गोवा के मुख्यमंत्री दिगंबर कामत महिलाओं के एक सम्मेलन में बोलते-बोलते जोश में होश खो बैठे । यह जानते हुए भी कि वो जिस पार्टी के सदस्य हैं उसकी अध्यक्षा एक महिला है- कामत ने महिलाओं के बारे में अपमानजनक टिप्पणी कर डाली । कामत ने यह टिप्पणी यह जानते हुए भी की कि उनकी पार्टी के एजेंडे में महिलाओं को लोकसभा और राज्यसभा में आरक्षण दिलाना प्राथमिकता पर है । प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी यूपीए- 2 के दो साल पूरे होने पर महिलाओं को पंचायतों में आरक्षण देने पर सरकार की पीठ ठोंकी । लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि गोवा के कांग्रेसी मुख्यमंत्री को यह सब चीजें याद नहीं है । महिलाओं के सम्मेलन में कामत ने कहा कि महिलाओं को राजनीति में नहीं आना चाहिए क्योंकि इससे समाज पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है । अब यह बात तो कामत ही बता सकते हैं कि किस तरह के नकारात्मक प्रभाव की बात वो कर रहे हैं । लेकिन उनके भाषण का जो भाव था वह महिलाओं को लेकर उनकी घटिया मानसिकता को प्रदर्शित कर गया ।
दिगंबर कामत यह भूल गए कि भारत का लोकतांत्रिक इतिहास इस बात का गवाह है कि महिलाओं ने राजनीति में अमिट छाप छोड़ी है । चाहे वो दिगंबर कामत की पार्टी की इंदिरा गांधी हों, राजकुमारी अमृत कौर, सुचेता कृपलानी, गीता मुखर्जी हों, या फिर पूर्व मंत्री तारकेश्वरी सिन्हा, कृष्णा शाही हों । अब के परिदृश्य में भी सोनिया गांधी, सुषमा स्वराज, मीरा कुमार, मायावती, जयललिता से लेकर कई महिला नेत्री हैं जिनको नजरअंदाज नहीं किया जा सकता और भारत के राजनीतिक परिदृश्य इनकी मजबूत उपस्थिति है । भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाओं के योगदान को गिनाने की जरूरत नहीं है, लंबे समय से राजनीति से जुड़े कामत याहब को संभवत: यह पता होगा ।
गोवा के मुख्यमंत्री राजनीति में महिलाओं के आने के नकारात्मक प्रभाव पर ही बोलकर नहीं रुके । वो आगे बढ़े और यहां तक कह गए कि- “राजनीति महिलाओं को क्रेजी बना देती है । समाज के बदलाव में महिलाओं की महती भूमिका है और उन्हें आनेवाली पीढ़ी का ध्यान रखना चाहिए ।“ बोलने के उत्साह में कामत जो कह गए उससे उनकी राजनीति और उनके करियर पर दूरगामी असर पड़ सकता है । लेकिन सवाल यह उठता है कि किसी राज्य का एक चुना हुआ मुख्यमंत्री एक सार्वजनिक समारोह में इस तरह के वक्तव्य कैसे दे सकता है । एक सूबे के सबसे जिम्मेदार पद पर बैठा आदमी, जिसने संविधान के नाम पर शपथ लेकर पद संभाला है वह इस तरह का अपमानजनक वक्तव्य देने के बाद भी अपने पद पर बना हुआ है । क्या कामत की संविधान में आस्था खत्म हो गई है । कामत शायद यह भूल गए हैं कि आज वो एक महिला की कृपा की वजह से ही गोवा के मुख्यमंत्री हैं, विधायकों की पसंद की वजह से नहीं ।
दरअसल कामत का यह बयान एक घोर सामंती व्यवस्था की पुरुषवादी मानसिकता का बेहद कुरुप चेहरा है । उस व्यवस्था का जहां महिलाएं बच्चा पैदा करने की मशीन हैं, बच्चा पालना उनका परम धर्म है । परिवार की देखभाल और अपने पति की हर तरह की जरूरतों पर जान न्योछावर करने की घुट्टी उसे जन्म से पिलाई जाती है । उस आदिकालीन वयव्स्था में महिलाएं गुलाम हैं जिनका परम कर्तव्य है अपने स्वमी की सेवा और स्वामी है पुरुष । इस पाषाणकालीन व्यवस्था में यकीन रखनेवाले पुरुषों को यह कतई मंजूर नहीं है कि महिलाएं भी पुरुषों के साथ कंधा से कंधा मिलाकर काम करें । महिलाओं को पुरुषों के बराबर हक और दर्जा मिले । महिलाएं देश की नीति नियंता बने । गोवा के मुख्यमंत्री इसी सामंती और पुरुष प्रधान व्यवस्था के प्रतिनिधि पुरुष हैं । उनका वक्तव्य पुरुषों के महिला विरोधी मानसिकता के मनोविज्ञान का नमूना है । ।
महिला विरोधी इसी मनोविज्ञान और मानसिकता में मुलायम सिंह भी कह जाते हैं कि अगर संसद में महिलाओं को आरक्षण मिला तो सीटियां बजेंगी । इसी मनोविज्ञान के तहत मुस्लिम धर्म गुरू कल्बे जब्बाद भी महिलाओं के प्रति अपमानजनक बोल बोलते हैं । यही मनोविज्ञान है जो तुलसीलास से भी लिखवा लेता है – ढोल, गंवार...पशु नारी ये सब है तारण के अधिकारी । तो महिलाओं का जो विरोध है वह किसी सिद्धांत, धर्म, आस्था, विश्वास या वाद के परिधि से परे है । जब भी महिलाओं की बेहतरी की बात होती है तो सभी सिद्धांत, वाद, समुदाय, धर्म धरे रह जाते हैं । प्रबल हो जाता है कठोर पुरातनपंथी विचारधारा जो महिलाओं को सदियों से दबा कर रख रहा है और आगे भी चाहता है कि वो उसी तरह दासता और पिछड़ेपन की बेड़ियों में जकड़ी रहें । लेकिन अब वक्त काफी आगे बढ़ गया है पर पीछे छूट गए हैं इस तरह के सामंती और दकियानूसी विचारधारा के लोग ।
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Friday, May 28, 2010
Friday, May 21, 2010
कांग्रेस का माइनरिटी प्लान
हाल के दिनों में भारतीय राजनीति में कई ऐसी घटनाएं घटी जिसे अगर हम सिलसिलेवार ढंग से देखें तो केंद्र में शासन कर रही कांग्रेस पार्टी का एक गेमप्लान सामने आता है । यह गेम प्लान अगले दो तीन सालों में सूबों में होनेवाले विधानसभा चुनावों के मद्देनजर तैयार किया गया प्रतीत होता है। दरअसल इन कड़ियों को जोड़ने के लिए हमें कुछ पीछे जाना होगा । कुछ महीनों पहले पार्टी के महासचिव दिग्विजय सिंह आजमगढ़ के संजरपुर पहुंचकर बाटला हाउस एनकाउंटर पर सवाल खड़े देते हैं । इशारों-इशारों में दिग्विजय सिंह ने बटला हाउस एनकांउटर के फर्जी होने की बात कर डाली । बटला हाउस एनकाउंटर में मारे गए आतंकवादियों के फोटोग्राफ्स की बिनाह पर उन्होंने दावा किया कि एनकाउंटर में उस तरह से सर में गोली लगना नामुमकिन है। सवाल यह भी उठा कि बटला हाउस एनकांटर पर सवाल खड़े करने के लिए दिग्विजय सिंह ने संजरपुर को क्यों चुना । इस बयान के कुछ ही दिनों बाद ही पुलिस के साथ मुठभेड़ में मारे गए आतंकवादियों के फोटोग्राफ्स और उनकी पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट लीक की गई जिसको आधार बनाकर बटला हाउस एनकाउंटर पर मीडिया में सवाल खड़े किए गए और एनकाउंटर को शक के दायरे में ला दिया गया । वोट की ओछी राजनीति के लिए दिल्ली पुलिस के जाबांज इंसपेक्टर मोहनचंद शर्मा की शहादत को भुला दिया गया । गौरतलब है कि मोहन चंद्र शर्मा को कांग्रेस पार्टी ने ही मरणोपरांत देश का सर्वोच्च सम्मान दिया था । एक बार फिर से बटला हाउस का जिन्न बोतल से बाहर आ गया और साथ ही आजमगढ़ भी सुर्खियों में आ गया । जाहिर सी बात है इस पूरे घटना क्रम को अगर हम चंद महीनों पहले दिग्विजय सिंह के संजरपुर में दिए गए बयान से जोड़कर देखें तो तस्वीर कुछ साफ होती नजर आती है । अल्पसंख्यकों को लुभाने के लिए फेंका गया यह पहला चारा था ।
इसमें सफलता पाने के बाद कांग्रेस ने अपना निशाना बनाया गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को । गुजरात दंगों के बाद मोदी को भारतीय मुसलमानों के बीच खलनायक की तरह पेश किया गया और उनकी छवि घोर सांप्रदायिक बना दी गई । सचाई चाहे जो हो वो तो अदालत से तय होगा लेकिन आज की तारीख में देश का मुसलमान मोदी के बारे में बेहद खराब राय रखता है । तो कांग्रेस ने फिर से देश के अल्पसंख्यकों के बीच मोदी के बहाने एक संदेश देने की कोशिश की, संदेश यह कि जो भी मोदी के साथ है वो हमारा दुश्मन है । आपको याद होगा कि मुंबई में एक समारोह में सदी के महानायक अमिताभ बच्चन और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण एक मंच पर साथ दिखे थे जिसके बाद पार्टी में अशोक चव्हाण के खिलाफ मोर्चा खुल गया था । उनको उस अमिताभ के साथ बैठने के लिए आलोचना का शिकार होना पड़ा जो गुजरात पर्यटन के ब्रांड अंबेस्डर हैं और नरेन्द्र मोदी के साथ भी मंच शेयर करते हैं । लेकिन इस आलोचना के पीछे की असली वजह वो नहीं है जो सतह के उपर दिखाई देती है बल्कि वजह वह है जो सतह के नीचे है । कांग्रेस पार्टी अशोक चव्हाण और अमिताभ बच्चन के बहाने देश के अल्पसंख्यकों को यह संदेश देना चाहती थी कि जो भी मोदी के साथ है वो हमें बर्दाश्त नहीं है और पार्टी यहां भी सफल रही क्योंकि अमिताभ का नाम आने से मीडिया में उक्त घटना को लगातार कई दिनों तक प्रमुखता से कवरेज मिलता रहा ।
तीसरी घटना जो हुई वो जुड़ी तो हुई है आईपीएल और ललित मोदी से लेकिन उसके पीछे भी नरेन्द्र मोदी का ही नाम है । आईपीएल में जब तत्कालीन विदेश राज्य मंत्री शशि थरूर और आईपीएल कमिश्नर ललित मोदी के बीच जुबानी जंग जारी था तो उस विवाद में अचानक से कोच्चि टीम में हिस्सेदारी को लेकर गुजरात के उद्योगपतियों के साथ नरेन्द्र मोदी का नाम भी उछला । जैसे ही नरेन्द्र मोदी, वसुंधरा राजे और ललित मोदी के तार जुड़ते नजर आए अचानक से वित्त मंत्रालय के अधीन काम करनेवाला आयकर विभाग सक्रिय हो गया और देशभर में ताबड़तोड़ छापे डाले जाने लगे । ललित मोदी को भी बीजेपी कनेक्शन मंहगा पड़ा । यहां भी कांग्रेस देश के अल्पसंख्यकों को यह संदेश देने में सफल हो गई कि जो भी नरेन्द्र मोदी के साथ वह हमें बर्दाश्त नहीं ।
कांग्रेस की तरफ से देश के अल्पसंख्यकों को लगातार यह संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि सिर्फ वही इकलौती पार्टी है जो उनके हितों का ख्याल रख सकती है । इसका एक और उदाहरण अभी सामने आया है- पार्टी में अल्पसंख्यकों के नए-नए बने पैरोकार दिग्विजय सिंह ने अब मालेगांव, गोवा, जयपुर और हैदराबाद धमाकों की सुनवाई के लिए विशेष अदालत गठित करने का राग छेड़ा हुआ है । यह इसलिए कि इन जगहों पर धमाका कराने का शक कुछ हिंदूवादी संगठनों पर है और उन संगठनों से जुड़े लोग या तो जेल में हैं या फिर पुलिस हिरासत में । उनके ट्रायल के लिए दिग्विजय सिंह को भारतीय न्यायिक वयवस्था की रफ्तार पर भरोसा नहीं हो रहा है और वह इसके लिए तेज गति से सुनवाई चाहते हैं । दिग्विजय सिंह या उनकी पार्टी ने कभी भी देश भर में हुए आतकंवादी हमलों के लिए अलग से अदालत की मांग की हो ऐसा सुनने में नहीं आया । यहां भी अल्पसंख्यकों को संदेश देने की कोशिश ना कि आतंकवादी गतिविधियों पर काबू पाने की ईमानदार कोशिश ।
अब अगर हम उपर के सभी वाकयों को जोड़ते हैं तो एक मुकम्मल तस्वीर सामने आती है । यह तस्वीर बनती है कांग्रेस पार्टी द्वारा देश के अल्पसंख्यक समुदाय को अपने पाले में लाने की कोशिश और इस कोशिश का लक्ष्य है बिहार, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव । इस साल बिहार में, अगले साल पश्चिम बंगाल में और उसके अगले साल उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होनेवाले हैं । कांग्रेस इस प्रयास में है कि बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद जिस तरह से अल्पसंख्यक समुदाय उनसे बिदक गया था उसे लुभाकर, रिझाकर अपने पाले में लाया जाए । दो हजार एक की जनगणना के आधार पर अगर हम देखें तो ये तीन ऐसे राज्य हैं जहां मुसलमानों की संख्या की संख्या काफी ज्यादा है । दो हजार एक के जनगणना के मुताबिक देश की कुल मुस्लिम आबादी का बाइस फीसदी उत्तर प्रदेश में है । बिहार में तकरीबन दस फीसदी और पश्चिम बंगाल में ---फीसदी मुस्लिम आबादी है । उत्तर प्रदेश की अस्सी लोकसभा सीटों में से 17 के भाग्य का फैसला मुस्लिम वोटर करते हैं जहां कि उनकी आबादी तकरीबन बीस फीसदी है । इसे इस तरह भी देख सकते हैं कि उत्तर प्रदेश में बीस ऐसे जिले हैं जहां की मुस्लिम आबादी बीस फीसदी से ज्यादा है । आजमगढ़, बहराइच, गोंडा, श्रावस्ती, वाराणसी और डुमरियागंज के अलावा पश्चिम उत्तर प्रदेश के अमरोहा, मुजफ्फरनगर, मोरादाबाद में तो उम्मीदवारों की किस्मत का फैसला मुस्लिम वोटों के आधार पर ही होता है ।
बिहार में भी सात जिलों में यही हालत है, किशनगंज, कटिहार अररिया और पूर्णिया में तो पैंतीस फीसदी से ज्यादा आबादी है जो दर्जनों विधानसभा क्षेत्र के नतीजों को प्रभावित करते हैं । यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि मुसलमान एकमुस्त वोट करते हैं । पिछले लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में मुसलमानों ने कांग्रेस के पक्ष में वोट डालकर उसको बीस सीटों का आंकड़ा हासिल करने में मदद की । पश्चिम बंगाल के कई इलाकों में भी मुसलमानों की निर्णायक संख्या है । क्लासलेस और कास्टलेस सोसायटी का दावा करनेवाली पश्चिम बंगाल प्रगतिशील सरकार ने भी इन्हीं वोटों को ध्यान में ऱखकर बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन को सूबे से बाहर निकाल दिया । अब सरकार को यह डर सता रहा है कि मुस्लिम वोट बैंक ममता बनर्जी की ओर जा रहा है तो उसे फिर से अपने पाले में लाने के लिए तमाम हथकंडे अपना रही है । उधर कांग्रेस भी उन्हें अपनी तरफ खींचने की जुगत में लगी है ।
सवाल यह उठता है कि आजादी के बाद से दशकों तक मुस्लिम वोट कांग्रेस को जाता रहा लेकिन उनके उत्थान के लिए कितना और क्या किया गया । मुस्लिम समुदाय में शिक्षा के प्रचार प्रसार के लिए कितनी कोशिश की गई । मुस्लिम इलाकों में कितने सरकारी स्कूल खोले गए । अगर ये सारे आंकड़े सामने आ जाएं तो कांग्रेस की पोल खुल जाएगी । इस देश में उपराष्ट्रपति और राष्ट्रपति तो मुसलमान बन सकता है लेकिन उनका सरकारी दफ्तर में चपरासी बनना मुश्किल है । यह एक कड़वी सचाई है जिसके लिए सिर्फ और सिर्फ इस देश में आजादी के बाद पांच दशक तक राज करनेवाली पार्टी जिम्मेदार है । मुसलमानों को वोट बैंक की तरह इस्तेमाल करनेवाली कांग्रेस पर क्या इस समुदाय के समुचित विकास की जिम्मेदारी नहीं है । अब वक्त आ गया है कि देश की अल्पसंख्यक जनता को ऐसी पार्टियों की राजनीति और हमदर्दी के झूठे दिखावे को समझना चाहिए और मौका मिलने पर उनको सबक भी सिखाना चाहिए ।
इसमें सफलता पाने के बाद कांग्रेस ने अपना निशाना बनाया गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को । गुजरात दंगों के बाद मोदी को भारतीय मुसलमानों के बीच खलनायक की तरह पेश किया गया और उनकी छवि घोर सांप्रदायिक बना दी गई । सचाई चाहे जो हो वो तो अदालत से तय होगा लेकिन आज की तारीख में देश का मुसलमान मोदी के बारे में बेहद खराब राय रखता है । तो कांग्रेस ने फिर से देश के अल्पसंख्यकों के बीच मोदी के बहाने एक संदेश देने की कोशिश की, संदेश यह कि जो भी मोदी के साथ है वो हमारा दुश्मन है । आपको याद होगा कि मुंबई में एक समारोह में सदी के महानायक अमिताभ बच्चन और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण एक मंच पर साथ दिखे थे जिसके बाद पार्टी में अशोक चव्हाण के खिलाफ मोर्चा खुल गया था । उनको उस अमिताभ के साथ बैठने के लिए आलोचना का शिकार होना पड़ा जो गुजरात पर्यटन के ब्रांड अंबेस्डर हैं और नरेन्द्र मोदी के साथ भी मंच शेयर करते हैं । लेकिन इस आलोचना के पीछे की असली वजह वो नहीं है जो सतह के उपर दिखाई देती है बल्कि वजह वह है जो सतह के नीचे है । कांग्रेस पार्टी अशोक चव्हाण और अमिताभ बच्चन के बहाने देश के अल्पसंख्यकों को यह संदेश देना चाहती थी कि जो भी मोदी के साथ है वो हमें बर्दाश्त नहीं है और पार्टी यहां भी सफल रही क्योंकि अमिताभ का नाम आने से मीडिया में उक्त घटना को लगातार कई दिनों तक प्रमुखता से कवरेज मिलता रहा ।
तीसरी घटना जो हुई वो जुड़ी तो हुई है आईपीएल और ललित मोदी से लेकिन उसके पीछे भी नरेन्द्र मोदी का ही नाम है । आईपीएल में जब तत्कालीन विदेश राज्य मंत्री शशि थरूर और आईपीएल कमिश्नर ललित मोदी के बीच जुबानी जंग जारी था तो उस विवाद में अचानक से कोच्चि टीम में हिस्सेदारी को लेकर गुजरात के उद्योगपतियों के साथ नरेन्द्र मोदी का नाम भी उछला । जैसे ही नरेन्द्र मोदी, वसुंधरा राजे और ललित मोदी के तार जुड़ते नजर आए अचानक से वित्त मंत्रालय के अधीन काम करनेवाला आयकर विभाग सक्रिय हो गया और देशभर में ताबड़तोड़ छापे डाले जाने लगे । ललित मोदी को भी बीजेपी कनेक्शन मंहगा पड़ा । यहां भी कांग्रेस देश के अल्पसंख्यकों को यह संदेश देने में सफल हो गई कि जो भी नरेन्द्र मोदी के साथ वह हमें बर्दाश्त नहीं ।
कांग्रेस की तरफ से देश के अल्पसंख्यकों को लगातार यह संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि सिर्फ वही इकलौती पार्टी है जो उनके हितों का ख्याल रख सकती है । इसका एक और उदाहरण अभी सामने आया है- पार्टी में अल्पसंख्यकों के नए-नए बने पैरोकार दिग्विजय सिंह ने अब मालेगांव, गोवा, जयपुर और हैदराबाद धमाकों की सुनवाई के लिए विशेष अदालत गठित करने का राग छेड़ा हुआ है । यह इसलिए कि इन जगहों पर धमाका कराने का शक कुछ हिंदूवादी संगठनों पर है और उन संगठनों से जुड़े लोग या तो जेल में हैं या फिर पुलिस हिरासत में । उनके ट्रायल के लिए दिग्विजय सिंह को भारतीय न्यायिक वयवस्था की रफ्तार पर भरोसा नहीं हो रहा है और वह इसके लिए तेज गति से सुनवाई चाहते हैं । दिग्विजय सिंह या उनकी पार्टी ने कभी भी देश भर में हुए आतकंवादी हमलों के लिए अलग से अदालत की मांग की हो ऐसा सुनने में नहीं आया । यहां भी अल्पसंख्यकों को संदेश देने की कोशिश ना कि आतंकवादी गतिविधियों पर काबू पाने की ईमानदार कोशिश ।
अब अगर हम उपर के सभी वाकयों को जोड़ते हैं तो एक मुकम्मल तस्वीर सामने आती है । यह तस्वीर बनती है कांग्रेस पार्टी द्वारा देश के अल्पसंख्यक समुदाय को अपने पाले में लाने की कोशिश और इस कोशिश का लक्ष्य है बिहार, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव । इस साल बिहार में, अगले साल पश्चिम बंगाल में और उसके अगले साल उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होनेवाले हैं । कांग्रेस इस प्रयास में है कि बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद जिस तरह से अल्पसंख्यक समुदाय उनसे बिदक गया था उसे लुभाकर, रिझाकर अपने पाले में लाया जाए । दो हजार एक की जनगणना के आधार पर अगर हम देखें तो ये तीन ऐसे राज्य हैं जहां मुसलमानों की संख्या की संख्या काफी ज्यादा है । दो हजार एक के जनगणना के मुताबिक देश की कुल मुस्लिम आबादी का बाइस फीसदी उत्तर प्रदेश में है । बिहार में तकरीबन दस फीसदी और पश्चिम बंगाल में ---फीसदी मुस्लिम आबादी है । उत्तर प्रदेश की अस्सी लोकसभा सीटों में से 17 के भाग्य का फैसला मुस्लिम वोटर करते हैं जहां कि उनकी आबादी तकरीबन बीस फीसदी है । इसे इस तरह भी देख सकते हैं कि उत्तर प्रदेश में बीस ऐसे जिले हैं जहां की मुस्लिम आबादी बीस फीसदी से ज्यादा है । आजमगढ़, बहराइच, गोंडा, श्रावस्ती, वाराणसी और डुमरियागंज के अलावा पश्चिम उत्तर प्रदेश के अमरोहा, मुजफ्फरनगर, मोरादाबाद में तो उम्मीदवारों की किस्मत का फैसला मुस्लिम वोटों के आधार पर ही होता है ।
बिहार में भी सात जिलों में यही हालत है, किशनगंज, कटिहार अररिया और पूर्णिया में तो पैंतीस फीसदी से ज्यादा आबादी है जो दर्जनों विधानसभा क्षेत्र के नतीजों को प्रभावित करते हैं । यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि मुसलमान एकमुस्त वोट करते हैं । पिछले लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में मुसलमानों ने कांग्रेस के पक्ष में वोट डालकर उसको बीस सीटों का आंकड़ा हासिल करने में मदद की । पश्चिम बंगाल के कई इलाकों में भी मुसलमानों की निर्णायक संख्या है । क्लासलेस और कास्टलेस सोसायटी का दावा करनेवाली पश्चिम बंगाल प्रगतिशील सरकार ने भी इन्हीं वोटों को ध्यान में ऱखकर बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन को सूबे से बाहर निकाल दिया । अब सरकार को यह डर सता रहा है कि मुस्लिम वोट बैंक ममता बनर्जी की ओर जा रहा है तो उसे फिर से अपने पाले में लाने के लिए तमाम हथकंडे अपना रही है । उधर कांग्रेस भी उन्हें अपनी तरफ खींचने की जुगत में लगी है ।
सवाल यह उठता है कि आजादी के बाद से दशकों तक मुस्लिम वोट कांग्रेस को जाता रहा लेकिन उनके उत्थान के लिए कितना और क्या किया गया । मुस्लिम समुदाय में शिक्षा के प्रचार प्रसार के लिए कितनी कोशिश की गई । मुस्लिम इलाकों में कितने सरकारी स्कूल खोले गए । अगर ये सारे आंकड़े सामने आ जाएं तो कांग्रेस की पोल खुल जाएगी । इस देश में उपराष्ट्रपति और राष्ट्रपति तो मुसलमान बन सकता है लेकिन उनका सरकारी दफ्तर में चपरासी बनना मुश्किल है । यह एक कड़वी सचाई है जिसके लिए सिर्फ और सिर्फ इस देश में आजादी के बाद पांच दशक तक राज करनेवाली पार्टी जिम्मेदार है । मुसलमानों को वोट बैंक की तरह इस्तेमाल करनेवाली कांग्रेस पर क्या इस समुदाय के समुचित विकास की जिम्मेदारी नहीं है । अब वक्त आ गया है कि देश की अल्पसंख्यक जनता को ऐसी पार्टियों की राजनीति और हमदर्दी के झूठे दिखावे को समझना चाहिए और मौका मिलने पर उनको सबक भी सिखाना चाहिए ।
Monday, May 17, 2010
शीला, श्लाका और छीछालेदार
हिंदी के वरिष्ठ और बेहद प्रतिष्ठित लेखक कृष्ण बलदेव वैद के अपमान का संगीन इल्जाम झेल रही दिल्ली की हिंदी अकादमी ने आखिरकार अपना पुरस्कार वितरण समारोह आयोजित कर ही लिया । लेकिन इस बार पुरस्कार अर्पण समारोह की भव्यता और लोगों की सहभागिता के बगैर आयोजित की गई । राजधानी के सबसे बड़े ऑडिटोरियम में से किसी एक में आयोजित होने वाला अकादमी का यह सालाना समारोह इस बार दिल्ली सचिवालय के एक कमरे में आयोजित हुआ। सबकुछ बेहद सरकारी और गुपचुप तरीके से किया गया । हिंदी अकादमी की यह परंपरा रही है कि वो किसी भी कार्यक्रम के लिए दिल्ली के लेखकों-पत्रकारों को आमंत्रित करती है । अकादमी की अपनी एक मेलिंग लिस्ट है जिनको हर कार्यक्रम में आमंत्रित किया जाता है । लेकिन इस बार ऐसा कुछ नहीं हुआ । यहां तक कि अकादमी के गवर्निंग वॉडी के सदस्यों तक को सिर्फ कार्ड भेजकर रस्म अदायगी कर ली गई । नतीजा यह हुआ कि जन कार्यक्रम होने की बजाए यह आयोजन सरकारी कार्यक्रम में तब्दील होकर रह गया । वरिष्ठ साहित्यकार और हंस के संपादक ने बेहद सटीक टिप्पणी की और कहा कि अगर अकादमी को पुरस्कार वितरण की रस्म अदायगी ही करनी थी तो लेखकों को कूरियर से चेक और स्मृति चिन्ह भेज देती । समारोह में शीला दीक्षित ने हिंदी अकादमी की स्वायत्ता को लेकर बड़ा लंबा चौड़ा भाषण दिया लेकिन अकादमी की स्वायत्ता का जिस तरह से गला घोंटा गया उसके लिए शीला दीक्षित ही जिम्मेदार हैं । दरअसल हिंदी अकादमी अब पूरी तरह से सरकार का भोंपू बनकर रह गया है । हिंदी के प्रचार प्रसार की आड़ में सरकार के मंत्रियों और विधायकों को खुश करने और जनता के बीच उनकी छवि बनाने का काम होता है । इसके अलावा बड़े और रसूखदार लोगों की साहित्यिक लिप्सा को भी दिल्ली की हिंदी अकादमी संतुष्ट करती है । इसका एक उदाहरण आपको देते चलें । इसी पुरस्कार वितरण समारोह में हिंदी अकादमी की पत्रिका इंद्रप्रस्थ भारती के एक अंक का लोकार्पण भी किया गया । इस अंक में एक बड़े बिल्डर को खुश करने के लिए अंत समय में हिंदी के एक वरिष्ठ कवि की कविता हटाकर उनकी कविता प्रमुखता से छाप दी गई । इस खेल का अंदाज तो पाठक स्वयं लगा सकते हैं कि बिल्डर की कविता को अंत समय में क्यों शामिल किया गया । अगर कविता उतनी ही अच्छी थी तो क्या अगले अंक का इंतजार नहीं किया जा सकता था । तो अकादमी में जिस तरह के खेल चल रहे हैं उसको देखते हुए यह कहने में मुझे तनिक भी संकोच नहीं कि ये सरकार की छवि को बिगाड़ने का काम ज्यादा कर रहे हैं, बनाने का कम ।
दरअसल इस पूरे विवाद को समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाना पड़ेगा । वर्ष 2008-09 के लिए अकादमी की कार्यकारिणी ने हिंदी के वरिष्ठ और प्रतिष्ठित लेखक कृष्ण बलदेव वैद को श्लाका सम्मान देने की संस्तुति की थी । उसके बाद अकादमी की अध्यक्ष की हैसियत से दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने तत्कालीन कार्यकारिणी के फैसलों पर मुहर लगा थी । लेकिन बाद के दिनों में हिंदी अकादमी में प्रशासनिक अराजकता की वजह से उस वर्ष के सम्मान नहीं दिए जा सके । लेकिन अब जब अकादमी ने वर्ष 2009-10 के पुरस्कारों के साथ 2008-09 के पुरस्कारों का ऐलान किया तो 2008-09 के लिए श्ललाका सम्मान के लिए किसी का नाम घोषित नहीं किया गया । सूची से कृष्ण बलदेव वैद का नाम गायब था । बताया जा रहा है कि एक अनाम से कांग्रेसी नेता ने अकादमी की अध्यक्ष दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को पत्र लिखकर कृष्ण बलदेव वैद को श्लाका सम्मान नहीं देने का अनुरोध किया था । कांग्रेसी नेता का आरोप है कि वैद के उपन्यास नसरीन में कई जगह अश्लील शब्दों और स्थितियों का चित्रण किया गया है । कांग्रेसी नेता की आपत्ति को तरजीह देते हुए शीला दीक्षित की अध्यक्षता वाली कमिटी ने वैद जी का नाम रोक दिया ।
