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Saturday, March 18, 2017

हिंदी साहित्य की आत्ममुग्ध पीढ़ी

काफी दिनों के बाद दिल्ली के साहित्य अकादमी जाना हुआ, वहां हिंदी के एक वरिष्ठ आलोचक से मुलाकात हुई । बातें चली तो इन दिनों सक्रिय लेखकों की सृजनात्मकता पर बात शुरू हुई । कविता, कहानी आलोचना से लेकर फेसबुक पर चल रही साहित्यक गतिविधियों पर भी बात हुई । इस बातचीत में उन्होंने कई ऐसी टिप्पणी की जो समकालीन साहित्यक परिदृश्य पर सटीक बैठती है । उन्होंने साहित्य की मौजूदा पीढ़ी को हिंदी साहित्य की आत्ममुग्ध पीढ़ी की संज्ञा दी । जब मैंने एतराज जताया तो बोले कि आप जरा वस्तुनिष्ठ होकर विचार करो तो मेरी बात सही लगेगी । उनके तर्क थे कि आज के लेखक अपने वरिष्ठ लेखकों को पढ़कर उनकी रचनाओं से आगे जाने का कोई उपक्रम करते दीख नहीं रहे हैं, वो तो बस अपनी ही पीढ़ी के लेखकों के कंधों पर पांव रखकर आगे निकल जाने की होड़ में शामिल हैं । हर लेखक पुरस्कृत होना चाहता है और उसको लगता है कि वो शेक्सपियर और दस्तावस्की जैसा महान लेखक हो गया है । उन्होंने जोर देकर कहा था कि साहित्य लंबे समय तक चलनेवाली एक ऐसी साधना है जिसमें फल मिलने की गुंजाइश नहीं के बराबर होती है लेकिन इन दिनों जो लोग कहानी या उपन्यास लिख रहे हैं उनको साधना से कोई लेना देना नहीं है वो तो तप के पहले ही वरदान के आकांक्षी हुए जा रहे हैं । मैंने उनसे कहा कि इस तरह हवा में बातें ना करें और उदाहरण देकर बताएं । उन्होंने छूटते ही कहा कि साहित्यक पत्रिका पाखी में कहानीकार-उपन्यासकार अल्पना मिश्रा का साक्षात्कार देख लें । उनके मुताबिक यह साक्षात्कार आत्ममुग्धता की पराकाष्ठा है, जिसमें कोई लेखक अपनी ही रचना को महान बता रहा है और दूसरे की रचना को फ्लॉप करार दे रहा है । यह आत्ममुग्धता नहीं तो और क्या है । मैं अवाक उनको सुन रहा था और वो धाराप्रवाह पाखी के उस इंटरव्यू की धज्जियां उड़ा रहे थे । उस साक्षात्कार में अल्पना जी ने प्रेम भारद्वाज के शब्दों को लेकर खुद को अनकन्वेंशनल लेखक कहा है । मुझे लगता है कि अल्पना मिश्र जी की सारी रचनाएं लगभग पारंपरिक ही हैं, उनकी कहानियां भी और उनका उपन्यास भी ।
मुझे लगा कि इस बातचीत को आगे बढ़ाया जाना चाहिए और मैं आलोचक महोदय को लेकर साहित्य अकादमी की कैंटीन की तरफ बढ़ा । मौजूदा पीढ़ी के कहानीकारों पर चर्चा चल रही थी । उन्होंने मुझसे पूछा कि तुम बताओ कि पिछले दस साल की कितनी कहानियां याद हैं । कहानी के गिरते स्तर को लेकर उनकी चिंता और उसका प्रकटीकरण जारी था । उन्होंने कहा कि कुछ सालों पहले नीलाक्षी सिंह को लेकर बहुत शोर मचा था लेकिन अब वो कहां हैं । उनकी कहानियों को अपने कंधे पर लेकर घूमनेवाले संपादक भी नीलाक्षी को साहित्य या कहानी की दुनिया में स्थापित नहीं कर पाए । इन दोनों लेखकों के अलावा उन्होंने कई लेखक, लेखिकाओं के नाम गिनाए । उनका दुख यही था कि वो खूब कहानियां पढ़ते हैं लेकिन लगभग सभी कहानियों को पढ़ने के बाद उनको निराशा होती है । उनका मानना था कि हर युग में अच्छी कहानियां लिखी जाए यह आवश्यक नहीं है लेकिन कहानी को लेकर जो विवेक है उसका बचना जरूरी है । यही विवेक आज खतरे में है । उनका कहना था कि कहानी भी गीत और गजल की तरह बाजार के जाल में फंसती जा रही है । उनका कहना था किआज के कहानीकारों के अनुभव बहुत सीमित हैं । मैंने उन्हें और लेखकों के बारे में कुरेदा । मुझे यह जानकर घोर आश्चर्य हुआ कि समकालीन हिंदी कहानी के सभी लेखकों को लगभग वो पढ़ चुके थे । उन्होने बताया कि हिंदी की तमाम साहित्यक पत्रिकाएं उनके पास आती हैं और वो सबको पढ़ते हैं, नए से नए लेखकों से लेकर वरिष्ठ लेखकों तक की रचनाएं । उन्होंने माना कि वो जितनी कहानियां पढ़ते हैं उतनी ही निराशा बढ़ती जाती है । यह एक आलोचक के अलावा एक गंभीर पाठक का भी दर्द था । उन्होंने यह भी माना कि साहित्य में गंभीर लेखन के प्रशंसकों में कमी आई है । प्रकाशक भी अब चालू और तुरत-फुरत लोकप्रियता हासिल करनेवाली फूहड़ रचनाओं को तवज्जो देने में लगे हैं । करीब डेढ घंटे तक हमारी बातचीत होती रही । अंत में मैने उनसे पूछा कि इस वक्त किस महिला कथाकार की रचनाओं में उनको दम नजर आता है । उन्होंने छूटते ही कहा कि इस वक्त अपनी पीढ़ी में मनीषा कुलश्रेष्ठ सबसे समर्थ रचनाकार हैं । उन्होने मनीषा की कुछ कहानियों के नाम भी गिनाए । जब उनको मंडी हाउस के पास टैक्सी पर बिठाकर जब विवाद दे रहा था तो उन्होंने कहा कि इस वक्त हीं साहित्य बजबजा रहा है, लिहाजा इसपर चिंता करना ।

