले नितिन गडकरी को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिया गया। देशभर में पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच नितिन गडकरी की काबिलियत को लेकर एक संदेह का वातावरण बना । इसकी वजह से पार्टी से जुडे़ कार्यकर्ताओं में किसी तरह का उत्साह पैदा नहीं हो सका । लंबे जद्दोजहद के बाद नितिन गडकरी ने दो महीने पहले तेरह उपाध्यक्ष और पंद्रह महासचिव समेत पार्टी पदाधिकारियों की एक बड़ी फौज का ऐलान किया । टीम के ऐलान के साथ ही पार्टी प्रवक्ता बनाए गए शाहनवाज हुसैन और राजीव प्रताप रुडी खफा हो गए । शाहनवाज ने तो कुछ दिनों तक पार्टी की बैठकों का बहिष्कार कर नेतृत्व को चुनौती भी दी । शाहनवाज हुसैन का तर्क था कि जब रविशंकर प्रसाद केंद्र में राज्य मंत्री थे तो वो कैबिनेट मंत्री थे, लिहाजा पार्टी में रविशंकर प्रसाद का जूनियर बनाकर अध्यक्ष ने उन्हें अपमानित किया है । दो महीने से ज्यादा का वक्त बीत गया पार्टी पदाधिकारियों का एलान हुए लेकिन गडकरी अब तक उनके बीच काम का बंटवारा नहीं कर पाए हैं । हां इस बीच यह जरूर हुआ कि गडकरी ने लालू और मुलायम सिंह यादव को सोनिया का तलवा चाटने वाला कुत्ता बताकर खासी आलोचना झेली । जिस पार्टी का अध्यक्ष अटल बिहारी वाजपेयी जैसे सलीकेदार वक्ता रहा वहां गडकरी के इस छिछले बयान ने बीजेपी की छवि पर दाग लगा दिया जिसकी निकट भविष्य में भारपाई मुश्किल है ।
अगर हम पार्टी अध्यक्ष के तौर पर गडकरी के राजनैतिक पैसलों पर नजर डालें तो वहां भी वो बुरी तरह से अपरिपक्व नजर आए । झारखंड में शिबू सोरेन और उसके बेटे हमंत सोरेन की चाल में फंसकर पार्टी की खासी भद पिटी । सरकार से समर्थन वापसी का ऐलान फिर साथ मिलकर सरकार बनाने का फैसला और फिर समर्थन वापसी के फैसले से पार्टी की किरकिरी हुई । राजनीति में शुचिता और पवित्रता की बात करनेवाली पार्टी झारखंड में बुरी तरह से एक्सपोज हो गई ।
लोकतंत्र में विपक्षी दल की एक महती जिम्मेदारी यह भी होती है वह सरकार की गलत नीतियों को उजागर करे, साथ ही सरकार के जन विरोधी कदमों का पुरजोर विरोध करते हुए आंदोलन करे । लेकिन अगर हम पिछले सालभर के बीजेपी के क्रियाकलापों पर नजर डालें तो अपनी अंतर्कलह से जूझ रही पार्टी कोई भी बड़ा आंदोलन खड़ा नहीं कर पाई । महंगाई और गन्ने के मूल्य पर संसद में विपक्षी दलों के बीच अभूतपूर्व एकता दिखाई दी थी । उन्नीस सौ नवासी में वीपी सिंह की सरकार गठन के बाद पहली बार बीजेपी, वामपंथी दल और लालू-मुलायम एक साथ नजर आए थे । लेकिन विपक्षी दलों की यह एकता ज्यादा समय तक चल नहीं पाई । कांग्रेस के राजनीतिक दांव के आगे विपक्षी एकता तार-तार हो गई । इससे भी बीजेपी के सरकार को घेरने के सपने पर ग्रहण लग गया । प्रमुख विपक्षी दल होने के नाते इस बिखराव को ना रोक पाने का ठीकरा भी बीजेपी ही सर ही फूटा ।
संसद में बिखरी विपक्षी एकता को कांग्रेस ने बजट पर कटौती प्रस्ताव के दौरान जमकर भुनाया और एक बार फिर से साबित कर दिया कि गठबंधन की सरकार को कोई खतरा नहीं है । देश में महंगाई चरम पर है, जनता त्राहिमाम कर रही है, गैस के बाद अब पेट्रोल डीजल के दाम बढाने की सरकार तैयारी कर रही है । किसानों को सब्सिडी की रियायत खत्म करने की भी कवायद चल रही है । आम आदमी के नाम पर सत्ता में वापस लौटी कांग्रेस को आम आदमी की ही फिक्र नहीं है लेकिन बीजेपी को भी कहां फिक्र है । दिल्ली में पार्टी ने महंगाई पर एक प्रतीकात्मक रैली अवश्य की लेकिन महंगाई के मुद्दे पर देशव्यापी आंदोलन झेड़ने में बुरी तरह नाकाम रही । इसकी वजह है कि संगठन और काडर जिस बीजेपी की मजबूती हुआ करती थी आज वही संगठन और कार्यकर्ता द्वंद में हैं । राज्य इकाइयों के अध्यक्ष या तो चुने नहीं जा सके हैं या फिर जहां चुने गए हैं वहां वो पदाधिकारी बनाने और रूठे नेताओं को मनाने में लगे हैं । जनता और उसकी समस्या के लिए उनके पास वक्त ही नहीं है । दिल्ली की रैली में गर्मी से गश खाकर गिर पड़ने वाले बीजेपी अध्यक्ष विदेश में छुट्टियां मना रहे हैं । हालात तो यह है कि राज्यसभा के चुनाव होने हैं लेकिन अभी तक पार्टी की केंद्रीय चुनाव समिति का गठन नहीं हो पाया है । सबकुछ एडहॉक तरीके से चल रहा है । लोकतंत्र के लिए प्रमुख विपक्षी दल का इस तरह से बिखरा हुआ और दिशाहीन होना अच्छा नहीं है । जरूरत इस बात की है कि पार्टी हार के सदमे से उबरे, अंतर्कलह को दरकिनार करे और जनता के बीच जाकर फिर से अपनो खोए हुए जनाधार को वापस पाने की कोशिश करे, तभी पार्टी मजबूत होगी और देश में लोकतंत्र भी मजबूत होगा ।
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