कृष्ण बलदेव वेद को श्ललाका सम्मान नहीं दिए जाने पर हिंदी साहित्य में विरोध के स्वर उठने लगे थे । हिंदी के आलोचक पुरुषोत्तम अग्रवाल, पुरुषोत्तम अग्रवाल की चिट्ठी के बाद 2009-10 के श्ललाका कवि केदारनाथ सिंह ने भी पुरस्कार लेने से इंकार कर दिया । केदार जी के इस कदम के बाद तो जैसे पुरस्कार ठुकरानेवालों की लाइन लग गई । कवि-पत्रकार विमल कुमार, कवि पंकज सिंह, कवयित्रि और स्वर्गीय निर्मल वर्मा की पत्नी गगन गिल, रेखा जैन ने भी हिंदी अकादमी द्वारा घोषित पुरस्कार लेने से मना कर दिया है । लेकिन हैरानी की बात है कि पहले सार्वजनिक तौर पर विरोध जताने के बाद भी गगन ना केवल समारोह में पहुंची बल्कि मंच पर शीला दीक्षित के हाथों पुरस्कार भी ग्रहण किया । तमाम हिंदी दैनिकों ने गगन गिल की तस्वीर को प्रमुखता से छापा । गगन गिल का वहां पहुंचान हैरानी की बात थी क्योकि उनको अशोक वाजपेयी खेमे का माना जाता है और वैद जी भी उसी स्कूल ऑफ राइटर्स हैं । गगन के अलावा असगर वजाहत भी पुरस्कार लेने पहुंचे । असगर वजाहत ने शुरू से ही अपना स्टैंड साफ रखा था इस वजह से उनकी मौजूदगी को लेकर किसी को हैरानी नहीं हुई ।
इस पुरस्कार वितरण समारोह के आयोजन से कुछ बेहद अहम और बड़े सवाल खड़े हिंदी के साहिय और साहित्यकार के सामने खड़े हो गए हैं । हिंदी लेखकों का ढुलमुल चरित्र एक बार फिर से उजागर हुआ है । अकादमी के कर्ताधर्ताओं को यह मालूम है कि हिंदी के लेखकों का विरोध फौरी होता है और वो ज्यादा समय तक अपने स्टैंड पर कायम नहीं रह सकते हैं । इस बात को ज्यादा दिन नहीं बीते हैं जब अशोक चक्रधर को हिंदी अकादमी का उपाध्यक्ष बनाने पर हिंदी के कई वरिष्ठ लेखकों ने घोर आपत्ति जताई थी । अशोक चक्रधर को मसखरा और मंचीय कवि कहकर खिल्ली उड़ाई थी, लेकिन चंद दिनों बाद वही साहित्यकार अशोक चक्रधर के सानिध्य में मंचासीन नजर आने लगे थे । चाहे वो राजेन्द्र यादव हों या फिर नामवर सिंह या फिर कोई और वरिष्ठ लेखक । वजह ये थी कि अशोक चक्रधर सत्ता प्रतिष्ठान के करीब है, हिंदी अकादमी के उपाध्यक्ष के अलावा वो केंद्रीय हिंदी संस्थान के भी कर्ता-घर्ता हैं । हिंदी के लेखक सरकारी लाभ का चाहे जितना विरोध करें लेकिन वो इसका लोभ संवरण नहीं कर पाते हैं । छोटे –मोटे फायदे के लिए बड़े सिद्धांतो को तिलांजलि देने में इन्हें वक्त नहीं लगता । वैद जी का अपमान पूरे साहित्य जगत का अपमान है और हिंदी समाज को पूरी ताकत के साथ इसका विरोध करना चाहिए था । अफसोस की बात है कि हिंदी के लेखक पुरजोर तरीके से शीला दीक्षित सरकार का विरोध नहीं कर सके और सरकार ने अपनी मनमानी कर ली । लेकिन इससे दिल्ली सरकार की जमकर किरकिरी हुई । आज नहीं तो कल शीला दीक्षित को इस बात का एहसास होगा लेकिन तबतक बहुत देर हो चुकी होगी ।
दरअसल इस पूरे विवाद को समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाना पड़ेगा । वर्ष 2008-09 के लिए अकादमी की कार्यकारिणी ने हिंदी के वरिष्ठ और प्रतिष्ठित लेखक कृष्ण बलदेव वैद को श्लाका सम्मान देने की संस्तुति की थी । उसके बाद अकादमी की अध्यक्ष की हैसियत से दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने तत्कालीन कार्यकारिणी के फैसलों पर मुहर लगा थी । लेकिन बाद के दिनों में हिंदी अकादमी में प्रशासनिक अराजकता की वजह से उस वर्ष के सम्मान नहीं दिए जा सके । लेकिन अब जब अकादमी ने वर्ष 2009-10 के पुरस्कारों के साथ 2008-09 के पुरस्कारों का ऐलान किया तो 2008-09 के लिए श्ललाका सम्मान के लिए किसी का नाम घोषित नहीं किया गया । सूची से कृष्ण बलदेव वैद का नाम गायब था । बताया जा रहा है कि एक अनाम से कांग्रेसी नेता ने अकादमी की अध्यक्ष दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को पत्र लिखकर कृष्ण बलदेव वैद को श्लाका सम्मान नहीं देने का अनुरोध किया था । कांग्रेसी नेता का आरोप है कि वैद के उपन्यास नसरीन में कई जगह अश्लील शब्दों और स्थितियों का चित्रण किया गया है । कांग्रेसी नेता की आपत्ति को तरजीह देते हुए शीला दीक्षित की अध्यक्षता वाली कमिटी ने वैद जी का नाम रोक दिया ।
कृष्ण बलदेव वेद को श्ललाका सम्मान नहीं दिए जाने पर हिंदी साहित्य में विरोध के स्वर उठने लगे थे । हिंदी के आलोचक पुरुषोत्तम अग्रवाल, पुरुषोत्तम अग्रवाल की चिट्ठी के बाद 2009-10 के श्ललाका कवि केदारनाथ सिंह ने भी पुरस्कार लेने से इंकार कर दिया । केदार जी के इस कदम के बाद तो जैसे पुरस्कार ठुकरानेवालों की लाइन लग गई । कवि-पत्रकार विमल कुमार, कवि पंकज सिंह, कवयित्रि और स्वर्गीय निर्मल वर्मा की पत्नी गगन गिल, रेखा जैन ने भी हिंदी अकादमी द्वारा घोषित पुरस्कार लेने से मना कर दिया है । लेकिन हैरानी की बात है कि पहले सार्वजनिक तौर पर विरोध जताने के बाद भी गगन ना केवल समारोह में पहुंची बल्कि मंच पर शीला दीक्षित के हाथों पुरस्कार भी ग्रहण किया । तमाम हिंदी दैनिकों ने गगन गिल की तस्वीर को प्रमुखता से छापा । गगन गिल का वहां पहुंचान हैरानी की बात थी क्योकि उनको अशोक वाजपेयी खेमे का माना जाता है और वैद जी भी उसी स्कूल ऑफ राइटर्स हैं । गगन के अलावा असगर वजाहत भी पुरस्कार लेने पहुंचे । असगर वजाहत ने शुरू से ही अपना स्टैंड साफ रखा था इस वजह से उनकी मौजूदगी को लेकर किसी को हैरानी नहीं हुई ।
इस पुरस्कार वितरण समारोह के आयोजन से कुछ बेहद अहम और बड़े सवाल खड़े हिंदी के साहिय और साहित्यकार के सामने खड़े हो गए हैं । हिंदी लेखकों का ढुलमुल चरित्र एक बार फिर से उजागर हुआ है । अकादमी के कर्ताधर्ताओं को यह मालूम है कि हिंदी के लेखकों का विरोध फौरी होता है और वो ज्यादा समय तक अपने स्टैंड पर कायम नहीं रह सकते हैं । इस बात को ज्यादा दिन नहीं बीते हैं जब अशोक चक्रधर को हिंदी अकादमी का उपाध्यक्ष बनाने पर हिंदी के कई वरिष्ठ लेखकों ने घोर आपत्ति जताई थी । अशोक चक्रधर को मसखरा और मंचीय कवि कहकर खिल्ली उड़ाई थी, लेकिन चंद दिनों बाद वही साहित्यकार अशोक चक्रधर के सानिध्य में मंचासीन नजर आने लगे थे । चाहे वो राजेन्द्र यादव हों या फिर नामवर सिंह या फिर कोई और वरिष्ठ लेखक । वजह ये थी कि अशोक चक्रधर सत्ता प्रतिष्ठान के करीब है, हिंदी अकादमी के उपाध्यक्ष के अलावा वो केंद्रीय हिंदी संस्थान के भी कर्ता-घर्ता हैं । हिंदी के लेखक सरकारी लाभ का चाहे जितना विरोध करें लेकिन वो इसका लोभ संवरण नहीं कर पाते हैं । छोटे –मोटे फायदे के लिए बड़े सिद्धांतो को तिलांजलि देने में इन्हें वक्त नहीं लगता । वैद जी का अपमान पूरे साहित्य जगत का अपमान है और हिंदी समाज को पूरी ताकत के साथ इसका विरोध करना चाहिए था । अफसोस की बात है कि हिंदी के लेखक पुरजोर तरीके से शीला दीक्षित सरकार का विरोध नहीं कर सके और सरकार ने अपनी मनमानी कर ली । लेकिन इससे दिल्ली सरकार की जमकर किरकिरी हुई । आज नहीं तो कल शीला दीक्षित को इस बात का एहसास होगा लेकिन तबतक बहुत देर हो चुकी होगी ।
Wednesday, May 5, 2010
विश्वास के कातिल गुरू
अभी एक छोटी सी पर अहम खबर अखबारों में आई जो देश से गद्दारी करनेवाली माधुरी गुप्ता के कवरेज में गुम होकर रह गई । केरल के कोझीकोड जिले के छोटे से कस्बे पुलियाकावू के एक प्राइमरी स्कूल के शिक्षक को चौथी क्लास में पढ़नेवाली छह लड़कियों के यौन शोषण करने का दोषी पाया गया और उसे तीस साल की जेल और बीस हजार रुपये का जुर्माने की सजा सुनाई गई । दरअसल उनतालीस साल के इस गुनहगार ने आज से तेरह साल पहले चौथी क्लास की लड़कियों के साथ क्लारूम और कंप्यूटर लैब में छेड़छाड़ की थी और उन्हें अपने हवस का शिकार बनाने की कोशिश की थी । शिक्षा के मंदिर की पवित्रता को अपनी हरकतों से बदनाम करनेवाले इस शख्स का जब राज खुला था तो केरल में तूफान उठ खड़ा हुआ था । तेरह साल बाद उन छह मासूम लड़कियों को इंसाफ मिला है । संभवत देश का यह पहला मामला है जहां यौन शोषण के मामले में किसी आरोपी को तीस साल की कैद और बीस हजार रुपये का जुर्माना किया गया है । अदालत के इस तरह के रुख से इस तरह की घिनौनी हरकत करनेवालों पर लगाम लगाने में मदद मिल सकती है या फिर इस तरह के कुंठित लोग कानून के खौफ की वजह से इस तरह की नापाक हरकतों को अंजाम ना दें ।
हाल के दिनों में इस तरह की बेचैन करनेवाली खबरें लगातार आने लगी हैं । प्राइमरी स्कूल से लेकर स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय तक से शिक्षकों के अपने छात्र-छात्राओं के यौन शोषण की खबरें लगातार सुर्खियां बनती रही हैं । जिस दिन केरल की अदालत में यौन शोषण के जुर्म में आरोपी को तीस साल की सजा की खबर छपी उसी दिन ये खबर भी आई कि देश के शीर्ष विश्वविद्यालयों में से एक - जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी में एक शिक्षक ने एक विदेशी छात्रा के साथ जोर-जबरदस्ती करने की कोशिश की । जब छात्रा ने इसका विरोध किया तो उक्त शिक्षक ने मामले को रफा-दफा करने की कोशिश की, लेकिन मामला पुलिस तक पहुंच गया । इसके पहले दिल्ली विश्वविद्यालय में एक दलित छात्रा के यौन शोषण के जुर्म में हिंदी विभाग के एक शिक्षक को विश्वविद्यालय ने नौकरी से हटा दिया था । दिल्ली विश्वविद्यालय के ही एक अन्य कॉलेज के एक शिक्षक पर छात्रों के यौन शोषण का आरोप लगा जिसे विश्विद्यालय की कमेटी ने सही पाया और उस केस में भी प्रोफेसर के खिलाफ कार्रवाई हुई ।
दरअसल इस तरह के मामले जब राजधानी दिल्ली या फिर कुछ बड़े शहरों में होते हैं तो मीडिया की नजरों में आ जाते हैं और फिर प्रशासन कार्रवाई को मजबूर हो जाता है । लेकिन देश के सूदूर इलाकों में शिक्षकों के इस तरह की नापाक हरकत उजागर ही नहीं हो पाते हैं और यौन शोषण की शिकार लड़कियां और बच्चियां चुप रह जाती हैं । इस देश में गुरू को भगवान या फिर उससे भी उंचा दर्जा प्राप्त है । गुरू को मां-बाप से भी ज्यादा इज्जत इस देश में बख्शी जाती है । छुटपन से ही बच्चों को यह सिखाया जाता रहा है कि – गुरु गोविंद दोउ खड़े काके लागूं पांय. बलिहारी बा गुरू की जिमि गोविंद दियो बताए । यानि कि गुरु भगवान से भी बड़ा होता है और भगवान या गुरू एक साथ खड़े हों तो पहले गुरू को प्रणाम करना चाहिए क्योंकि गुरू ही भगवान के बारे में बताते हैं । लड़कियों के मां-बाप शिक्षकों पर इसी अटूट आस्था और विश्वास के तहत अपने बच्चों को स्कूल भेजते हैं कि वहां उनकी औलाद महफूज है । लेकिन कुछ स्कूलों में सेक्स कुंठित शिक्षकों की वजह से समाज का शिक्षा के इन मंदिरों पर से विश्वास दरकने लगा है , असुरक्षा की भावना घर करने लगी है, उनके अवचेतन मन में हमेशा अपने बच्चों की सुरक्षा को लेकर एक चिंता व्याप्त रहती है । अब जरूरत इस बात की है कि एक तरफ तो स्कूलों और कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में इस तरह की घटनाओं से निबटने के लिए जरूरी कदम उठाए जाएं और सरकार के कर्ताधर्ता भी मासूमों के यौन शोषण करनेवालों के खिलाफ और सख्त कानून बनाए और उसे जल्दी और सख्ती से लागू करने का मैकेनिज्म भी विकसित करे । वर्ना भगवान से उपर का दर्जा प्राप्त इन गुरुओं को शैतान का दर्जा मिलते देर नहीं लगेगी ।
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हाल के दिनों में इस तरह की बेचैन करनेवाली खबरें लगातार आने लगी हैं । प्राइमरी स्कूल से लेकर स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय तक से शिक्षकों के अपने छात्र-छात्राओं के यौन शोषण की खबरें लगातार सुर्खियां बनती रही हैं । जिस दिन केरल की अदालत में यौन शोषण के जुर्म में आरोपी को तीस साल की सजा की खबर छपी उसी दिन ये खबर भी आई कि देश के शीर्ष विश्वविद्यालयों में से एक - जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी में एक शिक्षक ने एक विदेशी छात्रा के साथ जोर-जबरदस्ती करने की कोशिश की । जब छात्रा ने इसका विरोध किया तो उक्त शिक्षक ने मामले को रफा-दफा करने की कोशिश की, लेकिन मामला पुलिस तक पहुंच गया । इसके पहले दिल्ली विश्वविद्यालय में एक दलित छात्रा के यौन शोषण के जुर्म में हिंदी विभाग के एक शिक्षक को विश्वविद्यालय ने नौकरी से हटा दिया था । दिल्ली विश्वविद्यालय के ही एक अन्य कॉलेज के एक शिक्षक पर छात्रों के यौन शोषण का आरोप लगा जिसे विश्विद्यालय की कमेटी ने सही पाया और उस केस में भी प्रोफेसर के खिलाफ कार्रवाई हुई ।
दरअसल इस तरह के मामले जब राजधानी दिल्ली या फिर कुछ बड़े शहरों में होते हैं तो मीडिया की नजरों में आ जाते हैं और फिर प्रशासन कार्रवाई को मजबूर हो जाता है । लेकिन देश के सूदूर इलाकों में शिक्षकों के इस तरह की नापाक हरकत उजागर ही नहीं हो पाते हैं और यौन शोषण की शिकार लड़कियां और बच्चियां चुप रह जाती हैं । इस देश में गुरू को भगवान या फिर उससे भी उंचा दर्जा प्राप्त है । गुरू को मां-बाप से भी ज्यादा इज्जत इस देश में बख्शी जाती है । छुटपन से ही बच्चों को यह सिखाया जाता रहा है कि – गुरु गोविंद दोउ खड़े काके लागूं पांय. बलिहारी बा गुरू की जिमि गोविंद दियो बताए । यानि कि गुरु भगवान से भी बड़ा होता है और भगवान या गुरू एक साथ खड़े हों तो पहले गुरू को प्रणाम करना चाहिए क्योंकि गुरू ही भगवान के बारे में बताते हैं । लड़कियों के मां-बाप शिक्षकों पर इसी अटूट आस्था और विश्वास के तहत अपने बच्चों को स्कूल भेजते हैं कि वहां उनकी औलाद महफूज है । लेकिन कुछ स्कूलों में सेक्स कुंठित शिक्षकों की वजह से समाज का शिक्षा के इन मंदिरों पर से विश्वास दरकने लगा है , असुरक्षा की भावना घर करने लगी है, उनके अवचेतन मन में हमेशा अपने बच्चों की सुरक्षा को लेकर एक चिंता व्याप्त रहती है । अब जरूरत इस बात की है कि एक तरफ तो स्कूलों और कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में इस तरह की घटनाओं से निबटने के लिए जरूरी कदम उठाए जाएं और सरकार के कर्ताधर्ता भी मासूमों के यौन शोषण करनेवालों के खिलाफ और सख्त कानून बनाए और उसे जल्दी और सख्ती से लागू करने का मैकेनिज्म भी विकसित करे । वर्ना भगवान से उपर का दर्जा प्राप्त इन गुरुओं को शैतान का दर्जा मिलते देर नहीं लगेगी ।
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Monday, May 3, 2010
स्त्री के विद्रोह की कहानियां
बात अस्सी के शुरुआती दशक की है । उस वक्त मैं बिहार के जमालपुर के रेलवे हाई स्कूल का छात्र था । यह वो दौर था जब टेलीविजन सूदूर शहरी और ग्रामीण इलाकों में नहीं पहुंच पाया था । खबरों के लिए हमलोग आकाशवाणी के पटना और दिल्ली केंद्र पर निर्भर रहते थे । शाम साढे़ सात बजे पटना आकाशवाणी से प्रादेशिक समाचार का प्रसारण होता था, जिसे हमारे घर में नियमित सुना जाता था । इसके अलावा रात पौने नौ बजे राष्ट्रीय समाचार आता था जिसे सुनकर हमलोग सो जाते थे । लेकिन आकाशवाणी से ज्यादा हमारा भरोसा उस वक्त बीबीसी की हिंदी प्रसारण सेवा पर था । वक्त ठीक से याद नहीं है लेकिन अगर मेरा स्मृति ठीक है तो शाम सात बजकर चालीस मिनट पर बीबीसी से हिंदी में खबरों का प्रसारण होता था । ओंकार नाथ श्रीवास्तव, रमा पांडे आदि की आवाज में खबरों का जब प्रसारण होता था तो उनके बोलने के अंदाज से खबरों में गहराई आ जाती थी । आकाशवाणी के समाचार वाचको की आवाज भी बेहद अच्छी और डिक्शन एकदम साफ होता था लेकिन बीबीसी में प्रसारण का तरीका और बैकग्राउंड म्यूजिक से प्रस्तुतिकरण जानदार हो जाती थी । तो हमारी शाम खबरों को सुनकर बीता करता था ।
बीबीसी की हिंदी सेवा से एक और रोचक याद जुड़ी हुई है । साल के अंत और नए वर्ष के शुरुआत में प्रसारण के वक्त समाचारवाचक ये ऐलान करता था कि अगर आपको बीबीसी का कैलेंडर चाहिए तो अमिक पते पर हमें लिखें । ये दिल्ली का पता होता था और पोस्ट बॉक्स नंबर लिखना होता था । मैंने भी जब इसको सुना तो सोचा क्यों ना एक पोस्टकार्ड लिख दिया जाए । उस वक्त पोस्टकार्ड पांच पैसे का आता था । मैंने बेहद विनम्रता से कैलेंडर भेजने का अनुरोध पत्र बीबीसी के बताए पते पर भेज दिया । लगभग दस दिनों के बाद ए फोर साइज के एक खूबसूरत लिफाफा मेरे पते पर आया जिसमें प्रेषक की जगह बीबीसी हिंदी सेवा का नाम लिखा था । जब मैं स्कूल से लौटा तो अपने कमरे में वो लिफाफा देखकर बेहद खुश हुआ । जल्दबाजी में उसे खोला तो एकदम चमकदार कागज पर एक पन्ने का कैलेंडर था । उपर एक ग्रुप फोटो था जिसमें बीबीसी हिंदी सेवा से जुड़े लोगों की तस्वीर थी । लगभग तीन दशक बाद स्मृति में अब दो ही नाम हैं- ओंकार नाथ श्रीवास्तव और रमा पांडे । तत्काल लिफाफे से निकालकर उसे स्टडी टेबल के सामने लगा लिया । लेकिन फिर एक खुराफात सूझा कि अगर एक पांच पैसे के पोस्टकॉर्ड भेजने पर इतने खूबसूरत कागज पर छपा कैलेंडर मिल सकता है तो क्यों ना कुछ और अनुरोध पत्र भेजकर और कैलेंडर मंगवा लिए जाएं और दोस्तों में बांटकर रौब गालिब किया जाए । फिर तो मुझे याद है कि अपने परिवार के हर व्यक्ति के नाम से अनुरोध पत्र बीबीसी हिंदी सेवा को भेज दिया । चूंकि अनुरोध पत्र एक साथ नहीं भेजकर थोड़े अंतराल पर भेजा था इसलिए उसी हिसाब से कुछ अंतराल के बाद कैलेंडर मिलने शुरू हो गए । पहले तो डाकिया भी चौंका कि हर एक दो दिन बाद लंदन के पते से मेरे घर क्या आ रहा है । दबी जुबान से वो ये दरियाफ्त भी करने की कोशिश करने लगा कि इस लिफाफे में होता क्या है । एक दिन मैंने उसकी जिज्ञासा खत्म करते हुए उसके सामने ही लिफाफा कोलकर उपहार स्वरूप वो कैलेंडर उसे ही दे दिया । अब तो ये हर साल का नियम सा बन गया था ।
कैलेंडर में चश्मा लगाए ओंकार नाथ श्रीवास्तव और बेहद खूबसूरत रमा पांडे अपने बोलने के अंदाज की वजह से भी याद हैं । अभी जब मित्र जयप्रकाश पांडे ने बताया कि रमा पांडे के कथा संग्रह की डीवीडी लंदन के नेहरू ऑडिटोरियम में जारी हुई है तो मैं चौंका, कहानी संग्रह की डीवीडी । बातों –बातों में ही जय प्रकाश जी ने यह भी बताया कि रमा पांडे गायिका इला अरुण और पियूष पांडे की बहन हैं । बात आई गई हो गई । लेकिन अभी कुछ दिनों पहले किसी रेफरेंस के लिए एक किताब ढूंढने में जुटा था तो अचानक फैसले पर नजर गई । लेखिका रमा पांडे थी और दिल्ली के मंजुलिका प्रकाशन से छपी थी किताब । उसे निकालकर अलग रख लिया । फिर उसे पढ़ना शुरू किया । स्त्री विमर्श के इस दौर में पिछले वर्ष प्रकाशित इस किताब की साहित्य जगत में नोटिस ली जानी थी लेकिन अफसोस कि हिंदी के कर्ताधर्ताओं की नजर इस अहम किताब पर नहीं गई । मुस्लिम महिलाओं को केंद्र में रखकर लिखी गई कहानियां इनके संघर्ष और वयवस्था के खिलाफ उठ खडे़ होने की कहानी है । रमा पांडे बहुआयामी प्रतिभा की धनी हैं । वो देश की पहली महिला प्रोड्यूसर हैं जिन्होंने लंबे अरसे तक दूरदर्शन के लिए काम करते हुए अपनी प्रतिभा की छाप छोड़ी ।
जैसा कि मैंने उपर बताया कि फैसले देश की मुस्लिम महिलाओं की संघर्ष की दास्तां है । इसकी एक कहानी दौड़ती हिरणी की नायिका रमा पांडे की दोस्त है । रमा पांडे बताती हैं कि स्कूल के दिनों में राबिया उनकी दोस्त थी और बेहद प्रतिभाशली एथलीट थी । लेकिन नवी कक्षा में जाते ही राबिया के परिवारवालों ने उसके खेल में भाग लेने पर इसलिए रोक लगा दी क्योंकि वो राबिया का निकाह करना चाहते थे । रमा पांडे तो जब इस बात का पता चला तो उसने राबिया की अम्मी से ये बात करने की कोशिश की लेकिन उसके हाथ नाकामी लगी । राबिया के परिवारवाले टस से मस होने को तैयार नहीं थे और परिवार के दबाव में राबिया कोई भी कदम उठाने को तैयार नहीं थी । जब रमा ने उसे अपने पांव पर खड़े होने की सलाह दी तो उसका जबाव था – जब दौड़ नहीं सकती तो अपने पांव पर क्या खडी होउंगी । लेकिन फिर भी राबिया ने हौसला नहीं छोड़ा और राष्ट्रीय खेल में भाग लिया । कई वर्षों तक रमा और राबिया नहीं मिले । लेकिन वर्षों बाद जब वो मिले तो राबिया की उम्र बयालीस की हो चुकी थी और उसने शादी नहीं करने का फैसला कर लिया था । यह एक ऐसी लड़की का विद्रोह था जो एक पारंपरिक मुस्लिम परिवार से आती थी । लेखिका पर इस बात का गहरा असर पड़ा और दौड़ती हिरणी इसी असर के परिणामस्वरूप सामने आया । फैसले में और भी कई कहानियां हैं जिसे लेखिका ने बेहद करीब से इपनी आंखों के सामने घटते हुए देखा है । चाहे वो उनके खुद के रिश्तेदार कू पैरा-जंपर से एक स्कूल के हेडमिस्ट्रेस बनने की कहानी हो या फिर हैदराबाद की शाइस्ता की कहानी हो । फैसले संग्रह की अमूनन सारी कहानियां यथार्थ का चित्रण हैं । इस कहानी संग्रह में जो एक बात रेखांकित की जा सकती है वो है नायिकाओं का समाज और वयवस्था के प्रति विद्रोह । रमा पांडे की भाषा में शास्त्रीयता नहीं है जो इसे बोझिल बनाने की बजाए पठनीय बनाती है । स्त्री विमर्श के झंडाबरदारों के लिए रमा की कहानियां एक चुनौती की तरह हैं और मुजे लगता है कि देर सबेर उन्हें इस संग्रह का नोटिस लेना ही पड़ेगा ।
बीबीसी की हिंदी सेवा से एक और रोचक याद जुड़ी हुई है । साल के अंत और नए वर्ष के शुरुआत में प्रसारण के वक्त समाचारवाचक ये ऐलान करता था कि अगर आपको बीबीसी का कैलेंडर चाहिए तो अमिक पते पर हमें लिखें । ये दिल्ली का पता होता था और पोस्ट बॉक्स नंबर लिखना होता था । मैंने भी जब इसको सुना तो सोचा क्यों ना एक पोस्टकार्ड लिख दिया जाए । उस वक्त पोस्टकार्ड पांच पैसे का आता था । मैंने बेहद विनम्रता से कैलेंडर भेजने का अनुरोध पत्र बीबीसी के बताए पते पर भेज दिया । लगभग दस दिनों के बाद ए फोर साइज के एक खूबसूरत लिफाफा मेरे पते पर आया जिसमें प्रेषक की जगह बीबीसी हिंदी सेवा का नाम लिखा था । जब मैं स्कूल से लौटा तो अपने कमरे में वो लिफाफा देखकर बेहद खुश हुआ । जल्दबाजी में उसे खोला तो एकदम चमकदार कागज पर एक पन्ने का कैलेंडर था । उपर एक ग्रुप फोटो था जिसमें बीबीसी हिंदी सेवा से जुड़े लोगों की तस्वीर थी । लगभग तीन दशक बाद स्मृति में अब दो ही नाम हैं- ओंकार नाथ श्रीवास्तव और रमा पांडे । तत्काल लिफाफे से निकालकर उसे स्टडी टेबल के सामने लगा लिया । लेकिन फिर एक खुराफात सूझा कि अगर एक पांच पैसे के पोस्टकॉर्ड भेजने पर इतने खूबसूरत कागज पर छपा कैलेंडर मिल सकता है तो क्यों ना कुछ और अनुरोध पत्र भेजकर और कैलेंडर मंगवा लिए जाएं और दोस्तों में बांटकर रौब गालिब किया जाए । फिर तो मुझे याद है कि अपने परिवार के हर व्यक्ति के नाम से अनुरोध पत्र बीबीसी हिंदी सेवा को भेज दिया । चूंकि अनुरोध पत्र एक साथ नहीं भेजकर थोड़े अंतराल पर भेजा था इसलिए उसी हिसाब से कुछ अंतराल के बाद कैलेंडर मिलने शुरू हो गए । पहले तो डाकिया भी चौंका कि हर एक दो दिन बाद लंदन के पते से मेरे घर क्या आ रहा है । दबी जुबान से वो ये दरियाफ्त भी करने की कोशिश करने लगा कि इस लिफाफे में होता क्या है । एक दिन मैंने उसकी जिज्ञासा खत्म करते हुए उसके सामने ही लिफाफा कोलकर उपहार स्वरूप वो कैलेंडर उसे ही दे दिया । अब तो ये हर साल का नियम सा बन गया था ।
कैलेंडर में चश्मा लगाए ओंकार नाथ श्रीवास्तव और बेहद खूबसूरत रमा पांडे अपने बोलने के अंदाज की वजह से भी याद हैं । अभी जब मित्र जयप्रकाश पांडे ने बताया कि रमा पांडे के कथा संग्रह की डीवीडी लंदन के नेहरू ऑडिटोरियम में जारी हुई है तो मैं चौंका, कहानी संग्रह की डीवीडी । बातों –बातों में ही जय प्रकाश जी ने यह भी बताया कि रमा पांडे गायिका इला अरुण और पियूष पांडे की बहन हैं । बात आई गई हो गई । लेकिन अभी कुछ दिनों पहले किसी रेफरेंस के लिए एक किताब ढूंढने में जुटा था तो अचानक फैसले पर नजर गई । लेखिका रमा पांडे थी और दिल्ली के मंजुलिका प्रकाशन से छपी थी किताब । उसे निकालकर अलग रख लिया । फिर उसे पढ़ना शुरू किया । स्त्री विमर्श के इस दौर में पिछले वर्ष प्रकाशित इस किताब की साहित्य जगत में नोटिस ली जानी थी लेकिन अफसोस कि हिंदी के कर्ताधर्ताओं की नजर इस अहम किताब पर नहीं गई । मुस्लिम महिलाओं को केंद्र में रखकर लिखी गई कहानियां इनके संघर्ष और वयवस्था के खिलाफ उठ खडे़ होने की कहानी है । रमा पांडे बहुआयामी प्रतिभा की धनी हैं । वो देश की पहली महिला प्रोड्यूसर हैं जिन्होंने लंबे अरसे तक दूरदर्शन के लिए काम करते हुए अपनी प्रतिभा की छाप छोड़ी ।
जैसा कि मैंने उपर बताया कि फैसले देश की मुस्लिम महिलाओं की संघर्ष की दास्तां है । इसकी एक कहानी दौड़ती हिरणी की नायिका रमा पांडे की दोस्त है । रमा पांडे बताती हैं कि स्कूल के दिनों में राबिया उनकी दोस्त थी और बेहद प्रतिभाशली एथलीट थी । लेकिन नवी कक्षा में जाते ही राबिया के परिवारवालों ने उसके खेल में भाग लेने पर इसलिए रोक लगा दी क्योंकि वो राबिया का निकाह करना चाहते थे । रमा पांडे तो जब इस बात का पता चला तो उसने राबिया की अम्मी से ये बात करने की कोशिश की लेकिन उसके हाथ नाकामी लगी । राबिया के परिवारवाले टस से मस होने को तैयार नहीं थे और परिवार के दबाव में राबिया कोई भी कदम उठाने को तैयार नहीं थी । जब रमा ने उसे अपने पांव पर खड़े होने की सलाह दी तो उसका जबाव था – जब दौड़ नहीं सकती तो अपने पांव पर क्या खडी होउंगी । लेकिन फिर भी राबिया ने हौसला नहीं छोड़ा और राष्ट्रीय खेल में भाग लिया । कई वर्षों तक रमा और राबिया नहीं मिले । लेकिन वर्षों बाद जब वो मिले तो राबिया की उम्र बयालीस की हो चुकी थी और उसने शादी नहीं करने का फैसला कर लिया था । यह एक ऐसी लड़की का विद्रोह था जो एक पारंपरिक मुस्लिम परिवार से आती थी । लेखिका पर इस बात का गहरा असर पड़ा और दौड़ती हिरणी इसी असर के परिणामस्वरूप सामने आया । फैसले में और भी कई कहानियां हैं जिसे लेखिका ने बेहद करीब से इपनी आंखों के सामने घटते हुए देखा है । चाहे वो उनके खुद के रिश्तेदार कू पैरा-जंपर से एक स्कूल के हेडमिस्ट्रेस बनने की कहानी हो या फिर हैदराबाद की शाइस्ता की कहानी हो । फैसले संग्रह की अमूनन सारी कहानियां यथार्थ का चित्रण हैं । इस कहानी संग्रह में जो एक बात रेखांकित की जा सकती है वो है नायिकाओं का समाज और वयवस्था के प्रति विद्रोह । रमा पांडे की भाषा में शास्त्रीयता नहीं है जो इसे बोझिल बनाने की बजाए पठनीय बनाती है । स्त्री विमर्श के झंडाबरदारों के लिए रमा की कहानियां एक चुनौती की तरह हैं और मुजे लगता है कि देर सबेर उन्हें इस संग्रह का नोटिस लेना ही पड़ेगा ।