मैं वापस अकादमी के परिसर में लौटा तो मेरे सामने उनकी कई टिप्पणियां थी जिनपर विचार करना आवश्यक था । उनकी इस बात में तो मुझे दम लगा कि आज के ज्यादातर लेखक अपने समकालीन को तो नहीं ही पढ़ते हैं अपने पूर्ववर्ती रचनाकारों की रचनाओं को भी नहीं पढ़ते हैं । उनका तर्क यह होता है कि वो दूसरे की रचनाओं को पढ़ने से उनकी रचनात्मकता प्रभावित होगी । चले अगर एक मिनट के लिए इस तर्क को मान भी लिया जाए तो समकालीन रचनाकारों को पढ़ने में क्या दिक्कत है । दरअसल आज की पीढ़ी के कई रचनाकारों में एक खास किस्म का एरोगैंस दिखाई देता है, बदतमीजी की हद तक । वो खुद को विद्वान ही नहीं मनाते बल्कि यह अपेक्षा भी रखते हैं कि दूसरे भी उनको ज्ञानी मानें । यहीं से उनकी रचनात्मकता बाधित होनी शुरू हो जाती है । बाधित रचनात्मकता को जब छद्म विद्वता बोध का साथ मिलता है तब उससे उपजती है पुरस्कृत होने की चाहत और इस चाहत के वशीभूत होकर शुरू होता है पुरस्कार पाने की गोलबंदी । और तय मानिए कि जब साहित्य में गोलबंदी या घेरेबंदी शुरू हो जाए तो उसका संक्रमण काल शुरू हो जाता है । इस संक्रमण काल को आप उस दौर की रचनाओं में आसानी से लक्षित कर सकते हैं । जरूरत इस बात की है कि आज की आत्ममुग्ध पीढ़ी के रचनाकार अपने समकालीनों और पूर्ववर्तियों को पढ़ें और उनको रचनात्मक स्तर पर चुनौती पेश करें । अगर ऐसा हो पाता है तो समकालीन साहित्य का परिदृश्य बदल सकता है और कुछ अच्छी रचनाएं सामने आ सकती हैं ।     

2 comments:

vandana gupta said...

हर नए को आज वरिष्ठ पढ़ते कहाँ हैं जब तक वो अपनी पहचान नही बना लेता। एक पहलू ये भी है। उदहारण के लिए डार्क हॉर्स का लेखक नीलोत्पल मृणाल के उपन्यास के शायद 3 संस्करण आ चुके थे तब तक किसी वरिष्ठ ने उसे नही पढ़ा और यदि पढ़ा भी हो तो नही सराहा लेकिन जैसे ही साहित्य अकादमी मिला यकायक सबकी निगाह में आ गया तो क्या ये वरिष्ठों का भी कर्तव्य नही क़ि नायों को पढ़ उनका मार्गदर्शन करें या लेखन में दम है तो आगे बढ़ाएं। कोई एक पहलू या करक के आधार पर निर्णय नही लेना चाहिए। बाकि जो कहा गया है आलेख में वो काफी हद तक सही है

sangeeta sethi said...

उम्दा विश्लेषण