Wednesday, April 21, 2010
आईपीएल में गुम बीपीएल
देशभर में इस वक्त आईपीएल और उसमें लगे हजारों करोड़ पर बात हो रही है । इस बात पर बहस जारी खेल में इतना पैसा कहां से आ रहा है । संसद में भी इस बात पर ही हंगामा हो रहा है कि इंडियन प्रीमियर लीग में हो रहे तथाकथित भ्रष्टाचार और काले धन के निवेश से कैसे निबटा जाए । तमाम दलों के नेता बीजेपी से लेकर वामपंथी तक, आरजेडी से लेकर समाजवादी पार्टी तक इतना शोर मचा रहे हैं गोया ये देश पर आया सबसे बड़ा संकट हो और अगर सरकार इस संकट से जल्द नहीं निपटती है तो देश का बेड़ा गर्क हो जाएगा । कांग्रेस पार्टी भी अपने सबसे काबिल और अनुभवी मंत्री प्रणब मुखर्जी को इस मोर्चे पर तैनात कर चुकी है । सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री समेत कांग्रेस के तमाम दिग्गज रविवार को इस मसले पर दो घंटे तक माथापच्ची कर चुके हैं । लेकिन फटाफटा क्रिकेट पर मचे इस कोलाहल के बीच एक ऐसी अहम खबर आई जो इस शोरगुल में दबकर रह गई । रविवार को खबर आई कि भारत में गरीबों की संख्या में दो हजार चार की तुलना में तकरीबन दस करोड़ का इजाफा हुआ है । दो हजार चार में भारत में भारत में गरीबी की दर कुल जनसंख्या की साढे सत्ताइस फीसदी थी जो अब बढ़कर सैंतीस फीसदी से ज्यादा हो गई है । गरीबी दर में छह साल में लगभग दस फीसदी का इजाफा इस देश के लिए बड़ी चिंता की बात है । लेकिन इस खबर पर ना तो कहीं चर्चा हुई और ना ही मीडिया में इसे तवज्जो मिली । सोमवार को संसद में पूरी ताकत से विरोध दर्ज करनेवाले विरोधी दल के सांसदों को देश में बढ़ रही गरीबी और गरीबों की चिंता कहां हैं । गरीबों और पिछड़ों की राजनीति करनेवाले लालू मुलायम शरद यादव को भी आईपीएल में जारी कथित भ्रष्टाचार देश के सामने बड़ी समस्या नजर आ रही है । गरीबी के इस बढ़ते दानव पर लगाम लगाने में इन नेताओं की रुचि हो ऐसा दिखता नहीं है ।
संयुक्त राष्ट्र के एक अनुमान के मुताबिक भारत में लगभग चालीस करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे अपना जीवन बसर करते हैं जो कि पिछले साल के अनुमान से लगभग दस करोड़ ज्यादा है । इस अनुमान की गणना का आधार किसी भी वयक्ति की दैनिक आय है । संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के मुताबिक भारत में तकरीबन चालीस करोड़ लोगों की दैनिक आय साठ रुपये या इससे कम है । अगर इस अनुमान को सही मानें तो पूरे विश्व में गरीबों की कुल संख्या का एक तिहाई हिस्सा भारत में बसती है जिसकी प्रतिदिन आय सौ रुपये या इससे कम है । मनमोहन सिंह की सरकार निकट भविष्य फूड सेक्युरिटी बिल लाने जा रही है । सोनिया गांधी की सलाह पर इस बिल में कुछ तब्दीलियां की जा रही है । लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि यूपीए सरकार की प्राथमिकता ये बिल कुछ नीचे है । ना तो संसद के अंदर और ना ही संसद के बाहर इस पर बहस हो रही है, जो हमारे लिए चिंता का सबब है । हलांकि सोनिया गांधी के अनुरोध या निर्देश के बाद सरकार हरकत में आई है और इस बिल में गरीबों, महिलाओं के दायरे को विस्तृत करने की कवायद चल रही है । लेकिन सवाल यह उठता है कि जब हम विश्व महाशक्ति होने का सपना देख रहे हों, तकनीक और अंतरिक्ष में लंबी उड़ान के लिए तैयार कर रहे हों ऐसे में देश में गरीबों की संख्या में बढ़ोतरी हमारे महाशक्ति बनने के सपने पर ग्रहण लगा सकती है । जरूरत इस बात की भी है कि उद्योग और उद्योगपतियों के लिए रियायतों का पिटारा खोल देने में सरकार जिस उदारता का परिचय देती है वो सहृदयता या उदारता गरीबी से निपटने में दिखाई नहीं देती । किसी जमाने में गरीबी हटाओ का नारा देकर इंदिरा गांधी ने सत्ता हासिल की थी । दशकों बाद आम आदमी के साथ होने का दावा कर कांग्रेस फिर से सत्ता में आई । अब वक्त आ गया है कि सरकार अगर समय रहते चेत जाए नहीं तो गरीबी एक ऐसी विकराल समस्या बनकर देश के सामने खड़ी हो जाएगी जिसका बहुत ही दूरगामी असर होगा ।
संयुक्त राष्ट्र के एक अनुमान के मुताबिक भारत में लगभग चालीस करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे अपना जीवन बसर करते हैं जो कि पिछले साल के अनुमान से लगभग दस करोड़ ज्यादा है । इस अनुमान की गणना का आधार किसी भी वयक्ति की दैनिक आय है । संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के मुताबिक भारत में तकरीबन चालीस करोड़ लोगों की दैनिक आय साठ रुपये या इससे कम है । अगर इस अनुमान को सही मानें तो पूरे विश्व में गरीबों की कुल संख्या का एक तिहाई हिस्सा भारत में बसती है जिसकी प्रतिदिन आय सौ रुपये या इससे कम है । मनमोहन सिंह की सरकार निकट भविष्य फूड सेक्युरिटी बिल लाने जा रही है । सोनिया गांधी की सलाह पर इस बिल में कुछ तब्दीलियां की जा रही है । लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि यूपीए सरकार की प्राथमिकता ये बिल कुछ नीचे है । ना तो संसद के अंदर और ना ही संसद के बाहर इस पर बहस हो रही है, जो हमारे लिए चिंता का सबब है । हलांकि सोनिया गांधी के अनुरोध या निर्देश के बाद सरकार हरकत में आई है और इस बिल में गरीबों, महिलाओं के दायरे को विस्तृत करने की कवायद चल रही है । लेकिन सवाल यह उठता है कि जब हम विश्व महाशक्ति होने का सपना देख रहे हों, तकनीक और अंतरिक्ष में लंबी उड़ान के लिए तैयार कर रहे हों ऐसे में देश में गरीबों की संख्या में बढ़ोतरी हमारे महाशक्ति बनने के सपने पर ग्रहण लगा सकती है । जरूरत इस बात की भी है कि उद्योग और उद्योगपतियों के लिए रियायतों का पिटारा खोल देने में सरकार जिस उदारता का परिचय देती है वो सहृदयता या उदारता गरीबी से निपटने में दिखाई नहीं देती । किसी जमाने में गरीबी हटाओ का नारा देकर इंदिरा गांधी ने सत्ता हासिल की थी । दशकों बाद आम आदमी के साथ होने का दावा कर कांग्रेस फिर से सत्ता में आई । अब वक्त आ गया है कि सरकार अगर समय रहते चेत जाए नहीं तो गरीबी एक ऐसी विकराल समस्या बनकर देश के सामने खड़ी हो जाएगी जिसका बहुत ही दूरगामी असर होगा ।
Monday, April 12, 2010
जज, जस्टिस और भ्रष्टाचार
भ्रष्टाचार के आरोप में महाभियोग की प्रक्रिया झेल रहे कर्नाटक हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस पी डी दिनाकरन ने सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम को आईना दिखा दिया है । उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली जजों की कमिटी की लंबी छुट्टी पर जाने की सलाह ठुकरा दी । सरकारी भूमि पर अवैध कब्जे और अपने पद के दुरुपयोग के आरोप में महाभियोग की प्रक्रिया झेल रहे जस्टिस दिनाकरन लंबे समय से न्यायिक कामकाज नहीं देख रहे थे वो सिर्फ कर्नाटक हाई कोर्ट का प्रशासनिक कामकाज संभाल रहे थे । महाभियोग का आरोप झेल रहे जस्टिस के प्रशासनिक कामकाज संभालने पर उनके ही एक साथी जज ने अपनी नाराजगी का खुले आम इंतजार किया था । इस असमंजस की हालत में न्यायमूर्ति दिनाकरन को उनके पद से हटाने की कवायद काफी देर से शुरू की गई । काफी समय बाद शुरू की गई इस कोशिश के तहत सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम ने जस्टिस दिनाकरन को लंबी छुट्टी पर जाने की सलाह दी थी और उनकी जगह दिल्ली उच्च न्यायालय के जस्टिस मदन लोकुर को वहां का कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया था। लेकिन कॉलेजियम की इस सलाह को जस्टिस दिनाकरन के ठुकराने के बाद उनका तबादला सिक्किम हाई कोर्ट कर दिया गया है ।
अगर हम कानूनी बारिकियों को देखें तो किसी भी उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश या न्यायमूर्ति लंबी छुट्टी पर जाने के कॉलेजियम की सलाह को मानने के लिए बाध्य नहीं है । लेकिन न्यायिक परंपरा के मुताबिक उच्च न्यायालय के जस्टिस कॉलेजियम की सलाह को आमतौर पर ठुकराते नहीं हैं । लेकिन दिनाकरन के इस कदम के बाद एक बार फिर से न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने की प्रक्रिया की खामियां और उसकी सीमाएं दोनों उजागर हो गई हैं ।
कानून मंत्री वीरप्पा मोइली ने सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश के जी बालाकृष्णन की अध्यक्षता वाली जजों वाली समिति की सलाह मानने से जस्टिस दिनाकरन के इंकार के बारे में पूछे जाने पर कहा था कोई जज भी कानून से उपर नहीं है । दरअसल यह पूरा मामला बेहद ही पेचीदा है । संविधान के अनुच्छेद दो सौ तेइस,जिसका हवाला कानून मंत्री दे रहे हैं, के मुताबिक – जब किसी हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश का पद रिक्त है या जब ऐसा मुख्य न्यायाधीश की अनुपस्थिति के कारण वह अपने पद के कर्तव्यों का पालन करने में असमर्थ है तब कोर्ट के अन्य जजों में से एक जज जिसे राष्ट्रपति इस प्रयोजन के लिए नियुक्त कर, उस पद के कर्तव्यों का पालन करेगा । लेकिन स्वतंत्र भारत न्यायिक इतिहास में ऐसा कोई मौका अबतक आया नहीं जबतक हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के रहते किसी और को उसी न्यायलय में कार्यकारी मुख्य न्यायधीश बनाया जाए । लेकिन ऐसी नौबत आई नहीं और दिनाकरन को सिक्किम भेज दिया गया ।
जस्टिस दिनाकरन के इस तबादले ने एक बार फिर से कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं । सवाल यह उठता है कि अगर कोई न्यायाधीश एक हाईकोर्ट में न्यायिक जिम्मेदारी निभाने के लायक नहीं हैं तो वो दूसरे हाईकोर्ट में उन्ही जिम्मेदारियों को कैसे निभा सकते हैं । अगर जस्टिस दिनाकरन पर भ्रष्टाचार के इल्जाम हैं और वो कर्नाटक हाईकोर्ट में न्यायिक जिम्मेदारियों का निर्वहन नहीं कर सकते हैं तो सिक्किम उच्च न्यायालय में अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों का निर्वहन बगैर किसी लाभ-लोभ के कैसे कर सकते हैं । ये कुछ ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब किसी के पास नहीं है । ना तो सरकार के पास और ना ही कॉलेजियम के पास ।
इसके पहले भी जब पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट की जस्टिस निर्मल यादव पर आरोप लगे थे तो उन्हें कॉलेजियम ने लंबी छुट्टी पर भेज दिया था और जब मामला शांत हुआ तो उनका तबादला पंजाब हरियाणा हाई कोर्ट से उत्तरांचल हाईकोर्ट कर दिया गया । इसी तरह जब जनवरी दो हजार सात में गुजरात हाईकोर्ट के जस्टिस पी बी मजुमदार ने अपने ही साथी जस्टिस बी जे सेठना पर बदतमीजी का आरोप लगाया था तो जस्टिस बी जे सेठना का तबादला सिक्किम और पी बी मजुमदार का तबादला राजस्थान कर दिया गया था । हलांकि तब न्यायमूर्ति सेठना ने सिक्किम जाने से इंकार करते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया था ।
ये कुछ ऐसे उदाहरण है जो भारतीय न्यायिक प्रक्रिया में भ्रष्टाचार के मामलों को निबटने की कमियों की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट करते हैं । हमारे यहां सुप्रीम कोर्ट का प्रधान न्यायधीश देश की न्यायिक व्यवस्था का प्रशासनिक मुखिया होता है । वो जजों का तबादला तो कर सकता है लेकिन हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों को सिर्फ और सिर्फ महाभियोग के जरिए ही हटाया जा सकता है । लेकिन संविधान के मुताबिक महाभियोग की प्रक्रिया बेहद जटिल है और उसका अंजाम तक पहुंचना अत्यंत मुश्किल है । जस्टिस रमास्वामी के मामले में पूरा देश इस जटिल प्रक्रिया को देख चुका है । जस्टिस दिनाकरन के खिलाफ भी महाभियोग की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और राज्यसभा के सभापति की मंजूरी के बाद सुप्रीम कोर्ट के जज वी एस सिरपुकर की अध्यक्षता में तीन सदस्यों की कमेटी इस बारे में तथ्यों की पड़ताल करेगी । न्यायिक इतिहास में यह तीसरा मौका है जब किसी भी जज के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू की गई है । इसके पहले जस्टिस वी रामास्वामी के खिलाफ संसद में महाभियोग की प्रक्रिया चली थी लेकिन कांग्रेस के सांसदों के सदन से वॉक आउट करने के बाद ये प्रस्ताव गिर गया था ।
दूसरी ओर हाल के दिनों में सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम के क्रियाकलापों पर भी सवाल खड़े हुए हैं । दिल्ली उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायधीश न्यायमूर्ति ए पी शाह को सुप्रीम कोर्ट में प्रोन्नति ना दिए जाने के कॉलेजियम के फैसले पर प्रश्नचिन्ह लगा था । जस्टिस शाह की छवि बेदाग थी और ये माना जा रहा था कि उनको सुप्रीम कोर्ट का जज बनाया जाएगा । लेकिन मीडिया में ऐसी खबरें आई कि सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस के जी बालाकृष्णनन की अध्यक्षता वाली कॉलेजियम के एक सदस्य जस्टिस शाह के प्रोन्नति के खिलाफ थे, इस वजह से उनका सुप्रीम कोर्ट का जज बनना संभव नहीं हो सका ।
मेरा मानना है कि देश की सवा सौ करोड़ जनता का देश की न्यायिक प्रक्रिया और न्यायाधीशों पर अटूट विश्वास है । जब किसी एक न्यायधीश के आचरण की वजह से अदालत और अदालत की मर्यादा को ठेस पहुंचती है तो सवा सौ करोड़ लोगों के विश्वास को भी ठेस पहुंचाती है । हमारा मानना है कि जनता के इस विश्वास की रक्षा हर हाल में की जानी चाहिए । इस विश्वास की रक्षा तभी हो सकती है जब हाईकोर्ट के जजों की नियुक्ति प्रक्रिया पारदर्शी हो और उसका एक तय स्वरूप हो । इसके लिए सरकार को पर्याप्त इच्छाशक्ति दिखानी होगी । सालों से ज्यूडिशियल स्टैंर्ड और अकाउंटिबिलिटी बिल पर बहस चल रही है लेकिन किसी नतीजे पर नहीं पहुंचा जा सका है । अब वक्त आ गया है कि इस बिल में अपेक्षित बदलाव करके संसद में पेश किया जाए और जल्लद से जल्द कानून बनाकर न्यायपालिका की साख को बचाया जाए ।
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अगर हम कानूनी बारिकियों को देखें तो किसी भी उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश या न्यायमूर्ति लंबी छुट्टी पर जाने के कॉलेजियम की सलाह को मानने के लिए बाध्य नहीं है । लेकिन न्यायिक परंपरा के मुताबिक उच्च न्यायालय के जस्टिस कॉलेजियम की सलाह को आमतौर पर ठुकराते नहीं हैं । लेकिन दिनाकरन के इस कदम के बाद एक बार फिर से न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने की प्रक्रिया की खामियां और उसकी सीमाएं दोनों उजागर हो गई हैं ।
कानून मंत्री वीरप्पा मोइली ने सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश के जी बालाकृष्णन की अध्यक्षता वाली जजों वाली समिति की सलाह मानने से जस्टिस दिनाकरन के इंकार के बारे में पूछे जाने पर कहा था कोई जज भी कानून से उपर नहीं है । दरअसल यह पूरा मामला बेहद ही पेचीदा है । संविधान के अनुच्छेद दो सौ तेइस,जिसका हवाला कानून मंत्री दे रहे हैं, के मुताबिक – जब किसी हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश का पद रिक्त है या जब ऐसा मुख्य न्यायाधीश की अनुपस्थिति के कारण वह अपने पद के कर्तव्यों का पालन करने में असमर्थ है तब कोर्ट के अन्य जजों में से एक जज जिसे राष्ट्रपति इस प्रयोजन के लिए नियुक्त कर, उस पद के कर्तव्यों का पालन करेगा । लेकिन स्वतंत्र भारत न्यायिक इतिहास में ऐसा कोई मौका अबतक आया नहीं जबतक हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के रहते किसी और को उसी न्यायलय में कार्यकारी मुख्य न्यायधीश बनाया जाए । लेकिन ऐसी नौबत आई नहीं और दिनाकरन को सिक्किम भेज दिया गया ।
जस्टिस दिनाकरन के इस तबादले ने एक बार फिर से कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं । सवाल यह उठता है कि अगर कोई न्यायाधीश एक हाईकोर्ट में न्यायिक जिम्मेदारी निभाने के लायक नहीं हैं तो वो दूसरे हाईकोर्ट में उन्ही जिम्मेदारियों को कैसे निभा सकते हैं । अगर जस्टिस दिनाकरन पर भ्रष्टाचार के इल्जाम हैं और वो कर्नाटक हाईकोर्ट में न्यायिक जिम्मेदारियों का निर्वहन नहीं कर सकते हैं तो सिक्किम उच्च न्यायालय में अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों का निर्वहन बगैर किसी लाभ-लोभ के कैसे कर सकते हैं । ये कुछ ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब किसी के पास नहीं है । ना तो सरकार के पास और ना ही कॉलेजियम के पास ।
इसके पहले भी जब पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट की जस्टिस निर्मल यादव पर आरोप लगे थे तो उन्हें कॉलेजियम ने लंबी छुट्टी पर भेज दिया था और जब मामला शांत हुआ तो उनका तबादला पंजाब हरियाणा हाई कोर्ट से उत्तरांचल हाईकोर्ट कर दिया गया । इसी तरह जब जनवरी दो हजार सात में गुजरात हाईकोर्ट के जस्टिस पी बी मजुमदार ने अपने ही साथी जस्टिस बी जे सेठना पर बदतमीजी का आरोप लगाया था तो जस्टिस बी जे सेठना का तबादला सिक्किम और पी बी मजुमदार का तबादला राजस्थान कर दिया गया था । हलांकि तब न्यायमूर्ति सेठना ने सिक्किम जाने से इंकार करते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया था ।
ये कुछ ऐसे उदाहरण है जो भारतीय न्यायिक प्रक्रिया में भ्रष्टाचार के मामलों को निबटने की कमियों की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट करते हैं । हमारे यहां सुप्रीम कोर्ट का प्रधान न्यायधीश देश की न्यायिक व्यवस्था का प्रशासनिक मुखिया होता है । वो जजों का तबादला तो कर सकता है लेकिन हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों को सिर्फ और सिर्फ महाभियोग के जरिए ही हटाया जा सकता है । लेकिन संविधान के मुताबिक महाभियोग की प्रक्रिया बेहद जटिल है और उसका अंजाम तक पहुंचना अत्यंत मुश्किल है । जस्टिस रमास्वामी के मामले में पूरा देश इस जटिल प्रक्रिया को देख चुका है । जस्टिस दिनाकरन के खिलाफ भी महाभियोग की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और राज्यसभा के सभापति की मंजूरी के बाद सुप्रीम कोर्ट के जज वी एस सिरपुकर की अध्यक्षता में तीन सदस्यों की कमेटी इस बारे में तथ्यों की पड़ताल करेगी । न्यायिक इतिहास में यह तीसरा मौका है जब किसी भी जज के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू की गई है । इसके पहले जस्टिस वी रामास्वामी के खिलाफ संसद में महाभियोग की प्रक्रिया चली थी लेकिन कांग्रेस के सांसदों के सदन से वॉक आउट करने के बाद ये प्रस्ताव गिर गया था ।
दूसरी ओर हाल के दिनों में सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम के क्रियाकलापों पर भी सवाल खड़े हुए हैं । दिल्ली उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायधीश न्यायमूर्ति ए पी शाह को सुप्रीम कोर्ट में प्रोन्नति ना दिए जाने के कॉलेजियम के फैसले पर प्रश्नचिन्ह लगा था । जस्टिस शाह की छवि बेदाग थी और ये माना जा रहा था कि उनको सुप्रीम कोर्ट का जज बनाया जाएगा । लेकिन मीडिया में ऐसी खबरें आई कि सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस के जी बालाकृष्णनन की अध्यक्षता वाली कॉलेजियम के एक सदस्य जस्टिस शाह के प्रोन्नति के खिलाफ थे, इस वजह से उनका सुप्रीम कोर्ट का जज बनना संभव नहीं हो सका ।
मेरा मानना है कि देश की सवा सौ करोड़ जनता का देश की न्यायिक प्रक्रिया और न्यायाधीशों पर अटूट विश्वास है । जब किसी एक न्यायधीश के आचरण की वजह से अदालत और अदालत की मर्यादा को ठेस पहुंचती है तो सवा सौ करोड़ लोगों के विश्वास को भी ठेस पहुंचाती है । हमारा मानना है कि जनता के इस विश्वास की रक्षा हर हाल में की जानी चाहिए । इस विश्वास की रक्षा तभी हो सकती है जब हाईकोर्ट के जजों की नियुक्ति प्रक्रिया पारदर्शी हो और उसका एक तय स्वरूप हो । इसके लिए सरकार को पर्याप्त इच्छाशक्ति दिखानी होगी । सालों से ज्यूडिशियल स्टैंर्ड और अकाउंटिबिलिटी बिल पर बहस चल रही है लेकिन किसी नतीजे पर नहीं पहुंचा जा सका है । अब वक्त आ गया है कि इस बिल में अपेक्षित बदलाव करके संसद में पेश किया जाए और जल्लद से जल्द कानून बनाकर न्यायपालिका की साख को बचाया जाए ।
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Monday, April 5, 2010
अनुवाद से जगती उम्मीदें
हिंदी में अनुवाद की हालत बेहद खराब है । जो अनुवाद हो भी रहे हैं वो बहुधा स्तरीय नहीं होते हैं । अनुवाद इस तरह से किए जाते हैं कि मूल लेखन की आत्मा कराह उठती है । हिंदी के लेखकों में अनुवाद को लेकर बहुत उत्साह भी नहीं है । अमूनन अनुवाद में लेखक तभी जुटते हैं जब उनके पास या तो काम कम होता है या नहीं होता है । जैसे ही काम मिलता है अनुवाद को लेकर वो उदासीन हो जाते हैं । इसलिए हिंदी में अनुवाद एक विधा के रूप में विकसित नहीं पाई और अनुवादक को उचित सम्मान नहीं मिल पाया । नतीजा यह हुआ कि अन्य भारतीय भाषाओं से हिंदी में अनुवाद नहीं हो पाया और हिंदी के पाठक का परिचय विश्व की अन्यतम कृति से नहीं हो पाया ।
लेकिन अभी हाल के दिनों में हॉर्पर कालिन्स पब्लिकेशंस और पेंग्विन बुक्स ने भारतीय अंग्रेजी लेखकों के अलावा विश्व के अन्य भाषाओं की कृतियों का अनुवाद हिंदी में प्रकाशित करना शुरू किया है । यह एक स्वागत योग्य कदम है । हॉर्पर कालिन्स से अभी अद्वैत काला के उपन्यास ऑलमोस्ट सिंगल का अनुवाद मनीषा तनेजा ने किया है । लगभग तीन सौ पन्नों का उपन्यास बेहतरीन अनुवाद का एक नमूना है । मनीषा तनेजा दिल्ली विश्वविद्यालय में स्पेनिश पढ़ाती हैं और इसके पहले भी गैबरील गारसिया मारक्वैज का उपन्यास एकाकीपन के सौ साल और पॉउलो नेरुदा के संस्मरण का हिंदी में अनुवाद किया है । अभी-अभी मैंने उनके द्वारा अनूदित अद्वैत काला के उपन्यास का हिंदी अनुवाद लगभग सिंगल पढ़ा । मैंने अद्वैत काला का अंग्रेजी में लिखा मूल उपन्यास भी पढ़ा था । मनीषा के अनुवाद में मूल की आत्मा की रक्षा की गई है जिससे उपन्यास के प्रवाह में बाधा नहीं आती । हिंदी अनुवाद में अंग्रेजी भाषा के शब्दों को लेकर कोई दुराग्रह दिखाई नहीं देता, बल्कि पात्रों के बीच बोलचाल में सहजता से जो अंग्रेजी के शब्द आते हैं उसे हिंदी अनुवाद में बदला नहीं गया है जिस वजह से अनुवाद बेहतर हो पाया है । दारू पीते हुए उपन्यास की बिंदास नायिका और उसकी दोस्त अंग्रेजी के शब्दों का प्रयास करती हैं और अनुवाद में उससे छेड़छाड़ नहीं की गई है ।
कुछ दिनों पहले मैंने वाणी प्रकाशन से प्रकाशित दो हजार चार के नोबेल पुरस्कार विजेता लेखिका फ्रेडरिक येलनिक के उपन्यास क्लावीयरश्पीलेरिन का हिंदी अनुवाद पियानो टीचर पढ़ा । उक्त उपन्यास का हिंदी अनुवाद विदेशी भाषा साहित्य की त्रैमासिक पत्रिका सार संसार के मुख्य संपादक और जर्मन भाषा के जानकार अमृत मेहता ने किया था । पहली नजर में हिंदी अनुवाद ठीक-ठाक लगा था । मैंने अपने इस स्तंभ में ही उस उपन्यास पर लिखा भी था । लेकिन बाद में जमशेदपुर से लेखिका विजय शर्मा ने मेरा ध्यान कुछ त्रुटियों की ओर दिलाया तो फिर मैंने उसका अंग्रेजी अनुवाद पढ़ा । उसको पढ़ने के बाद मुझे पता चला कि अमृत मेहता का अनुवाद बिल्कुल ही स्तरीय नहीं था । ट्रांसलिटरेशन के चक्कर में अमृत मेहता ने कुछ बेहद अश्लील शब्दों का इस्तेमाल किया जो गैरजरूरी था । साथ ही उपन्यास में वर्णित कुछ दृश्यों को भी उन्होंने बदल डाला । अमृत मेहता ने लिखा कि नायिका बाथ टब में अपने हाथ के नस काट लेती है जबकि मूल उपन्यास में येलनिक लिखा है कि नायिका बाथ टब में अपने यौनांग काट लेती है । अनुवाद में शब्दों के चयन की स्वतंत्रता तो अनुवादक ले सकता है लेकिन प्रसंग और घटनाओं को बदलने की छूट वो नहीं ले सकता है । इस तरह के लापरवाह अनुवाद का नतीजा यह होता है कि भविष्य के शोधार्थियों को गलत संदर्भ मिलते हैं और अर्थ का अनर्थ हो जाता है । इस मामले में मनीषा तनेजा ने सावधानी बरती है और उनके द्वारा अनूदिक उपन्यास लगभग सिंगल बेहतर बेहद पठनीय बन पडा है ।
दूसरा अहम उपन्यास हॉर्पर कालिन्स ने प्रकाशित किया वह है - बुकर पुरस्कार प्राप्त लेखक अरविंद अडिगा का द वाइट टाइगर । प्रकाशक का दावा कि इस उपन्यास की सिर्फ भारत में दो लाख प्रतियां बिक चुकी हैं । किताब के बैक पर कवर पर इस सूचना के प्रकाशन से हिंदी प्रकाशन जगत सकते में पड़ सकता है । हिंदी में उपन्यासों का संसकरण पांच सौ या फिर अब तो तीन सौ का ही होता है । और मेरे जानते हाल के दिनों में हिंदी का कोई उपन्यास दस हजार भी नहीं बिका है । दो लाख प्रतियां बिकने की बात तो हिंदी में सोची भी नहीं जा सकती है । जबकि भारत में हिंदी के पाठकों की संख्या अंग्रेजी पाठकों से कई गुणा ज्यादा है । ये एक बेहद अहम सवाल है, जिसपर हिंदी समाज को विचार करने की जरूरत है ।
अब बात अरविंद अडीगा के उपन्यास द वाइट टाइगर की बात । अरविंद के इस उपन्यास का अनुवाद मनोहर नोतानी ने किया है । मनोहर पेशे से इंजीनियर हैं लेकिन एक लंबे अरसे से अनवाद का काम कर रहे हैं, लेकिन किसी उपन्यास का अनुवाद करने का यह उनका पहला अनुभव है । वाइट टाइगर में मध्य भारत के गांव में जन्मे रिक्शा चालक के बेटे बलराम की कहानी है । लेकिन जब उसे स्कूल से निकाल दिया जाता है तो वो चाय की दुकान पर सफाई और बरतन धोने का काम करता अपने भविष्य के सपने बुनता है । उसकी तकदीर तब बदलती है जब उसके गांव का एक अमीर जमींदार उसे अपना ड्राइवर बनाकर दिल्ली ले आता है । महानगर की चकाचौंध में बलराम की एक नए तरीके से शिक्षा होती है । इस उपन्यास का अनुवाद थोड़ा शास्त्रीय किस्म का है जो पाठ को बाधित करता है । इस उपन्यास के अनुवाद के क्रम में मनोहर नोतानी ने हिंदी के खांटी शब्दों के इस्तेमाल के साथ-साथ स्थानीय शब्द का भी इस्तेमाल किया है । एक बानगी- उस रात, एक बार फिर आंगन झाड़ने का बहाना करते हुए हम चमरघेंच और उसके बेटों के नजीक जा फटके, वे लोग एक बेंच पर बिराजे बतियाते रहे, हाथ में गिलास और गिलास में चमचम दारू । इस दो वाक्य में तीन शब्दे ऐसे हैं जो बिल्कुल स्थानीय भाषा के हैं - चमरघेंच, नजीक और चमचम दारू । इस तरह के कई शब्दो का इस्तेमाल अनुवादक ने किया है जिससे उनके मेहनत का पता चलता है ।
एक तीसरी किताब जो हाल में प्रकाशित हुई है वो है शिक्षाविद् और सांसद रह चुकी भारती राय की आत्मकथा- ये दिन, वे दिन । ल रूप से बांग्ला में लिखी गई इस आत्मकथा का हिंदी अनुवाद सुशील गुप्ता ने किया । सुशील गुप्ता का नाम हिंदी के पाठकों के लिए जाना पहचाना है । उन्होंने बांग्ला की कई चर्चित लेखकिओं और लेखकों की कृतियों का अनुवाद हिंदी में किया है । भारती राय ने अपनी इस आत्मकथा में पांच पीढियों की कहानी लिखी है । ये कहानी शुरू होती है उनकी परनानी शैलबाला उर्फ सुंदर मां के साथ । कथा के दूसरे पड़ाव पर हैं लेखिका की नानी मां । तीसरे पड़ाव पर लेखिका की मां से पाठकों की मुलाकात होती है और चौथे पड़ाव पर हैं और पांचवें भाग में कई अहम सवाल हैं । इस किताब की प्रस्तावना वरिष्ठ लेखिका और पत्रकार मृणाल पांडे ने लिखी है । इस किताब से एक लंबे काल खंड का इतिहास सामने आता है । का ने पारिवारिक स्थितियों के बहाने बंगाल और देश की राजनीतिक और साहित्यिक परिदृश्य का सुरुचिपूर्ण चित्र खींचा है । हिंदी में आत्मकथा के बहाने जो एक आत्म प्रचार का दौर चल पड़ा है यह किताब उससे पूरी तरह से अलग है । इस वजह से ही मुझे उम्मीद है कि यह किताब हिंदी के पाठकों को पसंद आएगी । अन्य भाषाओं से हिंदी में अनुदित होकर आ रही ये कृतियां एक उम्मीद जगाती हैं ।
लेकिन अभी हाल के दिनों में हॉर्पर कालिन्स पब्लिकेशंस और पेंग्विन बुक्स ने भारतीय अंग्रेजी लेखकों के अलावा विश्व के अन्य भाषाओं की कृतियों का अनुवाद हिंदी में प्रकाशित करना शुरू किया है । यह एक स्वागत योग्य कदम है । हॉर्पर कालिन्स से अभी अद्वैत काला के उपन्यास ऑलमोस्ट सिंगल का अनुवाद मनीषा तनेजा ने किया है । लगभग तीन सौ पन्नों का उपन्यास बेहतरीन अनुवाद का एक नमूना है । मनीषा तनेजा दिल्ली विश्वविद्यालय में स्पेनिश पढ़ाती हैं और इसके पहले भी गैबरील गारसिया मारक्वैज का उपन्यास एकाकीपन के सौ साल और पॉउलो नेरुदा के संस्मरण का हिंदी में अनुवाद किया है । अभी-अभी मैंने उनके द्वारा अनूदित अद्वैत काला के उपन्यास का हिंदी अनुवाद लगभग सिंगल पढ़ा । मैंने अद्वैत काला का अंग्रेजी में लिखा मूल उपन्यास भी पढ़ा था । मनीषा के अनुवाद में मूल की आत्मा की रक्षा की गई है जिससे उपन्यास के प्रवाह में बाधा नहीं आती । हिंदी अनुवाद में अंग्रेजी भाषा के शब्दों को लेकर कोई दुराग्रह दिखाई नहीं देता, बल्कि पात्रों के बीच बोलचाल में सहजता से जो अंग्रेजी के शब्द आते हैं उसे हिंदी अनुवाद में बदला नहीं गया है जिस वजह से अनुवाद बेहतर हो पाया है । दारू पीते हुए उपन्यास की बिंदास नायिका और उसकी दोस्त अंग्रेजी के शब्दों का प्रयास करती हैं और अनुवाद में उससे छेड़छाड़ नहीं की गई है ।
कुछ दिनों पहले मैंने वाणी प्रकाशन से प्रकाशित दो हजार चार के नोबेल पुरस्कार विजेता लेखिका फ्रेडरिक येलनिक के उपन्यास क्लावीयरश्पीलेरिन का हिंदी अनुवाद पियानो टीचर पढ़ा । उक्त उपन्यास का हिंदी अनुवाद विदेशी भाषा साहित्य की त्रैमासिक पत्रिका सार संसार के मुख्य संपादक और जर्मन भाषा के जानकार अमृत मेहता ने किया था । पहली नजर में हिंदी अनुवाद ठीक-ठाक लगा था । मैंने अपने इस स्तंभ में ही उस उपन्यास पर लिखा भी था । लेकिन बाद में जमशेदपुर से लेखिका विजय शर्मा ने मेरा ध्यान कुछ त्रुटियों की ओर दिलाया तो फिर मैंने उसका अंग्रेजी अनुवाद पढ़ा । उसको पढ़ने के बाद मुझे पता चला कि अमृत मेहता का अनुवाद बिल्कुल ही स्तरीय नहीं था । ट्रांसलिटरेशन के चक्कर में अमृत मेहता ने कुछ बेहद अश्लील शब्दों का इस्तेमाल किया जो गैरजरूरी था । साथ ही उपन्यास में वर्णित कुछ दृश्यों को भी उन्होंने बदल डाला । अमृत मेहता ने लिखा कि नायिका बाथ टब में अपने हाथ के नस काट लेती है जबकि मूल उपन्यास में येलनिक लिखा है कि नायिका बाथ टब में अपने यौनांग काट लेती है । अनुवाद में शब्दों के चयन की स्वतंत्रता तो अनुवादक ले सकता है लेकिन प्रसंग और घटनाओं को बदलने की छूट वो नहीं ले सकता है । इस तरह के लापरवाह अनुवाद का नतीजा यह होता है कि भविष्य के शोधार्थियों को गलत संदर्भ मिलते हैं और अर्थ का अनर्थ हो जाता है । इस मामले में मनीषा तनेजा ने सावधानी बरती है और उनके द्वारा अनूदिक उपन्यास लगभग सिंगल बेहतर बेहद पठनीय बन पडा है ।
दूसरा अहम उपन्यास हॉर्पर कालिन्स ने प्रकाशित किया वह है - बुकर पुरस्कार प्राप्त लेखक अरविंद अडिगा का द वाइट टाइगर । प्रकाशक का दावा कि इस उपन्यास की सिर्फ भारत में दो लाख प्रतियां बिक चुकी हैं । किताब के बैक पर कवर पर इस सूचना के प्रकाशन से हिंदी प्रकाशन जगत सकते में पड़ सकता है । हिंदी में उपन्यासों का संसकरण पांच सौ या फिर अब तो तीन सौ का ही होता है । और मेरे जानते हाल के दिनों में हिंदी का कोई उपन्यास दस हजार भी नहीं बिका है । दो लाख प्रतियां बिकने की बात तो हिंदी में सोची भी नहीं जा सकती है । जबकि भारत में हिंदी के पाठकों की संख्या अंग्रेजी पाठकों से कई गुणा ज्यादा है । ये एक बेहद अहम सवाल है, जिसपर हिंदी समाज को विचार करने की जरूरत है ।
अब बात अरविंद अडीगा के उपन्यास द वाइट टाइगर की बात । अरविंद के इस उपन्यास का अनुवाद मनोहर नोतानी ने किया है । मनोहर पेशे से इंजीनियर हैं लेकिन एक लंबे अरसे से अनवाद का काम कर रहे हैं, लेकिन किसी उपन्यास का अनुवाद करने का यह उनका पहला अनुभव है । वाइट टाइगर में मध्य भारत के गांव में जन्मे रिक्शा चालक के बेटे बलराम की कहानी है । लेकिन जब उसे स्कूल से निकाल दिया जाता है तो वो चाय की दुकान पर सफाई और बरतन धोने का काम करता अपने भविष्य के सपने बुनता है । उसकी तकदीर तब बदलती है जब उसके गांव का एक अमीर जमींदार उसे अपना ड्राइवर बनाकर दिल्ली ले आता है । महानगर की चकाचौंध में बलराम की एक नए तरीके से शिक्षा होती है । इस उपन्यास का अनुवाद थोड़ा शास्त्रीय किस्म का है जो पाठ को बाधित करता है । इस उपन्यास के अनुवाद के क्रम में मनोहर नोतानी ने हिंदी के खांटी शब्दों के इस्तेमाल के साथ-साथ स्थानीय शब्द का भी इस्तेमाल किया है । एक बानगी- उस रात, एक बार फिर आंगन झाड़ने का बहाना करते हुए हम चमरघेंच और उसके बेटों के नजीक जा फटके, वे लोग एक बेंच पर बिराजे बतियाते रहे, हाथ में गिलास और गिलास में चमचम दारू । इस दो वाक्य में तीन शब्दे ऐसे हैं जो बिल्कुल स्थानीय भाषा के हैं - चमरघेंच, नजीक और चमचम दारू । इस तरह के कई शब्दो का इस्तेमाल अनुवादक ने किया है जिससे उनके मेहनत का पता चलता है ।
एक तीसरी किताब जो हाल में प्रकाशित हुई है वो है शिक्षाविद् और सांसद रह चुकी भारती राय की आत्मकथा- ये दिन, वे दिन । ल रूप से बांग्ला में लिखी गई इस आत्मकथा का हिंदी अनुवाद सुशील गुप्ता ने किया । सुशील गुप्ता का नाम हिंदी के पाठकों के लिए जाना पहचाना है । उन्होंने बांग्ला की कई चर्चित लेखकिओं और लेखकों की कृतियों का अनुवाद हिंदी में किया है । भारती राय ने अपनी इस आत्मकथा में पांच पीढियों की कहानी लिखी है । ये कहानी शुरू होती है उनकी परनानी शैलबाला उर्फ सुंदर मां के साथ । कथा के दूसरे पड़ाव पर हैं लेखिका की नानी मां । तीसरे पड़ाव पर लेखिका की मां से पाठकों की मुलाकात होती है और चौथे पड़ाव पर हैं और पांचवें भाग में कई अहम सवाल हैं । इस किताब की प्रस्तावना वरिष्ठ लेखिका और पत्रकार मृणाल पांडे ने लिखी है । इस किताब से एक लंबे काल खंड का इतिहास सामने आता है । का ने पारिवारिक स्थितियों के बहाने बंगाल और देश की राजनीतिक और साहित्यिक परिदृश्य का सुरुचिपूर्ण चित्र खींचा है । हिंदी में आत्मकथा के बहाने जो एक आत्म प्रचार का दौर चल पड़ा है यह किताब उससे पूरी तरह से अलग है । इस वजह से ही मुझे उम्मीद है कि यह किताब हिंदी के पाठकों को पसंद आएगी । अन्य भाषाओं से हिंदी में अनुदित होकर आ रही ये कृतियां एक उम्मीद जगाती हैं ।
Tuesday, March 30, 2010
विरासत पर घमासान
विरासत पर संग्राम
तमिलनाडु की राजनीति में आजकल भूचाल आया हुआ है और ये भूचाल विरोधी दलों की वजह से नहीं बल्कि सत्ता पक्ष की तरफ से ही है । तमिलनाडु के मुख्यमंत्री करुणानिधि के बड़े बेटे और केंद्रीय रसायन मंत्री अझागिरी के एक तमिल साप्ताहिक को दिए गए साक्षात्कार से द्रविड़ मुनेत्र कड़गम में तूफान उठ खड़ा हुआ है । अझागिरी ने साफ तौर पर यह कह दिया है कि वो अपने पिता और सूबे के मुख्यमंत्री के बाद किसी को अपना नेता स्वीकार नहीं करेंगे । अझागिरी ने कहा- जब तक करुणानिधि जीवित हैं तबतक किसी और के डीएमके के नेता होने के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता है । किसी और व्यक्ति का ना तो इतना बड़ा कद है और ना ही उसमें वो नेतृत्व क्षमता है जो करुणानिधि की जगह ले सके । लेकिन उनके बाद मैं किसी को भी अपना नेता नहीं मानूंगा । दरअसल अझागिरी के निशाने पर हैं उनके छोटे भाई और तमिलनाडू के उपमुख्यमंत्री एम के स्तालिन ।
लेकिन इस पूरे झगड़े को समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाना होगा । जब दूसरी बार यूपीए की सरकार बनी तो मंत्रिमंडल गठन के वक्त करुणानिधि की पार्टी द्रविड़ मुनेत्र कड़गम ने खासा पच्चर फंसाया था । मालदार मंत्रालय के लिए कांग्रेस के सहयोगी दलों में होड़ लगी थी । उस वक्त करुणानिधि ने लोकसभा के सदस्यों के संख्या बल के आधार पर जमकर सौदेबाजी की थी । अपने खास सांसदों के अलावा अपने बड़े बेटे अझागिरी को केंद्र में कैबिनेट मंत्री बनवा दिया था । अझागिरी के केंद्र में मंत्री बनने के अगले ही दिन उन्होंने अपने छोटे बेटे एम के स्तालिन को तमिलनाडु का उपमुख्यमंत्री मनोनीत कर कई संकेत एक साथ दे दिए थे । करुणानिधि ने स्तालिन को ना केवल उपमुख्यमंत्री बनाया बल्कि सरकार और पार्टी में भी उनको प्रयत्नपूर्वक स्थापित करने लगे ताकि दो हजार ग्यारह में होनेवाले विधानसभा चुनाव के पहले स्तालिन को राज्य के मुख्यमंत्री की गद्दी सौंप सकें । इस योजना के तहत सबकुछ ठीक ठाक चल रहा था । लेकिन अचानक करुणानिधि के एक बयान से सारा मामला बदल गया । करुणानिधि ने जोर देकर कहा कि वो जून में होनेवाले विश्व तमिल सम्मेलन के बाद अपने दायित्व से मुक्त होकर लोगों के बीच रहना चाहते हैं ।
इस बयान और स्तालिन के पार्टी और सरकार में बढ़ते रसूख से साफ था कि करुणानिधि तमिलनाडु को लेकर अपने छोटे बेटे पर ज्यादा भरोसा कर रहे हैं । इन साफ संकेतों को समझते हुए अझागिरी ने अपना विरोध तेज कर दिया और पिता पर दवाब भी बढ़ाया । अझागिरी केंद्र में कैबिनेट मंत्री बनकर खुश तो हैं लेकिन वो चाहते हैं कि पार्टी में भी उन्हें अहम ओहदा मिले ताकि वो अपने प्रभाव क्षेत्र का विस्तार दक्षिण तमिललाडु से आगे जाकर कर सकें । दक्षिण तमिलनाडु में अझागिरी का दबदबा है और पिछले लोकसभा चुनाव में उन्होंने इस बात को साबित भी किया । इस इलाके की सभी दस लोकसभा सीटों पर डीएमके को जीत दिलाकर अपनी धमक भी दिखाई ।
पारिवार के बढ़ते दबाव और घर में मचे कलह को देखते हुए करुणानिधि ने एक शातिर राजनेता की तरह एक बार फिर से बयान बदला । करुणा ने कहा कि हलांकि पीठ में तकलीफ की वजह से वो व्हील चेयर पर हैं लेकिन दिमागी तौर पर पूरी तरह से स्वस्थ हैं और निकट भविष्य में रिटायर होने की उनकी कोई योजना नहीं है और ना ही वो मुख्यमंत्री की कुर्सी खाली करनेवाले हैं । हलांकि एक बार फिर से करुणानिधि ने ये कहकर कि स्तालिन उनके लिए प्राणवायु हैं ये संकेत दे दिया है कि सूबे की कमान वो अपने छोटे बेटे को ही सौंपनेवाले हैं ।
राज्य में मुख्यमंत्री पद को लेकर जिस तरह से परिवार में घमासान मचा है उससे ये प्रतीत होता है कि तमिलनाडु करुणानिधि की पारिवारिक जागीर है जिसकी विरासत को लेकर दोनों पुत्रों में जंग छिड़ा है । राजनीति में परिवारवाद और वंशवाद का ये एक विद्रूप चेहरा है जो लोकतंत्र के मुंह पर एक बदनुमा दाग है । मुख्यमंत्री चुनने का अधिकार प्रत्यक्ष रूप से तो चुने हुए विधायको के पास होता है लेकिन परोक्ष रूप से तो सूबे की जनता ही यह तय करती है कि उनका सीएम कौन होगा ।
उन्नीस सौ सत्तावन में पहली बार विधायक बने और सड़सठ में मंत्री बने करुणानिधि ने संघर्ष के बूते अपनी पहचान बनाई थी । अपने संघर्ष और सांगठनिक क्षमता की बदौलत करुणानिधि ने तमिलनाडु के तत्कालीन मुख्यमंत्री अन्नादुरै के मन पर गहरी छाप छोड़ी थी । अन्ना इनसे बेहद प्रभावित थे और बेइतहां भरोसा भी । समय के साथ उन्होंने अघोषित तौर पर करुणानिधि को अपने उत्तराधिकारी के तौर पर प्रोजेक्ट भी करने शुरू कर दिया था । नतीजा यह हुआ कि जूनियर होते हुए भी करुणानिधि को उनके मंत्रिमंडल में अहम जगह मिली । जब उन्नीस सौ उनहत्तर में अन्नादुरै की मौत हुई तो करुणानिधि ने सूबे के मुख्यमंत्री का पद संभाला ।
अपने संघर्ष और द्रविड़ राजनीति की बदौलत पार्टी में अपनी जगह बनाने वाले करुणानिधि अब अपनी ही पार्टी के समर्पित और संघर्षशील कार्यकर्ताओं को भुलाकर अपने संतान मोह में डूब से गए लगते हैं । सत्ता सुख और पुत्र मोह में जिस तरह से धृतराष्ट्र को कुछ नहीं दिखाई देता था उसी तरह करुणानिधि को भी तमिलनाडु और देश की राजनीति में बेटे-बेटियों के अलावा कोई और दिखाई नहीं देता । यह एक ऐसे महान राजनेता का पतन है जिसने द्रविड़ आंदोलन में ना केवल जमकर हिस्सा लिया बल्कि उसे अपनी नेतृत्व क्षमता से एक दिशा भी दी । लेकिन सत्ता सुख और पुत्र मोह ऐसी चीज है जो बड़े से बड़े क्रांतिकारी को भी डिगा देती है । डिगे तो करुणानिधि भी थे जब उनपर भ्रष्टाचार के संगीन इल्जाम लगे और सरकारिया कमीशन ने उनको इन तमाम भ्रष्टाचार के लिए दोषी भी पाया था । उन आरोपों में घिरे करुणानिधि की सरकार को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने बरखास्त भी किया था । सत्ता नेता को भ्रष्ट और कमजोर बनाती है और शायद यही वजह रही कि गांधी जी और जयप्रकाश नारायण ने पूरे जीवन में कोई सरकारी पद नहीं लिया, किसी सरकार में शामिल नहीं हुए । जिसकी वजह से इनकी विश्वसनीयता बरकरार रह सकी और लोग इनकी एक आवाज पर जान लेने और देने दोनों के लिए तैयार रहते थे ।
अझागिरी तमिल पत्रिका को दिए इंटरव्यू के बाद जब बवाल बढ़ा तो अझागिरी ने तमाम अटकलों को खारिज करते हुए सफाई दी कि वो और स्तालिन एक दुनाली बंदूक की तरह हैं जो एक साथ अपने दुश्मनों पर वार करते हैं । लेकिन तमिलनाडु की राजनीति और करुणानिधि के परिवार को लंबे अरसे से नजदीक से देखनेवालों का मानना है कि दोनों दुनाली बंदूक नहीं बल्कि एक दूसरे की तरफ तनी हुई बंदूक हैं । झगड़ा का तीसरा कोण करुणानिधि की बेटी कनीमोझी का भी है । अपनी तीसरी पत्नी के दबाव में करुणानिधि ने कनीमोझी को राज्यसभा का सदस्य तो बनवा दिया लेकिन कनिमोझी और उसकी मां इतने से संतुष्ट नहीं हैं । कनीमोझी की भी राजनैतिक महात्वाकांक्षा हिलोरे ले रही हैं, वो भी मंत्री पद और पार्टी में अहम ओहदा चाहती है । उनका तर्क है कि राजनीतिक विरासत में औलाद को बराबर हक मिलना चाहिए और हो भी क्यों ना क्योंकि करुणानिधि ने तो पूरी डीएमको अपनी जागीर बना रखी है जहां मलाई तो सिर्फ परिवार में ही बंटती है आम कार्यकर्ता के हिस्से तो आता है आंदोलन और संघर्ष । तमिलनाडु की राजनीति पर अगर हम बारीकी से नजर डालें तो ये बात साफ तौर पर दिखती है कि करुणानिधि के बाद डीएमके में उनकी राजनीतिक विरासत को लेकर संग्राम तय है, इंतजार बस समय का है । पारिवारिक कलह और पुत्रमोह में फंसे करुणा पर तो बस दया की जा सकती है, क्योंकि पचासी पार इस राजनीतिक पुरोधा के आंखों पर मोह की पट्टी है ।
तमिलनाडु की राजनीति में आजकल भूचाल आया हुआ है और ये भूचाल विरोधी दलों की वजह से नहीं बल्कि सत्ता पक्ष की तरफ से ही है । तमिलनाडु के मुख्यमंत्री करुणानिधि के बड़े बेटे और केंद्रीय रसायन मंत्री अझागिरी के एक तमिल साप्ताहिक को दिए गए साक्षात्कार से द्रविड़ मुनेत्र कड़गम में तूफान उठ खड़ा हुआ है । अझागिरी ने साफ तौर पर यह कह दिया है कि वो अपने पिता और सूबे के मुख्यमंत्री के बाद किसी को अपना नेता स्वीकार नहीं करेंगे । अझागिरी ने कहा- जब तक करुणानिधि जीवित हैं तबतक किसी और के डीएमके के नेता होने के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता है । किसी और व्यक्ति का ना तो इतना बड़ा कद है और ना ही उसमें वो नेतृत्व क्षमता है जो करुणानिधि की जगह ले सके । लेकिन उनके बाद मैं किसी को भी अपना नेता नहीं मानूंगा । दरअसल अझागिरी के निशाने पर हैं उनके छोटे भाई और तमिलनाडू के उपमुख्यमंत्री एम के स्तालिन ।
लेकिन इस पूरे झगड़े को समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाना होगा । जब दूसरी बार यूपीए की सरकार बनी तो मंत्रिमंडल गठन के वक्त करुणानिधि की पार्टी द्रविड़ मुनेत्र कड़गम ने खासा पच्चर फंसाया था । मालदार मंत्रालय के लिए कांग्रेस के सहयोगी दलों में होड़ लगी थी । उस वक्त करुणानिधि ने लोकसभा के सदस्यों के संख्या बल के आधार पर जमकर सौदेबाजी की थी । अपने खास सांसदों के अलावा अपने बड़े बेटे अझागिरी को केंद्र में कैबिनेट मंत्री बनवा दिया था । अझागिरी के केंद्र में मंत्री बनने के अगले ही दिन उन्होंने अपने छोटे बेटे एम के स्तालिन को तमिलनाडु का उपमुख्यमंत्री मनोनीत कर कई संकेत एक साथ दे दिए थे । करुणानिधि ने स्तालिन को ना केवल उपमुख्यमंत्री बनाया बल्कि सरकार और पार्टी में भी उनको प्रयत्नपूर्वक स्थापित करने लगे ताकि दो हजार ग्यारह में होनेवाले विधानसभा चुनाव के पहले स्तालिन को राज्य के मुख्यमंत्री की गद्दी सौंप सकें । इस योजना के तहत सबकुछ ठीक ठाक चल रहा था । लेकिन अचानक करुणानिधि के एक बयान से सारा मामला बदल गया । करुणानिधि ने जोर देकर कहा कि वो जून में होनेवाले विश्व तमिल सम्मेलन के बाद अपने दायित्व से मुक्त होकर लोगों के बीच रहना चाहते हैं ।
इस बयान और स्तालिन के पार्टी और सरकार में बढ़ते रसूख से साफ था कि करुणानिधि तमिलनाडु को लेकर अपने छोटे बेटे पर ज्यादा भरोसा कर रहे हैं । इन साफ संकेतों को समझते हुए अझागिरी ने अपना विरोध तेज कर दिया और पिता पर दवाब भी बढ़ाया । अझागिरी केंद्र में कैबिनेट मंत्री बनकर खुश तो हैं लेकिन वो चाहते हैं कि पार्टी में भी उन्हें अहम ओहदा मिले ताकि वो अपने प्रभाव क्षेत्र का विस्तार दक्षिण तमिललाडु से आगे जाकर कर सकें । दक्षिण तमिलनाडु में अझागिरी का दबदबा है और पिछले लोकसभा चुनाव में उन्होंने इस बात को साबित भी किया । इस इलाके की सभी दस लोकसभा सीटों पर डीएमके को जीत दिलाकर अपनी धमक भी दिखाई ।
पारिवार के बढ़ते दबाव और घर में मचे कलह को देखते हुए करुणानिधि ने एक शातिर राजनेता की तरह एक बार फिर से बयान बदला । करुणा ने कहा कि हलांकि पीठ में तकलीफ की वजह से वो व्हील चेयर पर हैं लेकिन दिमागी तौर पर पूरी तरह से स्वस्थ हैं और निकट भविष्य में रिटायर होने की उनकी कोई योजना नहीं है और ना ही वो मुख्यमंत्री की कुर्सी खाली करनेवाले हैं । हलांकि एक बार फिर से करुणानिधि ने ये कहकर कि स्तालिन उनके लिए प्राणवायु हैं ये संकेत दे दिया है कि सूबे की कमान वो अपने छोटे बेटे को ही सौंपनेवाले हैं ।
राज्य में मुख्यमंत्री पद को लेकर जिस तरह से परिवार में घमासान मचा है उससे ये प्रतीत होता है कि तमिलनाडु करुणानिधि की पारिवारिक जागीर है जिसकी विरासत को लेकर दोनों पुत्रों में जंग छिड़ा है । राजनीति में परिवारवाद और वंशवाद का ये एक विद्रूप चेहरा है जो लोकतंत्र के मुंह पर एक बदनुमा दाग है । मुख्यमंत्री चुनने का अधिकार प्रत्यक्ष रूप से तो चुने हुए विधायको के पास होता है लेकिन परोक्ष रूप से तो सूबे की जनता ही यह तय करती है कि उनका सीएम कौन होगा ।
उन्नीस सौ सत्तावन में पहली बार विधायक बने और सड़सठ में मंत्री बने करुणानिधि ने संघर्ष के बूते अपनी पहचान बनाई थी । अपने संघर्ष और सांगठनिक क्षमता की बदौलत करुणानिधि ने तमिलनाडु के तत्कालीन मुख्यमंत्री अन्नादुरै के मन पर गहरी छाप छोड़ी थी । अन्ना इनसे बेहद प्रभावित थे और बेइतहां भरोसा भी । समय के साथ उन्होंने अघोषित तौर पर करुणानिधि को अपने उत्तराधिकारी के तौर पर प्रोजेक्ट भी करने शुरू कर दिया था । नतीजा यह हुआ कि जूनियर होते हुए भी करुणानिधि को उनके मंत्रिमंडल में अहम जगह मिली । जब उन्नीस सौ उनहत्तर में अन्नादुरै की मौत हुई तो करुणानिधि ने सूबे के मुख्यमंत्री का पद संभाला ।
अपने संघर्ष और द्रविड़ राजनीति की बदौलत पार्टी में अपनी जगह बनाने वाले करुणानिधि अब अपनी ही पार्टी के समर्पित और संघर्षशील कार्यकर्ताओं को भुलाकर अपने संतान मोह में डूब से गए लगते हैं । सत्ता सुख और पुत्र मोह में जिस तरह से धृतराष्ट्र को कुछ नहीं दिखाई देता था उसी तरह करुणानिधि को भी तमिलनाडु और देश की राजनीति में बेटे-बेटियों के अलावा कोई और दिखाई नहीं देता । यह एक ऐसे महान राजनेता का पतन है जिसने द्रविड़ आंदोलन में ना केवल जमकर हिस्सा लिया बल्कि उसे अपनी नेतृत्व क्षमता से एक दिशा भी दी । लेकिन सत्ता सुख और पुत्र मोह ऐसी चीज है जो बड़े से बड़े क्रांतिकारी को भी डिगा देती है । डिगे तो करुणानिधि भी थे जब उनपर भ्रष्टाचार के संगीन इल्जाम लगे और सरकारिया कमीशन ने उनको इन तमाम भ्रष्टाचार के लिए दोषी भी पाया था । उन आरोपों में घिरे करुणानिधि की सरकार को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने बरखास्त भी किया था । सत्ता नेता को भ्रष्ट और कमजोर बनाती है और शायद यही वजह रही कि गांधी जी और जयप्रकाश नारायण ने पूरे जीवन में कोई सरकारी पद नहीं लिया, किसी सरकार में शामिल नहीं हुए । जिसकी वजह से इनकी विश्वसनीयता बरकरार रह सकी और लोग इनकी एक आवाज पर जान लेने और देने दोनों के लिए तैयार रहते थे ।
अझागिरी तमिल पत्रिका को दिए इंटरव्यू के बाद जब बवाल बढ़ा तो अझागिरी ने तमाम अटकलों को खारिज करते हुए सफाई दी कि वो और स्तालिन एक दुनाली बंदूक की तरह हैं जो एक साथ अपने दुश्मनों पर वार करते हैं । लेकिन तमिलनाडु की राजनीति और करुणानिधि के परिवार को लंबे अरसे से नजदीक से देखनेवालों का मानना है कि दोनों दुनाली बंदूक नहीं बल्कि एक दूसरे की तरफ तनी हुई बंदूक हैं । झगड़ा का तीसरा कोण करुणानिधि की बेटी कनीमोझी का भी है । अपनी तीसरी पत्नी के दबाव में करुणानिधि ने कनीमोझी को राज्यसभा का सदस्य तो बनवा दिया लेकिन कनिमोझी और उसकी मां इतने से संतुष्ट नहीं हैं । कनीमोझी की भी राजनैतिक महात्वाकांक्षा हिलोरे ले रही हैं, वो भी मंत्री पद और पार्टी में अहम ओहदा चाहती है । उनका तर्क है कि राजनीतिक विरासत में औलाद को बराबर हक मिलना चाहिए और हो भी क्यों ना क्योंकि करुणानिधि ने तो पूरी डीएमको अपनी जागीर बना रखी है जहां मलाई तो सिर्फ परिवार में ही बंटती है आम कार्यकर्ता के हिस्से तो आता है आंदोलन और संघर्ष । तमिलनाडु की राजनीति पर अगर हम बारीकी से नजर डालें तो ये बात साफ तौर पर दिखती है कि करुणानिधि के बाद डीएमके में उनकी राजनीतिक विरासत को लेकर संग्राम तय है, इंतजार बस समय का है । पारिवारिक कलह और पुत्रमोह में फंसे करुणा पर तो बस दया की जा सकती है, क्योंकि पचासी पार इस राजनीतिक पुरोधा के आंखों पर मोह की पट्टी है ।
Tuesday, March 23, 2010
मकबूल पर फिदा क्यों हों ?
जब मैंने मकबूल फिदा हुसैन के भारत छोड़ने और कतर की नागरिकता स्वीकार करने पर सेक्युलरवादियों के दोहरे चरित्र को उजागर करता हुआ लेख हाहाकार पर लिखा तो मेरे विवेक और मेरी समझ,मेरी विचारधारा, मेरी शिक्षा, मेरी पारिवारिक पृष्ठभूमि को लेकर लोगों ने सवाल किए ।मुझे कालिदास का कुमार संभव पढ़ने की और खजुराहो की प्रसिद्ध मूर्तियां देखने समझने के अलावा प्राचीन भारतीय मूर्तिकला के बारे में अपने ज्ञान को बढ़ाने का उपदेश दिया गया । मुझे इस बात पर घेरने की कोशिश की गई कि मेरी बातें भगवा ब्रिगेड या संघियों से क्यों मिलती जुलती हैं । जिन लोगों ने मुझे इस तरह की सलाह दी मुझे नहीं मालूम कि उनकी समझ कितनी बेहतर है, उन्होंने कालीदास को कितना पढ़ा है । उन्होंने कितनी बार खजुराहो की मूर्तियां देखी है, लेकिन उन्हें मैं ये बता दूं कि हुसैन ने अपनी जीवनी और अपनी एक पेंटिंग दस्तखत करके मुझे दिए हैं जो मेरे लिए अमूल्य धरोहर हैं । हुसैन की पेंटिंग को समझने का दावा करनेवाले उनके तथाकथित समर्थकों में अभिवयक्ति की आजादी को लेकर घोर चिंता है और उन्हें लगता है कि हुसैन के भारत चोड़कर चले जाने से संविधान द्वारा प्रदत्त इस अधिकार पर हमला हुआ है । उन्हें यह सोचने समझने की जरूरत है कि जब भी कोई अपने आपको अभिव्यक्त करने के लिए ज्यादा स्वतंत्रता की अपेक्षा करता है तो स्वत: उससे ज्यादा उत्तरदायित्वपूर्ण व्यवहार भी अपेक्षित हो जाता है । भारत माता का नंगा चित्र बनाने पर हुसैन के खिलाफ दायर याचिका को दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस संजय किशन कौल ने खारिज कर दिया, साथ ही अपने फैसले में कला और उसकी समझ को लेकर कुछ कठोर टिप्पणियां भी की । लेकिन हुसैन के उन्नीस सौ सत्तर में बनाए गए सरस्वती और दुर्गा की नंगी तस्वीरों के एक दूसरे मामले में दो हजार चार में दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस जे डी कपूर का भी एक फैसला आया था । जस्टिस कपूर ने आठ अप्रैल दो हजार चार के अपने फैसले में लिखा-
इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि देश के करोड़ो हिंदुओं की इन देवियों में अटूट श्रद्धा है- एक ज्ञान की देवी हैं तो दूसरी शक्ति की । इन देवियों की नंगी तस्वीर पेंट करना इन करोड़ों लोगों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना तो है ही साथ ही उन करोड़ों लोगों की धर्म और उसमें उनकी आस्था का भी अपमान है ।
शब्द, पेंटिंग, रेखाचित्र और भाषण के माध्यम से अभिव्यक्ति की आजादी को संविधान में मौलिक अधिकार का दर्जा हासिल है जो कि हर नागरिक के लिए अमूल्य है । कोई भी कलाकार या पेंटर मानवीय संवेदना और मनोभाव को कई तरीकों से अभिवयक्त कर सकता है । इन मनोभावों और आइडियाज की अभिवयक्ति को किसी सीमा में नहीं बांधा जा सकता है । लेकिन कोई भी इस बात को भुला या विस्मृत नहीं कर सकता कि जितनी ज्यादा स्वतंत्रता होगी उतनी ही ज्यादा जिम्मेदारी भी होती है । अगर किसी को अभिवयक्ति का असीमित अधिकार मिला है तो उससे यह अपेक्षित है कि इस अधिकार का उपयोग अच्छे कार्य के लिए करे ना कि किसी धर्म या धार्मिक प्रतीकों या देवी देवताओं के खिलाफ विद्वेषपूर्ण भावना के साथ उन्हे अपमानित करने के लिए । हो सकता है कि ये धर्मिक प्रतीक या देवी देवता एक मिथक हों लेकिन इन्हें श्रद्धाभाव से देखा जाता है और समय के साथ ये लोगों के दैनिक धर्मिक क्रियाकलापों से इस कदर जुड़ गए हैं कि उनके खिलाफ अगर कुछ छपता है, चित्रित किया जाता है या फिर कहा जाता है तो इससे धार्मिक भावनाएं बेतरह आहत होती है । किसी भी खास धर्म के देवी देवताओं की आपत्तिजनक या नीचा दिखाने वाले रेखाचित्र या फिर पेंटिंग समाज में वैमनस्यता और एक दूसरे के प्रति नफरत पैदा करते हैं ।
अगर यह मान लिया जाए कि इस तरह के कार्य कला का एक नमूना है तब भी इस बात को विस्मृत नहीं किया जा सकता है कि इस तरह के कृत्य जानबूझकर धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने या फिर अपमानित करने के दायरे में आता है, क्योंकि ये देवी देवता करोड़ों लोगों के अराध्य हैं । एक बार फिर मैं ये कहता हूं कि ये देवी देवता एक मिथक हो सकते हैं लेकिन जब भी इस तरह से नग्न रूप में उनको चित्रित किया जाता है तो लोगों की धार्मिक भावनाएं आहत होती हैं ।
अभिवयक्ति की आजादी के नाम पर किसी व्यक्ति को किसी भी वर्ग या समाज की धार्मिक भावनाओं से खिलवाड़ की इजाजत नहीं दी जा सकती है । यह बात याचिकाकर्ता ( हुसैन) को समझनी चाहिए कि वो एक अलग धर्म से संबंधित हैं । अगर याचिकाकर्ता को लोगों की धार्मिक भावनाओं की गहराई का एहसास नहीं है तो वो अपने धर्म या फिर किसी और धर्म पर हाथ अजमाकर देखें तो उन्हें पता चल जाएगा कि धार्मिक भवानाओं की जड़ें कितनी गहरी होती हैं । इस तरह के काम दो अलग-अलग धर्मों को मानने वालों के बीच वैमनस्यता की खाई को और गहरा करती हैं, साथ ही सामाजिक सदभाव और आपसी भाईचारे के बीच बाधा बनकर खड़ी हो जाती है ।
याचिकाकर्ता ने महाभारत की पात्र द्रोपदी, जिन्हें हिंदू धर्म को मानने वाले लोग इज्जत की नजरों से देखते हैं, को भी पूरी तरह से निर्वस्त्र चित्रित किया है, जबकि चीरहरण के वक्त भी द्रोपदी निर्वस्त्र नहीं हो पाई थी । इस पेंटिंग में जिस तरह से द्रोपदी का चित्रण हुआ है वह साफ तौर से हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचानेवाला और नफरत पैदा करनेवाला है । अपने बारह पन्नों के जजमेंट में विद्वान न्यायाधीश ने और कई बातें कही और अंत में आठ शिकायतकर्ताओं की याचिका खारिज कर दी क्योंकि धार्मिक भावनाओं को भड़काने, दो समुदायों के बीच नफरत फैलाने आदि के संवंध में जो धाराएं (153 ए और 295 ए) लगाई जाती हैं उसमें राज्य या केंद्र सरकार की पू्र्वानुमति आवश्यक होती है, जो कि इस केस में नहीं थी । सनद रहे कि जब केस चल रहा था तो केंद्र में बीजेपी की सरकार थी । ये तो हुई अदालत और न्यायाधीश की बात । आपको एक और उदाहरण देते चलें जिससे कि हुसैन की महानता(?) और उनके पूर्वाग्रह पर से परदा हटता है । हुसैन ने एक बार महात्मा गांधी, कार्ल मार्क्स, अलबर्ट आइंस्टीन और हिटलर की पेंटिंग बनाई जिसमें हिटलर को उन्होंने नंगा दिखाया । जब उनसे इसके बार में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि किसी को अपमानित करने का यह उनका यह अपना तरीका है । इसके बाद मुझे लगता नहीं है कि कुछ कहने की जरूरत है । मार्क्स के अंध भक्तो धर्मनिरपेक्षता और अभिवयक्ति की आजादी के खतरे पर विलाप करना बंद करो । अपनी आंखों पर चढ़ा लाल चश्मा उतारो, तभी तर्क संगत बातें भी होंगी और विमर्श भी ।
( जस्टिस कपूर के जजमेंट के चुनिंदा अंशों के अनुवाद में हो सकता है कोर्ट की भाषा में कोई त्रुटि रह गई हो लेकिन भाव वही हैं )
Monday, March 22, 2010
शीला, श्लाका और बवाल
हिंदी में साहित्यिक पुरस्कारों की स्थिति बेहद खराब है । पुरस्कारों की विश्वसनीयता और उसके दिए जाने के तरीके को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं । हालत तो यहां तक पहुंच गए हैं कि साहित्य अकादमी पुरस्कारों की साख पर बट्टा लगा है । लेकिन ताजा विवाद तो दिल्ली की हिंदी अकादमी के श्लाका सम्मान को लेकर उठा है । दिल्ली की हिंदी अकादमी की अध्यक्ष वहां की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित हैं और उपाध्यक्ष अशोक चक्रधर हैं । हिंदी अकादमी हर साल श्लाका सम्मान के अलावा कई और अन्य पुरस्कार देती है । वर्ष 2008-09 के लिए अकादमी की कार्यकारिणी ने हिंदी के वरिष्ठ और प्रतिष्ठित लेखक कृष्ण बलदेव वैद को श्लाका सम्मान देने की संस्तुति की थी । उसके बाद अकादमी की अध्यक्ष की हैसियत से तत्कालीन कार्यकारिणी के फैसलों पर मुहर लगा थी । लेकिन बाद के दिनों में हिंदी अकादमी में प्रशासनिक अराजकता की वजह से उस वर्ष के सम्मान नहीं दिए जा सके । लेकिन अब जब अकादमी ने वर्ष 2009-10 के पुरस्कारों के साथ 2008-09 के पुरस्कारों का ऐलान किया तो 2008-09 के लिए श्ललाका सम्मान के लिए किसी का नाम घोषित नहीं किया गया । सूची से कृष्ण बलदेव वैद का नाम गायब था । बताया जा रहा है कि एक अनाम से कांग्रेसी नेता ने अकादमी की अध्यक्ष दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को पत्र लिखकर कृष्ण बलदेव वैद को श्लाका सम्मान नहीं देने का अनुरोध किया था । कांग्रेसी नेता का आरोप है कि वैद के उपन्यास नसरीन में कई जगह अश्लील शब्दों और स्थितियों का चित्रण किया गया है । कांग्रेसी नेता की आपत्ति को कांग्रेसी मुख्यमंत्री ने इस तरह स्वीकार कर लिया जैसै ये दस जनपथ का फरमान हो और ना मानने पर उनकी कुर्सी जाने का खतरा हो । शीला दीक्षित, जो कला और संस्कृति को लेकर संवेदनशील और समझदार मानी जाती है उनका यह निर्णय चौंकानेवाला है क्योंकि वैद जी को पुरस्कार देने का निर्णय हिंदी के लब्धप्रतिष्ठित लेखकों की एक कमिटी ने किया था । यहां यह बात भी समझ से परे हैं कि शुचिता और पवित्रता का ठेका कांग्रेसियों ने कब से ले लिया । यह ठेका तो भगवा खेमे के पास था । क्या धर्मनिरपेक्षता और अभिवयक्ति की आजादी का नारा देनेवाली कांग्रेस पार्टी भी भगवा रंग में रंगने लगी है । या फिर मुख्यमंत्री अपनी अधिकारियों की राय को तरजीह देने के क्रम में भगवा विचारधारा के साथ नजर आने की गलती कर बैठी । दरअसल ज्योतिष जोशी के हिंदी अकादमी के सचिव पद से इस्तीफे के बाद किन्हीं परिचयदास को अकादमी का सचिव का प्रभार दे दिया गया । परिचयदास अपने नाम के आगे कभी प्रोफेसर तो कभी डॉक्टर लिखकर लगातार हिंदी अकादमी के विज्ञापनों में छपते रहते हैं । लेकिन असली खेल तो प्लेयर बिलंडिग में बैठने वाले एक अफसर का चल रहा है, परिचयदास तो इस वजह से कुर्सी पर बैठे हैं कि वो एक कमजोर सचिव हैं जो अपने आकाओं के हुक्म को बगैर किसी सवाल जबाव के बजाते रहते हैं । अब ये मुख्यमंत्री को तय करना है कि दिल्ली की हिंदी अकादमी को सचिवालय में बैठे अफसर चलाएंगे या फिर साहित्यकारों की संचालन समिति । क्या अकादमी को स्वायत्ता मिल पाएगी या फिर यह दिल्ली सरकार का भोंपू बन कर रह जाएगा । खैर ये तो एक अवांतर प्रसंग है ।
कृष्ण बलदेव वेद को श्ललाका सम्मान नहीं दिए जाने पर हिंदी साहित्य में भूचाल आ गया । सबसे पहले हिंदी के आलोचक पुरुषोत्तम अग्रवाल ने हिंदी अकादमी के साहित्यकार सम्मान लेने से इंकार कर दिया और अकादमी के सचिव को एक पत्र लिखकर अग्रवाल ने अपना विरोध भी जताया और कहा कि – साहित्य और कला में श्लीलता और अश्लीलता के फैसले इतने सपाट ढंग से नहीं किए जा सकते । साहित्येतर कारणों से जूरी की संस्तुति की उपेक्षा करना अनुचित है । यह स्थिति केवल एक वरिष्ठ लेखक के ही प्रति नहीं, साहित्य मात्र के प्रति संवेदनशीलता और सम्मान के आभाव की सूचना देती है । अपने विरोध पत्र में पुरुषोत्तम अग्रवाल ने लिखा- साहित्य के सामाजिक दायित्व की चर्चा बहुत की जाती है । इसी के साथ यह भी जरूरी है कि समाज और सामाजिक-राजनैतिक सत्ता की विभिन्न संस्थाएं भी साहित्य, कला, ज्ञान और विचार की साधना और उसकी स्वायत्तता का सम्मान करना सीखें ।
पुरुषोत्तम अग्रवाल के इस्तीफे की खबर अखबारों में छपते ही हिंदी अकादमी का विरोध और तेज हो गया । 2009-10 के श्ललाका सम्मान के लिए तुने गए वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह ने भी पुरस्कार लेने से इंकार कर दिया । उनका कहना है कि वैदजी हिंदी के बेहद अहम रचनाकार हैं, उनसे श्लाका सम्मान की स्वकीकृति हासिल करने के बाद उन्हें पुरस्कार से वंचित कर उनका अपमान किया गया है । इस खुलासे के बाद स्थितियां बिल्कुल बदल गई हैं और उनका जमीर श्लाका सम्मान लेने की इजाजत नहीं देता । केदार जी के इस कदम के बाद तो जैसे पुरस्कार ठुकरानेवालों की लाइन लग गई । कवि-पत्रकार विमल कुमार, कवि पंकज सिंह, कवयित्रि और स्वर्गीय निर्मल वर्मा की पत्नी गगन गिल, रेखा जैन ने भी हिंदी अकादमी द्वारा घोषित पुरस्कार लेने से मना कर दिया है । इसके अलावा पूरा का पूरा हिंदी साहित्य वैद जी के अपमान के बाद उद्वेलित है और दिल्ली सरकार की जमकर थुक्का फजीहत हो रही है । अब तो हालात ऐसे बन रहे हैं कि हिंदी अकादमी को सम्मान समारोह करना मुश्किल हो रहा है ।
लेकिन इस सारे विवाद की एक अवांतर कथा भी है । बताया जा रहा है कि कृष्ण बलदेव वैद के खिलाफ मुख्यमंत्री को कांग्रेस के नेता से चिट्ठी लिखवाने के पीछे हिंदी की एक वरिष्ठ आलोचक हैं । जिस वर्ष जूरी ने वैद जी का नाम तय किया था उस वर्ष उक्त महिला आलोचक भी अपनी दावेदारी को लेकर लॉबिंग कर रही थी । जब उनकी बात नहीं बनी और जूरी ने वैद जी का नाम तय कर दिया तो उन्होंने एक कांग्रेसी से कृष्ण बलदेव वैद जी के खिलाफ पत्र लिखवा दिया । नतीजा यह हुआ कि अपसरशाही में जकड़ी हिंदी अकादमी ने उस पत्र के आधार पर वैद जी को पुरस्कार देने से मना कर दिया बिना ये सोचे समझे, बिना यह जाने की आपत्ति का आधार क्या है । दरअसल अकादमी के अफसरों को लगता है कि हिंदीवालों का विरोध फौरी होता है । जब अशोक चक्रधर को हिंदी अकादमी का उपाध्यक्ष बनाया गया था तो हिंदी के कई वरिष्ठ लेखकों ने घोर आपत्ति जताई थी । लेकिन चंद दिनों बाद वही साहित्यकार अशोक चक्रधर के सानिध्य में मंचासीन हो रहे थे । ना विरोध रहा और ना ही कोई दूरी । उस घटना के बाद अकादमी के अफसर बेपरवाह हो गए हैं । लेकिन अफसरों का इस बात का अंदाजा नहीं था कि इस बार इतनी संख्या में पुरस्कार ठुकरा दिए जाएंगे और मामला इतना संगीन हो जाएगा । शीला जी अब भी वक्त है अकादमी को कहिए कि अपनी गलती माने और कृष्ण बलदेव वैद जी माफी मांगकर उन्हें सम्मानित करे वर्ना होगा यह कि आप भी साहित्य और कला के मामले में भगवा खेमे में नजर आएंगी ।
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कृष्ण बलदेव वेद को श्ललाका सम्मान नहीं दिए जाने पर हिंदी साहित्य में भूचाल आ गया । सबसे पहले हिंदी के आलोचक पुरुषोत्तम अग्रवाल ने हिंदी अकादमी के साहित्यकार सम्मान लेने से इंकार कर दिया और अकादमी के सचिव को एक पत्र लिखकर अग्रवाल ने अपना विरोध भी जताया और कहा कि – साहित्य और कला में श्लीलता और अश्लीलता के फैसले इतने सपाट ढंग से नहीं किए जा सकते । साहित्येतर कारणों से जूरी की संस्तुति की उपेक्षा करना अनुचित है । यह स्थिति केवल एक वरिष्ठ लेखक के ही प्रति नहीं, साहित्य मात्र के प्रति संवेदनशीलता और सम्मान के आभाव की सूचना देती है । अपने विरोध पत्र में पुरुषोत्तम अग्रवाल ने लिखा- साहित्य के सामाजिक दायित्व की चर्चा बहुत की जाती है । इसी के साथ यह भी जरूरी है कि समाज और सामाजिक-राजनैतिक सत्ता की विभिन्न संस्थाएं भी साहित्य, कला, ज्ञान और विचार की साधना और उसकी स्वायत्तता का सम्मान करना सीखें ।
पुरुषोत्तम अग्रवाल के इस्तीफे की खबर अखबारों में छपते ही हिंदी अकादमी का विरोध और तेज हो गया । 2009-10 के श्ललाका सम्मान के लिए तुने गए वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह ने भी पुरस्कार लेने से इंकार कर दिया । उनका कहना है कि वैदजी हिंदी के बेहद अहम रचनाकार हैं, उनसे श्लाका सम्मान की स्वकीकृति हासिल करने के बाद उन्हें पुरस्कार से वंचित कर उनका अपमान किया गया है । इस खुलासे के बाद स्थितियां बिल्कुल बदल गई हैं और उनका जमीर श्लाका सम्मान लेने की इजाजत नहीं देता । केदार जी के इस कदम के बाद तो जैसे पुरस्कार ठुकरानेवालों की लाइन लग गई । कवि-पत्रकार विमल कुमार, कवि पंकज सिंह, कवयित्रि और स्वर्गीय निर्मल वर्मा की पत्नी गगन गिल, रेखा जैन ने भी हिंदी अकादमी द्वारा घोषित पुरस्कार लेने से मना कर दिया है । इसके अलावा पूरा का पूरा हिंदी साहित्य वैद जी के अपमान के बाद उद्वेलित है और दिल्ली सरकार की जमकर थुक्का फजीहत हो रही है । अब तो हालात ऐसे बन रहे हैं कि हिंदी अकादमी को सम्मान समारोह करना मुश्किल हो रहा है ।
लेकिन इस सारे विवाद की एक अवांतर कथा भी है । बताया जा रहा है कि कृष्ण बलदेव वैद के खिलाफ मुख्यमंत्री को कांग्रेस के नेता से चिट्ठी लिखवाने के पीछे हिंदी की एक वरिष्ठ आलोचक हैं । जिस वर्ष जूरी ने वैद जी का नाम तय किया था उस वर्ष उक्त महिला आलोचक भी अपनी दावेदारी को लेकर लॉबिंग कर रही थी । जब उनकी बात नहीं बनी और जूरी ने वैद जी का नाम तय कर दिया तो उन्होंने एक कांग्रेसी से कृष्ण बलदेव वैद जी के खिलाफ पत्र लिखवा दिया । नतीजा यह हुआ कि अपसरशाही में जकड़ी हिंदी अकादमी ने उस पत्र के आधार पर वैद जी को पुरस्कार देने से मना कर दिया बिना ये सोचे समझे, बिना यह जाने की आपत्ति का आधार क्या है । दरअसल अकादमी के अफसरों को लगता है कि हिंदीवालों का विरोध फौरी होता है । जब अशोक चक्रधर को हिंदी अकादमी का उपाध्यक्ष बनाया गया था तो हिंदी के कई वरिष्ठ लेखकों ने घोर आपत्ति जताई थी । लेकिन चंद दिनों बाद वही साहित्यकार अशोक चक्रधर के सानिध्य में मंचासीन हो रहे थे । ना विरोध रहा और ना ही कोई दूरी । उस घटना के बाद अकादमी के अफसर बेपरवाह हो गए हैं । लेकिन अफसरों का इस बात का अंदाजा नहीं था कि इस बार इतनी संख्या में पुरस्कार ठुकरा दिए जाएंगे और मामला इतना संगीन हो जाएगा । शीला जी अब भी वक्त है अकादमी को कहिए कि अपनी गलती माने और कृष्ण बलदेव वैद जी माफी मांगकर उन्हें सम्मानित करे वर्ना होगा यह कि आप भी साहित्य और कला के मामले में भगवा खेमे में नजर आएंगी ।
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Thursday, March 18, 2010
महिलाओं से दुश्मनी क्यों
देशभर में महिलाओं को संसद में आरक्षण दिए जाने पर जोरदार बहस चल रही है । महिलाओं को और अधिकार देने और उसे भारतीय पुरुष प्रधान समाज में पुरुषों के बराबर दर्जा हासिल हो इस प्रयास को महिला आरक्षण बिल से बल मिला । लेकिन भारतीय महिला को ताकत मिले, वो देश की भागयविधाता बने, नीति-निर्धारण करे, यह बात हमारके देश में मौजूद धर्म के ठेकेदारों को मंजूर नहीं । महिला आरक्षण के समर्थन और विरोध के कोलाहल के बीच अयोध्या के राम जन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष महंथ नृत्यगोपाल दास ने एक बेहद आपत्तिजनक और अव्यावहारिक बयान जारी कर दिया । नृत्यगोपाल दास ने कहा कि महिलाओं को अकेले मंदिर, मठ या देवालय में नहीं जाना चाहिए । अगर वो मंदिर, मठ या देवालय जाती हैं तो उन्हें पिता, पुत्र या भाई के साथ ही जाना चाहिए । राम जन्मभूमि न्यास के ही वरिष्ठ सदस्य रामविलास वेदांती तो इससे भी एक कदम आगे जाकर कहते हैं कि महिलाओं के अकेले मंदिर में जाने पर प्रतिबंध लगा देना चाहिए । मेरे जानते सनातन धर्म के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है जब किसी हिंदू धर्म गुरू ने महिलाओं के मंदिर या मठ में जाने को लेकर ऐसी बात कही है । धर्म के इन दो ठेकेदारों के बयान के पीछे की मानसिकता और मनोविज्ञान पर विचार करने की आवश्यकता है । नृत्य गोपाल दास और वेदांती के ये विचार भारतीय परुष प्रधान समाज की जड़ मानसिकता और मनोविज्ञान का प्रतिनिधित्व करते हैं । इन्हें लगता है कि हर समस्या की जड़ में नारी और उसका सौंदर्य है । इन दो धर्मानुभावों को यह लगता है कि अगर महिलाएं मंदिर में अकेले गई तो साधुओं और पुजारियों का मन डोल जाएगा और कुछ भी अनहोनी घटित हो जाएगा । इन जैसे महंथों और वेदांतियों को लगता है कि दुनिया के सारे पापों की जड़ में नारी है ।बजाए साधुओं और महात्माओं को संयम का उपदेश देने के बजाए ये लोग महिलाओं को ही सावधानी बरतने की सालह दे रहे हैं । यहां ये यह भी भूल जाते हैं कि मन तो सनातन धर्म के सबसे श्रद्धेय मुनि विश्वामित्र का भी डोल गया था ।
लेकिन ये धर्मानुभाव भारतीय सनातन परंपरा को भूल गए हैं जहां मंदिरों में नारियों को सदियों से सम्मान मिलता रहा है । दक्षिण भारत में तो महिलाएं मंदिरों में रहती भी हैं । भगवान को समर्पित ये महिलाएं मंदिरों और देवालयों में देवदासी कहलाती है । कालांतर में धर्म के ठेकेदारों और मठाधीशों की वजह से देवदासी परंपरा भी बदनाम हुई और उसमें कुछ ऐसे तत्व घुस आए जो स्त्रियों का शोषण करने लगे और उस पवित्र परंपरा को देह व्यापार में तब्दील कर दिया ।
हद तो तब हो जाती है जब धर्म के ये ठेकेदार अपने बयानों के लिए शास्त्रों को आधार बनाते हैं । लेकिन धर्म के नाम पर अपनी दुकान चलानेवाले इन आचार्यों को कौन बताए कि शास्त्रों और धर्मग्रंथों में तो मंदिरों का उल्लेख ही नहीं मिलता है । आश्रमों का जिक्र अवश्य है । शास्त्रों में तो गंगा की पूजा होती थी, सूर्य की आराधना होती थी, शिव की पूजा का उल्लेख है लेकिन मंदिरों का उल्लेख नहीं है । रावण को भी जब शिव की पूजा करना था तो वो कैलाश पर्वत गया था किसी मंदिर या मठ में नहीं । पहली बार किसी मंदिरनुमा चीज का उल्लेख रामायण में मिलता है जब राम ने लंका जाने के क्रम में शिवलिंग की पूजा की थी, जो बाद में सेतुबंध शिवलिंग के नाम से जाना गया । कहना ना होगा कि धर्म के ये ठेकेदार शास्त्रों और धर्मग्रंथों को आधार बनाकर देश की भोली भाली जनता को बेवकूफ बनाते हैं, और यह कोई नई प्रवृत्ति नहीं है, ये सालों से चल रहा है । जरूरत इस बात की है कि महंथ और वेदांती के बयानों की जोरदार शब्दों में निंदा करनी चाहिए क्योंकि इस तरह के बयान स्त्रियों को पीछे धकेलने की साजिश है । क्या यह महज संयोग है कि नृत्य गोपाल दास के बयान के चंद दिनों बाद ही शिया धर्म गुरू कल्बे जव्वाद का भी स्त्रियों को लेकर एक बयान आता है जिसमें वो कहते हैं कि लीडर बनना औरतों का काम नहीं है, उनका काम लीडर पैदा करना है । जव्वाद के मुताबिक कुदरत ने अल्लाह ने उन्हें इसलिए बनाया है कि वो घर संभालें, अच्छी नस्ल के बच्चे पैदा करें । कल्बे जव्वाद के इस बयान के समर्थन देश के सबसे बड़े मदरसे नदवा कॉलेज के आला मौलाना ने भी किया । सवाल यह उठता है कि क्या हर धर्म के ठेकेदारों को सशक्त महिलाओं से डर क्यों लगता है । वो क्या वजह है जो धर्म, मजहब, जाति के नाम पर एक दूसरे के खिलाफ जहर उगलनेवाले तत्व महिलाओं को अधिकार देने के खिलाफ एक ही प्लेटफॉर्म पर साथ खड़े नजर आते हैं । इस सवाल का जबाव बेहद जरूरी है ।
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लेकिन ये धर्मानुभाव भारतीय सनातन परंपरा को भूल गए हैं जहां मंदिरों में नारियों को सदियों से सम्मान मिलता रहा है । दक्षिण भारत में तो महिलाएं मंदिरों में रहती भी हैं । भगवान को समर्पित ये महिलाएं मंदिरों और देवालयों में देवदासी कहलाती है । कालांतर में धर्म के ठेकेदारों और मठाधीशों की वजह से देवदासी परंपरा भी बदनाम हुई और उसमें कुछ ऐसे तत्व घुस आए जो स्त्रियों का शोषण करने लगे और उस पवित्र परंपरा को देह व्यापार में तब्दील कर दिया ।
हद तो तब हो जाती है जब धर्म के ये ठेकेदार अपने बयानों के लिए शास्त्रों को आधार बनाते हैं । लेकिन धर्म के नाम पर अपनी दुकान चलानेवाले इन आचार्यों को कौन बताए कि शास्त्रों और धर्मग्रंथों में तो मंदिरों का उल्लेख ही नहीं मिलता है । आश्रमों का जिक्र अवश्य है । शास्त्रों में तो गंगा की पूजा होती थी, सूर्य की आराधना होती थी, शिव की पूजा का उल्लेख है लेकिन मंदिरों का उल्लेख नहीं है । रावण को भी जब शिव की पूजा करना था तो वो कैलाश पर्वत गया था किसी मंदिर या मठ में नहीं । पहली बार किसी मंदिरनुमा चीज का उल्लेख रामायण में मिलता है जब राम ने लंका जाने के क्रम में शिवलिंग की पूजा की थी, जो बाद में सेतुबंध शिवलिंग के नाम से जाना गया । कहना ना होगा कि धर्म के ये ठेकेदार शास्त्रों और धर्मग्रंथों को आधार बनाकर देश की भोली भाली जनता को बेवकूफ बनाते हैं, और यह कोई नई प्रवृत्ति नहीं है, ये सालों से चल रहा है । जरूरत इस बात की है कि महंथ और वेदांती के बयानों की जोरदार शब्दों में निंदा करनी चाहिए क्योंकि इस तरह के बयान स्त्रियों को पीछे धकेलने की साजिश है । क्या यह महज संयोग है कि नृत्य गोपाल दास के बयान के चंद दिनों बाद ही शिया धर्म गुरू कल्बे जव्वाद का भी स्त्रियों को लेकर एक बयान आता है जिसमें वो कहते हैं कि लीडर बनना औरतों का काम नहीं है, उनका काम लीडर पैदा करना है । जव्वाद के मुताबिक कुदरत ने अल्लाह ने उन्हें इसलिए बनाया है कि वो घर संभालें, अच्छी नस्ल के बच्चे पैदा करें । कल्बे जव्वाद के इस बयान के समर्थन देश के सबसे बड़े मदरसे नदवा कॉलेज के आला मौलाना ने भी किया । सवाल यह उठता है कि क्या हर धर्म के ठेकेदारों को सशक्त महिलाओं से डर क्यों लगता है । वो क्या वजह है जो धर्म, मजहब, जाति के नाम पर एक दूसरे के खिलाफ जहर उगलनेवाले तत्व महिलाओं को अधिकार देने के खिलाफ एक ही प्लेटफॉर्म पर साथ खड़े नजर आते हैं । इस सवाल का जबाव बेहद जरूरी है ।
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Thursday, March 4, 2010
हुसैन पर विधवा विलाप क्यों ?
दुनिया भर में मशहूर कूची के जादूगर मकबूल फिदा हुसैन के कतर की नागरिकता स्वीकार करने पर देशभर में कुछ चुनिंदा वामपंथी सेकुलर लेखकों और कार्यकर्ताओं ने हो हल्ला मचाया । हुसैन के भारत छोड़ने को इन परम सेकुलरवादियों ने अभिवयक्ति की आजादी से जोड़ दिया । उन्हें लगने लगा कि भारत ने यह नायाब हीरा देश में संघ और उससे जुड़े अतिवादी हिंदुओं की वजह से खो दिया । वो इस बात को लेकर चिंतित दिखाई दिए कि हुसैन का विरोध इसलिए हो रहा है कि वो एक मुसलमान हैं । हुसैन के विरोधियों की इस बात के लिए भी लानत मलामत की गई कि वो कौन होते हैं यह कहने वाले कि हुसैन पैगंबर की तस्वीर बना कर दिखाएं । तर्क यह कि एक कलाकार को इस बात की स्वतंत्रता होनी चाहिए कि वो जो चाहे उसे चित्रित करे । लेकिन हुसैन के इस्लाम से संबंधित कोई भी चित्र नहीं बनाने से तथाकथित सेकुलरवादियों का यह तर्क कमजोर होता है । कुछ लोग यह भी कहते हैं कि कुरान इस बात कि इजाजत नहीं देता कि किसी भी वस्तु या व्यक्ति का चित्रण हो । लेकिन सवाल यह उठ खडा़ होता है कि क्या एक कलाकार की अभिव्यक्ति पवित्र कुरान और इस्लाम की सीमा में प्रवेश नहीं कर सकता ।
जबतक भारत में इन सवालों पर बहस होती या फिर कला और कलाकार के पक्ष में खड़े होने का दंभ भरनेवाले प्रगतिवादी-जनवादी लेखक विरोध का डंडा-झंडा संभालते हुसैन के एक इंटरव्यू ने उसकी हवा निकाल दी । हुसैन ने कतर से दिए एक इंटरव्यू में यह स्वीकार किया कि उनके भारत छोड़ने की वजह कुछ और भी है । हुसैन ने माना कि भारत में उनका रहना मुमकिन नहीं था लेकिन इसके बाद जो बात हुसैन ने कही उसपर तो छातीकूट अभियान चला रहे इन प्रगतिवादियों के पांव तले से भी जमीन खिसक गई । हुसैन ने अपने साक्षात्कार में कहा कि वो तीन मुख्य प्रोजेक्ट पर काम करना चाहते थे- पहला मोहनजोदाड़ो से लेकर मनमोहन सिंह तक के भारतीय सभ्यता का इतिहास, बेबीलोन और विश्व की दूसरी अन्य सभ्यताओं का इतिहास और भारतीय सिनेमा के सौ वर्षों का इतिहास । हुसैन ने माना कि भारत में इन प्रोजेक्ट्स पर काम करने के लिए उनको प्रायोजक नहीं मिल रहे थे । इसलिए जब कतर के शेख मोज़ा ने उनकी इस योजना को प्रायोजित करने की इच्छा जताई तो वो मना नहीं कर सके । मकबूल फिदा हुसैन ने यह भी माना कि भारत में कला के लिए उचित माहौल नहीं है लेकिन उसके पहले प्रायोजक नहीं मिले की बात कहकर हुसैन ने अपनी असली परेशानी जाहिर कर दी । इसके अलावा हुसैन ने जो एक बात और साफगोई से मानी वो यह कि भारत में टैक्स का ढांचा बेहद जटिल और परेशान करनेवाला है और यह भी उनके देश छोड़ने की वजहों में से एक है ।
हुसैन के इन बयानों से यह साफ हो गया कि हुसैन ने अतिवादियों से परेशान होकर तो भारत छोड़ा लेकिन उनकी परेशानी की वजह सिर्फ उनकी अभिवयक्ति की आजादी पर हमला नहीं था । अगर सिर्फ यह वजह होती तो हुसैन भारत जैसे सहिष्णु समाज को छोड़कर कतर जैसे कट्टर देश को नहीं चुनते । भारत में हुसैन को मुट्ठी भर लोगों का विरोध झेलना पड़ रहा था, कमोबेश वो अपनी कलाकृतियों में अपनी जादुई कूची का रंग भर सकते थे लेकिन कतर में वो सिर्फ एक दरबारी पेंटर भर होकर रह जाएंगे । अगर हुसैन को भारत में अभिव्यक्ति की आजादी नहीं मिल रही थी और वो भगवा ब्रिगेड की गुंडागर्दी से परेशान थे तो कतर में उन्हें कौन सी आजादी मिलेगी । भारत में जितने हुसैन के विरोधी हैं उनसे ज्यादा उनके समर्थक हैं । लेकिन पैसे और व्यावसायिक कारणों से हुसैन ने भारत को छोड़ने का फैसला लिया और उसे अभिव्यक्ति की आजाजदी से जोड़ने का खेल खेला गया । अब कतर में हुसैन मजे में हिंदू देवी देवताओं के नंगे और शर्मसार करनेवाले चित्र बेखौफ होकर बना पाएंगे , वहां के शासकों के पसंद का ख्याल रखेंगे । लेकिन क्या हुसैन वहां रहकर कतर के शासकों के चित्र में प्रयोग कर पाएंगे । क्या कतर की खूबसूरत औरतों में उन्हें अभिव्यक्ति की आजादी दिखाई देगी । क्या वहां के समाज की रूढिवादिता पर हुसैन की कूची चल सकेगी । या फिर भारी भरकम रकम के नीचे एक कलाकार की कला दब कर रह जाएगी ।
ये कुछ ऐसे सवाल हैं जिनपर भारत के बयानवीर लेखकों को विचार करना चाहिए । दरअसल मार्क्स के इन आधुनिक चेलों को मार्क्सवाद ने हर चीज को देखने की एक नई दृष्टि तो दी लेकिन उनकी दूसरी आंख से सचाई देखने की दृष्टि छीन ली । वो हर चीज को अब मार्क्सवाद के लाल चश्मे से देखने लगे । तस्लीमा का मामला अभी ताजा है । कर्नाटक के एक अखबार ने तस्लीमा के पुराने लेख को छाप दिया । जिसपर वहां कई जिलों में जमकर हिंसा हुई, विरोध इतना बढ़ा कि पुलिस को फायरिंग करनी पड़ी जिसमें दो लोगों की जान चली गई और लाखों की संपत्ति का नुकसान हुआ । विरोध बढ़ता देखकर कर्नाटक सरकार ने आनन-फानन में तस्लीमा के खिलाफ मुकदमा दर्ज करा दिया । जबकि तस्लीमा यह सफाई दे चुकी थी कि उन्होंने कन्नड़ के अखबार के लिए कोई लेख लिखा ही नहीं था । हुसैन के भारत छोड़ने पर बुक्का फाड़कर विलाप करनेवाले इन प्रगतिवादियों को तस्लीमा पर हो रहा अत्याचार नहीं दिखाई दे रहा । दरअसल मार्क्स के इन चेलों ने सबसे आधुनिक होने का दावा करनेवाले इस वाद को उतना ही भ्रष्ट किया है जितना हिंदू धर्म को पोंगा पंडितों ने । इन कथित मार्क्सवादियों के दोहरे रवैये की वजह से ही हिंदुओं, जो कि साधारणतया सहिष्णु होते हैं, के मन में भी यह सवाल उठने लगता है कि बुद्दिजीवियों का एक वर्ग सिर्फ हिंदुओं के खिलाफ ही सेकुलर क्यों होता है । प्रगतिशीलता का ताना-बाना धारण किए इन बुद्धिजीवियों को यह लगता है कि अगर वो हिंदुओं का विरोध नहीं करेंगे तो वो ना तो प्रगतिशील रह पाएंगे और ना ही सेकुलर ।
अंत में इतना कहना चाहता हूं कि हुसैन ने अपने इंटरव्यू में यह भी कहा कि भारतीय संविधान सिर्फ एक कागज का टुकडा़ है । अगर किसी भी देशवासी के मन में उसके संविधान को लेकर इतनी ही इज्जत है तो फिर वो देश छोड़कर जाए या रहे कोई फर्क नहीं पड़ता ।
जबतक भारत में इन सवालों पर बहस होती या फिर कला और कलाकार के पक्ष में खड़े होने का दंभ भरनेवाले प्रगतिवादी-जनवादी लेखक विरोध का डंडा-झंडा संभालते हुसैन के एक इंटरव्यू ने उसकी हवा निकाल दी । हुसैन ने कतर से दिए एक इंटरव्यू में यह स्वीकार किया कि उनके भारत छोड़ने की वजह कुछ और भी है । हुसैन ने माना कि भारत में उनका रहना मुमकिन नहीं था लेकिन इसके बाद जो बात हुसैन ने कही उसपर तो छातीकूट अभियान चला रहे इन प्रगतिवादियों के पांव तले से भी जमीन खिसक गई । हुसैन ने अपने साक्षात्कार में कहा कि वो तीन मुख्य प्रोजेक्ट पर काम करना चाहते थे- पहला मोहनजोदाड़ो से लेकर मनमोहन सिंह तक के भारतीय सभ्यता का इतिहास, बेबीलोन और विश्व की दूसरी अन्य सभ्यताओं का इतिहास और भारतीय सिनेमा के सौ वर्षों का इतिहास । हुसैन ने माना कि भारत में इन प्रोजेक्ट्स पर काम करने के लिए उनको प्रायोजक नहीं मिल रहे थे । इसलिए जब कतर के शेख मोज़ा ने उनकी इस योजना को प्रायोजित करने की इच्छा जताई तो वो मना नहीं कर सके । मकबूल फिदा हुसैन ने यह भी माना कि भारत में कला के लिए उचित माहौल नहीं है लेकिन उसके पहले प्रायोजक नहीं मिले की बात कहकर हुसैन ने अपनी असली परेशानी जाहिर कर दी । इसके अलावा हुसैन ने जो एक बात और साफगोई से मानी वो यह कि भारत में टैक्स का ढांचा बेहद जटिल और परेशान करनेवाला है और यह भी उनके देश छोड़ने की वजहों में से एक है ।
हुसैन के इन बयानों से यह साफ हो गया कि हुसैन ने अतिवादियों से परेशान होकर तो भारत छोड़ा लेकिन उनकी परेशानी की वजह सिर्फ उनकी अभिवयक्ति की आजादी पर हमला नहीं था । अगर सिर्फ यह वजह होती तो हुसैन भारत जैसे सहिष्णु समाज को छोड़कर कतर जैसे कट्टर देश को नहीं चुनते । भारत में हुसैन को मुट्ठी भर लोगों का विरोध झेलना पड़ रहा था, कमोबेश वो अपनी कलाकृतियों में अपनी जादुई कूची का रंग भर सकते थे लेकिन कतर में वो सिर्फ एक दरबारी पेंटर भर होकर रह जाएंगे । अगर हुसैन को भारत में अभिव्यक्ति की आजादी नहीं मिल रही थी और वो भगवा ब्रिगेड की गुंडागर्दी से परेशान थे तो कतर में उन्हें कौन सी आजादी मिलेगी । भारत में जितने हुसैन के विरोधी हैं उनसे ज्यादा उनके समर्थक हैं । लेकिन पैसे और व्यावसायिक कारणों से हुसैन ने भारत को छोड़ने का फैसला लिया और उसे अभिव्यक्ति की आजाजदी से जोड़ने का खेल खेला गया । अब कतर में हुसैन मजे में हिंदू देवी देवताओं के नंगे और शर्मसार करनेवाले चित्र बेखौफ होकर बना पाएंगे , वहां के शासकों के पसंद का ख्याल रखेंगे । लेकिन क्या हुसैन वहां रहकर कतर के शासकों के चित्र में प्रयोग कर पाएंगे । क्या कतर की खूबसूरत औरतों में उन्हें अभिव्यक्ति की आजादी दिखाई देगी । क्या वहां के समाज की रूढिवादिता पर हुसैन की कूची चल सकेगी । या फिर भारी भरकम रकम के नीचे एक कलाकार की कला दब कर रह जाएगी ।
ये कुछ ऐसे सवाल हैं जिनपर भारत के बयानवीर लेखकों को विचार करना चाहिए । दरअसल मार्क्स के इन आधुनिक चेलों को मार्क्सवाद ने हर चीज को देखने की एक नई दृष्टि तो दी लेकिन उनकी दूसरी आंख से सचाई देखने की दृष्टि छीन ली । वो हर चीज को अब मार्क्सवाद के लाल चश्मे से देखने लगे । तस्लीमा का मामला अभी ताजा है । कर्नाटक के एक अखबार ने तस्लीमा के पुराने लेख को छाप दिया । जिसपर वहां कई जिलों में जमकर हिंसा हुई, विरोध इतना बढ़ा कि पुलिस को फायरिंग करनी पड़ी जिसमें दो लोगों की जान चली गई और लाखों की संपत्ति का नुकसान हुआ । विरोध बढ़ता देखकर कर्नाटक सरकार ने आनन-फानन में तस्लीमा के खिलाफ मुकदमा दर्ज करा दिया । जबकि तस्लीमा यह सफाई दे चुकी थी कि उन्होंने कन्नड़ के अखबार के लिए कोई लेख लिखा ही नहीं था । हुसैन के भारत छोड़ने पर बुक्का फाड़कर विलाप करनेवाले इन प्रगतिवादियों को तस्लीमा पर हो रहा अत्याचार नहीं दिखाई दे रहा । दरअसल मार्क्स के इन चेलों ने सबसे आधुनिक होने का दावा करनेवाले इस वाद को उतना ही भ्रष्ट किया है जितना हिंदू धर्म को पोंगा पंडितों ने । इन कथित मार्क्सवादियों के दोहरे रवैये की वजह से ही हिंदुओं, जो कि साधारणतया सहिष्णु होते हैं, के मन में भी यह सवाल उठने लगता है कि बुद्दिजीवियों का एक वर्ग सिर्फ हिंदुओं के खिलाफ ही सेकुलर क्यों होता है । प्रगतिशीलता का ताना-बाना धारण किए इन बुद्धिजीवियों को यह लगता है कि अगर वो हिंदुओं का विरोध नहीं करेंगे तो वो ना तो प्रगतिशील रह पाएंगे और ना ही सेकुलर ।
अंत में इतना कहना चाहता हूं कि हुसैन ने अपने इंटरव्यू में यह भी कहा कि भारतीय संविधान सिर्फ एक कागज का टुकडा़ है । अगर किसी भी देशवासी के मन में उसके संविधान को लेकर इतनी ही इज्जत है तो फिर वो देश छोड़कर जाए या रहे कोई फर्क नहीं पड़ता ।
Saturday, February 20, 2010
अभिवयक्ति की अराजकता
साहित्य अकादमी के पुरस्कार वितरण समारोह में कुछ हिंदू सगंठनों के विरोध से साहित्यिक जगत में तूफान उठ खड़ा हुआ है । प्रगतिवाद और जनवाद के तथाकथित ठेकेदार इसको लेखकीय अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर भगवा हमला करार दे रहे हैं । इन बयानवीर जनवादियों को समारोह के दौरान हुए विरोध प्रदर्शन में फासीवाद की आहट भी सुनाई दे रही है । लेकिन किसी भी विरोध पर हल्ला मचानेवाले ये प्रगितवादी लेखक यह भूल जाते हैं कि विरोध और विवाद के पीछे की वजह क्या है । दरअसल इस विवाद के पीछे पूर्व सांसद और लेखक वाई लक्ष्मी प्रसाद का उपन्यास द्रौपदी है, जिसपर उन्हें इस वर्ष साहित्य अकादमी का पुरस्कार मिला है । इस उपन्यास में लक्ष्मी प्रसाद ने द्रौपदी के चरित्र और कृष्ण से उसके संबंधों को कल्पना के आधार पर एक बेहद घिनौना रूप दिया है । भारतीय जनमानस में महाभारत और उसके पात्रों को लेकर सदियों से एक स्थापित मान्यता है । हिंदू जनमानस में द्रोपदी को सम्मान और श्रद्धा की नजर से देखा जाता है । लेकिन लक्ष्मी प्रसाद ने पौराणिक आख्यानों के आधार पर बुनी गई या स्थापित द्रौपदी की छवि को ध्वस्त करने की घृणित कोशिश की है । अभिवयक्ति की आजादी के नाम पर पौराणिक आख्यानों या फिर धार्मिक चरित्रों के साथ छेड-छाड़ की इजाजत किसी भी लेखक को नहीं है । मिथकों की जड़े लोकमानस में बहुत गहरी और व्यापक हैं इस वजह से रचनाकार से विवेकपू्र्ण सतर्कता अपेक्षित है । हर मिथक और प्रतीक की एक संभावना होती है, उस संभावना की दिशा में ही लेखक को उसका इस्तेमाल करना चाहिए और एक सीमा के बाद उसे विरुपित नहीं किया जाना चाहिए । जिस लेखक को मिथक की विराटता में अपनी क्षुद्रता भरनी हो उसे मिथक का इस्तेमाल सृजनात्मक लेखन में नहीं करना चाहिए ।
सृजनात्मक लेखन में अनेकों ऐसे उदाहरण हैं जहां धार्मिक प्रतीकों, पौराणिक मिथकों या फिर धार्मिक चरित्रों का इस्तेमाल किया गया है । ईसा, राम, कृष्ण, द्रौपदी, सीता, अहिल्या कर्ण आदि अनेक पात्रों का उपयोग हिंदी के कई लेखकों ने किया है । आधुनिक हिंदी काव्य की दो बड़ी रचनाएं कामायनी और राम की शक्ति पूजा पौराणिक धार्मिक मिथकों को आधार बनाकर मानवीय और राष्ट्रीय संदर्भों में उनकी युगीन व्याख्या करते हैं । शिवाजी सावंत ने अपने उपन्यास मृत्युंजय में कर्ण को समूची पीड़ित, दलित और शोषित जनता का प्रतीक बना दिया है । रांगेय राघव के अलावा भी कई प्रगतिशील लेखकों ने अपने लेखन में पौराणिक और धार्मिक प्रतीकों का उपयोग किया है, लेकिन इन सभी लेखकों ने प्रचलित और स्थापित मान्यताओं के खिलाफ जाकर किसी का भी चरित्र हनन नहीं किया है । तर्कसंगत तरीके से उनके व्यक्तित्व की कमियों को उजागर अवश्य किया है । हर युग में कवियों ने भी पौराणिक मिथकों को नए ढंग से रचा है । तुलसीदास जो रामकथा में पाते हैं वो नरेश मेहता नहीं पाते । सूरदास के यहां जो कृष्णकथा है वो धर्मवीर भारती के यहां नहीं है । अमेरिका में हॉवर्ड फास्ट ने भी पौराणिक और ऐतिहासिक प्रतीकों का उपयोग किया है लेकिन उनके संदर्भ बेहद आधुनिक हैं ।
लेकिन लक्ष्मी प्रसाद की इस कृति के समर्थन में खडे होकर एक बार फिर से इन प्रगतिवादी और जनवादियों का दोहरा चरित्र उजागर हुआ है । अभिवयक्ति की आजादी के नाम पर कुछ लेखकों ने हिंदू धर्म, उसकी मान्यताएं और उनके देवी देवताओं पर किसी भी तरह की टिप्पणी की स्वतंत्रता ले रखी है । राजेन्द्र यादव कभी हनुमान को आतंकवादी कह देते हैं, एफएम हुसैन भारत माता की नंगी तस्वीर बना देते हैं । जब इनका विरोध होता है तो उसपर छाती पीटते हैं और देश पर संकटकाल की डुगडुगी बजाते हैं । क्या इन लेखकों में हिम्मत है कि वो इस्लाम या मोहम्मद साहब के बारे में कुछ लिख सकें । क्या एम एफ हुसैन में यह हिम्मत है कि जिस तरह की पेंटिंग वो हिंदू देवी-देवताओं की बनाते हैं उसी स्वतंत्रता के साथ वो इस्लाम धर्म से जुड़े पात्रों या चरित्रों का चित्रण कर सकें । सलमान रश्दी और तस्लीमा नसरीन ने इस्लाम के खिलाफ लिखने की हिम्मत दिखाई तो आज उनकी स्थिति किसी से छुपी नहीं है । सलमान भारी सुरक्षा के बीच जिंदगी बिता रहे हैं और तसलीमा दर-बदर की ठोकरें खा रही हैं । अभी बहुत ज्यादा दिन नहीं बीते हैं जब कि एक डेनिश कार्टूनिस्ट ने पैगंबर साहब का कार्टून बना दिया था । नतीजा यह हुआ कि अल कायदा तक के लोग उसकी जान के पीछे पड़ गए थे । भारत में भी एक पत्रिका के संपादक और उसके मालिक को इस कार्टून को छापने पर जेल की हवा खानी पड़ी थी । तब तो किसी भी प्रगतिशील लेखक को अभिवयक्ति की स्वतंत्रता की याद नहीं आई थी । मेरा सवाल सिर्फ इतना सा है कि ये जो जनवाद और प्रगतिवाद का झंडा बुलंद करनेवाले लेखक और प्रोफेसर हैं वो बार-बार हिंदुओं की सहिष्णुता की परीक्षा क्यों लेना चाहते हैं । इन जैसे दोहरे चरित्र के लोगों की वजह से ही हिंदुओं का मन खट्टा होता है और उनमें कट्टरता बढ़ती है और समाज में वैमनस्यता फैलती है । कोई भी चीज अगर गलत है तो इसका आधार तो समान रूप से हर समुदाय और धर्म के लोगों पर लागू होता है या फिर हिंदुओं के लिए अभिव्यक्ति की आजादी का आधार कुछ और होता है और इन्य समुदाय के लोगों के लिए कुछ और ।
किसी भी कृति में मिथक या धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल वहां तक ही ठीक होता है जहांतक वो मनुष्य के अंतर्जगत को व्याख्यायित कर सके या फिर मनुष्यों के आपसी संवंधों को एक नई दिशा दे सके । अभिव्यक्ति के आजादी के नाम पर अभिवयक्ति की अराजकता की इजाजत किसी को भी नहीं दी जा सकती है । साहित्य अकादमी एक स्वायत्त संस्था है और प्रगतिशील लेखकों ने ही इस पर दक्षिणपंथी होने का आरोप जड़ा था लेकिन अब वही जनवादी और प्रगतिवादी लेखक और संगठन साहित्य अकादमी के पक्ष में खड़े दिखाई दे रहे हैं । ये तो जनवाद की मौकापरस्ती का एक ताजा नमूना है, इतिहास में इसके सैकड़ों उदाहरण हैं । अब वक्त आ गया है कि इन लोगों और संगठनों को अपने गिरेबां में झांककर आत्ममंथन करना चाहिए । अगर ये समय रहते नहीं चेते तो अभी तो सिर्फ अप्रासंगिक हुए हैं, आनेवाले दिनों में वो इतिहास के पन्नों में भी जगह नहीं पा सकेंगे
सृजनात्मक लेखन में अनेकों ऐसे उदाहरण हैं जहां धार्मिक प्रतीकों, पौराणिक मिथकों या फिर धार्मिक चरित्रों का इस्तेमाल किया गया है । ईसा, राम, कृष्ण, द्रौपदी, सीता, अहिल्या कर्ण आदि अनेक पात्रों का उपयोग हिंदी के कई लेखकों ने किया है । आधुनिक हिंदी काव्य की दो बड़ी रचनाएं कामायनी और राम की शक्ति पूजा पौराणिक धार्मिक मिथकों को आधार बनाकर मानवीय और राष्ट्रीय संदर्भों में उनकी युगीन व्याख्या करते हैं । शिवाजी सावंत ने अपने उपन्यास मृत्युंजय में कर्ण को समूची पीड़ित, दलित और शोषित जनता का प्रतीक बना दिया है । रांगेय राघव के अलावा भी कई प्रगतिशील लेखकों ने अपने लेखन में पौराणिक और धार्मिक प्रतीकों का उपयोग किया है, लेकिन इन सभी लेखकों ने प्रचलित और स्थापित मान्यताओं के खिलाफ जाकर किसी का भी चरित्र हनन नहीं किया है । तर्कसंगत तरीके से उनके व्यक्तित्व की कमियों को उजागर अवश्य किया है । हर युग में कवियों ने भी पौराणिक मिथकों को नए ढंग से रचा है । तुलसीदास जो रामकथा में पाते हैं वो नरेश मेहता नहीं पाते । सूरदास के यहां जो कृष्णकथा है वो धर्मवीर भारती के यहां नहीं है । अमेरिका में हॉवर्ड फास्ट ने भी पौराणिक और ऐतिहासिक प्रतीकों का उपयोग किया है लेकिन उनके संदर्भ बेहद आधुनिक हैं ।
लेकिन लक्ष्मी प्रसाद की इस कृति के समर्थन में खडे होकर एक बार फिर से इन प्रगतिवादी और जनवादियों का दोहरा चरित्र उजागर हुआ है । अभिवयक्ति की आजादी के नाम पर कुछ लेखकों ने हिंदू धर्म, उसकी मान्यताएं और उनके देवी देवताओं पर किसी भी तरह की टिप्पणी की स्वतंत्रता ले रखी है । राजेन्द्र यादव कभी हनुमान को आतंकवादी कह देते हैं, एफएम हुसैन भारत माता की नंगी तस्वीर बना देते हैं । जब इनका विरोध होता है तो उसपर छाती पीटते हैं और देश पर संकटकाल की डुगडुगी बजाते हैं । क्या इन लेखकों में हिम्मत है कि वो इस्लाम या मोहम्मद साहब के बारे में कुछ लिख सकें । क्या एम एफ हुसैन में यह हिम्मत है कि जिस तरह की पेंटिंग वो हिंदू देवी-देवताओं की बनाते हैं उसी स्वतंत्रता के साथ वो इस्लाम धर्म से जुड़े पात्रों या चरित्रों का चित्रण कर सकें । सलमान रश्दी और तस्लीमा नसरीन ने इस्लाम के खिलाफ लिखने की हिम्मत दिखाई तो आज उनकी स्थिति किसी से छुपी नहीं है । सलमान भारी सुरक्षा के बीच जिंदगी बिता रहे हैं और तसलीमा दर-बदर की ठोकरें खा रही हैं । अभी बहुत ज्यादा दिन नहीं बीते हैं जब कि एक डेनिश कार्टूनिस्ट ने पैगंबर साहब का कार्टून बना दिया था । नतीजा यह हुआ कि अल कायदा तक के लोग उसकी जान के पीछे पड़ गए थे । भारत में भी एक पत्रिका के संपादक और उसके मालिक को इस कार्टून को छापने पर जेल की हवा खानी पड़ी थी । तब तो किसी भी प्रगतिशील लेखक को अभिवयक्ति की स्वतंत्रता की याद नहीं आई थी । मेरा सवाल सिर्फ इतना सा है कि ये जो जनवाद और प्रगतिवाद का झंडा बुलंद करनेवाले लेखक और प्रोफेसर हैं वो बार-बार हिंदुओं की सहिष्णुता की परीक्षा क्यों लेना चाहते हैं । इन जैसे दोहरे चरित्र के लोगों की वजह से ही हिंदुओं का मन खट्टा होता है और उनमें कट्टरता बढ़ती है और समाज में वैमनस्यता फैलती है । कोई भी चीज अगर गलत है तो इसका आधार तो समान रूप से हर समुदाय और धर्म के लोगों पर लागू होता है या फिर हिंदुओं के लिए अभिव्यक्ति की आजादी का आधार कुछ और होता है और इन्य समुदाय के लोगों के लिए कुछ और ।
किसी भी कृति में मिथक या धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल वहां तक ही ठीक होता है जहांतक वो मनुष्य के अंतर्जगत को व्याख्यायित कर सके या फिर मनुष्यों के आपसी संवंधों को एक नई दिशा दे सके । अभिव्यक्ति के आजादी के नाम पर अभिवयक्ति की अराजकता की इजाजत किसी को भी नहीं दी जा सकती है । साहित्य अकादमी एक स्वायत्त संस्था है और प्रगतिशील लेखकों ने ही इस पर दक्षिणपंथी होने का आरोप जड़ा था लेकिन अब वही जनवादी और प्रगतिवादी लेखक और संगठन साहित्य अकादमी के पक्ष में खड़े दिखाई दे रहे हैं । ये तो जनवाद की मौकापरस्ती का एक ताजा नमूना है, इतिहास में इसके सैकड़ों उदाहरण हैं । अब वक्त आ गया है कि इन लोगों और संगठनों को अपने गिरेबां में झांककर आत्ममंथन करना चाहिए । अगर ये समय रहते नहीं चेते तो अभी तो सिर्फ अप्रासंगिक हुए हैं, आनेवाले दिनों में वो इतिहास के पन्नों में भी जगह नहीं पा सकेंगे
Thursday, February 18, 2010
निराशा की किरण
भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत हो रही है , भारत विकास कर रहा है, आनेवाले कुछ वर्षों में भारत विश्व की चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था हो जाएगी, विश्व मंच पर भारत की बात गंभीरता से सुनी जाने लगी है, आदि-आदि जाने कितनी बातें पढ़ते सुनते जानते यह लगता है कि देश सचमुच तरक्की कर रहा है, हम मजबूत हो रहे हैं । सरकार भी इस बात का एहसास कराने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ती कि देश की जनता खुशहाल हो रही है और सरकार आम आदमी का ध्यान रख रही है । लेकिन देश के प्रधानमंत्री के आवास और कार्यालय से तकरीबन बीस किलोमीटर की दूरी पर औसतन हर दो दिन पर मानसिक रूप से बीमार रोगी बेहतर इलाज और रहन सहन के आभाव में दम तोड़ रहे हैं । राजधानी दिल्ली में मानसिक रूप से बीमार लोगों की आश्रय स्थली आशा किरण में लगातार हो रही मौत से विकास और खुशहाली के सारे दावों की पोल खुल रही है । दिल्ली की शीला दीक्षित सरकार चाहे लाख दावे करे लेकिन राजधानी में लगभग दो महीने में 26 मंदबुद्धि और मानसिक रूप से कमजोर और बीमार लोगों की मौत ने उनकी सरकार की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए है । दिल्ली सरकार के समाज कल्याण मंत्रालय की यह जिम्मेदारी है कि वो ये सुनिश्चित करे कि मानसिक रूप से बीमार लोगों को पर्याप्त सुविधाएं मिले । लेकिन आशा किरण होम में क्षमता से दुगने मरीज ठूंस दिए गए हैं, और भ्रष्टाचार की वजह से उनके रहन सहन और बीमारी के इलाज की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है । हर मौत के बाद जब सवाल खड़े होते हैं तो जांच की बात कर सरकार अपना पल्ला झाड़ लेती है । देश की राजधानी दिल्ली में मानसिक रूप से बीमार लोगों की यह हालत है तो देश के अन्य इलाकों और सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में इन रोगियों की हालत क्या होगी आप अंदाजा लगा सकते हैं ।
दरअसल ऐसा करके शीला दीक्षित की सरकार संविधान का भी अनादर कर रही है । देश के संविधान की प्रस्तावना भारतवासियों को समानता का अधिकार प्रदान करती है । संविधान साफ तौर पर यह कहता है कि धर्म, जाति, जन्म स्थान, लिंग के आधार पर कोई भी भेदभाव नहीं किया जा सकता है । राइट टू लिव विद डिगनिटी भी भारतवासी का अधिकार है । और सरकार को इन अधिकारों को सुरक्षित करना है । प्रतिष्ठापूर्वक जीवन के अधिकार की गारंटी सिर्फ भारतीय संविधान ही नहीं बल्कि कई अंतराष्ट्रीय संधियां भी देती है । अस्सी के दशक में मानसिक रूप से बीमार लोगों के अधिकारों को लेकर अंतराष्ट्रीय स्तर पर जोरदार मुहिम चली थी । नतीजा यह हुआ कि संयुक्त राष्ट्र संघ की साधारण सभा ने मानसिक रूप से बीमार लोगों को सम्मानपूर्व जीने के अधिकारो को लेकर एक घोषणा पत्र को मंजूरी दी । इस घोषणा-पत्र की धारा पच्चीस के मुताबिक हर व्यक्ति को बेरोजगारी, बीमारी, विकलांगता, बुढापा या फिर कोई ऐसी वजह जिसपर उसका नियंत्रण ना हो, की हालात में जीने के अधिकार की सुरक्षा दी जाएगी । और संयुक्त राष्ट्र के सदस्य होने के नाते हमारे देश पर भी इसे लागू करने की जिम्मेदारी है । लेकिन दिल्ली सरकार देश के संविधान के साथ-साथ अंतराष्ट्रीय मानकों की भी धज्जियां उड़ा रही है ।
मानसिक रोग एक ऐसी ही परिस्थिति है जिसमें बीमार व्यक्ति को यह नहीं पता होता है कि वो क्या और क्यों कर रहा है । उसे एक ऐसे वातावरण की जरूरत होती है जहां वो अपने आपको सहज और सुरक्षित महसूस कर सके । इसी तरह के वातावरण के निर्माण के लिए बनाए गए आशा किरण में इन रोगियों को सिर्फ निराशा की किरण ही नजर आती है । मानसिक रूप से बीमार लोगों को लेकर सरकार बेहद सवंदनहीन रहती है और वोट बैंक की राजनीति करने वाली राजनीतिक पार्टियों को भी इन मंदबुद्धि लोगों की पीड़ा का एहसास तक नहीं होता है । हमारा समाज भी इनके प्रति बहुधा उदासीन ही रहता है और मंदबुद्धि और मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति को परिवार पर बोझ समझा जाता है । उन्हें पागल मानकर मानसिक आरोग्यशाला में भर्ती करवाकर परिवार के लोग जैसे छुटकारा पाना चाहते हैं जबकि उन्हें यह नहीं मालूम कि अगर मानसिक रूप से बीमार मरीज अपने घर में रहेगा तो उसमें सुधार जल्द आने की संभावना बढ़ जाती है । यहां हम याद दिलाते चलें कि रामनाथपुरम के पास दिमागी तौर पर बीमार लोगों के एक हॉस्टल में लगी आग में 25 मरीज जिंदा जल कर मर गए थे, क्योंकि उनकी मानसिक स्थिति के मद्देनजर रात में उन्हें बिस्तर से बांध दिया जाता था । इसलिए जब आग लगी तो लोहे की जंजीर में जकड़े ये मरीज बिस्तर पर ही खाक हो गए ।
आज जरूरत इस बात की है कि सरकार इस तरह के बीमार लोगों के प्रति संवेदनशीव रवैया अपनाए और उन्हें हर तरह की सुरक्षा की गारंटी देने का इंतजाम करे । अगर ऐसा नहीं होता है तो विकास और सामाजिक बदलाव की बात बेमानी और हवाई ही रहेगी ।
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दरअसल ऐसा करके शीला दीक्षित की सरकार संविधान का भी अनादर कर रही है । देश के संविधान की प्रस्तावना भारतवासियों को समानता का अधिकार प्रदान करती है । संविधान साफ तौर पर यह कहता है कि धर्म, जाति, जन्म स्थान, लिंग के आधार पर कोई भी भेदभाव नहीं किया जा सकता है । राइट टू लिव विद डिगनिटी भी भारतवासी का अधिकार है । और सरकार को इन अधिकारों को सुरक्षित करना है । प्रतिष्ठापूर्वक जीवन के अधिकार की गारंटी सिर्फ भारतीय संविधान ही नहीं बल्कि कई अंतराष्ट्रीय संधियां भी देती है । अस्सी के दशक में मानसिक रूप से बीमार लोगों के अधिकारों को लेकर अंतराष्ट्रीय स्तर पर जोरदार मुहिम चली थी । नतीजा यह हुआ कि संयुक्त राष्ट्र संघ की साधारण सभा ने मानसिक रूप से बीमार लोगों को सम्मानपूर्व जीने के अधिकारो को लेकर एक घोषणा पत्र को मंजूरी दी । इस घोषणा-पत्र की धारा पच्चीस के मुताबिक हर व्यक्ति को बेरोजगारी, बीमारी, विकलांगता, बुढापा या फिर कोई ऐसी वजह जिसपर उसका नियंत्रण ना हो, की हालात में जीने के अधिकार की सुरक्षा दी जाएगी । और संयुक्त राष्ट्र के सदस्य होने के नाते हमारे देश पर भी इसे लागू करने की जिम्मेदारी है । लेकिन दिल्ली सरकार देश के संविधान के साथ-साथ अंतराष्ट्रीय मानकों की भी धज्जियां उड़ा रही है ।
मानसिक रोग एक ऐसी ही परिस्थिति है जिसमें बीमार व्यक्ति को यह नहीं पता होता है कि वो क्या और क्यों कर रहा है । उसे एक ऐसे वातावरण की जरूरत होती है जहां वो अपने आपको सहज और सुरक्षित महसूस कर सके । इसी तरह के वातावरण के निर्माण के लिए बनाए गए आशा किरण में इन रोगियों को सिर्फ निराशा की किरण ही नजर आती है । मानसिक रूप से बीमार लोगों को लेकर सरकार बेहद सवंदनहीन रहती है और वोट बैंक की राजनीति करने वाली राजनीतिक पार्टियों को भी इन मंदबुद्धि लोगों की पीड़ा का एहसास तक नहीं होता है । हमारा समाज भी इनके प्रति बहुधा उदासीन ही रहता है और मंदबुद्धि और मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति को परिवार पर बोझ समझा जाता है । उन्हें पागल मानकर मानसिक आरोग्यशाला में भर्ती करवाकर परिवार के लोग जैसे छुटकारा पाना चाहते हैं जबकि उन्हें यह नहीं मालूम कि अगर मानसिक रूप से बीमार मरीज अपने घर में रहेगा तो उसमें सुधार जल्द आने की संभावना बढ़ जाती है । यहां हम याद दिलाते चलें कि रामनाथपुरम के पास दिमागी तौर पर बीमार लोगों के एक हॉस्टल में लगी आग में 25 मरीज जिंदा जल कर मर गए थे, क्योंकि उनकी मानसिक स्थिति के मद्देनजर रात में उन्हें बिस्तर से बांध दिया जाता था । इसलिए जब आग लगी तो लोहे की जंजीर में जकड़े ये मरीज बिस्तर पर ही खाक हो गए ।
आज जरूरत इस बात की है कि सरकार इस तरह के बीमार लोगों के प्रति संवेदनशीव रवैया अपनाए और उन्हें हर तरह की सुरक्षा की गारंटी देने का इंतजाम करे । अगर ऐसा नहीं होता है तो विकास और सामाजिक बदलाव की बात बेमानी और हवाई ही रहेगी ।
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Thursday, February 11, 2010
कांग्रेस का नया अर्जुन
आजादी के बाद के चुनावों में उत्तर प्रदेश में अल्पसंख्यकों के वोट कमोबेश कांग्रेस पार्टी को ही मिलते रहे हैं । सन बानवे में बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद मुसलमानों का कांग्रेस से मोहभंग हुआ और उसका वोट कांग्रेस की झोली से निकलकर मुलायम के पास पहुंच गया । लेकिन पिछले लोकसभा चुनाव के वक्त मुलायम सिंह यादव ने बाबरी मस्जिद विध्वंस के वक्त उत्तर प्रदेश के मुखयमंत्री रह चुके पूर्व भाजपा नेता कल्याण सिंह को अपना सहयोगी बना लिया । लोकसभा चुनाव के नतीजों ने यह साफ कर दिया कि मुलायम के लिए कल्याण की यह दोस्ती भारी पड़ी । उत्तर प्रदेश में ढाई साल बाद एक बार फिर से विधानसभा चुनाव होनेवाले हैं और लोकसभा चुनावों में पार्टी की सफलता से उत्साहित कांग्रेसियों की नजर एक बार फिर से मुस्लिम मतदाताओं पर है । पार्टी नेताओं को यह लगने लगा है कि अगर मुसलमानों को एक बार फिर से साध लिया गया तो प्रदेश में मरणासन्न पार्टी को नई संजीवनी मिल सकती है ।
अपनी इसी योजना को लेकर पार्टी के उत्तर प्रदेश प्रभारी दिग्विजय सिंह आजमगढ़ के संजरपुर पहुंचते हैं । संजरपुर वो कस्बा है जहां के कुछ युवकों पर आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होने का आरोप लगता रहा है । वहां पहुंचकर दिग्विजय सिंह को अचानक दिल्ली ब्लास्ट के बाद हुए बटला एनकाउंटर की याद आती है । स्थानीय लोगों का जोरदार विरोध और काले झंडे के बावजूद जब दिग्विजय सिंह को बोलने का मौका मिला तो उन्होंने एक शातिर राजनेता की तरह लोगों की दुखती रग पर हाथ रख दिया । इशारों-इशारों में बटला हाउस एनकांउटर के फर्जी होने की बात कर डाली । दिग्विजय ने कहा कि उन्होंने बटला हाउस एनकाउंटर के फोटोग्राफ्स देखे हैं जिनमें आतंकवादियों के सर में गोली लगी है । उनके मुताबिक दहशतगर्दों के खिलाफ एनकाउंटर में इस तरह से गोली लगना नामुमकिन है । जाहिर है इशारा और इरादा दोनों साफ था । दिग्विजय सिंह को अगर बटला हाउस एनकाउंटर की सत्यता पर संदेह था तो डेढ साल से चुप क्यों थे । संजरपुर पहुंचकर ही दिग्गी राजा को बटला हाउस की याद क्यों आई । आपको याद दिलाते चलें कि दो हजार आठ के सितंबर में दिल्ली के बटला हाउस इलाके में हुए एक एनकाउंटर में दिल्ली पुलिस के जांबाज सिपाहियों ने दो आतंकवादियों को ढेर कर दिया था । आतंकवादियों से लड़ते हुए उस मुठभेड़ में दिल्ली पुलिस के जांबाज इंसपेक्टर मोहन चंद्र शर्मा शहीद हो गए थे और एक हेड कांस्टेबल बुरी तरह से जख्मी हो गया था । दो साल पहले जब यह एनकाउंटर हुआ था, उस वक्त भी इसपर सवाल खड़े हुए थे । लेकिन बाद में अदालत और सरकारी जांच में ये साबित हो गया कि मुठभेड़ सही था ।
जब दिग्विजय सिंह संजरपुर में ये बयान दे रहे थे उसके दो दिन पहले यूपी एसटीएफ ने दिल्ली समेत कई शहरों में हुए बम धमाकों के आरोपी आतंकवादी शहजाद को धर दबोचा था । शहजाद ने इस सिलसिले में कई सनसनीखेज खुलासे भी किए और यह भी माना कि दिल्ली पुलिस के इंसपेक्टर मोहनचंद शर्मा उसकी ही गोली का निशाना बने । लेकिन एनकाउंटर के फोटग्राफ्स को ध्यान से देखनेवाले कांग्रेस पार्टी के इस वरिष्ठ नेता को शहजाद के बयानों को पढने की फुर्त कहां । इन बातों से बेखबर दिग्विजय ने संजरपुर में बटला हाउस एनकाउंटर को ही संदेहास्पद करार दे दिया । ये इस एनकाउंटर में मारे गए शहीद मोहनचंद शर्मा का अपमान भी है ।
जाहिर था दिग्विजय सिंह के इस बयान के बाद सियासी गलियारों में हड़कंप मचा और भारतीय जनता पार्टी ने दिग्विजय सिंह के बहाने कांग्रेस पार्टी पर निशाना साधा । आनन फानन में कांग्रेस ने दिग्विजय के बयान से खुद को अलग कर लिया । दरअसल कांग्रेस में अल्पसंख्यकों को लुभाने की यह चाल बहुत पुरानी है । एक जमाने में दिग्विजय सिंह के गुरू और उनके ही प्रदेश के कांग्रेसी नेता अर्जुन सिंह भी इस तरह के राजनीतिक दांव चला करते थे । एक जमाने में जब सीताराम केसरी कांग्रेस के अध्यक्ष थे उस वक्त अर्जुन सिंह ने अल्पसंख्यकों को खुश करने के लिए आरएसएस पर गांधी की हत्या का आरोप जड़ दिया था । जब आरएसएस ने कानूनी कार्रवाई की धमकी दी तो अर्जुन के तेवर नरम पड़े थे और बयान में संशोधन करते हुए कहा था कि संघ ने जो वातावरण तैयार किया था वही गांधी हत्या की वजह बना । लेकिन उस वक्त बयान देते वक्त अर्जुन सिंह यह भूल गए थे कि जस्टिस कपूर की रिपोर्ट, कांग्रेस के नेता डी पी मिश्रा की आत्मकथा और सरदार पटेल के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के पत्रों में भी आरएसएस को गांधी की हत्या के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया गया था । लेकिन अर्जुन सिंह अपने राजनैतिक लाभ के लिए गांधी की हत्या का इस्तेमाल करते रहे । लेकिन आरएसएस के तत्कालीन प्रवक्ता राम माधव ने अर्जुन सिंह को हकीकत का आईना भी दिखाया था । राम माधव ने बताया था कि अर्जुन सिंह के परिवार के संबंध संघ के साथ कितने गहरे रहे हैं और उनके भाई राणा बहादुर सिंह एक जमाने में राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के जिला प्रमुख हुआ करते थे । लेकिन इन सबसे बेखबर अर्जुन सिंह ने अल्पसंख्यकों पर डोरे डालना नहीं छोड़ा ।
इसके बाद जब अर्जुन सिंह केंद्र में मानव संसाधन विकास मंत्री बने तो पाठ्य पुस्तकों को भगवा रंग से मुक्त करने की मुहिम के नाम पर भी अपनी राजनीति चमकाते रहे । इसपर भी जमकर विवाद हुआ था । जिसमें बाद में प्रधानमंत्री को दखल देना पड़ा था । अर्जुन सिंह ने एक वक्त अपने वक्तव्यों और सहयोगियों के साथ मिलकर ऐसा समां बांध दिया था कि लगने लगा था कि सेक्युलरिज्म के वो सबसे बड़े पैरोकार हैं । अपन बयानवीरता से उत्साहित अर्जुन सिंह यहीं नहीं रुके थे उन्होंने एक वक्तव्य में संघ और हिंदू महासभा को भारत के विभाजन का जिम्मेदार भी ठहरा दिया था । अर्जुन सिंह ने संघ पर इतिहास को गलत दिशा देने का आरोप भी जड़ा था । अल्पसंख्यकों को लुभाने के चक्कर में सिंह ने कई बचकाने तर्क दिए और यह भूल गए कि विभाजन का असली जिम्मेदार तो जिन्ना थे जिन्होंने द्वि-राष्ट्र के सिद्धांत का ना केवल प्रतिपादन किया बल्कि उसको मूर्त रूप भी दिलवाया, जिसको कांग्रेस के नेताओं का भी मूक समर्थन प्राप्त था । द्वि-राष्ट्र के सिद्धांत पर इतिहासकारों में मतैक्य नहीं है विद्वानों ने जमकर लिखा है ।
अब अर्जुन सिंह अस्वस्थ हैं और पार्टी में उनकी कोई पूछ नहीं रह गई है । कांग्रेस में कोई बड़ा अल्पसंख्यक नेता भी नहीं है जिसपर पार्टी को ये भरोसा हो कि वो अपने समुदाय का वोट पार्टी को दिला सकता है । मौका माकूल देखकर दिग्विजय सिंह ने अपने गुरू अर्जुन सिंह की राह पर चलने का फैसला कर लिया प्रतीत होता है । दिग्विजय सिंह को इसके दो फायदे हो सकते हैं एक तो पार्टी में उसकी पूछ बढ़ जाएगी और दूसरे अगर खुदा ना खास्ते उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को कोई फायदा होता है तो पार्टी आलाकमान की नजर में उनका ग्राफ भी उपर चढ़ जाएगा । कांग्रेस पार्टी में अपने प्रतिद्वदियों की राजनीति से राहुल के नाम के सहारे जूझ रहे दिग्गी राजा को अल्पसंख्यकों की पैरोकारी का ये फॉर्मूला बेहतर लगा और संजरपुर पहुंचकर उन्होंने इसकी शुरुआत कर दी । भविष्य में यह देखना और भी दिलचस्प होगा कि अल्पसंख्यकों के किन-किन मुद्दों पर दिग्विजय सिंह अपनी राय देते हैं और कांग्रेस उससे अपना पल्ला झाड़ लेती है । लेकिन दिग्विजय सिंह को यह याद रखना चाहिए कि अर्जुन सिंह के जमाने में राजनैतिक फिजां कुछ और थी और अब का राजनैतिक परिदृश्य अलहदा है । अब मुसलमानों को सिर्फ बयानबाजी से बरगलाना मुश्किल है उन्हें कुछ ठोस करके दिखाना होगा ।
अपनी इसी योजना को लेकर पार्टी के उत्तर प्रदेश प्रभारी दिग्विजय सिंह आजमगढ़ के संजरपुर पहुंचते हैं । संजरपुर वो कस्बा है जहां के कुछ युवकों पर आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होने का आरोप लगता रहा है । वहां पहुंचकर दिग्विजय सिंह को अचानक दिल्ली ब्लास्ट के बाद हुए बटला एनकाउंटर की याद आती है । स्थानीय लोगों का जोरदार विरोध और काले झंडे के बावजूद जब दिग्विजय सिंह को बोलने का मौका मिला तो उन्होंने एक शातिर राजनेता की तरह लोगों की दुखती रग पर हाथ रख दिया । इशारों-इशारों में बटला हाउस एनकांउटर के फर्जी होने की बात कर डाली । दिग्विजय ने कहा कि उन्होंने बटला हाउस एनकाउंटर के फोटोग्राफ्स देखे हैं जिनमें आतंकवादियों के सर में गोली लगी है । उनके मुताबिक दहशतगर्दों के खिलाफ एनकाउंटर में इस तरह से गोली लगना नामुमकिन है । जाहिर है इशारा और इरादा दोनों साफ था । दिग्विजय सिंह को अगर बटला हाउस एनकाउंटर की सत्यता पर संदेह था तो डेढ साल से चुप क्यों थे । संजरपुर पहुंचकर ही दिग्गी राजा को बटला हाउस की याद क्यों आई । आपको याद दिलाते चलें कि दो हजार आठ के सितंबर में दिल्ली के बटला हाउस इलाके में हुए एक एनकाउंटर में दिल्ली पुलिस के जांबाज सिपाहियों ने दो आतंकवादियों को ढेर कर दिया था । आतंकवादियों से लड़ते हुए उस मुठभेड़ में दिल्ली पुलिस के जांबाज इंसपेक्टर मोहन चंद्र शर्मा शहीद हो गए थे और एक हेड कांस्टेबल बुरी तरह से जख्मी हो गया था । दो साल पहले जब यह एनकाउंटर हुआ था, उस वक्त भी इसपर सवाल खड़े हुए थे । लेकिन बाद में अदालत और सरकारी जांच में ये साबित हो गया कि मुठभेड़ सही था ।
जब दिग्विजय सिंह संजरपुर में ये बयान दे रहे थे उसके दो दिन पहले यूपी एसटीएफ ने दिल्ली समेत कई शहरों में हुए बम धमाकों के आरोपी आतंकवादी शहजाद को धर दबोचा था । शहजाद ने इस सिलसिले में कई सनसनीखेज खुलासे भी किए और यह भी माना कि दिल्ली पुलिस के इंसपेक्टर मोहनचंद शर्मा उसकी ही गोली का निशाना बने । लेकिन एनकाउंटर के फोटग्राफ्स को ध्यान से देखनेवाले कांग्रेस पार्टी के इस वरिष्ठ नेता को शहजाद के बयानों को पढने की फुर्त कहां । इन बातों से बेखबर दिग्विजय ने संजरपुर में बटला हाउस एनकाउंटर को ही संदेहास्पद करार दे दिया । ये इस एनकाउंटर में मारे गए शहीद मोहनचंद शर्मा का अपमान भी है ।
जाहिर था दिग्विजय सिंह के इस बयान के बाद सियासी गलियारों में हड़कंप मचा और भारतीय जनता पार्टी ने दिग्विजय सिंह के बहाने कांग्रेस पार्टी पर निशाना साधा । आनन फानन में कांग्रेस ने दिग्विजय के बयान से खुद को अलग कर लिया । दरअसल कांग्रेस में अल्पसंख्यकों को लुभाने की यह चाल बहुत पुरानी है । एक जमाने में दिग्विजय सिंह के गुरू और उनके ही प्रदेश के कांग्रेसी नेता अर्जुन सिंह भी इस तरह के राजनीतिक दांव चला करते थे । एक जमाने में जब सीताराम केसरी कांग्रेस के अध्यक्ष थे उस वक्त अर्जुन सिंह ने अल्पसंख्यकों को खुश करने के लिए आरएसएस पर गांधी की हत्या का आरोप जड़ दिया था । जब आरएसएस ने कानूनी कार्रवाई की धमकी दी तो अर्जुन के तेवर नरम पड़े थे और बयान में संशोधन करते हुए कहा था कि संघ ने जो वातावरण तैयार किया था वही गांधी हत्या की वजह बना । लेकिन उस वक्त बयान देते वक्त अर्जुन सिंह यह भूल गए थे कि जस्टिस कपूर की रिपोर्ट, कांग्रेस के नेता डी पी मिश्रा की आत्मकथा और सरदार पटेल के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के पत्रों में भी आरएसएस को गांधी की हत्या के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया गया था । लेकिन अर्जुन सिंह अपने राजनैतिक लाभ के लिए गांधी की हत्या का इस्तेमाल करते रहे । लेकिन आरएसएस के तत्कालीन प्रवक्ता राम माधव ने अर्जुन सिंह को हकीकत का आईना भी दिखाया था । राम माधव ने बताया था कि अर्जुन सिंह के परिवार के संबंध संघ के साथ कितने गहरे रहे हैं और उनके भाई राणा बहादुर सिंह एक जमाने में राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के जिला प्रमुख हुआ करते थे । लेकिन इन सबसे बेखबर अर्जुन सिंह ने अल्पसंख्यकों पर डोरे डालना नहीं छोड़ा ।
इसके बाद जब अर्जुन सिंह केंद्र में मानव संसाधन विकास मंत्री बने तो पाठ्य पुस्तकों को भगवा रंग से मुक्त करने की मुहिम के नाम पर भी अपनी राजनीति चमकाते रहे । इसपर भी जमकर विवाद हुआ था । जिसमें बाद में प्रधानमंत्री को दखल देना पड़ा था । अर्जुन सिंह ने एक वक्त अपने वक्तव्यों और सहयोगियों के साथ मिलकर ऐसा समां बांध दिया था कि लगने लगा था कि सेक्युलरिज्म के वो सबसे बड़े पैरोकार हैं । अपन बयानवीरता से उत्साहित अर्जुन सिंह यहीं नहीं रुके थे उन्होंने एक वक्तव्य में संघ और हिंदू महासभा को भारत के विभाजन का जिम्मेदार भी ठहरा दिया था । अर्जुन सिंह ने संघ पर इतिहास को गलत दिशा देने का आरोप भी जड़ा था । अल्पसंख्यकों को लुभाने के चक्कर में सिंह ने कई बचकाने तर्क दिए और यह भूल गए कि विभाजन का असली जिम्मेदार तो जिन्ना थे जिन्होंने द्वि-राष्ट्र के सिद्धांत का ना केवल प्रतिपादन किया बल्कि उसको मूर्त रूप भी दिलवाया, जिसको कांग्रेस के नेताओं का भी मूक समर्थन प्राप्त था । द्वि-राष्ट्र के सिद्धांत पर इतिहासकारों में मतैक्य नहीं है विद्वानों ने जमकर लिखा है ।
अब अर्जुन सिंह अस्वस्थ हैं और पार्टी में उनकी कोई पूछ नहीं रह गई है । कांग्रेस में कोई बड़ा अल्पसंख्यक नेता भी नहीं है जिसपर पार्टी को ये भरोसा हो कि वो अपने समुदाय का वोट पार्टी को दिला सकता है । मौका माकूल देखकर दिग्विजय सिंह ने अपने गुरू अर्जुन सिंह की राह पर चलने का फैसला कर लिया प्रतीत होता है । दिग्विजय सिंह को इसके दो फायदे हो सकते हैं एक तो पार्टी में उसकी पूछ बढ़ जाएगी और दूसरे अगर खुदा ना खास्ते उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को कोई फायदा होता है तो पार्टी आलाकमान की नजर में उनका ग्राफ भी उपर चढ़ जाएगा । कांग्रेस पार्टी में अपने प्रतिद्वदियों की राजनीति से राहुल के नाम के सहारे जूझ रहे दिग्गी राजा को अल्पसंख्यकों की पैरोकारी का ये फॉर्मूला बेहतर लगा और संजरपुर पहुंचकर उन्होंने इसकी शुरुआत कर दी । भविष्य में यह देखना और भी दिलचस्प होगा कि अल्पसंख्यकों के किन-किन मुद्दों पर दिग्विजय सिंह अपनी राय देते हैं और कांग्रेस उससे अपना पल्ला झाड़ लेती है । लेकिन दिग्विजय सिंह को यह याद रखना चाहिए कि अर्जुन सिंह के जमाने में राजनैतिक फिजां कुछ और थी और अब का राजनैतिक परिदृश्य अलहदा है । अब मुसलमानों को सिर्फ बयानबाजी से बरगलाना मुश्किल है उन्हें कुछ ठोस करके दिखाना होगा ।
Saturday, January 30, 2010
विश्व पुस्तक मेला- सरकारी लापरवाही का नमूना
पंद्रहवीं शताब्दी में जब पुस्तक मेले की शुरुआत हुई थी तो उसके पीछे अवधारणा यह थी कि विश्व के देशों के प्रकाशकों को एक मंच मिले जहां वो किताबों के प्रकाशन अधिकार का सौदा कर सकें । प्रारंभिक अवधारणा में समय के साथ बदलाव आया और कालांतर में इस तरह का मेला पुस्तक प्रेमियों के लिए उत्सव सरीखा बन गया जिस्का वो शिद्दत से इंतजार करने लगे । पश्चिम की यह अवधारणा जब हिंदुस्तान आई तो पुस्तक मेले की जो तस्वीर उभरी उसके केंद्र में सिर्फ पाठक ही थे । किताबों के प्रकाशन अधिकार के कारोबार को ना तो मंच मिला और ना ही प्रकाशकों के स्तर पर इसके के लिए कोई गंभीर कोशिश की गई । भारत में विश्व पुस्तक मेले का आयोजन नेशनल बुक ट्रस्ट के जिम्मे है और हर दो साल पर दिल्ली के प्रगति मैदान में एनबीटी इसे आयोजित करती है । इस वर्ष भी शनिवार से फरवरी के पहले हफ्ते तक चलनेवाले विश्व पुस्तक मेले की सउरुआत हो चुकी है । भारत में बदले हुए चरित्र के साथ आयोजित होनेवाले विश्व पुस्तक मेले को लेकर पहले प्रकाशकों और पाठकों में खासा उत्साह रहता था । लेकिन समय के साथ लगातार इस उत्साह में कमी आती गई । दिल्ली के विश्व पुस्तक मेले को मैं लगभग बीस वर्षों से देख रहा हूं । हर बार इसमें पाठकों और प्रकाशकों के उत्साह में ह्रास ही होता दिख रहा है । पुस्तक मेले का आयोजन करनेवाली संस्था पर यह जिम्मेदारी होती है कि वो पाठकों या पुस्तक प्रेमियों के बीच पुस्तक मेले को लेकर जागरुकता या फिर एक उत्साह पैदा करे लेकिन दिल्ली के विश्व पुस्तक मेले को लेकर एनबीटी ना तो कोई माहौल बना पाई और ना ही लोगों तक इसकी जानकारी पहुंच पाई । कुछ इलाकों में छोटे होर्डिंग लगाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली । हद तो तब हो गई जब शनिवार से शुरू होनेवाले मेले में दिल्ली के प्रकाशकों को स्टाल आवंटन की जानकारी भी बुधवार को दी गई । दिल्ली के बाहर के प्रकाशकों के हाल का अंदाजा भर लगाया जा सकता है । नेशनल बुक ट्रस्ट ने खुद तो विश्व पुस्तक मेला के प्रचार प्रसार के लिए कुछ किया नहीं प्रकाशकों को भी इतना वक्त नहीं दिया कि वो अपने स्तर पर इसकी जानकारी पाठकों और पुस्तक प्रेमियों तक पहुंचा सकें । पिछले पुस्तक मेले में रूस को अतिथि देश का दर्जा दिया गया था लेकिन उस वक्त एनबीटी की बेहद भद पिटी थी जब रूस के प्रकाशकों ने मेला खत्म होने के पहले ही अपना बोरिया बिस्तर समेट लिया था । एनबीटी के इस रवैये से भारत की खूब भद पिटी थी ।
लेकिन भारत के प्रकाशकों में अब भी विश्व पुस्तक मेले को लेकर उत्साह बचा है और वो हर बार कुछ नया करने की जिद पाले बैठे हैं । कुछ ऐसे प्रकाशक भी हैं जिन्होंने बजाप्ता योजना बनाकर किताबों की तैयारी करवाई। प्रकाशकों के अलावा लेखकों ने भी योजनाबद्ध तरीके से काम किया ताकि उनकी किताबें मेले में रिलीज हो सके । नामवर सिंह हमारे वक्त के हिंदी के सबसे बड़े लेखक हैं । लेकिन उनपर लगातार यह आरोप लगता रहा है कि पिछले सत्ताइस साल से उन्होंने कुछ नहीं लिखा । उनकी आखिरी किताब- दूसरी परंपरा की खोज- सन उन्नीस सौ बयासी में छपी थी । उसके बाद से नामवर सिंह ने अपने आप को वाचिक परंपरा में सिद्ध कर लिया और लेखन से विरक्त हो गए । लेकिन हिंदी में उनके आलोचकों के साथ-साथ इनके प्रशंसकों को भी इस बात का इंतजार रहा कि नामवर शायद लेखन की ओर लौटें । विश्व पुस्तक मेले के अवसर पर उनका यह इंतजार खत्म होगा । राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली से नामवर सिंह की एक साथ छह किताबें प्रकाशित हैं । हिंदी और हिंदीवालों को इसपर सहसा विश्वास नहीं होगा । लोग सोच रहे हैं कि नामवर सिंह के भाषणों का संकलन है । यह आंशिक रूप से सही भी है कि इन छह किताबों में से दो उनके भाषणों का संकलन है लेकिन बाकी चार उनके खुद की लिखी किताबें हैं । विश्व पुस्तक मेले की यह सबसे बड़ी उपलब्धि है जब पाठकों को एक साथ नामवर सिंह की छह किताबें उपलब्ध है । नामवर सिंह के अलावा एक और आलोचक नंदकिशोर नवल की कविता की किताब प्रकाशित है जिन्होंने सियाराम तिवारी के साथ संयुक्त रूप से प्रकाशन संस्थान ने द्वाभा के नाम से छापा है । नंदकिशोर नवल की आलोचनात्मक दृष्टि और उनका काम उल्लेखनीय है लेकिन मन के कोने अंतरे में कवि होने की लालसा उन्हें बार-बार कविता संग्रह छपवाने की ओर प्रेरित करती है । विश्व पुस्तक मेले के मौके पर जो एक बेहद विस्फोटक किताब प्रकाशित हुई है वह है इंदौर की लेखिका कृष्णा अग्निहोत्री की । सामयिक प्रकाशन, दिल्ली से कृष्णा अग्निहोत्री की आत्मकथा दो खंडो में प्रकाशित हुई है - लगता नहीं है दिल मेरा तथा और...और...औरत । कृष्णा अग्निहोत्री अपने जमाने की बेहद खूबसूरत और बिंदास लेखिका थी । अपनी इस आत्मकथा में उन्होंने दिल्ली के साहित्यकारों-संपादकों के साथ अपने हर तरह के रिश्तों पर बेहद बेबाकी और साहसपूर्वक लिखा है । कृष्णा जी जिस तरह स्वभाव से विंदास थी वही बिंदासपना इस आत्मकथा में भी रेखांकित की जा सकती है । इसमें स्त्री लेखिका और पुरुष लेखक के संबंधों का जो द्वंद या फिर छल-छद्म है उससे एक बारगी साहित्य जगत में हड़कंप मचना तय है । हिंदी में लेखक-लेखिका संबंधों पर कलम की जगह तलवार लेकर लिखनेवाली कुछ लेखिकाओं को इस किताब से एक नई जीवनी शक्ति मिलेगी और वो फिर से पुरुषों को कठघरे में खड़ा करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ेंगी । इन किताबों के अलावा कई प्रकाशकों ने साहित्य से इतर हटकर बेहद उल्लेखनीय किताबें प्रकाशित की है । वाणी प्रकाशन ने अमेरिकी अर्थशास्त्री पॉल कुर्गमैन की किताब का पत्रकार अरविंद मोहन से अनुवाद करवाया है । मंदी के दौर में यह एक अहम किताब साबित होगी । लेकिन किताबों के अलावा जो सबसे बड़ा और अहम सवाल है वो यह कि क्या इस पुस्तक मेले को पाठक तवज्जो देंगे । क्या एनबीटी पाठकों के बीच बाकी बचे दिनों में उत्साह पैदा करने में कामयाब हो पाएगी । अगर ऐसा होता है तो प्रकाशक लेखक के लिए संतोष की बात होगी लेकिन अगर ऐसा नहीं हो पाता है तो विश्व पुस्तक मेले के औचित्य के साथ-साथ एनबीटी के कर्ता-धर्ताओं पर भी बड़ा प्रश्न चिन्ह लगेगा ।
लेकिन भारत के प्रकाशकों में अब भी विश्व पुस्तक मेले को लेकर उत्साह बचा है और वो हर बार कुछ नया करने की जिद पाले बैठे हैं । कुछ ऐसे प्रकाशक भी हैं जिन्होंने बजाप्ता योजना बनाकर किताबों की तैयारी करवाई। प्रकाशकों के अलावा लेखकों ने भी योजनाबद्ध तरीके से काम किया ताकि उनकी किताबें मेले में रिलीज हो सके । नामवर सिंह हमारे वक्त के हिंदी के सबसे बड़े लेखक हैं । लेकिन उनपर लगातार यह आरोप लगता रहा है कि पिछले सत्ताइस साल से उन्होंने कुछ नहीं लिखा । उनकी आखिरी किताब- दूसरी परंपरा की खोज- सन उन्नीस सौ बयासी में छपी थी । उसके बाद से नामवर सिंह ने अपने आप को वाचिक परंपरा में सिद्ध कर लिया और लेखन से विरक्त हो गए । लेकिन हिंदी में उनके आलोचकों के साथ-साथ इनके प्रशंसकों को भी इस बात का इंतजार रहा कि नामवर शायद लेखन की ओर लौटें । विश्व पुस्तक मेले के अवसर पर उनका यह इंतजार खत्म होगा । राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली से नामवर सिंह की एक साथ छह किताबें प्रकाशित हैं । हिंदी और हिंदीवालों को इसपर सहसा विश्वास नहीं होगा । लोग सोच रहे हैं कि नामवर सिंह के भाषणों का संकलन है । यह आंशिक रूप से सही भी है कि इन छह किताबों में से दो उनके भाषणों का संकलन है लेकिन बाकी चार उनके खुद की लिखी किताबें हैं । विश्व पुस्तक मेले की यह सबसे बड़ी उपलब्धि है जब पाठकों को एक साथ नामवर सिंह की छह किताबें उपलब्ध है । नामवर सिंह के अलावा एक और आलोचक नंदकिशोर नवल की कविता की किताब प्रकाशित है जिन्होंने सियाराम तिवारी के साथ संयुक्त रूप से प्रकाशन संस्थान ने द्वाभा के नाम से छापा है । नंदकिशोर नवल की आलोचनात्मक दृष्टि और उनका काम उल्लेखनीय है लेकिन मन के कोने अंतरे में कवि होने की लालसा उन्हें बार-बार कविता संग्रह छपवाने की ओर प्रेरित करती है । विश्व पुस्तक मेले के मौके पर जो एक बेहद विस्फोटक किताब प्रकाशित हुई है वह है इंदौर की लेखिका कृष्णा अग्निहोत्री की । सामयिक प्रकाशन, दिल्ली से कृष्णा अग्निहोत्री की आत्मकथा दो खंडो में प्रकाशित हुई है - लगता नहीं है दिल मेरा तथा और...और...औरत । कृष्णा अग्निहोत्री अपने जमाने की बेहद खूबसूरत और बिंदास लेखिका थी । अपनी इस आत्मकथा में उन्होंने दिल्ली के साहित्यकारों-संपादकों के साथ अपने हर तरह के रिश्तों पर बेहद बेबाकी और साहसपूर्वक लिखा है । कृष्णा जी जिस तरह स्वभाव से विंदास थी वही बिंदासपना इस आत्मकथा में भी रेखांकित की जा सकती है । इसमें स्त्री लेखिका और पुरुष लेखक के संबंधों का जो द्वंद या फिर छल-छद्म है उससे एक बारगी साहित्य जगत में हड़कंप मचना तय है । हिंदी में लेखक-लेखिका संबंधों पर कलम की जगह तलवार लेकर लिखनेवाली कुछ लेखिकाओं को इस किताब से एक नई जीवनी शक्ति मिलेगी और वो फिर से पुरुषों को कठघरे में खड़ा करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ेंगी । इन किताबों के अलावा कई प्रकाशकों ने साहित्य से इतर हटकर बेहद उल्लेखनीय किताबें प्रकाशित की है । वाणी प्रकाशन ने अमेरिकी अर्थशास्त्री पॉल कुर्गमैन की किताब का पत्रकार अरविंद मोहन से अनुवाद करवाया है । मंदी के दौर में यह एक अहम किताब साबित होगी । लेकिन किताबों के अलावा जो सबसे बड़ा और अहम सवाल है वो यह कि क्या इस पुस्तक मेले को पाठक तवज्जो देंगे । क्या एनबीटी पाठकों के बीच बाकी बचे दिनों में उत्साह पैदा करने में कामयाब हो पाएगी । अगर ऐसा होता है तो प्रकाशक लेखक के लिए संतोष की बात होगी लेकिन अगर ऐसा नहीं हो पाता है तो विश्व पुस्तक मेले के औचित्य के साथ-साथ एनबीटी के कर्ता-धर्ताओं पर भी बड़ा प्रश्न चिन्ह लगेगा ।
Monday, January 18, 2010
नदियों के गुनहगार
नदियों के गुनहगार
पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश कहते हैं कि गंगा इतनी मैली है इस बात का अंदाजा उन्हें नहीं है । क्या उन्होंने ये जुमले भी नहीं सुने कि गंगा मैली हो रही है, गंगा रास्ता बदल रही है, गंगा के किनारों का कटाव हो रहा है , गंगा को बचाना है, गंगा को बचाने के लिए सरकारी स्तर प्रयास किए जा रहे हैं । ये ऐसे जुमले हैं जो वर्षों से सुर्खियां बन रहे हैं लेकिन हालात में कोई बदलाव नहीं आता दिख रहा है । गंगा नदी से देश की आबादी का बड़ा हिस्सा जुडा़ है और वही आबादी उसे बरबाद करने पर तुली है । जाने या अनजाने लोग गंगा को कूड़ेदान की तरह इस्तेमाल करते हैं और व्यक्तिगत और औद्योगिक कचड़े का एक बड़ा हिस्सा गंगा में प्रवाहित कर देते हैं । यही हालत देश की राजधानी से गुरनेवाली नदी यमुना की भी है बल्कि यों कहें कि यहां तो हालत और भी बदतर है । नब्बे के दशक के शुरुआती वर्षों में जब दिल्ली आया था तो यमुना में कुछ पानी होता था और कहीं -कहीं साफ पानी के भी दर्शन हो जाते थे लेकिन दो दशकों में यमुना पूरे तरीके से गंदे नाले में तब्दील हो गई है ।
हालात बदतर होते देख प्रधानमंत्री ने भी इसपर चिंता जताई और गंगा को बचाने के लिए सरकारी स्तर पर भी ठोस उपाय करने के इरादों का इजहार किया । इसी तर्ज पर दिल्ली सरकार ने एक बार फिर यमुना का उद्धार करने की योजना बनाई है । सरकारी स्तर पर नदियों को बचाने के लिए सत्तर के दशक में भी एक मुहिम शुरू हुई थी और उन्नीस सौ चौहत्तर में पर्यावरण संरक्षण कानून और जल ( प्रदूषण और रोकथाम ) कानून बनाया गया था । इस कानून में नदियों को गंदा करने और उसके स्वरूप में बदलाव लाने की कोशिशों को रोकने के लिए दंड का प्रावधान किया था । इस कानून की धाराओं के मुताबिक नदियों के पानी को प्रदूषित करनेवाले को अठारह महीने से छह साल तक की सजा का प्रावधान किया गया था । लेकिन इस कानून के बनने के पच्चीस साल बाद भी किसी को उसके तहत सजा हुई हो और उसे जेल भेजा गया हो ऐसा ज्ञात नहीं है । यह कानून सिर्फ सरकारी अधिकारियों की कमाई का एक जरिया बनकर रह गया है । होता यह है कि सरकारी अधिकारी यह मानकर चलते हैं कि यह कानून सिर्फ प्रदूषण फैलानेवाले फैक्ट्रियों पर लागू होता है और वहां वो सजा का भय दिखाकर मोटी कमाई करते हैं ।
इस कानून के अंतर्गत आम जनता को भी सजा हो सकती है । ऐसे किसी भी शहर में जाइये जहां से कोई नदी गुजर रही हो और आप उसके पुल पर पांच मिनट खड़े हो जाइये, आपको कई भक्त ऐसे मिलेंगे जो पॉलीबैग में फूल,धूप, अगरबत्ती और अन्य पूजा का सामान प्रवाहित करते नजर आ जाएंगे । चाहे वो दिल्ली का निजामुद्दीन पुल हो, लखनऊ में गोमती नदी पर बना लोहिया ब्रिज हो या फिर अयोध्या में राम की पैड़ी के पास का सरयू नदी का पुल हो, सरेआम कानून की धज्जियां उड़ाते लोग आपको नजर आएंगे । लेकिन कानून का पालन करवानेवालों को कानून का सरेआम उल्लंघन दिखाई नहीं देता । दिल्ली में तो हालात इतने बदतर हो गए कि लोगों को रोकने के लिए सरकार ने निजामुद्दीन पुल पर लोहे का पच्चीस फुट उंचा जाल लगवाया । लेकिन फिर भी लोग कहां मानने वाले कहीं जाली तोड़ दी गई तो कहीं उस जाल के उपर से गंदा फेंकने की कोशिश की गई । नतीजा यह हुआ कि जो पुल साफ सुथरा दिखता था वह बेहद गंदा और बदसूरत दिखने लगा ।
नदियों को बचाने की सरकारी नीति और कानून बनाकर इसे नहीं बचाया जा सकता है, जरूरत इस बात की है कि लोगों को जागरूक किया जाए और उन्हें उनके कृत्य से होनेवाले खतरों से आगाह करने की मुहिम चलाई जाए । कानून तो सिर्फ एक हथियार हो सकता है जिससे नासमझ लोगों को डराकर इस प्रवृति को रोका जा सके, ताकि आनेवाली पीढियां हमें नदियों के गुनहगार के तौर पर याद ना करें
पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश कहते हैं कि गंगा इतनी मैली है इस बात का अंदाजा उन्हें नहीं है । क्या उन्होंने ये जुमले भी नहीं सुने कि गंगा मैली हो रही है, गंगा रास्ता बदल रही है, गंगा के किनारों का कटाव हो रहा है , गंगा को बचाना है, गंगा को बचाने के लिए सरकारी स्तर प्रयास किए जा रहे हैं । ये ऐसे जुमले हैं जो वर्षों से सुर्खियां बन रहे हैं लेकिन हालात में कोई बदलाव नहीं आता दिख रहा है । गंगा नदी से देश की आबादी का बड़ा हिस्सा जुडा़ है और वही आबादी उसे बरबाद करने पर तुली है । जाने या अनजाने लोग गंगा को कूड़ेदान की तरह इस्तेमाल करते हैं और व्यक्तिगत और औद्योगिक कचड़े का एक बड़ा हिस्सा गंगा में प्रवाहित कर देते हैं । यही हालत देश की राजधानी से गुरनेवाली नदी यमुना की भी है बल्कि यों कहें कि यहां तो हालत और भी बदतर है । नब्बे के दशक के शुरुआती वर्षों में जब दिल्ली आया था तो यमुना में कुछ पानी होता था और कहीं -कहीं साफ पानी के भी दर्शन हो जाते थे लेकिन दो दशकों में यमुना पूरे तरीके से गंदे नाले में तब्दील हो गई है ।
हालात बदतर होते देख प्रधानमंत्री ने भी इसपर चिंता जताई और गंगा को बचाने के लिए सरकारी स्तर पर भी ठोस उपाय करने के इरादों का इजहार किया । इसी तर्ज पर दिल्ली सरकार ने एक बार फिर यमुना का उद्धार करने की योजना बनाई है । सरकारी स्तर पर नदियों को बचाने के लिए सत्तर के दशक में भी एक मुहिम शुरू हुई थी और उन्नीस सौ चौहत्तर में पर्यावरण संरक्षण कानून और जल ( प्रदूषण और रोकथाम ) कानून बनाया गया था । इस कानून में नदियों को गंदा करने और उसके स्वरूप में बदलाव लाने की कोशिशों को रोकने के लिए दंड का प्रावधान किया था । इस कानून की धाराओं के मुताबिक नदियों के पानी को प्रदूषित करनेवाले को अठारह महीने से छह साल तक की सजा का प्रावधान किया गया था । लेकिन इस कानून के बनने के पच्चीस साल बाद भी किसी को उसके तहत सजा हुई हो और उसे जेल भेजा गया हो ऐसा ज्ञात नहीं है । यह कानून सिर्फ सरकारी अधिकारियों की कमाई का एक जरिया बनकर रह गया है । होता यह है कि सरकारी अधिकारी यह मानकर चलते हैं कि यह कानून सिर्फ प्रदूषण फैलानेवाले फैक्ट्रियों पर लागू होता है और वहां वो सजा का भय दिखाकर मोटी कमाई करते हैं ।
इस कानून के अंतर्गत आम जनता को भी सजा हो सकती है । ऐसे किसी भी शहर में जाइये जहां से कोई नदी गुजर रही हो और आप उसके पुल पर पांच मिनट खड़े हो जाइये, आपको कई भक्त ऐसे मिलेंगे जो पॉलीबैग में फूल,धूप, अगरबत्ती और अन्य पूजा का सामान प्रवाहित करते नजर आ जाएंगे । चाहे वो दिल्ली का निजामुद्दीन पुल हो, लखनऊ में गोमती नदी पर बना लोहिया ब्रिज हो या फिर अयोध्या में राम की पैड़ी के पास का सरयू नदी का पुल हो, सरेआम कानून की धज्जियां उड़ाते लोग आपको नजर आएंगे । लेकिन कानून का पालन करवानेवालों को कानून का सरेआम उल्लंघन दिखाई नहीं देता । दिल्ली में तो हालात इतने बदतर हो गए कि लोगों को रोकने के लिए सरकार ने निजामुद्दीन पुल पर लोहे का पच्चीस फुट उंचा जाल लगवाया । लेकिन फिर भी लोग कहां मानने वाले कहीं जाली तोड़ दी गई तो कहीं उस जाल के उपर से गंदा फेंकने की कोशिश की गई । नतीजा यह हुआ कि जो पुल साफ सुथरा दिखता था वह बेहद गंदा और बदसूरत दिखने लगा ।
नदियों को बचाने की सरकारी नीति और कानून बनाकर इसे नहीं बचाया जा सकता है, जरूरत इस बात की है कि लोगों को जागरूक किया जाए और उन्हें उनके कृत्य से होनेवाले खतरों से आगाह करने की मुहिम चलाई जाए । कानून तो सिर्फ एक हथियार हो सकता है जिससे नासमझ लोगों को डराकर इस प्रवृति को रोका जा सके, ताकि आनेवाली पीढियां हमें नदियों के गुनहगार के तौर पर याद ना करें
Thursday, January 14, 2010
गैर जिम्मेदार पत्रकारिता की हद
तेलंगाना की आग में जल रहे आंध्र प्रदेश में एक खबर ने फिर से आग लगा दी। सूबे के एक स्थानीय न्यूज चैनल ने चार महीने पहले रूस की एक वेबवसाइट पर प्रकाशित खबर को उठाकर अचानक से चलाना शुरू कर दिया। सिर्फ खबर ही नहीं चलाई बल्कि उसपर स्टूडियो में तीन चार लोगों को बिठाकर चर्चा भी शुरू कर दी । कहने का तात्पर्य यह कि उक्त खबर को बड़े स्तर पर चलाया जाने लगा । खबर यह थी कि आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री वाई एस राजशेखर रेड्डी की मौत एक हादसा नहीं बल्कि एक वृहत्तर षडयंत्र का हिस्सा थी । न्यूज चैनल की खबर के मुताबिक इस षडयंत्र में देश का एक बड़ा औद्योगिक घराना शामिल था । जैसे ही इस खबर का प्रसारण शुरू हुआ आंध्र प्रदेश के कई इलाकों में हड़कंप मच गया । वाई एस राजशेखर रेड्डी के समर्थक सड़कों पर उतर आए और कई इलाकों में विरोध प्रदर्शन का आगाज हो गया । कुछ ही घंटों में लोगों का गुस्सा उबाल खाने लगा और उस खबर में जिस औद्योगिक प्रतिष्ठान को षडयंत्र के लिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा था उसके प्रतिष्ठानों पर हमले होने लगे । जबतक सरकारी मशीनरी चेतती तब तक कई शहरों में आगजनी शुरू हो गई । उस स्थानीय चैनल की देखादेखी दो और लोकल चैनलों ने भी इस खबर को प्रसारित करना शुरू कर दिया जिसने गुस्से की आग में घी की तरह काम किया, जिससे बवाल और बढ गया । लेकिन बगैर किसी तरह की जांच पड़ताल के चलाई जा रही इस खबर की आग में पत्रकारिता के तमाम स्थापित मूल्य और मान्यताएं भी जलकर खाक हो गए । एक अनाम सी बेवसाइट पर छपी लगभग चार महीने पुरानी अफवाह को उठाकर खबर की तरह पेश कर एक सूबे को आग में झोंकने की जितनी भी निंदा की जाए कम है । किसी ने भी इस खबर को जांचने और संबंधित पक्ष से बात करने की कोशिश नहीं की । बगैर किसी पक्ष से कोई प्रतिक्रिया लिए इतना बड़ा आरोप लगा देना पत्रकारिता के सिद्धांत के खिलाफ है, जिसकी जमकर निंदा की जानी चाहिए । किसी बेवसाइट की कल्पना को जस का तस उठाकर उससे खबर बनाकर घंटो प्रसारित करने से सूबे में कानून व्यवस्था की समस्या पैदा हो गई । इसके अलावा उस औद्योगिक घराने की प्रतिष्ठा पर भी इससे आंच आई ।
किसी न्यूज चैनल की गैरजिम्मेदाराना खबर के प्रसारण का यह पहला मौका नहीं है । अब से लगभग दो साल पहले दिल्ली में एक राष्ट्रीय चैनल ने भी इस तरह की एक खबर दिखाकर सनसनी फैला दी थी । उस चैनल ने दिल्ली की एक स्कूल की शिक्षिका पर स्टिंग के जरिए उसके सेक्स ट्रेड में शामिल होने की खबर प्रसारित की थी । उस वक्त भी खबर के प्रसारण के साथ ही राजधानी दिल्ली में जबरदस्त हंगामा और आगजनी हुई थी। उत्तेजित भीड़ ने उस स्कूल में घुसकर जमकर तोड़फोड़ की थी और दबाव में आई पुलिस ने शिक्षिका को गिरफ्तार कर लिया था। आनन-फानन में दिल्ली सरकार भी हरकत में आई थी और उस शिक्षिका को नौकरी से हटाने का एलान कर दिया था। बाद में हुई जांच में शिक्षिका पर लगे तमाम आरोप निराधार पाए गए थे । कोर्ट में पहुंचे इस मामले के बाद भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने उक्त चैनल के प्रसारण पर तीन हफ्ते का प्रतिबंध भी लगा था । इन दो वाकयों के अलावा झारखंड की राजधानी से प्रसारित होनेवाले एक लोकल चैनल के संपादक को ब्लैकमेलिंग के आरोप में जेल भी जाना पड़ा था।
इस तरह की गैर जिम्मेदार पत्रकारिता ने एक साथ कई अहम सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या किसी भी न्यूज चैनल को बगैर खबरों की जांच किए उसे प्रसारित करने का अधिकार है। क्या उस न्यूज चैनल के संपादक को इस खबर की पड़ताल नहीं करनी चाहिए थी । खबरों के बाद मचनेवाले बवाल और सार्वजनिक संपत्ति के नुकसान की जिम्मेदारी किसकी है। किसी के चरित्र हनन का जिम्मेदार कौन है। क्या भारत सरकार को इसपर काबू करने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाना चाहिए । क्या इन चैनलों को लाइसेंस देने के पहले उसे ठोक बजाकर देखा जाता है । टीवी न्यूज चैनलों पर भारत सरकार एक गाइडलाइन बनाकर लगाम लगाने की हर मुमकिन कोशिश कर रही है । इस माहौल में इस तरह की घटिया हरकतें सरकार के हाथ में प्रेस की आजादी पर लगाम लगाने का औजार मुहैया कराती है । सरकार के इस कदम का पत्रकारों के संगठन लगातार और पुरजोर विरोध कर रहे हैं, उनकी इस मुहिम को इस तरह की घटनाओं से झटका भी लगता है ।
भारत में प्रेस और मीडिया को लोकतंत्र का प्रहरी माना जाता है और उसकी स्वतंत्रता के लिए सभी लोग सजग भी रहते हैं । लॉर्ड डेनिंग ने अपनी प्रसिद्ध किताब रोड टू जस्टिस में कहा है कि प्रेस एक वॉचडॉग है । उसकी जिम्मेदारी है कि वो यह देखे कि हर काम सही तरीके से बगैर किसी दबाव और पक्षपात के हो रहा है। लेकिन कभी कभार यह वॉचडॉग अपनी सीमाओं से आगे चला जाता है जिसके लिए इसे दंडित करना आवश्यक है। भारत के संविधान में प्रेस की आजादी के लिए अलग से कोई प्रावधान नहीं है वह भी राइट टू फ्रीडम ऑफ स्पीच और एक्सप्रेशन के अंतर्गत ही आता है। संविधान में अभिव्यक्ति की यह स्वतंत्रता असीमित नहीं है । संविधान में इस पर अंकुश लगाने और इसके बेजा इस्तेमाल को रोकने का भी प्रावधान है । हमारे संविधान की अनुच्छेद उन्नीस दो में अभिव्यक्ति की आजादी पर कई वंदिशें भी है । उसके अनुसार अगर इससे देश की सुरक्षा को खतरा उत्पन्न होता है, समाज में अशांति फैलती है, कानून व्यवस्था भंग होती है, देश की किसी भी अदालत की अवमानना होती है या फिर किसी की अभिव्यक्ति की आजादी से दूसरे व्यक्ति की मानहानि होती है या फिर उससे कोई भी व्यक्ति या समूह को अपराध के लिए प्रवृत्त होता है तो उस स्थिति में अभिव्यक्ति की आजादी की इजाजत नहीं दी जा सकती है। आंध्र प्रदेश के न्यूज चैनल ने जिस तरह की खबर प्रसारित की उससे समाज में अशांति भी फैली, किसी व्यक्ति और संस्था की मानहानि भी हुई और उस खबर के असर में लोगों ने कानून भी तोड़ा । इस वजह से भी उक्त न्यूज चैनल के खिलाफ आपराधिक मामला बनता है । इसकी सजा तो उस न्यूज चैनल को हर हाल में मिलनी चाहिए ताकि प्रेस और मीडिया की निष्पक्षता पर कोई सवाल खड़ा ना हो । साथ ही भविष्य में कोई भी चैनल इस तरह की खबरों को ना दिखाए जिससे की मीडिया की विश्वसनीयता पर गंभीर संकट खडा़ हो जाए ।
लेकिन बड़ा सवाल अब भी मुंह बाए खड़ा है कि इस तरह की हरकतों को रोकने के लिए क्या उपाय किए जा सकते हैं। देश में न्यूज चैनलों की बाढ़ आई हुई है और एक अनुमान के मुताबिक इस वक्त देशभर में लगभग पांच सौ के करीब न्यूज चैनल या तो चल रहे हैं या फिर प्रसारण की तैयारी कर रहे हैं। पत्रकारिता के इस पेशे में ऐसे भी लोग आ रहे हैं जिन्हें ना तो पत्रकारिता की गौरवशाली परंपरा का एहसास है और ना ही उसकी पवित्रता को लेकर कोई प्रतिबद्धता । कोई ठेकेदार है तो कोई बिल्डर तो कोई राजनेता खबरों के इस धंधे में शामिल हो रहा है। उनकी मंशा साफ नहीं है । वो अपने लाभ लोभ के लिए इस धंधे में आ रहे हैं । समाज या फिर उसकी बेहतरी से उनका कोई लेना देना नहीं है ।
देश में लोकतांत्रिक प्रक्रिया को सुचारू रूप से चलाने के लिए प्रेस और मीडिया की आजादी बेहद आवश्यक है । और मीडिया ने इसे साबित भी किया है । ओर जब देशभर में रुचिका को इंसाफ दिलाने के मामले में न्यूज चैनलों और अखबारों की भूमिका की प्रशंसा हो रही है और लोग यह कह रहे हैं कि अगर मीडिया नहीं होती तो राठौर जैसा शक्तिशाली वयक्ति गुनाह कर बच निकलता । वहीं दूसरी ओर आंध्र प्रदेश जैसी घटनाएं मीडिया को शर्मसार करती है जिससे कानून तो निबटेगा ही लेकिन इस तरह के लोगों को चिन्हित करना और उन्हें मीडिया की जमात से बाहर करवाने की महिम चलाना भी मीडिया से जुड़े तमाम संगठनों का काम है ताकि उसकी साख बची रह सके ।
किसी न्यूज चैनल की गैरजिम्मेदाराना खबर के प्रसारण का यह पहला मौका नहीं है । अब से लगभग दो साल पहले दिल्ली में एक राष्ट्रीय चैनल ने भी इस तरह की एक खबर दिखाकर सनसनी फैला दी थी । उस चैनल ने दिल्ली की एक स्कूल की शिक्षिका पर स्टिंग के जरिए उसके सेक्स ट्रेड में शामिल होने की खबर प्रसारित की थी । उस वक्त भी खबर के प्रसारण के साथ ही राजधानी दिल्ली में जबरदस्त हंगामा और आगजनी हुई थी। उत्तेजित भीड़ ने उस स्कूल में घुसकर जमकर तोड़फोड़ की थी और दबाव में आई पुलिस ने शिक्षिका को गिरफ्तार कर लिया था। आनन-फानन में दिल्ली सरकार भी हरकत में आई थी और उस शिक्षिका को नौकरी से हटाने का एलान कर दिया था। बाद में हुई जांच में शिक्षिका पर लगे तमाम आरोप निराधार पाए गए थे । कोर्ट में पहुंचे इस मामले के बाद भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने उक्त चैनल के प्रसारण पर तीन हफ्ते का प्रतिबंध भी लगा था । इन दो वाकयों के अलावा झारखंड की राजधानी से प्रसारित होनेवाले एक लोकल चैनल के संपादक को ब्लैकमेलिंग के आरोप में जेल भी जाना पड़ा था।
इस तरह की गैर जिम्मेदार पत्रकारिता ने एक साथ कई अहम सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या किसी भी न्यूज चैनल को बगैर खबरों की जांच किए उसे प्रसारित करने का अधिकार है। क्या उस न्यूज चैनल के संपादक को इस खबर की पड़ताल नहीं करनी चाहिए थी । खबरों के बाद मचनेवाले बवाल और सार्वजनिक संपत्ति के नुकसान की जिम्मेदारी किसकी है। किसी के चरित्र हनन का जिम्मेदार कौन है। क्या भारत सरकार को इसपर काबू करने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाना चाहिए । क्या इन चैनलों को लाइसेंस देने के पहले उसे ठोक बजाकर देखा जाता है । टीवी न्यूज चैनलों पर भारत सरकार एक गाइडलाइन बनाकर लगाम लगाने की हर मुमकिन कोशिश कर रही है । इस माहौल में इस तरह की घटिया हरकतें सरकार के हाथ में प्रेस की आजादी पर लगाम लगाने का औजार मुहैया कराती है । सरकार के इस कदम का पत्रकारों के संगठन लगातार और पुरजोर विरोध कर रहे हैं, उनकी इस मुहिम को इस तरह की घटनाओं से झटका भी लगता है ।
भारत में प्रेस और मीडिया को लोकतंत्र का प्रहरी माना जाता है और उसकी स्वतंत्रता के लिए सभी लोग सजग भी रहते हैं । लॉर्ड डेनिंग ने अपनी प्रसिद्ध किताब रोड टू जस्टिस में कहा है कि प्रेस एक वॉचडॉग है । उसकी जिम्मेदारी है कि वो यह देखे कि हर काम सही तरीके से बगैर किसी दबाव और पक्षपात के हो रहा है। लेकिन कभी कभार यह वॉचडॉग अपनी सीमाओं से आगे चला जाता है जिसके लिए इसे दंडित करना आवश्यक है। भारत के संविधान में प्रेस की आजादी के लिए अलग से कोई प्रावधान नहीं है वह भी राइट टू फ्रीडम ऑफ स्पीच और एक्सप्रेशन के अंतर्गत ही आता है। संविधान में अभिव्यक्ति की यह स्वतंत्रता असीमित नहीं है । संविधान में इस पर अंकुश लगाने और इसके बेजा इस्तेमाल को रोकने का भी प्रावधान है । हमारे संविधान की अनुच्छेद उन्नीस दो में अभिव्यक्ति की आजादी पर कई वंदिशें भी है । उसके अनुसार अगर इससे देश की सुरक्षा को खतरा उत्पन्न होता है, समाज में अशांति फैलती है, कानून व्यवस्था भंग होती है, देश की किसी भी अदालत की अवमानना होती है या फिर किसी की अभिव्यक्ति की आजादी से दूसरे व्यक्ति की मानहानि होती है या फिर उससे कोई भी व्यक्ति या समूह को अपराध के लिए प्रवृत्त होता है तो उस स्थिति में अभिव्यक्ति की आजादी की इजाजत नहीं दी जा सकती है। आंध्र प्रदेश के न्यूज चैनल ने जिस तरह की खबर प्रसारित की उससे समाज में अशांति भी फैली, किसी व्यक्ति और संस्था की मानहानि भी हुई और उस खबर के असर में लोगों ने कानून भी तोड़ा । इस वजह से भी उक्त न्यूज चैनल के खिलाफ आपराधिक मामला बनता है । इसकी सजा तो उस न्यूज चैनल को हर हाल में मिलनी चाहिए ताकि प्रेस और मीडिया की निष्पक्षता पर कोई सवाल खड़ा ना हो । साथ ही भविष्य में कोई भी चैनल इस तरह की खबरों को ना दिखाए जिससे की मीडिया की विश्वसनीयता पर गंभीर संकट खडा़ हो जाए ।
लेकिन बड़ा सवाल अब भी मुंह बाए खड़ा है कि इस तरह की हरकतों को रोकने के लिए क्या उपाय किए जा सकते हैं। देश में न्यूज चैनलों की बाढ़ आई हुई है और एक अनुमान के मुताबिक इस वक्त देशभर में लगभग पांच सौ के करीब न्यूज चैनल या तो चल रहे हैं या फिर प्रसारण की तैयारी कर रहे हैं। पत्रकारिता के इस पेशे में ऐसे भी लोग आ रहे हैं जिन्हें ना तो पत्रकारिता की गौरवशाली परंपरा का एहसास है और ना ही उसकी पवित्रता को लेकर कोई प्रतिबद्धता । कोई ठेकेदार है तो कोई बिल्डर तो कोई राजनेता खबरों के इस धंधे में शामिल हो रहा है। उनकी मंशा साफ नहीं है । वो अपने लाभ लोभ के लिए इस धंधे में आ रहे हैं । समाज या फिर उसकी बेहतरी से उनका कोई लेना देना नहीं है ।
देश में लोकतांत्रिक प्रक्रिया को सुचारू रूप से चलाने के लिए प्रेस और मीडिया की आजादी बेहद आवश्यक है । और मीडिया ने इसे साबित भी किया है । ओर जब देशभर में रुचिका को इंसाफ दिलाने के मामले में न्यूज चैनलों और अखबारों की भूमिका की प्रशंसा हो रही है और लोग यह कह रहे हैं कि अगर मीडिया नहीं होती तो राठौर जैसा शक्तिशाली वयक्ति गुनाह कर बच निकलता । वहीं दूसरी ओर आंध्र प्रदेश जैसी घटनाएं मीडिया को शर्मसार करती है जिससे कानून तो निबटेगा ही लेकिन इस तरह के लोगों को चिन्हित करना और उन्हें मीडिया की जमात से बाहर करवाने की महिम चलाना भी मीडिया से जुड़े तमाम संगठनों का काम है ताकि उसकी साख बची रह सके ।
Thursday, January 7, 2010
गरीबों की भी सुन लो
इन दिनों राजस्थान से गरीबों और दलितों को लेकर कुछ चिंताजनक खबरें आ रही हैं । तकरीबन पखवाड़े भर पहले जयपुर के पास केंद्र सरकार की पसंदीदा स्कीम नरेगा में दलितों के साथ भेदभाव की बात सामने आई । आरोप यह लगा कि नरेगा में दलितों को उनके गांव से कई किलोमीटर दूर काम दिया जा रहा है । इस वजह से गरीब दलित परिवारों को इस योजना का लाभ नहीं मिल पा रहा है । दूसरी खबर राजस्थान के ही चित्तौड़गढ़ से आई कि नरेगा में मेहनताना मिलने में हो रही देरी और काम ना मिल पाने की वजह से एक व्यक्ति भुखमरी का शिकार हो गया । आजादी के साठ साल से भी ज्यादा बीत जाने के बाद भी इस तरह की घटनाएं लोकतंत्र को शर्मसार करती हैं । ये दोनों ही वाकए राहुल गांधी के पसंदीदा कार्यक्रम नरेगा से जुड़े हैं । नरेगा को देशभर में लागू करने की जिम्मेदारी भी राहुल के ही पसंदीदा मंत्री सीपी जोशी पर है और सूबे में कांग्रेस की सरकार है जिसके मुखिया अशोक गहलोत हैं । लेकिन बात सिर्फ राजस्थान की नहीं है ऐसी ही खबरें झारखंड और उड़ीसा से भी आ रही हैं । यहां सवाल यह उठता है कि क्या हम हमारा समाज और हमारी सरकार गरीबों पर समुचित ध्यान दे रही है । क्या गरीबी दूर करने के ठोस उपाय किए जा रहे हैं ।
दरअसल हो ये रहा है कि हमारा देश पूंजीवाद और उपभोक्तवाद की राह पर बेहद तेजी से बढ़ रहा हैं और इस राह को चुननेवाली सरकार अपनी इस तेजी में लोगों के प्रति जो सामाजिक जिम्मेदारियां हैं उससे दूर होते जा रही है । गरीबों को अनाज उपलब्ध करने में नाकाम रहनेवाली सरकार अब आम जनता को पानी भी मुफ्त में नहीं देना चाहती । आम आदमी के लिए काम करने का दंभ भरनेवाली दिल्ली की कांग्रेसी सरकार ने तो यह व्यवस्था लागू भी कर दी । जिस देश में लोग भूख से मर रहे हैं वहां सरकार पानी के दाम वसूल कर पानी पीकर जिंदा रहने के अधिकार से भी उसे महरूम कर देना चाहती है । योजनाबद्ध तरीके से गरीबों और किसानों को खाद बीज और अन्य सामनों पर सब्सिडी खत्म कर रही है । दूसरी तरफ उद्योग और उद्योगपतियों को सस्ती दरों पर जमीन और करों में छूट दिया जा रहा है । उद्योग और उद्योगपतियों को छूट देना गलत नहीं है लेकिन मापदंड जब दो हो जाते हैं तो सरकार की नीयत पर सवाल खड़े हो जाते हैं । दस हजार रुपये की कृषि ऋण वसूली के लिए सरकारी अफसर किसानों के घर तक जब्त करने में नहीं हिचकिचाते जबकि उद्योगपतियों से करोड़ों रुपये की ऋण वसूलने के लिए कुछ नहीं कर पाते हैं ।
बहुत दिनों से यह सुन रहा हूं कि भारत और इंडिया के बीच की खाई बढ़ती जा रही है लेकिन अब यह खाई इतनी गहरा गई है कि समाज का एक वर्ग ऐसा है जो यह कहता है कि गरीबी तो नैचुरल फैनोमिना है जिससे निबटना सरकार का काम नहीं है, खुद उस वयक्ति को इस फैनोमिना से निबटना होगा । अगर वह गरीब रहना चाहता है तो कोई भी उसकी मदद नहीं कर पाएगा । ऐसी बातें कहनेवाली जो पीढ़ी है उसके लिए गरीबी तो एक शब्द मात्र है । उसने ना तो कभी गरीबी देखी और ना ही कभी गरीबी महसूस की । अगर आपको इस पीढ़ी को देखना हो तो किसी भी शॉपिंग मॉल के मेगा स्टोर में चले जाइए । कपड़ों और अपनी साज सज्जा पर बेतहाशा खर्च करनेवाले कई युवक –युवतियां नजर आ जाएंगें । जिनके लिए पैसे कोई मायने ही नहीं रखते । हमारे ताकतवर नेताओं, बेशुमार दौलत के मालिक उद्योगपतियों, प्राइवेट सेक्टर में शीर्ष पदों पर बैठे अधिकारियों के लिए पैसा की कोई अहमियत ही नहीं है ।
इस देश का दुर्भाग्य है कि हमारे जो नीति नियंता हैं उन्हें भी गरीबों की फिक्र नहीं है । गरीबों की समस्याएं किसी के लिए चिंता का सबब नहीं बनती । उन्हें गरीबों और आम आदमी की याद सिर्फ चुनाव के वक्त आती है । गरीबों को सत्ता की सीढ़ी की तरह इंदिरा गांधी ने भी गरीबी हटाओ का इमोशनल नारा देकर इस्तेमाल किया था और फिर दशकों बाद कांग्रेस ने आम आदमी को लुभाकर सत्ता हासिल की । आम आदमी को साल भर में एक खास अवधि के लिए रोजगार मिले इसके लिए ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना लाया गया । इस बात का जोरशोर से प्रचार किया गया कि इस ऐतिहासिक योजना से भारत की गरीबी दूर हो जाएगी । कई चुनाव विश्लेषकों और पंडितों का यह दावा है कि यूपीए-2 की जीत के लिए यही योजना जिम्मेदार है । लेकिन इस योजना में जिस तरह की भयंकर गड़बड़ियों की शिकायतें मिल रही है, जिस पैमाने पर भ्रष्टाचार हो रहा है उससे तो यही लगता है कि इस योजना का लाभ इसे लागू करनेवालों को ज्यादा हो रहा है । इसके प्रमाण राजस्थान से लेकर मध्यप्रदेश और झारखंड से लेकर उड़ीसा के किसी भी गांव में बगैर ढूंढे आपको मिल सकते हैं । जरूरत इस बात कि है कि देश के हुक्मरान गरीबों के लिए सिर्फ योजना ना बनाएं उसे गरीबों तक पहुंचाने के लिए प्रयास भी करें । दलितों के घर में रात बिताने से उनका उद्धार नहीं होगा, जरूरत इस बात कि देश का हर दलित और गरीब सम्मान के साथ जी सके इसका इंतजाम करने की सार्थक पहल होनी चाहिए ।
दरअसल हो ये रहा है कि हमारा देश पूंजीवाद और उपभोक्तवाद की राह पर बेहद तेजी से बढ़ रहा हैं और इस राह को चुननेवाली सरकार अपनी इस तेजी में लोगों के प्रति जो सामाजिक जिम्मेदारियां हैं उससे दूर होते जा रही है । गरीबों को अनाज उपलब्ध करने में नाकाम रहनेवाली सरकार अब आम जनता को पानी भी मुफ्त में नहीं देना चाहती । आम आदमी के लिए काम करने का दंभ भरनेवाली दिल्ली की कांग्रेसी सरकार ने तो यह व्यवस्था लागू भी कर दी । जिस देश में लोग भूख से मर रहे हैं वहां सरकार पानी के दाम वसूल कर पानी पीकर जिंदा रहने के अधिकार से भी उसे महरूम कर देना चाहती है । योजनाबद्ध तरीके से गरीबों और किसानों को खाद बीज और अन्य सामनों पर सब्सिडी खत्म कर रही है । दूसरी तरफ उद्योग और उद्योगपतियों को सस्ती दरों पर जमीन और करों में छूट दिया जा रहा है । उद्योग और उद्योगपतियों को छूट देना गलत नहीं है लेकिन मापदंड जब दो हो जाते हैं तो सरकार की नीयत पर सवाल खड़े हो जाते हैं । दस हजार रुपये की कृषि ऋण वसूली के लिए सरकारी अफसर किसानों के घर तक जब्त करने में नहीं हिचकिचाते जबकि उद्योगपतियों से करोड़ों रुपये की ऋण वसूलने के लिए कुछ नहीं कर पाते हैं ।
बहुत दिनों से यह सुन रहा हूं कि भारत और इंडिया के बीच की खाई बढ़ती जा रही है लेकिन अब यह खाई इतनी गहरा गई है कि समाज का एक वर्ग ऐसा है जो यह कहता है कि गरीबी तो नैचुरल फैनोमिना है जिससे निबटना सरकार का काम नहीं है, खुद उस वयक्ति को इस फैनोमिना से निबटना होगा । अगर वह गरीब रहना चाहता है तो कोई भी उसकी मदद नहीं कर पाएगा । ऐसी बातें कहनेवाली जो पीढ़ी है उसके लिए गरीबी तो एक शब्द मात्र है । उसने ना तो कभी गरीबी देखी और ना ही कभी गरीबी महसूस की । अगर आपको इस पीढ़ी को देखना हो तो किसी भी शॉपिंग मॉल के मेगा स्टोर में चले जाइए । कपड़ों और अपनी साज सज्जा पर बेतहाशा खर्च करनेवाले कई युवक –युवतियां नजर आ जाएंगें । जिनके लिए पैसे कोई मायने ही नहीं रखते । हमारे ताकतवर नेताओं, बेशुमार दौलत के मालिक उद्योगपतियों, प्राइवेट सेक्टर में शीर्ष पदों पर बैठे अधिकारियों के लिए पैसा की कोई अहमियत ही नहीं है ।
इस देश का दुर्भाग्य है कि हमारे जो नीति नियंता हैं उन्हें भी गरीबों की फिक्र नहीं है । गरीबों की समस्याएं किसी के लिए चिंता का सबब नहीं बनती । उन्हें गरीबों और आम आदमी की याद सिर्फ चुनाव के वक्त आती है । गरीबों को सत्ता की सीढ़ी की तरह इंदिरा गांधी ने भी गरीबी हटाओ का इमोशनल नारा देकर इस्तेमाल किया था और फिर दशकों बाद कांग्रेस ने आम आदमी को लुभाकर सत्ता हासिल की । आम आदमी को साल भर में एक खास अवधि के लिए रोजगार मिले इसके लिए ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना लाया गया । इस बात का जोरशोर से प्रचार किया गया कि इस ऐतिहासिक योजना से भारत की गरीबी दूर हो जाएगी । कई चुनाव विश्लेषकों और पंडितों का यह दावा है कि यूपीए-2 की जीत के लिए यही योजना जिम्मेदार है । लेकिन इस योजना में जिस तरह की भयंकर गड़बड़ियों की शिकायतें मिल रही है, जिस पैमाने पर भ्रष्टाचार हो रहा है उससे तो यही लगता है कि इस योजना का लाभ इसे लागू करनेवालों को ज्यादा हो रहा है । इसके प्रमाण राजस्थान से लेकर मध्यप्रदेश और झारखंड से लेकर उड़ीसा के किसी भी गांव में बगैर ढूंढे आपको मिल सकते हैं । जरूरत इस बात कि है कि देश के हुक्मरान गरीबों के लिए सिर्फ योजना ना बनाएं उसे गरीबों तक पहुंचाने के लिए प्रयास भी करें । दलितों के घर में रात बिताने से उनका उद्धार नहीं होगा, जरूरत इस बात कि देश का हर दलित और गरीब सम्मान के साथ जी सके इसका इंतजाम करने की सार्थक पहल होनी चाहिए ।
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